सती…
एक राजकुमारी नहीं,
बल्कि भक्ति की वह ज्वाला
जिसने स्वयं महादेव का ध्यान खींच लिया।
यह कहानी है—
तप, त्याग और दिव्य प्रेम की।
ब्रह्मा जी बोले—
“ऐसी एकाग्रता मैंने कभी किसी स्त्री में नहीं देखी।
सती केवल तप नहीं कर रहीं,
वह स्वयं शिव को पुकार रही हैं।”
यही वह क्षण था
जब ब्रह्मांड ने संकेत दे दिया।
जब प्रेम सच्चा हो,
तो स्वयं नारायण भी मध्यस्थ बनते हैं।
विष्णु जी ने महादेव से कहा—
“हे प्रभु, सती को उसका वरदान दीजिए…
और उसे अपनी अर्धांगिनी बनाइए।
महादेव मौन थे…
पर उनका मौन ही उनकी स्वीकृति था।
त्रिदेवों की वाणी सुनकर
शिव ने स्वयं सती के पास जाने का निश्चय किया।
आँखें खुलीं…
और सामने स्वयं महादेव।
सती ने चरणों में शीश झुका दिया।
शिव बोले—
“तुम्हारी भक्ति से मैं प्रसन्न हूँ।
बताओ, क्या वर चाहती हो?
सती सोचती रहीं—
मैं उनसे कैसे कहूँ कि वही मेरा वर हैं?
संकोच में शब्द अधूरे रह गए—
“हे प्रभु, क्या आप…
महादेव मुस्कुराए।
और बोले—
“मुझसे विवाह करो, सती।”
यह प्रस्ताव नहीं था,
यह आत्माओं का पुनर्मिलन था।
ज्योतिष की दृष्टि से,
यह शिव-सती मिलन दर्शाता है—
🔹 जब कुंडली में तप (शनि) और भक्ति (केतु) सक्रिय होते हैं
🔹 और शुक्र पवित्र प्रेम का संकेत देता है
🔹 तब जीवन में दैवी जीवनसाथी का योग बनता है
यही कारण है—
कुछ रिश्ते बनाए नहीं जाते,
वे पूर्वजन्मों से तय होते हैं।