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Parshuram Jayanti

parshuram jayanti

भगवान  परशुराम जयंती पंचांग के वैशाख माह के शुक्लपक्ष तृतीया को मनाई जाती हैं

परशुराम शब्द का अर्थ ,

परशुराम दो शब्दो को मिला कर बना है परशुराम अर्थात कुल्हाड़ी तथा राम इन दो शब्दो को मिलने पर कुल्हाड़ी के साथ राम अर्थ निकलता है जैसे राम भगवान विष्णु के अवतार थे उसी प्रकार परशुराम भी विष्णु के अवतार थे इसलिए परशुराम को विष्णु तथा राम जी के समान शक्तिशाली माना जाता है |

परशुराम के अनेक नाम है जैसे -रामभद्र ,भार्गव ,भृगुपति  ( ऋषिभृगु  के वंशज) जमदग्न्य ( जमदग्नि के पुत्र ) के नाम से जाना जाता है |

परशुराम कौन थे –

 भगवान विष्णु के छठे अवतार के रूप में परशुराम पृथ्वी पर अवतरित हुए |सदियों पुरानी बात हैं कि कन्नौज में गाधि नाम के राजा राज किया करते थे | उनकी कन्या रूप गुण से संपन्न थी | उनका नाम सत्यवती  था विवाह योग्य होने पर सत्यवती का विवाह भृगु ऋषि के पुत्र ऋषिक के साथ हुआ था | विवाहोपरांत जब ऋषि   भृगु ने अपनी पुत्र वधु को वरदान मांगने के लिए कहा था तब सत्यवती ने अपनी माता के लिए पुत्र की कामना की  थी | भृगु ऋषि ने दो चरु पात्र देते हुए कहा कि इन दोनों पात्रों में से एक तुम्हारे लिए हैं और दूसरा तुम्हारी  माता के लिए हैं | जब तुम दोनों ऋतु स्नान कर चुकी हो  तब तुम गूलर के वृक्ष का आलिंगन कर तथा तुम्हारी माता पीपल के वृक्ष का आलंगिन कर अपने-अपने  चरु पात्र ग्रहण करना तब तुम दोनों की मनोकामना  अवश्य पूरी होगी  | परन्तु जब उसकी माँ ने ये सुना तो उसके ह्रदय में कपट उत्पन्न हुआ और उसने अपनी बेटी के चरु पात्र से अपना चरु पात्र बदल दिया | समयानुसार जब दोनों ने चरु पात्र ग्रहण किया तब  भृगु ऋषि को अपनी दिव्य दृष्टि से उसकी पुत्रवधु से उसकी माँ द्वारा किया छल ज्ञात हुआ और उन्होंने अपनी पुत्रवधु को बतलाया कि तुम्हारी संतान ब्राह्मण तो अवश्य होगी परन्तु उसमे गुण क्षत्रिये के होंगे और इसका ठीक विपरीत तुम्हारी माँ का पुत्र होगा ,तब उसने भृगु ऋषि से विनती करते हुए कि मेरा पौत्र भले ही क्षत्रिय गुण वाला लेकिन पुत्र एक ब्राह्मण का ही व्यवहार करे  |  इस प्रकार भृगु ऋषि ने उसकी विनती स्वीकार की  और उसके सप्तऋषिओं में सातवें स्थान के ऋषि जमदग्नि का जन्म हुआ  और ऋषि जमदग्नि के पांचवे पुत्र थे श्री परुशराम | जो कि जाति से ब्राह्मण थे परन्तु गुण क्षत्रिये के थे भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम थे |

अपने शिष्य भीष्म को नहीं कर सके पराजित -

 भीष्म ने भगवान परशुराम से ही अस्त्र -शस्त्र कि विद्या का ज्ञान प्राप्त किया | एक बार भीष्म काशी में हो रहे स्वयंवर से काशिराज कि पुत्रियों अम्बा , अम्बिका और बालिका को अपने छोटे भाई के लिए विचित्रवार्य से उठा लाए  थे  | तब अम्बा ने भीष्म को बताया था कि वो अपने मन से किसी और को अपना पति मान चुकी थी | तब अम्बा अपनी रक्षा के लिए परशुराम  जी की शरण में गयीं और तब  परशुराम और उनके शिष्य भीष्म के बीच लगभग अठारह दिन तक युद्ध चला परन्तु भीष्म को अपने पिता द्वारा इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त होने कि वजह से परशुराम जी को हार का सामना करना पडा |

क्षत्रियों को ख़त्म करने की सौगंध -

एक बार  हहैयवंश क्षत्रियों के राजा सहस्त्रार्जुन श्री परशुराम  के पिता जमदग्नि के आश्रम गये |वह ऋषि जमदग्नि से उनके आश्रम में उपस्थित कामधेनु गाय मांगने लगे परन्तु अतिप्रिय होने कि वजह से ऋषि ने वह देने से इनकार कर दिया तब राजा ने उसे अपना अपमान  समझा और क्रोध में आकर युद्ध कर ऋषि जमदग्नि की हत्या कर दी और वह गाय आश्रम से ले गये | जब परशुराम जी को इस घटना का पता चला तो उन्होंने हहैयवंश के सभी क्षत्रिओं का नाश करने का संकल्प ले लिया |जब क्षत्रियों ने परशुराम का संकल्प सुना तब वे पृथ्वी छोड़ कर भागने लगे लेकिन इक्कीस बार युद्ध करके परशुराम ने सभी क्षत्रियों का नाश कर  हहैयवंश को समाप्त किया  | और फिर भी उनका क्रोध शांत नहीं  हो  रहा था तब कश्यप मुनि ने परशुराम को पृथ्वी छोड़ने का आदेश दे दिया था | मुनि कश्यप कि आज्ञा का पालन करते हुए महेंद्रगिरी के महेंद्र पर्वत पर रहने लगे | वहां उन्होंने कई वर्षो  तपस्या की थी | और इसीलिये महेन्द्रगिरि को परशुराम जी का निवास स्थान भी माना जाता हैं |