कैलाश पर्वत पर शांति थी…
हिम की चादर ओढ़े महादेव
ध्यान में लीन थे।
वैराग्य उनका आभूषण था
और मौन उनकी भाषा।
देवताओं और ऋषियों ने देखा—
सृष्टि चल रही है,
पर शिव अकेले हैं।
वे कैलाश पहुँचे और
विनम्र स्वर में बोले—
“हे महादेव, अब विवाह का समय है।”
महादेव ने नेत्र खोले और कहा—
“मैं योगी हूँ, तपस्वी हूँ।
कौन स्त्री मेरे साथ
इस कठोर साधना का पथ चलेगी?
कौन योगिनी बनकर भी
गृहस्थ जीवन निभा पाएगी?”
यह सुनकर सभी समझ गए—
महादेव विवाह से नहीं,
असंगति से डरते हैं।
वे ऐसी संगिनी चाहते थे
जो प्रेम भी समझे
और तप भी।
तभी ब्रह्मा जी आगे आए।
मुस्कुराते हुए बोले—
“ऐसी स्त्री है, महादेव।
मेरी पौत्री सती—
जो प्रेम में भी तपस्विनी है।”
सती…
जो शिव के मौन में भी
उनका हृदय सुन सकती थीं।
जो योगी को भी अपनाती थीं
और गृहस्थ को भी।
यह केवल विवाह का प्रस्ताव नहीं था।
यह शिव और शक्ति के
मिलन का संकेत था।
जहाँ से सृष्टि को
नई दिशा मिलनी थी।
ज्योतिष कहता है—
जब कुंडली में
संयम (शिव) और भावना (शक्ति)
का संतुलन बनता है,
तभी सच्चा विवाह योग बनता है।
शिव-सती की कथा बताती है—
विवाह दो शरीरों का नहीं,
दो कर्मों और आत्माओं का मिलन है।