भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी
भगवान गणेश का वह विशेष दिन है
जब चंद्र और गणपति की संयुक्त कृपा मिलती है।
“भाल” यानी मस्तक
“चंद्र” यानी चंद्रमा
इस रूप में गणेश जी
अपने मस्तक पर चंद्र धारण करते हैं।
यह मन, भावनाओं और मानसिक शांति का प्रतीक है।
इस दिन रखा गया व्रत:
चंद्र दोष कम करता है
मानसिक तनाव घटाता है
अटके कार्यों में गति देता है
मान्यता है कि सच्ची श्रद्धा से किया गया व्रत जीवन की बड़ी रुकावटें हटा सकता है।
संकष्टी चतुर्थी का व्रत
चंद्र दर्शन के बाद ही पूर्ण माना जाता है।
रात को चंद्रमा को अर्घ्य देकर
“ॐ गं गणपतये नमः” का जप
विशेष फलदायी माना जाता है।
सफेद वस्त्र धारण करें
चावल और दूध का दान करें
चंद्रमा को जल अर्पित करें
कहा जाता है कि इससे मन की अशांति दूर होती है।
भालचंद्र गणेश की पूजा
बुद्धि और निर्णय क्षमता को मजबूत करती है।
व्यापार, नौकरी और परीक्षा में
सफलता के योग बढ़ सकते हैं।
क्रोध और अपशब्द
झूठ बोलना
चंद्र दर्शन किए बिना भोजन
संयम और शांति इस व्रत की असली कुंजी है।
गणेश जी को 11 दूर्वा अर्पित करें
और घी का दीपक जलाएं।
मान्यता है कि
यह उपाय बाधाओं को तेजी से दूर करता है।
यह दिन
मन और भाग्य दोनों को संतुलित करने का अवसर है।
जहां श्रद्धा है,
वहां संकट टिक नहीं सकते।
अगर जीवन में रुकावटें हैं,
तो इस चतुर्थी
पूरे विधि-विधान से व्रत रखें।
हो सकता है
यही दिन आपके लिए नई शुरुआत बन जाए।
गणपति बप्पा मोरया!