भद्रा काल में होलिका दहन क्यों नहीं किया जाता है: अगर प्रदोष काल के समय भद्रा मिल रही है तो दूसरे दिन प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा में होलिका दहन करना चाहिए। अगर दूसरे दिन पूर्णिमा प्रदोष व्यापिनी नहीं हो तो ऎसी स्थिति पहले दिन भद्रा समाप्ति के बाद होलिका दहन करना चाहिए। अगर पहले दिन भद्रा निशीथ अर्थात आधी रात के बाद या निशीथ कल में समाप्त हो रही हो तो भद्रा के मुखकाल को छोड़कर भद्राकाल में ही निशीथ काल से पहले होलिका दहन कर लेना चाहिए क्योंकि निशीथ के दौरान होलिकादहन निषेध है। परदिने प्रदोष स्पर्शाभावे पूर्वदिने यदि निशीथात्प्राक् भद्रा समाप्ति" तत्दा भद्रावसानोत्तरमेव होलिका दीपनम्। निशीथोत्तरं भद्रा समाप्तौ भद्रामुखं त्यक्त्वा भद्रायामेव । (धर्मसिंधु कथन) भद्रा में होलिका दहन कब करना होता है शुभ: भद्रा काल के समय होलिका दहन की मनाही होती है। लेकिन कई कुछ खास परिस्थितियों में भद्रा काल के समय का कुछ भाग होलिका दहन के लिए उपयोगी माना गया है और उस काल के दौरान होलिका दहन करने की आज्ञा शास्त्र भी देते हैं। आइये जान लेते हैं कि भद्रा काल में कौन सा समय होलिका दहन के लिए उपयोग किया जा सकता है : फाल्गुन पूर्णिमा पूर्णिमा तिथि साढ़े तीन प्रहर से अधिक हो लेकिन प्रतिपदा तिथि का भोगकाल पूर्णिमा के कुल भोग से कम हो तो इस स्थिति में भद्रा समय के दौरान प्रदोषव्यापिनी पूर्णिमा में ही भद्रा के पुच्छ काल में होलिका दहन किया जा सकता है। निशीथ काल के बाद भद्रा अगर समाप्त हो रही है तो इस स्थिति में भद्रा मुख को छोड़ कर भद्रा में ही होलिका दहन करना शास्त्रसम्मत माना गया है। इसके अलावा अगर प्रदोषकाल में भद्रा मुख हो तो भद्रा के बाद अथवा प्रदोष के बाद होलिका दहन किया जाना उचित होता है, लेकिन अगर दोनों दिन पूर्णिमा प्रदोष को स्पर्श नहीं कर पा रही है तो उस स्थिति में पहले दिन की पूर्णिमा के दिन भद्रा पुच्छ काल के समय होलिका दहन किया जाना चाहिए। अब अगर यहां भद्रा पुच्छ समय नहीं मिल रहा हो तो प्रदोष के तुरंत बाद होलिका दहन कर लेना चाहिए। सामान्य अर्थों में भद्रा काल में भद्रा पुच्छ का समय होलिका दहन के लिए उपयुक्त माना जाता है। भद्रा पुच्छ और भद्रा मुख, इन दो समय में भद्रा मुख को हमेशा त्याग देना चाहिए और भद्रा पुच्छ का ही उपयोग किया जाना चाहिए। होलिका दहन में किस लोक की भद्रा होती है शुभ: भद्रा की स्थिति को तीन लोकों में माना गया है जो समय-समय पर उपस्थित होती रहती है। मुहूर्त शास्त्र के अनुसार भद्रा का वास स्वर्ग लोक, पृथ्वी लोक तथा पाताल लोक में अलग-अलग प्रभाव देने वाला होता है। इसलिए किसी भी काम को करने में भद्रा की स्थिति को देख लेना उचित होता है। शुभ तथा मांगलिक कार्य के लिए भद्रा समय को त्यागना ही उचित होता है लेकिन कुछ ऎसे काम भी होते हैं जब भद्रा को उपयोगी माना गया है और इस समय भद्रा की स्थिति को विशेष परिणाम देने वाली माना जाता है। कैसे जानें होलिका दहन के दिन कहां है भद्रा का वास: भद्रा वास की स्थिति को चंद्रमा के गोचर अनुसार समझ सकते हैं। कुम्भ कर्क द्वये मर्त्ये स्वर्गेऽब्जेऽजात्त्रयेऽलिंगे। स्त्री धनुर्जूकनक्रेऽधो भद्रा तत्रैव तत्फलं।। पंचांग गणना के अनुसार जब चंद्रमा मेष राशि, वृषभ राशि, मिथुन राशि या वृश्चिक राशि में होता है तो भद्रा स्वर्ग लोक में वास करती है। इस समय पर भद्रा उर्ध्वमुखी होती है। चंद्रमा का गोचर कन्या राशि, तुला राशि, धनु राशि या मकर राशि में होता है तो भद्रा का वास पाताल लोक में माना जाता है। इस समय पर भद्रा अधोमुखी होती है। चंद्रमा का गोचर जब कर्क राशि, सिंह राशि, कुंभ राशि या मीन राशि में स्थित होता है तो भद्रा का वास पृथ्वी लोक पर माना जाता है। इस समय पर भद्रा सम्मुख होती है। विशेष :: होलिका दहन का समय बहुत विशेष समय होता है जब ग्रहों की स्थिति का असर हम पर सीधे तौर पर पड़ता है। इस समय कुछ विशेष ग्रहों जैसे शनि, राहु, केतु की ऊर्जाएं हम पर तेजी से अपना असर डालती हैं इसलिए इस दौरान चंद्रमा की मजबूती के साथ साथ नव ग्रहों का अनुकूल प्रभाव प्राप्त करने के लिए आवश्यक होता है कि होलिका दहन का कार्य शुभ मुहूर्त समय पर ही की जाए। इस कारण से होलिका दहन के समय भद्रा की स्थिति को देखते हुए काम करना उचित परिणाम देता है। भद्र मुक्त समय या शास्त्रों के अनुसार बहुत आवश्यक होने पर कौन सा भद्रा समय अनुकूल हो सकता है इसकी जानकारी किसी योग्य ज्योतिषी से लेना उचित होता है।