पूर्णिमा व्रत और इसकी महत्वपूर्ण तिथियां | Purnima Vrat

पूर्णिमा व्रत

हिंदू कैलेंडर के अनुसार, शुक्ल पक्ष के अंतिम दिन को पूर्णिमा/Purnima कहा जाता है। पूर्णचंद्र का दिन होने के कारण, इस दिन आकाश में पूर्ण चंद्रमा दिखाई देता है और लोगों द्वारा व्रत/vrat रखा जाता है।

पूर्णिमा व्रत से आप क्या समझते हैं?/What do you mean by Purnima Vrat?

पूर्णिमा व्रत/Purnima vrat रखने का उद्देश्य, जीवन के सभी सुख और मानसिक शांति प्राप्त करना है। इस दिन मृत पूर्वजों को याद करना और उनकी पूजा करना महत्वपूर्ण होता है।
हिंदू संस्कृति में पूर्णिमा तिथि का बहुत अधिक महत्व है। यह तिथि बहुत शुभ मानी जाती है क्योंकि इस दिन चंद्रमा पूर्ण रूप से प्रकाशवान और बली होता है। इस दिन पूजा, जप, तप और दान से न केवल पुण्य फल की प्राप्ति होती है बल्कि चंद्रदेव और भगवान श्रीहरि की कृपा भी जमकर प्राप्त होती है। शास्त्रों के अनुसार पूर्णिमा के दिन पूजा-अर्चना और दान करने से मनुष्य के समस्त पाप कट जाते हैं इसलिए इस तिथि पर स्नान, दान व जप करने का बड़ा महत्व है । इस दिन भगवान श्री विष्णु और माता लक्ष्मी के अलावा मानसिक शक्ति व सुख-समृद्धि हेतु चंद्र ग्रह की पूजा की जाती है। पूर्णिमा के दिन श्री सत्यनारायण भगवान की पूजा करने का भी विधान है। इस दिन मंदिरों में देव दर्शन करने और पवित्र नदियों में स्नान करने से सौभाग्य की वृद्धि होती है।

पूर्णिमा 2022 तिथियां/Purnima 2022 Dates

दिन     दिनांक   पूर्णिमा नाम
सोमवार जनवरी 17, 2022 पूस पूर्णिमा 
बुधवार फ़रवरी 16, 2022  माघ पूर्णिमा 
शुक्रवार मार्च 18, 2022  फ़ाल्गुन पूर्णिमा 
शनिवार अप्रैल 16 2022  चैत्र पूर्णिमा 
सोमवार मई 16 2022  वैशाख पूर्णिमा 
मंगलवार जून 14, 2022 ज्येष्ठ पूर्णिमा 
बुधवार जुलाई 13 2022 आषाढ़ पूर्णिमा 
शुक्रवार अगस्त 12,  2022 श्रावण पूर्णिमा 
शनिवार सितम्बर 10,  2022 भाद्रपदा पूर्णिमा 
रविवार अक्टूबर 9,  2022 आश्विन पूर्णिमा 
मंगलवार नवंबर 8,  2022 कार्तिक पूर्णिमा 
बृहस्पतिवार दिसंबर 8,  2022 मार्गशीर्ष पूर्णिमा 

पूर्णिमा का महत्व/ Importance of Purnima

आमतौर पर, व्रत/vrat पूर्णमासी के दिन या पूर्णिमा/ Purnima से एक दिन पहले यानी चतुर्दशी (14 वें चंद्र दिवस) को शुरू होकर, सामान्यतः सूर्योदय से पूर्ण चंद्र के उदय होने तक रखा जाता है।

पूर्णिमा के विभिन्न प्रकार / Different types of purnima

• पौष पूर्णिमा

• माघ पूर्णिमा

• फाल्गुन पूर्णिमा

• चैत्र पूर्णिमा

• वैशाख पूर्णिमा

• ज्येष्ठ पूर्णिमा

• आषाढ़ पूर्णिमा

• श्रावण पूर्णिमा

• भाद्रपद पूर्णिमा

• अश्विन पूर्णिमा

• कार्तिक पूर्णिमा

• मार्गशीर्ष पूर्णिमा

पूर्णिमा व्रत कथाPurnima Vrat Katha

पूर्णिमा/Purnima का पालन करने के कई तरीके और विभिन्न  कथाएं हैं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण है त्रिपुरारी पूर्णिमा है। इस कथा के अनुसार -

पौराणिक कथाओं में कहा गया है- एक बार, तारकासुर नाम का एक राक्षस था जिसके तीन पुत्र थे- कमलाक्ष, विद्युन्माली और तारकक्ष। भगवान शिव के बड़े पुत्र कार्तिकेय द्वारा तारकासुर का वध करने पर, उसके तीनों पुत्रों ने अशान्त होकर भगवान ब्रह्मा का वरदान पाने के लिए तपस्या की। ब्रह्मा जी ने उनकी तपस्या से प्रभावित होकर उनकी इच्छा पूछी। तीनों ने अमर होने का वरदान मांगा, जिसे ब्रह्मा जी ने अस्वीकार कर दिया और उन्हें एक अलग वरदान मांगने के लिए कहा।

तीनों ने बहुत विचार करने के बाद, ब्रह्मा जी से अपने लिए तीन अलग-अलग शहर मांगे, जिसमें बैठकर वे पूरी पृथ्वी और आकाश का चक्कर लगा सकें तथा एक हजार साल बाद तीनों शहर मिल जाएं और भगवान के  एक ही तीर में सभी शहरों को नष्ट करने की शक्ति हो, जो उनकी मृत्यु का कारण बने। भगवान ब्रह्मा ने तीनों भाइयों को यह वरदान दे दिया।

ब्रह्माजी के आदेश पर माया दानव ने सोने की नगरी तारक्ष के लिए, विद्युन्माली के लिए लोहे और कमलाक्ष के लिए चांदी के तीन शहरों का निर्माण किया। इंद्रदेव  इन तीनों भाइयों से डरकर, मदद के लिए भगवान शिव के पास गए। तब, भगवान शिव ने इन राक्षसों को नष्ट करने के लिए रथ का निर्माण करना शुरू किया।

इस दिव्य रथ में देवताओं का निवास भी था। इसके पहिये चाँद और सूरज के बने थे। वरुण, इंद्र, कुबेर और यम रथ की गाड़ी में बदल गए। शेषनाग धनुष, भगवान शिव तीर और अग्निदेव तीर की नोक बने। तब, भगवान शिव इस दिव्य रथ पर सवार हुए।

देवताओं के बने रथ और तीनों भाइयों के बीच भीषण युद्ध हुआ। जैसे ही तीनों रथ कतार में आए, भगवान शिव ने तीनों राक्षसों का नाश कर दिया। इस पूरी घटना के बाद, भगवान शिव को त्रिपुरारी के नाम से जाना जाने लगा क्योंकि यह कार्तिक महीने की पूर्णिमा को हुआ था, इसलिए इसे त्रिपुरारी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है।

चलिए आपका परिचय पूर्णिमा तिथि से जुड़ी शास्त्रीय और प्रामाणिक विधि से करवाते हैं:-

  • इस दिन सर्वप्रथम ब्रह्ममुहूर्त में उठकर घर की साफ़-सफाई करें। 
  • फिर नहाने वाले पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलकर उस जल से स्नान करें। 
  • इसके बाद भुवन भास्कर भगवान श्री सूर्यदेव को ॐ घृणि श्री सूर्याय नमः मंत्र से या गायत्री मंत्र से अर्घ्य दें।
  • किसी भी शुभ कार्य से पहले विघ्न विनाशक भगवान श्री गणेश जी का पूजन करते हैं। 
  • इसलिए पहले भगवान श्री गणेश का ध्यान और पूजन करें। 
  • फिर भगवान श्री विष्णु के साथ-साथ माता लक्ष्मी की पूजा करें। 
  • आप चाहें तो श्री विष्णु सहस्रनाम, श्री नारायण स्तोत्र आदि का श्रद्धापूर्वक पाठ भी कर सकते हैं।
  • इस दिन सत्यनारायण व्रत कथा पढ़ना भी अनंत गुणा पुण्य फल प्रदान करता है।
  • पूजन के उपरांत भगवान श्री हरि व माता लक्ष्मी को पीले मिष्ठान का भोग लगाएं। 
  • भगवान श्री विष्णु को तुलसी पत्र अत्यंत प्रिय है क्योंकि इसके बिना वो भोग ग्रहण नहीं करते हैं। 
  • इसलिए भोग में तुलसी जी को शामिल करना न भूलें। 
  • अंत में श्रद्धापूर्वक भगवान श्री विष्णु और माता लक्ष्मी जी की आरती उतारें। 
  • पूर्णिमा पर चंद्रदेव की पूजा करने का भी विशेष महत्व है।  
  • चंद्रोदय होने पर चंद्रदेव की पूजा अवश्य करें।  
  • रात्रि में थोड़े से कच्चे दूध में अक्षत(चावल) व मिश्री मिलाकर चंद्रदेव को अर्घ्य दें। 
  • अगर हो सके तो इस दिन ग़रीब व असहाय लोगों की किसी न किसी रूप में सेवा अवश्य करें। 

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