पृथ्वी पर भगवान के विभिन्न अवतार क्यों हैं?

Incarnation of God

तन से अधिक महत्वपूर्ण उसके कर्म होते हैं। भगवान विष्णु द्वारा भी कच्छप, मत्स्य और वाराह का अवतार लेकर, इन रूपों में संपूर्ण जगत का भरण पोषण करके, अपनी गरिमा बनाए रखी थी। जीव सिर्फ कठोर ही नहीं होते, बल्कि इनका अस्तित्व भी मनुष्यों की ही तरह दिव्यता से परिपूर्ण होता है। ईश्वर द्वारा कच्छप, मत्स्य और वाराहा का अवतार/Incarnation of gods लेकर, पशु जीवन के प्रति लगाव और सहानुभूति का संकेत दिया है।

ईश्वर का प्राथमिक अवतार क्या और क्यों था?/ What Was the First Incarnation of God and Why?

भगवान विष्णु का पहला अवतार मत्स्य का रूप था। वह चारों वेदों को राक्षस के कब्जे से बचाने और मनु को बाढ़ से बचाने के लिए उन्होने मत्स्य का अवतार/incarnation लिया गया था, जो कि ब्रह्म देव की चाल थी। वह जानते थे कि पृथ्वीलोक पर रहने वाले प्राणी वेदों की शुद्धि होने तक उसका उपयोग नहीं कर पाएंगे इसलिए उन्होंने प्राणियों के पूर्ण रूप से भ्रष्ट हो चुके सामाजिक मूल्यों और मानवता को फिर से स्थापित करने की आवश्यकता समझी।  

तब, उन्होंने मानवता को स्थापित करने और मनुष्य के अस्तित्व के लिए अनुकूल माहौल बनाने के लिए भगवान शिव से मदद मांगी। ब्रह्मदेव की भयंकर बाढ़ लाने की योजना को जानते हुए, भगवान विष्णु ने मानवता की पुनः स्थापना करने के लिए, मनु और उनकी पत्नी शतरूपा को बचाने के लिए मत्स्य रूप धारण किया था। 

ईश्वर का दूसरा अवतार क्या और क्यों था?/ What Was the Second Incarnation of God and Why?

भगवान विष्णु द्वारा, असुरों से देवताओं की सहायता करने के लिए कच्छप अवतार लिया गया था। देवता और असुर चचेरे भाई होने के बावजूद भी हर समय आपस में भिड़ते रहते थे, जिससे उनके बीच तनावों में वृद्धि होती गई। परिणामस्वरूप, देवताओं की  संत दुर्वासा द्वारा प्रदान की गई शक्तियां कम हो रही थीं। इसलिए, उन्होंने ब्रह्मदेव के पास जाकर उनसे मदद मांगी। ब्रह्माजी ने थोड़ी देर भगवान विष्णु के दूसरे जन्म- कूर्म अवतार/incarnation का ध्यान करते हुए कहा, "आइए, हम भगवान विष्णु से मदद लेते हैं जो हमेशा अपने भक्तों की मदद करते है।” तब भगवान विष्णु ने उन्हें असुरों को हराने का वरदान दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें कठोर परिश्रम द्वारा समुद्र मंथन करके अमृत प्राप्त करना होगा। इसके लिए उन्होंने मंदराचल पर्वत को मथनी रूप में और वासुकी (सर्पों के राजा) को पर्वत घुमाने की रस्सी के रूप में उपयोग करने को कहा। तब, देवताओं द्वारा मंदराचल पर्वत को कैसे हिलाया जा सकता है‌? इस प्रश्न के उठने पर भगवान विष्णु ने कहा, "मैं कच्छप रूप में अवतरित होकर, अपनी पीठ पर पर्वत का बोझ तब तक उठाऊंगा, जब तक कि समुद्र के मंथन द्वारा अमृत की प्राप्ति नहीं होती।

ईश्वर का तीसरा अवतार क्या और क्यों था?/ What Was the Third Incarnation of God and Why?

भगवान विष्णु का तीसरा अवतार/incarnation वाराह का था। वह इस रूप में धरती माता को हिरण्याक्ष के चंगुल से बचाने के लिए प्रकट हुए थे, क्योंकि असुर हिरण्याक्ष क्रोधोन्मत्त होकर ग्रह को चुराकर, ब्रह्मांडीय महासागर में डुबो देना चाहता था।

हिरण्याक्ष कौन था?/ Who was Hiranyaksha?

हिरण्याक्ष/Hiranyaksha एक असुर/Asur था, जिसने अपने पूर्वजन्म में भगवान विष्णु के निवास- वैकुंठ में द्वारपाल के रूप में कार्य किया था। उस समय, सनत कुमारों द्वारा उसे उनके भाई को श्री विष्णुजी से मिलने की अनुमति न देने के लिए फटकार लगाई गई थी। चारों कुमारों ने दोनों भाइयों को अंदर जाने देने के लिए झगड़ा किया, लेकिन जय और विजया ने उन्हें प्रवेश करने से मना कर दिया। हालांकि, श्रापित होने के बाद, जय और विजया ने सनत कुमारों को दया दिखाने के लिए कहा। तब उन्होंने कहा, कि अगले जन्म में भगवान विष्णु द्वारा मारे जाने पर ही उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी। तब, उन्होंने महसूस किया कि किसी को अपनी शक्तियों का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। अतः जय और विजया ने हिरण्यकश्यप/Hiranyakashyap और हिरण्याक्ष के रूप में जन्म लिया। दोनों भाइयों ने तीनों लोकों-देव लोक, पृथ्वी लोक और पाताल लोक में आतंक फैला रखा था। बाद में, लालचवश वह देवताओं से अधिक शक्तिशाली बनकर, अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करना चाहते थे।