प्रदोष व्रत और इसकी महत्वपूर्ण तिथियां | Pradosh vrat

प्रदोष व्रत

हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक माह में दो बार प्रदोष व्रत आता है। बुधवार को आने वाले प्रदोष व्रत को बुध प्रदोष व्रत कहते हैं. इस पावन दिन पर पुष्य नक्षत्र दोपहर 01:38 से 25 अगस्त को शाम 04:16 तक रहेगा।

 

बुध प्रदोष शुभ पूजा मुहूर्त

24 अगस्त, शाम 06:52 से रात्रि 09:04 तक

त्रयोदशी तिथि सुबह 08:30 से शुरू होकर 25 अगस्त को प्रातः 10:38 तक

 

बुध प्रदोष व्रत के लाभ

इस दिन शनि मकर राशि, गुरु मीन राशि व बुध कन्या राशि में गोचर करेंगे जिसके चलते क्रमशः शश, हंस व भद्र नामक दुर्लभ पंचमहापुरुष योगों का भी निर्माण होगा। इसके अतिरिक्त इस दिन पुष्य नक्षत्र भी रहेगा जोकि ज्योतिषशास्त्र के अनुसार एक बहुत ही शुभ नक्षत्र है  इस नक्षत्र में कोई भी नया व कीमती सामान खरीदना, पूजा-पाठ करना बहुत ही श्रेष्ठ परिणाम प्रदान करता है. इसलिए 24 अगस्त को पुष्य नक्षत्र में पड़ने वाले प्रदोष काल के दौरान देवादिदेव महादेव की पूजा करने से आपकी आर्थिक व पारिवारिक समस्याएं दूर हो सकती हैं. आपकी मानसिक शांति में वृद्धि हो सकती है. सुख-संपत्ति व सौभाग्य की प्राप्ति हो सकती है. दांपत्य संबंध मधुर बन सकते हैं.

 

प्रदोष 2022 की तिथियां/Pradosh 2022 Dates

दिन दिनांक     प्रदोष का नाम
शनिवार जनवरी 15, 2022  शनि प्रदोष व्रत 
रविवार जनवरी 30, 2022   रवि प्रदोष व्रत
सोमवार फ़रवरी 14, 2022 सोम प्रदोष व्रत 
सोमवार फ़रवरी 28, 2022 सोम प्रदोष व्रत 
मंगलवार मार्च 15, 2022 भौम प्रदोष व्रत 
मंगलवार मार्च 29, 2022 भौम प्रदोष व्रत 
बृहस्पतिवार अप्रैल 14, 2022 गुरु प्रदोष व्रत 
बृहस्पतिवार अप्रैल 28 , 2022 गुरु प्रदोष व्रत 
शुक्रवार मई 13, 2022 शुक्र प्रदोष व्रत 
शुक्रवार मई 27 , 2022 शुक्र प्रदोष व्रत 
रविवार जून 12, 2022 रवि प्रदोष व्रत
रविवार  जून 26, 2022 रवि प्रदोष व्रत
सोमवार जुलाई 11 , 2022 सोम प्रदोष व्रत 
सोमवार जुलाई 25 , 2022 सोम प्रदोष व्रत 
मंगलवार अगस्त 9 , 2022  भौम प्रदोष व्रत 
बुधवार अगस्त 24, 2022 बुध प्रदोष व्रत 
बृहस्पतिवार सितम्बर 8, 2022 गुरु प्रदोष व्रत 
शुक्रवार सितम्बर 23, 2022 शुक्र प्रदोष व्रत 
शुक्रवार अक्टूबर 7 , 2022 शुक्र प्रदोष व्रत 
शनिवार अक्टूबर 22 , 2022 शनि प्रदोष व्रत 
शनिवार नवंबर 5  , 2022 शनि प्रदोष व्रत 
सोमवार नवंबर 21  , 2022 सोम प्रदोष व्रत 
सोमवार दिसंबर 5 , 2022 सोम प्रदोष व्रत 
बुधवार दिसंबर 21, 2022 बुध प्रदोष व्रत 

 

प्रदोष व्रत का महत्व/Importance of Pradosh Vrat

प्रदोष व्रत/Pradosh vrat का महत्व यह है कि इस विशेष दिन पर, भगवान शिव अपने भक्तों को आशीर्वाद देते हैं और साथ ही, हम भारतीय भगवान शिव से मोक्ष प्राप्ति की  प्रार्थना करते हैं।

 

प्रत्येक मास की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है। त्रयोदशी तिथि को जो भी दिन होता है, उसी दिन के नामानुसार प्रदोष व्रत मानते हैं। प्रदोष व्रत एक सर्वकार्य सिद्धि व पापनाशक व्रत है। अधिकांश लोग केवल यह जानते हैं कि यह व्रत केवल सोम प्रदोष का होता है, जबकि हमारे शास्त्रों में सप्ताह के प्रत्येक दिन का प्रदोष व्रत बताया गया है। प्रदोष का अर्थ रात्रि का शुभारंभ होता है। सूर्यास्त होने के बाद जब संध्याकाल होता है तो रात्रि के प्रारंभ होने की पूर्व बेला को ही प्रदोष कहते हैं। इसको सरल भाषा में यह भी कह सकते हैं कि संध्याकाल और रात्रिकाल का मिलन ही प्रदोष है। यह व्रत स्त्री और पुरुष दोनों के लिए समान रूप से अत्यंत लाभकारी है। इसलिए इस व्रत को कोई भी कर सकता है परन्तु अधिकांशतः यह व्रत स्त्रियां ही अधिक रखती हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि रवि प्रदोष, सोम प्रदोष, मंगल प्रदोष व शनि प्रदोष के व्रत को पूर्ण करने से अति शीघ्र कार्य सिद्धि होने के साथ-साथ अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। 

 

प्रदोष व्रत पूजन विधि  

चलिए आपका परिचय प्रदोष व्रत से जुड़ी एक ऐसी श्रेष्ठ व प्रामाणिक विधि से करवाते हैं जिसे अपनाकर आप भगवान भोलेनाथ जी की कृपा जल्द प्राप्त कर सकते हैं:-

  1. सर्वप्रथम ब्रह्म मुहूर्त में उठकर दैनिक कार्यों से निवृत होने के बाद स्नान करें। 
  2. इस व्रत के मुख्य देवता भगवान शिव हैं।
  3. इसलिए स्वच्छ वस्त्र धारण करके श्री गणेश जी, भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करके व्रत को सफलतापूर्वक संपन्न करने का संकल्प लें। 
  4. दिन भर निराहार रहकर संध्याकाल में घर के मंदिर या किसी शिवालय में जाकर शिवलिंग पर कच्चा दूध, बेलपत्र, धतूरे का फल, सफेद पुष्पों की माला, सफेद मिष्ठान आदि अर्पित करके विधिवत पूजन करें। 
  5. आप चाहें तो श्री शिव तांडव स्तोत्र, शिव चालीसा, श्री रुद्राष्टाध्यायी, श्री रुद्राष्टकम आदि का श्रद्धापूर्वक पाठ भी कर सकते हैं। 
  6. इस दिन ॐ नमः शिवाय मंत्र का एक माला(108 बार) जाप करना भी बहुत पुण्य फलदायी होता है। 
  7. पूजन के अंत में श्रद्धा पूर्वक भगवान शिव व माता पार्वती अथवा शिव परिवार की आरती उतारें। 
  8. इस दिन यथाशक्ति किसी निर्धन या असहाय व्यक्ति की सेवा भी करें। 

प्रदोष व्रत के विभिन्न प्रकार/Different types of Pradosh Vrat

  1. प्रदोष व्रत (कृष्ण पक्ष)
  2. भौम प्रदोष व्रत (शुक्ल पक्ष)
  3. भौम प्रदोष व्रत (कृष्ण पक्ष)
  4. प्रदोष व्रत (शुक्ल पक्ष)
  5. प्रदोष व्रत (कृष्ण पक्ष)
  6. प्रदोष व्रत (शुक्ल पक्ष)
  7. प्रदोष व्रत (कृष्ण पक्ष)
  8. शनि प्रदोष व्रत (शुक्ल पक्ष)
  9. शनि प्रदोष व्रत (कृष्ण पक्ष)
  10. सोम प्रदोष व्रत (शुक्ल पक्ष)
  11. सोम प्रदोष व्रत (कृष्ण पक्ष)
  12. भौम प्रदोष व्रत (शुक्ल पक्ष)
  13. प्रदोष व्रत (कृष्ण पक्ष)
  14. प्रदोष व्रत (शुक्ल पक्ष)
  15. प्रदोष व्रत (कृष्ण पक्ष)
  16. प्रदोष व्रत (शुक्ल पक्ष)
  17. शनि प्रदोष व्रत (कृष्ण पक्ष)
  18. शनि प्रदोष व्रत (शुक्ल पक्ष)
  19. सोम प्रदोष व्रत (कृष्ण पक्ष)
  20. प्रदोष व्रत (शुक्ल पक्ष)
  21. भौम प्रदोष व्रत (कृष्ण पक्ष)
  22. भौम प्रदोष व्रत (शुक्ल पक्ष)
  23. प्रदोष व्रत (कृष्ण पक्ष)
  24. प्रदोष व्रत (शुक्ल पक्ष)
  25. प्रदोष व्रत (कृष्ण पक्ष)

 

प्रदोष व्रत कथा/Pradosh Vrat Katha

प्रदोष/ Pradosh से संबंधित, प्रसिद्ध पौराणिक कथाओं में से एक स्कंद पुराण में मिलती है। एक बूढ़ी विधवा अपनी जीविका चलाने के लिए, अपने बेटे के साथ भिक्षा मांगने घर से बाहर जाया करती थी। एक बार, जब वह  अपने घर लौट रही थी तो उसने देखा कि एक युवक घायल अवस्था में जमीन पर पड़ा है। वह जानती थी कि उसके पास तीन मुँहों का पेट भरने के लिए पर्याप्त नहीं है। फिर भी, वह लड़के को घर लाने और उसकी मदद करने का फैसला करती है।

 

बूढ़ी औरत को यह नहीं पता था कि जिस लड़के को उसने आश्रय दिया है, वह विदर्भ का राजकुमार धर्मगुप्त था जिसके पिता को शत्रुओं ने पराजित करके मार डाला, और उसने अपनी माँ को भी खो दिया था। कुछ दिनों के बाद, जब लड़के के घाव ठीक होने लगे, तो बूढ़ी औरत उसे और अपने बेटे को मंदिर ले गई, जहां  उसकी शांडिल्य ऋषि से आकस्मिक भेंट हुई। उन्होंने, उसे उस लड़के की पहचान के बारे में सब कुछ बताया। वह यह जानकर अभिभूत हो गई कि लड़का एक राजकुमार था।

 

इस पर, ऋषि ने सुझाव दिया कि उन्हें प्रदोष का व्रत/ vrat रखकर, भगवान शिव का आशीर्वाद लेना चाहिए। उसके व्रत रखने के साथ ही, लड़कों को भी प्रदोष व्रत करने की इच्छा हुई।

 

साल बीतते गए, और दोनों लड़के भाइयों की तरह बड़े हो गए। एक खूबसूरत दिन, उनके जंगल जाने पर धर्मगुप्त ने एक गंधर्व राजकुमारी अंशुमती को देखा, जिससे पहली मुलाकात में ही उन्हें प्यार हो गया था। राजकुमारी द्वारा धर्मगुप्त से विवाह करने की इच्छा व्यक्त करने के बाद, उसके पिता बूढ़ी विधवा के घर गए। वहां उन्होंने धर्मगुप्त की वास्तविक पहचान और उसके अतीत के बारे में सब कुछ पता चला।

 

धर्मगुप्त ने अंशुमती से विवाह किया और उसके पिता की मदद से अपना राज्य विदर्भ वापस जीत लिया। अंत में, राजकुमार बूढ़ी औरत और उसके बेटे को अपने राज्य में ले गया। इस प्रकार, उन्हें प्रदोष व्रत/Pradosh vrat रखने का लाभ मिला।

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