एकादशी की महत्वपूर्ण तिथियां/Ekadashi important Dates

एकादशी 2022

हिंदू धर्म में, एकादशी का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है, जिसकी अत्यधिक महिमा है। हम भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए, एकादशी व्रत/ Ekadashi Vrat द्वारा उनका पूजन करते हैं, जो मानव मन को भगवान विष्णु से जोड़ने का एक साधन बनता है। ऐसा माना जाता है कि एकादशी के दौरान, मस्तिष्क की ध्यान केंद्रित करने की क्षमता अधिक हो जाती है। पुराणों के अनुसार, भगवान शिव स्वयं नारद जी को मिलकर समझाते हैं कि कैसे एकादशी का व्रत/ Vrat पापों को दूर करने और स्वर्ग जाने में मदद करता है।

उत्पन्ना एकादशी शुभ पूजा मुहूर्त

एकादशी तिथि प्रारंभ: 19 नवंबर, सुबह 10:30 से  
एकादशी तिथि समाप्त: 20 नवंबर, सुबह 10:41 तक

उत्पन्ना एकादशी शुभ पूजा मुहूर्त: 20 नवंबर, प्रातः 09:27 से दोपहर 12:07 तक
उत्पन्ना एकादशी पारण मुहूर्त: 21 नवंबर, प्रातः 06:48 से सुबह 08:56 तक

एकादशी व्रत पूजन विधि

  1. एकादशी के दिन सबसे पहले नित्यकर्म व स्नान आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. फिर हाथ में फूल, चावल(अक्षत) और जल लेकर भगवान श्री विष्णु का स्मरण करते हुए एकादशी व्रत और श्री हरि की पूजा संपन्न करने का संकल्प लें।
  3. अब एक स्वच्छ चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर अनाज़ की ढ़ेरी पर भगवान श्री विष्णु की प्रतिमा या चित्र को स्थान दें और गंगाजल से उनका अभिषेक करें।
  4. फिर उनको पीले पुष्पों की माला पहनाकर पीले चंदन या हल्दी से उनका तिलक करें।
  5. इसके बाद दीपक व धूप प्रज्वलित करके उन्हें तुलसी पत्र, केला, पंचमेवा, पंच फल, सुपारी आदि अर्पित करें।
  6. इसके बाद एकादशी व्रत कथा, श्री विष्णु सहस्रनाम, श्री नारायण स्तोत्र आदि का श्रद्धापूर्वक पाठ करें।
  7. अगर आप चाहें तो भगवान श्री विष्णु के मंत्रों का जाप तुलसी माला के जरिए कर सकते हैं।
  8. अब श्री हरि को केला, गुड़, चने की दाल, बेसन के लड्डू या कोई भी मौसमी फल आदि अर्पित करें।
  9. पूजन के अंत में भगवान श्री विष्णु की शुद्ध घी या कपूर के दीपक से श्रद्धापूर्वक आरती उतारे। 
  10. अंत में भगवान श्री विष्णु से अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए प्रार्थना करके प्रसाद का वितरण करें।

एकादशी से आप क्या समझते हैं?/What do you mean by Ekadashi?

हिंदू कैलेंडर के अनुसार, पक्ष की ग्यारहवीं तिथि/ Eleventh date of the paksha  को एकादशी कहा जाता है, जो कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष के ग्यारहवें दिन, महीने में दो बार आती है। लोग जीवन में सुख और शांति का अनुभव करने के लिए एकादशी का व्रत करते हैं। आइए जानते हैं कि इस वर्ष कब है एकादशी।

एकादशी 2022 तिथियां/Ekadashi 2022 

दिन  दिनांक एकादशी  नाम 
बृहस्पतिवार जनवरी 13, 2022, पौशा  पुत्रदा  एकादशी 
शुक्रवार जनवरी 28, 2022, षटतिला  एकादशी 
शनिवार फ़रवरी 12, 2022, जया  एकादशी 
रविवार फ़रवरी 27, 2022,  विजया  एकादशी 
सोमवार मार्च 14, 2022,  आमलकी  एकादशी 
सोमवार मार्च 28, 2022,  पापमोचनी  एकादशी 
मंगलवार अप्रैल 12, 2022,  कामदा  एकादशी 
बुधवार अप्रैल 13, 2022,  वैष्णव  कामदा  एकादशी 
मंगलवार अप्रैल 26, 2022,  वरुथिनी  एकादशी 
बृहस्पतिवार मई 12, 2022,  मोहिनी  एकादशी 
बृहस्पतिवार मई 26, 2022,  अपरा  एकादशी 
शुक्रवार जून 10, 2022,  निर्जला  एकादशी 
शुक्रवार जून 24, 2022,  योगिनी  एकादशी 
रविवार जुलाई 10, 2022, देवशयनी  एकादशी 
रविवार जुलाई 24, 2022,  कामिका  एकादशी 
सोमवार अगस्त 8, 2022,  श्रावण  पुत्रदा  एकादशी 
मंगलवार अगस्त 23, 2022,  अजा  एकादशी 
बुधवार सितम्बर 7, 2022,  परिवर्तिनी  एकादशी 
बुधवार सितम्बर 21, 2022,  इंदिरा  एकादशी 
बृहस्पतिवार अक्टूबर 6, 2022,  पापांकुशा  एकादशी 
शुक्रवार अक्टूबर 21, 2022,  रमा  एकादशी 
शुक्रवार नवंबर 4, 2022,  देवउत्थाना  एकादशी 
रविवार नवंबर 20, 2022,  उत्पन्ना  एकादशी 
शनिवार दिसंबर 3, 2022,  मोक्षदा  एकादशी 
सोमवार दिसंबर 19, 2022,  सफला   एकादशी

एकादशी का महत्व/Importance of Ekadashi

हमारे देश में व्रत एवं उपवास का बहुत अधिक महत्व है। भारत के प्रत्येक धर्म में व्रत और उपवास करने का निर्देश है।व्रत के माध्यम से हमारी आंतरिक शुद्धि होती है। व्रत या उपवास करने से मन व बुद्धि की शुद्धता बढ़ती है और सद्गुणों का विकास होता है। भगवान श्री हरि विष्णु की कृपा पाने के लिए एकादशी व्रत को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। प्रत्येक मास में दो एकादशी आती हैं। अधिक मास पड़ने पर उस माह में दो अन्य एकादशियाँ और बढ़ जाती है। इस प्रकार एकादशी तिथियों की कुल संख्या छब्बीस है। ये सभी एकादशियाँ अपने नाम के अनुसार ही श्रेष्ठ फल देने वाली हैं। एकादशी के दिन व्रत-उपवास करने, व्रत की कथा पढ़ने या सुनने और भगवान श्री विष्णु का भक्तिभाव पूर्वक पूजन करने से अनंत कोटि पुण्य फलों की प्राप्ति होती है और शरीर त्यागने के बाद मनुष्य विष्णुलोक की शोभा बढ़ाता है। 

एकादशी व्रत को मुख्यतः दो वर्गों में बांटा गया है - नित्य और काम्य। यदि एकादशी का व्रत निष्काम भावना रखते हुए बिना किसी फल की इच्छा के किया जाए तो उसे 'नित्य' कहते हैं। और अगर किसी सांसारिक मनोकामना की पूर्ति के लिए यह व्रत किया जाए तो वह 'काम्य' कहलाता है। चलिए आपको एकादशी व्रत से जुड़ी प्रामाणिक व शास्त्रीय विधि बताते हैं जिसे अपनाकर आप भी पुण्य फल के भागी बन सकते हैं-

एकादशी के विभिन्न प्रकार/Different types of Ekadashi 

भारत में अलग अलग प्रकार की एकादशी होती है और इसका महत्व भी अलग अलग होता है। ऊपर आपको सभी एकादशी की तिथियों के बारे में बताया गया है, और नीचे आपको उन सभी एकादशी व्रत के नाम बताए गए हैं जिन्हें भारत में रखा जाता है।

1. उत्पन्ना एकादशी

2. मोक्षदा / बैकुंठ / मुक्कोटी / गीता एकादशी

3. सफल एकादशी

4. पुत्रदा एकादशी

5. शत्तीला एकादशी

6. जया / भीष्म एकादशी

7. विजया एकादशी

8. आमलकी एकादशी

9. पापमोचनी एकादशी:

10. कामदा एकादशी

11. वरुथिनी एकादशी

12. मोहिनी एकादशी

13. अपरा एकादशी

14. निर्जला एकादशी

15. योगिनी एकादशी

16. देव-सयाना / पद्मा एकादशी

17. कामिका एकादशी

18. पुत्रदा / पवित्रोपना एकादशी

19. आजा / अन्नदा एकादशी

20. पार्वतीनी / पार्श्व / वामन एकादशी

21. इंदिरा एकादशी

22. पापांकुशा एकादशी

23. रमा एकादशी

24. हरिबोधिनी / उत्थान एकादशी

25. आदिका मास - पद्मिनी एकादशी

26. अधिक मास - परमा एकादशी

एकादशी व्रत कथा/Ekadashi vrat Katha: 

एकादशी का पालन करने के कई तरीके और विभिन्न प्रकार की कथाएं प्रचलित हैं। लेकिन सभी कथाओं का एक ही अर्थ निकलता है। एकादशी व्रत कथा राजा युधिष्ठिर के लिए थी, जिसे श्री कृष्ण ने स्वयं सुनाया था। उदाहरण के लिए-

जया / भीष्म एकादशी व्रत कथा/ Jaya / Bhishma Ekadasi 

प्राचीन कथाओं के अनुसार, इंद्रदेव पुष्पदंत और चित्रसेन के साथ गंधर्व संगीत सुन रहे थे। दरबार में अन्य लोग - जैसे पुष्पदंत की पुत्री पुष्पावती, चित्रसेन की पत्नी, पुत्र और पौत्र भी उपस्थित थे। चित्रसेन के पोते माल्यवान को देखते ही, पुष्पावती उस पर आसक्त हो गई या उनके तरफ आकर्षित हो गई। वह एक-दूसरे की प्रशंसा करने में मग्न हो गए और माल्यवान भी पुष्पवती पर आसक्त होकर अपने गायन का सुर-ताल भूल गए। इससे संगीत की सारा आनंद खराब हो गया।

उनके व्यवहार से इंद्रदेव ने क्रोधित होकर पुष्पावती और माल्यवान को श्राप दिया। जिसके कारण, उन्होंने अपनी सारी शक्तियां खो दीं और उन्हें मनुष्यों के रूप में जीवन जीने के लिए पृथ्वी पर भेज दिया गया।

पुष्पावती और माल्यवान ने कई दिनों तक पृथ्वी पर जीवन की समस्याओं को सहन करते हुए, इस श्राप से मुक्ति पाने के लिए, उन्होंने माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को पीपल के वृक्ष के नीचे व्रत/Vrat किया। भगवान विष्णु ने उनकी भक्ति से प्रभावित होकर उन्हें भगवान इंद्र के श्राप से मुक्त किया और उन्होंने फिर से अपनी शक्तियां वापस दे दी।

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