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MAUNI AMAVASYA

MAUNI AMAVASYA

मौनी अमावस्या का महत्त्व

चन्द्रमा को मन का स्वामी माना गया है और अमावस्या को चन्द्रदर्शन नहीं होते, जिससे मन की स्थिति कमज़ोर होती है। इसलिए इस दिन मौन व्रत रखकर मन को संयम में रखने का विधान बनाया गया है। शास्त्रों में भी वर्णित है कि होंठों से ईश्वर का जाप करने से जितना पुण्य मिलता है, उससे कई गुणा अधिक पुण्य मन में हरि का नाम लेने से मिलता है। चूंकि इस व्रत को करने वाले को पूरे दिन मौन व्रत का पालन करना होता है, इसलिए यह योग पर आधारित व्रत भी कहलाता है। मौनी अमावस्या के दिन संतों की तरह चुप रहें तो उत्तम है। अगर चुप रहना संभव नहीं है तो कम से कम अपने मुख से कोई भी कटु शब्द न निकालें। इस दिन भगवान विष्णु और शिव दोनों की पूजा का विधान है।

मौनी अमावस्या व्रत विधि

मौनी अमावस्या का हिन्दू धर्म में विशेष महत्त्व है। माघ माह में कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मौनी अमावस्या कहते हैं। इस दिन मौन रहना चाहिए। मुनि शब्द से ही 'मौनी' की उत्पत्ति हुई है। इसलिए इस व्रत को मौन धारण करके समापन करने वाले को मुनि पद की प्राप्ति होती है। इस दिन मौन रहकर यमुना या गंगा में स्नान करना चाहिए। यदि यह अमावस्या सोमवार के दिन हो तो इसका महत्त्व और भी अधिक बढ़ जाता है। माघ मास के स्नान  का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण पर्व अमावस्या ही है। माघ मास की अमावस्या और पूर्णिमा दोनों ही तिथियाँ पर्व हैं। इन दिनों में पृथ्वी के किसी-न-किसी भाग में सूर्य या चंद्रमा को ग्रहण हो सकता है। इस दिन दान आदि पुण्य कर्म किया जाता हैं |