आठवें भाव में केतु | Ketu in 8th house

आठवें भाव का केतु, अक्सर भारी वाहनों से दुर्घटना या घोड़े, गधे, खच्चर, ऊंट, हाथी, भैंस आदि से हानि का संकेत देता है। यदि केतु शनि या मंगल के प्रभाव में नहीं है, तो आपको इससे कोई खास हानि नहीं होगी और होगी तो भी इससे आप तुरंत निजात पा जाएंगे। इसके साथ साथ कुत्ते, सियार, लोमड़ी, बंदर, ऊंट आदि के काटने से रेबीज होने की संभावना हो सकती है। इसके अलावा जहरीले सांप, मगरमच्छ, बिच्छू या ततैया द्वारा डंक मारना या काटना भी आठवें भाव में केतु के प्रभाव के अंतर्गत आता है।

 

आठवें भाव में केतु का प्रभाव/ Effects of Ketu in the Eighth House

जल तत्व वाली राशियों में, केतु का चंद्रमा या शुक्र के साथ मेल होने पर, पानी या फूड पॉइजनिंग का खतरा रहता है। अक्सर, माता-पिता की कई पीढ़ियों से बवासीर के लक्षण होने पर, आठवें भाव का केतु बवासीर की परेशानी का कारण बनता है। वहीं, फिस्टुला या उससे संबद्ध रोगों की भी संभावना प्रबल बनी हुई है और इसके लिए किसी भी प्रकार के पारिवारिक इतिहास की आवश्यकता नहीं होती।

 

आठवें भाव में केतु का एक अन्य अवयव, किसी भी लिंग के साथ अप्राकृतिक शारीरिक संपर्क के करीब जाने की प्रवृत्ति देता है। समलैंगिकों की कुंडली के अध्ययन से पता चलता है कि उनमें से कम से कम 50% के आठवें भाव में राहु या केतु या विशेष रूप से आठवें भाव में केतु हो सकता है, तथा ऐसा देखा गया है कि व्यक्तियों में यह रुचि 45 या 48 वर्षों के बाद भी विकसित हो सकती है। हालांकि, आठवें भाव में केतु अकेला होने पर, इन प्रवृत्तियों के अंतिम परिणामस्वरूप  कोई गंभीर बीमारी या रोग नहीं देगा लेकिन, आठवें भाव में केतु के साथ मंगल, शनि या शुक्र के होने या दूसरे भाव से केतु पर दृष्टि डालने पर, होने वाले रोगों या बीमारियों को समझाने और ठीक करने में लंबा समय लगा सकता है।

 

आठवें भाव में केतु, जीवनसाथी को धन संबंधी विषयों या शारीरिक संबंधों में अतृप्त बनाता है, जिसे समय-समय पर पति संतुष्ट करने में विफल रहता है। इसके अलावा, जिस राशि का स्वामी बुध होता है या शुक्र आठवें भाव में होता है तो केतु, व्यक्ति की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में वृद्धि करता है परंतु, बुध या शुक्र पहले, तीसरे या छठे भाव में नहीं होने होता। 

 

वहीं, दूसरे भाव में चन्द्रमा और आठवें भाव में मंगल और केतु के होने पर, ल्यूकेमिया या त्वचा संबंधी रोग हो सकते हैं। माना जाता है कि बारहवें भाव में चंद्रमा और आठवें भाव में केतु, तंत्रिकाओं से संबंधित समस्याएं प्रदान करने में समर्थ होता है, जिसका स्तर बारहवें भाव के संवेदनशील बिंदु से चंद्रमा की स्थिति पर निर्भर करता है।

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