अयोध्या आज मुस्कुरा रही है

आज अयोध्या की हवा कुछ अलग है।

यह मुस्कान अचानक नहीं आई,

यह सदियों की प्रतीक्षा के बाद खिली है।

हर सुबह जलता एक दीपक… एक उम्मीद के नाम

हर सुबह अयोध्या की गलियों में

एक बूढ़ी औरत

चुपचाप एक दीपक जलाया करती थी।

किसके लिए? — एक सवाल, एक विश्वास

लोग पूछते—

“किसके लिए?”

वो बिना रुके बस कहती—

“घर लौटने वाले के लिए।”

घर लौटने वाले का इंतज़ार

उसके लिए राम कोई कहानी नहीं थे,

वो एक वादा थे—

जो कभी टूटता नहीं।

आँखों ने बहुत कुछ देखा, दिल ने राम को संभाले रखा

उसकी आँखों ने

भीड़ देखी, शोर देखा, विवाद देखे…

लेकिन दिल में

सिर्फ राम का नाम बचा रहा।

हाथ काँपे, दीपक छोटा हुआ… पर प्रतीक्षा नहीं

बरसों बीते,

हाथ काँपने लगे,

दीपक छोटा होता गया…

पर इंतज़ार कभी कम नहीं हुआ।

वो सुबह, जब हवा ने कुछ और कहा

फिर एक सुबह आई,

जो रोज़ जैसी नहीं थी।

हवा में कुछ बदला हुआ था।

शंखनाद गूँजा, अयोध्या जाग उठी

शंखनाद गूँजा,

और अयोध्या जैसे नींद से जाग उठी।

दीपों की कतारें और राम नाम से भरी हवा

चारों ओर दीपों की कतारें थीं,

शंखनाद गूँज रहा था,

और पूरी अयोध्या

राम के नाम से भर गई थी।

पहली बार इंतज़ार ने मुस्कान ओढ़ ली

बूढ़ी औरत ने काँपते हाथों से

दीपक जलाया…

और पहली बार

मुस्कुराई।

आज राम अपने अयोध्या लौट आए हैं

वो धीरे से बोली—

आज राम

अपने अयोध्या लौट आए हैं।

उत्सव, आँसू और एक गहरा सुकून

उस दिन अयोध्या में

उत्सव भी था,

आँसू भी थे,

और एक गहरा सुकून भी।

क्योंकि जब राम लौटते हैं…

क्योंकि कुछ लौटना

सिर्फ आना नहीं होता,

वो आत्मा को छू जाता है।

सिर्फ मंदिर नहीं बनता, सदियों का इंतज़ार घर बन जाता है

जब राम लौटते हैं,

तो सिर्फ मंदिर नहीं बनता—

सदियों का इंतज़ार

घर बन जाता है।


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