ईश्वर की कृपा क्या है?/ What is the grace of God?

ईश्वर की कृपा

संस्कार या पूजा/pooja करते समय, कई बार विविध संकेतों से आमना-सामना हो जाता है, जिनको समझना संभव नहीं होता। लेकिन यह संकेत हमारे जीवन के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। यह संकेत दर्शाते हैं कि पूजित ईश्वर या देवता आपसे प्रसन्न हैं या नहीं। तब इन संकेतों के अनुसार, हम अपने इष्टदेव से अपनी मनोकामनाएं या इच्छाएं कह सकते हैं। इससे अलौकिक शक्तियां, उन मनोकामनाओं को पूर्ण करती हैं। अब हम, पूजन/worship के दौरान ईश्वर द्वारा दिए गए कुछ संकेतों के बारे में समझाने का प्रयास करेंगे:

प्रचंड ज्योत / Intensification of a flame
पांच तत्वों में से एक अग्नि है, जिसमें भगवान शिव का वास होता है। पूजन/worship के बीच में सामने रखे दीपक की लौ में वृद्धि होना, सर्वशक्तिमान ईश्वर की पूजन और सच्ची भक्ति से देवताओं की प्रसन्नता को दर्शाता है। ऐसे समय में, ईश्वर की प्रार्थना करके अपनी मनोकामनाएं कही जा सकती हैं।

अगरबत्ती का धुआं / Incense smoke
पूजा/pooja करते समय, भगवान के सामने जलाई गई अगरबत्ती का धुआं, ईश्वर की मूर्ति की ओर उठना दर्शाता है कि ईश्वर द्वारा पूजा स्वीकार कर ली गई है और आपकी मनोकामना जल्द ही पूर्ण हो सकती है।

फूल का गिरना / Flower fall

पूजन या ध्यान करते समय भगवान को अर्पण किए गए फूलों में से, एक फूल का सामने की ओर गिरना आशाजनक माना जाता है और यह पूजा के स्वीकार होने का संकेत देता है। जिसके कारण शीघ्र ही सकारात्मक परिणाम प्राप्त हो सकते हैं।

द्वार पर गौ माता / Cow at the door

भगवान शिव के पूजन या आरती के समय, द्वार पर गौ का आना उत्तम संकेतों को दर्शाता है। द्वार पर गाय की पूजा/pooja करने के बाद रोटी आदि खिलाकर, हाथ जोड़कर गौमाता को मनोकामना बताने से, मनोकामना जल्दी पूर्ण होती है।

ईश्वर की कृपा होने पर ही मनुष्य जन्म की प्राप्ति होती है। मानव जीवन में भूत, वर्तमान और भविष्य के कर्मों को सुधार कर मनुष्य मोक्ष की ओर अग्रसर होता है। मनुष्य अपने द्वारा किए गए कर्मों से दुष्ट आत्मा और श्रेष्ठ धर्मात्मा बन सकता है। 

हमारे कठिन परिश्रम और बुद्धिमानी से यह संभव हो सकता है, लेकिन कभी-कभी हमारी क्षमता उन कार्यों के लिए पर्याप्त नहीं होती। यह कुछ ऐसे अवसर होते हैं जब  कुछ घटनाएं नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं। सामान्य तौर पर, इसे ही बुरा समय कहा जाता है, और मनुष्य का स्वभाव ऐसा है कि वह कठिन परिस्थितियों के दौरान मंदिरों और तीर्थ स्थानों पर जाकर मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए ईश्वर का स्मरण और  प्रार्थना करता है।

लेकिन समझने वाली बात यह है कि ईश्वर हर समय, हर किसी की प्रार्थनाएं नहीं सुन पाते हैं, इसलिए ईश्वर तक अपने कष्टों को पहुंचाने के लिए यह जानना आवश्यक है कि प्रार्थनाओं द्वारा अपनी बात ईश्वर तक किस प्रकार पहुंचाई जा सकती है।

प्रार्थना का अर्थ / Meaning of prayer

प्रार्थना ईश्वर से दिव्य संपर्क स्थापित करके अपनी मनोकामनाएं कहने का एक मार्ग है जिसके द्वारा  मनुष्य अपनी या दूसरों की इच्छाओं को पूर्ण करने की कोशिश करते हैं। संयोगवश तंत्र-मंत्र, जप-तप भी एक प्रकार की प्रार्थना ही है। प्रार्थनाएं अपने प्रभावों द्वारा, छोटे स्तर पर, आपकी आवश्यकतानुसार स्वरूप को बदल देती हैं।  

बहुसंख्यक व्यक्तियों के एक साथ प्रार्थना करने पर, यह अधिक प्रभावी होकर शीघ्रता पूर्वक परिवर्तन कर सकती हैं।  

प्रार्थना अनसुनी क्यों हो जाती है?/ Why prayer goes unheard

कई बार व्यक्तियों को ऐसा महसूस होता है कि अत्यधिक प्रार्थनाएं करने पर भी, ईश्वर तक उनकी प्रार्थनाएं नहीं पहुंच पाती हैं। ऐसी स्थितियों में, हमारे द्वारा बताया जाता है कि कभी-कभी प्रार्थनाएं निष्फल क्यों हो जाती है। आरंभ से ही, यह समझना आवश्यक है कि व्यापार में लेन-देन के समान ही, प्रार्थनाएं भी निष्फल हो सकती है।

प्रार्थनाएं कैसे और किस प्रकार निष्फल होती हैं, इसके कुछ कारण इस प्रकार हैं :
- आहार और व्यवहार में अनियमितता के कारण प्रार्थनाएं निष्फल हो जाती हैं।
- माता-पिता का अनादर करने के कारण प्रार्थनाएं निष्फल हो जाती हैं।
- स्वयं को हानि पहुंचाने से भी प्रार्थनाएं निष्फल हो जाती हैं। 
- निरर्थक प्रार्थनाएं भी निष्फल हो जाती हैं।

प्रार्थना के नियम / Rules of prayer

उचित प्रकार से की गई प्रार्थनाओं द्वारा जीवन में चमत्कारिक प्रभाव मिल सकता है। 
- प्रार्थनाएं, स्वच्छता पूर्वक स्पष्ट रूप से और आसानी से बोली जा सकने वाली होनी चाहिए।
- प्रार्थनाएं, सकारात्मक और शांत वातावरण में करनी उत्तम होती हैं।
- अर्धरात्रि में की जाने वाली प्रार्थनाएं, जल्दी ही स्वीकार कर ली जाती हैं।
- नियमित रूप से एक निश्चित समय पर प्रार्थना करना श्रेष्ठ होता है। 
- इस समय के दौरान, अनुचित या दूसरों को हानि पहुंचाने के उद्देश्य से प्रार्थनाएं नहीं करनी चाहिए। 
- दूसरों के लिए प्रार्थना करने से पहले, उनका ध्यान करते हुए प्रार्थना शुरू करनी चाहिए। 

हमारा विश्वास है कि इन नियमों का पालन करके, धन, संतान या नौकरी के लिए की गई प्रार्थनाएं निस्संदेह पूर्ण होती हैं। 

प्रार्थना करने के तरीके / Way to pray

• ईश्वर तक प्रार्थनाएं पहुंचाने के लिए निम्नलिखित  तरीकों के अनुसार प्रार्थना करनी चाहिए :
• एकांत स्थान पर बैठे।
• प्रार्थना करते समय रीढ़ की हड्डी सीधी रखनी चाहिए।
• तत्पश्चात, अपने इष्ट देव, गुरु या ईश्वर का ध्यान करना चाहिए।
• इसके बाद इच्छित प्रार्थनाएं करनी चाहिए।
• अपनी प्रार्थनाओं को किसी के समक्ष प्रकट नहीं करना चाहिए। 
• अपनी प्रार्थनाओं को समय-समय पर दोहराते रहना चाहिए।

निष्ठापूर्वक इन तरीकों का पालन करने पर मनोकामनाओं के पूर्ण होने की प्रबल संभावनाएं होती हैं। कहा जाता है कि मानव जन्म ही एकमात्र ऐसा जन्म है, जिसमें व्यक्ति परोपकार के द्वारा अपने जीवन को पवित्र कर सकता है। घरेलू जीवन या गृहस्थ आश्रम को मानव जीवन का सर्वश्रेष्ठ आश्रम माना जाता है। गृहस्थों द्वारा किए गए दैनिक कार्यों को सर्वशक्तिमान ईश्वर की पूजा माना जाता है, क्योंकि उनके सभी कार्यों और कर्तव्यों में ईश्वर के प्रति भक्ति-भावना उपस्थित होती है। यही कारण है कि देवता भी मनुष्य के रूप में जन्म लेने की इच्छा रखते हैं। किसानों को अन्नदाता, अन्नपूर्ण ईश्वर भी कहा जाता है। ईश्वर द्वारा मनुष्यों का चुनाव परोपकार करने के लिए किया है।

सत्संग और भागवत कथा दोनों भाग्य से प्राप्त होते हैं। बुरे वक्त के दौरान, जिनका भाग्य उदय होता है, उन्हें ही यह मौका मिलता है। भागवत कथा पापी को मुक्ति देती है। भागवत कथा मनुष्य को नश्वरता और जीवन को भावपूर्ण बनाने का मार्ग दिखाती है। किसी भी बात के परिणाम तभी प्राप्त होते हैं, जब उनका उचित प्रकार से पालन किया जाता है। परंतु, कुछ लोग दूसरों की बातों पर ध्यान न देकर सिर्फ अपनी बातों को सर्वोपरि रखते हैं तथा कुछ लोग बातों पर ध्यान न देकर, सिर्फ समय की बर्बादी करते हैं। इस प्रकार, तीन प्रकार के श्रोता होते हैं जिनमें से एक को श्रोता कहा जाता है, और अन्य बातों को उखाड़ने वाले होते हैं। बातों को ध्यान से ना सुनने वाले और डींगे मारने वाले लोगों की बातों से कोई लाभ नहीं होता है।

हम सभी भगवान की कृपा/grace of God और दयालुता के बारे में सुनते रहते हैं और अधिकांश ने इसे महसूस भी किया होगा। परंतु, इस भावना को वही व्यक्ति समझ सकते हैं जिन पर ईश्वर की कृपा हो।