अन्नप्राशन संस्कार क्यों महत्वपूर्ण है?

अन्नप्राशन संस्कार

नवजात शिशु के छह माह का होने पर अन्नप्राशन संस्कार/Annaprashan Sanskar किया जाता है। शास्त्रों में आहार को मनुष्य की आत्मा कहा गया है। गीता में बताया गया है कि आहार का उपभोग करने के कारण ही मनुष्य जीवित रहता है और मानसिक शक्ति का निर्माण करता है। अतः जीवन के लिए आहार का अत्यधिक महत्व होता है। नवजात शिशु द्वारा, मां के गर्भ में मौजूद दूषित कणों को शरीर से बाहर निकालने और शुद्ध आहार को खिलाने की प्रक्रिया को अन्नप्राशन संस्कार/ Annaprashan Sanskar कहा जाता है।

(अन्नाशनान्मातृगर्भेमलाशाद्यपिशुद्धय्ति।) शिशु के छह या सात माह का होने पर, उसे पहली बार पेय पदार्थों, दूध आदि के अलावा अनाज खिलाया जाता है। इस संस्कार का उद्देश्य, शिशु को पवित्र आहार प्राप्त कराना होता है। छांदोग्य उपनिषद में बताया गया है कि पौष्टिक भोजन से ही तन और मन स्वस्थ रहता है और स्वस्थ मन ही आत्मज्ञान का एकमात्र साधन है, तथा आहार शुद्ध होने पर ही, विवेक की शुद्धि होती है।

आहारशुद्धौ सत्वशुद्धि:

इस श्लोक का अर्थ है कि शुद्ध भोजन करने से मानव शरीर में गुणों की वृद्धि होती है। एक उचित आहार शरीर, मन, बुद्धि, कुशाग्रता और आत्मा का पोषण करता है। इस कारण अन्नप्राशन को संस्कार स्वरूप ग्रहण करके, जीवन में केवल शुद्ध, सात्विक और पौष्टिक आहार का संकल्प करने के लिए, अन्नप्राशन संस्कार/Annaprashan Sanskar किया जाता है।

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