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Akshaya Tratiya

Akshya Tratiya

अक्षय तृतीया

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अक्षय तृतीया का हिन्दू धर्म में बहुत बड़ा महत्त्व है | " क्षयति इति अक्षय”अर्थात  जिसका कभी क्षय न हो उसे अक्षय कहते हैं | वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाता है। इस दिन किये जाने वाले  शुभ कार्य का फल अक्षय होता है |इस दिन  दिए जाने वाले दान का भी बहुत महत्त्व होता है | ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस दिन किया जाने वाला दान अक्षुण रहता है |

 क्या है, इस दिन के महत्त्व का मुख्य कारण

आइये मैं  डॉ विनय बजरंगी आपको बताता हूँ  कि इस दिन का इतना महत्त्व क्यों है ? इस दिन सूर्य और चंद्र दोनों ग्रह अपने परमोच्च अंश  पर  रहते हैं | इस दिन सूर्य भच्रक के १० अंश पर  उच्च का   होता है और चन्द्रमा भच्रक के ३३ अंश पर उच्च का होता है |

 ज्योतिष के अनुसार कुंडली में यदि बहुत से शुभ योग हों ,तब भी वह  पूर्ण रूप से तब तक फलीभूत नहीं होते जब  तक कुंडली में सूर्य एवं चन्द्रमा में बल न हो |अतः इस दिन किये गए दान सूर्य एवं चन्द्रमा को बलि करते हैं | इससे जातक को सूर्य एवं चन्द्रमा का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त होता है | और कुंडली के  शुभ  योग पूर्णतः फलीभूत होते हैं |

कहते हैं इस दिन  भगवान् सूर्य ने पांडवों को अक्षय पात्र भेंट किया था |इसका अभिप्राय यह है कि यदि इस दिन भगवान् सूर्य का आशीर्वाद प्राप्त किया जाय तो घर में धन धान्य और सुख समृद्धि कि कमी नहीं रहती |

शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान् कृष्ण और सुदामा का पुनः  मिलाप  हुआ था | भगवान् कृष्ण चन्द्रवंशिये हैं | चन्द्रमा मन का भी कारक भी  होता है  |  और सुदामा जो कि   निस्वार्थ भक्ति का प्रतीक हैं|अर्थात यदि निस्वार्थ भक्ति के साथ मन को प्रभु को समर्पित किया जाए तो प्रभु वैसे ही प्रस्सन होते हैं जैसे वो सुदामा कि भक्ति से प्रस्सन  हुए थे  |

अक्षय तृतीया को युगादि तिथि भी कहा जाता है |युग +आदि अर्थात एक युग का आरम्भ |शास्त्रों के अनुसार इस दिन त्रेता युग का आरम्भ हुआ था और त्रेता युग में ही भगवान् राम का जन्म हुआ था जो कि सूर्य वंशी थे |इस दिन सूर्य पूर्ण बलि होता है |

इस दिन भगवान् परशुराम का भी जन्म हुआ था जिन्होंने  ब्राह्मणत्व अर्थात सत्वगुण को बढ़ावा देने के लिए  , एवं रजस  एवं  तमस का अंत करने के लिए कई प्रयास किये थे |

इसी दिन भगवान परशुरामका जन्म होनेके कारण इसे परशुराम तीज भी कहा जाता है। इस दिन गंगा-स्नान तथा  भगवान श्री कृष्ण को चंदन लगाने का विशेष महत्त्व है। कहा जाता है कि इस दिन जिनका परिणय-संस्कार होता है उनका सौभाग्य अखंड रहता है। इस दिन महालक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए भी विशेष अनुष्ठान करने का विधान है। इस दिन माँ लक्ष्मी यथाशीघ्र प्रसन्न होती है और अनुष्ठान करता धन-धान्य से परिपूर्ण हो जाता है साथ ही पुण्य को भी प्राप्त करता है। अक्षय तृतीया अनंत-अक्षय-अक्षुण्ण फलप्रदान करने वाला दिन कहा जाता है।

पुराणों में भविष्य पुराण के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन ही सत्युग एवं त्रेतायुग का प्रारंभ हुआ था। भगवान विष्णु के 24  अवतारों में भगवान परशुराम, नर-नारायण एवं हयग्रीव आदि तीन अवतार अक्षय तृतीया के दिन ही इस पृथ्वी पर आए। प्रसिद्ध तीर्थस्थल बद्रीनारायण के कपाट भी अक्षय तृतीया को खुलते हैं। वृंदावन के बांके बिहारी के चरण दर्शन केवल अक्षय तृतीया को ही होते हैं।

भगवान श्री कृष्ण ने भी अक्षय तृतीया के महत्त्व के सम्बन्ध में बताते हुए युधिष्ठर से कहते हैं कि हे राजन इस तिथि पर किए गए दान तथा  हवन का कभी  क्षय नहीं होता अतएव  हमारे ऋषि-मुनियोंने इसे ‘अक्षय तृतीया’ कहा है।

अक्षय तृतीया के दिन क्या करना शुभ है

शास्त्रानुसार इस दिन को स्वयंसिद्ध मुहूर्त माना गया है। इस दिन बिना पंचांग देखे कोई भी शुभ कार्य किया जा सकता है | इस दिन स्वर्ण आभूषण खरीदने का विशेष महत्व है | जो कि लक्ष्मी जी का प्रतीक हैं | इस दिन कंप्यूटर, मोबाइल, फ्रिज,गाड़ी आदि खरीदना शुभ   माना  जाता है | इस दिन भूमि पूजन, गृह प्रवेश, पदभार ग्रहण या कोई नया व्यापार प्रारंभ बिना पंचांग देखे कर सकते हैं |

अक्षय तृतीया मनाने की विधि

नित्य क्रिया से निवृत्त होकर, स्नान आदि करके श्री विष्णु भगवान की विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। इस दिन  पितृतर्पण करना चाहिए। शास्त्रों में  ऐसी  मान्यता है कि, इस दिन बिना पिंड दान  दिए केवल  ब्राह्मण को भोजन के रूप में श्राद्ध कर्म करना चाहिए। यदि यह संभव न हो, तो कम से कम तिल तर्पण अवश्य  करना चाहिए।  इस दिन छाता दान करना अत्यंत शुभ  माना जाता है

स्त्रियोंके लिए यह दिन अति महत्त्वपूर्ण होता है।  इस दिन  चैत्रगौरी का  विसर्जन किया जाता है। इस कारण स्त्रियां इस दिन अपने घर पर सुहागनों को बुलाकर उन्हें हल्दी कुमकुम लगाती हैं और उपहार देती है

पूर्वजों को गति हेतु तिल तर्पण का विधान

पूर्वजों को गति हेतु तिल तर्पण का विधान है तिल तर्पण  पूर्वजों को तिल तथा जल अर्पित करने का विधान है।

तिलतर्पण का अर्थ है, देवता को तिलके रूपमें  शरणागत भाव अर्पण करना। तिल अर्पण करते समय भाव रखना चाहिए कि ‘ईश्वर के द्वारा ही सब कुछ मुझसे करवाया जा रहा है। अर्थात तिल-तर्पण के समय साधक में  किसी भी तरह अहंकार की भावना नहीं होनी चाहिए।

 अक्षय तृतीया से सम्बंधित अन्य जानकारी

आज ही के दिन माँ अन्नपूर्णा का जन्म भी हुआ था

आज ही के दिन कुबेर को खजाना मिला था ।

ब्रह्मा जी के पुत्र अक्षय कुमार का अवतरण भी आज ही के दिन हुआ था ।

बृंदावन के बाँके बिहारी मंदिर में आज ही के दिन श्री विग्रह चरण के दर्शन होते है

महाभारत का युद्ध  भी अक्षय तृतीया के दिन ही समाप्त हुआ था ।