रुद्राभिषेक करने के कारण और परिणाम क्या हैं?

रुद्राभिषेक

भगवान शिव को देवों के देव के रूप में जाना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, भगवान शिव की आराधना करने से सभी मनोकामनाएं शीघ्र ही पूरी हो जाती हैं। पवित्र सावन मास के आरंभ होते ही, शिवालयों में जल सहित कुछ विशेष वस्तुएं शिव को अर्पित की जाती हैं, जिसे रुद्राभिषेक/Rudrabhishekam कहा जाता है। इसमें शुक्ल यजुर्वेद के रुद्राष्टाध्यायी के मंत्रों का जाप किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार, अन्य दिनों की अपेक्षा, सावन में रुद्राभिषेक करना अधिक शुभ और लाभकारी माना जाता है।

रुद्राभिषेक / Rudrabhishek

रुद्राभिषेकम वैदिक संस्कृति का एक हिस्सा है। प्राणियों के कष्टों से दुखी भगवान रुद्र को शांत करने के लिए अभिषेक के अलावा अन्य कोई उपाय नहीं है। श्रावण में रुद्राभिषेक/Rudrabhishek इच्छाओं की पूर्ति के लिए किया जाता है, लेकिन यह मन और जीवन का कायाकल्प भी करता है। वर्तमान समय में मनुष्य इच्छाओं की अति शीघ्र पूर्ति की कोशिश में मशीन के समान बनता जा रहा है। शिव के बाह्य स्वरूप, शिवलिंग का अभिषेक तब तक प्रतीकात्मक है, जब तक मन में कर्म शक्ति द्वारा ऊर्जा का संचार नहीं होता।

रुद्राभिषेक की विशेषता / The Prominence of Rudrabhishek

कहा जाता है कि भगवान शिव का रुद्राभिषेक करने से मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है। साथ ही, ग्रह दोष और रोगों से भी मुक्ति मिलती है। रूद्रहृदयोपनिषद के अनुसार, शिव या रुद्र के समस्त देवताओं की आत्मा में स्थित होने के कारण, वे सभी रुद्र की आत्मा हैं।
भगवान शिव, सर्व कल्याणकारी देवता के रूप में परम पूजनीय हैं। शास्त्रों की मान्यता अनुसार, भगवान शिव की आराधना करने से सभी मनोकामनाएं शीघ्र पूरी होती हैं।

रुद्र का अभिषेक करने की विधि / Method of doing Abhishekam of Rudra

आमतौर पर, अभिषेक जल से किया जाता है, लेकिन सावन, सोमवार, प्रदोष और शिवरात्रि आदि विशेष अवसरों या दिनों में, गाय के दूध या किसी अन्य दूध से मंत्रों के साथ किया जाता है।

विशेष अवसरों पर, रुद्राभिषेक दूध, दही, घी, शहद और चीनी से बने पंचामृत/panchamrit के मेल से या अलग-अलग  किया जाता है।

वर्षा जल से रुद्राभिषेक करने पर नकारात्मकता खत्म होती है तथा असाध्य रोगों से शांति पाने के लिए कुशा से रुद्राभिषेक करा जाता है। भवन और वाहन के लिए दही से रुद्राभिषेक करते हैं और धन प्राप्ति के लिए गन्ने के रस से रुद्राभिषेक किया जाता है। साथ ही धन वृद्धि के लिए शहद और घी से अभिषेक करना चाहिए।

मंदिर के जल से किया गया अभिषेक/Abhishek मोक्ष की ओर ले जाता है और सरसों के तेल से अभिषेक करने से शत्रुओं का नाश होता है। गाय के दूध और शुद्ध घी से शिव का अभिषेक करना स्वास्थ्यप्रद होता है। पुत्र की इच्छा रखने वाले व्यक्तियों को चीनी के पानी से अभिषेकम्/Abhishekam करना चाहिए।

शिवलिंग पर अर्पण की गई विभिन्न सामग्रियों के क्या लाभ हैं?/ What are the benefits of various offerings to Shivling?

  • वर्षा जल से रुद्राभिषेक करने पर नकारात्मकता दूर होती है।
  • कुशा जल से रोगों और दुखों से मुक्ति मिलती है।
  • दही से अभिषेक करने पर पशु, भवन और वाहनों की प्राप्ति होती है।
  • गन्ने के रस से अभिषेक करने पर धन की प्राप्ति होती है।
  • शहद युक्त जल से रुद्राभिषेक करने से धन में वृद्धि होती है।
  • पवित्र जल से रुद्राभिषेक करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  • जल में इत्र मिलाकर अभिषेक करने से रोग समाप्त होते हैं।
  • दूध से, रुद्राभिषेक/Rudrabhishek करने से पुत्र की प्राप्ति होती है तथा गोनोरिया से मुक्ति मिलती है और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
  • गंगाजल से, अभिषेक करने से बुखार ठीक हो जाता है।
  • दूध और चीनी से अभिषेक करने से सद्बुद्धि प्राप्त होती है।
  • घी से रुद्राभिषेक करने से वंश वृद्धि होती है।
  • सरसों के तेल से अभिषेक करने से रोगों और शत्रुओं का नाश होता है।
  • शहद से, रुद्राभिषेक करने से पापों का नाश होता है।

इसके अतिरिक्त क्या करना चाहिए?/ What should be done apart from this?

1. शिवलिंग पर कच्चे चावल अर्पण करने से धन-धान्य की प्राप्ति होती है।
2. तिल अर्पण करने से समस्त पापों का नाश होता है। 
3. जौ अर्पित करने से लंबे समय से चल रही समस्याओं का अंत होता है। 
4. गेहूं अर्पित करने से पुत्र की प्राप्ति होती है।
5. शिवलिंग पर जल चढ़ाने से पारिवारिक सदस्यों को आ रहे तेज बुखार में कमी आती है।
6. दूध में चीनी मिलाकर चढ़ाने से बच्चों का दिमाग तेज होता है।
7. शिवलिंग पर गन्ने का रस अर्पण करने से समस्त सांसारिक सुखों की प्राप्ति होती है।
8. गंगा जल चढ़ाने से भौतिक सुखों के साथ ही मोक्ष की भी प्राप्ति होती है।
9. शिवलिंग पर शहद अर्पित करने से टी.बी. या मधुमेह में आराम मिलता है।
10. गाय के दूध से बना घी चढ़ाने से शारीरिक दुर्बलता से मुक्ति मिलती है।
11. पुष्प अर्पण करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
12. शमी वृक्ष के पत्ते शिवलिंग पर चढ़ाने से समस्त दुखों से मुक्ति मिलती है।

सावन, त्रयोदशी, शिवरात्रि या श्रावण के सोमवार के दिन नियमित रूप से उपरोक्त अनुष्ठान/Rituals करना लाभदायक होता है।

भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए जलाभिषेक का विशेष महत्व है। जल शुद्धता का प्रतीक है। अतः भगवान के जलाभिषेक द्वारा, मन की शुद्धता, कल्याण और सद्भावना के लिए प्रार्थना की जाती है। शिव एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ-कल्याण होता है। प्राचीन समय से ही, भगवान शिव की पूजा-अर्चना होती रही है। प्रत्येक मनोकामना की पूर्ति के लिए शिव की आराधना की जाती है। 

शिवजी का अभिषेक/Abhishek कई चीजों से किया जाता है। जैसे- पुत्र के लिए दूध, स्नेह के लिए दही, घी प्रेम की वृद्धि के लिए, धन के लिए शहद, व्यापार-वृद्धि के लिए गन्ने का रस, रोग से मुक्ति के लिए गिलोय का रस, सम्मान पाने के लिए बेल के रस से अभिषेक किया जाता है। 

इन बातों का रखें ध्यान/ Precautions to be kept in mind

× पंचामृत अर्पित करने के पश्चात, जलाभिषेक करना चाहिए।
× शिवलिंग पर रोली नहीं, बल्कि चंदन का तिलक लगाना चाहिए। 
× कटे-फटे बेल पत्र नहीं चढ़ाने चाहिए। 
× जलाभिषेक के समय, शिवलिंग के पश्चात क्रमानुसार गणेश, नंदी, कार्तिकेय, गौरी का पूजन करना चाहिए।
× भगवान शिव को चढ़ाए गए जल को न पार किया जाता है और न ही पिया जाता है।

भगवान शिव का पूजन कैसे करना चाहिए?/ How to worship lord Shiva?

हिंदू धर्म के अनुसार, सर्वप्रथम शिव परिवार का जलाभिषेक करके दूध, दही, घी, शहद, चीनी से बना पंचामृत/panchamrit अर्पित करना चाहिए। शुद्ध जल से स्नान कराने के पश्चात वस्त्र आदि अर्पित करके चन्दन, चावल, माला, बेलपत्र, अगरबत्ती, प्रसाद जैसे फल, पान आदि अर्पण करने चाहिए तथा माल्यार्पण करते समय क्षमा मांगनी चाहिए।

रुद्राभिषेक के दौरान, मंदिर में संगमरमर से निर्मित प्रतिमाओं का अभिषेक किया जाता है क्योंकि ऐसा माना चाहता है कि मूर्तियों में भगवान का वास होता है।

मूर्तियों को रखने से पहले, उस स्थान पर नौ ग्रह या नवग्रह बनाकर उनका पूजन किया जाता है। तत्पश्चात, मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा करके, ध्यानपूर्वक रुद्राभिषेक करने में अडतालीस दिन लगते हैं। इतने दिनों तक पूजन और हवन आदि के कारण वातावरण गर्म हो जाता है इसीलिए; मंदिर के अंदर का तापमान ठंडा होने के कारण, वहां रुद्राभिषेक/Rudrabhishek किया जाता है। सम्पूर्ण प्रक्रिया मंदिर के पुजारी द्वारा की जाती है और प्रतिदिन पूजा और हवन के बाद प्रसाद का वितरण किया जाता है।

अभिषेक/Abhishek की प्रक्रिया में गाय के दूध से बने दही और घी का प्रयोग किया जाता है। हिंदू धर्म के महाकाव्यों और प्राचीन ग्रंथों में गाय को पवित्र माना गया है। कहा जाता है कि गाय में तैंतीस करोड़ देवी-देवता निवास करते हैं।

कई बार रुद्राभिषेक का कार्यक्रम मंदिरों में नहीं किया जाता है, लेकिन घर पर रुद्राभिषेक करने पर, सर्वप्रथम घर के मंदिर में मूर्ति की स्थापना की जाती है। इसे करने की विधि इस प्रकार है:

1. कुमकुम अभिषेकम् / Kumkum Abhishekam:
सर्वप्रथम सभी मूर्तियों पर, सिंदूर (कुमकुम) लगाना आवश्यक होता है।

2. दुग्ध अभिषेकम् / Abhishekam with Milk:
दुग्ध को अत्यधिक पवित्र माना गया है। इसके सौन्दर्य गुणों के कारण, इससे मूर्ति का रुद्राभिषेक करना अनिवार्य होता है।  

3. दधि अभिषेकम् / Abhishekam with curd:
दुग्ध के पश्चात, मूर्ति को दही से स्नान कराया जाता है तथा दही को पंचामृत में भी मिलाया जाता है।

4. मधु अभिषेकम् / Abhishekam with Honey:
शहद एक अनिवार्य तत्व है। पंचामृत/panchamrit में शहद भी मिलाया जाता है। इसका स्वाद मीठा होने से भाषा और वाणी में मधुरता आती है और शायद इसी कारण इसे मूर्तियों का अभिषेक किया जाता है।

6. शर्करा अभिषेकम् / Abhishekam with Sugar:
गन्ने का रस या चीनी; दोनों में से एक पंचामृत में प्रयोग किया जाता है, यह स्वास्थ्यवर्धक होने के कारण मन से नकारात्मक विचारों को दूर रखता है और शरीर को स्वस्थ रखता है।

7. नारिकेलम् अभिषेकम् / Abhishekam with Sugar:
नारियल तोड़ने के बाद, उसके पानी से मूर्ति को स्नान कराया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इससे जीवन में मेल-मिलाप होता है और लोलुपता नहीं होती।

8. मेवे और कदली अभिषेकम् / 8. Nuts and Banana:
मूर्ति को किशमिश, चने, काजू, खजूर, अंजीर आदि और छोटे टुकड़ों में कटे केले भोग के रूप में चढ़ाए जाते हैं।  

9. जलाभिषेकम् / Abhishekam With Water:
अंत में, पुजारी द्वारा गंगा या किसी अन्य पवित्र नदी से लाए जल द्वारा मूर्ति को स्नान कराया जाता है।

रुद्राभिषेक कितने प्रकार के होते हैं?/ What are the types of Rudrabhishekam?

अभिषेक दो प्रकार के होते हैं-
१-पंचामृत अभिषेक
२ - जल से अभिषेक या जलाभिषेक

प्रतिदिन कौन सा अभिषेक करना चाहिए?/ Which Abhishek should be done daily?

आज भी, दोनों प्रकार के अभिषेक करने की प्रथा प्रचलित है जिसमें आगम मान्य है। अभिषेक ध्यानपूर्वक करने से, विवादों में कमी आती है और भावनाओं में शुद्धि की अनुभूति होती है।

रुद्राभिषेक करते समय किन विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए?/ What are the special things to be kept in mind while doing the Rudrabhishekam?

अभिषेक करते समय ध्यान रखने योग्य बातें :

• अभिषेक करते समय, स्नान करने के बाद धुली हुई धोती, दुपट्टा धारण करना चाहिए। पैंट, कमीज, पायजामा आदि पहन कर पूजा नहीं की जाती है।
• अभिषेक करने वाले व्यक्ति की आयु आठ वर्ष से कम और अस्सी वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए।
• अभिषेक करते समय नाक, कान, मुंह और नाभि के निचले हिस्से को उंगलियों से नहीं छूना चाहिए। 
• सर्दी, बुखार, त्वचा रोग, सफेद धब्बे, खुजली, दाद, रक्त, मवाद आदि स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियों में  अभिषेक नहीं करना चाहिए।
• अभिषेक करते समय, मूर्ति की स्थापना नाभि के स्तर से ऊंची करनी चाहिए।
• अभिषेक करते समय सिर पर दुपट्टा या रुमाल रखना चाहिए।
•‌ अभिषेक/Abhishek करने के लिए, मूर्ति को वेदिका से बाहर निकालते समय गर्दन, कमर, पेट आदि से मूर्ति को नहीं उठाना चाहिए क्योंकि यह वेदनीय कर्म अत्यधिक असंतोषजनक होता है। मूर्ति को एक हाथ भगवान के पद्मासन पर और दूसरा हाथ भगवान की पीठ पर रखकर, मूर्ति को सिर पर रखना चाहिए। तत्पश्चात, दोनों हाथों से अभिषेकम् के स्थान पर रखना चाहिए, मूर्ति को मौलिक पूजन करने के बाद ही वेदी से उतारना चाहिए और वेदी पर रखने से पहले भी मूल पूजन  करना चाहिए।
• अभिषेक करते समय धारण की गई धोती, दुपट्टे का प्रयोग घरेलू कार्यों में नहीं करना चाहिए। 
• दूसरों के द्वारा पहने गए वस्त्रों से या केवल धोती धारण करके अभिषेक नहीं करना चाहिए। 

अभिषेक के समय मुख किस दिशा में होना चाहिए और क्यों?/ In which direction should the face be at the time of Abhishekam and why?

जीवन पर दिशाओं का गहरा प्रभाव पड़ता है, इसलिए पूजन करते समय मूर्ति का मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए तथा अभिषेक करने वाले व्यक्ति का का मुख उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए और यदि मूर्ति का मुख उत्तर दिशा की ओर हो तो व्यक्ति का मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। मूर्ति और उपासक दोनों का मुख दक्षिण-पश्चिम की ओर नहीं होना चाहिए। क्योंकि दक्षिण को अवरोधों की दिशा माना गया है  जिस कारण शांति की प्राप्ति नहीं होती है। पूर्व की ओर यमन्तक का अर्थ है- मृत्यु पर विजय प्राप्त करने वाला। प्रज्ञांतक का अर्थ है- दक्षिण दिशा में बुद्धि की हानि। पश्चिम दिशा को मन-मस्तिष्क को कमजोर करने वाला  पद्मं तक माना जाता है और पश्चिम और दक्षिण दिशाएं नकारात्मक होने के कारण ऊर्जा का दोहन करती हैं तथा पूर्व और उत्तर दिशा सकारात्मक होने के कारण ऊर्जा का पोषण करती हैं।