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SIDDHIDHATRI THE HUGE DURGA

siddhidhatri vinay bajrangi

सिद्धिदात्री 
नवम नवरात्रि को सिद्धिदात्री माता कि पूजा कि जाती हैं |
वंदना मन्त्र 
सिद्धगन्‍धर्वयक्षाद्यैर सुरैरमरैरपि |
सेव्यमाना सदा भूयात सिद्धिदा सिद्धिदायिनी ||
नव दुर्गा पूजन के नौवें  दिन साधक माँ दुर्गा के नौवें स्वरुप सिद्धिदात्री माता का ध्यान करने वाले  साधक को इनकी उपासना से इस संसार कि वास्तविकता का बोध होता है |  वास्तविकता परम शक्तिदायक अमृत पद कि और ले जाने वाली होती हैं साधको को सभी प्रकार कि सिद्धियां प्राप्त होती हैं | 
उपयुर्क्त मंत्र का जप  शुद्ध उच्चारणपूर्वक क्रिस्टल कि माला से 108 बार करें तथा अम्बा  जी कि आरती करने के बाद , कालरात्रि माता कि ताम्बें का चित्र युक्त बीसा यंत्र  सभी देवी भक्तो में बांटें तो और भी अधिक लाभ प्राप्त होता हैं |

कुछ जानकारी  माँ सिद्धिदात्री  की :

माँ सिद्धिदात्री दुर्गा माँ का नौवा रूप है सिद्धिदात्री का अर्थ है सिद्धि देने वाली माँ , सिद्धिदात्री की पूजा करने से हमे आठ सिद्धियां प्राप्त होती है जो इस प्रकार है |

१- अनिमा

२- महिमा

३- गरिमा

४ - लहिमा

५- प्राप्ति

६- प्रकाम्य

७- लेषित्वा

८- वशित्व

 भगवान शिव के द्वारा महाशक्ति की पूजा करने पर माँ शक्ति ने  प्रसन्न होकर उन्हें यह आठों सिद्धियां प्रदान की थी | यह माँ दुर्गा का सबसे शक्तिशाली रूप है | क्योंकि यह रूप सभी देवताओं के तेज से प्रकट हुआ है | असुर महिषासुर के अत्याचार से परेशान होकर सब देवगण शंकर भगवान एवं विष्णु भगवान के पास सहायता के लिए गए | तब उन सभी से एक - एक तेज उत्पन्न हुआ | उस तेज से एक नारी का निर्माण हुआ | जिन्हे सिद्धिदात्री के नाम से जाना गया | इस प्रकार माँ सिद्धिदात्री में अनेक देवताओं का वास है जैसे :

* श्री विष्णु भगवान से प्रकट तेज से भुजाएं बनीं |

* महादेव के तेज से मुख बना |

* चन्द्रमा के तेज से  वक्ष स्थल की रचना हुई |

* यमराज के तेज से केश उत्पन्न हुए |

* सूर्य देव के तेज से पैर की ऊँगली बनी |

* कुबेरदेव के तेज से नाक  की रचना हुई |

* इंद्र भगवान के तेज से दांतो की उत्पत्ति हुई |

* अग्नि देव के तेज से तीनो नेत्रों की रचना हुई |

* वायु देव के तेज से कानों की उत्पत्ति हुई |

 

 इस प्रकार महा सिद्धिदात्री की उत्पत्ति हुई जो महा शक्ति के नाम से विख्यात हुईं| इन्हे असुर महिषासुर का वध करने हेतु प्रकट किया गया | सभी देवगणों ने इन्हे अपने-अपने शस्त्र देकर सुशोभित किया |

*  विष्णु भगवान ने  अपना सुदर्शन चक्र अर्पण किया |

*  महादेव जी ने अपना त्रिशूल भेंट किया |

*  वरुण देव ने अपना शंख अर्पित किया |

*  प्रजापति देव ने अपना वज्र  और घंटा प्रदान किया |

*  अग्नि देव ने प्रचंड शक्ति भेंट की |

*  पवन देव ने धनुष वाण अर्पण किया |

*  सूर्य देव ने असीम तेज अर्पण किया |

*  पर्वतराज हिमालय ने सवारी के लिए सिंह भेंट किया |

*  ब्रह्म देव ने कमंडल अर्पण किया |

*  समुद्रदेव ने इन्हे समस्त आभूषणों से सुसज्जित किया |

*  कुबेर देव ने इन्हें मधुपात्र दिया |

 

इस तरह विभिन्न शस्त्र से सुसज्जित माँ दुर्गा का ये सिद्धिदात्री रूप प्रकट हुआ | असुर महिषासुर जो की अत्यंत बलशाली एवं पराक्रमी था , उसने अपने बल से देवताओं युद्ध जीतकर स्वर्ग छीन  लिया था |

उसका विनाश करने हेतु माँ सिद्धिदात्री का अवतरण हुआ | तब महा शक्ति ने महिषासुर का वध करने के उपरांत स्वर्ग देवताओं को वापस किया |

जो साधक इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार पूर्ण निष्ठा से एकाग्र होकर आराधना करता है वह सभी सिद्धियों को प्राप्त करता है इनकी आराधन से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती है | देवी सिद्धिदात्री की पूजा के लिए नवाहन प्रसाद , नवरस युक्त भोजन तथा नौ प्रकार के फल- फूल अर्पण किये जाने चाहिए |

माँ सिद्धिदात्री को माँ सरस्वती का भी प्रतिरूप है |

जो सफ़ेद वस्त्र धारण किये अपने भक्तो को असीम ज्ञान प्रदान करती हैं|

मंत्र

सिद्धगंधर्वयक्षाद्यैरसुरैररमरैरपि।

सेव्यमाना सदा भूयात सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।

 

माँ सिद्धिदात्री का ज्योतिष सम्बन्ध :                                        

माँ सिद्धिदात्री कुंडली के त्रिकोणो में वास करती है | उनकी आराधना करने से यदि हमें  उनकी अनुकम्पा प्राप्त होती है,  तो कुंडली का प्रथम त्रिकोण यानि भाव , पहला भाव, भाव पांचवा , और भाव नवां बलयुक्त हो जाते है| और जातक के जीवन में भाग्य प्रबलता के साथ प्रवेश करता है साथ -साथ रोगविहीन लम्बी आयु मिलती है |