मिडिल ईस्ट में तनाव: अमेरिका और ईरान: हाल के समय में अमेरिका और ईरान के बीच राजनीतिक और सैन्य तनाव में वृद्धि देखी जा रही है। ईरान में व्यापक विरोध-प्रदर्शन, इंटरनेट बंदी और अस्थिरता के बीच, सुरक्षा स्थिति पूरी तरह गंभीर बनी हुई है। भारत ने भी ईरान से भारतीय नागरिकों को सुरक्षित बाहर निकलने की सलाह दी है, जो कि बढ़ते तनाव का सीधा संकेत है। यूरो-अमेरिकन शक्तियों और मध्य-पूर्व की नीतिगत टकराहट को विश्व राजनीति की बड़ी समस्याओं में से एक माना जा रहा है। यह वह क्षेत्र है जहां तेल, सुरक्षा, और सामरिक सामर्थ्य के मुद्दे सीधे दूसरे देशों की नीतियों को प्रभावित करते हैं। भारत का नजरिया: कूटनीति और संतुलन: भारत इस समय कूटनीतिक रूप से बेहद सक्रिय भूमिका निभा रहा है। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची से फोन पर विस्तार से बातचीत की है, जिसमें उन्होंने बढ़ती स्थिति, शांतिपूर्ण समाधान और भारतीय सुरक्षा चिंताओं पर चर्चा की। इस बातचीत के दौरान भारत ने दो मुख्य संदेश दिए:क्षेत्र में तनाव को कम करने की अपीलसाझे हितों और सहयोग के लिए संवाद को प्राथमिकता देनाये संकेत दिखाते हैं कि भारत सधार्मिक और रणनीतिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा है, जिससे संघर्ष की संभावना को नियंत्रित किया जा सके।इसके अलावा, भारत और ईरान के बीच पहले भी बिलैटरल बैठकें और सहयोग होते रहे हैं — जैसे 20वीं संयुक्त आयोग बैठक जहां दोनों पक्षों ने आर्थिक, सांस्कृतिक और सुरक्षा मुद्दों पर बातचीत की थी, और चाबहार पोर्ट व INSTC कनेक्टिविटी जैसे बड़े पारिस्थितिक ढांचे पर सहमति जताई थी। क्या तीसरा विश्वयुद्ध की आशंका बढ़ रही है?: यह सवाल आज बहुतों के मन में है। जब दो बड़े वैश्विक खिलाड़ी टकराव की कगार पर हों, तो आशंका स्वाभाविक लगती है।लेकिन ज्योतिषीय दृष्टि से:ऐसे समय में जब मंगल, शनि और राहु का प्रभाव बलवत्तर होता है,संघर्ष की ऊर्जा बढ़ती हैसाथ ही बुध और गुरु के संतुलन से संवाद की राह भी खुलती हैइसका मतलब यह है कि परिस्थितियाँ सिर्फ टकराव की ओर ही नहीं, बल्कि संवाद और कूटनीति की ओर भी अग्रसर हो सकती हैं।ज्योतिष का कहना है कि जब ग्रहों की स्थिति संघर्ष और शांति के बीच संतुलन बनाए रखे, तभी दुनिया नया संतुलन या वैश्विक पुनर्गठन देखती है — न कि केवल युद्ध का विस्तार। भारत का संतुलित दृष्टिकोण क्यों अहम है?: भारत ऐसे समय में जहां कई वैश्विक महाशक्तियाँ अपनी-अपनी रणनीति पर काम कर रही हैं, संतुलन और संवाद पर ज़ोर दे रहा है। भारत की कूटनीति इन मूल बिंदुओं पर आधारित रही है:सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास का मूल मंत्रकिसी भी तरह के खुले टकराव से दूरीबातचीत और समाधान पर बलजयशंकर की बात-चीत में यही संदेश सामने आया कि भारत क्षेत्रीय तनाव को बढ़ाने की बजाय उसे नियंत्रित करने में सक्रिय भूमिका निभाएगा। यह अर्थ है कि भारत किसी भी बड़ी शक्ति संघर्ष की सीधी भागीदारी नहीं करना चाहता, बल्कि स्थिरता और शांति की दिशा में प्रयास करना चाहता है — जो भविष्य के कूटनीतिक समीकरणों के लिए अहम संकेत हो सकता है। ज्योतिषीय संकेतों में शांति और संतुलन की राह: ज्योतिष में ग्रहों की चाल सिर्फ युद्ध या संघर्ष ही नहीं देखते हैं, बल्कि संवाद, समझौता, रणनीति परिवर्तन और दीर्घकालिक संतुलन के अवसर भी दिखाते हैं।2026 की ग्रह स्थिति कुछ इस तरह संकेत देती है:शनि के प्रभाव से कठोर निर्णय संभवराहु के प्रभाव से अचानक घटनाओं की आशंकाऔर गुरु-बुध के संतुलन से संवाद और समाधान की राह खुलती हैइसलिए यह कहा जा सकता है कि:मिडिल ईस्ट से बड़ा वैश्विक युद्ध शुरू होगा — यह निश्चित नहीं, लेकिन संघर्ष की आहट और कूटनीतिक संतुलन दोनों की संभावनाएँ मौजूद हैं। आगे क्या हो सकता है?: भारत की कूटनीतिक भूमिका: भारत ऐसा रुख अपनाएगा जो संघर्ष को बढ़ने से रोके, न कि गति दे। इसके पीछे रणनीति यह है कि भारी टकराव का प्रभाव मानवीय, आर्थिक और सामरिक सभी स्तरों पर विनाशकारी होगा।संवाद की भूमिका: ईरान, अमेरिका, और क्षेत्रीय साथी देशों के बीच डिप्लोमैटिक वार्ता को प्राथमिकता दी जाएगी।आम दुनिया पर असर: तेल की कीमतें, वैश्विक बाजार, और ऊर्जा सुरक्षा पर प्रभाव पड़ेगा — लिहाज़ा देशों को शांतिपूर्ण समाधान ढूँढने की जरूरत और बढ़ जाएगी। निष्कर्ष: आज मिडिल ईस्ट के तनाव और अमेरिका–ईरान टकराव की खबरें दुनिया की चिंता का विषय हैं। लेकिन जहां राजनीतिक बयानबाज़ी और सैन्य मूवमेंट बढ़ रहे हैं, वहीं भारत जैसी लोकतांत्रिक शक्ति संवाद, संतुलन और कूटनीति के मार्ग को मजबूती से थामे हुए है।ज्योतिषीय संकेत भी यही कहते हैं कि यह समय केवल युद्ध के लिए नहीं है, बल्कि नई समझ, रणनीति और वैश्विक संवाद का भी समय है।और शायद यही बात हमें तीसरे विश्वयुद्ध के डर से बड़ी सीख देती है — संवाद ही स्थिरता की पहली सीढ़ी है।