नारी तपस्या का अद्भुत प्रभाव

यह सिर्फ तप नहीं था…

यह प्रेम, समर्पण और शिव-भक्ति की पराकाष्ठा थी।

यह कथा है सती की दिव्य तपस्या की।

सती का अडिग संकल्प

भगवान शिव को पाने के लिए

सती ने सुख-सुविधा का त्याग किया।

उन्होंने कठोर तप करने का व्रत लिया—

केवल शिव, और कुछ नहीं।

राजकुमारी से तपस्विनी तक

सती ने राजसी वस्त्र त्यागे,

तपस्विनी का वेश धारण किया

और नदी के तट पर

भगवान शिव की आराधना शुरू की।

भूख, जल और मंत्रों की अग्नि

उपवास, मौन और

पवित्र मंत्रों का निरंतर जाप…

सती की तपस्या

हर सांस के साथ और गहरी होती गई।

भीगे वस्त्र, अडिग भक्ति

नदी में स्नान कर

भीगे वस्त्रों में ही

सती घंटों शिव का ध्यान करतीं।

उनका मन—पूरी तरह शिवमय था।

जब स्वर्ग भी विचलित हो उठा

सती की तपस्या देखकर

स्वर्गलोक चकित रह गया।

भगवान विष्णु, ब्रह्मा,

देवियाँ और ऋषि पृथ्वी पर उतरे।

भक्ति में इतनी लीन कि देवता भी अदृश्य

देवताओं का आगमन भी

सती को महसूस नहीं हुआ।

उनका चित्त इतना स्थिर था

कि संसार थम सा गया।

आशीर्वाद देने आए थे… स्वयं झुक गए

सती की भक्ति से अभिभूत होकर

देवता और ऋषि

उन्हें प्रणाम करने लगे।

आशीर्वाद देने नहीं—

आशीर्वाद मांगने।

जब तपस्या ने ग्रहों को भी झुका दिया

ज्योतिष कहता है—

जब शुक्र भक्ति बने,

चंद्र मन पर स्थिर हो,

और शनि तप में परिवर्तित हो जाए,

तो साधक की चेतना

देवताओं से भी ऊँची हो जाती है।

सती की तपस्या

एक संकेत है—

जब कुंडली से अहंकार हटता है,

तो ईश्वर स्वयं मार्ग दिखाते हैं।


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