मुख्य पृष्ठ भारतीय त्यौहार & मुहुर्त

भारतीय त्यौहार & मुहुर्त

अगले वर्ष के लिए संबंधित त्यौहार टैब के अंदर क्लिक करें
गुरू पूर्णिमा/ Guru Purnima
13 Jul, 2022

हिंदू संस्कृति में, गुरु को भगवान के समान का दर्जा दिया जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वह गुरु ही होता है जो दुनिया में हर तरह की समस्या का सामना करना सिखाता है और हर मुश्किलों हल करने में मार्गदर्शन करता है। गुरु का ज्ञान प्राप्त करने और दिखाए गए मार्ग पर चलने से व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त होता है। शास्त्रों के अनुसार यदि भगवान आपको श्राप दे तो गुरु आपको बचा सकता है, लेकिन खुद भगवान गुरु के द्वारा दिए गए श्राप से आपकी रक्षा नहीं कर सकते। इसलिए कबीर जी का एक दोहा इस बात को साबित करता है -
गुरु गोबिंद दोनो खडे, काके लागू पाय।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविन्द दियो बताय।

इस त्योहार हर साल आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा/ guru purnima के नाम से मनाया जाता है। इस त्योहार पर खास तौर पर गुरुओं की पूजा की जाती है। भारत में इस पर्व को बहुत ही सम्मान के साथ मनाया जाता है। प्राचीन काल में इस पर्व का महत्व और भी ज्यादा था। उस वक्त शिष्य गुरु के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा प्राप्त करते थे। गुरु पूर्णिमा के दिन सभी शिष्य पूरी भक्ति के साथ अपने गुरु की पूजा करते थे और उनको दिए गए ज्ञान के लिए धन्यवाद देते थे।
इस दिन घर के बड़ों जैसे माता-पिता, भाई-बहन आदि को गुरु माना जाता है और उनसे आशीर्वाद लेकर दिन की शुरुआत की जाती है। भारत में सभी गुरुओं का बहुत सम्मान किया जाता है क्योंकि गुरु ही वह मानव होता है जो अपने शिष्य को सही और गलत रास्ते का फर्क बताता है और यदि कोई किसी गलत रास्ते पर है तो उसे निकाल कर सही दिशा में ले जाते हैं। पौराणिक काल में बहुत सारी कहानियां प्रचलित हैं, जो बताती हैं कि किसी को भी सफल बनाने में गुरु का उल्लेखनीय योगदान होता है। इस दिन को मनाने के पीछे का एक कारण यह भी माना जाता है कि इसी दिन ब्रह्मसूत्र, महाभारत, श्रीमद्भागवत और अठारह पुराणों जैसे महान साहित्य की रचना करने वाले महान गुरु महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। महर्षि वेदव्यास को सभी गुरुओं के गुरु माना जाता है इसलिए इस दिन का एक खास महत्व होता है। इस दिन सभी शिष्य अपने-अपने गुरुओं का आशीर्वाद लेते हैं। वह उनका धन्यवाद करते हैं कि उन्होंने अभी तक बहुत कुछ सीखा है और आगे भी सीखना चाहते हैं। 
बजरंगी धाम में हम 24 जुलाई, 2021 को सुबह लगभग 9 बजे चुनिंदा अनुयायियों के लिए एक छोटी पूजा अनुष्ठान का आयोजन करेंगे और गुरु पूर्णिमा उत्सव मनाएंगे। हर वर्ष हम ऐसा आयोजन करते हैं और आगे भी करते रहेंगे जिससे सभी को रिद्धि और सिद्धि प्राप्त हो।

गुरु का अर्थ क्या है?/ What is the Meaning of Guru?
शास्त्रों में, 'गु' का अर्थ है अंधकार, और 'रु' का अर्थ है 'प्रकाश' जो अंधकार को जड़ से खत्म कर देता है। सभी गुरुओं को गुरु इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह अज्ञानता को दूर करते हैं। इस वाक्य का अर्थ यह है कि वह 'गुरु' ही होता है जो मानव को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। गुरु को ईश्वर के समान माना गया है। इस श्रद्धा के पीछे का कारण यह है कि यह रिश्ता पूरी तरह से आध्यात्मिक प्रगति और ज्ञान की प्राप्ति के लिए है।

गुरु-शिष्य परंपरा की शुरुआत/The Beginning of Guru-Shishya Tradition 

शास्त्रों और कुछ पौराणिक कथाओं/guru purnima Story के अनुसार, सबसे पहले श्री परमेश्वर ने नारायण को विष्णु के नाम से पुकारा और उन्हें 'ॐ ' के रूप में महामंत्र का जाप करने का आदेश दिया। कुछ समय पश्चात, ब्रह्मा जी को अज्ञान से मुक्त करने के लिए, भगवान ने अपने हृदय से योगियों के ज्ञान को श्री रुद्र के सामने प्रकट किया। फिर उन्होंने ब्रह्मा जी की अंतरात्मा को शुद्ध करने के लिए 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जाप करने का ज्ञान देकर ब्रह्मा के अंधकार को शुद्ध किया। इस प्रकार शिष्य को अंधकार के स्थान पर प्रकाश की ओर ले जाना गुरुत्व कहलाता है। 

गुरु पूर्णिमा का महत्व/ The Importance of Guru Purnima

इस पर्व पर बहुत सारे लोग अपने गुरु या फिर संतों की विधि के अनुसार पूजा करते हैं। वह उनकी पादुका को सामने रख दिया, फूल, अक्षत, चंदन, नैवेद्य आदि के साथ पूरे रीति रिवाज के साथ गुरु की पूजा/ Guru Puja करते हैं।
जो अंधकार को मिटाकर प्रकाश की ओर ले जाता है, वह 'गुरु' कहलाता है। माता-पिता भले ही बच्चे को जन्म देते हैं, लेकिन गुरू उसे जीवन और दुनिया का अर्थ समझाने का काम करता है जिससे वह अपने आगे का जीवन सफलता से व्यतीत कर सके। कई शास्त्रों में गुरु को ब्रह्म इसलिए कहा गया है क्योंकि जैसे ब्रह्म जीव बनाता है, उसी तरह गुरु, एक व्यक्ति को अच्छा इंसान बनाता है। हमारी आत्मा ईश्वर के रूप में सत्य का ढूंढने के लिए बेताब रहती है, और यह मिलान गुरु की शिक्षा के बिना हो ही नहीं सकता। इसलिए मनुष्य को हर जन्म में गुरु से शिक्षा करनी पड़ती है। 

अठारह पुराणों की रचना करने वाले महान साहित्य महर्षि वेद व्यास जी का जन्म आषाढ़ पूर्णिमा को हुआ था। ऐसी मान्यता है कि वेदव्यास ऋषि पराशर के पुत्र थे। हिंदू शास्त्रों के अनुसार महर्षि व्यास तीनों काल के स्वामी थे। उनको अपनी दिव्य दृष्टि से देखकर पता चल गया था कि कलयुग में लोगों की धर्म के प्रति रुचि कम हो सकती है। धर्म में रुचि न होने के कारण मनुष्य ईश्वर को न मानने वाला, कर्तव्य विहीन, कम उम्र और बिना नैतिकता का होगा। उन्हें पहले ही पता चल गया था कि मानव के लिए एक विस्तृत और संपूर्ण वेद का अध्ययन करना आसान नहीं होगा। इसलिए महर्षि व्यास ने वेदों को चार भागों में विभाजित किया ताकि अल्प बुद्धि और अल्प स्मृति शक्ति वाले लोग भी वेदों के अध्ययन से लाभान्वित हो सकें और अपने जीवन में एक दृष्टि बना सकें। व्यास जी ने वेदों को अलग-अलग भागों में विभाजित करके ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का नाम दिया। इन सभी वेदों को वेद व्यास ने बांटा था इसलिए इनका नाम वेद व्यास जी के नाम से ही प्रसिद्ध हुए। उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद अपने प्रिय शिष्यों वैशम्पायन, सुमंतमुनि, पाल और जामिन को दिए। 

वेदव्यास जी ने पंचम वेद के रूप में पुराणों की रचना की थी जिसमें वेदों के ज्ञान को रोमांचक कहानियों के रूप में लोगों तक पहुंचाने का प्रयास था क्योंकि वेदों में जो भी बातें कही गई थी उन्हें समझना असाधारण रूप से रहस्यमय और चुनौतीपूर्ण थी। उन्होंने पुराणों का ज्ञान अपने शिष्य रोमहर्षण को दिया। व्यास जी के शिष्यों ने अपनी बुद्धि शक्ति के अनुसार, वेदों को कई शाखाओं और उप-शाखाओं में विभाजित किया। महर्षि व्यास ने महाभारत की रचना भी की थी। वह  हमारे आदि-गुरु माने जाते हैं। गुरु पूर्णिमा का यह प्रसिद्ध पर्व व्यास जी की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। इसलिए इस पर्व/Festival को व्यास पूर्णिमा/ Vyasa Purnima के नाम से जाना जाता है।

गुरु पूर्णिमा का प्राचीन महत्व क्या है?/ What is the Ancient Importance of Guru Purnima?

विभिन्न हिंदू पौराणिक वेदों के अनुसार, गुरु को त्रिदेवों से सर्वोपरि भी कहा गया है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि गुरु ही व्यक्ति को सही दिशा दिखाते हैं और अपने शिष्य का मार्गदर्शन भी करते हैं। इस पर्व/Festival को मनाने की प्रथा प्राचीन काल के समय से चलती आ रही है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, गुरु को भगवान का दर्जा दिया जाता था और उन्हें दक्षिणा के रूप में अपार श्रद्धा और सेवा दी जाती थी।
इस दिन गोवर्धन जी की परिक्रमा का भी विधान है। गोवर्धन उत्तर प्रदेश राज्य में स्थित है। यह भी देखा गया है कि इस दिन लोग पवित्र नदियों, कुंडों और तालाबों में स्नान करते हैं और अपने इच्छा अनुसार दान भी देते हैं।
गुरु की महिमा है अगम, गाकर तरता शिष्य
गुरु काल का अनुमान कर, गढ़ता आज भविष्य

वैदिक ग्रंथ में भगवान शिव को प्रथम गुरु माना गया है/ Lord Shiva is considered to be the Maiden Guru in Vedic Grantha. 

पुराणों के अनुसार भगवान शिव को प्रथम गुरु माना गया है। शनि और परशुराम उनके दो शिष्य हैं। शिवजी ने पृथ्वी पर सबसे पहले सभ्यता और धर्म का प्रचार किया, इसलिए उन्हें आदिदेव और आदि गुरु कहा जाता है। शिव को आदिनाथ भी कहा जाता है। आदिगुरु शिव ने शनि और परशुराम के साथ सात लोगों को ज्ञान दिया। इन्हें बाद में सात महर्षि कहा गया, बाद में उन्होंने शिव के ज्ञान को चारों ओर फैला दिया। 

शिष्य गुरु पूजा/ Shishya Worship Guru

गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व/Festival पर शिष्य अपने गुरुओं की पूजा करते हैं और गुरुओं को उपहार स्वरूप कुछ दान और दक्षिणा भी देते हैं और उनके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। प्रत्येक युग में, गुरु का अधिकार कण-रूपी परब्रह्म की तरह हर जगह व्याप्त रहा है। बिना गुरु के संसार अज्ञान की रात मात्र है।

गुरु पूर्णिमा पूजा की विधि/ Method of Guru Purnima Puja

शास्त्रों में गुरु पूर्णिमा पर गुरु पूजा/Guru puja की विधि का वर्णन इस प्रकार किया गया है कि सुबह भगवान विष्णु, शिव, गुरु बृहस्पति और महर्षि वेदव्यास की पूजा करने के बाद आपको अपने गुरु को प्रणाम करना चाहिए। कुछ लोग अपने अपने गुरुओं को फूलों की माला पहना कर, और नए कपड़े तोहफे के रूप में देकर उनसे आशीर्वाद लेते हैं।

  • गुरु पूर्णिमा पर केवल गुरु ही नहीं बल्कि परिवार में किसी भी बड़े यानी माता-पिता, भाई-बहन आदि को भी गुरु के बराबर मान कर उनसे आशीर्वाद लें।
  • गुरु की कृपा से ही विद्यार्थी को ज्ञान की प्राप्ति होता है। उसके हृदय का अज्ञान और अंधकार दूर हो जाता है।
  • केवल गुरु का आशीर्वाद ही मानवता के लिए लाभकारी, ज्ञानवर्धक और उपयोगी साबित होता है। संसार का सारा ज्ञान गुरु की कृपा से ही प्राप्त होता है।
  • गुरु से मंत्र प्राप्त करने के लिए इस दिन को श्रेष्ठ माना गया है।
  • इस दिन जितना हो सके गुरुओं की सेवा करें और उनसे ज्ञान प्राप्त करें।
  • इसलिए जरूरी है कि इस पर्व को पूरी श्रद्धा के साथ मनाया जाए|

गुरु पूर्णिमा मनाने के पीछे का मिथक/The Myth behind the Celebration of Guru Purnima

भारत की पहचान इसके आध्यात्मिक सार में छिपी है। भारत में बदलते समय और परिस्थितियों के अनुसार इस अध्यात्म को जीवन में उतारने की अद्भुत कला को यहां के ऋषि-मुनियों ने ही सिखाई है। गुरु पूर्णिमा ऐसे सर्वदेशीय गुरुओं के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का पर्व है जो स्वयं कष्ट सहकर भी समाज को प्रगति के पथ पर अग्रसर करते हैं। महाभारत काल में महर्षि वेदव्यास के नाम से सभी परिचित थे। उन्हें मुनिश्रेष्ठ भी कहा जाता था और यह वही हैं जिन्होंने चार वेदों, अठारह पुराण और श्रीमद्भागवत की रचना की थी। इतिहास में उन्हें गुरु-शिष्य परंपरा का पहला गुरु माना जाता था।
हर व्यक्ति को समझना चाहिए कि यदि कोई व्यक्ति ज्ञान देता है, तो वह हमें कुछ सीखता है; तब उस स्थिति में वह हमारे लिए एक गुरु के समान बन जाता है। आप यह भी कह सकते हैं कि वह पूजनीय बन जाता है। शास्त्रों में एक कहानी उल्लेखनीय है कि एक बार मुनिवर ने भील जाति के किसी व्यक्ति को एक पेड़ को झुकाकर उससे नारियल तोड़ते देखा। उस दिन से व्यास जी ने उस व्यक्ति का पीछा करना शुरू कर दिया क्योंकि वह इस विद्या को जानने के लिए उत्सुक थे, लेकिन वह व्यक्ति वेद व्यास जी से झिझक और भय के कारण दूर जाकर छिप जाता था। पीछा करते हुए, व्यास जी एक दिन उस व्यक्ति के घर पहुंचे,  वह व्यक्ति घर पर नहीं था, लेकिन उसका पुत्र उपस्थित था जिसने व्यास जी की बात सुनी और वह उनको वह मंत्र देने के लिए तैयार हो गया। अगले दिन व्यास जी फिर से आए और उन्होंने सभी नियमों का पालन करते हुए उस व्यक्ति से उस मंत्र को ले लिया। 
जब वह व्यक्ति घर वापस आया तब उसके पुत्र ने अपने पिता की झिझक का कारण पूछा|  पुत्र की बात सुनकर पिता ने कहा कि पुत्र, "मैं जानबूझकर यह मंत्र व्यास जी को यह मंत्र नहीं देना चाहता था क्योंकि मेरे मन में एक बात थी कि जिस व्यक्ति से कोई मंत्र लिया जाता है, वह गुरु के समान हो जाता है। वह आगे कहते हैं कि हम गरीब और छोटी जाति के लोग हैं। तब क्या व्यास जी हमारा सम्मान करेंगे?" पिता ने उसे एक बात और कही कि यदि मंत्र देने वाला व्यक्ति पूजनीय नहीं है, तो वह मंत्र सिद्ध नहीं हो सकता। इसी कारण उस व्यक्ति ने अपने पुत्र को व्यास जी की परीक्षा लेने के लिए भेजा कि क्या उनके पुत्र को गुरु के समान यह सम्मान मिलता है या नहीं?
अगले दिन उस व्यक्ति का पुत्र व्यास जी के दरबार में पहुँचा, जहाँ व्यास जी अपने साथियों के साथ किसी बात पर चर्चा कर रहे थे। अपने गुरु जो उस व्यक्ति का पुत्र था, उनको आते देख व्यास जी दौड़ते हुए आए और उनकी पूजा की और सभी नियमों का पालन करते हुए उनका सम्मान किया। यह देखकर पुत्र बेहद प्रसन्न हुआ। उसकी और उसके पिता की सारी दुविधाएं मिट गईं और एक बात सिद्ध हो गई कि गुरु अगर छोटी जाति का भी हो तब भी वह पूजनीय होता है। ऐसा वेद व्यास जी ने भी किया और गुरु-शिष्य परंपरा को जीवित रखा। व्यास जी ने भी गुरु शिष्य की परंपरा का पूर्ण रूप से पालन किया। इस पूरे वर्ष में एक दिन ब्रह्म ज्ञान सद्गुरु को समर्पित होता है जिसे व्यास पूर्णिमा या गुरु पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है 

वर्षा ऋतु गुरु पूर्णिमा के लिए सर्वश्रेष्ठ क्यों है?/ Why is Varsha Ritu Best for Guru Purnima?

भारत में सभी ऋतुओं का अपना महत्व है। गुरु पूर्णिमा/Guru Purnima 2021 के मनाए जाने के पीछे एक खास कारण है और वह है – बारिश। इसका कारण यह है कि इन चार महीनों में न तो अधिक गर्मी होती है और न ही अधिक ठंड। इस समय को पढ़ाई और अध्ययन के लिए उपयुक्त और उत्तम माना जाता है। इसलिए गुरू के चरणों में जो शिष्य होते हैं वह इस समय को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग की शक्ति प्राप्त करने के लिए उपयुक्त मानते हैं और चुनते हैं।

आप अन्य सभी प्रमुख भारतीय त्योहारों के लिए भारतीय त्योहारों में ज्योतिष की प्रासंगिकता (Relevance of Astrology) पर इसी तरह के लेख पढ़ सकते हैं|

हरियाली तीज
31 Jul, 2022

श्रावण मास के शुक्ल पक्ष के तीसरे दिन या तृतीया को हरियाली तीज या श्रावणी तीज का दिन निश्चित होता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार, हरियाली तीज अक्सर जुलाई या अगस्त में आती है। यह मुख्य रूप से महिलाओं का पर्व है जो श्रावण शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को उत्तम भाग्य और अच्छा वर पाने के लिए मनाया जाता है। यह पर्व सावन में आता है जब चारों ओर हरियाली होती है। यही कारण है कि इस पर्व को हरियाली तीज भी कहा जाता है। श्रावण मास में जब संपूर्ण धरती हरियाली से सजी होती है, तो प्रकृति के इन खूबसूरत पलों का आनंद उठाने के लिए महिलाओं द्वारा झूला झूलकर अत्यधिक पौराणिक रूप से यह पर्व मनाया जाता है। हरियाली तीज के अवसर पर देशभर में कई स्थानों पर मेले आयोजित किए जाते हैं और माता पार्वती की सवारी धूमधाम से निकाली जाती है। यह पर्व भगवान शिव और पार्वती जी के पुनर्मिलन को सम्मानित करने के लिए मनाया जाता है। 

 

हरियाली तीज का पौराणिक महत्व/ Mythological Significance of Hariyali Teej

हिंदू धर्म में, प्रत्येक व्रत, उपवास और त्योहारों का पौराणिक संबंध होने के कारण, उनके साथ एक रोमांचक कहानी या कथा जुड़ी होती है। हरियाली तीज भी भगवान शिव और पार्वती के पुनर्मिलन को मनाने के लिए मनाई जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार, देवी पार्वती में भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठिन तपस्या की थी। 108 जन्मों के कठिन तप के बाद, माता पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति रूप में प्राप्त किया था। यह कहा जाता है कि श्रावण मास के शुक्ल पक्ष के तीसरे दिन भगवान शिव ने पार्वती जी को पत्नी रूप में स्वीकार किया था। तबसे, ऐसा माना जाता है कि इस दिन को भगवान शिव और देवी पार्वती द्वारा विवाहित महिलाओं के लिए भाग्य का दिन होने का आशीर्वाद दिया गया था। इसलिए हरियाली तीज पर विवाहित महिलाओं द्वारा भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन और उपवास करने से परिवार में खुशहाली और सुख समृद्धि आती है। 

 

हरियाली तीज का धार्मिक महत्व/ Religious Significance of Hariyali Teej

धार्मिक विश्वासों के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि सावन में हरियाली तीज के दिन भगवान शिव और पार्वती जी फिर से एक साथ आए थे, जिसका वर्णन शिवपुराण में भी वर्णित है। इसलिए इस दिन विवाहित महिलाओं द्वारा वैवाहिक जीवन आनंदमय बनाए रखने के लिए, देवी पार्वती और शिव जी का पूजा की जाती है। उत्तर भारत में तीज पर्व अत्यधिक धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन अविवाहित कन्याएं भी योग्य वर की कामना के साथ उपवास करती है और पूरे मन से उन्हें प्राप्त करने के लिए इश्वर से प्रथना करती हैं। 

 

हरियाली तीज कैसे मनाई जाती है?/ How is Hariyali Teej celebrated?

यह उपवास करवा चौथ से भी अधिक कठिन माना जाता है। इस दिन महिलाओं द्वारा पूरा दिन व्रत रखा जाता है और अगले दिन सुबह स्नान और पूजा के बाद, महिलाओं का व्रत पूर्ण होता है और उसके बाद ही वह कुछ खाती और पीती हैं। इस अवसर पर देवी पार्वती और शिवजी की पूजा की जाती है। इस दिन महिलाओं के मायके से मेकअप का सामान और मिठाइयां ससुराल भेजी जाती हैं। घर के कार्यों को पूरा करके स्नान के बाद, महिलाओं द्वारा सोलह श्रृंगार करके निर्जला व्रत रखा जाता है तथा पूजा के बाद उपवास से संबंधित कथा सुनी जाती है। इस दिन हरे रंग के कपड़े, हरी चुनरी, हरे रंग का लहंगा पहनने, हरा श्रृंगार करने, मेहंदी लगाने, और झूला झूलने की भी मान्यता है।

 

ऐसे मनाई जाती है हरियाली तीज/ This is how Hariyali Teej is celebrated

सावन की शुरुआत के साथ ही विवाहित महिलाओं को उनके माता-पिता के घर बुलाया जाता है। हरियाली तीज से एक दिन पहले, द्वितीया को श्रृंगार दिवस या सिंजारा के रूप में मनाया जाता है। बहू-बेटियों को नौ तरह की मिठाइयां और व्यंजन खिलाए जाते हैं। सिंजारा के दिन, इस त्योहार को मनाने के लिए नवयुवतियां और नवविवाहित दुल्हनें अपने हाथों और पैरों पर मेहंदी लगाती हैं। तीज के दिन महिलाएं हरि साड़ियां और आभूषण पहनकर शाम को झील के किनारे या बगीचे में अपनी सखियों के साथ झूला झूलती हैं और गीत गाती हैं। माना जाता है कि भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए पार्वती ने एक सौ सात जन्म लिए थे तथा उनकी कठोर तपस्या और एक सौ आठवें जन्म में, भगवान शिव द्वारा देवी पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया गया था। इन सबके साथ ही इस व्रत की शुरुआत हुई। इस दिन विवाहित महिलाओं द्वारा सोलह श्रृंगार विधि के साथ भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने से, उनके पति के साथ संबंध अच्छे रहते हैं और पति की उम्र में वृद्धि भी होती है। 

 

तीज पूजा में सोलह श्रृंगार का महत्व/ Significance of 16 makeups ritual  in Teej Puja

यह व्रत अच्छे वर की प्राप्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। सौभाग्य के लिए किए जाने वाले इस व्रत में, महिलाएं मां पार्वती को शहद से बने व्यंजन का भोग लगाती हैं तथा देवी को चूड़ियां, सिंदूर, कंगन, मेहंदी, साड़ी, चुनरी आदि श्रृंगार की कुल सोलह वस्तुएं अर्पित करती हैं। व्रत रखने वाली महिलाएं इन वस्तुओं को देवी पार्वती को अर्पित करके सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। हरियाली तीज की पूजा में पार्वती जी के साथ भगवान शिव की भी पूजा की जाती है। इस दिन व्रत रखने वाली महिलाएं सोलह श्रृंगार की रस्म भी करती हैं। तीज के दिन लोकगीतों पर झूला झूलना सर्वव्यापी है।  

 

हरियाली तीज का व्रत क्यों किया जाता है?/ Why fast on Hariyali Teej

इस पर्व के इस अवसर पर  जो विवाहित महिलाएं सोलह श्रृंगार करके शिव-पार्वती की पूजा करती हैं, उनके पतियों की उम्र में वृद्धि होती है। ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करने वाली अविवाहित युवतियों को आशीर्वाद प्राप्त होता है कि उनके विवाह में आने वाले सभी अवरोध दूर हो जाएंगे हैं और उन्हें एक योग्य वर की प्राप्ति होती है। इस व्रत से विवाहित महिलाओं को पति की लंबी आयु के साथ-साथ सुख-समृद्धि और दांपत्य जीवन का सुख प्राप्त होता है।

अगर किसी युवती का विवाह  नहीं हो रहा हो तो उसे इस दिन व्रत और पूजा करनी चाहिए। इसके अलावा विवाहित महिलाओं को संयुक्त रूप से शिव और पार्वती की पूजा करनी चाहिए।

 

बहनों और बहुओं को सिंधारा दिया जाता है/ Sindhara is given to sisters and daughters-in-law

हरियाली तीज के अवसर पर महिलाएं हाथों पर मेहंदी लगाकर व्रत करती हैं। इस समय के दौरान, घेवर, फेनी और सेवइयां का अधिक प्रचलन होता है। उत्सव से एक दिन पहले, बहनों और बहुओं को वस्त्र, सौभाग्य की वस्तुएं, घेवर, फेनी, फल आदि का सिंधारा दिया जाता है। हरियाली तीज पर ठाकुरजी को मालपुए का भी भोग लगाया जाता है जो इस पर्व पर काफी शुभ माना जाता है।

 

हरियाली तीज परंपरा/ Hariyali Teej tradition

शादी के बाद नवविवाहित युवतियों के लिए पहले सावन का एक अलग ही अर्थ होता है। हरियाली तीज के अवसर पर ससुराल से लड़कियों को उनके माता-पिता के घर बुलाया जाता है।

1. सिंधारा हरियाली तीज से एक दिन पहले मनाया जाता है। इस दिन नवविवाहित युवतियों के ससुराल से कपड़े, गहने, श्रृंगार का सामान, मेहंदी और मिठाइयां भेजी जाती हैं, जिसका इस पर्व में प्रयोग भी होता है।

2. इस दिन मेहंदी लगाने का विशेष महत्व होता है। महिलाएं और लड़कियां इसे विभिन्न डिजाइनों में अपने हाथों पर लगाती हैं। इस दिन विवाहित होने के संकेत के तौर पर पैरों में आलता भी लगाया जाता है।

 3. हरियाली तीज पर विवाहित महिलाओं द्वारा सास के पैर छूकर उन्हें मिठाईयां दी जाती हैं। उनकी गैरमौजूदगी में भाभी (जेठानी) या किसी अन्य बुजुर्ग महिला को दिया जाता है।

 

4. इस दिन महिलाएं श्रृंगार और नए वस्त्र पहनकर पार्वती की पूजा करती हैं।

5. हरियाली तीज पर महिलाओं और युवतियों द्वारा मैदान या बगीचे में झूला झूला जाता है और लोक कथाएं कहीं जाती हैं। 

 

हरियाली तीज पूजा मंत्र/ Hariyali Teej Puja Mantra

देहि सौभाग्य आरोग्यं देहि मे परमं सुखम्।

पुत्रान देहि सौभाग्यम देहि सर्व।

कामांश्च देहि मे।।

 

मालपुआ भी भोग के रूप में करते अर्पित/ Malpua are also offered

श्रावण मास में घेवर, फेनी और सेवइयां बहुतायत होती है। तीज से एक दिन पहले बहनों और बहुओं को सिंधारा दिया जाता है जिसमें कपड़े, सौभाग्य की वस्तुएं, घेवर, फेनी, फल आदि शामिल होते हैं। बरसाना में राधा रानी जी के संजारा अर्पण के दर्शन को देखने के बाद भक्त आश्चर्यचकित रह जाते हैं। हरियाली तीज पर ठाकुरजी को मालपुए का भोग लगाया जाता है। 

 

हरियाली तीज व्रत कथा / Hariyali Teej Vrat Story

हरियाली तीज भगवान शिव और पार्वती के पुनर्मिलन का सम्मान करने के लिए मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। इस कठिन तप के कारण ही, देवी पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त किया था। किंवदंती के अनुसार, हिमालय के घर में माता गौरी ने पार्वती  रूप में पुनर्जन्म लिया था। पार्वती बचपन से ही शिव को वर रूप में पाना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने घोर तप किया। एक दिन नारद जी ने हिमालय से कहा कि भगवान विष्णु पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें अपनी पत्नी बनाना चाहते हैं। यह सुनकर हिमालय रोमांचित हो उठे। वैकल्पिक रूप से, नारद मुनि ने विष्णु जी के पास जाकर कहा कि हिमालय ने अपनी बेटी पार्वती की शादी आपसे करने का फैसला किया है। इस पर विष्णु भी राजी हो गए। तब नारद जी ने पार्वती के पास जाकर उन्हें बताया कि उनके पिता हिमालय में विष्णु जी के साथ उनका विवाह तय कर दिया है। यह सुनकर पार्वती दुखी होकर अपनी सखियों के साथ पिता से छुपकर एक सुनसान जंगल में जाकर फिर से तपस्या करने लगीं। उन्होंने रेत से एक शिवलिंग का निर्माण किया और उपवास करते हुए पूजा करना शुरू कर दिया। भगवान शिव इस तपस्या से प्रसन्न हुए और उनकी इच्छा पूरी करने का आश्वासन दिया। इसी बीच पार्वती के पिता हिमालय भी वहां पहुंच गए। सच्चाई जानने के बाद, वह पार्वती का विवाह भगवान शिव से करने के लिए तैयार हो गए तथा इसके बाद शिव जी ने पार्वती जी से विधिवत् विवाह किया। शिव कहते हैं, 'हे पार्वती! आपके द्वारा किए गए कठिन व्रत के कारण हमारा विवाह हो सका। अतः मैं निष्कपट रूप से इस व्रत का पालन करने वाली प्रत्येक स्त्री की मनोकामना पूरी करूंगा।'

अलग अलग राज्य में तीज की परंपरा भी अलग अलग होती है/Teej's tradition in a different state

भारत के अलग-अलग राज्य इस त्योहार को अलग-अलग अंदाज में मनाते हैं। हर राज्य इस पर्व को अपने अंदाज से मनाता है जिसमें से कुछ के बारे में नीचे दिया गया है।

जयपुर की तीज शोभायात्रा

राजस्थान के लोगों के लिए यह पर्व जीवन का सार है। विशेषकर, गुलाबी नगरी जयपुर में इसकी अलग ही भव्यता देखने को मिलती है। तीज के अवसर पर, जयपुर में लगने वाले मेले का पूरे विश्व में विशेष स्थान   है। इस दिन, पूजा के बाद तीज माता की शोभायात्रा निकाली जाती है। पार्वती जी की प्रतिमा, जिसे तीज माता कहा जाता है, को मार्च में लाया जाता है। त्योहार से पहले, प्रतिमा को रंग-रोगन करके नए वस्त्रों और आभूषणों से सजाया जाता है; तथा शुभ मुहूर्त में शोभायात्रा निकाली जाती है। इस दौरान लाखों की संख्या में लोगों द्वारा माता पार्वती के दर्शन किए जाते हैं। हाथी और घोड़े इस जुलूस की शोभा बढ़ाते हैं। छोटी चौपड़, गणगौरी बाजार और चौगान होते हुए पालिका बाग पहुंचने के बाद, यह शोभायात्रा त्रिपोलिया बाजार में विसर्जित की जाती है। रंग-बिरंगे परिधानों में सजे ग्रामीणों के साथ कई विदेशी पर्यटक भी सवारी देखने के लिए जाते हैं। चारों ओर रंग-बिरंगे कपड़ों में लोग, घेवर-फेनी की खुशबू, प्रकृति की खूबसूरती इस त्यौहार को विशेष बनाती है। खुले स्थानों में विशाल वृक्षों की डालियों पर लगे झूलों में, हाथों में रची मेहंदी के साथ महिलाओं और बच्चों के साथ मल्हार गाकर झूले का आनंद लेना एक अनोखा अनुभव होता है। महिलाओं द्वारा अपनी सखियों के साथ, झूलते  समय लोक गीत, कजरी आदि गाए जाते हैं  जिनसे सारा वातावरण मधुर और जीवंत हो उठता है।

 

राजस्थान का तीज पर्व/ Teej festival in Rajasthan

 

राजस्थान में तीज का उत्सव एक मौसमी त्योहार के रूप में मनाया जाता है। हरियाली और बादलों से आच्छादित सावन या श्रावण मास में लोगों द्वारा यह त्योहार     मनाया जाता है। आसमान में मंडराते काले बादलों के कारण, इस त्योहार को कजली तीज और हरियाली के कारण इस त्योहार को हरियाली तीज कहा जाता है। इस त्योहार पर राजस्थान में झूले लगाए जाते हैं और नदी किनारे मेलों का आयोजन किया जाता है। इस त्योहार के आसपास खरीफ फसलों की बुवाई भी शुरू हो जाती है।   बारिश के लिए चिंतित किसान तीज पर्व पर मोठ, बाजरा, फली आदि का बीजारोपण करते हैं। 

 

वृंदावन तीज/ Teej of Vrindavan

सावन में ब्रज के झूले बहुत प्रसिद्ध हैं। श्री वल्लभ सम्प्रदाय में, ठाकुर जी सावन मास के दौरान झूले पर झूलते रहते हैं। अन्य मंदिरों में सावन शुक्ल तृतीया-हरियाली तीज से रक्षाबंधन-पूर्णिमा तक हिंडोला सजाया जाता है। वृंदावन में श्री बांके बिहारी तीज की रात को, सोने और चांदी से बनी  गंगा-जमुनी को एक विशाल हिंडोले में  झुलाया जाता है। मथुरा का द्वारकाधीश  तट बहुत प्रसिद्ध है। ठाकुर जी के सारे पर्दे, हिंडोला, वस्त्र सब आसमान के रंग से मेल खाते हुए होते हैं जिनमें काली घटा का अत्यधिक महत्व होता है। 

 

हरियाली तीज पर किए जाने वाले उपाय/ Follow these remedial measures on Hariyali Teej

पति-पत्नी के बीच सामंजस्य की कमी होने पर यह उपाय किए जा सकते हैं- 

-शिव जी को पीले वस्त्र और माता पार्वती को लाल वस्त्र अर्पित करने चाहिए।

-बेहतर तालमेल के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

-इसके बाद दोनों कपड़ों में गांठ बांधकर और कुछ  दूरी पर रख दें।

 

अगर पति-पत्नी को एक-दूसरे से दूर रहना पड़े तो क्या करना चाहिए?

-भगवान शिव को पुष्प, बिल्वपत्र,   अबीर-गुलाल अर्पित करना चाहिए।

-चांदी के कलश में माता गौरी को सिंदूर अर्पण करना चाहिए।

- एक दूसरे के साथ शांत रहने की प्रार्थना करनी चाहिए।

- नियमित रूप से अर्पण किए गए सिंदूर का प्रयोग करना चाहिए।

 

यदि पति या पत्नी में से किसी एक का स्वास्थ्य खराब होता है तो

- शाम के समय शिव मंदिर जाना चाहिए।

-सर्वप्रथम शिवलिंग पर पंचामृत अर्पण करें।

-इसके बाद जलधारा से अभिषेक करें।

-जीवनसाथी के स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना करें।

 

उधार के कारण परेशानियां होने पर 

-कत्था का एक सूखा टुकड़ा लेकर जमीन पर तीन सीधी रेखाएं बना लें।

-फिर हनुमान जी का नाम लेने के बाद इन तीनों रेखाओं को पैरों से मिटा दें।

-यह उपाय तीन मंगलवार तक करने से निश्चित ही लाभ प्राप्त हो सकता है।

 

हरियाली तीज पर तीन चीजें त्यागने की परंपरा/ The tradition of giving up three things on Hariyali Teej

हरियाली तीज पर प्रत्येक स्त्री को तीन बुराइयां त्यागने का संकल्प लेना चाहिए। ये तीन चीजें हैं-

1. पति को धोखा 

2. झूठ बोलना और बुरा व्यवहार 

3. परनिंदा (दूसरों की बुराई करने से परहेज)

 

हरियाली तीज के दौरान क्या सही और क्या वर्जित होता है?/ What is right and what is forbidden during Hariyali Teej

1) हरियाली तीज पर निर्जला व्रत होने के कारण पानी नहीं पीना चाहिए। लेकिन गर्भवती और बीमार महिलाओं से इसका कोई संबंध नहीं होता।

2) व्रत रखने वाली महिलाओं को व्रत पूर्ण करने के लिए हरियाली तीज की व्रत कथा सुननी चाहिए। 

3) यह व्रत पति की लंबी उम्र और कल्याण के लिए होने के कारण इस दिन तीज माता/ माता पार्वती के गीत और कथा सुनना शुभ माना जाता है।

नहीं करने वाली चीजें / What not to do?

१) इस व्रत में सफेद और काले वस्त्रों का प्रयोग वर्जित होता है।

२) कहा जाता है कि तीज के व्रत के दौरान नींद नहीं लेनी चाहिए।

३) हिंदू धर्म के अनुसार इस व्रत को करने वाली पत्नियों  का मन, कर्म और वचन शुद्ध होना चाहिए, अर्थात किसी के बारे में बुरा नहीं सोचना चाहिए, गलत काम  और अभद्र भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

 

अनिवार्य मानी जाने वाली चीजें/ These things are considered imperative

हरियाली तीज पर हरी चूड़ियां और मेहंदी जैसी चीजें महत्वपूर्ण मानी जाती हैं, जिनका विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी उम्र, स्वास्थ्य और खुशी के प्रतीक रूप में ध्यान रखा जाता है। इस दिन, आमतौर पर महिलाएं हरे रंग का प्रयोग करती हैं। इसके विपरीत, हरियाली तीज पर महिलाओं के माता-पिता द्वारा साड़ी, श्रृंगार का सामान, मिठाई, फल आदि भेजना उपयुक्त माना जाता है।

नाग पंचमी
02 Aug, 2022

प्रसिद्ध हिंदू पर्व नागपंचमी 2021/nag panchami 2021 संपूर्ण भारत में मनाया जाता है। सर्पों का हमारी संस्कृति का एक अनिवार्य हिस्सा होने के कारण इस दिन लोगों द्वारा शक्ति और सूर्य के अवतार भगवान भोलेनाथ की पूजा की जाती है। यह पर्व श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि/Fifth Tithi में होने के कारण, उत्तर भारत में सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ही नाग पूजा की जाती है। लेकिन दक्षिण भारत में यह पर्व कृष्ण पक्ष की पंचम तिथि को मनाया जाता है। हिंदू धर्म में, नाग पंचमी का दिन महत्वपूर्ण माने जाने के कारण, इस दिन नागों की दूध चढ़ाकर पूजा की जाती है। भगवान शिव को नाग अत्यधिक प्रिय होने के कारण यह पर्व सावन के महीने में आता है तथा इस दिन पूर्ण श्रद्धा के साथ नाग पंचमी का अनुष्ठान करने पर भगवान भोलेनाथ प्रसन्न होकर अपनी कृपा बरसाते हैं।

नाग पंचमी का महत्व/ Significance of Nag Panchami

हिंदू धर्म के अनुसार, सर्पों को देवता मानकर उचित विधि द्वारा उनकी पूजा की जाती है। वास्तव में, सर्प को  भगवान शिव शंकर का हार और विष्णु की शैय्या माना जाता है। साथ ही, सांपों का संबंध लोगों के जीवन से भी होता है। सावन के महीने में भारी बारिश होने के कारण, सर्पों के भूमि से बाहर निकलने पर लोगों द्वारा  दूध चढ़ाकर उनका पूजन किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन श्रद्धा के साथ नाग देवता का पूजन करने पर उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है जिससे सर्प उन्हें ना तो नुकसान पहुंचाते हैं और ना ही उनसे भयभीत होते हैं। 

कुंडली में काल सर्प दोष वाले व्यक्तियों द्वारा, इस दिन पूजन करने से इस दोष से छुटकारा मिल सकता है। यह दोष सभी ग्रहों के राहु और केतु के बीच में आने के कारण होता है तथा ऐसे व्यक्तियों को अपने जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है और कुछ हासिल करने के लिए कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसा कहा जाता है कि जीवन में राहु-केतु के कारण समस्याएं होने पर नाग पंचमी के दिन सर्पों का पूजन/Nag panchami pooja करके अपनी समस्याओं का समाधान प्राप्त किया जा सकता है। 

1. हिंदू मान्यताओं के अनुसार, पौराणिक काल से ही नागों का देवता रूप में पूजन किया जाता रहा है इसलिए नाग पंचमी/Naag panchami 2021 के दिन नाग पूजन करना शुभ माना जाता है।

2. ऐसी भी मान्यता है, कि नाग पंचमी के दिन सर्प का पूजन करने से, सांप के काटने का डर नहीं होता और  अच्छा जीवन व्यतीत किया जा सकता है।

3. ऐसी मान्यता है कि इस दिन सर्पों को दूध चढ़ाने और उनकी पूजा करने से अक्षय पुण्य/Akshay Punya की प्राप्ति होती है।

4. सपेरों के लिए भी यह पर्व विशेष महत्व रखता है।  आमतौर पर, इस दिन लोग सर्पों को दूध और पैसे  चढ़ाते हैं।

5. परंपरानुसार, इस दिन घर के प्रवेश द्वार पर सर्प का चित्र बनाना एक प्रथा है। ऐसा माना जाता है कि सर्पों की कृपा से यह चित्र घर की रक्षा करता है।


नाग पंचमी पूजन का इतिहास/ History of Nag Panchami Puja

पुराणों के अनुसार, नाग पंचमी मनाने की कई मान्यताएं हैं। ऐसा माना जाता है कि श्रावण शुक्ल की पंचमी तिथि को सभी सर्प कुल श्राप से मुक्ति पाने के लिए ब्रह्माजी से मिलने गए और तब ब्रह्माजी ने नागों को श्राप से मुक्त कर दिया। इस घटना के बाद से नाग पूजन की प्रथा शुरू हुई। 

एक और कहानी यह है कि सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को भगवान श्रीकृष्ण ने कालिया नाग का वध करके गोकुल वासियों के प्राण की रक्षा की थी और तभी से नाग पूजन का पर्व शुरू हुआ। 

एक और मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान रस्सी नहीं मिलने पर वासुकी नाग के कहने पर उनका प्रयोग रस्सी की तरह किया गया था। देवताओं द्वारा वासुकी नाग की पूंछ पकड़ी गई और राक्षसों ने वासुकी नाग का मुंह पकड़ा था। और उसी मंथन के दौरान निकले विष को भगवान शिव ने अपने कंठ में रखकर सभी की रक्षा की थी। उसके बाद उसमें से निकले अमृत को देवताओं द्वारा ग्रहण कर लिया गया जिससे सभी देवता अमर हो गए थे।  वासुकी नाग के समुद्र मंथन के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण नाग पंचमी मनाई जाती है, और तब से ही, सभी नागों और सर्पों की पूजा करने की परंपरा शुरू हुई। 

नाग पंचमी मनाने का कारण/ The reason for celebrating Nag Panchami

नाग पंचमी का त्योहार सर्पों का पूजन और उनसे प्रार्थना करके, लोगों को प्रत्येक समस्याओं से बचाने के लिए   मनाया जाता है। सावन के दौरान, भारी बारिश के कारण सर्पों के अपने बिलों से बाहर निकलने पर लोगों द्वारा दूध चढ़ाकर उनकी पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि सामान्य रूप से सर्पों की याददाश्त तेज होने के कारण, वह उन लोगों के चेहरे याद रखते हैं जो उन्हें नुकसान पहुंचाते हैं और बदला लेते समय उस व्यक्ति के परिवार वालों को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसलिए, महिलाओं द्वारा क्षमा मांग कर अपने परिवार को किसी भी नुकसान से बचाने के लिए सर्पों को दूध चढ़ाकर प्रार्थना की जाती है। 


एक पुरानी पौराणिक कथा के अनुसार, जब सर्पों के राजा तक्षक द्वारा डसने के कारण राजा जनमेजय के पिता परीक्षित की मृत्यु होने पर, मृत्यु का बदला लेने के लिए राजा जनमेजय ने संपूर्ण सर्प जाति को नष्ट करने के लिए एक यज्ञ का आयोजन किया। जिस दिन ब्राह्मण आस्तिक ऋषि के द्वारा यह यज्ञ कराया गया उस दिन नाग पंचमी थी। तब से इस दिन को नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है।

नाग पंचमी पूजन और कालसर्प दोष का संबंध/ Nag Panchami worship and relationship with kaal sarp dosha

हिंदू मान्यताओं के अनुसार, कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की नाग पंचमी के दिन भी व्रत रखा जाता है। गरुड़ पुराण में इससे संबंधित सभी जानकारी बताई गई है। व्रत करने वाले व्यक्तियों को मिट्टी या आटे से सर्प बनाकर, उसे विभिन्न रंगों से सजाने के बाद फूल, खीर, दूध, दीपक आदि से पूजन करना चाहिए। पूजन के बाद भुने हुए चने और जौ को प्रसाद के रूप में बांटना चाहिए। ज्योतिषियों/ astrologers का मानना ​​है कि जिन लोगों की कुंडली में कालसर्प दोष होता है उनके द्वारा इस दिन नाग देवता का पूजन करने से उनकी कुंडली में से यह दोष समाप्त हो जाता है।

नाग पंचमी - उपवास और पूजन विधि/ Nag Panchami – Fasting and worship method (Vidhi)

1. इस दिन उपवास/nag panchami upvas रख कर देवताओं की पूजा की जाती है। इस दिन अनंत, वासुकी, पद्म, महापद्म, तक्षक, कुलीर, कर्कोटक और शंख जैसे अष्ट नागों की पूजा की जाती है।

2. चतुर्थी के दिन एक बार भोजन करके, पंचमी के दिन व्रत/Nag Panchami Vrat करके सायंकाल भोजन करना चाहिए।

3. पूजा के लिए लकड़ी की चौकी पर सर्प का चित्र या मिट्टी की मूर्ति स्थापित की जाती है।

4. फिर नाग देवता को हल्दी, रोली (लाल सिंदूर), अक्षत और पुष्प चढ़ाए जाते हैं। 

5. इसके बाद लकड़ी की चौकी पर बैठकर नाग देवता को कच्चा दूध, घी और चीनी का मिश्रण चढ़ाना चाहिए।

6. पूजन/nag panchami pooja के बाद नाग देवता की आरती की जाती है।

7. सुविधानुसार, किसी सपेरे को थोड़ी दक्षिणा देकर सर्प को दूध दिया जा सकता है। 

8. अंत में, व्रत रखने वाले व्यक्तियों को नाग पंचमी की कथा अवश्य सुननी चाहिए।

नोट: परंपरा के अनुसार, कई राज्यों में नाग पंचमी चैत्र और भाद्रपद शुक्ल पंचमी को मनाई जाती है। भारत के अलग अलग क्षेत्र में अलग अलग तरीके से इस पर्व/Festival को मनाने की मान्यता है।

नाग पंचमी से जुड़ी मान्यताएं/ Beliefs related to Nag Panchami

1. हिंदू पुराणों के अनुसार, ब्रह्मा जी के पुत्र ऋषि कश्यप की चार पत्नियां थीं। ऐसा माना जाता है कि  उनकी पहली पत्नी से देवताओं का जन्म, दूसरी पत्नी से गरुड़ और चौथी पत्नी से राक्षसों का जन्म हुआ था, लेकिन उनकी नागा वंश की तीसरी पत्नी कद्रू ने सर्प को जन्म दिया था।

2. पुराणों में दिव्य और बौम दो प्रकार के सर्पों का वर्णन किया गया है। वासुकी और तक्षक दिव्य नाग कहे जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि शेषनाग पृथ्वी का भार वहन करते हैं और क्रोधित होने पर उनके पास प्रज्वलित अग्नि के समान दृष्टि से सम्पूर्ण जगत को राख करने की क्षमता है तथा यदि वह काट लें तो इसका कोई इलाज नहीं है। लेकिन धरती पर मौजूद सभी सर्पों में से कुल 80 प्रकार के सर्पों के ही दांतों में जहर होता है।

3. अनंत, वासुकी, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापदम, शंखपाल और कुलिक अष्टनागों को, सभी नागों में श्रेष्ठ माने गए हैं। इनमें से दो नाग ब्राह्मण, दो क्षत्रिय, दो वैश्य और दो शूद्र माने जाते हैं जिनमें अनंत और कुलिक ब्राह्मण, वासुकी और शंखपाल क्षत्रिय, तक्षक और महापदम वैश्य माने गए हैं और पद्म और कर्कोटक को शूद्र कहा गया है।

4. अर्जुन के पौत्र और परीक्षित के पुत्र जनमेजय के अनुसार, उन्होंने नागों से बदला लेने और सर्प वंश को नष्ट करने के लिए एक सर्प यज्ञ करने का ठाना था क्योंकि उनके पिता, राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के काटने से हुई थी। नागों की रक्षा करने के लिए जरत्कारु के पुत्र, आस्तिक मुनि ने जिस दिन इस यज्ञ को विफल किया, उस दिन श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि थी जिसके कारण तक्षक नाग और उनके वंशज विनाश से बच गए थे। माना जाता है कि यहीं से नाग पंचमी पर्व मनाने की परंपरा प्रचलित हुई।

नाग पंचमी की प्राचीनतम कथा/ The oldest story of Nag Panchami

प्राचीन काल में एक सेठ जी के सात पुत्र थे और सातों का विवाह हो चुका था। सबसे छोटे बेटे की पत्नी बुद्धिमान और अच्छे स्वभाव की थी, लेकिन उसके भाई की पत्नी ऐसी नहीं थी। एक दिन जब बड़ी बहू ने सभी बहुओं को घर की साज-सज्जा के लिए पीली मिट्टी लाने के लिए कहा और सभी राजी भी हो गई। उसके पश्चात सभी बहुएं एक साथ मिट्टी लेने निकल पड़े। जब वह अपनी म्यान से मिट्टी खोदने लगीं, तब मिट्टी में से एक सांप निकला, और बड़ी बहू द्वारा उसे म्यान से मारने की कोशिश करते देखकर छोटी बहू ने उसे रोककर कहा- 'यह सर्प निर्दोष है, उसे मत मारो।' यह सुनकर बड़ी बहू ने उसे नहीं मारा।

उसके बाद सर्प के एक तरफ बैठने पर छोटी बहू ने सर्प से कहा - 'हम जल्द ही वापस आएँगे, तुम यहाँ से कहीं मत जाना।' इतना कहकर वह सबके साथ घर चली गई। घर पहुंचने के बाद, कार्यों में उलझ कर सांप से किए अपने वादे को भूल गई। अगले दिन जब उसे वह बात याद आई तो वह सभी को साथ लेकर वहां पहुंची और उसने वहां सांप को बैठे हुए देखा। उसने कहा - 'नमस्कार, सर्प भाई!' सांप बोला- 'तुमने मुझे भाई कहा है, नहीं तो झूठ बोलने पर मैं तुम्हें काट लेता। उसने कहा- 'भैया मुझसे गलती हो गई, मैं आपसे माफ़ी माँगती हूँ।' इस पर सांप बोला- "ठीक है, आज से तुम मेरी बहन और मैं तुम्हारा भाई बन गया हूं। जो चाहो मांग सकती हो।" वह बोली- 'भाई, मेरा कोई नहीं है; आपको अपने भाई के रूप में पाकर अच्छा लगा।' कुछ दिनों के बाद, सांप इंसान के रूप में उसके घर आया और कहा, 'मेरी बहन को भेजो।' सबको आश्चर्य हुआ और उन्होंने उसे रोक लिया और कहा कि उसका कोई भाई नहीं है तो उसने कहा- "मैं उसका दूर का भाई हूं। मैं बचपन में ही अपनी बहन से बिछड़ गया था, इसलिए वह मुझे नहीं पहचानती।" विश्वास होने पर, उन्होंने छोटी बहू को उसके साथ भेज दिया। रास्ते में सर्प ने उससे कहा कि 'वह सर्प है, इसलिए चलते समय परेशानी होने पर बिना डरे मेरी पूछ पकड़ कर चलती रहना।' उसने जैसा कहा था वैसा ही करने पर वह उसके घर पहुंच गई। वह वहाँ की दौलत और वैभव देखकर चकित रह गई। एक दिन सांप की मां ने उससे कहा- 'मैं काम से बाहर जा रही हूं, तुम अपने भाई को ठंडा दूध दे देना।' उसने इस पर ध्यान नहीं दिया और उसे गर्म दूध दे दिया, जिससे उसका चेहरा बुरी तरह जल गया। यह देखकर सांप की मां अत्यधिक क्रोधित हो गईं लेकिन सर्प के समझाने पर वह शांत हो गईं। तब सर्प ने कहा कि अब उसकी बहन को उसके घर भेज देना चाहिए। तब सर्प (छोटी भाभी का भाई) और उसके पिता उसे बहुत सारा सोना, चाँदी, जवाहरात, कपड़े और गहने आदि देकर उसके घर ले आए। इतना धन देखकर बड़ी बहू ने ईर्ष्या से कहा, कि यदि तुम्हारा भाई इतना धनवान है तो उससे और धन लेना चाहिए। जब सर्प ने यह बातें सुनीं, तो उसने सोने की सारी चीज़ें लाकर अपनी बहन को दे दीं। यह देखकर बड़ी बहू बोली कि 'झाडू लगाने के लिए झाड़ू भी सोने की होनी चाहिए।' यह सुनकर सांप  अपनी बहन के लिए सोने की झाड़ू ले आया। 

सर्प ने छोटी बहू को हीरे-जवाहरात का शानदार हार दिया था जिसकी प्रशंसा सुनकर उस देश की रानी ने राजा से कहा कि सेठ की छोटी बहू का हार यहां मंगवाया जाए। राजा ने अपने मंत्री को तुरंत हार लाने का आदेश दिया; मंत्री ने सेठ जी के पास जाकर कहा कि 'तुम्हारी छोटी बहू का हार महारानी जी पहनना चाहती हैं इसलिए उससे हार लाकर मुझे दे दो। सेठ जी ने डरते हुए छोटी बहू से हार लेकर उसे दे दिया। छोटी बहू को इस बात का बहुत बुरा लगा; उसने अपने सर्प भाई को याद करते हुए प्रार्थना की - 'भाई! रानी ने हार छीन लिया है; आपको कुछ करना चाहिए।' उसने अपने भाई से अनुरोध किया कि जब रानी उस हार को अपने गले में पहने तो वह सांप बन जाए और जब वह मुझे लौटाए तो वह हीरे और रत्नों का हो जाए। सांप ने ठीक वही किया जैसा उसने कहा था। जैसे ही रानी ने हार पहना वह सांप बन गया। यह देख कर रानी चिल्ला कर रोने लगी। यह देखकर राजा ने सेठ जी को छोटी बहू को तुरंत भेजने के लिए खबर भेजी। सेठ जी डर गए कि राजा उनकी बहू का क्या करेगा? यह सोचकर वह स्वयं छोटी बहू को लेकर राजा के पास गए। राजा ने छोटी बहू से पूछा- "तुमने क्या जादू किया है? मै तुम्हें सजा दूंगा।" छोटी बहू बोली- सर्वशक्तिमान राजन्! मेरी  उदंडता को क्षमा कीजिए; लेकिन जब मैं इस हार को अपने गले में पहनूंगी तो यह हीरे और जवाहरात का बन जाएगा और जब कोई इसे अपने गले में पहनेगा तो यह हार सांप बन जाएगा।

यह सुनकर राजा को विश्वास नहीं हुआ। उसने सर्प में बदल चुके हार को उसे देकर कहा, कि वह इसे अभी पहन कर दिखाएं। छोटी बहू के हार पहनते ही सर्प हीरे-जवाहरात के हार में बदल गया। यह देखने के बाद, राजा ने उसके शब्दों से संतुष्ट और प्रसन्न होकर उसको पुरस्कार स्वरूप ढेर सारा धन दिया। उस धन और हार के साथ दोनों अपने घर लौट गए। उसका धन देखकर बड़ी बहू ने ईर्ष्यावश छोटी बहु के पति से कहा, कि छोटी बहू के पास कहीं से धन आया है। यह सुनकर उसके पति ने अपनी पत्नी से कहा- मुझे सही से बताओ कि यह धन उसे कौन देता है? उसने फिर से अपने भाई को याद करने पर उसी समय सांप वहां आया और बोला- अगर कोई मेरी बहन के चरित्र पर शक करेगा तो मैं उसे खा जाऊंगा। यह सुनकर छोटी बहू का पति डर गया और उसने नाग देवता का बड़ा आदर सत्कार किया। उसी दिन से, नाग पंचमी का पर्व मनाया जाता है और महिलाओं द्वारा नागों की भाई के समान पूजा की जाती है।  

नाग पंचमी के दिन न करने वाले कार्य/ what not to do on nag panchami?

-नाग पंचमी के दिन किसानों को गलती से भी खेतों में काम नहीं करना चाहिए क्योंकि यह उनके और उनके परिवार के लिए अत्यधिक नुकसानदायक हो सकता है।  

-नाग पंचमी के दिन सुई- धागे का प्रयोग नहीं होने के कारण, इस दिन सुई और धागे का प्रयोग करने से बचना चाहिए।

-नाग पंचमी के दिन, चूल्हे पर तवा नहीं रखना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से सांपों को नुकसान पहुंच सकता है। 

-इस दिन किसी से झगड़ा नहीं करना चाहिए तथा परिवार के सदस्यों को कड़वे शब्द नहीं बोलने चाहिए। 

-नाग पंचमी/Nag panchami 2021 के दिन, लोहे के बर्तनों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इस दिन लोहे के बर्तन में न तो खाना बनाना चाहिए और न ही खाना चाहिए |

रक्षा बंधन
11 Aug, 2022

दुनिया भर में प्रचलित रक्षाबंधन का त्यौहार एक बंधन के रूप में जाना जाता है जिसे न तो तोड़ा जा सकता है और न ही छोड़ा जा सकता है।

भाई बहन के प्रेम और कर्तव्य को समर्पित यह त्योहार हर साल श्रावण पूर्णिमा को मनाया जाता है। बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी/Rakhi बांधने के लिए रक्षाबंधन का इंतजार करती है। भारतीय संस्कृति में प्रत्येक संस्कृति के समाहित होने की विशेषता के कारण कश्मीर से कन्याकुमारी तक, सौराष्ट्र से लेकर असम तक, लोगों द्वारा कोई ना कोई त्योहार मनाए जाते रहते हैं जिनसे आपसी संबंधों के बीच सद्भावनाओं में वृद्धि होती रहती है। सामान्यतः भाई-बहनों के बीच प्रेम और तकरार होने के बावजूद भी, रक्षाबंधन का पर्व राखी के माध्यम से भाईयों के प्रति बहनों के अपार स्नेह और बहनों के प्रति भाईयों के फर्ज को दर्शाता है। यह प्रेम और कर्तव्य जीवन भर भाई-बहन के बंधन को बांधे रखता है।

इस दिन बहनें अपने भाईयों के माथे पर तिलक करके,   कलाई पर रक्षा सूत्र या राखी/ Rakhi बांधकर आरती उतारती हैं और उनकी लंबी उम्र की प्रार्थना करतीं हैं। भाई भी बहनों पर उपहारों की वर्षा करके कठिन समय में मदद करने के लिए उनके साथ रहने का वादा करते हैं। 

पौराणिक कथा/Mythological stories के अनुसार, द्रौपदी द्वारा अपने चीरहरण के समय श्रीकृष्ण को अपनी रक्षा के लिए पुकारने पर, उन्होंने भरी सभा में द्रौपदी की रक्षा की थी। हालांकि, कृष्ण और द्रौपदी के बीच अच्छे संबंध थे लेकिन यह कहा जाता है कि पूर्व जन्म में द्रौपदी और कृष्ण के भाई-बहन होने के कारण कृष्ण ने अपनी राखी की प्रतिज्ञा को निभाया था। वर्तमान में, यह पर्व भाई-बहन के प्रेम की गहनता को दर्शाता है। जहां एक ओर, बहने भाईयों  के प्रति अपने कर्तव्यों को और भाई बहनों के प्रति अपने दायित्वों को पूरा करने का वादा करते हैं; बहनें भी भाइयों की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती है। बहनों द्वारा भाईयों की कलाई पर जो राखी बांधी जाती है, वह सिर्फ एक धागा नहीं होता बल्कि बहन-भाइयों के अटूट और पवित्र प्रेम का बंधन और सुरक्षा की शक्ति और प्रतिबद्धता उस धागे में निहित होती है।
 

रक्षाबंधन का महत्व/ Importance of Raksha Bandhan

रक्षाबंधन का पर्व भारत में बहुत लोकप्रिय है। रक्षाबंधन का अर्थ होता है- 'रक्षा का अटूट बंधन', जिसमें बहनें अपने भाइयों को राखी का धागा बांधती हैं, जो दोस्ती की भावना से भी जुड़ा होता है। रक्षाबंधन पर, बहनें अपने भाइयों के घर जाती हैं, और राखी बांधकर कहती हैं, "मैं तुम्हारी रक्षा करूंगी, और तुम मेरी रक्षा करना।"  यह अनिवार्य नहीं होता कि वो उसका स्वयं का भाई हो, वह अपने परिचितों में से किसी को भी राखी बांध सकती है। रक्षाबंधन पर राखी बांधने की हमारी सदियों पुरानी परंपरा है। हिन्दु त्यौहारों के अनुसार, हर पूर्णिमा किसी न किसी त्योहार को समर्पित होती है। इन सभी त्योहारों में एक बात सबसे महत्वपूर्ण है, वह है जिंदगी में खुशियां का बना रहना। 

सभी भाई-बहनों को एक-दूसरे की रक्षा और प्रेम की जिम्मेदारी लेते हुए रक्षाबंधन का पर्व बहुत हर्षोल्लास के साथ मनाना चाहिए। आज, जब रिश्ते धुंधले होते जा रहे हैं तो ऐसी स्थिति में भाई-बहनों का पवित्र रिश्ता संबंधों को मजबूत आधार दे सकता है। रक्षाबंधन भाइयों और बहनों के बीच भावनात्मक बंधन का प्रतीक है। बहनों के स्नेह बंधन में बंधकर, भाई उनकी रक्षा  करने का वचन देते हैं। राखी बांधना अब केवल भाइयों और बहनों के बीच तक सीमित नहीं रह गया है। अब देश की रक्षा, पर्यावरण की रक्षा, धर्म की रक्षा, हितों की रक्षा आदि के लिए राखी बांधी जाने लगी है। रवींद्रनाथ जी ने बंगाल के विघटन के खिलाफ इस त्योहार पर जन जागरूकता फैलाई थी और इस त्योहार को एकता और भाईचारे का प्रतीक बनाया था। प्रकृति को बनाए रखने के लिए वृक्षों को राखी बांधने की परंपरा भी शुरू हो गई है। 

वहीं दूसरी ओर, सम्मान और आस्था दिखाने के लिए भी राखी बांधी जाती है। रक्षाबंधन का महत्व आज के समय में इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि समाज में आज मूल्यों की कमी होने से प्रेम और सम्मान की भावना भी कम होती जा रही है। यह त्योहार आंतरिक बंधन को मजबूत करके हमारे भीतर सामाजिकता का विकास करता है। यह त्योहार/Festival परिवार, समाज, देश और दुनिया के प्रति हमारे कर्तव्यों की जागरूकता को भी बढ़ाता है। 
 

पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व/ Mythological and historical significance

हिंदू पौराणिक कथाओं में रक्षाबंधन/Rakshabandhan का इतिहास मिलता है। इस पर्व का प्रसंग वामन अवतार की कहानी/Story में मिलता है। कहानी इस प्रकार है- राजा बलि के यज्ञ द्वारा स्वर्ग पर अपना अधिकार करने का प्रयास करने पर इंद्र ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। तब विष्णु जी के वामन ब्राह्मण के रूप में राजा बलि से भिक्षा मांगने पर गुरु के मना करने के बावजूद बाली ने तीन पग भूमि दान कर दी। भगवान वामन ने आकाश, अधोलोक और पृथ्वी को तीन चरणों में मापा और राजा बलि को गहरी खाई में फेंक दिया। तब अपनी भक्ति के कारण, उसके विष्णु जी से हर समय अपने सामने रहने का वचन लेने पर, लक्ष्मी जी चिंतित हो उठीं। तब नारद जी की सलाह पर, लक्ष्मी जी ने बाली के पास जाकर रक्षा सूत्र (रक्षा का धागा) बांधकर उसे अपना भाई बना लिया। बदले में, वह विष्णु जी को अपने साथ ले आईं। यह श्रावण की पूर्णिमा थी। इतिहास में राखी के महत्व के कई संदर्भ मिलते हैं। मेवाड़ की महारानी कर्णावती ने मुगल बादशाह हुमायूँ को राखी भेजकर सुरक्षा की कामना की थी और हुमायूं ने मुसलमान होते हुए भी राखी का सम्मान रखा था। कहा जाता है कि सिकंदर की पत्नी ने अपने पति के हिंदू शत्रु, राजा पुरु को राखी बांधकर अपना भाई बना लिया था और युद्ध के दौरान सिकंदर को नहीं मारने का प्रण लिया था। 

भाई-बहन के प्रेम का पर्व रक्षाबंधन / Rakshabandhan brother and sister love

वैसे भी भाई-बहन का विशेष संबंध रक्षा से संबंधित होता है, जहां भाई और बहन एक दूसरे की रक्षा करने का संकल्प लेते हैं। इस दिन सभी बहनें अपने भाइयों को राखी बांधती हैं और हर समय उनकी रक्षा करने का वादा करती हैं, और भाई भी अपनी बहनों से वादा करते हैं कि जो भी हो वह उनके साथ खड़े रहेंगे। राजस्थान में राखी बांधने की एक अनूठी परंपरा है, जिसमें ननद द्वारा भाभी को एक विशेष प्रकार की राखी बांधी जाती है जिसे लुंबा के नाम से जाना जाता है। कुछ क्षेत्रों पर बहनें, अपनी बहनों को भी राखी बांधती हैं।

भाई-बहन के संबंधों का प्रतीक/ Symbol of brother-sister relationship

हिंदुओं का प्रमुख त्योहार रक्षाबंधन भाई-बहन के संबंधों का पर्व है जो भारत के कई हिस्सों में भाइयों और बहनों के बंधन को मजबूत बनाने के लिए मनाया जाता है। इसके साथ ही इसे नेपाल और पाकिस्तान में भी बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। हिंदुओं के अलावा, भारत में अन्य धर्मों के लोग भी इस पर्व बड़े उत्साह और जोश के साथ मनाते हैं। यह एक ऐसा त्योहार है जो पारिवारिक संबंधों की एकता और विशेषता को दर्शाता है जो मुख्य रूप से भाई-बहनों के रिश्ते को समर्पित है। यह त्योहार भारत में लंबे समय से मनाया जाता रहा है।

रक्षा बंधन का सामाजिक संदर्भ/ Social Context of Raksha Bandhan

इस दिन बहनें अपने भाईयों के दाहिने हाथ पर राखी बांधती हैं और उनके माथे पर तिलक करती हैं और उनकी लंबी उम्र की कामना करती हैं। बदले में, भाइयों द्वारा बहनों की रक्षा करने का वचन दिया जाता है। ऐसा माना जाता है कि राखी के रंग-बिरंगे धागे भाई-बहनों के प्रेम के बंधन को मजबूत करते हैं। रक्षाबंधन स्नेह के बंधन के साथ संबंधों को मजबूत करने का त्योहार है। यही कारण है कि इस अवसर पर न केवल बहन-भाइयों  बल्कि अन्य संबंधों में भी रक्षा सूत्र (या राखी) बांधने की प्रथा है। गुरु शिष्य को धागा बांधता है और शिष्य गुरु को।

प्राचीन काल में जब स्नातक अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद गुरुकुल छोड़ते थे, तो वे आचार्य से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए रक्षा सूत्र बांधा करते थे, जबकि आचार्य अपने छात्रों को रक्षा सूत्र इस कामना से बाँधते थे कि वे  ज्ञान अर्जित कर चुके हैं  तथा शिक्षक की गरिमा और अपने ज्ञान की सफलतापूर्वक रक्षा करने के लिए उन्हें अपने जीवन में इसका उचित उपयोग करना चाहिए। 

इस परंपरा के अनुसार, आज भी किसी भी धार्मिक अनुष्ठान से पहले पुजारियों द्वारा यजमानों को रक्षा सूत्र बांधा जाता है। इस तरह, दोनों एक-दूसरे के सम्मान की रक्षा करने का वचन लेते हैं। रक्षाबंधन पर्व सामाजिक और पारिवारिक एकता का प्रतीक रहा है। विवाह के उपरांत, बहनों के दूसरे घर चले जाने पर, इसी बहाने हर साल उनके रिश्तेदार ही नहीं, बल्कि दूर के भाई भी उनके घर जाकर राखी बंधवाते हैं और अपने संबंधों को पुनर्जीवित करते हैं। यह दो परिवारों और कुलों का मिलन होता है। इस त्योहार को समाज के विभिन्न वर्गों के बीच एकता के प्रतीक के रूप में भी प्रयोग किया जाता है ताकि जो संपर्क टूट जाते हैं उन्हें इसके द्वारा जोड़ा जा सके।

स्वतंत्रता संग्राम में रक्षा बंधन की भूमिका/ Role of Raksha Bandhan in Freedom Struggle

इस त्योहार को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में, जन जागरूकता के माध्यम के रूप में भी इस्तेमाल किया गया था। प्रसिद्ध भारतीय नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर जी का मानना ​​​​था कि रक्षाबंधन न केवल भाई और बहन के बीच के बंधन को मजबूत करने का दिन है, बल्कि हमें इस दिन अपने हमवतनों के साथ अपने संबंधों को भी मजबूत करना चाहिए। ब्रिटिश सरकार की ,'फूट करो और राज करो' वाली नीति के तहत वह बंगाल के विभाजन के बारे में सुनकर टूट गए थे। यह विभाजन हिंदुओं और मुसलमानों के बीच तेजी से बढ़ते संघर्षों के आधार पर किया गया था। यह वह समय था जब रवींद्रनाथ टैगोर जी ने हिंदुओं और मुसलमानों को करीब लाने के लिए रक्षाबंधन उत्सव की शुरुआत करके, दोनों धर्मों के लोगों से इस पवित्र धागे को एक-दूसरे को बांधने और उनकी रक्षा करने के लिए कहा था। दोनों धर्मों के लोगों के बीच संबंध मजबूत करने के लिए आज भी, पश्चिम बंगाल में लोगों द्वारा एकता और सद्भाव में वृद्धि करने के लिए अपने दोस्तों और पड़ोसियों को राखी बांधी जाती है। 

रक्षा बंधन पर सरकारी व्यवस्था/ Government Arrangement on Raksha Bandhan

इस अवसर पर भारत सरकार के डाक एवं तार विभाग द्वारा दस रुपये मूल्य के आकर्षक लिफाफों की बिक्री की जाती है जिसकी कीमत पांच रुपये और डाक शुल्क पांच रुपये होता है। राखी के त्योहार पर बहनें अपने भाईयों को महज पांच रुपये में तीन-चार राखियां भेज सकती हैं। डाक विभाग द्वारा बहनों को दिए गए इस उपहार के तहत पचास ग्राम वजन का राखी का लिफाफा सिर्फ पांच रुपये में भेजा जा सकता है, जबकि सामान्य तौर पर, बीस ग्राम के लिफाफे में सिर्फ एक राखी भेजी जा सकती है। यह सुविधा केवल रक्षाबंधन तक उपलब्ध रहती है। बारिश के मौसम को ध्यान में रखते हुए, रक्षाबंधन/Rakshabandhan 2022 के अवसर पर वर्ष २००७ से बारिश से बचाने वाले जलरोधी लिफाफे भी डाक-तार विभाग द्वारा उपलब्ध कराये जाते हैं। यह लिफाफे दूसरे लिफाफों से अलग होते हैं और इनका आकार और डिजाइन अलग होने के कारण इनमें राखी ज्यादा सुरक्षित रहती हैं। सरकार इस अवसर पर कन्याओं और महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा का भी प्रावधान करती है जिससे बहनें बिना धन खर्च किए अपने भाइयों के पास राखी बांधने जा सकती हैं। यह सुविधा रक्षा बंधन पर ही उपलब्ध होती है लेकिन यह सुविधा हर जगह नहीं होती। 

राखी और आधुनिक तकनीकी माध्यम/ Rakhi 2022 and modern technical medium

तकनीकी युग और सूचना संचार का राखी जैसे त्योहारों पर भी प्रभाव पड़ा है। आजकल बहुत से भारतीय विदेश में रहते हैं, और उनके परिवार के सदस्य (भाई-बहन) भारत या अन्य देशों में रहते हैं। इंटरनेट की शुरुआत के बाद, कई ई-कॉमर्स साइट्स खुल गई हैं जो ऑनलाइन ऑर्डर लेकर राखी और अन्य सभी संबंधित सामान दिए गए पते पर पहुंचाती हैं। दूर रहने के कारण राखी पर नहीं मिल सकने वाले भाई बहनों द्वारा, आधुनिक तरीकों से देखकर और सुनकर इस त्यौहार को मनाया जाता है।

रक्षाबंधन मंत्र/ Rakshabandhan Mantra

भारतीय संस्कृति में कथा/Story, पूजन/Rakshabandhan Pooja और अनेक अनुष्ठानों के समय रक्षा सूत्र बांधने का विशेष महत्व है। सुरक्षा के तीन धागों को तीन बार लपेट कर इस मंत्र से बांधा जाता है।

येन बद्धो बलि राजा,दानवेन्द्रो महाबल: 

तेन त्वाम् प्रतिबद्धनामि रक्षे माचल माचल:।

राखी के इस मंत्र का अर्थ है- जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बांधा गया था, उसी रक्षाबंधन से मैं तुम्हें बांधता हूं, जो तुम्हारी रक्षा करेगा| हे रक्षे! (रक्षासूत्र) तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो। 

राखी बांधने का पारंपरिक तरीका/ The traditional method for tying Rakhi

१) सबसे पहले राखी के दिन पवित्र स्नान करके देवी-देवताओं का आशीर्वाद लेने के लिए देवताओं की पूजा करनी चाहिए। 

२) राखी, चावल, रोली, या सिंदूर को चांदी, पीतल या तांबे की प्लेट में एक छोटी कटोरी में रखें और इसे पानी या इत्र से मिला लें।

 ३) राखी की थाली को पूजा स्थल पर रखकर सबसे पहले बाल गोपाल या अपने इष्ट देवता को राखी अर्पित करके प्रार्थना करनी चाहिए। 

४) राखी बांधते समय भाई का मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। इससे राखी पर भी देवताओं की कृपा बनी रहती है। 

५) राखी बांधते समय भाइयों को अपने सिर पर रूमाल या कोई साफ कपड़ा रखना चाहिए।

६) बहनों को सबसे पहले भाई के माथे पर रोली का टीका लगाना चाहिए।

७) तिलक के ऊपर कच्चे चावल (अक्षत) लगाएं और आशीर्वाद के रूप में भाई पर कुछ अक्षत छिड़कने चाहिए।

८) भाईयों को अमंगल से बचाने के लिए दीपक से आरती उतारने चाहिए। यदा-कदा बहनें अपने भाइयों को काजल लगाती हैं।

९) मंत्र का जाप करते हुए, भाई की दाहिनी कलाई पर राखी का पवित्र धागा बांधने से, राखी के धागों को शक्ति मिलती है।

१०) भाई-बहनों को एक-दूसरे को मिठाई खिलानी चाहिए।

११) भाई बड़ा हो, तो बहनों को भाई के पैर छूने चाहिए। बहनें बड़ी हों, तो भाइयों को पैर छूकर आशीर्वाद लेना चाहिए।

१२) भाई को वस्त्र, आभूषण या धन देकर बहन के सुखी जीवन की कामना करनी चाहिए।

रक्षाबंधन के अवसर पर बनाए जाने वाले व्यंजन/ Delicacies prepared on the occasion of Raksha Bandhan

भारत में कोई भी उत्सव बिना व्यंजनों को बनाए पूर्ण नहीं होता है। प्रत्येक उत्सव पर कुछ खास व्यंजन बनाए जाते हैं। इसी तरह रक्षाबंधन के मौके पर घेवर, शकरपारे, नमकीन पारे आदि चीजें खास तौर से बनाई जाती हैं। सावन के महीने में घेवर मुख्य मिठाई मानी जाती है। इसका सेवन पूरे उत्तर भारत में पूरे महीने में किया जाता है। हलवा, पूड़ी और खीर भी इस त्योहार की कुछ प्रचलित मिठाइयां हैं।

निष्कर्ष/ Conclusion

आखिरकार कहा जा सकता है कि राखी के इस पर्व का भाई-बहनों के लिए विशेष महत्व है। आज के युग में यह पर्व हमारी संस्कृति की विशेषता बन गया है और हमें इस पर गर्व होना चाहिए। इस पर्व को मनाने के साथ ही, हमें एक-दूसरे के साथ सद्भाव से रहने का संकल्प भी लेना चाहिए। उतार-चढ़ाव में सभी के साथ तालमेल बिठाकर रहना चाहिए। आज कई भाई अपनी कलाई पर राखी नहीं बांध पा रहे हैं क्योंकि उनकी बहनों को इस संसार में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है। यह शर्म की बात है कि जिस देश में कन्याओं की पूजा की जाती है वहां पर कन्या-भ्रूण हत्या के मामले सामने आते रहते हैं। यह त्योहार हमें यह भी याद दिलाता है कि बहनें हमारे जीवन में कितना महत्व रखती हैं। यह त्योहार सामान्य लोगों तथा देवी-देवताओं द्वारा भाई-बहनों के पवित्र संबंध को बनाए रखने के लिए भी मनाया जाता है। कई भाई-बहनें व्यावसायिक और व्यक्तिगत कारणों से एक-दूसरे से नहीं मिल पाते हैं। फिर भी, इस विशेष अवसर पर, वे निस्संदेह एक-दूसरे के लिए समय निकालते हैं और इस पवित्र त्योहार को मनाते हैं। हमें इस त्योहार को खुशी और नैतिक मूल्यों के साथ मनाना चाहिए।

अगले पांच वर्षों में इन तिथि पर आएगी रक्षाबंधन

यह है अगले पांच वर्षों के लिए रक्षाबंधन की तारीखें।

  • गुरुवार-   11 अगस्त 2022 
  • बुधवार-   30 अगस्त 2023 
  • सोमवार-  19 अगस्त 2024  
  • शनिवार-    9 अगस्त 2025 
  • शुक्रवार-  28 अगस्त 2026

कजरी तीज
14 Aug, 2022

सभी लोग हरियाली तीज के बारे में जानते ही होंगे। इसी तीज की तरह एक और तीज होती है – कजरी तीज। महिलाओं के लिए हरियाली तीज की तरह ही कजरी तीज/kajari teej 2021 उतनी ही महत्व रखता है। यह भाद्रपद मास के दौरान कृष्ण पक्ष के तीसरे दिन मनाया जाता है। यह त्यौहार उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान में भव्य रूप से मनाया जाता है। कजरी तीज को कजली तीज/Kajli Teej के नाम से भी जाना जाता है। इस त्यौहार का महत्व/Significance of Kajri Teej महिलाओं के लिए सबसे अधिक होता है। इस दिन विवाहित महिलाएं अपने वैवाहिक जीवन की सुख-समृद्धि के लिए व्रत/ Kajari Teej Vart रखती हैं। कजली तीज को अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग नामों से जाना जाता है लेकिन पूरे भारत में इसकी मान्यता एक जैसी है। यह मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार जैसे राज्यों में मनाया जाता है। इन राज्यों में इसे बुरी तीज और सतूड़ी तीज के नाम से भी जाना जाता है।

दांपत्य जीवन में सुख-समृद्धि के लिए यह व्रत/ Fasting किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि अगर कोई कन्या या विवाहित महिला इस दिन भगवान शिव और देवी पार्वती की पूरी भक्ति और आराधना के साथ पूजा करती है, तब उन्हें एक सही जीवनसाथी की प्राप्ति होती है। यह भी माना जाता है कि इस दिन बहुत समय बाद ही देवी पार्वती भगवान शिव के साथ होती हैं। कई जगहों पर कजली तीज के अवसर पर मुख्य रूप से गौरी की पूजा/ Kajari Teej Puja की जाती है। यदि किसी की कुंडली में कोई भी बाधा हो, और वह इस पूजा को पूर्ण रीति रिवाज/ Rituals of Kajli Teej के साथ करे, तो उसकी सभी बाधाएं दूर हो जाती है। हालांकि, इस पूजा का फल तभी प्राप्त होगा यदि आप अविवाहित और स्वयं इस पूजा को करें। ऐसी मान्यता है कि कजली तीज के दिन देवी पार्वती को इसी दिन भगवान शिव की प्राप्ति हुई थी। देवी पार्वती ने इसके लिए चुनौतीपूर्ण ध्यान साधना का सामना किया था। इस पर्व/Festival के अवसर पर विवाहित महिलाओं को भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करनी चाहिए। ऐसा कहा जाता है कि जिन महिलाओं का विवाह नहीं होता, उन्हें इस पर्व पर व्रत रखने से अच्छे जीवनसाथी का आशीर्वाद मिलता है। 

इस पर्व के दिन पति और पत्नी को एक दूसरे से विश्वासघात, गलत व्यवहार और एक दूसरे के पीठ पीछे बुराई नहीं कहना चाहिए। इस दिन विवाहित और अविवाहित महिलाएं व्रत रखती हैं। यह व्रत उनके लिए एक आवश्यक कार्य बन जाता है। इस दिन सभी महिलाएं अपना श्रृंगार करती हैं। और फिर, शाम को, वह सभी एक मंदिर में जाकर भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करते हैं। इस दिन पत्नी अपने पति की लंबी उम्र की कामना करती है। कजली तीज के दिन घर में झूला लगाने की प्रथा है। इस दिन महिलाएं दिन भर अपने दोस्तों के साथ बैठकर गीत गाती हैं और साथ में नृत्य भी करती हैं। विवाहित महिलाएं अपने पति के लिए व्रत/Kajri Teej Vrat रखती हैं और अविवाहित महिलाएं सही जीवनसाथी पाने के लिए इसका पूर्ण रूप से पालन करती हैं।

कजली तीज का महत्व/ Importance of Kajali Teej

विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और उसके सुख समृद्धि के लिए इस व्रत को रखती हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन देवी पार्वती ने भगवान शिव का साथ प्राप्त करने के लिए गहन ध्यान और कड़े परिश्रम से गुजरी थी। जिनको अच्छे जीवनसाथी की तलाश होती है उन्हें इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूरे मन से पूजा करनी चाहिए। ऐसा करने से अविवाहितों को योग्य वर का वरदान प्राप्त होता है और विवाहित स्त्रियों को सदा के लिए भाग्यशाली होने का वरदान मिल जाता है। जो महिलाएं मां पार्वती की पूजा पूरे मन से करती हैं उनकी मनोकामना जरूर पूरी होती है। कजरी तीज पर मां पार्वती की पूजा करने वाली सभी महिलाओं को अपने पति के साथ सुखी जीवन का आशीर्वाद मिलता है। 

एक पौराणिक कथा के अनुसार, देवी पार्वती ने 108 जन्मों के बाद भगवान शिव से विवाह करने में सफलता प्राप्त की थी। इतने कड़े परिश्रम के बाद ही देवी पार्वती को भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त हुआ था। इस दिन को निस्वार्थ प्रेम की भावना के साथ मनाया जाता है। यह और कुछ नहीं बल्कि देवी पार्वती की निस्वार्थ भक्ति ही थी जिसने भगवान शिव को उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करने पर मजबूर किया। कजरी तीज/Kajali Teej 2021 के दिन जौ, गेहूं, चना मटर और चावल के सत्तू को घी में मिलाकर कई तरह के व्यंजन बनाए जाते हैं। चांद को देखने के बाद व्रत/Fasting खोलने के लिए भोजन किया जाता है।

कजली तीज क्यों मनाई जाती है?/ Why is Kajli Teej Celebrated?

तीज का त्यौहार विवाहित जोड़ों के लिए बहुत महत्व रखता है क्योंकि यह एक ऐसा त्योहार है जो पति और पत्नी के रिश्ते को और भी ज्यादा मजबूत करता है। इस दिन सत्तू खाकर व्रत खोलने की परंपरा है। नीम के पेड़ की पूजा करना इस त्योहार का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा है। लोग इस दिन नए कपड़े पहन कर व्रत करते हैं और बाद विभिन्न व्यंजनों का आनंद लेते हैं। ऐसा माना जाता है कि देवी पार्वती को कजरी तीज पर गहन ध्यान करने के बाद अपने जीवन में भगवान शिव के होने का फल मिला था। इसलिए इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती दोनों की पूजा की जाती है। यदि कोई अविवाहित महिला इस दिन व्रत रखती है और पूरी पूजा मन से करती है तो उसे अपनी पसंद का वर मिलता है।

कजली तीज को कजली तीज क्यों कहा जाता है?/ Why is Kajali Teej known as Kajli Teej?

प्राचीन किवदंतियों के अनुसार भारत के मध्य भाग में कजली नाम का एक जंगल मौजूद था, जहां ददुरै नाम का एक राजा शासन करता था। इस राज्य में लोग कजली के आधार पर गीत गाते थे। यही कारण है कि उनका स्थान पूरे भारत में  प्रसिद्ध हो गया था। कुछ वर्षों के बाद राजा ददुरै की मृत्यु हो गई, राजा की मृत्यु के बाद उसकी रानी नागमती विधवा हो गई। इन सबके कारण उनकी प्रजा बहुत दुखी और उदास कर दिया। इसलिए, कजली के गीत पति और पत्नी की एकता के लिए गाए जाते हैं।

दूसरी ओर, एक प्रेमपूर्ण मिथक के अनुसार, देवी पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में चाहा। हालांकि उस समय भगवान शिव ने उनके सामने एक शर्त रखी थी। शर्त के अनुसार, देवी पार्वती को भगवान शिव के लिए अपनी सच्ची भक्ति और प्रेम साबित करना पड़ा था। इसके पश्चात, देवी पार्वती ने भगवान शिव के नाम पर 108 वर्षों तक तपस्या की और भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए सभी परीक्षा में खड़ी रहीं। इसके बाद तीज के दिन भगवान शिव ने देवी पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इसी वजह से इस दिन को कजरी तीज के नाम से भी जाना जाता है। इसी कारण इस दिन सभी देवता तीज पर देवी पार्वती और भगवान शिव की पूजा करते हैं क्योंकि इससे वह प्रसन्न होते हैं।

कजली तीज कैसे मनाया जाता है?/How is Kajali Teej Celebrated?

कजली तीज/Kajli teej 2021 के दिन, विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं, और अविवाहित महिलाएं इस दिन अपनी पसंद का वर प्राप्त करने का आशीर्वाद पाने के लिए व्रत रखती हैं। इस दिन जौ, गेहूं, चना मटर और चावल के सत्तू को घी में मिलाकर कई तरह के व्यंजन बनाए जाते हैं। चंद्रमा की पूजा करने के बाद व्रत का समापन होता है। इसके अलावा कजरी तीज पर गायों की पूजा करने का भी प्रावधान है। साथ ही इस दिन झूले भी लगाए जाते हैं और महिलाएं एक साथ बैठकर गीत गाती हैं और साथ में नृत्य भी करती हैं। कजरी गीत गाना इस त्योहार का एक अविभाज्य हिस्सा है। नीम के पेड़ की भी पूजा की जाती है।

कजली तीज पर की जाने वाली परंपरा/The tradition followed on Kajli Teej.

1. इस दिन विवाहित महिलाएं व्रत रखती हैं ताकि उनके पति को लंबी आयु प्राप्त हो और अविवाहित लड़कियां अपनी पसंद का वर के वरदान के लिए यह व्रत रखती हैं।

2. इस दिन जौ, गेहूं, चना मटर और चावल के सत्तू को घी में मिलाकर कई तरह के व्यंजन बनाए जाते हैं। चंद्रमा के उदय होने के बाद व्रत खोलने के लिए भोजन किया जाता है।

3. इस दिन विशेष रूप से गायों की पूजा की जाती है। गेहूँ के सात छोटे गोले बनाकर उन पर घी, गुड़ लगाया जाता है। इसके बाद इन्हें गायों को खिलाया जाता है, और फिर भोजन किया जाता है।

4. कजली तीज पर झूले लगाए जाते हैं। लोग झूले पर एक साथ बैठते हैं और एक साथ कजली तीज/Kajli Teej 2021 के गीत गाते हैं और नृत्य करते हैं।

5. इस दिन कजरी गीत गाने की अनूठी परंपरा है।

कजली तीज के अनुष्ठान/ Rituals of Kajli Teej

इस पर्व पर निमड़ी देवी की पूजा करने का विधान है। पूजा/ Kajari Teej Puja से पूर्व दीवार पर घी और गुड़ से बनी पाल बांधकर मिट्टी और गाय के गोबर का उपयोग कर तालाब जैसी संरचना बनाई जाती है। और फिर उसके बगल में नीम के पेड़ की एक शाखा रखी जाती है। तालाब में कच्चा दूध और पानी चढ़ाया जाता है, और एक दीया जलाया जाता है और वहां रखा जाता है। एक प्लेट में नींबू, खीरा, केला, सेब, सत्तू, रोली, मौली, अक्षत आदि रखे जाते हैं। इसके अलावा किसी पात्र में थोड़ा कच्चा दूध लें और शाम को उसका श्रृंगार कर लें। सारी तैयारी करने के पश्चात निम्नलिखित तरीकों से देवी निमड़ी की पूजा करें:

1. सबसे पहले देवी निमड़ी पर थोड़ा पानी और रोली छिड़कें और फिर चावल चढ़ाएं।

2. देवी निमड़ी के पीछे की दीवार पर मेहंदी, रोली और काजल के 13 टीके उँगलियों से लगाए। मेहंदी का टीका, अनामिका से रोली और तर्जनी से काजल का टीका लगाना चाहिए।

3. देवी निमड़ी को मौली अर्पित करने के बाद उन्हें मेंहदी, काजल और वस्त्र अर्पित करें। दीवार पर टीके का सहारा लेकर लच्छा बांधें या रोली बांधे।

4. देवी निमड़ी को फल और दक्षिणा अर्पित करें और पूजा पात्र पर रोली का टीका लगाकर लच्छा बांधें।

5. पूजा स्थल पर तालाब के किनारे रखे दीये की रोशनी में नींबू, खीरा, नीम की टहनी, नाक की नथनी, साड़ी का पल्ला आदि देखें। इसके बाद चंद्रमा को अर्घ्य दें।

चन्द्रमा को अर्घ्य देने का विधान/ Ritual of offering Arghya to the Moon

कजरी तीज की शाम को देवी निमड़ी की पूजा करने के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा सदियों पुरानी है और इसे आज भी उसी निष्ठा से निभाया जाता है।

1. चंद्रमा को जल, रोली, मौली और अक्षत की बूंदें चढ़ाएं और फिर भोग लगाएं।

2. हाथों में चांदी की अंगूठी और गेहूं के दाने पकड़कर जल को अर्घ्य दें और फिर एक स्थान पर खड़े होकर चार बार घुमाएं।

कजरी तीज का नियम/ Rule of Kajari Teej

1. आमतौर पर यह व्रत निर्जल उपवास होता है। हालांकि, गर्भवती महिलाओं को फल खाने की अनुमति होती है।

2. यदि किसी कारण चंद्रमा नहीं देखता तो रात के लगभग 11:30 बजे आकाश की ओर देखते हुए अर्घ्य देकर व्रत को खोला जा सकता है।

3. उद्यान के बाद यदि पूर्ण व्रत रखने की क्षमता ना हो तो आप फलों का सेवन भी कर सकते हैं।

ऊपर बताए गए नियमों/ Rule of Kajari Teej के अनुसार यदि विवाहित महिला कजरी का व्रत करती है तो उसके परिवार को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। और यदि अविवाहित कन्या व्रत करती है तो उसे अपनी पसंद का वर प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त होता है।

कजरी तीज या कजली तीज का प्राचीन मिथक/ Ancient Myth of Kajari Teej or Kajli Teej

एक गाँव में एक गरीब ब्राह्मण रहता था। उनके साथ उनकी ब्राह्मण पत्नी भी रहती थी। उस समय भाद्रपद के महीने में कजरी तीज का आगमन हुआ था। ब्राह्मण पत्नी ने देवी तीज के नाम पर व्रत रखा। उसने अपने पति से कहा कि उसने कजरी तीज का व्रत रखा है और उसे सत्तू की जरूरत है, और उसने उसे चने से बना सत्तू लाने को कहा। ब्राह्मण पति ने अपनी ब्राह्मणी पत्नी से पूछा कि उसे सत्तू कैसे और कहाँ से मिलेगा। इस पर, उसने अपने पति से कहा कि किसी भी कीमत पर वह इसकी व्यवस्था करें, चाहे वह चोरी से हो या लूट से। ब्राह्मण घर से निकल कर साहूकार की दुकान पर गया। यहां से उसने सवा किलो चना दाल, घी, चीनी लिया। फिर उसने इनमें से सत्तू बनाया। जैसे ही वह जा रहा था, सभी नौकर जाग गए। शोर सुनकर सब लोग चोर-चोर चिल्लाने लगे| साहूकार ने आकर ब्राह्मण को पकड़ लिया। ब्राह्मण ने कहा कि वह चोर नहीं है और वह एक गरीब ब्राह्मण है। उसकी पत्नी ने तीज का व्रत रखा है इसलिए वह सवा किलो सत्तू तैयार करने आया था ताकि वह उसे अपनी पत्नी के पास ले जा सके। जब साहूकार ने ब्राह्मण की जाँच की, तो उसे सत्तू के अलावा कुछ नहीं मिला। दूसरी तरफ चंद्रमा का उदय हो चुका था और ब्राह्मण पत्नी सत्तू की प्रतीक्षा कर रही थी। साहूकार ने ब्राह्मण से कहा कि आज से वह ब्राह्मण की पत्नी को अपनी धर्म बहन मानेगा। वह ब्राह्मण को सत्तू, आभूषण, धन, मेंहदी और लच्छा सहित ढेर सारी सामान देकर आदर सत्कार से विदाई देता है। इसके बाद सभी ने देवी कजली की पूजा की। जिस प्रकार ब्राह्मण को सुख की प्राप्ति हुई, उसी प्रकार देवी कजली की कृपा से सभी पर कृपा बनी रहती है।

गाय की पूजा होती है/ Cow is worshipped

इस पर्व पर जो जो बनाया जाता है उन सभी के बारे में आपको पहले ही बताया गया है। इस दिन गाय की विशेष रूप से पूजा की जाती है। गेहूं की रोटी पर गुड़ और चने रखकर गाय को चढ़ाया जाता है। और फिर, उपवास खोला जाता है।

कजरी तीज और सोलह श्रृंगार/ Kajari Teej and Solah Shringar

कजरी तीज पर देवी पार्वती की मूर्ति का झांकी निकाली जाती है। अविवाहित महिलाएं नृत्य भी करती हैं। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए प्रार्थना करती हैं और अखंड दीपक जलाकर पूरी रात जागती हैं। ऐसा करना अनिवार्य नहीं है लेकिन महिलाएं यह अपने लिए करती हैं। इस दिन महिलाएं हाथों में मेहंदी लगाती हैं और सोलह श्रृंगार करती हैं। इस दिन घर में झूला भी लगाया जाता है।

कजरी तीज पर महिलाएं मालपुआ और घेवर जैसे स्वादिष्ट व्यंजन बनाती हैं। वह  इस दिन चारों ओर हरियाली का आनंद लेते हैं और झूलों पर झूलते हुए गीत भी गाते हैं।

शेयर बाजार के लिए कौन सा नक्षत्र उत्तम है, जानने के लिए यहां क्लिक (Click) करें?

भारत में कहां मनाई जाती है कजरी तीज?/ Where is Kajari Teej Observed in India?

कजरी तीज भारत के कई हिस्सों में मनाई जाती है। यह भारत के अलग अलग राज्यों में अलग-अलग तरीकों से मनाई जाती है। यह उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि में बड़े धूमधाम से मनाई जाती है।

विभिन्न राज्यों में अलग अलग तरह से यह त्यौहार मनाया जाता है|

1. बिहार और उत्तर प्रदेश में नावों पर कजरी गीत गाए जाते हैं। वाराणसी और मिर्जापुर में वार्षिक गीतों के साथ कजरी गीत भी गाए जाते हैं। ऐसे एक ही राज्य में इसे मनाने के दो तरीके मिल गए।

2. राजस्थान में इस पर्व को विशेष महत्व दिया जाता है। विशेष रूप से बूंदी शहर में बहुत धूमधाम और शोर शराबे के साथ मनाया जाता है। इस दिन लोग घोड़ों और ऊंटों की सवारी भी करते हैं। बूंदी में तीज का उत्सव दुनिया भर में प्रसिद्ध है, और लोग इसकी भव्यता को देखने के लिए दूर-दूर से आते हैं।

कजरी तीज पर महिलाओं को क्या नहीं करना चाहिए/ What should not be done by Women on Kajari Teej?

  • इस दिन विवाहित महिलाओं को सफेद साड़ी नहीं पहननी चाहिए और उन्हें बिना गहनों के नहीं रहना चाहिए।
  • कजरी तीज पर भोजन और पानी का सेवन न करें क्योंकि यह व्रत निर्जला व्रत होता है। बिना पानी पिए इसका पालन करना इस पर्व की आवश्यकता है।
  • आस-पास साफ-सफाई रखने पर ध्यान दें क्योंकि कजरी तीज पर साफ-सफाई का काफी महत्व/Significance है।
  • कजरी तीज पर कृपया अपने पति से ऐसा कुछ भी न कहें जिससे उन्हें दुख पहुंचे।
  • कजरी तीज पर पति से दूर न रहें।
  • कजरी तीज के अवसर पर अपशब्द न कहें।
  • कजरी तीज पर किसी से पीठ पीछे न बोलें और न ही किसी से जलन महसूस करें।
  • कजरी तीज पर घर में कोई लड़ाई ना करें। परिवार के सदस्यों के साथ अच्छा व्यवहार करें।
  • इस दिन विवाहित महिलाओं को अपनी हथेलियों पर मेहंदी लगानी चाहिए। शास्त्रों के अनुसार  मेहंदी प्यार का प्रतीक है।
  • इस दिन चूड़ियां जरूर पहननी चाहिए। बिना चूड़ियों के रहना अशुभ माना जाता है।

आप अन्य सभी प्रमुख भारतीय त्योहारों में ज्योतिष की प्रासंगिकता (Relevance of Astrology) पर इसी तरह के लेख पढ़ सकते हैं।

कृष्ण जन्माष्टमी
18 Aug, 2022

पृथ्वी को पापों के भार से रहित करने के लिए भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि रोहिणी नक्षत्र में भगवान विष्णु का कृष्ण के रूप में अवतार हुआ । जन्माष्टमी/ krishna Janmashtami को भगवान कृष्ण का जन्मदिन माना जाता है; यह पर्व विश्व भर में आस्था और भक्ति के साथ मनाया जाता है। लोगों की श्रीकृष्ण के प्रति आस्था सदियों से है। वह कभी यशोदा नंदन हैं तो कभी ब्रज के नटखट गिरधर गोपाल। भारतवर्ष में यह बड़े ही उत्साह से मनाया जाता है; इसकी तैयारियां इसके आगमन से पूर्व ही प्रारम्भ हो जाती हैं। कृष्ण-भक्ति  के रंगों में सारा माहौल गुंजायमान हो जाता है। जन्माष्टमी का पर्व आस्था और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। श्रीमद्भागवत को प्रमाण मानकर स्मार्त सम्प्रदाय के लोग चंद्रोदय व्यापनी अष्टमी अर्थात रोहिणी नक्षत्र को जन्माष्टमी मनाते हैं और वैष्णव व्यापानी अष्टमी और उदयकाल रोहिणी नक्षत्र को जन्माष्टमी मनाते हैं। 

जन्माष्टमी के अलग-अलग रूप हैं और इस पर्व को अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है। कहीं रंगों की होली होती है तो कहीं फूलों की महक और कहीं, दही हांडी का भव्य आयोजन होता है, और कहीं, भगवान कृष्ण के जीवन के मोहक पझालू झांकियों के रूप में देखने को मिलते हैं। मंदिरों को भव्यता से सजाया जाता है। इस अवसर पर श्रद्धालु उपवास रखते हैं। इस दिन, मंदिरों को सजाया जाता है, और भगवान कृष्ण का झूला बनाया जाता है, और कृष्ण रासलीला का आयोजन भी किया जाता है।

जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर श्रद्धालु भगवान कृष्ण के दर्शन के लिए मथुरा आते हैं। मंदिरों को मोहकता से सजाया जाता है। मथुरा में जन्माष्टमी पर आयोजित श्रीकृष्ण जयंती को देखने के लिए विदेशों से भी लाखों कृष्ण भक्त पहुंचते हैं। भगवान की प्रतिमा पर हल्दी, दही, घी, तेल, गुलाब जल, मक्खन, केसर, कपूर आदि चढ़ाकर लोग इसे एक-दूसरे पर छिड़कते हैं। जन्माष्टमी का व्रत सभी नियमों के अनुसार करने से भक्त मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह व्रत मनोकामना पूर्ति के लिए किया जाता है। श्रीकृष्ण की भक्ति का यह पावन पर्व सभी को कृष्ण भक्ति से परिपूर्ण देता है। यह पर्व सनातन धर्म मानने वालों के लिए आवश्यक माना जाता है। इस दिन व्रत रखा जाता है और लोग कृष्ण भक्ति के गीत सुनते हैं। श्रीकृष्ण-लीला की झाँकी को घरों और मंदिरों में सजाया जाता है।

जन्माष्टमी का महत्व/ Importance of Janmashtami

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी/ krishna Janmashtami का पर्व देशभर के लिए विशेष महत्व रखता है। यह हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। भगवान श्रीकृष्ण को विष्णु का आठवां अवतार माना जाता है । बच्चों से लेकर बड़ों तक, सभी अपने आराध्य के जन्म का आनंद मनाने और भगवान कृष्ण की महिमा का गुणगान करने के लिए पूरे दिन उपवास रखते हैं। भगवान श्रीकृष्ण को साज-सज्जा के सामान से  सुशोभित किया जाता है, झूलों को सजाया जाता है,  और भगवान कृष्ण को झूले में बैठाया जाता हैं। महिलाएं और पुरुष मध्यरात्रि तक उपवास रखते हैं। तदोपरांत , श्रीकृष्ण के जन्म का समाचार हर गूंजता है। श्रीकृष्ण की आरती होती है और प्रसाद बांटा जाता है।

कृष्ण जन्माष्टमी का इतिहास/ History of Krishna Janmashtami

ऐसा माना जाता है कि श्रीकृष्ण के अवतार का एक मुख्य उद्देश्य आतताई  कंस का वध करना था। कंस की एक बहन थी, देवकी। कंस उससे बहुत प्रेम करता था। जब कंस अपनी बहन का विवाह करके लौट रहा था, तब एक आकाशवाणी हुई , "हे कंस, तुम्हारी प्यारी बहनकी अष्टम संतान , तुम्हारी मृत्यु का कारण होगी।" इस कारण कंस ने अपनी बहन को बंदी बना लिया।

जिस क्षण देवकी किसी भी बच्चे को जन्म देती, कंस तुरंत उस बच्चे को मौत के घात उतार देता था। जब देवकी ने आठवें बच्चे, श्रीकृष्ण को जन्म दिया, तब भगवान विष्णु की माया से कारागृह  के ताले टूट गए और भगवान कृष्ण के पिता वासुदेव  उन्हें गोकुल में नंद बाबा के महल में छोड़ आये| वहां एक लड़की जन्मी थी। वह लड़की देवी योगमाया का अवतार थी। वासुदेव उस लड़की को लेकर वापस कारागृह में आ गए। कंस ने उस लड़की को देखा और उसे मारने की इच्छा से उसने उसे फर्श पर पटक दिया। जैसे ही उसे नीचे फेंका, वह लड़की हवा में उछल पड़ी और बोली, "कंस, तुम्हारा काल यहाँ से चला गया है। वह कुछ समय बाद तुम्हें नष्ट कर देगा। मैं सिर्फ एक माया हूँ।" कुछ वर्ष बाद ऐसा ही हुआ। भगवान श्रीकृष्ण उसी महल में आए और उन्होंने कंस का वध किया।

श्रीकृष्ण के मस्तक पर मोर पंख का महत्व/ Importance of Peacock Feather on Sri Krishna's Head

एक राजा अपनी प्रजा के हर सुख दुःख के लिए जिम्मेदार होता है। इन उत्तरदायित्वों का भार वह मुकुट के रूप में अपने सिर पर धारण करते हैं। लेकिन, श्रीकृष्ण ने अपने सभी कर्तव्यों को एक खेल की तरह सहजता से पूरा किया। जैसे एक मां अपने बच्चों की देखभाल करना बोझ नहीं समझती। इसी तरह, श्रीकृष्ण अपनी जिम्मेदारियों को बोझ नहीं मानते। वह मोर के मुकुट (जो बहुत हल्का भी होता है) के रूप में अपने सिर पर विभिन्न रंगों के साथ इन जिम्मेदारियों को बहुत जल्दी से वहन करते है। श्रीकृष्ण हम सभी में एक आकर्षक और आनंदमय प्रवाह हैं। जब मन में कोई बेचैनी, चिंता या इच्छा न हो, तभी हमें गहरा विश्राम मिल सकता है, और गहरे विश्राम में ही श्रीकृष्ण का जन्म होता है

जन्माष्टमी कैसे मनाई जाती है/ How is Janmashtami Celebrated

जन्माष्टमी/krishna janmashtami 2021 भिन्न-भिन्न जगहों पर अलग-अलग तरीके से मनाई जाती है। कई स्थानों पर इसे फूलों की होली के रूप में मनाते हैं और इसके साथ ही देश के विभिन्न प्रान्तों में रंगों की होली भी खेली जाती है। श्रीकृष्ण के जन्म की नगरी मथुरा में जन्माष्टमी बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाई जाती है। श्रीकृष्ण को मक्खन और दूध अति-प्रिय था क्योंकि उनके पास गांव का मक्खन हुआ करता था, जिसे वह चुराते थे। एक दिन उन्हें माखन की चोरी करने से रोकने के लिए उसकी माता यशोदा को उन्हें एक खंभे से बांधना पड़ा और इसी कारण भगवान कृष्ण का नाम माखन चोर पड़ा। वृंदावन में लोगों ने मक्खन की मटकी को ऊंचाई पर टांगना प्रारम्भ कर दिया ताकि वह कृष्ण के हाथ से दूर रहे । फिर भी नटखट कृष्ण की समझ के आगे यह योजना भी निरर्थक साबित हुई, माखन चुराने के लिए श्री कृष्ण ने अपने बाल-सखाओं के साथ एक योजना बनाई और उन्होंने मटकी से दही और माखन चुरा लिया, जो ऊंचाई पर लटका हुआ था। यहीं से दही-हांडी का त्योहार का शुभारम्भ हुआ।

श्रीकृष्ण के अन्य नाम का अर्थ- "माखन चोर।"/ The meaning of Sri Krishna's Other Name- "Makhan Chor." 

श्रीकृष्ण को माखन चोर भी कहा जाता है। दूध पोषण का स्रोत है, और दही दूध का ही एक रूप है। दूध को मथने से मक्खन बनता है और ऊपर तैरने लगता है । यह हल्का और स्वस्थवर्धक  होता है। जब हमारी बुद्धि जाग्रत होती है तब वह मक्खन के समान हो जाती है। तब चेतना में ज्ञान का उदय होता है। और व्यक्ति अपने आप को समझने में सक्षम हो जाता है। वह इस संसार में रहते हुए अनासक्त रहता है। उसकी चेतना संसार की बातों और व्यवहार से निराश नहीं होती। माखनचोरी की लीला श्री कृष्ण के प्रेम की महिमा के चित्रण का प्रतीक है। श्रीकृष्ण का आकर्षण और कौशल इतना गहरा है कि वह सबसे धैर्यवान व्यक्ति की चेतना भी चुरा लेते हैं।

दही-हांडी के पीछे क्या मान्यता है?/ What is the belief behind Dahi-Handi?

दही-हांडी का उत्सव  मनाने के पीछे मान्यता यह है कि भगवान कृष्ण को मक्खन बहुत पसंद था। अपने बालरूप में, वह पड़ोसी के घर से मक्खन चुराते थे। इसलिए, उन्हें "माखन चोर" के रूप में विख्यात हुए। भगवान कृष्ण सभी लोगों के घरों से मक्खन की चोरी करते थे, जिससे माता जशोदा को बहुत परेशानी होती थी। इसके लिए माता यशोदा ने सभी पड़ोसियों को अपनी दही-हांडी ऊंचाई पर बांधने की सलाह दी। परन्तु फिर भी, भगवान कृष्ण अपने सखाओं के साथ मानव श्रृंखला बनाकर हांडी तक पहुंच जाते  हैं और हांडी तोड़कर माखन और दही आपस में बांट लेते हैं। इसी वजह से जन्माष्टमी पर कई जगहों पर दही-हांडी का उत्सव बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। जन्माष्टमी के दिन लोग अपनी गलियों में दही-हांडी प्रतियोगिता करते हैं; फिर लोग मटकी तोड़ने के लिए एक श्रंखला बना कर उस तक पहुंच जाते हैं और उसे तोड़ देते हैं|   यह मुख्य रूप से भारत के राज्य गुजरात और महाराष्ट्र में देखी जाती है।

जन्माष्टमी पर रोहिणी नक्षत्र का महत्व/ The importance of Rohini Nakshatra on Janmashtami

भगवान कृष्ण का जन्म भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र/ RohiniNakshatra on Janmashtamiमें हुआ था। रोहिणी नक्षत्र की इस तिथि के कारण इसे कृष्ण जन्माष्टमी के नाम से जाना जाता है। अब चूंकि भगवान कृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ था, इसलिए जन्माष्टमी के निर्धारण में रोहिणी नक्षत्र की स्थिति बेहद महत्वपूर्ण है।

जन्माष्टमी मध्य रात्रि को मनाई जाती है/ Birthday Celebrations happen at 12 on Janmashtami.

तिथि के अनुसार भगवान कृष्ण का जन्म भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को अर्धरात्री में हुआ था, इसलिए घरों और मंदिरों में आधी रात को भगवान कृष्ण की जयंती मनाई जाती है। रात में जन्म के बाद दूध से लड्डू गोपाल की मूर्ति को स्नान कराकर श्रीकृष्ण को नए और सुंदर वस्त्र पहनाए जाते हैं और उनका श्रृंगार किया जाता है। फिर, उन्हें पालने में बैठाया जाता है, और फिर पूजन के उपरान्त , चरणामृत, पंजीरी, ताजे फल, पंचमेवा आदि का भोग लगाया जाता है, जिसे तदोपरांत प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।

संतान प्राप्ति में फलदायी है जन्माष्टमी पर्व/ Janmashtami Festival is Fruitful in Having Children

जन्माष्टमी का त्योहार पर लोग व्रत/janmashtami vrat रखते हैं और पूजा करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस पर्व को मनाने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। जिन लोगों का चंद्रमा कमजोर है उन्हें इस दिन विशेष पूजा करने से लाभ मिल सकता है। इस दिन श्रीकृष्ण पूजा करने से लोगों को संतान, लंबी आयु और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

जन्माष्टमी पर झूला झूलने से होती है हर मनोकामना पूरी Every Wish Gets Fulfilled by Swinging on Janmashtami 

ऐसी मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से कई व्रतों का फल मिलता है। हमारे शास्त्रों में कृष्ण जन्माष्टमी को "व्रत राजा" कहा गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बाल गोपाल को झूला झूलाने का विशेष महत्व है, और इस दिन लोग भगवान कृष्ण को झूला झूलाने के लिए उत्साहित होते हैं। यदि कोई व्यक्ति भगवान को पालने में झूला देता है, तब उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

जन्माष्टमी का व्रत कैसे रखें/ How to keep the fast of Janmashtami

जन्माष्टमी पर, भक्त पूरे दिन उपवास रखते हैं और भगवान का आशीर्वाद लेते हैं; पूजा करते हैं। जन्माष्टमी का उपवास रखने के अपने नियम हैं। जो लोग जन्माष्टमी पर उपवास रखना चाहते हैं उन्हें जन्माष्टमी के एक दिन पहले केवल एक बार भोजन करना चाहिए। जन्माष्टमी की सुबह स्नान के उपरान्त भक्त व्रत का संकल्प लेते हैं और अगले दिन रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि की समाप्ति के बाद उपवास खोलते हैं।

जन्माष्टमी पूजा के नियम/ Rules of Janmashtami Puja

जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने का विधान है। 

यदि आप भी जन्माष्टमी का व्रत/janmashtami vrat कर रहे हैं तो इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण की पूजा/Gokulashtami Puja/ करें।

  • सुबह स्नान के उपरान्त निर्मल वस्त्र धारण करें |
  • यह पूजा हमेशा मुहूर्त/Puja Muhurt के अनुसार करनी चाहिए  |
  • जन्माष्टमी पर, बाल कृष्ण की स्थापना होती है (ठाकुरजी या लड्डू गोपाल)। कृष्ण जी की स्थापना आप अपनी इच्छानुसार किसी भी रूप में कर सकते हैं।
  • इसके अतिरिक्त घर के मंदिर में सर्वप्रथम कृष्ण जी या ठाकुर जी की मूर्ति को गंगाजल से स्नान कराएं।
  • इसके पश्चात दूध, दही, घी, चीनी, शहद और केसर से निर्मित पंचामृत से मूर्ति का स्नान करें।
  • अब शुद्ध जल से स्नान करें। शास्त्रों में लिखा है कि शंख से स्नान करना उत्तम होता है।
  • बाल-गोपाल की मूर्ती को नए कपड़े पहनाएं, उसे पीले रंग के कपड़े पहनाएं और उसे सजाएं।
  • श्रीकृष्ण के झूले को फूलों से सजाया जाना चाहिए । इसके लिए आप पारिजात और वैजयंती के पुष्पों से सजा सकते हैं। कृष्ण के जन्म के बाद उन्हें झूला बनाया जाता है।
  • श्रीकृष्ण जी के भोग के लिए पंचामृत बनाकर उसमें तुलसी के पत्ते, मेवा, माखन और मिश्री डाल दें। आप अपनी क्षमता के अनुसार धनिये की पंजीरी बनाकर 56 भोग लगा सकते हैं.
  • जहां तक ​​हो सके यह व्रत धैर्य और नियमों का पालन करते हुए करना चाहिए। अस्वस्थ लोगों को व्रत नहीं रखना चाहिए।
  • भगवान कृष्ण का जन्म उत्सव मध्यरात्रि में मनाया जाता है । भक्तों को यह पूरी रात जागकर बितानी चाहिए और भजन-कीर्तन करना चाहिए।
  • अर्धरात्री को लड्डू गोपाल को भोग लगाकर उनकी पूजा करें और फिर आरती करें।
  • अगले दिन सुबह अन्न का सेवन करें। अगर कोई इससे पहले भोजन करना चाहता है, तो वह भगवान की जयंती मनाने और मध्यरात्रि में प्रसाद ग्रहण करने के बाद ऐसा कर सकता है।

कृष्ण जन्माष्टमी व्रत सभी पापों को नष्ट करता है। इस व्रत का निर्वहन सभी नियमों और धैर्य के साथ इसका पालन करने से इंद्रलोक परलोक में आध्यात्मिक सुख प्राप्त करने में सहायता मिलती है।

श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। जैसे ही उनका जन्म हुआ, कारागार में चारों ओर एक दिव्या-प्रकाश की आभा फैल गई। वासुदेव-देवकी के समक्ष , शंख, चक्र, गदा और कमल के फूल धारण करने वाले चतुर्भुज भगवान ने अपना रूप प्रकट किया और कहा, अब मैं एक बालक का रूप लेता हूं। आप मुझे तुरंत गोकुल में नंद के पास ले जाएं और उस लड़की को कंस को सौंप दें जो अभी-अभी पैदा हुई है। वासुदेव ने वैसा ही किया और उस कन्या को कंस को सौंप दिया। कंस ने जब उस कन्या को मारना चाहा तो वह उसके हाथ से छूट कर आकाश में उड़ गई। उसने देवी का रूप धारण किया और कहा, "मुझे मारने का क्या लाभ ? तुम्हारा काल गोकुल तक पहुंच गया है"। यह देखकर कंस चकित हो गया। कंस ने श्रीकृष्ण को मारने के लिए कई असुरों को गोकुल में भेजा। श्रीकृष्ण ने अपनी अलौकिक माया से उन सभी का वध किया। वृद्ध होने पर उसने कंस का वध किया और कंस तथा देवकी के पिता उग्रसेन को राज्य सौंप दिया ।

भगवान कृष्ण को क्यों चढ़ाया जाता है छप्पन भोग/ Why Lord Krishna is offered 56 Bhog

जन्माष्टमी/ Krishna Janmashtami पर भगवान कृष्ण को छप्पन भोग लगाने का रिवाज है। धार्मिक मान्यता है कि छप्पन भोग से भगवान कृष्ण प्रसन्न होते हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। आइए, जानते हैं छप्पन भोग के पीछे का कारण-

जब भगवान कृष्ण नंदलाल और माता यशोदा के साथ गोकुल में रहते थे, तो उनकी मां उन्हें दिन में आठ बार अपने हाथों से खाना खिलाती थीं। एक बार, ब्रजवासी इंद्र की पूजा के लिए एक बड़े समारोह का आयोजन कर रहे थे। कृष्ण ने नंद बाबा से पूछा कि अनुष्ठान के पीछे क्या कारण है। तब, नंद बाबा ने कहा कि देवराज इंद्र इस पूजा से प्रसन्न होंगे, और वर्षा करेंगे। कृष्ण जी ने कहा कि वर्षा भेजना इंद्र का कर्तव्य है, तो इसके लिए उनकी पूजा करने की आवश्यकता क्यों है। यदि पूजा करनी है तब गोवर्धन पर्वत की पूजा करें क्योंकि उनसे हमें फल और सब्जियां मिलती हैं और जानवरों को चारा मिलता है।

फिर, सभी को कृष्ण की सलाह पसंद आई और सभी ने इंद्र की पूजा करने के बजाय गोवर्धन की पूजा प्रारम्भ कर दी । इंद्र ने इसे अपमान माना, और वह क्रोधित हो गए। क्रोधित इंद्र ने ब्रज में भारी बारिश भेजी, हर जगह पानी भर गया था। यह देखकर ब्रज के लोगों के मन में भय व्याप्त हो गया, तब कृष्ण ने उनसे कहा, "चलो गोवर्धन की शरण में चलते हैं। केवल वही इंद्र के प्रकोप से हमारी रक्षा कर सकते हैं।" कृष्ण ने अपनी छोटी उंगली से गोवर्धन पर्वत को उठा लिया और समस्त से ब्रज की रक्षा की। भगवान कृष्ण सात दिनों तक बिना कुछ खाए गोवर्धन पर्वत को उठाये रहे। जब आठवें दिन बारिश थम गई और सभी ब्रजवासी पर्वत की नीचे से  निकल आए, और उसके बाद, सभी ने सोचा कि कृष्ण ने सात दिनों तक बिना कुछ खाए गोवर्धन पर्वत को पकड़कर हमारी रक्षा की।

फिर माता यशोदा ने कन्हैया और ब्रजवासियों के लिए सात दिन सहित आठ पहर तक छप्पन प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन बनाए। कई भक्त बीस प्रकार की मिठाइयाँ, सोलह प्रकार के नमकीन और बीस प्रकार के सूखे मेवे चढ़ाते हैं। छप्पन भोग में आमतौर पर माखन मिश्री, खीर, बादाम दूध, टिक्की, काजू, पिस्ता, रसगुल्ला, जलेबी, लड्डू, रबड़ी, मठरी, मालपुआ, मोहनभोग, चटनी, मूंग दाल का हलवा, पकोड़ा, खिचड़ी, बैंगन की सब्जी, लौकी की सब्जी, पुरी, मुरब्बा, साग, दही, चावल, इलायची, दालें, कढ़ी, घेवर, चीला और पापड़ शामिल होते हैं। 

छप्पन भोग के संबंध में एक और मान्यता है कि गो लोक में भगवान श्रीकृष्ण राधा जी के साथ कमल पर विराजमान हैं। उस कमल की तीन परतें हैं। पहली परत में आठ और दूसरी परत में सोलह, तीसरी परत में बत्तीस पंखुड़ियां हैं। प्रत्येक पंखुड़ी पर एक धुरी सखी होती है, और भगवान बीच में विराजमान होते हैं। इस प्रकार, संख्या में छप्पन पंखुड़ियाँ हैं। यहाँ छप्पन अंक का यही अर्थ है। इसलिए, भगवान कृष्ण अपनी सखियों की संगति में छप्पन भोगों से संतुष्ट होते हैं।

क्यों रखा जाता है जन्माष्टमी का व्रत?/ Why Janmashtami fast is observed?

जन्माष्टमी के दिन व्रत रखकर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है। व्रत/ janmashtami vratका पालन इसलिए किया जाता है ताकि भगवान की पूजा करते समय हमारा चेतन, शरीर और विचार तीनों शुद्ध रहें। जब पूजा स्पष्ट सचेत और नेक विचारों से की जाती है, तो वह हमें शांति प्रदान करती है। जन्माष्टमी पर व्रत रखने का महत्व सिर्फ कृष्ण के जन्म से ही नहीं जुड़ा है, इसके चार प्राथमिक कारण हैं।

1) अष्टमी तिथि। अष्टमी तिथि को जया तिथि के नाम से भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है दिल जीतने की तिथि। इस दिन व्रत रखकर भगवान की पूजा करने से व्यक्ति को उसके सभी प्रयासों में विजय प्राप्त होती है।

2) अष्टमी तिथि के स्वामी शिव हैं और इसी दिन भगवान विष्णु ने भी अवतार लिया था। यह दो प्रमुख देवताओं के पूजन का दिन है।

3) मांसाहारी ना खाने और सिर्फ फलाहार करने से शरीर शुद्ध हो जाता है। उपवास के दौरान मन में सांसारिक विचार नहीं आते और चेतन ईश्वर भक्ति में लीन रहता है।

4) हमें भगवान श्रीकृष्ण के ज्ञान को अपने जीवन में अपनाना चाहिए । आतम-शुद्धि के बगैर ज्ञान प्राप्त करना संभव नहीं है। इसलिए इस दिन भोजन का त्याग कर असत्य, भौतिक सुख और हिंसा जैसी भावनाओं से दूर रहना चाहिए।

जन्माष्टमी विदेशों में भी मनाई जाती है/ Janmashtami is celebrated in Foreign Countries Too.

न केवल भारत में बल्कि विदेशों में रहने वाले भारतीय जन्माष्टमी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाते हैं। मथुरा के कारागार  में, श्री कृष्ण ने अपने क्रोधी मामा कंस का नाश करने के लिए माता देवकी के गर्भ से आधी रात को जन्म लिया था। इस लिहाज से इस दिन को पृथ्वी पर भगवान कृष्ण के अवतार का दिन माना जाता है। विदेशों में भी इस दिन भव्य कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।

जन्माष्टमी पर मथुरा में धूमधाम से प्रदर्शन होता है/ Pomp and show happen in Mathura on Janmashtami.

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर दूर-दूर से श्रद्धालु भगवान कान्हा की दीप्तिमान प्रतिमा के दर्शन के लिए मथुरा पहुंचते हैं। इस दिन पूरी मथुरा नगरी कृष्णभावनामृत हो जाती है। इसलिए कृष्ण जन्माष्टमी/ Krishna Janmashtami के अवसर पर मथुरा भक्ति के रंगों से जगमगा उठता है।

जन्माष्टमी पर झाँकी की सजावट/ The Decoration of Jhanki on Janmashtami

जन्माष्टमी को लोग उत्साह और उमंग के साथ मनाते हैं। पूजा और व्रत के साथ-साथ इस दिन घरों और मंदिरों में भी झाँकी सजाई जाती है। इन झांकियों  में श्रीकृष्ण के बचपन की लीलाओं और समस्त जीवन काल का चित्रण किया जाता है । चूंकि भगवान का जन्म कारागार में हुआ था, इसलिए कई पुलिस लाइनों में आज भी भगवान की खूबसूरत झाँकी सजाई जाती  हैं। इसके अतिरिक्त लोग अपने घरों में सुंदर झाँकी स्थापित करते हैं।

जन्माष्टमी पूजा में इन चीजों को शामिल करें / Include these items in Janmashtami Puja

1. तुलसी पूजा का है विशेष महत्व

जन्माष्टमी के दिन तुलसी पूजा का विशेष महत्व है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन शाम के समय तुलसी की पूजा के साथ-साथ उसमें घी का दिया जलाने से भी लाभ होता है। अगर आपके घर में तुलसी का पौधा नहीं है तो किसी मंदिर में जाकर दीपक जलाएं। कभी भी किसी दूसरे के घर की तुलसी की पूजा न करें।

2. पान के पत्ते को शामिल करना शुभ होता है

जन्माष्टमी के दिन कृष्ण पूजा में पान के पत्ते का विशेष महत्व है। ऐसा माना जाता है कि पूजा में पान के पत्ते को शामिल करने से हमें देवी लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। ज्योतिषियों के अनुसार पूजा में एक पान के पत्ते पर "ॐ वासुदेवाय नमः' लिखकर श्रीकृष्ण को अर्पित करें। ऐसा करने से पूजा फलदायी होती है।

3. माखन के बिना अधूरी है जन्माष्टमी पूजा

नंद के लाल गोपाल को माखन बहुत प्रिय है। इसलिए, पूजा में माखन को अवश्य शामिल करें । अपने बाल रूप में, भगवान कृषण गोपियों से माखन चुराते थे क्योंकि वह माखन खाने के शौकीन थे। इसलिए नंद लाल की पूजा में माखन मिश्री को भोग के रूप में अवश्य शामिल करें।

4. मोर पंख भी आवश्यक है 

भगवान कृष्ण सदा-सर्वदा अपने सिर पर मोर पंख लगाते हैं। मोर पंख उनके सिर की सुंदरता को बढ़ाता है और उनके अलंकरण का एक एक महत्वपूर्ण अंग है। इसलिए जन्माष्टमी पूजा में भगवान कृष्ण को मोर पंख अवश्य अर्पित करें ।

5. पूजा में पारिजात के फूलों का विशेष महत्व

भगवान श्री हरि विष्णु और माता लक्ष्मी को पारिजात के फूल अति प्रिय हैं और कृष्ण जी विष्णु के अवतार हैं। इसलिए पारिजात के फूलों को जन्माष्टमी के दिन पूजा में जरूर शामिल करना चाहिए।

6. बांसुरी के बिना अधूरी होगी पूजा

भगवान कृष्ण बांसुरी से भी अत्याधिक प्रेम करते हैं। उनकी बांसुरी की धुन सुनकर गोपियां प्रसन्न हो जाती थीं और अपना सारा काम-काज छोड़कर कृष्ण के पास चली जाती थीं। बांसुरी के बिना कृष्ण की तस्वीर भी अधूरी है। जन्माष्टमी पर कृष्ण जी को चांदी की बांसुरी चढ़ाएं। साथ ही पूजा के उपरान्त बांसुरी को अपने बटुए या उस स्थान पर रख दें जहां पैसा रखा गया है.

7. राखी से रक्षा का वर मांगें

रक्षाबंधन का पर्व असाधारण है। रक्षाबंधन के दिन से आठवें दिन तक राखी बांधी जा सकती है। इसलिए जन्माष्टमी के दिन भगवान कृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम को राखी बांधें। इससे आपको भगवान कृष्ण की विशेष कृपा प्राप्त होगी।

8. शंख में दूध से अभिषेक करें

जन्माष्टमी/ janmashtami 2021 के दिन दूध लेकर भगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप का अभिषेक करें। ऐसा करने से आपकी  हर मनोकामना पूर्ण होगी।

9. बछड़े की मूर्ति दूर करती है परेशानियां

कृष्ण जी को ग्वाल के नाम से जाना जाता है। अपने बचपन में श्रीकृष्ण ने गायों और बछड़ों के साथ कई लीलाएं की हैं। इसलिए जन्माष्टमी के दिन गाय और बछड़ों की छोटी-छोटी मूर्तियाँ लाएँ। ऐसा करने ससे आर्थिक कठिनाइयों और बच्चों से संबंधित समस्याओं को हल किया जाता है।

जन्माष्टमी पर क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए?/ What should be done and what should not be done on Janmashtami?

  • ऐसी मान्यता है कि जन्माष्टमी के व्रत से एक रात पहले सादा भोजन करें और अगले दिन ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करना चाहिए।
  • व्रत के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करके श्रीकृष्ण का ध्यान करना चाहिए।
  • भगवान के ध्यान के उपरान्त , उनके उपवास का संकल्प लेकर गोकुलाष्टमी पूजा/ Gokulashtami Puja की तैयारी शुरू करनी चाहिए।
  • इस दिन भगवान श्रीकृष्ण को माखन मिश्री तथा , पान, नारियल से बनी मिठाई का भोग लगाएं।
  • हाथों में जल, फूल, गंध, फल, कुश लेकर इस मंत्र का पाठ करना चाहिए:

           ममखिलपाप्रशमन पूर्ववक स्वाभिष्ट सिद्धये

          श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतमहं करिश्ये।

  • आधी रात को प्रभु का जन्म उत्सव मनाएं । इसके बाद पंचामृत से उनका अभिषेक करें। उसे नए कपड़े पहनाएं और सजाएं|
  • भगवान को चंदन का तिलक करें और भोग लगाएं। उनके भोग में तुलसी अवश्य डालनी चाहिए।
  • नंद के आनंद भयो जय कन्नैया लाल की का उच्चारण करते हुए कृष्ण को झूला झुलाना चाहिए|
  • घी और अगरबत्ती से बने दीये से भगवान कृष्ण की आरती करें और पूरी रात उनके  भजन गाएं।

जन्माष्टमी पर ऐसा ना करें/Do not do on Janamashtami

जन्माष्टमी का व्रत/ janmashtami vrat करने वाले व्यक्ति को एक दिन पहले ही अच्छे आचरण का अभ्यास करना चाहिए। जो लोग उपवास नहीं रखते हैं उन्हें लहसुन, प्याज, बैगन, मांस-शराब, सुपारी- मेवा और तंबाकू से बचना चाहिए। व्रत करने वाले व्यक्ति को भगवान कृष्ण का ध्यान करना चाहिए और यौन, विलासिता से परिपूर्ण भावनाओं से दूरी बना लेनी चाहिए। साथ ही मूंग और मसूर की दाल के सेवन से भी दूर रहना चाहिए। नकारात्मक सार को प्रवेश न करने दें।

जन्माष्टमी पर पूजा स्थल को फूलों से सजाएं/ Decorate the Puja Place with flowers on Janmashtami 

अपने घर में मौजूद मंदिर या पूजा स्थल को सजाने के लिए आप फूलों का प्रयोग  कर सकते हैं। गेंदे के फूलों से सजाने के बजाय आप अपने पूजा स्थल को सजाने के लिए चमेली और मोगरा के फूलों का उपयोग कर सकते हैं क्योंकि भगवान कृष्ण को यह फूल अति-प्रिय हैं। आप चाहें तो इन फूलों की एक विशाल माला बनाकर बाल गोपाल के झूले पर सजा सकते हैं।

जन्माष्टमी पर पूजा स्थल को रंग-बिरंगी रोशनी से सजाएं/ Decorate the Puja Place with Colourful Lights on Janmashtami

आप चाहें तो फूलों के अतिरिक्त पूजा स्थल और मंदिर को रोशनी से सजा सकते हैं। लाल, हरा, नीला, पीला, सफेद, जो भी रंग आपको पसंद हो, उस रंग को अपने पूजा स्थल और मंदिर में स्थापित करें और उन्हें शानदार ढंग से सजाएं।

गणेश चतुर्थी
31 Aug, 2022

भारत के कई राज्यों में गणेश चतुर्थी/ Ganesh Chaturthi 2021 को बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने घरों में सबसे पहले भगवान गणेश जी की स्थापना पूरे जश्न के साथ करते हैं। जो व्यक्ति गणेश जी की पूजा सच्चे मन से करते हैं वह उनकी सभी बाधाओं को दूर करते हैं। इसी कारण गणेश जी को विघ्नहर्ता भी कहा जाता है। घरों में उनके स्थापना के साथ उनका विसर्जन भी बहुत धूमधाम से होता है। सनातन धर्म में गणेश जी का विशेष महत्व है। कई पुराणों और वेदों में भगवान गणेश को गजानना या विघ्नहर्ता के नाम से भी जाना गया है। गणेश जी अपने भक्तों को ऋद्धि-सिद्धि और सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं। शास्त्रों के अनुसार, गणपति बप्पा अपने भक्तों को मुसीबत, कष्टों, गरीबी और बीमारियों से मुक्त कर उनके जीवन में खुशहाली भर देते हैं। इस दिन को गणेश उत्सव के नाम से भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है गणेश चतुर्थी का उत्सव। दसवें दिन सभी भक्त गणपति बप्पा को पूरे रिवाज से विदाई देते हैं। अनंत चतुर्दशी के दिन भक्त रंगो और नाचते झूमते गणेश जी की मूर्ति का विसर्जन करते हैं।
गणेश चतुर्थी भाद्रपद की शुक्ल चतुर्थी को मनाई जाती है। ऐसी मान्यता है कि गणेश जी का जन्म भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी को मध्याह्न, सोमवार, स्वाति नक्षत्र और सिंह लग्न में हुआ था, इसी कारणवश इस चतुर्थी को मुख्य रूप से गणेश चतुर्थी या विनायक चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। भारत के कई क्षेत्रों में इसे डंडा चौथ के नाम से भी जाना जाता है।
विशेष रूप से इस पर्व को महाराष्ट्र, पश्चिमी भारत में बड़ी आस्था और धूमधाम के साथ मनाया जाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार गणेश जी को नाम विघ्नहर्ता के नाम से भी जाना जाता है। इन दस दिनों के दौरान गणेश की पूजा श्रद्धा और नियमों के अनुसार की जाती है। भगवान गणेश अपने भक्तों के जीवन में सभी बाधाओं को समाप्त करते हैं और अपने उन पर आशीर्वाद और सुख समृद्धि की वर्षा करते हैं।

गणेश चतुर्थी का महत्व/Importance of Ganesh Chaturthi 2021

पौराणिक कथाओं के अनुसार, गणेश जी का जन्म देवी पार्वती के शरीर के तत्व से हुआ था। माता पार्वती ने गणेश जी को घर के द्वार पर खडा कर अपना रक्षक बनाकर स्नान करने चली गईं था। शिव जी को इस बात का ज्ञात नहीं था। उन्होंने गणेश जी को पार्वती से मिलने के मार्ग में विरोधी समझ कर उनका सिर धड़ से अलग कर दिया। तब पार्वती जी बहुत क्रोधित हो गई| जब शिव जी को वास्तविकता का पता चला, तो उन्होंने वहां मौजूद सभी लोगों को आदेश दिया कि वह किसी ऐसे बच्चे का सिर काटकर ले आए जिसकी माँ की पीठ उसके बच्चे की तरफ है।

जब शिव की प्रजा को एक हाथी का पुत्र उस अवस्था में मिला तो वह उसका सिर ले आए और शिव जी ने हाथी का सिर बालक के सिर पर लगा कर उसे जीवित कर दिया। यह सारी घटना भाद्र मास की चतुर्थी को हुई थी। इसलिए इस तिथि को गणेश चतुर्थी माना जाता है, और ऐसा माना जाता है कि इसी दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था। गणेश जी को आशीर्वाद प्राप्त है कि उन्हें सभी देवताओं में प्रथम पूजनीय माना जाएगा। इस दिन गणपति बप्पा को घर में लाने से उनके सभी भक्तों की बाधाएं और मुश्किलें दूर हो जाती हैं। इसी कारण उन्हें विघ्नहर्ता के नाम से भी पूजा और जाना जाता है। गणेश चतुर्थी के अवसर पर लोग गणेश जी को अपने घर में बड़े धूमधाम से लाते हैं और ग्यारह दिन तक उनकी पूजा करते हैं। ग्यारहवें दिन बडे धूम धाम से उनका विसर्जन होता है। किसी भी कार्य को शुरू करने से पहले गणेश जी की पूजा की जाती है।

बप्पा सभी देवों के स्वामी है। इसी कारण उन्हें गणपति के नाम से भी जाना जाता है। गणेश चतुर्थी को विनायक चतुर्थी भी कहते हैं। इसे कई जगहों पर डंडा चौथ भी कहा जाता है। गणेश जी को कई नामों से जाना जाता है। उन्हें ज्ञान-बुद्धि प्रदान करने वाला, सभी विघ्नों का नाश करने वाला और मंगल कार्यों को करने वाला माना जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन गणेश जी की विशेष पूजा/ Ganesh Chaturthi Puja की जाती है। जब भी गणेश चतुर्थी मंगलवार के दिन होती है तो इसे अंगारक चतुर्थी/Angarak Chaturthi कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस पर्व के कारण शुद्ध और उदार परिणाम प्राप्त होते हैं। गणेश चतुर्थी/ Ganesh Chaturthi 2021 को ऐसा त्यौहार माना जाता है जो पूरे भारत को एक सूत्र में बांधने का कार्य करता है। यदि हम इतिहास की ओर मुड़ें, तो हमें पता चलता है कि गणेश चतुर्थी की पूजा चालुक्य सातवाहन और राष्ट्ररुक्त के बाद से चली आ रही है। इसका स्पष्ट विवरण आपको छत्रपति शिवाजी के शासनकाल से मिल सकता है जब उन्होंने राष्ट्रीय संस्कृति और एकता को बढ़ावा देने के लिए गणेश वंदना पूजा करना शुरू किया था।

गणेश महोत्सव का इतिहास/History of Ganeshotsav

गणेश चतुर्थी की सटीक तिथि/ Ganesh Chaturthi date कोई नहीं जानता। इतिहास के अनुसार, शिवाजी महाराज के युग (मराठा साम्राज्य के संस्थापक) में, 1630-1680 के दौरान यह पर्व महत्वपूर्ण हो गया था, जिसे बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। उस दौरान इस पर्व को एक सार्वजनिक समारोह के रूप में मनाया जाता था। शिवाजी महाराज के समय में कुलदेवता के रूप में गणेशोत्सव का नियमित रूप से पालन किया जाने लगा। जब पेशवाओं का अंत हुआ तो यह त्योहार एक पारिवारिक उत्सव के रूप में प्रचलित हो गया|1893 में, लोकमान्य तिलक (भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक) के राज में इस पर्व का उत्सव फिर से शुरू किया गया था। गणेश चतुर्थी को एक वार्षिक उत्सव के रूप में मनाया जाने लगा, जिसका लोग पूरे वर्ष बेसब्री से इंतजार करते हैं।

आम तौर पर, लोगों में एकता लाने और ब्राह्मणों और गैर-ब्राह्मणों के बीच समस्या को दूर करने के लिए इस पर्व को राष्ट्रीय त्योहार के रूप में मनाया जाने लगा। ब्रिटिश शासन के दौरान, अपने क्रूर व्यवहार से खुद को मुक्त करने के लिए, महाराष्ट्र के लोगों ने बड़े साहस और राष्ट्रवादी उत्साह के साथ इस पर्व का पालन किया और हर साल इसे धूमधाम से मनाते थे। लोकमान्य तिलक ने गणेश विसर्जन की विधि/ Ganesh Visarjan Vidhi की स्थापना की थी। धीरे-धीरे लोगों ने इस त्योहार को अपनाना शुरू किया और विधि पूर्वक इस पर्व को मनाना शुरू कर दिया। हर वर्ष व्यक्ति पंचांग से गणेश विसर्जन की तिथि Ganesh Visarjan date को देख अपने कार्य करते थे। इस पर्व पर सामूहिक रूप से बौद्धिक भाषण, कविता, नृत्य, भक्ति गीत, नाटक, संगीत उत्सव, लोक नृत्य आदि करते हैं।

गणेश चतुर्थी तिथि/Ganesh Chaturthi date आने से पहले, लोग एक साथ मिलते हैं और इस त्यौहार को मनाने के लिए एक समारोह का फैसला करते हैं और सभी योजना बना कर त्यौहार मनाते हैं।
गणेश चतुर्थी, एक पवित्र हिंदू पर्व है। इस पर्व को भगवान गणेश के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। हिंदू प्राचीन मिथकों के अनुसार, ऐसा माना जाता है कि गणेश जी का जन्म माघ महीने की चतुर्थी (उज्ज्वल पखवाड़ा के चौथे दिन) को हुआ था। तभी से गणेश जी की जन्म तिथि को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाने लगा। आजकल, इस त्योहार को दुनिया भर में मनाया जाता है और इस पर्व को कोई एक धर्म नहीं बल्कि सभी लोग मना रहे हैं।

गणेशोत्सव की समयरेखा/Timeline for Ganeshotsav

जैसा कि पहले बताया गया है कि भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश जी का पर्व मनाया जाता है। गणेश जी के पूजन/ Ganesh Chaturthi Puja के साथ ही गणपति की मूर्ति की स्थापना करने का रिवाज है। लगातार दस दिनों तक उन्हें घर में रखा जाता है और पूरी श्रद्धा से उनकी पूजा की जाती है। अनंत चतुर्दशी या ग्यारहवें दिन लोग गणेश जी का विसर्जन करते हैं। इस दिन, लोग पूरे बाजे और रंगों के साथ गणेश की मूर्ति को विसर्जन के लिए ले जाते है। ढोल बजाते और नाचते गाते गणेश जी के विसर्जन के साथ इस पर्व का समापन होता है। विसर्जन के समाप्त होने का साथ लोग अगले साल आने वाली गणपती महोत्सव/ Ganesh Chaturthi 2022 के बारे में सोचने लग जाते हैं।

गणेश उत्सव कैसे मनाया जाता है?/How is Ganesh Utsav Celebrated?

दस दिनों तक चलने वाला यह पर्व हिन्दुओं की भक्ति का अद्भुत प्रमाण है। इस पर्व के दौरान शिव-पार्वती-नंदन और श्री गणेश की अलग अलग आकार की मूर्ति की स्थापना घरों, मंदिरों और पंडालों में की जाती है। इन मूर्तियों को फिर सजाया जाता है और एक को बुलाया जाता है जो दस दिनों तक बप्पा की पूजा करते हैं। अनंत-चतुर्दशी तक, गणेश की प्रतिमा की हर दिन सभी नियमों के साथ पूजा की जाती है और लड्डू का भोग लगाकर उसे प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। ग्यारहवें दिन, इस मूर्ति का विसर्जन एक स्वच्छ जल या नदी या महासागर में किया जाता है।

गणेश चतुर्थी क्यों मनाई जाती है?/Why is Ganesha Chaturthi Celebrated?

एक बार देवता भगवान शिव के पास पहुंचे और शिव से पूछने लगे कि सभी देवताओं में किसे पूजनीय माना जाए? तब, शिव ने कहा कि जो व्यक्ति पूरी सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा लगाएगा, वह इसी आधार पर सबसे पहले पूजा के योग्य माना जाएगा। इस प्रकार सभी देवता अपने-अपने वाहन में बैठ कर पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिए निकल पड़े। भगवान गणेश का वाहन एक चूहा है और गणेश जी का शरीर विशाल है, वह पृथ्वी की परिक्रमा कैसे कर सकते हैं। फिर, भगवान गणेश ने अपने पिता भगवान शिव और माता पार्वती के चारों ओर तीन चक्कर पूरे किए और हाथ जोड़कर वहीं उन्हीं के सामने खड़े हो गए। तब भगवान शिव ने कहा, "पूरे ब्रह्मांड में गणेश से बड़ा और बुद्धिमान कोई नहीं है।" अपने माता-पिता की परिक्रमा करके सभी लोकों की परिक्रमा पूरी की है। इसी के फल स्वरूप जो व्यक्ति किसी भी कार्य को शुरू करने से पहले गणेश जी पूजा करेगा उसे किसी भी प्रकार की कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ेगा। तभी से, भगवान गणेश सभी देवी-देवताओं के सामने सम्मानित और पूजनीय हो गए, इसलिए किसी भी पूजा से पहले भगवान गणेश की पूजा की जाती है उसके पश्चात ही अन्य सभी देवताओं की पूजा की जाती है। गणेश चतुर्थी मनाने वाले सभी लोग भगवान गणेश की मूर्ति का विसर्जन करते हैं। विसर्जन के साथ ही गणेश उत्सव समाप्त हो जाता है।

गणेश जी को ज्ञान का देवता क्यों कहा जाता है?/Why is Ganesha ji Known as the god of knowledge?

पूरे दुनिया के परिक्रमा की कहानी आपने ऊपर पढा होगा। इस परिक्रमा से पहले देवी पार्वती ने अपने दोनों पुत्रों को एक बात कही थी कि जो भी इस परिक्रमा को सबसे पहले पूरा करेगा उसे भेट के रूप में ज्ञान का फल प्राप्त होगा। जब परिक्रमा खत्म हुई तो गणेश जी विजेता घोषित हुए क्योंकि उन्होंने अपने माता-पिता के चारों तरफ परिक्रमा लगाई जो उनके ज्ञान को दर्शाती है। शिव और पार्वती जी इस वाक्य से प्रभावित हुए, और इसलिए, उन्होंने उसे ज्ञान का फल दिया। 

बप्पा हर मुसीबत को दूर करते हैं। ऐसा माना जाता है कि जिन घरों में दस दिनों तक बप्पा का आदर, सत्कार और पूजा की जाती है, वहां उनकी विशेष कृपा रहती है और ऐसे घरों में कभी भी विपत्तियां नहीं आती हैं। गणेश जी की ही कृपा से सभी कार्य बिना किसी बाधा के पूर्ण होते हैं और सभी की मनोकामनाएं भी पूर्ण होती हैं।

गणेश जी की मिट्टी की मूर्ति की स्थापना

गणेश जी की पूजा/Ganesh Chaturthi Puja सभी देवताओं में सबसे आसान पूजा मानी जाती है। इस पर्व के दिन हर घर में गणेश जी की मिट्टी की मूर्ति की स्थापना होती है। इस पर्व की मान्यता है कि यह शरीर पांच तत्वों से बना है और इन पांच तत्वों में ही विलीन हो जाएगा। इसी मान्यता के आधार पर अनंत चौदस के दिन गणपति जी का विसर्जन किया जाता है और उन्हें विदाई दी जाती है।

यह त्यौहार दस दिनों तक चलता है भाद्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरू होकर यह पर्व दस दिनों तक आनंद चौदस तक चलता है। चतुर्थी पर, गणपति बप्पा हर घर में विराजमान होते हैं, और दस दिनों के बाद, बप्पा की मूर्ति को विसर्जित किया जाता है। ज्यादातर लोग इस पर्व पर गणपति को दस दिन तक घर में बैठते हैं लेकिन कुछ लोग अपनी क्षमता के अनुसार दो-तीन दिन की पूजा के बाद बप्पा को विदा करते हैं। ऐसा करना गलत नहीं है क्योंकि जिसकी जितनी क्षमता होती है, वह उससे अधिक जा कर इस पर्व को मनाता है।

गणेश चतुर्थी व्रत की विधि/ The Vidhi of Ganesha Chaturthi Fast 

  • 1. प्रात:काल स्नान के बाद सोने, तांबे या मिट्टी से बनी गणेश जी की मूर्ति को घर लाएं और स्थापित करें।
  • 2. एक खाली कलश लेकर उसमें पानी भर दें और उसके मुंह को सादे कपड़े से बांधकर उस पर गणेश जी को विराजमान करें।
  • 3. गणेश जी को सिंदूर और दूर्वा चढ़ाएं और उन्हें इक्कीस लड्डू का भोग लगाएं। इनमें से पांच लड्डू भगवान गणेश को चढ़ाएं और बचे हुए लड्डू गरीबों या ब्राह्मणों में प्रसाद के रूप में बांट दें।
  • 4. गणेश जी का पूजन/ Ganesh Chaturthi Puja Muhurat शाम के समय करना सबसे उत्तम माना जाता है। गणेश चतुर्थी कथा/ ganesh chaturthi katha, गणेश चालीसा और आरती का पाठ करने के बाद आँखें नीची करके चंद्रमा को अर्घ्य देना चाहिए।
  • 5. इस दिन गणेश जी की सिद्धिविनायक के रूप में पूजा की जाती है और उस दिन व्रत/ ganeshchaturthivrat रखा जाता है।

गणेश चतुर्थी पर भोग/ The Bhog on Ganesh Chaturthi 

गणेश जी की स्थापना के बाद प्रतिदिन सभी नियम-कायदों के साथ उनकी पूजा की जाती है। फिर उन्हें सुबह और शाम भोग लगाया जाता है। गणेश जी को मोदक सबसे अधिक प्रिय है, इसलिए, उन्हें गणेश चतुर्थी पर मोदक से बना भोग चढ़ाएं।

गणेश चतुर्थी पर गलती से भी चंद्रमा के दर्शन न करें।

एक बार गणेश जी अपने वाहन चूहे पर सवार होकर घूमने निकले परन्तु वह फिसल गए, जिसे देख कर चंद्रमा ने उनका उपहास किया। गणेश जी को क्रोध आ गया और उन्होंने अपने क्रोध में चंद्रमा को शाप दिया कि, "तुम किसी को अपना मुंह नहीं दिखाओगे, और यदि कोई तुम्हें देखा, तो वह पाप का भागीदार बन जाए।" यह कहते ही गणेश जी वहां से चला गए।

इसके पश्चात चंद्रमा उदास हो गया, और वह चिंतित और अपने आप को अपराधी समझने लगे। चंद्रमा ने अपने आप से कहा, "मैंने सर्वगुण संपन्न भगवान के साथ क्या किया"? चंद्रमा को ना देखने के संबंध में सभी देवता भी निराश हो गए। फिर, इंद्र के कहने पर सभी देवता गजानन की पूजा करने लगे। उनकी पूजा से प्रसन्न होकर गणेश जी ने उनसे कोई वर मांगने को कहा|

सभी देवताओं ने कहा, "प्रभु, यह हमारा आपसे अनुरोध है, कृपया चंद्रमा को पहले जैसा बना दें।" गणेश जी ने देवताओं से कहा, "मैं अपना श्राप वापस नहीं ले सकता, लेकिन मैं इसे थोड़ा बदल सकता हूं। जो कोई भी जानबूझकर या अनजाने में भाद्र, शुक्ल, चतुर्थी पर चंद्रमा का दर्शन करता है, वह व्यक्ति शापित होगा, और उसे बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। यदि इस दिन कोई चंद्रमा का दर्शन करता है तो इस पाप से बचने के लिए निम्न मंत्र का पाठ करें-
''सिंह प्रसेनमवधित्सिंहो जाम्बवता हताः
सुकुमारक माँ रोदिस्तव हर्ष स्यामंतक''
तभी सभी देवताओं ने चंद्रमा से कहा, "आपने हंसकर गणेश का अपमान किया है। हमने मिलकर उनसे आपके पापों को क्षमा करने के लिए प्रार्थना की है, हमारे प्रयासों से प्रसन्न होकर गजानन ने केवल एक बार भाद्र शुक्ल चतुर्थी पर अदृश्य रहने का वचन देकर श्राप की ताकत को बहुत कम कर दिया है। आप भी उनका आशीर्वाद प्राप्त करें और फिर ब्रह्मांड को शीतलता प्रदान करें"। यह सुनकर चंद्रमा खुशी खुशी अपने कार्य पर लौट गए।
बाएं दांत वाले गणेश जी की स्थापना करें

श्री गणेश पूजा में श्री गणेश के दांत की दिशा का बहुत महत्व है। ऐसा माना जाता है कि घर में बायीं सूंड वाले गणेश जी की स्थापना करना चाहिए, इससे उस घर में मौजूद लोगों को बहुत सहायता मिलेगी। ऐसा करने से वह तुरंत प्रसन्न हो जाते है जबकि दाहिनी सूंड वाले गणेश जी को प्रसन्न करने में समय लगता है।

भगवान गणेश के बारे में कुछ रोचक तथ्य/ Some Interesting Facts About Lord Ganesha

1.  भगवान गणेश को भगवान शिव और माता पार्वती की पहली संतान माना जाता है।
2.  गणों के स्वामी होने के कारण उन्हें गणपति कहा जाता है।
3.  ज्योतिष में भगवान गणेश को 'केतु का देवता' भी कहा गया है।
4.  उनका नाम 'गजानन' है क्योंकि उनका चेहरा हाथी के आकार का होता है।
5.  उन्हें यह वरदान प्राप्त है कि उनकी पूजा के बिना कोई भी पूजा और कोई भी कार्य पूर्ण नहीं होगा। इसलिए उन्हें 'आदि पूज्य' कहा जाता है और किसी भी कार्य को करने से पहले उनकी पूजा अवश्य करना चाहिए।
6.  भारत में केवल भगवान गणेश की पूजा करने वाले संप्रदाय को 'गणपतये संप्रदाय' कहा जाता है, जो मुख्य रूप से महाराष्ट्र में पाया जाता है। इसके सिवाय कोई समुदाय नहीं है।
7.  गणेश जी की लंबी हाथी जैसी सूंड महा बुद्धित्व का प्रतीक हैं।
8.  शिव मानस शास्त्र में गणेश जी को प्रणव (ॐ) कहा गया है। ऊपरी भाग गणेश जी का मस्तक है, निचला भाग उदर है, चंद्रबिंदु लड्डू है, और मंत्र सूंड है।
9.  कुछ धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि गणेश की एक बहन भी थी जिसका नाम अशोक सुंदरी था।
10.  गणेश जी की दो पत्नियां हैं, जिनका नाम रिद्धि और सिद्धि है।
11.  देवी लक्ष्मी और देवी पार्वती दोनों ही आदि शक्ति यानी देवी दुर्गा हैं। देवी लक्ष्मी की पूजा उनके पुत्र गणेश के बिना नहीं की जाती है क्योंकि लक्ष्मी का मूल्य वही समझ सकता है जिसके पास ज्ञान हो, और गणेश जी को ज्ञान माता पार्वती से ज्ञान का फल प्राप्त है।

भगवान श्री गणेश को कैसे प्रसन्न किया जा सकता है?/ How can Lord Sri Ganesha be Made Happy? 

गणेशोत्सव शुरू होते ही श्री गणेश को प्रसन्न करने के प्रयास तेज होने लगते हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि न्यूनतम उपाय से ही गणेश जी प्रसन्न हो जाते हैं।
जानिए श्री गणेश को प्रसन्न करने के सरल उपाय
1. गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश के नामों का स्मरण करना चाहिए। किसी मंदिर में नियमों के अनुसार पूजा करने से भगवान प्रसन्न हो जाते हैं।
2. इस पर्व के दिन गणेश जी को भोग के रूप में घी और गुड़ का भोग लगाया जाता है। घी और गुड़ का भोग लगाकर गाय को खिलाने से आपको फल की प्राप्त होगी। ऐसा करने से आर्थिक समृद्धि आती है।
3. यदि आपको अपने घर में विरोधी शक्तियां का आभास हो तो गणेश चतुर्थी के दिन सफेद रंग के गणपति की घर के मंदिर में स्थापना करनी चाहिए। यह सभी प्रकार की बुरी शक्तियों का नाश कर आपके घर में सुख और समृद्धि लाता है।
4. इस दिन गणेश जी को दूर्वा चढ़ाएं। हो सके तो दूर्वा से गणेश जी की मूर्ति बना कर उसे अपने घर में स्थापित कर सही मुहूर्त/Ganesh Chaturthi Puja Muhurat पर उनकी पूजा करनी चाहिए।
5. भगवान गणेश को सिंदूर टीका अवश्य लगाना चाहिए। इसके बाद माथे पर तिलक भी करना चाहिए, जिससे आपको अच्छे फल की प्राप्ति होती है।

श्री गणेश के जन्म से जुड़े तीन रोचक प्राचीन मिथक/ 3 Interesting Ancient Myths Related to the Birth of Shri Ganesha 

1.  वराह पुराण के अनुसार, भगवान शिव ने पांच तत्वों से गणेश जी की रचना की। जब भगवान शिव गणेश जी की रचना कर रहे थे, तो उन्हें एक अनोखा और प्यारा रूप मिला। इसके बाद देवताओं को यह समाचार प्राप्त हुआ। इस समाचार को पाते ही सभी देवताएं भयभीत हो गए कि कहीं वह सभी के आकर्षण का केंद्र न बन जाएं। भगवान शिव को इस भय का आभास हुआ, जिसके बाद उन्होंने उनका पेट बड़ा किया और चेहरे को बदल कर हाथी के समान कर दिया।
2.  वहीं, शिवपुराण में कथा इससे बिल्कुल अलग है। इस पुराण के अनुसार माता पार्वती ने अपने शरीर पर हल्दी लगाई थी। जब उन्होंने अपने शरीर से उस हल्दी को निकाला तो उससे एक पुतला बनाया। बाद में उन्होंने उसी पुतले में जीवन डाल दिया। और इस तरह विनायक या विघ्नहर्ता का जन्म हुआ। इसके बाद, देवी पार्वती ने गणेश जी को घर के दरवाजे पर बैठने और उनकी रक्षा करने का आदेश दिया। उन्हें बताया गया कि वह किसी को भी अंदर ना आने दें। कुछ समय बाद, शिव जी घर की और आए, और उन्होंने कहा कि उन्हें पार्वती से मिलना है। गणेश जी ने उन्हें तुरंत मना कर दिया क्योंकि वह नहीं जानते थे कि शिव जी कौन हैं और शिवा जी भी नहीं जानते थे कि गणेश जी कौन थे। दोनों में विवाद हो गया और कठ ही समय में इस विवाद ने युद्ध का रूप ले लिया। इस दौरान शिवाजी ने अपना त्रिशूल निकाला और गणेश जी का सिर धड़ से अलग कर दिया। जब पार्वती को पता चला तो वह बाहर आई और रोने लगी। उसने शिव से कहा कि तुमने मेरे बेटे का सिर काट दिया। शिवा जी ने पूछा कि वह आपका पुत्र कैसे हो सकता है; इसके बाद पार्वती ने शिव जी को अपनी पूरी कहानी सुनाई। परिस्थिति को देखते हुए शिव जी ने पार्वती को से कहा कि मैं आपके पुत्र को फिर से जीवित कर सकता हूं, लेकिन मुझे एक सिर की आवश्यकता है।
फिर उन्होंने सभी से एक बच्चे का सिर लाने को कहा उसकी माँ उसकी तरफ पीठ करके सोई हो। गरुड़ जी हर दिशा में भटकते रहे, लेकिन उन्हें ऐसी कोई मां नहीं मिली क्योंकि हर मां अपने बच्चे के सामने मुंख करके सो रही थी। अंत में एक हाथी दिखाई दिया। उन्हें इस अवस्था में एक हाथी और उसका बच्चा मिला और वह हाथी के बच्चे का सिर ले आए। भगवान शिव ने उस सिर को गणेश जी के शरीर से जोड़ कर उसे जीवित कर दिया। इस तरह गणेश जी को हाथी का सिर मिला।
3.  श्री गणेश चालीसा में वर्णित है कि माता पार्वती ने पुत्र प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या की थी। माता पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर श्री गणेश ने स्वयं एक ब्राह्मण का रूप लिया और उन्हें वरदान दिया कि बिना गर्भ धारण किए ही आपको एक दिव्य और बुद्धिमान पुत्र की प्राप्ति होगी। यह सुनकर माता बहुत प्रसन्न हुई और पालने में एक बालक को देख उसकी खुशी का ठिकाना ना रहा। चारों लोकों में आनंद फैल गया था। भगवान शिव और पार्वती ने एक विशाल उत्सव का आयोजन किया। जिसे देखने के लिए चारों ओर से देवी-देवता, गंधर्व, राक्षस और ऋषि-मुनियों का आगमन होने लगा। वहीं उन्हीं के बीच शनि महाराज भी दर्शन करने आए। माता पार्वती ने उनसे आग्रह किया कि वह उनके बच्चे को आशीर्वाद दें। वहीं शनि महाराज अपनी दृष्टि के कारण पार्वती के बच्चे को देखने से बच रहे थे। माता पार्वती को यह देख बहुत बुरा लगा। उन्होंने शनिदेव से एक प्रश्न पूछ लिया कि क्या आपको बच्चे का आना अच्छा नहीं लगा। शनिदेव बिना कुछ बोले बालक को देखने गए, लेकिन जैसे ही शनि की दृष्टि उस बालक पर पड़ी, तो बालक का सिर आकाश में उड़ गया। त्योहार का माहौल तुरंत मातम में बदल गया। यह देख माता पार्वती चिंतित हो गईं। चारों तरफ अफरातफरी का माहौल था। जल्द ही गरुड़ जी को चारों दिशाओं से सर्वश्रेष्ठ सिर लाने के लिए कहा गया। गरुड़ जी को हाथी का सिर मिला। शंकर जी ने उस सर को बालक के शरीर से जोड़ दिया | इस प्रकार गणेश जी को हाथी का मस्तक प्राप्त हुआ।

गणेश जी की प्रतिमा का विसर्जन क्यों किया जाता है?/Why is the Visarjan of Ganesha Idol Performed

धार्मिक ग्रंथों और पौराणिक कथाओं के अनुसार जब वेदव्यास जी ने दस दिनों तक लगातार भगवान गणेश को महाभारत की कथा सुनाई तो उन्होंने अपनी आंखें बंद कर ली थी। दस दिनों के बाद जब उन्होंने अपनी आँखें खोली तो उन्होंने देखा कि भगवान गणेश का तापमान बहुत बढ़ गया है। उसी समय वेद व्यास जी ने उन्हें पास के कुंड में स्नान कराया। ऐसा करने से उनके शरीर का तापमान कम नीचे आ गया, इसलिए गणपति की स्थापना के बाद अगले दस दिनों तक गणेश जी की पूजा की जाती है और फिर भगवान गणेश की मूर्ति का उत्सव शुरू होने के दसवें दिन विसर्जन कर दिया जाता है। गणेश विसर्जन को एक और नजरिए से भी देखा जा सकता है। यह पर्व इस बात का प्रतीक है कि मानव शरीर धूल से बना है और अंत में उसे धूल में मिल जाना है।

इसी कथा में एक और बात का जिक्र है गणपति जी के शरीर को गर्म होने से बचाने के लिए वेद व्यास जी ने उनके शरीर पर सुगंधित मिट्टी का लेप लगाया जिससे उनके शरीर का तापमान कम होने लगा। लेप सूखने के बाद गणेश जी का शरीर सख्त हो गया। सूखी मिट्टी भी गिरने लगी। फिर व्यास जी ने उन्हें एक ठंडे सरोवर में ले जाकर पानी में स्नान करवाया। जब तक गणेश जी वेद व्यास जी के स्थान पर थे, वेदव्यास जी ने दस दिनों तक श्री गणेश को उनका पसंदीदा भोजन दिया। बस तभी से गणेश जी की मूर्ति की स्थापना और विसर्जन का चलन है। इसी प्रथा में गणेश जी के पसंदीदा भोजन बना कर गरीबों या ब्राह्मणों को खिलाने की प्रथा भी है।

गणेश विसर्जन का महत्व

हिंदू पौराणिक कथाओं में, भगवान गणेश के विसर्जन के पीछे एक अनेक और मजेदार कहानियां हैं। गणेश चतुर्थी/Ganesh Chaturthi का उत्सव मानव जीवन के चक्र का प्रतिनिधित्व करता है: जन्म, जीवन और मृत्यु। ऐसा माना जाता है कि गणेश चतुर्थी के अंतिम दिन, भगवान गणेश अपने माता-पिता के पास कैलाश लौटते हैं। लोग भगवान गणेश की पूजा करते हैं और आशीर्वाद मांगते हैं ताकि वह उन्हें सभी बाधाओं से मुक्त जीवन दें। यह भी माना जाता है कि जब भगवान गणेश घर किसी व्यक्ति के घर से निकलते हैं, तो वह सभी नकारात्मक ऊर्जा और समस्याएं उस व्यक्ति के जीवन से दूर करके जाते हैं।

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार अगर गणेश विसर्जन/Ganesha Visarjan भी शुभ मुहूर्त के अनुसार किया जाए तो यह लाभदायक साबित होता है।

एक चूहा कैसे बना गणेश का वाहन?/ How did a rat become the Vaahan of Ganesha?

गणेश जी का वाहन एक चूहा है। उनकी शारीरिक संरचना की तुलना में उनका वाहन बहुत छोटा प्रतीत होता है। गणेश जी ने एक छोटे से जीव को अपने वाहन के रूप में क्यों चुना? यह प्रश्न अकसर लोगों के मन में आता होगा। यह बात तो सबको पता है कि गणेश ज्ञान और विद्या के अधिष्ठाता देवता हैं। ज्ञान में उनसे ऊपर किसी का दर्जा नहीं है और ना ही कोई उनसे तर्क-वितर्क और वाद-विवाद में उनसे बढ़कर है। आप यह भी कह सकते हैं कि उनका जुनून हर एक चीज या समस्या की गहराई तक जाना, और उस विषय में शोध करना और निष्कर्ष निकालना है। आप मूषक को भी वाद-विवाद में कम नहीं आंक सकते। यह हर वस्तु को कुतरता है और समान रूप से हमेशा सक्रिय रहता है। यह हमेशा सतर्क रहने का संदेश देता है। गणेश जी के पास अपना वाहन चुनना का पूरा अवसर था और उन्होंने चूहे की यह सब विशेषता देखकर ही उसे अपना वाहन चुना।
एक बार गणेश जी को महर्षि पाराशर के आश्रम में आमंत्रित किया गया था। उसी समय एक एक विशाल चूहे ने आश्रम में कदम रखा और सब कुछ नष्ट कर दिया। भगवान गणेश यह सब देख कर उस विशाल चूहे से मिलने और उसे सबक सिखाने का फैसला किया। गणेश जी उससे मिलने पहुंचे। उनके पास 'पाशा' नामक एक हथियार रहता है। जैसे ही उन्होने उस विशाल चूहे के गले की ओर फेंका, वह उसके गले से लिपट कर उस चूहे को गणेश जी के चरणों में ले गया। उस विशाल चूहे ने गणेश जी से माफी मांगी। तब गणेश जी ने उसे अपना वाहन बनाने की पेशकश की और वह मान गया। तभी से ही मूषक देव गणेश जी के वाहन है।

इन वस्तुओं को गणेश जी को अवश्य अर्पित करें।/ These items Must be offered to Lord Ganesha 

मोदक: मोदक एक खास तरह की मिठाई है, जिसे गणेश उत्सव पर खास तौर पर बनाया जाता है। गणेश जी इसे बहुत पसंद करते हैं और मोदक चढ़ाने से भक्तों की मनोकामना भी पूरी है।
हरा दूर्वा: गणेश जी को हरा दूर्वा विशेष रूप से प्रिय है। ऐसा माना जाता है कि हरा दूर्वा उन्हें ताजगी और शीतलता प्रदान करता है।
बूंदी के लड्डू: गणेश जी को बूंदी के लड्डू भी बहुत पसंद हैं। यदि गणपति जी को भोग के रूप में बूंदी के लड्डू चढ़ाए जाते हैं, तो वह अपने भक्तों को धन और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं और उनके घर में खुशियों की कभी कमी नहीं होती है।
श्रीफल: गणेश जी को श्रीफल सभी फलों में प्रिय है। इसलिए गजानन की आरती में श्रीफल का भोग अवश्य लगाया जाता है।
सिंदूर: गणेश जी को प्रसन्न करने के लिए उन पर सिंदूर का तिलक जरूर लगाएं। गणपति जी को सिंदूर का तिलक लगाने के बाद हमें अपने ऊपर भी सिंदूर का तिलक लगाना चाहिए। इससे आपको गणेश जी का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

गांधी जयंती
02 Oct, 2022

गांधी जी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में हुआ । राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का जन्म दिवस  पूरे देश में हर्षोल्लास से मनाया जाता है । बापू के जन्म दिवस पर पूरे देश के विद्यालयों तथा कार्यालयों में कार्यक्रमों  का आयोजन किया जाता है। बापू का पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। बापू, जिन्होंने अहिंसा के सिद्धांतों पर चलते हुए देश को आज़ादी दिलाई, लोगों के दिलों में आज भी जीवित है । गांधीजी को देश की स्वाधीन्ता के लिए कई बार कारावास की सज़ा भी हुई थी । गांधीजी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात में पोरबंदर नामक स्थान पर हुआ था। वह वकालत पढने तथा वकील बनने लन्दन गए थे । गांधीजी को लन्दन में  अपनी पढाई पूर्ण करने के पश्चात वकालत की डिग्री भी प्राप्त हो गयी। जब वह वापस भारत लौटे  तो देश की दशा ने उन्हें इतना द्रवित कर दिया की उन्होने देश की आज़ादी की खातिर एक लम्बी लड़ाई लड़ी। गांधीजी की निरंतर प्रयासों की बदौलत हम आज स्वाधीन हैं ।

देश की आज़ादी में बापू का बहुत बड़ा योगदान है। उन्हें याद करने के साथ-साथ वह उनके द्वारा अपनाई गयी पद्धति को भी याद करते हैं । गांधी जी ने अहिंसा, सत्य और शांति के साथ देश  में एक आंदोलन चलाया। बापू ने इन सिद्धांतों की सहायता से देश को आज़ाद कराया। गांधी जी का मानना ​​था कि, भारत में लोगों के मध्य मतभेदों और एकता की कमी के कारण अंग्रेज़ी औपनिवेशिक शक्तियां देश पर हावी हो सकी । उन्होंने असहयोग आंदोलन जैसे कई आंदोलन प्रारम्भ किए, क्योंकि उनका मानना था कि यह भारत पर औपनिवेशिक पकड़ को कमजोर करने में सहायक  हो सकता है।

बापू ने देश की आज़ादी के लिए कई आंदोलन प्रारम्भ किए और ये सभी अंतत: सफल रहे। इनमें से सबसे पहले आंदोलन का प्रारम्भ वर्ष 1919 में हुआ। वर्ष 1919 में जलियांवाला बाग कांड के खिलाफ आंदोलन हुआ था जिसमें देशवासियों ने बापू को पूरा समर्थन दिया था। उसके पश्चात  गांधीजी ने नमक सत्याग्रह प्रारम्भ किया किया, इस सत्याग्रह को डांडी यात्रा के नाम से भी जाना जाता है। यह यात्रा 26 दिनों तक चली, जो 12 मार्च, 1930 को प्रारम्भहुई और 6 अप्रैल, 1930 को तटीय गाँव डांडी में इसका समापन हुआ ।

प्रारम्भ में गांधीजी के आन्दोलन के साथ कुछ ही लोग जुड़े थे ,लेकिन जैसे-जैसे यह बढ़ते गए, और लोग भी इनसे जुड़ने लगे। नमक आंदोलन  इसका  एक उदाहरण है, जो कुछ लोगों के साथ शुरू हुआ, लेकिन बाद में पूरा देश इसमें शामिल हो गया। पूरा देश गांधीजी के मार्गदर्शन पर चलने को तैयार था। नमक आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य अंग्रेज़ी कर प्रणाली के खिलाफ आवाज़ बुलंद करना था। इसके चलते भारतीयों का जीवन कठिन हो गया था। इस आंदोलन में कई लोग गिरफ्तार हुए। हालाँकि, ब्रितानिया हुकूमत इसको रोकने में विफल रही और यह एक एक बड़ी सफलता थी क्योंकि अंग्रेज़ो को एहसास हुआ कि उनके शासन की नीवं चरमराने लगी थी।

अंग्रेज़ यह सोचने पर भी विवश हो गए की अहिंसा आंदोलन का सामना करना उनके लिए चुनौतीपूर्ण था। उन्हें यह प्रतीत होने लगा कि हिंसक गतिविधियों का सामना करना इससे कहीं आसान है। ब्रितानिया सरकार को अब अपना शासन खोने का दर सताने लगा था । पहली बार पूरा देश अहिंसा के पथ पर चलते हुए एक स्वर में स्वाधीनता के लिए संघर्ष कर रहा था। महिलाएं भी देश के स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया। महात्मा गांधी ने पूरे देश को स्वाधीन कराने का फैसला किया और अभियान प्रारम्भ किया। उन्होंने पूरे देश को समझाया कि हर लड़ाई के लिए लहू बहाने की आवश्यकता नहीं होती । युद्ध अहिंसा का पालन करते हुए भी लड़ा जा सकता है, भले ही वह देश की स्वाधीनता का ही क्यों ना हो।

गांधी जयंती अक्टूबर में क्यों मनाई जाती है?/ Why is Gandhi Jayanti Celebrated in October?

गांधी जयंती हर वर्ष 2 अक्टूबर को मनाई जाती है। गांधीजी का जन्म इसी दिन हुआ था। इस दिन को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। गांधी जी अपने अहिंसा आंदोलन के लिए विश्व भर में  प्रसिद्ध हैं। यह दिन उन्हें विश्व स्तर पर स्वीकार्यता प्रदान करने के लिए मनाया जाता है। गांधीजी का मत था कि अहिंसा एक बेहतर समाज के निर्माण पर आधारित दर्शन, सिद्धांत और अनुभव है।

गांधी जयंती किस प्रकार मनाई जाती है?/ How is Gandhi Jayanti Celebrated?

गांधी जयंती के अवसर पर, लोग नई दिल्ली में राजघाट पर  गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। इस दिन राष्ट्रीय अवकाश होता है। भारत के राष्ट्रपति और प्रधान मंत्री महात्मा गांधी की समाधि पर प्रार्थना करते है। गांधी जयंती का पर्व सभी विद्यालयों और कार्यालयों में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है ।

महात्मा गांधी के विषय में/About Mahatma Gandhi 

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का विवाह 13 वर्ष की आयु में कस्तूरबा गांधी से हुआ था । वह वकालत पढ़ने के लिए इंग्लॅण्ड गए थे, जहां डिग्री प्राप्त करने के पश्चात उन्होंने कुछ समय वहां वकालत की, जिसमें उन्हें वांछित सफलता प्राप्त नहीं हुई। कुछ समय बाद वह स्वदेश लौट आये और आज़ादी की लड़ाई को सशक्त बनाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।

उन्हें दक्षिण अफ्रीका की यात्रा करने का भी अवसर प्राप्त हुआ। उन्हें दक्षिण अफ्रीका में नस्लीय भेदभाव का भी सामना करना पड़ा। दक्षिण अफ्रीका में प्रथम श्रेणी के रेलगाड़ी डिब्बे  में यात्रा करते समय, गांधी को एक अंग्रेज़ ने सामान के साथ डिब्बे से बाहर धक्का दे दिया था।

इसके चलते उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले भारतीयों के साथ अमानवीय व्यवहार और भेदभाव के खिलाफ भारतीय कांग्रेस का गठन किया। दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के अधिकारों के लिए संघर्ष के दौरान, गांधी ने आत्म-शुद्धि और सत्याग्रह के सिद्धांतों का भी उपयोग किया , जो अहिंसा की उनकी व्यापक दृष्टि का हिस्सा थे। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में भारतीय श्रमिकों, खनन मज़दूरों और खेतिहर मज़दूरों को एकजुट किया और अंग्रेज़ी शासन के अन्याय के खिलाफ आवाज़ बुलंद की। दक्षिण अफ्रीका में इक्कीस साल बिताने के पश्चात, वह वर्ष 1915 में भारत लौट आये ।
महात्मा गांधी एक कुशल राजनीतिज्ञ थे जिन्होंने अंग्रेजों से भारत को मुक्त कराने के लिए लड़ाई लड़ी और गरीबों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई। उन्होंने देश भर में लोगों को अपनी देशभक्ति से अवगत कराया। सकल विश्व उनको अहिंसा के पुजारी के रूप में स्मरण करता है।

महात्मा गांधी अपने सरल जीवन और उच्च आदर्शों के कारण भारतीयों के लिए प्रेरणा स्त्रोत बने। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, विभिन्न आंदोलनों, जैसे सविनय अवज्ञा, भारत छोडो और डांडी  आन्दोलन के कारण, गांधीजी ने अंग्रेज़ी राज को भारत को  15 अगस्त, 1947 को स्वाधीन करने के लिए विवश  कर दिया था।
30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या कर दी थी। गोडसे हिंदू महासभा के सदस्य थे। उन्होंने महात्मा गांधी पर पाकिस्तान का पक्षधर होने का आरोप लगाया और उनके अहिंसा के सिद्धांत का विरोध किया।

महात्मा गांधी के विषय में कुछ रोचक तथ्य/Interesting Facts Related to Mahatma Gandhi

विश्व की जानी-मानी मोबाइल कंपनियों में से एक एपल के संस्थापक स्टीव जॉब्स ने गांधीजी के सम्मान में गोल चश्मा पहना था।

भारत में छोटी सड़कों के अतिरिक्त महात्मा गांधी के नाम पर पचास  से अधिक सड़कें हैं। साथ ही विदेशों में उनके नाम पर करीब साठ सड़कें हैं।

महात्मा गांधी को पांच बार नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया था, लेकिन उन्हें एक बार भी नोबेल पुरस्कार नहीं मिला।

गांधीजी प्रतिदिन अठारह किलोमीटर पैदल चलते थे।

गांधीजी 'महात्मा' और 'राष्ट्रपिता' के रूप में किस प्रकार  विख्यात हुए/How Gandhiji came to be known as 'Mahatma' and 'Father of the Nation 

12 जनवरी, 1918 को गांधी द्वारा लिखे गए एक पत्र में रवींद्रनाथ टैगोर को गुरुदेव कहकर संबोधित किया गया था।

टैगोर ने प्रथम बार एक पत्र में  गांधी को 12 अप्रैल, 1919 के दिन ' महात्मा कहकर  संबोधित किया था ।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने पहली बार 6 जुलाई 1944 को रेडियो सिंगापुर से प्रसारित अपने एक भाषण में गांधी को राष्ट्रपिता कहकर संबोधित किया था। एक कथन यह भी है कि उन्होंने इससे पूर्व 4 जून 1944 को आज़ाद हिंद रेडियो रंगून से प्रसारित एक संदेश में गांधीजी को "राष्ट्र  पिता" कहकर संबोधित किया था। 

गांधीजी की मृत्यु पर, पंडित नेहरू ने रेडियो पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा, "राष्ट्रपति अब नहीं रहे।"

महात्मा गांधी के पांच आंदोलनों ने भारत की स्वाधीनता में सहायता की/Mahatma Gandhi's five movements Helped India in Getting Freedom

गांधीजी द्वारा चालाया गया प्रथम सत्याग्रह वर्ष 1906 में ट्रांसवाल एशियाई पंजीकरण अधिनियम के विरोध में था। वर्ष 1920 में गांधीजी  भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी का हिस्सा बने और 26 जनवरी 1930 को अंग्रेज़ी शासन से भारत की स्वतंत्रता की घोषणा की। इसके अतिरिक्त वर्ष 1917 में उन्होंने चंपारण सत्याग्रह, असहयोग आंदोलन जैसे कई आंदोलन चलाए। इन्हीं आंदोलनों के कारण भारत को अंग्रेजों से आज़ादी  मिली। गांधीजी द्वारा चलाए गए आंदोलनों के विषय में यहां पढ़ें:

असहयोग आंदोलन- गांधीजी के असहयोग आन्दोलन  प्रारम्भ  करने का सबसे प्रमुख कारण था,अंग्रेजी सरकार की दमनकारी नीतियों।सरकार के सुधारों से जनता असंतुष्ट थी और हर तरफ  आर्थिक संकट छाया हुआ था तथा महामारी और अकाल फैला हुआ था। ऐसे समय में अंग्रेजी सरकार द्वारा वर्ष 1919  में रोलेट अधिनियम  लाया गया जो भारतीयों के हितों के लिए एक दमनकारी नीति का अंग  था।

चंपारण सत्याग्रह: बिहार के  चंपारण में  महात्मा गांधी की अगुवाई में पहला सत्याग्रह हुआ था। वर्ष 1917 में, बिहार के चंपारण पहुंचने के बाद, उन्होंने उन किसानों का समर्थन करने के लिए एक सत्याग्रह का आयोजन किया, जिन्हें अनाज नहीं बल्कि नील और अन्य नकद फसलों की खेती को मजबूर किया जा रहा था।

महात्मा गांधी- शांति के नायक/Mahatma Gandhi- The Hero of Peace

2 अक्टूबर,भारत को अपने राष्ट्रपिता की शिक्षाओं को याद करने का एक स्वर्णिम अवसर प्रदान करता है। भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में गांधी का आगमन बहुत से लोगों को खुश और हजारों भारतीयों को आकर्षित करने का अवसर प्रदान करता है और इसके साथ ही उनका जीवन-दर्शन  एक प्रेरणा स्त्रोत है, जिसे गांधी दर्शन कहा जाता है। यह और भी आश्चर्य की बात है कि गांधीजी के व्यक्तित्व ने करोड़ों देशवासियों के दिलों में जगह बनाई। इसके पश्चात  विश्व भर में कई लोग उनकी विचारधारा की ओर आकर्षित हुए।

विद्यालयों और महाविद्यालयों में जश्न/The Celebration at the Schools and Colleges

अहिंसा और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में गांधी के प्रयासों पर विद्यालयों, महाविद्यालयों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों में नाटक, खेल और भाषण जैसी विभिन्न प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। अन्य रोमांचक गतिविधियों जैसे निबंध लेखन, महात्मा गांधी नारा प्रतियोगिता, गांधी जयंती भाषण, प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता और चित्रकला प्रतियोगिताएँ सदा ही विभिन्न संस्थानों में आयोजित की जाती हैं।

विभिन्न प्रतियोगिताओं में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले प्रतियोगियों को पुरस्कार भी वितरित किये जाते हैं। इसके अतिरिक्त , विद्यालयों और महाविद्यालयों को गांधीजी के पोस्टर, महात्मा गांधी के नारे और इससे संबंधित चित्रों से सजाया जाता है। इसके अतिरिक्त छोटे बच्चे गांधी की तरह तैयार होते हैं।

गांधी सदा-सर्वदा युवाओं के लिए एक आदर्श और प्रेरक नेता रहे हैं। नेल्सन मंडेला की तरह ही , जेम्स लॉसन ने स्वतंत्रता और स्वाधीनता के लिए गांधी के अहिंसा के सिद्धांत की प्रशंसा की।
स्वराज प्राप्त करने में गांधीजी ने बेहतरीन कार्य किया। उन्होंने किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने की दिशा में भी कार्य किया । उन्होंने छुआछूत या अस्पृश्यता जैसी अन्य सामाजिक विसंगतियों को समाप्त किया। इसके अलावा उन्होंने महिला सशक्तिकरण का भी समर्थन किया।

गांधीजी ने असहयोग आंदोलन (1920), डांडी यात्रा (1930), और भारत छोड़ो आंदोलन (1942) जैसे विभिन्न आंदोलनों का नेतृत्व किया है। यह सभी आंदोलन अत्यंत प्रभावी और सफल रहे और इन्हें युवाओं का भी समर्थन प्राप्त हुआ।

स्वतंत्रता के लिए भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में महात्मा गांधी की भूमिका/Role of Mahatma Gandhi in the Indian National Movement for Independence

गांधीजी की अगुवाई में सबसे महत्वपूर्ण और सफल आंदोलनों में चंपारण सत्याग्रह आंदोलन था। जब महात्मा गांधी भारत वापस आये , तब उन्होंने देखा कि भारत के किसान कितनी समस्याओं से जूझ रहे हैं।

चंपारण, उत्तर बिहार में स्थित एक छोटा सा जिला है, जहां किसानों को अपनी ज़मीन पर नील की खेती करने के लिए विवश किया जाता था। उपजाऊ भूमि पर नील की खेती से किसानों को भारी नुकसान हुआ।

गांधी ने गरीब किसानों की मज़दूरी बढ़ाने के संघर्ष का भी नेतृत्व किया और उसमें सफल रहे। आंदोलन के पश्चात मज़दूरी में पैंतीस प्रतिशत  की वृद्धि हुई।  वर्ष 2007 में, गांधी जयंती के अवसर को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा "अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस" ​​घोषित किया गया था। 30 जनवरी 1948 को हिंदू राष्ट्रवादी नाथू राम गोडसे द्वारा हमले के कारण महात्मा गांधी की मृत्यु हो गई।

निष्कर्ष/Conclusion

गांधी जयंती मनाने का मुख्य  उद्देश्य महात्मा गांधी के दर्शन, सिद्धांतों और अनमोल विचारों का जन-प्रसार और सकल विश्व में अहिंसा और विश्वास की भावना को प्रस्फुटित करना है। ऐसे में हम हर वर्ष अपने महान नेता को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। हम हर गांधी जयंती पर बापू को उनके द्वारा किये गए महान कार्यों के लिए स्मरण करते हैं।

आप अन्य प्रमुख भारतीय त्योहारों के लिए भारतीय त्योहारों में ज्योतिष की प्रासंगिकता पर इसी तरह के लेख पढ़ सकते हैं।

दशहरा
05 Oct, 2022

भारत में मनाए जाने वाले सभी पर्व किसी न किसी रूप में बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश देते हैं, लेकिन वास्तव में दशहरे का त्यौहार इसके लिए जाना जाता है। यह पर्व दीपावली से ठीक बीस दिन बाद मनाया जाता है। पंचाग के अनुसार अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी को पूरे देश में विजयदशमी या दशहरा मनाया जाता है। दशहरा हिंदुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह त्योहार भगवान श्री राम की कथा बताता है, जिन्होंने नौ दिनों के युद्ध के पश्चात लंका में अभिमानी रावण को पराजित किया और माता सीता को उसकी कैद से मुक्त कराया। उसी दिन देवी दुर्गा ने महिषासुर का संहार किया था। इसलिए, इसे विजयदशमी के रूप में भी मनाया जाता है।

इस दिन देवी दुर्गा की भी आराधना की जाती है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान श्री राम ने भी देवी दुर्गा की पूजा कर उनसे शक्ति की याचना की। श्री राम की परीक्षा लेने के लिए, देवी ने पूजा के लिए रखे फूलों में से एक कमल का फूल हटा दिया। श्री राम राजीवनयन के नाम से जाने जाते हैं , जिसका अर्थ है कमल के सामान नयनों का स्वामी। इसलिए, उन्होंने अपनी एक आंख देवी को अर्पण करने का निर्णय किया। जैसे ही वह अपनी आंख निकालने वाले थे , देवी दुर्गा प्रसन्न हो गईं; वह उनके समक्ष प्रकट हुई और श्री राम को विजय का आशीर्वाद दिया। ऐसा माना जाता है कि इसके पश्चात दशमी के दिन भगवान राम ने रावण का वध किया था। रावण पर भगवान राम और महिषासुर दानव पर देवी दुर्गा की जय का यह पर्व सम्पूर्ण देश में बुराई पर अच्छाई तथा अधर्म पर धर्म की जीत के रूप में मनाया जाता है। इसे मनाने की विभिन्न शैलियाँ देश के अलग-अलग भागों में भी विकसित हुई हैं। कुल्लू का दशहरा देश भर में प्रसिद्ध है; पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा सहित कई राज्यों में दुर्गा पूजा भी भव्यता से मनाई जाती है।

विजयदशमी / दशहरा का महत्त्व/Importance of Vijayadashami/Dussehra

विजयदशमी / दशहरा का त्योहार बदी पर नेकी की जीत को दर्शाने के लिए मनाया जाता है। दशहरे के इस पर्व को विजय उत्सव के रूप में मनाया जाता है,  परन्तु उत्सव के पीछे की मान्यताएं भिन्न हैं। उदाहरण हेतु , किसानों के लिए, यह नई फसलों के लहलहाने का उत्सव है। प्राचीन काल में इस दिन औज़ारों और शस्त्रों का पूजन किया जाता था , क्योंकि पौराणिक काल में लोग औजारों और शस्त्रों को युद्ध में विजय के तौर पर देखते थे। फिर भी, इन सबके पीछे का  मुख्य कारण "बुराई पर अच्छाई की जीत" है। वर्तमान समय में यह बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। बुराई किसी भी रूप में हो सकती है जैसे क्रोध, झूठ, घृणा, ईर्ष्या, उदासीनता आदि। हमें अपने भीतर की बुराई को नष्ट करके विजयदशमी / दशहरा का पर्व मनाना चाहिए ताकि एक दिन हम अपनी सभी इंद्रियों पर शासन  पा सकें।

विजयादशमी: जानिए रामचरित मानस में क्या लिखा है?/ Vijayadashmi: Know What is Written in Ramacharitra Manas

हर वर्ष धूम- धाम के साथ मनाया जाने वाले विजयदशमी के त्योहार को केवल राम-रावण युद्ध  से सम्बंधित नहीं माना जाना चाहिए। बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक इस पर्व में छिपे संदेश समाज के लिए एक दिशा प्रशस्त कर सकते हैं। महापंडित दशानन स्वयं भली-भांति जानते थे कि राम के द्वारा उनकी जीवन लीला का अंत निर्धारित है। वहीं मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने भी रावण की बुद्धि और कौशल को नमन किया।

रामचरित मानस में राम का चरित्र बेहतरीन तरीके से वर्णित किया गया है, वहीं हम रावण के जीवन में  अपने ज्ञान और नेतृत्व क्षमता पर गर्व का अवलोकन भी देखते हैं। रावण बुद्धिमान होने के साथ-साथ अत्यंत पराक्रमी भी था, लेकिन वानर राज बाली ने इस अभिमानी  का दमन किया और लंकेश को उसे छह माह  तक अपनी काख में दबा कर रखा।

लंका पर शासन करने वाले रावण ने भी अपने सौतेले भाई कुबेर को धोखा दिया और उसके पुष्पक विमान पर आधिपत्य जमा लिया। इन सब बुराइयों के कारण वह मृत्यु को प्राप्त हुआ । हम हर वर्ष रावण रूपी अहंकार का पुतला जलाकर पर्व मनाते हैं, लेकिन हम अपने अहंकार का त्याग करने को तैयार नहीं हैं। इस प्रकार विजयादशमी का पर्व मनाने से क्या लाभ?

अपने अंदर छिपी चेतना को जागृत करना और अहंकार का त्याग करना विजयदशमी के पर्व का प्रमुख संदेश है। आज हम अपनी चेतना और ऊर्जा को सही दिशा प्रदान करने के लिए समस्याओं से ग्रसित हो गए हैं। रावण के अत्याचारों से त्रस्त लोगों को सुख प्रदान करने के लिए ही भगवान राम का जन्म हुआ था।

हम सभी इस बात से अवगत हैं कि राम का जन्म एक  क्षत्रिय परिवार में हुआ था। जबकि, रावण ब्राह्मण कुल से था और एक महान, वेदों और पुराणों के ज्ञाता ऋषि का पुत्र था। रावण के दादा ऋषि पुलत्स्य को भी भगवान के समान ही माना जाता था। राम-रावण युद्ध के दौरान राम के हृदय में कहीं न कहीं रावण के प्रति सहानुभूति थी।

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम इस बात से अवगत थे  एक कि ब्राह्मण को मारना पाप है। इसलिए, उन्होंने रावण को मारने के बाद ब्राह्मणों के वध का प्रायश्चित किया और प्रार्थना की, कि उनका इस पाप का भागी बनाना  सर्व-साधारण की रक्षा के लिए आवश्यक था; तो ईश्वर उन्हें इस पाप से मुक्त करें।

इस युग में यह बात भी जानने योग्य है कि रावण की मृत्यु के पश्चात भगवान राम ने स्वयं अपने छोटे भाई लक्ष्मण को ज्ञान प्राप्ति के लिए रावण के पास भेजा था। फिर भी अपनी अंतिम सांस ले रहे रावण ने लक्ष्मण की ओर दृष्टि तक नहीं डाली । बाद में, मर्यादा पुरुषोत्तम ने स्वयं रावण से हाथ जोड़कर ज्ञान प्रदान करने का अनुरोध किया, और रावण ने अपना अहंकार त्यागकर ज्ञानोपदेश दिया।

दशहरा या विजयदशमी का  पर्व  हमें दस प्रकार के पापों से दूर रहने का संदेश देता है। यह पर्व हमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, नशा, मत्सर, अभिमान, आलस्य, हिंसा और चोरी से दूर रहने की प्रेरणा देता है। यदि हम उत्साह के साथ रावण के पुतले को जलाते हैं, तो इन दस पापों को आग में दाह कर देना चाहिए , तभी हमारा इस विजयी पर्व को मनाने का उद्देश्य पूर्ण हो सकता है।

केवल सांस्कृतिक कार्यक्रमों जैसे, नाचने ,गाने, आतिशबाजी को ही विजयदशमी उत्सव का प्रतीक नहीं माना जाना चाहिए। इस पर्व की निहित संदेश लोगों तक पहुंचना चाहिए, और हर घर में शांति और खुशी होनी चाहिए। यही इस पर्व का संदेश है। दशहरे का नाम विजयदशमी होने के पीछे ग्रहों की स्थिति एक  प्रमुख कारण है।

शास्त्रों के अनुसार अश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी को शुक्र के उदय के समय जो मुहूर्त होता है, उसे ज्योतिष की भाषा में विजय मुहूर्त कहा जाता है। ज्योतिष की मानें तो शुक्र के उत्थान का यह समय सर्व सिद्धि दयाक माना जाता है। इसलिए दशहरे  को विजय दशमी के नाम से भी जाना जाता है।

दशहरे के पावन अवसर पर शमी के वृक्ष के सोन पत्र के आदान-प्रदान की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। इस परंपरा के पीछे एक कहानी है। ऐसा माना जाता है कि भगवान श्री राम लंका गमन के समय इस वृक्ष से होकर गुज़र रहे थे, तब इसी वृक्ष ने उनकी विजय की घोषणा की थी।

ऐसा कहा जाता है कि वनवास के चौदहवें वर्ष में अर्जुन ने इसी शमी वृक्ष पर अपना धनुष छिपा कर रखा था। आज भी दशहरे पर हिन्दू धर्म के अनुयायी रावण से शमी वृक्ष के पत्ते प्राप्त कर रावण से ज्ञान प्रदान करने का अनुरोध करते हैं।

विजय दशमी मनाने का मुख्य कारण चाहे जो भी हो, परन्तु यह निश्चित है कि यह पर्व अभिमान को नष्ट करने और संस्कृति के अनुसार आचरण करने का प्रतीक है। अच्छे व्यवहार को अपनाकर और खुद में व्याप्त बुराई को  तिलांजली अर्पित करने को विजयदशमी कहा जा सकता है।

दशहरे का धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्व है/Dussehra Has Huge Importance From Religious Point of View

ऐसा माना जाता है कि इस समय कोई भी शुभ कार्य प्रारम्भ करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है। दशहरे के दिन क्षत्रिय वंश में शस्त्रों का पूजन किया जाता है। इस दिन ब्राह्मण ज्ञान की देवी सरस्वती की पूजा करते हैं। वैश्य अपने बही खातों की पूजा करते हैं। बुराई के प्रतीक लंकेश रावण के पुतले को भी देश के विभिन्न हिस्सों में जलाया जाता है। भगवान राम ने रावण का वध किया था। हालाँकि, रावण अभी भी समाज में मुद्रास्फीति, भ्रष्टाचार, व्यभिचार, लालच , हिंसा, भेदभाव, ईर्ष्या, पर्यावरण प्रदूषण, यौन हिंसा और यौन शोषण जैसे रूपों में  विद्यमान है। इसलिए इस दिन हमें  अपने अन्दर निहित इन सभी बुराइयों को दूर करना चाहिए।

इसलिए, इस पर्व को  विजय दशमी और दशहरा के रूप में जाना जाता है/Hence, it is known as Vijaya Dashami and Dussehra

एक पौराणिक कथा के अनुसार रावण ने माता सीता का हरण किया था। जब रावण सीता का हरण कर सकता था, उस समय महिलाओं की दुर्दशा की कल्पना करना मुश्किल नहीं है । भगवान राम ने अधर्मी और अन्यायी रावण को युद्ध की चुनौती दी और नारी जाति के सम्मान की रक्षा के लिए दस दिनों तक रावण से युद्ध किया। अश्विन माह की शुक्ल दशमी को भगवान राम ने मां दुर्गा के दिव्य अस्त्र से उसका वध किया था। रावण का अंत दशानन का अंत था। इस पर्व को असत्य पर न्याय और सत्य की विजय के उत्सव के रूप में मनाया गया। इस संग्राम में रावण पर राम की विजय हुई थी। इसलिए इसको विजयदशमी कहा गया। इस दिन दशानन रावण पराजित हुआ था, इसलिए इस दिन को आम भाषा में दशहरा भी कहा जाता है।

देवी दुर्गा ने इस तिथि को विजयदशमी बनाया है/Goddess Durga has made this Tithi as Vijayadashami

दुर्गा सप्तशती का मध्य चरित्र में  देवी दुर्गा और महिषासुर वध की कथा है। इस दैत्य ने देवताओं का स्वर्ग से भी पलायन करा दिया। उसके अत्याचारों से पृथ्वी पर त्राही-त्राही मच गई। देवी ने अश्विन मास शुक्ल दशमी तिथि को महिषासुर का वध कर पृथ्वी को पाप के भार से मुक्त किया। देवी की विजय से प्रसन्न होकर देवताओं ने विजया देवी की पूजा की और इसी कारण इस  तिथि को विजयदशमी कहा जाता है।

महाभारत काल में सत्य की विजय/The victory of truth in the time of Mahabharata

महाभारत से पहले एक और युद्ध हुआ था, जिसे अकेले अर्जुन ने लड़ा था। एक ओर कौरवों की विशाल सेना थी और दूसरी ओर अर्जुन अकेला था। यह युद्ध इतिहास में विराट युद्ध के नाम से विख्यात है। अपने अज्ञात वास के अंतिम दिनों में, अर्जुन ने राजा विराट के लिए यह युद्ध लड़ा, जिनके राज्य में उन्होंने अपना अज्ञातवास बिताया था। यह कौरवों के असत्य पर पांडवों के धर्म की विजय थी। पांडवों की सफलता के कारण दशहरा को विजयदशमी के रूप में भी मनाया जाता है।

इसी देवी के कारण दशहरे का नाम विजयादशमी पड़ा/Dussehra got its name as Vijaya Dashami because of this Goddess.

नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ रूपों का पूजन होता है। लेकिन योगिनियों की पूजा के बिना देवी की पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती। इसलिए विजय नक्षत्र में दशमी तिथि को देवी की योगिनी जया और विजया का  अश्विन नक्षत्र के शुक्ल पक्ष में आगमन होता है। यह दो योगिनियां अजेय हैं; उन्हें कोई परास्त नहीं कर सकता, इसलिए इन्हें अपराजिता के रूप में भी पूजा जाता है। दशमी तिथि पर विजया देवी के पूजन के कारण दशहरे को विजय दशमी कहा जाता है।

यह पर्व प्राचीन काल से मनाया जा रहा है/Festival is being celebrated since ancient times

पुराने समय में राजघन दशहरा विजय उत्सव के रूप में मनाया जाता था। इस दिन, राजा ने देवी से प्रार्थना की और वह यात्रा के लिए चल पड़ा। विजयदशमी के दिन राजाओं ने अपने शासन क्षेत्र का विस्तार करने को दूसरे देशों पर आक्रमण किया।

दशहरा का महत्व/Importance of the day of Dussehra

ऐसी मान्यता है कि यदि दशहरे के दिन अगर कोई नया कार्य प्रारम्भ किया जाता हैं, तो यह अक्सर फायदेमंद साबित होता है, और इस दिन वाहन, आभूषण और अन्य सामान खरीदना भी शुभ माना जाता है; इससे घर में समृद्धि आती है। यही नहीं, इस दिन शिव पूजन करने से बहुत लाभ मिलता है। इस दिन की गयी प्रार्थना से आपको जीत और सफलता  प्राप्त होती है।

दशहरे की पूजन सामग्री/Dussehra Puja Essentials

  • दशहरे की मूर्तियाँ
  • गाय का गोबर, नींबू
  • तिलक, मौली,अक्षत, पुष्प
  • नवरात्रों में उगाई गयी जोँ
  • केले, मूली, ग्वार फली, गुड़
  • खीर, पूड़ी और आपकी पुस्तकें

दशहरा पूजन विधि/Dussehra Puja Vidhi

प्रात:काल स्नान करके गेहूं या चूने से दशहरे की मूर्तियाँ बना लें। इसके बाद गाय के गोबर के नौ गोले बनाएं। अब गाय के गोबर से दो कटोरी बना लें और एक कटोरी में कुछ सिक्के रख दें; दूसरी कटोरी  में रोली, चावल, फल और जौ रखें। इसके पश्चात :

पूजा का प्रारभ जल से करें/Start the Puja with water

रोली, चावल, फूल और जौ चढ़ाएं।

मूर्ति पर केला, मूली, ग्वारफली, गुड़ और चावल अर्पित करें ।

इसके बाद:

मूर्ति को धूप और दीप अर्पण करें और किताबों पर पुष्प, जौ, रोली और चावल भी चढ़ाएं।

यह करने के बाद गाय के गोबर के कटोरे में से सिक्के निकाल कर किसी सुरक्षित स्थान पर रख दें।

ब्राह्मणों और गरीबों को भोजन कराएं, दक्षिणा दें और रावण, दहन के बाद सोन पत्र बांटें और घर के बड़ों और रिश्तेदारों को प्रणाम करें और एक-दूसरे से भेंट करें ।

श्री राम रक्षा स्तोत्र पाठ/Sri Rama Raksha StotraPaath

अगर आप किसी राक्षसी प्रभाव से पीड़ित हैं या कोई अधर्मी आपको सता रहा है तो इस दिन श्री राम रक्षा स्तोत्र का पाठ करें। यदि आपके मन में कोई भय है तो इस दिन बगलामुखी अनुष्ठान करें। आपको लाभ होगा। राम मर्यादा की सीमा हैं, इसलिए उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है । वह शक्ति में विष्णु और क्षमा में पृथ्वी है। वास्तव में, वह साक्षात धर्म की प्रतिमूर्ति है। आज का दिन राम की पूजा के साथ ही उनके चरित्र से कुछ सीखने के लिए शुभ है।

शस्त्र पूजा का महत्व/Importance of Shastra Puja

विजय दशमी पर शत्रु पर विजय पाने के लिए शस्त्र पूजन भी किया जाता है। इस दिन वेदों, गीता और रामायण की पूजा करें क्योंकि यह वह शस्त्र हैं जो आपके आंतरिक और बाहरी शत्रुओं दोनों को परास्त करेंगे। नवरात्र के तुरंत बाद विजयदशमी आती है। इसका दार्शनिक अर्थ है कि नारी पूजा। मातृ शक्ति की पूजा के बिना हम शत्रु पर विजय प्राप्त नहीं कर सकते। विजयदशमी के इस महापर्व पर श्री राम की पूजा करें। श्री रामचरित मानस का अखंड पाठ करें। सीता राम का कीर्तन करें।

इस दिन कई  अन्य पूजाएँ भी की जाती है, जिनका उल्लेख नीचे किया गया है।

सूर्यास्त के बाद जब आकाश में कुछ तारे चमकने लगते हैं, यह समय विजय मुहूर्त कहलाता है। इस समय कोइ भी कार्य अथवा पूजन करने से अनुकूल परिणाम प्राप्त होते हैं। ऐसा कहा जाता है की श्री राम ने रावण को परास्त करने के लिए युद्धनाद इसी मुहूर्त में किया था।

दशहरे को वर्ष के सबसे पवित्र दिनों में से एक माना जाता है।यह समय कोई भी काम प्रारम्भ करने के लिए उपयुक्त है। हालाँकि, कुछ निश्चित मुहूर्त किसी विशेष पूजा के लिए भी उपयुक्त हो सकते हैं।

इस दिन क्षत्रिय, योद्धा और सैनिक शस्त्रों का पूजन करते हैं; इस पूजा को आयुध / शास्त्र पूजा भी कहा जाता है। वह इस दिन शमी-पूजन भी करते हैं। प्राचीन काल में राज परिवार और क्षत्रियों के लिए इस पूजा का विशेष महत्त्व था।

ब्राह्मण इस दिन देवी सरस्वती की पूजा करते हैं

वैश्य अपने बहि-खाते की पूजा करते हैं।

कई  स्थानों पर होने वाली नवरात्रि रामलीला का भी इस दिन समापन होता है।

रावण, कुंभकर्ण और मेघनाथ के पुतले जलाकर भगवान राम की विजय का जश्न मनाया जाता है।

इस दिन मां भगवती जगदम्बा की अपराजिता का जाप करना पवित्र माना जाता है।

पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा बहुत धूम-धाम से मनाई जाती है ।

दशहरे को विजयदशमी या आयुध पूजा के नाम से भी जाना जाता है। यह एक अत्यंत ही शुभ तिथि है। सर्वकार्य सर्वसिद्धि विजय मुहूर्त है। इसलिए कोई भी धार्मिक या नया कार्य इस दिन प्रारम्भ करने से अपार लाभ होता है। वहीं दशहरे पर शस्त्र पूजन भी होता है। साथ ही ऐसे कार्य घर सुख-शांति के साथ-साथ भारी आर्थिक मुनाफे का मार्ग प्रशस्त करते हैं। आइए जानते हैं कौन से हैं वह कार्य :

दशहरे पर शमी की लकड़ी की मीठे दही द्वारा अपराजिता मंत्रों से पूजा करने से सफलता और उन्नति प्राप्त होती है। घर के सदस्यों पर देवी-देवताओं की कृपा बनी रहती है।

दशहरे पर रावण दहन  के उपरान्त आप गुप्त दान भी कर सकते हैं। इस दिन आप किसी ऐसे मंदिर में नई झाड़ू रख सकते हैं जहां आपको कोई देख ना सके। आपके द्वारा किया गया यह दान आपकी धन संबंधी सभी समस्याओं को दूर करेगा।

दशहरे के दिन शमी वृक्ष की पूजा करने की मान्यता है। इस दिन शाम के समय शमी वृक्ष की पूजा करना और उसके नीचे देसी घी का दीप प्रज्ज्वलित करना आपके लिए शुभ रहेगा। माना जाता है कि इससे आपको कानूनी मामलों में सफलता प्राप्त होती है।

धार्मिक मान्यताएं ऐसा कहती हैं कि दशहरे के दिन फिटकरी का टुकड़ा लेकर परिवार के सभी सदस्यों को उसका स्पर्श कराएं। फिर इसे घर की छत पर ले जाकर जहां फेंकना चाहते हैं, उसके विपरीत दिशा में खड़े हो जाएं। फिर इसे अपने इष्टदेव का ध्यान करते हुए फेंक दें। ऐसा करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और समृद्धि आती है। ।

दशहरे के दिन पूजा करने के उपरान्त नौकरी और व्यापार में सफलता पाने के लिए गरीबों में दस फल वितरित करें और ओम विजयाय नमः मंत्र का जाप करें। ऐसा करने से आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी।

ज्योतिषियों के अनुसार रावण दहन के बाद बची हुई लकड़ी को घर में लाकर सुरक्षित स्थान पर रखना चाहिए। इससे घर में नकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश नहीं होता है। साथ ही घर में कोई भी तंत्र-मंत्र नहीं करता। दशहरे के दिन भगवान राम की रावण पर विजय हुई थी। इस दिन नवरात्रि का भी अंत होता है और देवी की प्रतिमा का विसर्जन होता है। इस दिन शस्त्रों की पूजा की जाती है और विजय उत्सव मनाया जाता है। यदि इस दिन कुछ विशेष अनुष्ठान किए जाएं तो भरपूर धन की प्राप्ति हो सकती है।

दशहरे पर किसकी पूजा करनी चाहिए और क्या लाभ होगा?/ Who should be worshipped on Dussehra, and what will be the benefit?

  • इस दिन महिषासुरमर्दिनी मां दुर्गा और भगवान राम की पूजन होना चाहिए।
  • इससे सभी विघ्नों का नाश होगा और जीवन के सभी कार्यों में में विजय प्राप्त होगी।
  • आज अस्त्र-शस्त्रों की पूजा करने से आपकी रक्षा होगी और यह आपको कोइ भी आपको हानि नहीं पहुंचाएंगे।
  • आज देवी की पूजा करके आप कोई नया कार्य प्रारम्भ कर सकते हैं।
  • जब नवग्रह को नियंत्रित रखने की बात आती है तो इसके लिए दशहरा पूजन अद्वितीय होता है।

विजय के लिए कौन से मंत्र का जाप करना चाहिए?/ Which Mantra should be chanted for victory?

"श्रीरामराम, जयरामराम, द्विजयम राममिर्यत।

 त्रयोदशाक्षरो मंत्रः सर्वसिद्धिकारःस्थितः।

नवरात्रि की समाप्ति पर दशहरा मनाएं/Celebrate Dussehra on the culmination of Navaratri

सर्वप्रथम देवी की पूजा करें और तद्पश्चात श्री राम की पूजा करें।

 देवी और श्री राम के मंत्रों का जाप करें।

अगर आपने कलश स्थापना की है तो नारियल को निकाल कर, उसका  प्रसाद के रूप में सेवन करें।

कलश का जल पूरे घर में छिड़कें ताकि नकारात्मकता का नाश हो सके ।

आप अन्य सभी प्रमुख भारतीय पर्वों के लिए भारतीय त्योहारों में ज्योतिष की प्रासंगिकता पर इसी प्रकार  के लेख पढ़ सकते हैं।

दुर्गा विसर्जन
05 Oct, 2022

दुर्गा पूजा उत्सव मां दुर्गा के विसर्जन के साथ समाप्त होता है। दुर्गा विसर्जन मुहूर्त सुबह या दोपहर में शुरू होता है जब विजयादशमी शुरू होती है। इसलिए जब विजयादशमी सुबह या दोपहर में हो तो मां दुर्गा की मूर्ति का विसर्जन करना चाहिए। कई वर्षों से विसर्जन सुबह के समय किया जाता रहा है। हालांकि, मां दुर्गा के विसर्जन के लिए सबसे अच्छा समय तब माना जाता है जब दोपहर में श्रवण नक्षत्र और दशमी तिथि एक साथ आती है। दुर्गा पूजा भारत में एक धार्मिक त्योहार है जिसे दुनिया भर में हिंदू धर्म द्वारा भव्य रूप से मनाया जाता है। दुर्गा पूजा नौ दिनों तक चलती है, और कुछ लोग इसे पांच या सात दिनों तक मनाते हैं। लोग षष्ठी को दुर्गा देवी की मूर्ति की पूजा शुरू करते हैं और दशमी पर मां दुर्गा के विसर्जन के साथ इसे समाप्त करते हैं। दुर्गा पूजा को दुर्गा उत्सव या नवरात्रि के नाम से भी जाना जाता है। 

दुर्गा पूजा का त्योहार व्यापक रूप से असम, उड़ीसा, बंगाल, झारखंड, मणिपुर और त्रिपुरा, में मनाया जाता है। बंगाल के अलावा, दुर्गा पूजा दिल्ली, उत्तर प्रदेश, गुजरात, पंजाब, महाराष्ट्र, आदि भारत में नवरात्रि पूजा के नाम से मनाई जाती है। दुर्गा पूजा या नवरात्रि पूजा साल में दो बार चैत्र और अश्विन के महीने में मनाई जाती है। दुर्गा पूजा एक महत्वपूर्ण हिंदू त्योहार है जिसका धार्मिक, दार्शनिक, सांस्कृतिक और सांसारिक महत्व है। लोग षष्ठी से मां दुर्गा की पूजा शुरू करते हैं और दशमी को समाप्त करते हैं। इन दिनों सभी मंदिरों को सजाया जाता है, और पूरा माहौल भक्तिमय और पवित्र हो जाता है। कुछ लोग अपने घरों में सभी व्यवस्थाओं के साथ मां दुर्गा के सभी नौ रूपों की पूजा करते हैं और उपवास रखते हैं। हम दुर्गा पूजा के रूप में नारी शक्ति की पूजा करते हैं। इस त्योहार के दौरान कई जगहों पर मेलों का आयोजन किया जाता है।

नवरात्रि के दौरान दुर्गा विसर्जन का क्या महत्व है?

हमारी सनातन परंपरा में विसर्जन का विशेष महत्व है। विसर्जन का अर्थ है पूर्णता, जीवन की पूर्णता, आध्यात्मिक ध्यान, या प्रकृति। जब कोई संस्था पूर्णता प्राप्त कर लेती है, तो उसे अनिवार्य रूप से विसर्जित कर दिया जाना चाहिए, या उसका विसर्जन करना होगा।

 आध्यात्मिक क्षेत्र में, विसर्जन अंत के लिए नहीं बल्कि पूर्णता के लिए खड़ा है। मां दुर्गा के विसर्जन के पीछे यही एकमात्र मुख्य कारण है। शारदीय नवरात्र शुरू होते ही हम देवी की मूर्ति बनाते हैं और फिर उसे कपड़े और आभूषणों से सजाते हैं। हम एक ही मूर्ति की नौ दिनों तक पूरी श्रद्धा से पूजा करते हैं और फिर एक दिन उसका विसर्जन करते हैं।

हमारे सनातन धर्म में ही विसर्जन की परंपरा का पालन किया जाता है। इस परंपरा में बहुत साहस शामिल है। सनातन धर्म मानता है कि एक रूप केवल शुरुआत है, और पूर्णता हमेशा निराकार होती है। यहाँ निराकार का अर्थ निराकार नहीं, सर्वव्यापी रूप होने में है। निराकार का अर्थ है कि ब्रह्मांड के सभी रूप एक ईश्वर के हैं।

निराकार होने का अर्थ एक रूप तक सीमित होना नहीं है, बल्कि सभी रूपों का प्रतिनिधित्व करना है। जब कोई भक्त आध्यात्मिक ध्यान को पूरा करता है, तब वह किसी भी रूप या कर्मकांड से परे चला जाता है। इसलिए, सभी महान लोगों ने कहा है, "छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिला के।"

नवरात्रि के नौ दिन इस बात का प्रतीक हैं कि हमें खुद को एक रूप की पूजा करने तक सीमित नहीं रखना चाहिए। इसके बजाय, हमें अपना आध्यात्मिक ध्यान पूरा करना चाहिए, अपने देवता को विसर्जित करना चाहिए ताकि वह निराकार हो सके। जब भक्त ऐसी निराकार अवस्था को प्राप्त कर लेता है, तब वह पूरे ब्रह्मांड में इसका साक्षी होता है। आप इस निराकार को कोई भी नामकरण दे सकते हैं। उसकी निराकारता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। अध्यात्म के इस पड़ाव पर हमें सर्व खलिविदं ब्रह्म की याद आती है; यही ईश्वर का एकमात्र सत्य है।

दुर्गा पूजा की शुरुआत कैसे हुई? दुर्गा पूजा का इतिहास

१७वीं और १८वीं शताब्दी में, जमींदारों और अमीर लोगों ने बड़े पैमाने पर दुर्गा पूजा का आयोजन किया, जहाँ सभी लोग एक छत के नीचे देवी दुर्गा की पूजा करने के लिए एकत्रित हुए। उदाहरण के लिए, अचला पूजा कोलकाता में बहुत प्रसिद्ध है, जिसकी शुरुआत जमींदार लक्ष्मीकांत मजूमदार ने 1610 में कोलकाता के शोभा बाजार, छोटी राजबाड़ी के 33 राजा नबकृष्ण रोड से की थी, जो मुख्य रूप से 1757 में शुरू हुई थी। इतना ही नहीं, माँ दुर्गा की मूर्ति का इस्तेमाल किया गया था। बंगाल के बाहर पंडालों में स्थापित किया जाता था, और उसकी भव्य पूजा की जाती थी।

दुर्गा पूजा से जुड़े मिथक

ऐसा माना जाता है कि देवी दुर्गा ने इसी दिन महिषासुर नाम के राक्षस का वध किया था, जो भगवान ब्रह्मा का वरदान पाकर बहुत शक्तिशाली हो गया था। भगवान ब्रम्हा ने महिषासुर को वरदान दिया कि कोई भी देवता या दानव उसे हरा नहीं सकते। इस वरदान को प्राप्त करने के बाद, उसने स्वर्ग में देवताओं को परेशान करना शुरू कर दिया और पृथ्वी पर भी लोगों को आतंकित किया। उसने स्वर्ग में एक यादृच्छिक हमला किया और इंद्र को हरा दिया, और स्वर्ग पर शासन करना शुरू कर दिया। सभी देवता चिंतित हो गए और मदद के लिए त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास पहुंचे। सभी देवताओं ने उसे हराने के लिए एक साथ युद्ध किया लेकिन व्यर्थ। जब कोई समाधान नहीं निकला, तब त्रिमूर्ति ने देवी दुर्गा को उसके विनाश के लिए बनाया। उन्हें शक्ति और पार्वती के नाम से भी जाना जाता है। देवी दुर्गा ने महिषासुर से नौ दिनों तक युद्ध किया और दसवें दिन उनका वध किया। इस अवसर पर, हिंदू दुर्गा पूजा का त्योहार मनाते हैं, और दसवें दिन को विजयदशमी के रूप में जाना जाता है।

दुर्गा पूजा सभी बुराईयों को दूर करने के लिए सारी शक्ति एकत्रित करने की इच्छा का उत्सव है। लोगों का मानना है कि देवी दुर्गा उन्हें आशीर्वाद देंगी और उन्हें सभी समस्याओं और नकारात्मक ऊर्जा से दूर रखेंगी। हिंदू धर्म के हर त्योहार के पीछे कोई न कोई सामाजिक कारण होता है। दुर्गा पूजा एक ऐसा त्योहार है जो हमारे जीवन को सकारात्मक ऊर्जा और खुशियों से भरने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

विसर्जन का अनुष्ठान

  • कन्या पूजन के बाद हथेली में एक फूल और कुछ चावल के दाने लेकर संकल्प लें।
  • पात्र में रखे नारियल को प्रसाद के रूप में ही लें और परिवार को अर्पित करें।
  • पात्र के पवित्र जल को पूरे घर में छिड़कें और फिर पूरे परिवार को प्रसाद के रूप में इसका सेवन करना चाहिए।
  • सिक्कों को एक कटोरी में रखो ; आप इन सिक्कों को अपने बचत स्थान में भी रख सकते हैं।
  • परिवार में सुपारी को प्रसाद के रूप में बांटें।
  • अब घर में माता की चौकी का आयोजन करें और सिंघासन को अपने मंदिर में रखें।
  • घर की महिलाएं साड़ियों और गहनों आदि का प्रयोग कर सकती हैं।
  • घर के मंदिर में श्री गणेश जी की मूर्ति को उनके स्थान पर स्थापित करें।
  • परिवार में सभी फल और मिठाइयां प्रसाद के रूप में बांटें।
  • चावल को चौकी और कलश  के ढक्कन पर रखें । उन्हें पक्षियों को अर्पित करें।
  • मां दुर्गा की मूर्ति या फोटो के सामने झुकें और उनका आशीर्वाद लें। इसके अलावा, उस कलश  का आशीर्वाद लें जिसमें आपने ज्वार और अन्य पूजा की आवश्यक चीजें बोई थीं। फिर किसी नदी, सरोवर या समुद्र में विसर्जन का अनुष्ठान करें।
  • विसर्जन के बाद एक ब्राह्मण को एक नारियल, दक्षिणा और चौकी के कपड़े दें।
  • विसर्जन करते समय इन बातों का  ध्यान रखें|
  • किसी नदी या सरोवर में विसर्जन करना बहुत शुभ माना जाता है। माता की मूर्ति, पात्र या जवार को पूरे विश्वास के साथ विसर्जित करें। पूजा के सभी आवश्यक सामानों को भी पवित्र जल में विसर्जित कर देना चाहिए।
  • विसर्जन के लिए मां दुर्गा की मूर्ति का उसी तरह ख्याल रखें जैसे आपने मां दुर्गा को लाते समय उनकी देखभाल की थी। विसर्जन से पहले मां दुर्गा की मूर्ति को कोई नुकसान नहीं होना चाहिए। मां दुर्गा के विसर्जन से पहले उचित आरती की जानी चाहिए।
  • आरती के दिव्य प्रकाश को मां दुर्गा की कृपा और शुद्ध प्रसाद के रूप में ग्रहण करना चाहिए। विसर्जन के बाद ब्राह्मण को नारियल, दक्षिणा और चौकी के कपड़े दान करना शुभ माना जाता है।

हम क्यों करते हैं मां दुर्गा का विसर्जन

ऐसा माना जाता है कि बेटी पराया धन होती है। उसे अपने मायके छोड़कर अपने पति के साथ उसके घर में रहने के लिए जाना पड़ता है, जो कि उसका ससुराल है। शादी के बाद बेटियां मेहमान की तरह मायके आती हैं। यह एक प्राचीन परंपरा है। माँ दुर्गा भी इस धरती पर अपने मायके और अपने बच्चों के पास जाती हैं, और कुछ दिन बिताने के बाद, वह वापस भगवान शिव के पास अपने ससुराल जाती हैं।

बारिश के बाद सितंबर और अक्टूबर में फसल कटाई के लिए तैयार हो जाती है। किसान उपज को अपने घरों में लाकर और उन्हें संग्रह करने के लिए कारखानों की सफाई करके अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को पूरा करते हैं। इस मौके पर किसानों की पत्नियां अपने बच्चों के साथ अपने मायके जाती हैं, कुछ खुशनुमा पल बिताती हैं और अपने ससुराल लौट जाती हैं। महिलाओं को आशीर्वाद और सद्भावना के साथ मायके से वापस भेज दिया जाता है।

इसी तरह, अपने बच्चों, कार्तिक और गणेश के साथ, लक्ष्मी, सरस्वती, माँ दुर्गा पृथ्वी पर चार दिन बिताने के लिए अपने घर आती हैं, और फिर वह अपने ससुराल भगवान शिव के पास जाती हैं। इस क्षण को विसर्जन के रूप में मनाया जाता है जिसमें भक्त परंपरा के अनुसार मूर्ति का विसर्जन करते हैं। विसर्जन से पहले मां दुर्गा का पूरा श्रृंगार होता है। महिलाएं एक दूसरे की मांग और चूड़ा पर सिंदूर लगाती हैं जो समृद्धि का प्रतीक है।

बंगाल में इस पर्व का विशेष महत्व है, जहां इसे सिंदूरखेला कहा जाता है। यह सिंदूर पति की लंबी उम्र का प्रतीक है। इस  अनुष्ठान से खुशी का माहौल बनाता है और फिर कुछ समय बाद मां दुर्गा के विसर्जन के समय हर कोई भावुक हो जाता है। पंडाल का माहौल अचानक बदल जाता है, और हर कोई माँ दुर्गा के जाने के गीत गाता है, "मा छोलेचे सोशूर बारी", जिसका अर्थ है माँ दुर्गा अपने ससुराल की ओर बढ़ रही हैं। वह आने वाले वर्ष में फिर से हमसे मिलने आएगी। उसे विसर्जन की प्रक्रिया के माध्यम से उसके ससुराल भेज दिया जाता है।

सिंदूर खेला

दुर्गा पूजा के दौरान सिंदूर खेला, पश्चिम बंगाल में मनाया जाने वाला एक अनूठा अनुष्ठान है। विजयदशमी पर दुर्गा विसर्जन से पहले सिंदूर खेला की रस्म निभाई जाती है। इस मौके पर विवाहित महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं और एक-दूसरे की सलामती की कामना करती हैं। सिंदूर उत्सव को सिंदूर खेला के नाम से भी जाना जाता है।

सोनागाछी की मिट्टी से क्यों बनाई जाती है मां दुर्गा की मूर्ति?

भारत त्यौहारों का देश है। हर प्रांत के अपने त्योहार होते हैं। दुर्गा पूजा एक ऐसा त्योहार है जो बंगाल में रहने वाले सभी लोगों को ऊर्जा और उत्साह से भर देता है।दुर्गा पूजा बंगालियों का एक अनिवार्य त्योहार है। यह पर्व चार दिनों तक चलता है। तैयारी पहले से शुरू हो जाती है। त्योहार के दौरान, पंडालों की स्थापना की जाती है, और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की व्यवस्था की जाती है। लोग नए कपड़े खरीदते हैं। बंगाल में दुर्गा पूजा सदियों से महत्वपूर्ण रही है। अठारहवीं शताब्दी में जब हमारे देश पर कब्जा किया गया था, तब भी जबलपुर में दुर्गा पूजा मनाई जाती थी।

महालय के दिन से हर बंगाली घर में चांदीपथ का मंत्र बजाया जाता है। रेडियो पर चांदीपथ सुनने की प्रथा आज भी कोलकाता में प्रचलित है। चांदीपथ को बीरेंद्र कृष्ण भद्र ने गाया है जिसमें वह महिषासुर मर्दिनी की कहानी को संस्कृत और बंगला मंत्रों के रूप में मधुर और लयबद्ध रूप से सुनाते हैं। आज वह जीवित नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज अमर है।

दुर्गा पूजा कितनी ही पवित्रता से मनाई जाए, मां दुर्गा की मूर्ति को सोनागाछी की मिट्टी से ही स्वरूप मिलता है।

दुर्गा माँ ने एक धर्मनिष्ठ वेश्या को वरदान दिया कि उसकी मूर्ति उसके हाथ से प्रदान की गई गंगा की चिकनी मिट्टी से बनेगी। उन्होंने  महिला को सामाजिक अपमान से बचाने के लिए ऐसा किया। तभी से सोनागाछी की मिट्टी से देवी की मूर्ति बनाने की परंपरा शुरू हो गई।

महालय के दिन मां दुर्गा की अपूर्ण रूप से बनी प्रतिमा में ऑंखें बनायीं जाती हैं। इस दिन लोग अपने मृत रिश्तेदारों को तर्पण चढ़ाते हैं और उसके बाद ही देवी पक्ष शुरू होता है। माँ दुर्गा अपने ससुराल और पति शिव के घर कैलाश को छोड़कर दस दिनों के लिए गणेश, कार्तिकेय, लक्ष्मी और सरस्वती के साथ पृथ्वी पर अपने घर चली जाती हैं।

लोग यह जानने के लिए ग्रहों और सितारों की स्थिति का निरीक्षण करते हैं कि माँ दुर्गा पृथ्वी की ओर कैसे चल रही हैं। यदि वह हाथी पर सवार होकर आती है, तो पृथ्वी पर मनुष्यों के जीवन के साथ-साथ खुशियाँ फैलाते हुए खेती धन्य हो जाती है। अगर वह घोड़े पर बैठ कर आती है, तो बारिश नहीं होती है और सूखा पड़ता है|यदि वह झूले पर आती है, तो यह चारों ओर फैली बीमारियों का प्रतीक है, और यदि वह नाव पर आती है, तो ऐसा माना जाता है कि बारिश अच्छी होगी, फसल अच्छी होगी, नए साल का आगमन भी अच्छा होगा, पृथ्वी के चारों ओर खुशी होगी।

छठे दिन दुर्गा की मूर्ति को पंडाल में लाया जाता है। बंगाल का कुमारतुली दुर्गा की सुंदर मूर्तियाँ बनाने के लिए प्रसिद्ध है, जहाँ इन मूर्तियों को मिट्टी से बनाया जाता है। कोलकाता में दुर्गा पूजा में लगभग 95 प्रतिशत मूर्तियाँ कुमारतुली से आती हैं। इन मूर्तियों को बनाने के लिए पहले लकड़ी के ढांचे पर जूट बांधकर एक फ्रेम तैयार किया जाता है और फिर मिट्टी में धान मिलाकर मूर्ति तैयार की जाती है। फिर मूर्ति को गहनों और कपड़ों से सजाया जाता है।

न केवल दुर्गा की मूर्ति, बल्कि पंडाल भी बहुत खूबसूरती से बनाए जाते हैं। कोलकाता में अमृतसर का स्वर्ण मंदिर बांस और कपड़े से बना है। दुर्गा पंडाल पेरिस में एफिल टॉवर की तरह भव्य दिखता है। पंडालों की रोशनी से पूरा शहर दुल्हन की तरह जगमगाता और खूबसूरत नजर आता है।

षष्ठी की शाम को बोधों की रस्म के साथ दुर्गा के मुंह से कपडा हटा दिया जाता है। फिर महाशष्टी की सुबह महिलाएं लाल किनारी वाली साड़ी पहनकर पूजा करती हैं। महाष्टमी के दिन का अपना महत्व है। संधि पूजा अष्टमी को होती है।

इसका अपना शुभ मुहूर्त होता है और उस समय यज्ञ किया जाता है। 

पुराने समय में लोग बकरे की बलि चढ़ाते थे, लेकिन यह प्रथा अब नहीं देखी जाती है। कहीं-कहीं किसी फल या कद्दू आदि की कुर्बानी भी दी जाती है। लोग निर्जला व्रत का पालन कर संधि के बीच 108 दीये जलाते हैं। ऐसा लगता है जैसे कुछ देर के लिए पूरा ब्रह्मांड खामोश हो जाता है। ऐसा माना जाता है कि संधि के दौरान मां दुर्गा की मूर्ति जीवित हो जाती है।

धुनुची नृत्य बंगाल में किया जाता है। ढुंची मिट्टी से बना एक बड़े बर्तन में दिया सजाया जाता है। सुगंधित धुनों के साथ इन बर्तनों में नारियल के छिलकों को जलाया जाता है। फिर, इन बर्तनों को हाथों में पकड़कर माँ दुर्गा के सामने नृत्य किया जाता है। लोग 4-5 धुनुची को एक साथ ले जाते हैं और गिरती आग के बीच नृत्य करते हैं।

दशमी की सुबह विवाहित महिलाएं मां दुर्गा की मूर्ति पर सिंदूर लगाने के लिए पंडाल आती हैं और होली की तरह सिंदूर से खेलती हैं। इसे सिंदूरखेला कहते हैं। मंत्र जाप से मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। विसर्जन के समय ऐसा लगता है मानो प्यारी बेटी मां दुर्गा अपने मायके से ससुराल जा रही हैं। दशहरे के दिन छोटे लोग परिवार के बड़े सदस्यों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लेते हैं। एक दूसरे को मिठाई खिलाते हैं। लोग एक-दूसरे से मिलने और बधाई देने के लिए एक-दूसरे के घर जाते हैं। और, इस तरह दुर्गा पूजा का त्यौहार पूरा होता है और मनाया जाता है।

आप अन्य सभी प्रमुख भारतीय त्योहारों के लिए भारतीय त्योहारों में ज्योतिष की प्रासंगिकता पर इसी तरह के लेख पढ़ सकते हैं।

करवा चौथ
13 Oct, 2022

करवा चौथ/Karva chauth दो शब्दों से मिलकर बना है, 'करवा' जिसका अर्थ है मिट्टी का बरतन और 'चौथ' का अर्थ है महीने का चौथा दिन। इस दिन मिट्टी का बरतन या करवे को अत्यधिक महत्व दिया जाता है। विवाहित महिलाएं साल भर इस दिन का इंतजार करती हैं। यह दिन दंपतियों के एक-दूसरे के प्रति प्रेम, स्नेह और सम्मान के लिए मनाया जाता है। अतः, इस दिन महिलाएं भक्ति और समर्पण के साथ परंपराओं और रीति-रिवाजों का पालन करती हैं।

उपवास का दिन/ FASTING ON THIS DAY

यह त्योहार कृष्ण पक्ष के चौथे दिन या 'चतुर्थी'/ Krishna Paksha को मनाया जाता है। महिलाएं इस दिन को अपने पति के लिए व्रत रखकर मनाती हैं। भारतीय महिलाएं इसे बहुत खुशी के साथ मनाती हैं। आजकल इसे विश्व स्तर पर मनाने का चलन हो गया है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, यह दिन 'पूर्णिमा' के चार दिन बाद मनाया जाता है। यह ज्यादातर अक्टूबर या नवंबर में होता है।

उपवास या व्रत करने की परंपरा का सभी विवाहित महिलाओं द्वारा पालन किया जाता है जिसमें महिलाओं द्वारा भगवान गणेश से, अपने जीवनसाथी की स्वस्थ और लंबी उम्र के लिए प्रार्थना की जाती है। हालांकि,  ज्यादातर इसे विवाहित महिलाओं द्वारा मनाया जाता है, लेकिन भारत के कुछ क्षेत्रों में ऐसा माना जाता है कि अविवाहिताओं को अपने भावी पति के लिए उपवास रखना चाहिए।

आसमान में चंद्र दर्शन किए बिना, कुछ भी न खाने-पीने के कठोर नियम का पालन करते हुए, विवाहित महिलाओं द्वारा करवा चौथ/ Karwa chauth का व्रत रखा जाता है। चंद्रोदय के बाद, भगवान शिव की उनके संपूर्ण परिवार सहित पूजा करके महिलाएं भोजन ग्रहण कर सकती हैं।

महिलाओं द्वारा मिट्टी के बर्तन/ करवा में जल भरकर चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। ब्राह्मण और अन्य विवाहित महिलाओं द्वारा जरूरतमंदों को दान देने की परंपरा है। यह पर्व ज्यादातर उत्तर भारतीयों द्वारा मनाया जाता है। करवा चौथ/Karwa chauth 2021 के ठीक चार दिन बाद, अहोई अष्टमी के दिन माताओं द्वारा अपने पुत्रों के लिए उपवास किया जाता है।

करवा चौथ संबंधित रीति-रिवाज / RITUALS OF KARVA CHAUTH

महिलाओं का पर्व होने के कारण, उन सभी के द्वारा उत्साहपूर्वक इस दिन की पहले से ही तैयारियां शुरू कर दी जाती हैं। कुछ महिलाओं द्वारा साड़ी-लहंगे, मेकअप, झुमके, हार, विभिन्न आभूषण और पूजा का सामान  नया खरीदा जाता है और कुछ महिलाओं द्वारा अपनी शादी की चीजों का प्रयोग किया जाता है। महिलाएं अपने हाथों को हिना के विभिन्न डिजाइनों से सजाती हैं, जिसे 'मेहंदी' भी कहा जाता है।

पूरा दिन उपवास होने के कारण, पंजाब जैसे क्षेत्रों में, महिलाएं प्रातः काल 4:00 बजे से पहले जागकर   खाती-पीती हैं। उत्तर प्रदेश में, पूर्व संध्या को महिलाओं द्वारा दूध से बनी फरनी को रस्म के तौर खाया जाता है।

पंजाब में, महिलाओं को अपनी सास से सजावटी सामान, मिठाई, साड़ी और अन्य महिला संबंधित सामान सरघी/ sarghi के तौर पर दिए जाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि जब कोई महिला अपना पहला करवा चौथ/Karwa chauth रखती है, तो उसकी सास द्वारा उसे सरघी दी जाती है। सरघी नवविवाहिताओं द्वारा, संपूर्ण जीवन अपनी सास के रीति-रिवाजों और परंपराओं का सम्मानपूर्वक पालन करने का प्रतीक होती है।

सूर्योदय से व्रत की शुरुआत होती है तथा महिलाओं द्वारा सामान्य रूप से कार्य करके या मित्रों के साथ अपना दिन व्यतीत किया जाता है। साथ ही, महिलाओं को पतियों और माता-पिता द्वारा भी उपहार दिए जाते हैं।  

शाम को, महिलाओं द्वारा सुंदर पोशाकें पहनकर, अन्य महिलाओं के साथ इस त्यौहार का आनंद लिया जाता है और समर्पित भाव से "पूजा-थाली" को सजा कर करवा चौथ की कथा सुनी जाती है। 

उत्तर प्रदेश और बिहार जैसी जगहों पर, महिलाएं अपनी थालियां सजा कर अन्य महिलाओं के समूहों में बैठती हैं, जहां वरिष्ठ महिलाओं या पुजारी द्वारा करवा चौथ कथा का पाठ किया जाता है। ऐसे समूहों में महिलाओं द्वारा अपनी थालियों को एक-दूसरे के साथ, सात बार बदल कर कथा पाठ किया जाता है।

समूहों में पहली छ: फेरियों में गाया जाता है- "वीरों कुण्डियॉ करवा, सर्व सुहागन करवा, कात्ती नाया तेरी ना, कुम्भ चकरा फेरी ना, आर पेअर पायेन ना, रुठदा मानियेन ना, सुथरा जगायेन ना,वे वीरों कुरिये करवा, वे सर्व सुहागन करवा"। जबकि सातवीं फेरी में गाया जाता है- "वीरों कुण्डियॉ करवा, सर्व सुहागन करवा, कात्ती नाया तेरी नी, कुम्भ चकरा फेरी भी, आर पेअर पायेन भी, रुठदा मानियेन भी, सुथरा जगायेन भी, वे वीरों कुरिये करवा, वे सर्व सुहागन करवा"।

राजस्थान में, परंपरानुसार एक महिला द्वारा अन्य महिलाओं "धापी की न धापी" पूछे जाने पर, अन्य महिलाओं द्वारा "जल से धापी, सुहाग से ना धापी" जवाब दिया जाता है।

उत्तर प्रदेश के अन्य स्थानों में भी गौर माता की पूजा की जाती है। महिलाएं अपने हाथों में मिट्टी लेकर उस पर थोड़ा पानी छिड़ककर, गौर माता की प्रतिमा बनाकर, उस पर कुमकुम लगाती हैं। अपनी थालियों का आदान-प्रदान करते हुए उनके द्वारा ये गाया जाता है- "सदा सुहागन करवा लो, पति की प्यारी करवा लो, सात बहनों की बहन करवा लो, व्रत करनी करवा लो, सास की प्यारी करवा लो"।

पूजा के बाद, उनके द्वारा अपनी सास और भाभी को हलवा, पूरी, नमकीन आदि प्रसाद स्वरूप दिया जाता है। 

इस रस्म के बाद महिलाएं बेसब्री से चांद का इंतजार करती हैं। आखिरकार चंद्रोदय होने पर, महिलाओं द्वारा अपने पति के साथ घर के बाहर या छत पर चंद्रमा के स्पष्ट प्रतिबिंब को देखने के लिए छलनी और जल से भरा गिलास ले जाया जाता है तथा चंद्रमा का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए अर्घ्य देकर पूजन किया जाता है और चंद्रमा के समान ही अपने पतियों की सम्मान और भक्ति के साथ पूजा की जाती है।  

इसके साथ ही, उनका उपवास समाप्त होता है। पतियों द्वारा पानी, भोजन, और मिठाई खिलाने के बाद, आखिरकार महिलाओं द्वारा भोजन किया जाता है। 

करवा चौथ का आधुनिकीकरण / MODERN DAY KARVA CHAUTH

उत्तर भारत में, आज के समय में इस शुभ दिन की संस्कृति और परम्पराओं में बदलाव आ गया है। 

आजकल इस दिन का महत्व दंपत्तियों के बीच प्रेम और स्नेह को दर्शाने के कारण, रोमांटिक माना जाने लगा है जिसका एक बड़ा कारण दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे या कभी खुशी कभी गम जैसी हिंदी फिल्में हैं जिनमें इस पर्व पर दंपत्तियों के दूर होने पर  गीत और नृत्य द्वारा एक-दूसरे के प्रति प्रेम प्रदर्शित किया जाता है। आजकल, यह दिन अविवाहित महिलाओं द्वारा प्रेम की निशानी के रूप में अपने मंगेतर या भावी पति के लिए मनाया जाने लगा है। 

करवा चौथ की पारंपरिक लोक कथा / The Traditional Folk Tale of Karva Chauth

एक बार की बात है, सात भाइयों की बहन राजकुमारी वीरवती विवाह के उपरांत,वफ अपने पहले करवा चौथ पर माता-पिता और भाइयों के साथ रहने के लिए घर वापस आई थी। पूरे दिन निर्जल उपवास करने के कारण, शाम को तबीयत खराब होने और बीमार महसूस करने पर, उसके भाइयों ने चिंतित होकर उसे कुछ खाने की सलाह दी। लेकिन वह अपने पति के लिए व्रत रखने पर अडिग रही इसलिए उसके भाइयों ने पवित्र 'पीपल के पेड़' के शीर्ष पर चंद्रमा का नकली प्रतिबिंब बनाया, जिसे सरलतापूर्वक चंद्रमा का वास्तविक प्रतिबिंब मानकर उसने अपना उपवास तोड़ दिया। तभी  अपने पति के निधन की बात पता चलने पर वह उसे सह नहीं सकी और बेकाबू होकर रोने लगी। जब उसे भाभी से, उसकी हालत से चिंतित होकर भाइयों द्वारा चांद का नकली प्रतिबिंब बनाने की बात पता चली तो इस असहनीय दर्द से उसका दिल टूट गया। इस पर उसके सामने 'देवी शक्ति' ने प्रकट होकर रोने का कारण पूछने पर उसने पूरी कहानी सुना दी। तब देवी ने उसे अगले दिन फिर से उपवास रखने का आदेश देकर कहा, यदि वह सफलतापूर्वक ऐसा करेगी, तो यमराज उसके पति को वापस कर देंगें।

यह भी माना जाता है कि उसके भाइयों ने पहाड़ के पीछे आग लगाकर उसे बताया कि यह चंद्रमा की चमक है। इस बात से आश्वस्त होने के परिणामस्वरूप उसने अपना व्रत तोड़ दिया। फिर जब उसे अपने पति की मौत का पता चला तो वह  घर की तरफ दौड़ी। मार्ग में उसने शिव-पार्वती को देखा और उन्हें अपनी कहानी सुनाई। उन्होंने उसे पति को वापस पाने के लिए फिर से उपवास रखने की सलाह दी। उसने वैसा ही किया और अपने पति को वापस पा लिया।

करवा चौथ की अन्य कथा / ANOTHER STORY ON KARVA CHAUTH

एक बार की बात है, पति के प्रति पूर्ण समर्पित करवा नाम की एक महिला थी। इस समर्पण और भक्ति के कारण, उसे एक आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त  थी। एक दिन झील में नहाते समय उसके पति को  एक मगरमच्छ ने पकड़ लिया। करवा ने अपने पति को घातक उभयचर से छुड़ाने के लिए सूती धागे का इस्तेमाल करके यम से उस मगरमच्छ को नरक में फेंकने के लिए कहा। यम मगरमच्छ के साथ ऐसा नहीं करना चाहता था, लेकिन स्त्री की आध्यात्मिक शक्तियों से श्राप मिलने की संभावना के कारण उनके पास अन्य कोई विकल्प नहीं था। इसके बजाय वह स्वयं अपने और अपने पति को लंबा जीवन दे सकती थी। इस दिन के बाद से, सभी विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पति के स्वस्थ और लंबे जीवन के लिए करवा चौथ/ Karwa chauth मनाया जाता है।  उनका विश्वास है कि यह उनके पति की रक्षा करता है।

करवा चौथ विधि / KARVA CHAUTH METHOD

पूजन शुरू होने से पहले, गणेश जी, अंबिका गौरी मां, श्री नंदीश्वर, मां पार्वती, भगवान शिव और श्री कार्तिकेय की प्रतिमाएं तथा बर्तन, दीपक, कपूर, काजल, चंदन, फल, मिठाई, घी का दीया, धूप आदि पूजन सामग्री का होना आवश्यक होता है।

सांयकाल, महिलाएं पोशाकें पहनकर अपने मित्रों या रिश्तेदारों के यहां जाती हैं, जहां महिलाओं द्वारा एक साथ बैठकर कथा सुनी जाती है। ज्यादातर कथा किसी बुजुर्ग महिला या पुजारी द्वारा कहीं जाती है।

भगवान गणेश के प्रतिबिंब स्वरुप बीच में गेहूँ से भरा मिट्टी का बर्तन स्थापित करके, एक बर्तन में जल और कुछ फल माता पार्वती की प्रतिमा के पास रखे जाते हैं, जिसके चारों ओर मिठाई, मट्ठी, फल और खाद्यान्न रखे होते हैं।

कथा सुनाने वाली महिला के लिए भी कुछ चीजें तोहफे के रूप में दी जाती हैं।

पहले, गौरी माता की प्रतिमा तैयार करने के लिए मिट्टी और गाय के गोबर का इस्तेमाल किया जाता था लेकिन आजकल ज्यादातर महिलाओं द्वारा धातु या कागज की मूर्ति पसंद की जाती है। कथा सुनने से पहले, महिलाओं द्वारा थालियों में दीया जलाया जाता है तथा सुंदर कपड़े पहनकर सिर पर  दुपट्टा ओढा जाता है। विवाहित महिलाएं दुपट्टा ओढ़ती हैं। देवी-देवताओं का आशीर्वाद पाने के लिए उनका पूजन किया जाता है तथा समूहों में एक साथ कथा/Karva Chauth Katha गाकर, अपनी थाली को सात बार घुमाकर फरनी नामक क्रिया की जाती है। इस कार्यक्रम के बाद, घर और पड़ोस के सभी बड़ों से आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है।

सरघी क्या है?/ WHAT IS SARGI?

सरघी एक विशेष आहार होता है जो महिलाओं को उनकी सास द्वारा दिया जाता है। ऐसा माना जाता है कि महिलाओं को सूर्योदय से पूर्व प्रातः काल चार या पांच बजे सरघी का सेवन करना चाहिए। सास के न होने की स्थिति में परिवार की बुजुर्ग महिला द्वारा सरघी दी जा सकती है। सरघी में काजू, बादाम, किशमिश, फल, मिठाई, सेवइयां जैसी  विभिन्न खाद्य सामग्री होती हैं जिनके सेवन से बिना कुछ खाए-पिए पूरा दिन बिताने की शक्ति मिलती है।

मेहंदी का क्या महत्व होता है?/ WHAT IS THE IMPORTANCE OF MEHNDI?

मेहंदी सौभाग्य का प्रतीक होती है। भारत में, यह माना जाता है कि मेहंदी जितनी गहरी रचेगी, पति और ससुराल पक्ष से उतना ही अधिक प्रेम मिलेगा। यह भी कहा जाता है कि मेहंदी का गहरा रंग पति के स्वस्थ और लंबे जीवन का प्रतीक होता है। त्योहारों के दौरान, मेहंदी के स्टॉल्स पर महिलाओं के पहुंचने से, मेहंदी का कारोबार बढ़ रहा है। करवा चौथ के दौरान, मेहंदी स्टाल के आस पास हमेशा भीड़ देखने को मिलती है

अहोई अष्टमी
17 Oct, 2022

अहोई अष्टमी का व्रत/Ahoi Ashtami Vrat कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन देवी अहोई की पूजा की जाती है। इस दिन महिलाएं अपने बच्चों की सुरक्षा और लंबी आयु के लिए उपवास रखती हैं। यह उपवास उन लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण है जिन्हें बच्चों की चाह होती है लेकिन वह जन्म देने में सक्षम नहीं होते हैं। यह व्रत उन लोगों के लिए भी लाभकारी साबित हो सकता है जिनके बच्चों की उम्र लंबी नहीं होती या जिनके बच्चे गर्भ में ही खत्म हो जाते हैं। आम तौर पर इस दिन का बच्चों को लेकर विशेष महत्व होता है तो यह दिन बच्चे की प्रगति और कल्याण में सहायक होता है। यह उपवास बच्चों की लंबी आयु और सौभाग्य के लिए है।

अहोई अष्टमी का व्रत/Ahoi Ashtami Vrat करवा चौथ के चार दिन बाद और दीपावली पूजा के आठ दिन पहले पड़ता है। करवा चौथ की तुलना में उत्तर भारत में अहोई अष्टमी अधिक प्रसिद्ध है। अहोई अष्टमी को अहोई अंते के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यह उपवास अष्टमी तिथि को मनाया जाता है और यह महीने का आठवां दिन होता है।

इस दिन महिलाएं देवी अहोई जो पार्वती का रूप की पूजा करती हैं और अपने बच्चों की लंबी उम्र की कामना करती हैं। जैसे करवा चौथ पर महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए उपवास रखती हैं, वैसे ही वह अपने बच्चों की लंबी उम्र के लिए अहोई अष्टमी का व्रत रखती हैं। आमतौर पर यह उपवास पुत्रों के जन्म के लिए रखा जाता है, लेकिन अब महिलाओं ने बेटियों के लिए भी इस व्रत का पालन करना शुरू कर दिया है।

अहोई अष्टमी उपवास का महत्व/Importance of Ahoi Ashtami

कार्तिक कृष्ण पक्ष की तिथि त्योहारों से भरी होती हैकरवा चौथ और अहोई अष्टमी ही वह प्रमुख त्योहार जिन्हें महिलाएं सबसे मनाती हैं। महिलाएं शास्त्रों के अनुसार व्रत रखकर इन त्योहारों का पालन करती हैं और दूसरी ओर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन कर इसे उत्सव का रूप देती हैं। इन उत्सवों में परिवार के कल्याण की भावना समाहित होती है। इस पर्व में अपनी सांस के चरणों को तीर्थ मानकर उनसे आशीर्वाद लेने की परंपरा है। कार्तिक कृष्ण पक्ष के आठवें दिन को अहोई अष्टमी कहा जाता है। यह उपवास दीपावली से ठीक एक सप्ताह पहले आता है। ऐसा कहा जाता है कि यह उपवास उन महिलाओं द्वारा किया जाता है जिनके बच्चे हैं। दूसरे शब्दों में, यह माना जा सकता है कि अहोई अष्टमी उपवास छोटे बच्चों के कल्याण के लिए किया जाता है। इस उपवास में सेई और सेई बच्चों के चित्र और अहोई देवी की छवि की पूजा/Ahoi Ashtami pooja की जाती है। अहोई अष्टमी उपवास संतान प्राप्ति के सुख का अनुभव करने और संतान की समृद्धि के लिए किया जाता है। कुछ महिलाएं इस दिन संतान प्राप्ति के लिए यह उपवास करती हैं। दरअसल, इस दिन लोग अपने बच्चों की सुरक्षा, लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि के लिए देवी पार्वती के अहोई रूप की पूजा करते हैं। बिना पानी पिए यह उपवास किया जाता है| और रात में सितारों को अर्घ्य दिया जाता है

आम तौर पर महिलाएं अहोई अष्टमी व्रत का पालन करने के लिए सुबह जल्दी उठती हैं; फिर, वह एक सफेद करवा अर्थात मिट्टी के बर्तन में पानी से भर कर  रखती हैं। इसके पश्चात वह देवी अहोई का ध्यान करती हैं। वह अपने बच्चों की सुख और समृद्धि के लिए सभी नियमों और विनियमों का पालन करके उनकी पूजा करती हैं। इस दिन महिलाएं निर्जला उपवास रखती हैं।

कुछ पौराणिक मान्यताओं के अनुसार अहोई पूजन के लिए शाम के समय घर की उत्तरी दीवार पर गेरू या पीली मिट्टी के आठ कोष्टक का पुतला बनाया जाता है। सभी नियमों का पालन करते हुए स्नान, तिलक आदि करने के बाद भोग लगाया जाता है। कुछ लोग अपनी क्षमता के अनुसार चांदी की अहोई में मोती डालकर पूजा करते हैं। चंद्रमा के उदय के बाद महिलाएं तारों को देखकर षोडशोपचार पूजन करती हैं। तत्पश्चात नक्षत्रों को जल से अर्घ्य देने से व्रत संपन्न होता है। चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद उपवास खोला जाता है और फिर भोजन करके अहोई अष्टमी व्रत विधि/Ahoi Ashtami Vrat vidhi को पूरा किया जाता है। इसके साथ ही कुछ लोग अहोई और कुछ चांदी की गेंदों को एक धागे में बांधते हैं और फिर हर साल कुछ गेंदों को उसी धागे में डालने की परंपरा है। पूजा के लिए कलश को गाय के गोबर से लीपते हैं और चिकनी मिट्टी को उत्तर की ओर जमीन पर रख दिया जाता है। इसके बाद सबसे पहले पूज्य भगवान श्री गणेश की पूजा के बाद देवी अहोई की पूजा की जाती है और उन्हें दूध, चीनी और चावल का भोग लगाया जाता है। फिर लकड़ी के तख़्त पर जल से भरा कलश स्थापित करके अहोई की कथा सुनी और सुनाई जाती है।

पूरी होती है इच्छा

हम पहले से आपको बताते आ रहे हैं कि अहोई अष्टमी व्रत मुख्य रूप से बच्चों के लिए रखा जाता है। कुछ लोग इसे बच्चे के जन्म और बच्चे की प्रगति के लिए भी रखते हैं। इस दिन निसंतान स्त्री भी संतान की कामना के लिए उपवास रख सकती है। दरअसल, इस दिन लोग अपने बच्चों की सुरक्षा, लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य, सुख और समृद्धि के लिए माता पार्वती के अहोई रूप की पूजा करते हैं। निःसंतान लोग इस दिन संतान प्राप्ति की इच्छा से पूरी श्रद्धा के साथ अहोई अष्टमी की पूजा विधि/Ahoi Ashtami’s pooja vidhi के अनुसार इस व्रत को करते हैं। इस दिन महिलाएं ज्यादातर घरों में उड़द चावल या कढ़ी चावल बनाती है।

परेशानियां दूर होंगी

देवी अहोई की पूजा करने के लिए गाय के घी में थोड़ी हल्दी डालें, एक दीया तैयार करें, चंदन की अगरबत्ती जलाएं, देवी को रोली, केसर और हल्दी चढ़ाएं। देवी को चावल का दलिया अर्पित करें। पूजा के बाद किसी गरीब कन्या को भोग देना शुभ माना जाता है। इसके अलावा, अपने बच्चे के जीवन में आने वाली परेशानियों को रोकने के लिए देवी गौरी को कनेर के फूल या पीले फूल चढ़ाएं।

अहोई अष्टमी का व्रत कैसे करें/ Rule of Ahoi Ashtami Vrat

  • प्रातः जल्दी उठकर स्नान कर स्वच्छ एवं नए वस्त्र धारण करें।

  • अब, मंदिर की दीवार पर देवी अहोई, देवी पार्वती, स्याहू और उनके सात पुत्रों के चित्र घर पर बनाएं।

  • आप चाहें तो पूजा के लिए बाजार में उपलब्ध पोस्टर का प्रयोग भी कर सकते हैं।

  • एक नया कलश लें और उसमें पानी भर दें। इसके ऊपर हल्दी से स्वास्तिक बनाएं और उस कलश को ढक कर रख दें।

  • देवी अहोई के नाम का ध्यान करें और घर में बड़ी उम्र की महिलाओं के साथ अहोई अष्टमी की कहानी/Ahoi Ashtami Story सुनें

  • सभी महिलाओं के लिए नए वस्त्र खरीदें।

  • कथा के बाद वह वस्त्र उन महिलाओं को भेंट करें।

  • रात को तारों को अर्घ्य दें और फिर व्रत खोलें।

अहोई का मिथक/Myth of Ahoi

प्राचीन काल में एक साहूकार रहता था। उनके सात बेटे और सात बहुएं थीं। उनकी एक बेटी भी थी जो ससुराल से मायके आई थी। जब सातों बहुएं दीवाली के अवसर पर, घर में लीपने के लिए पास के जंगल मिट्टी लाने गई तब लड़की भी उनके साथ थीं। जिस स्थान पर साहूकार की पुत्री मिट्टी खन्न रही थी, उस स्थान पर एक स्याहू रहता था। गलती से सयाहू का एक बच्चा बेटी की कुदाल से घायल हो गया और उसकी मौत हो गई। स्याहू ने क्रोधित होकर कहा, "मैं तुम्हारी कोख को बाँध दूँगा।"

सयाहू की बात सुनकर साहूकार की बेटी ने अपनी सभी भाभी से अनुरोध किया कि उसके स्थान पर कोई अपना गर्भ बांध दे। सबसे छोटी भाभी साहूकार की बेटी के स्थान पर अपनी कोख बांधने को तैयार हो जाती है। इसके बाद सबसे छोटी भाभी के सभी बच्चों की सात दिन के बाद मौत हो जाती है। सात बेटों की मृत्यु के बाद, उसने एक पंडित को आमंत्रित किया और उनसे समाधान के लिए कहा। पंडित ने उसे एक सुरही गाय की देखभाल करने की सलाह दी।

सुरही देखभाल से खुश हो जाती है और उसे स्याहू के पास ले जाती है। रास्ते में थककर दोनों कुछ देर आराम करते हैं। अचानक साहूकार की सबसे छोटी बहू  देखती है कि एक सांप, गरुड़ पंखनी के बच्चे को डंक मारने वाला था, इसलिए वह सांप को मार देती है। ठीक उसी समय पर, गरुड़ वहाँ आती है और चारों ओर खून के छींटे देखती है; तब वह सोचती है कि छोटी बहू ने उसके बच्चे को मार डाला है, और वह अपनी चोंच से सबसे छोटी बहू को चोंच मारने लगती है।

इस पर सबसे छोटी बहू कहती है कि उसने गरुड़ पंखनी के बच्चे की जान बचाई। इस पर गरुड़ पंखनी खुश हो जाती है और उसे सुरही के साथ स्याहू के पास ले जाती है। वहां सबसे छोटी बहू की देखभाल से प्रसन्न होकर स्याहू उसे सात पुत्र और सात बहुएं होने का वरदान देती है। स्याहू की दुआ से सबसे छोटी बहू का घर बेटे-बहू से भर जाता है। अहोई का अर्थ "अनहोनी को होनी बनाना " भी होता है जैसा कि साहूकार की बेटी के साथ हुआ था।

अहोई अष्टमी उपवास का नियम/Rule of ahoi Ashtami vrat

एक महिला जो अहोई अष्टमी के उपवास का पालन करने वाली है, उसे अंततः इस व्रत से लाभ की प्राप्ति के लिए अहोई अष्टमी के नियमों के बारे में पता होना चाहिए। अहोई अष्टमी के दिन देवी अहोई की पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि जो महिला अहोई अष्टमी के व्रत करती है, देवी अहोई स्वयं उसके बच्चे की रक्षा करती हैं।

1. अहोई अष्टमी व्रत निर्जला उपवास होता है। जो स्त्री बिना जल के इस व्रत का पालन करती है, उसे अंत में इस उपवास का फल अवश्य प्राप्त होता है।

2. अहोई अष्टमी व्रत के बाद कांसे के पात्र में से अर्घ्य नहीं दिया जाता क्योंकि कांस्य पात्र को अशुद्ध माना गया है। यदि कोई स्त्री पीतल के पात्र में अर्घ्य देती है तो उसके उपवास नष्ट हो जाते हैं।

3. अहोई अष्टमी उपवास में नक्षत्रों को अर्घ्य दिया जाता है। जिस प्रकार चन्द्रमा को अर्घ्य देने से करवा चौथ की सिद्धि होती है, उसी प्रकार नक्षत्रों को अर्घ्य देने से अहोई अष्टमी भी पूर्ण होती है।

4. अहोई अष्टमी के उपवास में नया करवा नहीं खरीदा जाता, क्योंकि इस पर्व के अनुसार करवा चौथ के करवा का प्रयोग किया जाता है।

5. अहोई अष्टमी के व्रत का पालन करने वाली महिला को चाकू, कैंची जैसी किसी भी चीज का प्रयोग नहीं करना चाहिए और सुई धागे का कोई काम नहीं करना चाहिए।

6. यह पर्व बच्चों के लिए होता है तो इस दिन अपने बच्चे या दूसरे के बच्चों को डांटना और पीटना नहीं चाहिए|

7. इस दिन किसी को भी मांसाहारी भोजन नहीं करना चाहिए।

8. अहोई अष्टमी का व्रत करने वाली स्त्री को दिन में नहीं सोना चाहिए क्योंकि व्रत के दिन पूजा पाठ करना अधिक फलदायी साबित होता है।

9. अहोई अष्टमी का व्रत रखने वाली स्त्री को वृद्ध लोगों का अपमान नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से फल की प्राप्ति नहीं होती है।

10. अहोई अष्टमी के दिन अपने घर के फर्श की सफाई न करें। पुराणों के अनुसार उस दिन घर में झाड़ू न लगाएं।

इन बातों का ध्यान रखना चाहिए 

  • इस दिन माता पार्वती के अहोई स्वरूप की पूजा की जाती है। निसंतान महिलाएं इस दिन उपवास रखती हैं और संतान की कामना करती हैं।

  • अहोई अष्टमी के दिन देवी अहोई की पूजा करने से पहले भगवान गणेश की पूजा करनी चाहिए।

  • अहोई अष्टमी का व्रत बिना जल के किया जाता है। ऐसा करने से संतान की आयु लंबी होती है और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

  • अहोई अष्टमी के दिन ससुराल वालों के लिए बयाना अवश्य निकालना चाहिए। अगर ससुराल वाले आपके साथ नहीं रहते हैं तो आप किसी पंडित या किसी बड़े व्यक्ति को बयाना दे सकते हैं।

  • अहोई अष्टमी के दिन नक्षत्रों को अर्घ्य दिया जाता है। ऐसा करने से बच्चे की उम्र लंबी होती है और जिन लोगों को संतान प्राप्ति का सुख नहीं मिला है उन्हें यह आनंद मिलता है।

  • अहोई अष्टमी पर उपवास कथा सुनते समय अपने हाथों में सात प्रकार के अनाज रखें और पूजा के बाद इन अनाजों को गाय को खिलाएं।

  • अहोई अष्टमी पूजा करते समय अपने बच्चों को अपने पास बिठाएं और देवी अहोई को भोग लगाकर अपने बच्चों को भोग  खिलाएं।

  • गरीबों को दान करें। दान और दक्षिणा में लिप्त होने से, उपवास पूरे हो जाते हैं।

  • अहोई अष्टमी के दिन पूजा के बाद ब्राह्मण और गाय को भोजन कराएं। उनका आशीर्वाद प्राप्त करें

देवी अहोई की आरती/ Goddess Ahoi Aarti

देवी अहोई की आरती

जय अहोई माता, मैया जय अहोई माता।

तुमको निसदिन ध्यानवत हर विष्णु विधाता। जय अहोई माता 

ब्राह्मणी, रूद्राणी  कमला तू ही है जगमाता

सूर्य- चंद्रमा ध्यावत नारद ऋषि गाता। जय अहोई माता

माता रूप निरजन सुख-संपत्ति दाता

जो कोई तुमको ध्यानवत नित मंगल पाता। जय अहोई माता

तू ही पाताल बसंती, तू ही है शुभदाता

कर्म-प्रभाव प्रकाशन जगनिधि से त्राता। जय अहोई माता

जिस घर तुमरो वासा , ताही घर गुण आता 

कर ना सके सोई कर ले, मन नहीं घबराता। जय अहोई माता

तुम बिन सुख ना होवे न कोई पुत्र पाता

खान-पान का वैभव सब तुमसे आता। जय अहोई माता

शुभ गुड सुंदर युक्ता, शीर निधि जाता 

रत्न चतुर्दश तुम बिन कोई नहीं पाता। जय अहोई माता

श्री अहोई मां की आरती जो कोई गाता

उर उमंग अति उपजे पाप उतर जाता । जय अहोई माता

आप अन्य सभी प्रमुख भारतीय त्योहारों के लिए भारतीय त्योहारों में ज्योतिष की प्रासंगिकता (Relevance of Astrology) पर इसी तरह के लेख पढ़ सकते हैं।

धनतेरस
22 Oct, 2022

धनतेरस, हर साल कार्तिक कृष्ण पक्ष के तेरहवें दिन मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन नई चीजें खरीदने की परंपरा है। इस दिन देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है क्योंकि यह दिन धन में वृद्धि लाता है। इस दिन भगवान धन्वंतरि ने भी अवतार लिया था, इसलिए इसे धनतेरस कहा जाता है। देवताओं और राक्षसों द्वारा संयुक्त रूप से किए गए समुद्र मंथन के दौरान प्राप्त किए गए चौदह रत्नों में धन्वंतरि और माता लक्ष्मी शामिल हैं। इस तिथि को धन्वंतरि त्रयोदशी के नाम से भी जाना जाता है।

धनतेरस हिंदुओं का एक प्रसिद्ध त्योहार है। यह दिवाली की शुरुआत का प्रतीक है। जैन धर्म में धनतेरस को ध्यान तेरस/Dhyan teras के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान महावीर ने जैन धर्म को पुनर्जीवित किया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, महावीर ने सर्वज्ञता, यानी पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया था। इसी कारण दीवाली जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार माना गया है। इस दिन को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस/National Ayurveda day के रूप में भी जाना जाता है।

हम धनतेरस पर बर्तन क्यों खरीदते हैं?/ Why do we buy Utensils on Dhanteras?

कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि प्रकट हुई थी। जब वह प्रकट हुए तो उनके पास अमृत से भरा घड़ा था। इसलिए, इस दिन बर्तन खरीदे जाते हैं क्योंकि भगवान धन्वंतरि के हाथ में एक बर्तन था। इसलिए आज के दिन पीतल और चांदी के बर्तन खरीदने चाहिए क्योंकि इससे भगवान धन्वंतरि प्रसन्न होती हैं। ऐसा माना जाता है कि धनतेरस अच्छा स्वास्थ्य और भाग्य भी साथ लाता है।

दक्षिण दिशा में दीये का महत्व/ Importance of Lighting Diya in the South direction 

भारतीय संस्कृति के अनुसार स्वास्थ्य को धन से ऊपर माना जाता है। एक कहावत आज भी प्रसिद्ध है - 'पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख घर में माया' यही कारण है कि धनतेरस को इतना महत्व दिया जाता है।

धनतेरस की पौराणिक कथाएं/ Dhanteras Mythology

एक दिन यमराज ने अपने दूतों से पूछा कि जब आप किसी का जीवन उनसे छीन लेते हैं, तब क्या आप कभी-कभी उन पर दया भी दिखाते हैं? क्या यह सब देख कर आपका दिल नहीं टूटा? क्या आप इसके बारे में कुछ नहीं कर सकते? यमदूत हिचकिचाते हुए बोले, हम आपके निर्देश पर चलते हैं। हमारा उद्देश्य ऐसा महसूस करना नहीं है। यमराज को लगा कि शायद वह उनसे डरते हैं, और इसलिए सच नहीं कह रहे हैं। उन्होंने, उन्हें निडर होने और ईमानदारी से सब कुछ बताने के लिए प्रोत्साहित किया। यमदूत ने तब कहा कि एक बार उनके सामने ऐसी स्थिति आ गई जिससे उनके दिल को झकझोर कर रख दिया और वह उस समय अपना कार्य नहीं करना चाहते थे। यमराज ने उनसे कहा कि जो भी आपके सामने हुआ था उसे बताओ।

यमदूत ने कहा, "एक बार हंस नाम का एक राजा था जो जंगल में शिकार के लिए गया था। शिकार के बीच, वह अपना रास्ता भटक गया और अन्य शिकारियों से अलग हो गया। राजा सीमा पार कर दूसरे राज्य में चला गया। वहां के राजा हेमा ने दिल से राजा हंस का स्वागत किया।

उसी दिन राजा हेमा की पत्नी ने एक बच्चे को जन्म दिया। ज्योतिषियों ने नक्षत्रों की गणना की और बताया कि लड़का विवाह के चार दिन बाद मर जाएगा। राजा के आदेश से उस बच्चे को ब्रह्मचारी के रूप में यमुना नदी के तट पर एक गुफा में रखा गया था। उन्हें महिलाओं से दूर रहने को कहा गया। समय बीतता गया और एक दिन राजा हंस की बेटी यमुना नदी के किनारे चली गई। उसने ब्रह्मचारी को देखा और उससे विवाह करने का मन बना लिया और उससे विवाह कर लिया। विवाह के चौथे दिन राजकुमार की मृत्यु हो गई।"

जब यमदूतों को उनकी कहानी के बारे में पता चला, तो वह बहुत दुखी हो गए। वह सुन नहीं पाए कि नवविवाहित जोड़े के साथ क्या हुआ। उन्होंने कहा कि जब वह युवा राजकुमार के शव को उठा रहे थे तब उनके आंसू नहीं रुके। इस पर यमराज ने कहा, "हम क्या कर सकते हैं? नियमों से बंधे होने के कारण, हमें यह अप्रिय और भयावह कार्य करना होगा।" यमदूतों में से एक ने यमराज से एक सवाल पूछा कि, "महाराज, अकाल मृत्यु से बचने के लिए हम कुछ नहीं कर सकते?" यमराज ने कहा कि धनतेरस का त्यौहार इस भयावह स्थिति का समाधान है। धन्वंतरि की पूजा और दीपदान करने से अकाल मृत्यु से मुक्ति मिलती है। जिस घर में यह पूजा की जाती है वहां शीघ्र मृत्यु का भय नहीं रहता।

इस घटना के बाद धन्वंतरि की पूजा और दीपदान करने की प्रथा शुरू हुई। इस मान्यता के अनुसार, धनतेरस की शाम को दक्षिण दिशा में लोग यम भगवान से प्रार्थना करने के लिए दीये जलाते हैं। इसके परिणाम स्वरूप उपासक और उसके परिवार को मृत्यु जैसे भयावह स्थिति से सुरक्षा मिलती है। यदि आप एक दीया जलाते हैं और देवी लक्ष्मी की पूजा करते हैं, तो यह परिवार में अच्छा स्वास्थ्य और सौभाग्य को दर्शाता है।

किसान के घर कैसे पहुंचे लक्ष्मी जी? दूसरी कहानी/ How did Lakshmi Ji reach the farmer's house? Another story 

श्री हरि, जो कभी क्षीरसागर में माता लक्ष्मी के साथ रहते थे, उन्हें आभास हुआ किया कि मृत्यु का निरीक्षण किया जा सकता है। माता लक्ष्मी भी उनके साथ आने के लिए कहने लगीं।

भगवान विष्णु ने कहा कि अगर वह उसके साथ आना चाहती है तब उसे उसकी शर्तों का पालन करना होगा। माता लक्ष्मी मान गईं और उनके साथ पृथ्वी पर दर्शन करने आईं। कुछ समय बाद, भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी को एक जगह पर रुकने और कहीं ना जाने के लिए कहा जब तक कि वह वापस आकर उनके साथ आने के लिए ना कहा जाए। माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु की बात मानने से इनकार कर दिया और उनका अनुसरण करती रहीं।

वह एक सुंदर सरसों के खेत में आई और पीले सरसों के सुंदर फूलों को देखकर प्रसन्न हो गई। उन्होंने खुद को इन खूबसूरत फूलों से सजाया। कुछ देर बाद उनको एक गन्ने का खेत दिखाई दिया। वह बहुत उत्साहित हो गई और वह स्वादिष्ट पका हुआ गन्ना लेने की चाहत करने लगीं।

यह देखकर भगवान विष्णु उस पर बहुत क्रोधित हो गए क्योंकि उन्होंने गरीब किसान के फल चुरा लिए थे। भगवान विष्णु ने लक्ष्मी जी को 12 साल तक किसान के साथ रहने और उसकी खेती में मदद करने का श्राप दिया। श्राप देने के बाद, भगवान विष्णु क्षीरसागर के लिए रवाना हो गए। माता लक्ष्मी ने 12 साल तक उस किसान की देखभाल की और उन्हें चांदी के गहने भी दिए। तेरहवें वर्ष में जब भगवान विष्णु उसे वापस लेने आए तो किसान ने माता लक्ष्मी को वापस भेजने से मना कर दिया। इस पर भगवान विष्णु ने कहा कि उन्हें जाने से कोई नहीं रोक सकता। वह हमेशा एक जगह से दूसरी जगह घूमती रहती है। किसान फिर भी नहीं माना और माता लक्ष्मी से अपने साथ रहने की भीख मांगी।

इसके साथ ही माता लक्ष्मी ने एक उपाय निकाला। उसने किसान से कहा कि वह जो कहे, उसका पालन करें और यदि वह ऐसा करता है, तो वह एक साल के लिए वापस आ जाएंगी। उसने कहा कल तेरहवीं है। अपने घर को अच्छे से साफ करें। फिर शाम को दीपक जलाकर मेरी पूजा करें। मेरे लिए तांबे के बर्तन में सिक्के भरें। यदि तुम ऐसा करोगे तो मैं तुम्हारे घर में एक वर्ष तक रहूंगी। जब किसान ने माता लक्ष्मी की बात मानी, तो वह फिर से समृद्ध हो गया। इसलिए हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को धनतेरस के रूप में मनाया जाता है।

धनतेरस पूजा विधि/ Dhanteras Puja Vidhi

धनतेरस पूजा विधि/ Dhanteras Puja Vidhi के अनुसार हमेशा शाम को प्रार्थना करनी चाहिए। पूजा के स्थान पर भगवान कुबेर और धन्वंतरि की मूर्तियों को उत्तर दिशा में रखना चाहिए। उनके साथ माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की भी पूजा अवश्य करें। कहा जाता है कि भगवान कुबेर को सफेद रंग और भगवान धन्वंतरि को पीली मिठाई का भोग लगाना चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि पीला रंग भगवान धन्वंतरि को प्रिय होता है। पूजा थाली में फूल, फल, चावल, रोली, धूप और दीये रखना चाहिए। दीया जलाने के बाद भगवान यमराज की पूजा करनी चाहिए।

धनतेरस ज्योतिषीय अवधारणा/ Dhanteras astrological concept 

प्राचीन कथाएँ केवल कहानियां नहीं हैं, बल्कि आज के परिवेश में उनकी भूमिकाएँ आवश्यक भी हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि घर में रोग, क्लेश, दर्द, अदालती कार्यवाही या शत्रु के कारण कोई समस्या आ रही हो तो किस प्रकार का दीपक जलाने से लाभ होगा? दीपक में कौन सा तेल सबसे अच्छा है, इसके बारे में जानें।

दिया और तेल/ Lamps and Oils 

  • आटे से बने दीपक किसी भी अवसर या पूजा के लिए सबसे अनुकूल माने जाते हैं।

  • धन की कमी से मुक्ति पाने के लिए घी के दीये जलाना चाहिए।

  • शनि की विपदा से मुक्ति पाने के लिए तिल के तेल का दीपक जलाना चाहिए। ऐसा करने से घर में आ रही परेशानियों से मुक्ति मिलती है।

  • पति की लंबी उम्र के लिए घर के मंदिर में महुआ के तेल का दीपक अवश्य जलाएं।

  • राहु और केतु ग्रहों की स्थिति को शांत करने के लिए अलसी के तेल का दीपक जलाना चाहिए।

  • किसी लंबित अदालती मुकदमे को जीतने के लिए घर के मंदिर के सामने पांच मुखी दीपक जलाना शुभ माना जाता है।

  • शत्रुओं से बचने या किसी प्रकार की आपत्ति से बचने के लिए शनि देव को सरसों के तेल का दीपक जलाकर प्रसन्न करें।

धनतेरस पर क्या करें?/ What to Do on Dhanteras  

  • अपने घर को अच्छी तरह साफ करें। इससे व्यक्ति के जीवन और घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश होता है।

  • सुनिश्चित करें कि आप घर और अपने आस-पास के सभी मकड़ी के जाले साफ करें क्योंकि वह आपके धन में बाधा उत्पन्न कर सकते हैं।

  • अपने बाथरूम के दरवाजे हमेशा बंद करके रखें। ऐसा माना जाता है कि शौचालय के खुले दरवाजे नकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करते हैं और धन के मामलों में समस्या पैदा करते हैं।

  • घर की उत्तर दिशा भगवान कुबेर का घर माना जाता है। घर के इस हिस्से को साफ-सुथरा रखें क्योंकि इससे धन का प्रवाह सुगम हो सकता है।

  • सुनिश्चित करें कि आप घर के सभी नल बंद करके रखें क्योंकि पानी की बर्बादी का मतलब धन की बर्बादी होती है।

  • एक नई झाड़ू खरीदें क्योंकि यह माता लक्ष्मी का प्रतीक है। अक्सर कई लोग इस झाड़ू खरीदते हैं।

  • धनतेरस पर पीतल, स्टील, सोना और चांदी की वस्तुओं को खरीदना बहुत शुभ माना जाता है।

धनतेरस पर क्या न करें?/ What to not do on Dhanteras 

  • कोई भी नुकीली वस्तु जैसे कैंची, चाकू आदि न खरीदें।

  • अपने पैर से झाड़ू को न छुएं। ऐसा मान्यता है कि ऐसा करने से माता लक्ष्मी का अनादर होता है।

  • धनतेरस पर तेल बिल्कुल न खरीदें और न ही ऐसी कोई भी वस्तु खरीदें जिसमें तेल का प्रयोग किया जाता है। यदि आपको तेल खरीदना है तो आप धनतेरस से एक-दो दिन पहले भी तेल खरीद सकते हैं।

  • काले रंग की कोई भी वस्तु ना खरीदें। इसे अशुभ माना जाता है।

  • इस दिन किसी को कर्ज न दें। यदि आप ऐसा करते हैं तब इससे धन हानि हो सकती है।

  •  कांच की कोई भी वस्तु न खरीदें। वैदिक ज्योतिष में कांच का राहु से संबंध बताया गया है।

  • भगवान कुबेर की ही नहीं, धन्वंतरि की भी पूजा करें।

  • इस दिन किसी के साथ मारपीट न करें। ऐसा माना जाता है कि जिस घर के सदस्य लड़ रहे होते हैं उस घर में माता लक्ष्मी की कृपा कभी नहीं होती है।

  • प्रतिशोधी हथियारों का प्रयोग न करें।

  • बड़ों का अनादर न करें। जिस घर में बड़े-बुजुर्गों का अपमान होता है, उस घर में माता लक्ष्मी का आशीर्वाद नहीं होता है।

धनतेरस के लिए पूजा मंत्र/ mantra for dhanteras puja

कुबेर धन मंत्र-

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं धनेश्वराय नमः॥

कुबेर अष्टलक्ष्मी मंत्र-

ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं श्रीं कुबेराय अष्ट-लक्ष्मी मम घरे धनं पुरय पुरय नमः॥

कुबेर मंत्र-

यक्षाय कुबेराय वैश्रवणय धनधान्यधिपतये

धनधन्य समृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा॥

आप अन्य सभी प्रमुख भारतीय त्योहारों के लिए भारतीय त्योहारों में ज्योतिष की प्रासंगिकता/ Relevance of Astrology पर इसी तरह के लेख पढ़ सकते हैं। 

नरक चतुर्दशी
24 Oct, 2022

नरक चतुर्दशी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनायी जाती है। इसे नरक चौदस, रूप चौदस और रूप चतुर्दशी भी कहा जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार इस दिन मृत्यु के देवता 'यमराज' की पूजा करने का विधान है। इसे 'छोटी दिवाली' के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यह दिवाली से एक दिन पूर्व मनाया जाता है। लोग अच्छे  स्वास्थ्य और अकाल मृत्यु से मुक्ति के लिए यमराज जा पूजन करते हैं। इसके साथ ही सूर्योदय से पूर्व तिल के तेल में सेब के पत्तों को मिलाकर शरीर पर लगाया जाता है। ऐसी मान्यता है की इस मिश्रण के प्रयोग से मनुष्य को नर्क से मुक्ति मिलती है और वह स्वर्ग को जाता है।

नरक चतुर्दशी के नियम एवं विधान/ Nark Chaturdashi Rituals 

कृष्ण पक्ष के चौदहवें  दिन, चंद्रमा के उदय होने पर नरक चतुर्दशी 2021/ Nark Chaturdashi 2021 मनाई जाती है। हालांकि इस पर्व को आम तौर पर दिन के उजाले में मनाया जाता है ।
यदि चतुर्दशी तिथि चंद्र उदय और दिन विराम दोनों  होती है, तो यह पहले दिन ही मनाई जाती है। इसके अतिरिक्त  यदि चतुर्दशी तिथि अरुणोदय या चंद्र उदय को स्पर्श न करे तो इसे पहले दिन मनाया जाना चाहिए। चंद्रोदय से पूर्व या सूर्योदय के समय शरीर पर तिल का तेल लगाने और यम तर्पण करने की रस्म होती है।

नरक चतुर्दशी पूजा विधि/ Nark Chaturdashi Puja Vidhi

इस दिन प्रातः काल स्नान करना आवश्यक है। इस दिन पूरे शरीर की तिल के तेल से मालिश करनी चाहिए । और फिर पौधे को अपने सिर के ऊपर से तीन बार घुमाएं।

नरक चतुर्दशी से पूर्व कार्तिक कृष्ण पक्ष की अहोई अष्टमी के दिन एक पात्र में जल रखा जाता है। नरक चतुर्दशी के दिन इस जल को नहाने के पानी में मिलाया जाता है। यह एक अनुष्ठान है, क्योंकि माना जाता है कि ऐसा करने से व्यक्ति को नरक से मुक्ति मिलती है। यह विधि व्यक्ति के सभी पापों से मुक्त कर देती है ।

इस दिन यमराज के लिए एक दीया घर के मुख्य द्वार पर रखना चाहिए।

संध्या काल में सभी देवी-देवताओं की पूजा करने के बाद, तेल का दीपक, घर और कार्यस्थल के बाहर रखना चाहिए। ऐसा करने पर लक्ष्मी जी उस घर अथवा कार्यस्थल पर सदा प्रसन्न रहकर  आशीर्वाद देती हैं।

अर्ध-रात्री के समय बेकार की चीजों का त्याग करना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि दिवाली के दिन देवी लक्ष्मी आएंगी, इसलिए घर की सफाई आवश्यक है।

नरक चतुर्दशी का महत्व/ Significance of Nark Chaturdashi

इस दिन दीप प्रज्ज्वलित करने का पौराणिक और धार्मिक महत्व है। ऐसा इसलिए है क्योंकि दीयों की तेज रोशनी रात के अंधेरे को दूर कर देती है। इसलिए इसे छोटी दिवाली भी कहते हैं। इस दिन कुछ और विधि और प्रक्रिया को भी करने का विधान है और उनमें से एक हैं अभ्यंग स्नान।

क्या है अभ्यंग स्नान और क्यों दिवाली से एक दिन पहले होता है यह विशेष स्नान?

कार्तिक मास की चतुर्दशी तिथि के दिन अभ्यंग स्नान/Abhyang snan का विशेष महत्व माना गया है। नरक चतुर्दशी/Narak Chaturdashi अर्थात छोटी दिवाली अवसर पर अभ्यंग स्नान को किया जाता है। अभ्यंग से तात्पर्य मालिश से होता है, संपूर्ण कार्तिक मास में शरीर पर तेल लगाने की मनाही होती है, केवल इस दिन ही शरीर पर तेल लगाए जाने का विधान बताया गया है। अभ्यंग एक पवित्र स्नान है जो न केवल शरीर की सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाने वाला होता है बल्कि समस्त पापों का शमन करने में सहायक होता है।

अभ्यंग स्नान के लिए परंपरागत रूप से कुछ विशेष जड़ी बूटियों का उपयोग भी किया जाता है, जिसके द्वारा एक लेप का निर्माण होता है, तथा उसे संपूर्ण शरीर पर लगाया जाता है। अभ्यंग स्नान केवल स्नान मात्र क्रिया नहीं होती है अपितु यह देह को पुष्ट करने हेतु उपयोग की जाने वाली एक अत्यंत वैज्ञानिक प्रक्रिया भी है, जो आध्यात्मिक रंग में घुल कर अत्यंत ही महत्वपूर्ण व पवित्र हो जाता है। मान्यता है की श्री कृष्ण ने नरकासुर के वध करने के पश्चात अभ्यंग स्नान किया था अत: यह स्नान सभी प्रकार की नकारात्मकता एवं बुराई को दूर करके जीवन शक्ति को सकारात्मकता प्रदान करने वाला स्नान होता है।

नरक चतुर्दशी से जुड़ी पौराणिक  कथाएं /Mythological tales associated with Nark Chaturdashi

1. राक्षस नरकासुर का वध:
नरकासुर नाम का एक राक्षस था। वह सभी देवी-देवताओं को आतंकित करता था। उसके पास विशेष शक्तियाँ थीं, और वह उनका प्रबल तौर पर उपयोग करता था। उसकी यातनायें इतनी बढ़ गई कि उसने सोलह हजार महिलाओं का अपहरण कर उन्हें बंधक बना लिया। देवता उसके  इस व्यवहार से निराश हो गए और सहायता माँगने भगवान कृष्ण के पास गए। भगवान कृष्ण ने सभी को आश्वासन दिया कि वह उनकी सहायता  करेंगे। राक्षस नरकासुर को श्राप था कि उसका वधएक स्त्री के हाथों ही होगा। इस कारण  भगवान कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को राक्षस को मारने के लिए भेजा। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का पराभव हुआ था । इसके उपरान्त सभी महिलाएं भगवान श्रीकृष्ण की सोलह हज़ार रानियों के रूप में जानी गईं। राक्षस के वध के बाद चतुर्दशी का पर्व मनाया गया ।

2. दानव राज बली की कथा:
एक अन्य कथानुसार , यह माना जाता है कि वामन के अवतार में भगवान विष्णु ने त्रयोदशी से अमावस्या की अवधि के मध्य तीन पगों में राक्षस राज बलि के राज्य को माप लिया । राजा बलि, जो एक परम दानी थे, उन्होंने इसके उपरान्त अपना पूरा राज्य भगवान वामन को दान कर दिया। इसके पश्चात भगवान वामन ने बलि से वरदान मांगने को कहा।

दैत्यराज बलि ने कहा कि हे प्रभु, मेरा राज्य हर वर्ष इस धरती पर त्रयोदशी से अमावस्या तक रहे। इस दौरान मेरे क्षेत्र में दिवाली मनाने वाले व्यक्ति को लक्ष्मी के घर में रहना चाहिए और चतुर्दशी के अवसर पर  नरक के लिए दीपक दान करने चाहिए। उन्होंने कहा की मेरे सभी सभी पूर्वजों को नरक में नहीं रहना चाहिए और यमराज की यातना को सहन नहीं करना चाहिए। वामन ने प्रसन्न होकर बलि को यह  वरदान दिया। इस वरदान के बाद नरक चतुर्दशी की प्रथा प्रचलित हुई और दीपदान प्रारम्भ हुआ।

नरक चतुर्दशी का हिंदू धर्म में धार्मिक और पौराणिक महत्व है। यह पांच त्योहारों की एक श्रृंखला में आने वाला में एक त्योहार है। दीपावली से दो दिन पूर्व , धन तेरेस, नरक चतुर्दशी, या छोटी दिवाली और फिर दीपावली, गोवर्धन पूजा और भाई दूज के पर्व मनाये जाते हैं  । नरक चतुर्दशीके दिन  दान और पूजन करने से नरक के भय से मुक्ति मिलती है।

चतुर्दशी के दिन क्या करें? /What to do on Nark Chaturdashi

1. इस दिन प्रात: काल स्नान करने के साथ और नए कपड़े पहनें। इसके उपरान्त माथे पर रूली का तिलक करें। तदोपरांत दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके यमराज को टिल का तेल अर्पण करें ।

2. मंदिर, रसोई, तुलसी, पीपल, बरगद, आंवला और आम के पेड़ों के नीचे प्रज्ज्वलित करें । 

3. दक्षिण दिशा में चार मुखी दीपक रखकर यमराज से स्वयं की सभी गलतियों को क्षमा करने की प्रार्थना करें।

4. अपने घर के मुख्य द्वार पर दीपक जलाएं। कहा जाता है कि इससे लक्ष्मी जी घर में अवश्य  प्रवेश करेंगी।

5. अपने घर को ठीक प्रकार से साफ करें। मुख्य रूप से दक्षिण दिशा की ओर ध्यान दिया जाना चाहिए ।

6. भगवान कृष्ण से प्रार्थना करें। ऐसा करने से आपको खूबसूरत त्वचा और मुखारविंद प्राप्त होगा ।

7. इस दिन हनुमान जी की भी पूजा का विधान है। दोषों से बचने के लिए लोग हनुमान मंदिर भी जाते हैं।

8. इस दिन किसी भी मंदिर में ग्यारह दीपक प्रज्ज्वलित करें ।

इस दिन क्या न करें/ What not to do on Nark Chaturdashi

1. इस दिन  किसी कीट भी न मारें। ऐसा करने से यमराज आप पर क्रोधित हो जाएंगे।

2. अपने घर की दक्षिण दिशा को साफ करें। यदि आप ऐसा नहीं करते हैं, तो यमराज क्रोधित हो जाएंगे।

3. इस दिन तेल का दान न करें। ऐसा करने से लक्ष्मी जी नाराज़ हो सकती हैं।

4. इस दिन आपको सूर्योदय के बाद नहीं उठना चाहिए । ऐसा करने से आपकी योग्यता कम हो जाती है।

5. इस दिन आपको मांसाहार से परहेज़ करना चाहिए ।

6. मदिरापान ना करें । यह आपकी सेहत को खराब कर सकता है।

7. झाड़ू को पैरना लगाएं , ऐसा माना जाता है कि इससे लक्ष्मी जी आपसे रुष्ट हो जाती हैं।

आप अन्य सभी प्रमुख भारतीय त्योहारों के लिए भारतीय त्योहारों में ज्योतिष की प्रासंगिकता पर ऐसे ही लेख पढ़ सकते हैं।

दिवाली
24 Oct, 2022

दिवाली/Diwali एक अति सुंदर पर्व है जो अपने साथ ढेरों खुशियां लाता है। रोशनी का त्यौहार होने के कारण इसे 'दीपोत्सव' भी कहा जाता है। दिवाली का त्यौहार अंधकार पर प्रकाश की जीत के साथ ही, हमारे जीवन को आनंद से भर देता है। यह पर्व हमारे संबंधों में होने वाले छोटे-छोटे मतभेदों को दूर कर उनमें गर्मजोशी और सौहार्द भरकर संबंधों में मजबूती लाता है। दिवाली सिर्फ हमारे देश में ही नहीं, बल्कि अन्य देशों में भी मनाई जाती है। इस त्योहार पर राजपत्रित अवकाश घोषित होने के कारण सभी स्कूल, कॉलेज, बैंक और सभी सरकारी कार्यालय बंद रहते हैं। दिवाली का त्यौहार विभिन्न धर्मों के लोग मिल जुल कर मनाते हैं। इस त्यौहार से संबंधित कई दंत कथाएं और मिथक भी हैं जो सभी बुराई पर अच्छाई की जीत और अंधकार पर रोशनी की जीत पर प्रकाश डालते हैं।

यह त्यौहार इसलिए मनाया जाता है क्योंकि इस दिन भगवान राम पत्नी सीता के साथ, लंका के राजा रावण को हराकर, उसकी कैद से भगवती सीता को छुड़ाकर अयोध्या वापस आए थे। रावण को मारकर राम ने बुराई पर जीत हासिल की थी इसलिए अमावस्या की अंधेरी रात्रि में अयोध्या के लोगों ने घी के दीये जलाकर उनका स्वागत किया था। तब से यह त्यौहार बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में जाना जाता है। उस दिन से यह महान पर्व दशहरे के त्यौहार के बीस दिन बाद पूरे जोश उमंग और उत्साह के साथ मनाया जाता है।

दिवाली कब मनाई जाती है?/ When is Diwali celebrated? 

यह दीपोत्सव/Deepotsav कार्तिक मास की अमावस्या के दिन बड़े जोश और उत्साह के साथ मनाया जाता है। ग्रेगोरी कैलेंडर के अनुसार, यह अक्टूबर या नवंबर मास में मनाया जाता है। 

दिवाली का महत्व और ऐतिहासिकता/ Importance of Diwali and its History

प्राचीन काल से, दीपावली हिंदूओं द्वारा मनाया जाने वाला सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण पर्व है। दिवाली शब्द संस्कृत के दो शब्दों से मिलकर बना है- 'दीप' और 'आवली'। दिवाली शब्द का अर्थ दियो की श्रृंखला होने के कारण, इस पर्व को दीपोत्सव या दीपों का त्योहार भी कहते है। इस त्यौहार का अर्थ ही प्रकाश-पर्व या रोशनी ही है इसलिए इस त्यौहार के दिन घरों और उसके आसपास के स्थानों की भी सफाई की जाती है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह त्यौहार हमें हमारी परंपरा से जोड़ता है, जो हमारी अंतरात्मा को जागरूक बनाकर अवगत कराता है कि अंत में सत्य और अच्छाई की हमेशा जीत होती है। दिवाली से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं इसके महत्व को और बढ़ा देती हैं। इस पर्व से हमें सत्य मार्ग पर चलने की सीख मिलती है। जैसा कि दिवाली नाम से ही पता चलता है कि यह रोशनी का पर्व है, जिसे मनाने के लिए लोग महीनों पहले से ही तैयारियां शुरू कर देते हैं। रोशनी के कारण चारों ओर जगमगाहट होती है। आज तक इस त्यौहार को परंपरागत रूप से पूजा जाता है।

दिवाली का त्यौहार प्रत्येक वर्ष की शरद ऋतु में अक्टूबर या नवंबर माह में मनाया जाता है। इस अवधि में हल्की ठंडक होने से मौसम सुहाना होता है। लोगों द्वारा इसे कार्तिक मास की अमावस्या के दिन बनाने से,अमावस्या का यह अंधकार दीयों की रोशनी से दूर हो जाता है। ऐसा माना जाता है, कि जैसे दीयों की रोशनी अंधकार को दूर करके रोशनी फैलाती है, वैसे ही दिवाली का त्योहार हमारे जीवन के अंधकार को नष्ट करके नई आशाओं की रोशनी से भर देता है। यह त्यौहार अपने साथ अत्यधिक खुशियां लाकर हमारे जीवन को सही मार्ग पर चलना सिखाता है। 

दिवाली के दिन ढेर सारी शुभकामनाओं सहित मित्रों, संबंधियों और पड़ोसियों को मिठाइयां और उपहार दिए जाते हैं, जो संबंधों में आए मतभेदों को दूर करके रिश्तों में मधुरता भरकर उन्हें मजबूत बनाते हैं। यही कारण है कि इस त्यौहार को मिलन-पर्व भी कहा जाता है। दिवाली के एक बड़ा त्यौहार होने के कारण इस दिन सभी सरकारी विभाग जैसे स्कूल, कॉलेज, बैंक बंद होते हैं। 

न सिर्फ भारतीय, बल्कि अन्य देशों के लोगों द्वारा भी यह रोशनी का पर्व मनाया जाता है। इस त्यौहार की संध्या को श्रीलंका, नेपाल, ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, सिंगापुर, म्यांमार, पाकिस्तान आदि देशों में राजपत्रित/gazetted अवकाश होता है। सिख, बौद्ध, जैन जैसे विभिन्न धर्मों के लोगों द्वारा भी दिवाली मनाई जाती है। इस त्यौहार से संबंधित कई मिथक होने से विभिन्न धर्मों के लोग अलग-अलग तरीकों से मनाते हैं। लेकिन ये सब अंधकार पर प्रकाश की जीत और बुराई पर अच्छाई की जीत पर ही प्रकाश डालते हैं। जैन धर्म के लोगों द्वारा दिवाली इसलिए मनाई जाती है क्योंकि इस दिन चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी ने मोक्ष प्राप्त किया था और इसी दिन उनके पहले शिष्य गौतम गणधर ने ज्ञान प्राप्त किया था जो अज्ञान पर ज्ञान की जीत को दर्शाता है।

दीपावली की प्रचलित कहानियां/ The Most Popular Story of Deepawali

राम का अयोध्या लौटना: धार्मिक पुस्तक रामायण में यह वर्णित है कि रावण का वध करके भगवान राम चौदह वर्षों बाद अयोध्या लौटे थे। तब, उनका भव्य स्वागत करने के लिए अयोध्या के निवासियों ने अपनी प्रसन्नता और उत्साह प्रदर्शित करने के लिए दीयों से रोशनी करके भगवान राम के सम्मान में अयोध्या को रोशनी से जगमग किया था। 

प्रथम कहानी/ First Story

एक बार एक राजा ने एक लकड़हारे से प्रसन्न होकर उसे चंदन का जंगल उपहार में दिया। लेकिन आखिरकार वह था तो एक लकड़हारा ही। अत: वह चंदन की कीमत नहीं समझ सका और अपना भोजन पकाने के लिए जंगल से चंदन की लकड़ियां लाकर प्रयोग करने लगा। जब अपने जासूसों द्वारा राजा को इस बारे में पता चला तो वह समझ गया कि केवल बुद्धिमान व्यक्ति ही अपनी बुद्धि से धन खर्च कर सकते हैं। इसी कारण देवी लक्ष्मी और गणपति की एक साथ पूजा की जाती है ताकि जिस व्यक्ति पर भी धन हो वह उसको बुद्धिमानी से उपयोग कर सकें।

द्वितीय कहानी/ Second Story

नरकासुर नाम का एक असुर था, जिसका दिवाली से एक दिन पहले भगवान कृष्ण ने वध कर संसार को उसके आतंक से मुक्त किया था। इसी कारण दिवाली को बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक स्वरूप मनाया जाता है।

इंद्र और बलि की कहानी/ The Story of Indra and Bali

एक बार असुरराज बलि इंद्र से डरकर कहीं छुप गए। असुर की तलाश में देवराज इंद्र जब एक खाली घर में पहुंचे तो वहां बलि स्वयं गधे के वेश में छिपा हुआ था। दोनों एक दूसरे से बात करने लगे। जब वह बात कर ही रहे थे कि बलि के शरीर से एक स्त्री प्रकट हुई। देवराज इंद्र के पूछे जाने पर स्त्री बोली, "मैं देवी लक्ष्मी हूं और मैं अपने स्वभाव के कारण एक ही स्थान पर स्थिर नहीं रहती हूं। मैं उसी स्थान पर स्थित रहती हूं जहां सत्य, दान, उपवास, तप, पराक्रम और धर्म की प्रधानता होती है। मैं सत्यवादी, ब्राह्मणों के मित्रवत् और धार्मिक नियमों का पालन करने वाले व्यक्तियों के घर में स्थित रहती हूं।" इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि देवी लक्ष्मी सदाचारी और गुणवान व्यक्तियों के घरों में स्थाई रूप से निवास करती हैं।

राजा और महात्मा की कहानी/The Story of King and Saint

प्राचीन कथा के अनुसार, एक बार एक संत ने राजा जैसी जीवनशैली जीने का विचार करके, देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए तपस्या करना शुरू कर दिया। तपस्या समाप्त होने पर, देवी लक्ष्मी ने प्रसन्न होकर उनकी इच्छाओं को पूर्ण किया। इच्छा पूर्ण होने के बाद, वह राजा के दरबार में पहुंचा और राजा के मुकुट को गिराने के लिए सिंहासन पर चढ़ गया। तब राजा अपने मुकुट से एक जहरीला सांप निकलते देखकर बहुत प्रसन्न हुआ क्योंकि संत ने उनकी रक्षा की थी। एक बार संत ने सभी दरबारियों को राजा के महल से बाहर जाने को कहा। उनके बाहर जाते ही, राजा का स्थान मलबे में बदल गया। राजा ने उनकी बहुत प्रशंसा की। तब अपनी प्रशंसा सुनकर महात्मा को अहंकार हो गया। लेकिन जल्दी ही अपनी गलती का एहसास होने पर, राजा के क्रोध से बचने के लिए भगवान गणपति से प्रार्थना की जिससे संत को फिर से उनका प्रारंभिक स्थान प्राप्त हुआ। इसलिए कहा जाता है कि धन के साथ बुद्धि का होना आवश्यक है इसलिए धन और बुद्धिमानी के रूप में देवी लक्ष्मी और भगवान गणेश/Ganesha and Lakshmi pooja की एक साथ पूजा की जाती है। 

देवी लक्ष्मी और साहूकार की पुत्री की कहानी/The Story of Goddess Laxmi and Moneylender's Daughter

एक गांव में एक साहूकार रहता था। उसकी पुत्री रोज पीपल-वृक्ष पर जल चढ़ाती थी। जिस वृक्ष पर वह जल अर्पित करती थी, उस वृक्ष पर भगवती लक्ष्मी का वास था। एक दिन माता लक्ष्मी ने साहूकार की पुत्री से पूछा, 'मैं तुम्हारी मित्र बनना चाहती हूं'। लड़की बोली, 'मैं अपने पिता से पूछ कर बताऊंगी'। जब उसने पिता को यह सब कहा तो उसके पिता ने सहमति दे दी। साहूकार की पुत्री के द्वारा दोस्ती का अनुरोध स्वीकार करने के बाद, वे दोनों अच्छे मित्रों की तरह एक दूसरे से बातें करने लगीं। एक दिन देवी लक्ष्मी ने साहूकार की पुत्री को अपने घर ले जाकर उसका तहे-दिल से स्वागत किया। उन्होंने उसे विभिन्न प्रकार का भोजन कराया। आतिथ्य सत्कार होने के बाद, जब साहूकार की पुत्री अपने घर जाने लगी तो देवी लक्ष्मी ने उससे पूछा, कि वह उन्हें कब आमंत्रित करेगी। तब साहूकार की पुत्री ने देवी लक्ष्मी को आमंत्रित किया। लेकिन वह अपने घर की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण उदास हो गई। वह सोचने लगी कि वह कि वह उन्हें अच्छी तरह से भोजन कराने के योग्य नहीं है। साहूकार अपनी पुत्री को देखकर सब समझ गया। उसने अपनी पुत्री को मिट्टी से रसोई घर साफ करके चार बाती का दिया जलाकर एक जगह बैठकर देवी लक्ष्मी को स्मरण करने को कहा। उसके ऐसा करने पर, उसी समय एक चील उसको गले का हार देकर उड़ गई। साहूकार की पुत्री ने उस हार को बेचकर भोजन का प्रबंध कर लिया। कुछ देर बाद, देवी लक्ष्मी, भगवान गणेश के साथ उसके घर पधारीं। साहूकार की पुत्री ने उन दोनों का बहुत अच्छे से स्वागत-सत्कार किया। भगवती लक्ष्मी उसके आथित्य-सत्कार से अत्यधिक प्रसन्न हुईं और साहूकार बहुत अमीर बन गया। 

दिवाली के लिए विशेष तैयारियां/ Special Preparation for Diwali

दिवाली से कई दिन पहले से ही तैयारियां शुरू हो जाती हैं। घरों और इमारतों में रंग-रोगन किया जाता है। पुरानी और काम में न आने वाली चीजों को कबाड़ में डाल दिया जाता है। घर के प्रत्येक कोण और कोनों की सफाई की जाती है। इस दृष्टि से, यह साफ-सफाई का भी त्यौहार है। जोश और उत्साह के त्योहार दिवाली का हम सब बेसब्री से इंतजार करते हैं। इसलिए लोग इस दिन के लिए कई महीने पहले से ही तैयारी शुरू कर देते हैं। ऐसा माना जाता है, कि देवी लक्ष्मी हमेशा स्वच्छ और साफ स्थान पर वास करती हैं इसलिए इस त्यौहार की तैयारी साफ-सफाई से शुरू होती है। घर के प्रत्येक कोने को बेहतर करने के लिए श्रेष्ठ तरीकों से सफाई की जाती है। दुकानों की भी सफाई की जाती है। साल भर का कबाड़ बाहर किया जाता है। खराब वस्त्र, टूटे-फूटे बर्तन या अन्य न सुधारी जा सकने वाले सामानों जैसी अनुपयोगी चीजों को घर से बाहर निकाल दिया जाता है।  दरारों और टूट-फूट आदि को ठीक कराने के लिए घरों की मरम्मत कराई जाती है। उसके बाद घरों और दुकानों पर रंग-रोगन किया जाता है। घरों को दिवाली के चार-पांच दिन पहले से विभिन्न तरीकों से सजाया जाता है।

इसके बाद लोग खरीदारी करते हैं तथा पारिवारिक सदस्यों के लिए नए वस्त्र, मित्रों और संबंधियों के लिए उपहार, रसोई के बर्तन और सोने के आभूषण, वाहन आदि जैसे अन्य सामान खरीदते हैं। इसके अलावा, भगवान की पूजा संबंधी आवश्यक सामग्री जैसे- दिया-बाती, गणपति और लक्ष्मी जी की मूर्तियां, देवताओं के वस्त्र और घर की सजावट के लिए रंग-बिरंगी रोशनी या लाइट, दीये और मोमबत्तियां आदि खरीदते हैं। इन सामानों के साथ ही मिठाईयां मंगाई जाती हैं। मालिकों द्वारा अपने-अपने कर्मचारियों के लिए भी नए वस्त्र और उपहार खरीदे जाते हैं। दिवाली के दिन घरों को अच्छी तरह साफ करके कमल-पुष्पों, आम के पत्तों और रंग-बिरंगी लाइटों से सजाया जाता है। घर की दहलीज पर रंगोली बनाकर पूरा दिन दीपक की रोशनी की जाती है जिससे घर में खुशियां बनी रहे 

छोटे बच्चे अपने बड़ों से इस त्यौहार के महत्व से संबंधित कहानियां सुनते हैं। महिलाओं द्वारा विभिन्न प्रकार की मिठाइयां बनाई जाती हैं। इसके बाद शाम को परिवार के सभी सदस्य एक साथ धन की देवी लक्ष्मी और बाधाओं को दूर करने वाले गणेश जी की पूजा करते हैं और अपनी सुख-शांति और समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं। इसके बाद, घर के छोटे सदस्यों द्वारा बड़ों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है और उसके बाद वह बधाई देने के लिए आस-पास के घरों में जाते हैं। पूजा के बाद घर को दीयों से सजाया जाता है। इन दीयों की रोशनी अमावस्या की रात के अंधकार को दूर करके उसे रोशन करती है। इसके बाद आतिशबाजी की जाती है। फिर परिवार के सभी सदस्य, मित्र और पड़ोसी सब एक साथ रात्रिभोज का आनंद लेते हैं। 

इस तरह, पूर्ण उत्साह और जोश के साथ यह भव्य पर्व मनाया जाता है, जो हमारे जीवन को अत्यधिक खुशियों से भर देता है। यह हमारे जीवन के सभी छोटे-छोटे मतभेदों को दूर करके, आपसी संबंधों को मधुर बनाता है। दिवाली के दिन लोगों द्वारा अपने-अपने घरों को विभिन्न सजावटी सामग्रियों से सजाया जाता है। लोग अपने-अपने घरों को विभिन्न प्रकार के दीयों, लाइटों से सजाकर, देवी लक्ष्मी का पूजन करके आतिशबाजी करते हैं। महिलाएं अपने घरों के प्रांगण में रंगोली बनाती है। शाम को लोग मेवा और मिठाइयों के साथ एक-दूसरे को मिलकर बधाइयां देते हैं। 

दिवाली पर लक्ष्मी और गणपति पूजन की परंपरा/The tradition of worshipping Laxmi and Ganesha on Diwali

दिवाली के दिन धन की देवी लक्ष्मी जी और भगवान गणेश जी की मूर्तियों को पूर्व दिशा में स्थापित करके पूजा करने से, लोगों के जीवन की सभी समस्याएं दूर होती हैं और उन्हें धन और यश की प्राप्ति होती है। 

दिवाली पर लक्ष्मी पूजन का महत्व/ Importance of worshipping Laxmi on Diwali

हम सभी जानते हैं, कि धन की देवी माता लक्ष्मी की कृपा से ही, हमें विलासिता और वैभव दोनों प्राप्त होते हैं। कार्तिक अमावस्या की शुभ तिथि पर, धन की देवी को प्रसन्न करने से व्यक्ति को उनका आशीर्वाद और समृद्धि दोनों प्राप्त होते हैं। दिवाली से पहले आने वाली शरद पूर्णिमा पर्व को, माता लक्ष्मी की जयंती के रूप में मनाया जाता है। फिर दिवाली पर उनका पूजन करके धन और समृद्धि प्राप्त की जा सकती है।

दिवाली पर गणेश पूजन का महत्व/ Importance of Ganesha’s worshipping on Diwali

भगवान गणेश को बुद्धि का देवता कहा जाता है। हिंदू पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान गणेश का पूजन किए बिना, कोई भी पूजा या धार्मिक कार्य नहीं किए जा सकते हैं। यही कारण है कि दिवाली के दिन भगवान गणपति की पूजा की जाती है। धन की देवी के पूजन द्वारा समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद, व्यक्ति को अपने धन का सही उपयोग करने के लिए बुद्धिमानी की आवश्यकता पड़ती है। भगवान गणेश द्वारा बुद्धि प्रदान करने और अपना मार्ग प्रशस्त करने के लिए भगवान गणपति की आराधना की जाती है।

दिवाली के पांच महत्वपूर्ण दिन/ Five important days during Diwali

  •  धनतेरस
  • नरक चतुर्दशी
  • लक्ष्मी पूजा/Lakshmi Pooja
  • गोवर्धन पूजन
  • भाई दूज

दिवाली की पूजन सामग्री/ Diwali’s Worshipping Materials

देवी लक्ष्मी के पूजन के लिए जिस पूजन सामग्री की आवश्यकता होती है वह निम्न प्रकार हैं- केसर, रोली, चावल, पान के पत्ते, सुपारी, फल, फूल, खीलें, बताशे, सिंदूर, मेवा, मिठाइयां, पंचामृत, गंगाजल, धूप, अगरबत्ती, रूई की बाती, कलावा, नारियल, कलश के लिए तांबे का बर्तन।

दिवाली पर पूजा की तैयारी कैसे करें?/ How to do Preparation for Worshipping on Diwali?

१) थाली या जमीन को शुद्ध करके उस पर स्वास्तिक बना सकते हैं या कोई यंत्र स्थापित किया जा सकता है। अब तांबे के बर्तन का कलश बनाकर उसमें पंचामृत, गंगाजल, सुपारी, सिक्के, लौंग रखकर काले कपड़े से ढक देते हैं फिर एक कच्चे नारियल के चारों ओर कलावा (एक प्रकार का लाल धागा) लपेटकर कलश स्थापित किया जाता है।

२) बनाए हुए यंत्र की जगह पर सोने-चांदी के सिक्के, रुपए, देवी लक्ष्मी की मूर्ति या मिट्टी से बनी लक्ष्मी-गणेश और सरस्वती की मूर्तियां या अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां रखी जाती हैं।

३) भगवान की धातु की मूर्ति होने पर उसे ईश्वर का अवतार मानकर गंगाजल से स्नान कराकर अक्षत, चंदन, फल और फूलों से सजाना चाहिए। इसके साथ घी या तिल के तेल का पंचमुखी दीपक जलाना चाहिए।

४) दिवाली की विशेषता लक्ष्मी पूजन से संबंधित होती है। इस दिन प्रत्येक घर, परिवार, कार्यालयों आदि में माता लक्ष्मी की पूजा/Lakshmi Pooja करके उनका स्वागत किया जाता है। दिवाली के दिन गृहस्वामियों और व्यवसायिक व्यक्ति, धन की देवी लक्ष्मी से धन और समृद्धि की अपेक्षा करते हैं।

दिवाली की पूजन विधि/ Worshipping Methodology on Diwali

१) नियमित रूप से पूजा करने वाले व्यक्तियों और बुजुर्गों द्वारा घरों में भगवती लक्ष्मी के लिए उपवास रखा जाता है। भगवती लक्ष्मी के पूजन के दौरान सभी पारिवारिक सदस्य घर में उपस्थित होते हैं। संबंधित परिवार के सदस्य को स्नान करके तथा आसन (एक प्रकार की बैठने की पवित्र गद्दी) पर बैठकर आचमन और प्राणायाम करके संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद गणेश जी का स्मरण करते हुए अपने दाहिने हाथ में गंध, अक्षत, फूल, कुशा, मिठाई और गंगाजल लेकर गणपति महालक्ष्मी, महाकाली, कुबेर आदि को अर्पित करके उनकी पूजा करनी चाहिए।

२) दिवाली के दिन कुबेर जी की भी आराधना करने का अत्यधिक महत्व होता है। कुबेर जी का पूजन करने के लिए, धन सुरक्षित रखने वाली तिजोरी या तहखाने पर स्वास्तिक बनाकर कुबेर जी का स्मरण करना चाहिए। 

३) सबसे पहले भगवान गणेश और महालक्ष्मी जी का पूजन करने के लिए, कलश स्थापित करके महालक्ष्मी जी और अन्य देवी-देवताओं का पूजन किया जाता है पूजन के बाद, सभी पारिवारिक सदस्यों द्वारा पार्टी/party करके पटाखे फोड़े जाते हैं। 

४) अब हाथ में अक्षत, फूल, जल और पैसे लेकर संकल्प मंत्र का जाप करते हुए संकल्प लिया जाता है कि मैं फलां फलां व्यक्ति इस समय फलां फलां स्थान पर बैठकर, पुण्य प्राप्त करने की इच्छा से आपकी पूजा करना शुरू कर रहा हूं। इसके बाद, सबसे पहले गणेश जी और महालक्ष्मी जी क्या पूजन किया जाता है।

५) हाथ में जल लेकर भगवान का स्मरण करते हुए, उन्हें पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। अंत में, पूजन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद, हाथ में अक्षत और फूल लेकर महालक्ष्मी जी की आरती की जाती है जिससे घर में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है। 

६) दिवाली की पूजन विधि के बाद, महालक्ष्मी जी की आरती के लिए घी का जलता दीपक लेते हैं। आरती के लिए थाली में रोली से स्वास्तिक बनाकर, थोड़े अक्षत और फूल रखकर गाय के घी का चार मुखी दीपक जलाकर शंख, घंटी, डमरु आदि बजाकर माता लक्ष्मी की आरती की जाती है। 

७) आरती के समय घर के सभी सदस्य एक साथ उपस्थित होते हैं। परिवार के सभी सदस्यों द्वारा सात बार माता लक्ष्मी की आरती करनी चाहिए। सात बार आरती करने के बाद, आरती की थाली लाइन में खड़े दूसरे पारिवारिक सदस्य के हाथ में दे देनी चाहिए। प्रत्येक पारिवारिक सदस्यों द्वारा ऐसा ही किया जाना चाहिए।

८) दिवाली पर मां सरस्वती के पूजन का भी प्रावधान होता है इसलिए देवी लक्ष्मी के पूजन के बाद मां सरस्वती की भी पूजा करनी चाहिए। 

९) महालक्ष्मी जी के पूजन के साथ ही, धन के स्वामी कुबेर जी की भी दिवाली और धनतेरस पर पूजा की जाती है। कुबेर जी की पूजा करने से घर में धन का प्रवाह बना रहता है। 

बहीखाता की पूजा कैसे करते हैं?/How to worship Ledger Account?

लेजर/बही खातों की पूजा करने के लिए पूजा के शुभ मुहूर्त के दौरान बही खातों में केसर या लाल कुसुम के साथ चंदन मिलाकर स्वास्तिक बनाकर उस पर "ओम् गणेशाय नमः" लिखना चाहिए। अब एक नई थैली में हल्दी की पांच गांठ, कमलगट्टे, अक्षत, कुशा, साबुत धनिया और थोड़े पैसे रखने चाहिए और थैली पर स्वास्तिक बनाकर मां सरस्वती को अर्पित करना चाहिए। 

पटाखे और आतिशबाजी/Crackers and Fireworks

पिछले वर्ष से विकसित हुए क्रोध, ईर्ष्या और भय जैसी नकारात्मक भावनाओं को पटाखों के रूप में नष्ट करना चाहिए। हर पटाखे के साथ किसी विशेष व्यक्ति से संबंधित सभी नकारात्मक भावनाओं को जला देना चाहिए या संबंधित व्यक्ति का नाम पटाखे पर लिखकर जलाने से आप उसके खिलाफ सभी नकारात्मक भावनाओं को जला सकते हैं। इसके लिए हम क्या कर सकते हैं? जैसे विचारों के बजाय उस व्यक्ति के खिलाफ अपनी सभी नकारात्मक भावनाओं को दूर करने के लिए स्वयं को नकारात्मक भावनाओं में न जला कर, अपनी सभी बुरी और नकारात्मक भावनाओं को पटाखों के साथ जलाकर, दोबारा उस व्यक्ति से मित्रता करनी चाहिए। इससे आपको प्रेम शांति और प्रसन्नता के साथ ही हल्कापन और बेहतर महसूस होगा। इसके बाद उस व्यक्ति को मिठाई देकर उत्सव मनाना चाहिए। व्यक्ति के प्रति बुराई न रखकर, उसकी बुराइयों को पटाखों के साथ जला देना चाहिए वास्तव में, दिवाली मनाने का यही सही तरीका है।

दिवाली का आर्थिक महत्व/ Economic Importance of Diwali

साल का सबसे बड़ा खरीदारी का समय दिवाली से शुरू होता है। छोटे से लेकर बड़े सभी व्यवसायक कपड़े, बर्तन, चूना, रंग, पूजन-सामग्री, सजावटी सामान, हलवाई की दुकान, मिठाई की दुकान, सोना-चांदी और वाहन के व्यवसाय में इस त्यौहार के दौरान, मांग के कारण बढ़ती हुई बिक्री देखी जा सकती है। सभी के लिए दिवाली एक महान पर्व है। यह व्यक्तियों के लिए एक विशेष त्यौहार है क्योंकि वे पिछले साल के सभी बकाया चुकाकर व्यापार को नए सिरे से शुरू करते हैं। व्यावसायिक व्यक्तियों द्वारा लेन-देन के लिए नई बही/लेजर और कलम के साथ, माता लक्ष्मी का पूजन करने के बाद नया व्यापार शुरू किया जाता है (इससे संबंधित अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर सकते हैं।), ताकि साल भर उनका व्यवसाय सुचारू रूप से चल सके। यही कारण है कि इस महापर्व का अत्यधिक आर्थिक महत्व है। 

दिवाली पर क्या करें?/ What to Do on Diwali? 

१) दिवाली के दिन माता लक्ष्मी के पूजन के बाद, घर के प्रत्येक कमरे में शंख या घंटी बजाना चाहिए। इसके परिणामस्वरूप घर की नकारात्मक ऊर्जा और दरिद्रता दूर होती है और घर में माता लक्ष्मी का प्रवेश होता है। 

२) दिवाली के दिन जलते तेल के दीपक में लौंग रखकर हनुमान जी की आरती करनी चाहिए। आप ऐसा दीपक किसी हनुमान मंदिर में भी ले जा सकते हैं।

३) शिव मंदिर जाकर भगवान को अक्षत या थोड़े चावल अर्पित करने चाहिए। यह ध्यान रखना चाहिए कि चावल बिना टूटे हुए पूर्ण आकार में हों। शिवलिंग पर टूटे हुए चावल के दाने अर्पित नहीं करने चाहिए।

४) महालक्ष्मी जी का पूजन करते समय, पीली कौड़ी को लक्ष्मी जी के सामने रखकर उन्हें आसानी से प्रसन्न किया जा सकता है। इसके परिणामस्वरूप धन संबंधी सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं। 

५) भगवती लक्ष्मी का पूजन करते समय उनके सामने हल्दी की गांठ रखनी चाहिए। पूजन के बाद, इन हल्दी की गांठों को अपने धन रखने के स्थान पर रख देना चाहिए। 

६) दिवाली के दिन झाड़ू/ ड्रूम अवश्य खरीदकर अपने पूरे घर की सफाई करनी चाहिए। यदि प्रयोग नहीं होती है तो एक निश्चित स्थान पर छिपा कर रख देना चाहिए। 

७) दिवाली के दिन किसी मंदिर में झाड़ू दान की जा सकती है। यदि आपके घर के पास लक्ष्मी जी का मंदिर हो, तो वहां सुगंधित अगरबत्ती का दान करना चाहिए। 

८) इस दिन अमावस्या होने के कारण, पीपल-वृक्ष को जल अर्पित करना चाहिए। ऐसा करने से शनि-दोष और कालसर्प-दोष दूर होते हैं। 

९) दिवाली के दिन भगवती लक्ष्मी के पूजन के लिए स्थिर लग्न उपयुक्त माना जाता है। इस लग्न में पूजा करने से भगवती लक्ष्मी आपके घर में स्थाई रूप से निवास करती हैं। पूजन के समय लक्ष्मी यंत्र/Lakshmi Yantra कुबेर यंत्र/Kuber Yantra और श्री यंत्र रखना चाहिए। स्फटिक यंत्र का प्रयोग उचित माना जाता है।

१०) घर के समीप स्थित पीपल-वृक्ष के समीप तेल का दीपक जलाना चाहिए।

११) प्रथम-पूजनीय श्री गणेश जी को कुशा के इक्कीस तिनकों/तृणों को अर्पित करके उनकी कृपा प्राप्त कर सकते हैं। दिवाली के दिन ऐसा करने से भगवान गणेश जी के साथ ही भगवती लक्ष्मी जी की भी कृपा प्राप्त होती है। 

१२) भगवान विष्णु के चरणों के समीप बैठी भगवती लक्ष्मी जी वाली तस्वीर को पूजने से भगवती लक्ष्मी बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाती हैं। 

१३) दिवाली के दिन 'श्री सूक्त' और 'कनकधारा स्त्रोत' का पाठ करना चाहिए। 'राम रक्षा स्त्रोत', हनुमान चालीसा या सुंदरकांड का पाठ भी किया जा सकता है। 

१४) याद रखना चाहिए कि, महीने की प्रत्येक अमावस्या को घर की उचित रूप से सफाई की जानी चाहिए। सफाई के बाद धूप और दीप जलाने से घर का वातावरण शुद्ध होता है और घर में हमेशा समृद्धि बनी रहती है। 

१५) दिवाली की रात्रि पर, घर में तुलसी के पौधे के समीप दीपक जलाकर वस्त्र अर्पित करना चाहिए। 

१६) कमलगट्टे की बनी माला से, महालक्ष्मी जी के "ॐ श्री ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः" महामंत्र का 108 बार जाप करना चाहिए। 

"भारतीय त्योहारों में ज्योतिष की प्रासंगिकता" जैसे लेखों द्वारा अन्य सभी प्रमुख भारतीय त्योहारों के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

 

गोवर्धन पूजा
26 Oct, 2022

हिंदू धर्म में शुद्ध और पवित्र गोवर्धन पूजन का अत्यधिक महत्व होता है। यह त्यौहार, प्रकृति और मनुष्यों के प्रति प्रेम और आभार दर्शाने का अत्यधिक असाधारण तरीका है। इसके साथ ही, देशभर में शुक्ल पक्ष के दूसरे दिन/ second day of the Shukla Paksha, गोवर्धन पूजन या अन्नकूट का विलक्षण और सुंदर त्योहार व्यापक रूप से मनाया जाता है। फिर भी, यह विशेष रुप से उत्तर भारत की ब्रजभूमि जैसे मथुरा, वृंदावन, नंदगांव, गोकुल और बरसाना का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है। साथ ही, गोवर्धन पूजन को अन्नकूट के नाम से भी जाना जाता है। दीपावली के अगले दिन, विशेष रूप से ब्रज में मनाई जाने वाले, इस अद्भुत त्योहार की प्रामाणिकता देखी जा सकती है। फलत:, गोवर्धन पूजन के दौरान गायों के गोधन की पूजा की जाती है। सुंदर प्रसंग यह है कि जैसे देवी लक्ष्मी सभी को सुख, आनंद, समृद्धि और शांति प्रदान करती हैं, उसी तरह शांत और निर्मल गौ माता भी अच्छे स्वास्थ्य और धन को सुनिश्चित करती है। प्राचीन मान्यता के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रज की विनाशकारी मूसलाधार बारिश से सभी को बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी सबसे छोटी उंगली पर लगातार सात दिनों तक उठाया था, तो उसकी छत्रछाया में गोपिकाएं संतुष्ट होकर आनंदपूर्वक ठहरी रही थीं।

सातवें दिन, शक्तिवान भगवान श्रीकृष्ण द्वारा विशाल गोवर्धन पर्वत को नीचे रख देने के बाद, प्रत्येक वर्ष अन्नकूट द्वारा गोवर्धन का पूजन करने के लिए इस शुभ और सुंदर पर्व को निर्धारित किया। तब से, इस अद्भुत पर्व को अन्नकूट कहा जाता है। कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा/ Kartik Shukla Pratipada को, दीपावली के दूसरे दिन, गोवर्धन या गौ पूजन का विशेष महत्व होता है। साथ ही, यह भी माना जाता है कि इस दिन गौ पूजन के बाद, गौ माता को पालक, भोजन और वस्त्र भी उपहार में देने चाहिए।

वास्तविक रुप से, गौ पूजन द्वारा गोवर्धन पूजन करने पर सच्चा आनंद, सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है। यह मुख्य पर्व देश के वृंदावन और मथुरा जैसे खूबसूरत क्षेत्रों में व्यापक रूप से मनाया जाता है। धार्मिक किवदंती की धार्मिक कथा के अनुसार, भगवान कृष्ण ने इंद्र के अभिमान को तोड़ने के लिए विशाल गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाकर इंद्र के क्रोध से गोकुलवासियों की रक्षा की थी। 

इंद्र का अभिमान नष्ट करने के बाद, सर्वोत्तम गोवर्धन पर्वत/Govardhan Parvat को पशुओं के लिए चारा, कृषि और भूमि की उर्वरता में वृद्धि करने के कारण, भगवान कृष्ण ने  कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा के दिन गोकुलवासियों को छप्पन भोग बनाकर विशाल और शक्तिशाली गोवर्धन पर्वत की पूजा करने का निर्देश दिया था।

इससे गोवर्धन पूजन मनाने का अत्यधिक महत्व  साबित होता है। तब से, गोवर्धन पूजन के दिन अन्नकूट तैयार करके, गोवर्धन पर्वत/ Govardhan Parvat के पूजन का अनोखा संस्कार किया जाता है। एक अन्य धार्मिक मान्यता के अनुसार, इंद्र के क्रोध से गोकुलवासियों की रक्षा करने के परिणामस्वरूप, कान्हा जी द्वारा विशाल गोवर्धन को उठाने के कारण यह खूबसूरत पर्व मनाया जाता है। लोगों द्वारा कृतज्ञता और आभार प्रदर्शित करने के लिए छप्पन भोग तैयार करके भगवान श्री कृष्ण को अर्पित किए गए थे। गोकुलवासियों के इस भाव से प्रसन्न और संतुष्ट होकर श्री कृष्ण ने लोगों को आशीर्वाद दिया कि वह हमेशा गोकुलवासियों की रक्षा 

गोवर्धन पूजा का महत्व / Importance of Govardhan Puja

भारतीय समाज में गोवर्धन पूजन का अत्यधिक महत्व होता है। प्रामाणिक वेदों और परंपराओं के अनुसार, वरुण, इंद्र और अग्नि जैसे कई अन्य शक्तिशाली देवताओं का पूजन करने की अनोखी परंपरा है। इस दिन विशालकाय गोवर्धन पर्वत/ Govardhan Parvat,गौ रूपी संपत्ति, और भगवान श्री कृष्ण के पूजन का विशेष महत्व होता है। यह पर्व मानव जाति को बचाने और प्रकृति द्वारा प्रदत्त सभी संसाधनों के प्रति अत्यधिक आभार प्रकट करने के संदेश को प्रसारित करता है। गोवर्धन पूजन का पर्व मनाने से हमें प्रकृति और उसके सभी संसाधनों के प्रति कृतज्ञता और आभार व्यक्त करने का अवसर मिलता है। इस पूजन के दौरान, विशाल और खूबसूरत गोवर्धन पर्वत का पूजन करके, जीवन को समृद्ध बनाने वाले वृक्षों, जानवरों, पक्षियों, नदियों, और पर्वतों जैसे विभिन्न प्राकृतिक संसाधनों के प्रति आभार और सम्मान व्यक्त करने का संदेश दिया जाता है।

 पर्वतमालाओं और नदियों की उपस्थिति, भारत में जलवायु संतुलन का एक मुख्य कारण है इसलिए यह सभी विभिन्न प्राकृतिक संसाधनों और प्राकृतिक संपदाओं के प्रति कृतज्ञता और आभार प्रदर्शित करने का दिन होता है। गाय के दूध, छाछ, दही, मक्खन और  गोबर से मानव जाति के जीवन स्तर को समृद्धिशाली बनाने के कारण, इस दिन गौ पूजन अवश्य किया जाता है। इस तरह की परिस्थितियों में, हिंदू धर्म में गौ को पवित्र गंगा नदी के समान महत्वपूर्ण मानकर व्यापक रूप से पूजा जाता है। इस दिन विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों द्वारा अन्नकूट बनाकर, गायन और नृत्य करते हुए आभार स्वरूप खूबसूरत गोवर्धन पर्वत का पूजन किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि पर्वत ही वास्तविक ईश्वर या संरक्षक के रूप में मनुष्य को जीने का मार्ग देता है तथा जीवन को बचाने के कठिन पलों में  आश्रय प्रदान करता है। प्रत्येक वर्ष, गोवर्धन पूजन विभिन्न महत्वपूर्ण रीति-रिवाजों और परंपराओं का पालन करके सुंदरता के साथ मनाया जाता है। बुराई पर अच्छाई और ईश्वर की जीत का जश्न मनाने और रक्षा करने के लिए, इस शुभ दिन पर भगवान कृष्ण और गोवर्धन पर्वत का पूजन किया जाता है। 

 प्रातः काल लोगों द्वारा अपनी गायों और बैलों को नहलाकर, केसर और मालाओं से सजाकर, गोबर का स्तूप बनाकर, खीर, बताशे, मालाओं, मिठाइयों जैसे स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ बनाकर उसकी पूजा की जाती है। इसके अलावा, कई लोगों द्वारा छप्पन भोग के लिए "नेवैद्य" या एक सौ आठ प्रकार का (छप्पन प्रकार का) भोजन विशेष रूप से तैयार करके भगवान को अर्पित किया जाता है।

गोवर्धन पर्वत की आकृति  मोर के समान होने के कारण, आसानी से राधा कुंड के रूप में वर्णित किया जा सकता है। श्याम कुंड नेत्र, दानघाटी गर्दन, मुखारबिंद मुख और पंचरी लंबे पंखों वाली कमर बनाती है। ऐसा माना जाता है कि पुलस्त्य मुनि के श्राप‌ के कारण, सरसों के दाने के बराबर इस पर्वत की ऊंचाई प्रतिदिन कम हो रही है। कहानी एक बार सतयुग की है, पुलस्त्य मुनि ने द्रोणकैला पहुंचकर गोवर्धन को साथ ले जाने के लिए द्रोणांचल पर्वत से निवेदन किया। ऋषि के निवेदन पर द्रोणांचल पर्वत बेटे के लिए अत्यंत दुखी हुए लेकिन गोवर्धन पर्वत के मान जाने पर उन्‍होंने अनुमति दे दी।

लेकिन उन्होंने एक विशेष शर्त के साथ अपने बेटे को ऋषि के साथ भेजा कि उसे रास्ते में नीचे रखा तो वह हमेशा के लिए वहीं रह जाएगा। बृजमंडल से गुजरते हुए, मुनि ने शौच करने के लिए उसे नीचे रख दिया। जैसे ही वह वापस आये, उन्हें एहसास हुआ कि वह उसे उस जगह से नहीं उठा सकते। तब उन्होंने क्रोधित होकर गोवर्धन को श्राप दिया कि वह धीरे-धीरे आकार में छोटा होता जाएगा। पहले 64 मील लंबा, 40 मील चौड़ा और 16 मील ऊंचा यह पर्वत बाद में घटकर 80 फीट हो गया। गोवर्धन पूजन को अन्नकूट के लोकप्रिय नाम से जाना जाता है। आधुनिक समय की पार्टियों के समान कई स्थानों पर लोगों के लिए भंडारे की भी व्यवस्था की जाती है।

गोवर्धन पूजन क्यों मनाया जाता है?/ Why is Govardhan Puja celebrated?

इस प्रकार, द्वापर युग में भगवान कृष्ण के शक्तिशाली और अनोखे अवतार के बाद से, अन्नकूट और गोवर्धन पूजन का प्रचलन शुरू हुआ था। हिंदू धर्म में, भगवान गोवर्धननाथजी का गाय के गोबर से पूजन किया जाता है। उसके बाद, पर्वतराज/ गिरिराज प्रभु जी की कृपा बनाए रखने के लिए स्वादिष्ट और शुद्ध अन्नकूट भोजन अर्पित किया जाता है। इस दिन मंदिरों में व्यापक रूप से अन्नकूट मनाया जाता है। गोवर्धन पूजन करने के पीछे धार्मिक मान्यता यह है कि सर्वशक्तिमान भगवान कृष्ण लोगों द्वारा गोवर्धन पर्वत का पूजन किए जाने से अति क्रुद्ध भगवान इंद्र के अनुचित अहंकार को चूर करना चाहते थे। इंद्र के विनाशकारी क्रोध से गोकुलवासियों की रक्षा के लिए, भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठ उंगली पर विशाल और शक्तिशाली गोवर्धन पर्वत को उठाकर सभी को इंद्र के क्रोध से बचाया था। 

साथ ही, यह भी कहा जाता है कि इसके बाद कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा के पवित्र दिन स्वयं भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत का पूजन करने के लिए स्वादिष्ट छप्पन भोग तैयार करने का सुझाव दिया गया था।

उस समय से, प्रत्येक वर्ष गोवर्धन पूजन और अन्नकूट की यह परंपरा भगवान श्रीकृष्ण, गोवर्धन पर्वत और अन्नकूट का विधिवत पूजन करके व्यापक रूप से मनाई जाती है।

इस दिन, सभी लोगों द्वारा नए और स्वादिष्ट व्यंजन बनाकर साहस, धन-संपत्ति आदि की इच्छा रखते हुए  मां लक्ष्मी और भगवान श्री कृष्ण से प्रार्थना की जाती है और उनको प्रसन्न करके विभिन्न व्यवसायों में महत्वपूर्ण लाभ प्राप्त किया जाता है। 

ब्रजभूमि से आरंभ हुआ यह पर्व गोवर्धन पर्वत/ Govardhan Parvat, प्रकृति, गौ पूजन पर आधारित होता है। मूल रूप से, श्री कृष्ण द्वारा शुरू किया गया, प्रकृति को समर्पित यह पर्व दिवाली के दूसरे दिन होता है। इस दिन, प्याज या लहसुन से संबंधित किसी भी चीज का प्रयोग नहीं करना चाहिए तथा इस दिन भगवान श्री कृष्ण को भोजन अर्पित करने से प्रसन्नता, संतुष्टि और आनंद की प्राप्ति होती है। 

भगवान इंद्र का पूजन क्यों किया जाता है?/ Why is Lord Indra worshipped?

इस दिन गोवर्धन और भगवान श्रीकृष्ण के साथ ही, इंद्र देव का भी पूजन किया जाता है। यह भगवान इंद्र, अग्नि देव, वरुण आदि उन सभी देवताओं को धन्यवाद सहित आभार प्रकट करने वाला पर्व है जिनकी मदद से अन्न उत्पन्न किया जाता है। लेकिन इंद्र द्वारा क्षमा मांगने पर, श्री कृष्ण द्वारा उन्हें क्षमा करने के परिणामस्वरूप  गोवर्धन के दिन इंद्रदेव का विशेष रुप से पूजन किया जाता है। 

इन्द्र क्रोधित क्यों हुए?/ Why was Indra angry?

ऐसा माना जाता है कि गोवर्धन पूजन से पूर्व प्रत्येक वर्ष ब्रजवासियों द्वारा फसल, मौसम, बारिश आदि प्रदान करने के कारण इंद्रदेव का पूजन किया जाता था। परंतु, द्वापर युग के दौरान, माता यशोदा को इंद्र पूजन की तैयारी करते देख कर श्री कृष्ण द्वारा उन्हें इंद्रदेव की जगह गोवर्धन पर्वत, वृक्षों आदि का पूजन करने के लिए कहां क्योंकि प्रकृति सभी के जीवन को बेहतर और समृद्धशाली बनाने में मदद करती है। इस बात से सभी ब्रजवासियों के सहमत होने से वे गोवर्धन पूजन करने लगे। यह देखकर, भगवान इंद्र के क्रोधित होकर अगले सात दिनों तक लगातार वर्षा करने पर भगवान श्रीकृष्ण ने विशाल गोवर्धन पर्वत को सबसे छोटी उंगली पर उठा लिया। लेकिन अंत में, इंद्र को भगवान कृष्ण से क्षमा याचना करनी पड़ी थी।

गोवर्धन पूजन विधि / Govardhan Puja Procedure

1. गोवर्धन जी को गोबर से मनुष्य रूप में बनाकर, सुंदरतापूर्वक फूलों से सजाया जाता है। गोवर्धन पूजन सुबह या शाम के समय किया जाता है। पूजन के दौरान, गोवर्धन को धूप, दीप, नैवेद्य, जल, फल आदि का भोग अर्पित किया जाता है तथा इस दिन कृषि कार्य में प्रयुक्त होने वाले पशुओं की भी पूजा की जाती है।

2. गोबर से लेटे हुए मनुष्य के रूप में गोवर्धन जी को बनाकर नाभि के स्थान पर मिट्टी का दीपक रखा जाता है तथा पूजन के समय, प्रसाद के रूप में दूध-दही गंगाजल, शहद, बताशे आदि रखें जाते हैं 
3. पूजन के उपरांत, सात परिक्रमा करते हुए जय गोवर्धनजी का उद्घोष करना चाहिए।

4. परिक्रमा के बाद, कमल पुष्प से जल देकर जौ की बुवाई की जाती है।

5. वास्तव में, इस दिन घरों में गोवर्धन गिरि/ Govardhan giri को ईश्वर रूप में पूजने से धन, संतति और गौ धन में वृद्धि होती है।

6. गोवर्धन पूजन के दिन भगवान विश्वकर्मा के साथ सभी कारखानों और उद्योगों में मशीनों का भी पूजन किया जाता है।

गोवर्धन पूजन मंत्र / Govardhan Pujan Mantra

गोवर्धन धराधार गोकुल त्राणकारक/
विष्णुबाहु कृतोच्छ्राय गवां कोटिप्रभो भव//
नैवेद्य अर्पित कर निम्न मंत्र से प्रार्थना करें:
लक्ष्मीर्या लोक पालानाम् धेनुरूपेण संस्थिता।    
घृतं वहति यज्ञार्थे मम पापं व्यपोहतु।।
गोवर्धन आरती/ Govardhan Aarti :
श्री गोवर्धन महाराज, ओ महाराज,
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।
तोपे पान चढ़े तोपे फूल चढ़े,
तोपे चढ़े दूध की धार।
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।
तेरी सात कोस की परिकम्मा,
और चकलेश्वर विश्राम
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।
तेरे गले में कण्ठा साज रहेओ,
ठोड़ी पे हीरा लाल।
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।
तेरे कानन कुण्डल चमक रहेओ,
तेरी झाँकी बनी विशाल।
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।
गिरिराज धरण प्रभु तेरी शरण।
करो भक्त का बेड़ा पार
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।

गोवर्धन पूजन को अन्नकूट क्यों कहा जाता है?/ Why is Govardhan Puja called Annakoot?

 इस पूजन को करते समय, अन्नकूट बनाकर यशोदा नंदन कृष्ण और गोवर्धन पर्वत/ Govardhan Parvat का पूजन किया जाता है। इस कारण ही इसे 'अन्नकूट' नाम दिया गया है। यह अंततः उस प्रकार का भोजन होता है जो सब्जियों, दूध और चावल द्वारा तैयार किया जाता है।

अन्नकूट बनाने की विधि / Method of making Annakoot

अन्नकूट बनाने के लिए सभी मौसमी सब्जियों, दूध, मावा, सूखे मेवे और चावल का उपयोग किया जाता है। साथ ही, ताजे फल और मिठाइयां भगवान के पास लाई जाती हैं। अन्नकूट में छप्पन प्रकार के खाद्य पदार्थ शामिल किए जाते हैं। इन सबके साथ ही, प्रदोष काल (सांय काल) में, पूर्ण विधि-विधान से भगवान श्रीकृष्ण का पूजन किया जाता है तथा गौ पूजन करके हरा चारा खिलाना शुभ माना जाता है।

अन्नकूट पूजन कैसे किया जाता है?/ How is Annakoot worshipped?

-वेदों के अनुसार, इस शुभ अवसर पर वरुण, इंद्र, अग्नि आदि देवताओं का पूजन किया जाता है।
- देवताओं के साथ ही गौओं की भी आरती करके उन्हें फल और मिठाई खिलाई जाती है।  
- गाय का गोबर से गोवर्धन पर्वत का प्रतिबिंब बनाया जाता है।  
- इसके बाद, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य से पूजन किया जाता है। 
- इस दिन घर के प्रत्येक सदस्य द्वारा रसोई घर में खाना बनाया जाता है। 
- भोजन में विभिन्न प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन बनाए जाते हैं। 

गोवर्धन पूजन संबंधित वृतांत/ Events on Govardhan Puja

1. व्यापक रूप से मनाया जाने वाला गोवर्धन पूजन का पर्व प्रकृति और भगवान श्री कृष्ण के प्रति कृतज्ञता और आभार दर्शाने के लिए समर्पित होता है। गोवर्धन पूजन के अवसर पर विभिन्न मंदिरों में अन्नकूट यानि भंडारे जैसे धार्मिक आयोजनों द्वारा लोगों के बीच भोजन का वितरण भी किया जाता है।

2. गोवर्धन पूजन के दिन, गोवर्धन पर्वत/ Govardhan Parvat की परिक्रमा करने से, भगवान श्री कृष्ण के आशीर्वाद और कृपा से आनंद और समृद्धि की प्राप्ति होती है।  

गोवर्धन पूजन कथा / Story of Govardhan worship

गोवर्धन पूजन पर्व से संबंधित एक गंभीर कथा है। कहावतों के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण द्वारा   लोगों को गोवर्धन पूजन करने की सलाह दी गई थी। यह भी कहा जाता है कि एक दिन माता यशोदा द्वारा भगवान इंद्र की प्रार्थना करने पर, श्रीकृष्ण ने अचानक अपनी मां से पूछा- कि वह भगवान इंद्र की पूजा क्यों कर रही हैं? माता ने सरलतापूर्वक जवाब दिया कि सभी निवासियों द्वारा बारिश के लिए भगवान इंद्र की प्रार्थना की जाती है जिससे फसलों की पैदावार में मदद हो और गायों को भी खाने के लिए चारा मिल जाए। माता की बात सुनते ही श्री कृष्ण ने तुरंत उत्तर दिया, कि सभी को भगवान इंद्र की जगह गोवर्धन की पूजा करनी चाहिए क्योंकि विशाल गोवर्धन पर्वत/ Govardhan Parvat पर जाने से गायों को खाने के लिए घास मिलती है। तब माता यशोदा के साथ ही, गांव वालों के भी आश्वस्त होने पर गांव वाले इंद्र के स्थान पर गोवर्धन का पूजन करने लगे। तब ब्रजवासियों को गोवर्धन पूजन करते देखकर, इंद्रदेव ने क्रोधित होकर बारिश शुरू कर दी। भारी मूसलाधार बारिश के कारण, लोगों के घरों में पानी भरने से सिर छुपाने की कोई जगह न मिलने पर, ग्रामीण अपनी समस्याओं को लेकर मदद मांगने भगवान श्री कृष्ण के पास गए। तब लोगों को संकटों से बचाने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर विशाल गोवर्धन पर्वत/ Govardhan Parvat को उठा लिया था जिसके नीचे सभी ब्रजवासियों ने बारिश न रुकने के कारण सात दिनों तक आश्रय लिया था। भगवान कृष्ण ही भगवान विष्णु का दूसरा रूप हैं, इस बात को महसूस करते ही इंद्रदेव को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने बारिश रोक दी। बारिश रुक जाने के बाद, भगवान श्रीकृष्ण ने पर्वत को नीचे रखकर लोगों को गोवर्धन पर्वत/ Govardhan Parvat का पूजन करने  का आदेश दिया। तभी से, कई क्षेत्रों में यह पर्व सुंदरतापूर्वक मनाया जाता है।

गोवर्धन पूजन के दौरान अत्यधिक लाभ कैसे प्राप्त किया जाता है?/ How to get enormous profit during Govardhan Puja? 

आर्थिक समृद्धि और सार्वकालिक सफलता प्राप्त करने के उपाय और मापदंड -
1. किसी गाय को स्नान कराकर उसे अवश्य ही तिलक  लगाना चाहिए। 
2. हमेशा ताजे फल और सब्जियों का प्रयोग करना चाहिए।
3. गौ माता की सात बार परिक्रमा करनी चाहिए।
4. सुरक्षित रहते हुए गाय के खुर के पास मिट्टी रखें।
5. इस मिट्टी में तिलक लगाकर जाने से अवश्य ही सफलता प्राप्त होती है।

बेहतर नौकरी और अवसर प्राप्त करने के लिए -

क) किसी भी शनिवार को जाकर पीपल वृक्ष पर काला धागा बांधना चाहिए।  
ख) धागे में नौ गांठें बांधकर अच्छे बदलाव प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।
ग) उसके बाद, वहां से सीधे घर आ जाना चाहिए।
घ) इससे जल्दी ही नौकरी में बदलाव मिल सकता है (इसके बारे में और अधिक पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक को देखें)।

संतान प्राप्ति के उपाय / Ways to get children

1. दूध, दही, शहद, चीनी, घी, गंगाजल और तुलसी दल मिलाकर पंचामृत बनाएं।

2. इस पंचामृत को शंख में भरकर भगवान श्री कृष्ण को अर्पित करना चाहिए।

3. इसके बाद "माला कृष्ण क्लें" ग्यारह मनकों का जाप करें।

4. इसके बाद पंचामृत ग्रहण करने से, मनोकामना पूर्ण होकर संतान की प्राप्ति होगी (इसके बारे में अधिक पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक को देखें)।

पूजन के दौरान करने योग्य और न करने योग्य सुझाव / Things to do and what not do during Puja hours 

क्या करें?  -
1. पूर्ण विधि-विधान पूर्वक उचित समय पर गोवर्धन पूजन करने के लिए, किसी पंडित को आमंत्रित किया जा सकता है। 

2. प्रातःकाल तेल मालिश करना, और पूजा से पहले स्नान करना

3. गोवर्धन पर्वत/ Govardhan Parvat बनाकर विशालकाय गोवर्धन पर्वत/ Govardhan Parvat का विधिपूर्वक पूजन करना चाहिए।

क्या न करें  -

1. गोवर्धन पूजन और अन्नकूट की व्यवस्था बंद कमरे में नहीं करनी चाहिए। 

2. गौ पूजन करते समय इष्टदेव या भगवान श्रीकृष्ण का पूजन करना नहीं भूलना चाहिए। 

3. इस दिन चंद्र दर्शन नहीं करने चाहिए। 

नौकरी बदलने और संतान प्राप्ति के लिए ज्योतिष संबंधित हमारे विचारों को पढ़ कर आप सहायता प्राप्त कर सकते हैं।

अन्य सभी प्रमुख भारतीय त्योहारों के लिए "भारतीय त्योहारों में ज्योतिष की प्रासंगिकता" जैसे हमारे लेखों द्वारा जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

भाई दूज
26 Oct, 2022

भाई दूज भाई और बहन के पवित्र रिश्ते को मजबूत करने का त्योहार है। भाई दूज या भैया दूज को भाई टीका, यम द्वितीया और भटरू द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है। यह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। यह तिथि दीपावली के दूसरे दिन पड़ती है। इस दिन बहनें अपने भाई के माथे पर तिलक लगाकर उनकी लंबी उम्र, सुख-समृद्धि की कामना करती हैं और बदले में भाई उन्हें उपहार के रूप में काफी चीजें देते हैं। इस दिन मृत्यु के देवता यमराज की भी पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है इस दिन यमराज अपनी बहन यमुना के घर भोजन करने आए थे।

भाई दूज का महत्व/Importance of Bhai Dooj

भाइयों और बहनों के पवित्र रिश्ते को मनाने के लिए समर्पित, भाई दूज हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण त्योहार है। इस पर्व का मुख्य उद्देश्य भाइयों और बहनों के प्रेम और सद्भावना के प्रवाह को हमेशा बनाए रखना है। यमराज और उनकी बहन यमुना का रिश्ता इस बात का सबूत है कि रिश्ते सब से ऊपर होते हैं। भाई दूज हमें काफी चीजें सिखाता है जैसे हमें इससे पता चलता है कि हम अपने जीवन में चाहे कितने भी व्यस्त क्यों न हों, हमें यह प्रयास करना चाहिए कि हम विशेष अवसरों या पर्वों पर अपने परिवार के साथ समय बिताएं। हर साल इस त्योहार को मनाने का यही मकसद होता है।

हम भाई दूज क्यों मनाते हैं?/Why do we celebrate Bhai Dooj?

भाइयों और बहनों के बीच संबंधों को गौरवान्वित करने के लिए समर्पित, यह त्यौहार हिंदू धर्म में अत्यंत महत्व रखता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व यम द्वितीया के नाम से भी विख्यात है।

हम भाई दूज कैसे मनाते हैं?/How do we celebrate Bhai Dooj?

इस पर्व को मनाने का एक अनूठा तरीका है। सुबह-सुबह, बहनें स्नान करती हैं और भगवान विष्णु और भगवान गणेश की पूजा करती हैं। इसके बाद वह अपने भाई के माथे पर तिलक लगाती हैं। भाई अपनी बहन के घर जाते हैं और वहां खाना भी खाते हैं। वह उन्हें उपहार भी देते हैं। इस पर्व पर यमुना नदी में स्नान करना और इस नदी के तट पर पूजा करना बहुत ही शुभ माना गया है।

  • शास्त्रों के अनुसार दीपावली के दो दिन बाद या जब कार्तिक शुक्ल पक्ष की दोपहर को द्वितीया तिथि आती है तो उस दिन भाई दूज मनाया जाता है। यदि दूसरी तिथि दोनों दिन पड़ती है तो अगले दिन भाई दूज मनाने का विधान है। इसके अलावा यदि दूसरी तिथि दोनों दिन की दोपहर को नहीं आती है तो अगले दिन भाई दूज मनाना चाहिए। भाई दूज मनाने के लिए यह तीनो विचार अधिक लोकप्रिय और मान्य हैं।

  • अन्य कथाओं के अनुसार यदि कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि दोपहर (दिन का तीसरा भाग) से शुरू हो तब भाई दूज मनाना चाहिए। इस बात को तार्किक नहीं कहा गया है।

  • भाई दूज के दिन दोपहर में ही भाई को तिलक और भोजन करना चाहिए। इसके अलावा दोपहर में यम पूजन भी करना चाहिए।

 

भाई दूज की कहानी/Story of Bhai Dooj 

एक राजा था जो अपने साले के साथ चौपर खेला करता था। उसका साला इस खेल में हमेशा उससे जीत जाता था। राजा ने सोचा कि वह हर बार जीतता है क्योंकि वह हर साल अपनी बहन के साथ भाई दूज का त्यौहार मनाता है। उसने आदेश दिया कि इस वर्ष उसका साला अपनी बहन के साथ भाई दूज नहीं मनाएगा। उसने सभी द्वार बंद कर दिए और सुनिश्चित किया कि वह किसी भी तरह से प्रवेश न कर सके। यह देख यमराज ने राजा के साले को तुरंत कुत्ते में बदल दिया। कुत्ता महल के अंदर बिना किसी समस्या के चला गया। रानी ने पहचान लिया कि कुत्ता उसका भाई है तब रानी ने उसके माथे पर तिलक लगाया और अपना हाथ उसके सिर पर फेर दिया। कुत्ता तिलक लगवा कर इस पर्व को विधि/Vidhi अनुसार पूर्ण करके वापस चला गया।

अगले दिन रानी का भाई राजा के पास फिर से गया और राजा को चौपर खेलने की चुनौती दी। राजा यह जानकर चौंक गया कि उसका साला उसकी पत्नी से मिला और यहाँ तक की उसके साथ भाई दूज भी मनाया। यह सब सुनने के बाद राजा भी अपनी बहन के साथ भाई दूज मनाने के लिए उसके घर चला गया। यह सुनकर यमराज चिंतित हो गए और सोचने लगे कि यदि ऐसा होता है तो यमपुरी का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। अपने भाई को चिंतित देखकर उसकी बहन यमुना ने उससे कहा, कि भाई, तुम चिंता मत करो, मुझे यह वरदान दो कि जो लोग आज बहन के साथ भोजन करते हैं और मथुरा शहर के विश्रामघाट में स्नान करते हैं, उन्हें यमपुरी नहीं जाना पड़ेगा| वह जीवन और मृत्यु के इस बंधन से मुक्त हो जाएंगे। भगवान यमराज ने अपनी बहन की इच्छा पूरी की, और तब से, सभी बहनों और भाइयों द्वारा यह त्योहार बड़े धूम धाम मनाया जाता है।

भाई दूज पर क्या करें/ What to do on Bhai Dooj 

  • सभी बहनों को अपने भाइयों को अपने घर बुलाना चाहिए और माथे पर तिलक, चंदन और रोली लगा कर पूरे पर्व को विधि/Vidhi के अनुसार करना चाहिए।

  • बहनों को अपने भाइयों को ताम्बुल उपहार में देना चाहिए। ऐसा पौराणिक मान्यता है जाता है कि यह बहन के सौभाग्य का प्रतीक है।

  • भाइयों को यमुना नदी में स्नान करना चाहिए। ऐसा करने से उन्हें अपने यमदोष से मुक्ति मिलती है।

  • भाइयों को अपने घरों में यमुना नदी का पानी लाना चाहिए|

  • बहनों को चावल की खीर बनानी चाहिए। यह पर्व भाइयों और बहनों की लंबी उम्र का प्रतीक है।

  • इस दिन भाइयों को अपनी बहनों को उपहार देना चाहिए।

  • अपनी बड़ी बहन के पैर छूकर आशीर्वाद प्राप्त करें।

  • भाई के माथे पर तिलक लगाते समय इस बात का ध्यान रखें कि उसका मुख उत्तर दिशा की ओर हो।

  • घर के बुजुर्गों का आशीर्वाद जरूर लें।

  • दोनों भाई बहनों को उनके इष्ट देवता की पूजा करनी चाहिए।

भाई दूज पर क्या न करें/ What to not do on Bhai Dooj

  • इस दिन अकेले खाना ना खाएं| आप अपनी बहन के साथ खाना खा सकते हैं। यदि आप अपनी बहन से नहीं मिल पा रहे हैं, तो गाय के पास बैठकर भोजन कर सकते हैं।

  •  इस दिन भाइयों और बहनों को लड़ाई झगड़ा नहीं करना चाहिए।

  • इस दिन अपनी बहन के बनाए भोजन का अनादर न करें।

  • भाई द्वारा दिए गए उपहार का अनादर न करें।

  • इस दिन अपनी बहन से झूठ न बोलें। ऐसा करने से यमराज आप पर क्रोधित हों सकते हैं।

  • इस पर्व की विधि पूरी होने से पहले भाइयों और बहनों को कुछ भी नहीं खाना चाहिए।

  • बहनों को अपने भाइयों के लिए पूरे स्नेह और देखभाल से खाना बनाना चाहिए।

  • तिलक लगाने के बाद भाई को मिठाई खिलाएं|

  • भाई को 'गोला' देना न भूलें क्योंकि यह बहुत पवित्र माना जाता है।

आप अन्य सभी प्रमुख भारतीय त्योहारों के लिए भारतीय त्योहारों में ज्योतिष की प्रासंगिकता/Relevance of Astrology पर इसी तरह के लेख पढ़ कर जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

छठ पूजा
30 Oct, 2022

भारत का लोकपर्व छठ पर्व या छठ पूजा/Chhath Puja कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि पर मनाया जाता है। छठ पूजा को सूर्य षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व दिवाली के छ: दिन बाद मनाया जाता है। छठ पूजा विशेष रुप से उत्तर भारत के बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश राज्य में धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन सूर्य देव और छठी मैया को अर्घ्य (जल) अर्पित करना मुख्य धार्मिक संस्कार होता है। पिछले कुछ सालों से भारत के लोकपर्वों में छठ पूजा के अत्यधिक महत्ता प्राप्त करने के कारण सिर्फ बिहार और झारखंड ही नहीं, बल्कि भारत के अन्य क्षेत्रों में भी अत्यधिक लोकप्रिय और व्यापक रूप से मनाया जाने लगा है। 

बिहार में छठ पूजा की भव्यता और भावना सर्वव्यापी, शानदार और अतुलनीय होती है। मूल रूप से, छठ पूजा सूर्य की उपासना को समर्पित होती है। धार्मिक विश्वासों के अनुसार छठ को सूर्य की बहन माना जाता है। ऐसी मान्यता है, कि छठ पर्व पर सूर्य देव की आराधना करने से छठ माई (छठ मैया) प्रसन्न होकर पूर्ण भक्ति के साथ सूर्य की आराधना करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को धन-संपत्ति, शांति और सद्भाव जैसे वरदान देती हैं।

 छठ पूजा की ऐतिहासिकता/ History of Chhath Puja

हिंदुओं का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार दिवाली, त्योहारों की एक अति सुंदर श्रृंखला के समान है। यह आकर्षक त्यौहार भाई दूज पर खत्म न होकर, छठ तक चलता रहता है। उत्तर भारत का महत्वपूर्ण त्योहार छठ पर्व मुख्यतः: उत्तर प्रदेश और बिहार में मनाया जाता है, लेकिन अब देशभर में उत्साह पूर्वक मनाया जाने लगा है। छठ सिर्फ एक दिन का त्यौहार न होकर चार दिनों तक लगातार चलने वाला भव्य उत्सव है। यह पहले दिन नहाए-खाए के साथ शुरू होकर चौथे दिन उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करने के साथ समाप्त होता है। हिंदू धर्म में छठ का त्यौहार अद्वितीय पौराणिक महत्व रखता है। 

छठ का पौराणिक महत्व/ छठ संबंधी किंवदंतियां/ Mythological significance of Chhath/Legend of Chhath

छठ पर्व के दौरान भगवती छठी की पूजा की जाती है, जिनकी किवदंतियों का उल्लेख ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है। किंवदंतियों के अनुसार, पहले मनु स्वयं के पुत्र, राजा प्रियव्रत की कोई संतान न होने से, पूर्ण रूप से दुखी और अकेले होने पर, ऋषि कश्यप ने सुझाव दिया कि राजा को पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ करना चाहिए। ऋषि के आदेशानुसार, राजा द्वारा यज्ञ कराने के परिणामस्वरूप वरदान की प्राप्ति होने पर रानी मालिनी ने पुत्र को जन्म दिया; लेकिन दुर्भाग्य से बच्चा मृत था। इस दुर्भाग्य ने राजा, रानी और पूरे कुल को और अधिक दुखी कर दिया। 

उनकी इस हानि का शोक मनाते समय, आकाश से एक विमान देवी षष्ठी को लेकर नीचे उतरा। तब राजा द्वारा देवी के सामने श्रद्धापूर्वक नमन करने पर, उन्होंने कहा- मैं ब्रह्मदेव की दत्तक पुत्री देवी षष्ठी हूं। मैं बच्चों की रक्षक होने के साथ ही, उन सभी नि:संतान दंपतियों को उनकी स्वयं की संतान का आशीर्वाद देती हूं जो पूरी भक्ति से मेरी आराधना करते हैं। तब उन्होंने मृत बालक पर अपना हाथ रखा और उनके दिव्य स्पर्श से बच्चा फिर से जीवित हो गया। अपने मृत पुत्र को जीवित देखकर राजा अपनी प्रसन्नता रोक नहीं सके और भक्तिपूर्वक देवी षष्ठी की पूजा करने लगे। इसके बाद से, देवी षष्ठी का आशीर्वाद पाने के लिए लोगों ने उनकी पूजा करना शुरू कर दिया।

छठ पर्व का वैज्ञानिक महत्व/ The Scientific significance of Chhath Parva

छठ पर्व के महत्व के पीछे गहरी वैज्ञानिक अंतर्दृष्टि छिपी हुई है। दरअसल, षष्ठी तिथि एक विशेष खगोलीय घटना है। इस दिन सूर्य की पराबैंगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर अधिक तीव्रता और आवृत्ति के साथ टकराती हैं। षष्ठी तिथि पर किए जाने वाले धार्मिक संस्कारों में संचित पराबैंगनी किरणों के संभावित दुष्परिणामों से पृथ्वी पर जीवन की रक्षा करने की अपार शक्ति होती है। छठ पर्व का विचार सजीव प्राणियों की सूर्य(तारा) की पराबैंगनी किरणों से बचाव करता है।

महाभारत काल में छठ के विचार की शुरुआत/  Observance of Chhath began in Mahabharata Era 

मान्यताओं के अनुसार, छठ का विचार महाभारत काल में शुरू हुआ। सूर्यपुत्र कर्ण ने इस दिन सूर्य की आराधना करके छठ संस्कार को शुरू किया था। सूर्य के परम भक्त कर्ण, प्रतिदिन घंटो तक कमर तक गहरे पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते थे। सूर्य के आशीर्वाद से कर्ण एक पराक्रमी और दुर्जय योद्धा बन गया था। इस युग में भी छठ पर अर्घ्य (अर्घ्य दान) करने की परंपरा पूर्ण श्रद्धा के साथ की जाती है।

द्रौपदी द्वारा छठ व्रत संस्कार/ Draupadi observed Chhath Vrat

छठ पर्व से जुड़ी एक और दंतकथा है। इस दंत कथा के अनुसार, पासों के खेल में पांडवों के द्वारा अपना साम्राज्य हारने के बाद द्रौपदी ने छठ व्रत का पालन किया था। व्रत की शक्ति से द्रौपदी की इच्छा पूर्ण हुई थी और पांडवों को उनका खोया साम्राज्य वापस मिल गया था। लोक कथाओं के अनुसार, सूर्य देव और देवी छठी  भाई-बहन हैं इसलिए छठ के दिन सूर्य की आराधना करना अत्यंत मंगलकारी माना जाता है। 

रावण वध के प्रायश्चित स्वरूप छठ संस्कार/ Observance of Chhath as a penance of killing Ravana 

भगवान राम और देवी सीता से जुड़ी एक पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान राम और देवी सीता के चौदह साल के वनवास के बाद अयोध्या लौटने पर, ऋषियों और संतों के आदेशानुसार उन्होंने रावण को मारने के पाप के प्रायश्चित स्वरूप राज सूर्य यज्ञ करने का फैसला किया। यज्ञ अनुष्ठान कराने के लिए ऋषि मुद्गल को आमंत्रित किया गया। ऋषि मुद्गल ने देवी सीता पर गंगाजल छिड़क कर सुझाव दिया कि उन्हें कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्य आराधना करनी चाहिए। तब ऋषि मुद्गल के आश्रम में रहते हुए देवी सीता ने छ: दिन के लिए सूर्य की आराधना की। 

छठ पर्व कब मनाया जाता है?/ When is Chhath Parva celebrated?

भगवान सूर्य की पूजा को समर्पित छठ पर्व, साल में दो बार चैत्र शुक्ल षष्ठी और कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मनाया जाता है। मगर कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मनाया जाने वाला पर्व अधिक महत्वपूर्ण और मुख्य छठ पर्व है। कार्तिक छठ पूजा अत्यधिक धार्मिक और पौराणिक महत्व रखती है। चार दिन लंबे इस त्यौहार को छठ पूजा, डाला छठ, छठी माई, छठ, छठ माई पूजा, सूर्य षष्ठी पूजा आदि नामों से भी जाना जाता है।

छठ पूजा क्यों मनाई जाती है?/ Why Chhath Puja is observed?

छठ पूजा मनाने और व्रत रखने के विभिन्न कारण हैं। लेकिन छठ पूजा मुख्य रूप से सूर्य की आराधना करके, उनकी कृपा पाने के लिए की जाती है। सूर्य की कृपा से व्यक्ति संपूर्ण वर्ष स्वस्थ रह सकता है। सूर्य अपने भक्तों को भौतिक सुख और समृद्धि भी प्रदान करते हैं। निसंतान दंपत्ति, संतान प्राप्ति के लिए सूर्य का आशीर्वाद पाना चाहते हैं। एक गुणवान संतान पाने की इच्छा से भी छठ व्रत का पालन किया जाता है। ( इसके बारे में अधिक जानकारी नीचे दिए गए लिंक पर उपलब्ध है) यह व्रत सभी सांसारिक और गैर सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए किया जाता है। 

देवी षष्ठी कौन हैं? और उनकी उत्पत्ति कैसे हुई?/ Who is Goddess Shashthi, and how she originated?

देवी छठ, सूर्य देव की बहन मानी जाती हैं। लेकिन छठ व्रत दंतकथाओं के अनुसार, देवी छठ को सर्वोच्च भगवान की पुत्री देवसेना के रूप में दर्शाया गया है। स्वयं देवसेना के अनुसार, वह आरंभिक सृष्टि के छठे भाग, प्रकृति की दिव्य शक्ति की स्त्री अभिव्यक्ति से उत्पन्न होने के कारण, उन्हें षष्ठी कहा जाता है। देवी कहती हैं कि जो कोई भी गुणी संतान चाहता है, उसे कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन धार्मिक क्रियाओं द्वारा मेरी पूजा और व्रत करना चाहिए। 

धार्मिक शास्त्रों में छठ व्रत की दंतकथा भगवान राम और भगवती सीता से भी जुड़ी हुई है। चौदह साल के वनवास से अयोध्या लौटने के बाद, भगवान राम और देवी सीता ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन सूर्य देव की आराधना और षष्ठी व्रत किया था। 

एक अन्य दंतकथा के अनुसार, महाभारत काल में विवाह पूर्व कुंती द्वारा भगवान सूर्य की पूजा करने के कारण उन्हें एक शक्तिशाली और दुर्जेय पुत्र कर्ण का आशीर्वाद मिला था। भगवान सूर्य के आशीर्वाद से अविवाहित मां कुंती द्वारा उत्पन्न कर्ण को, अपनी ही मां द्वारा नदी में त्याग दिया गया था, जो स्वयं सूर्य का परम भक्त होने पर पानी के अंदर खड़े होकर घंटों सूर्य की आराधना किया करता था। मान्यता है, कि सूर्य ने कर्ण को मंगल कामना और महान शक्तियों का आशीर्वाद दिया था। इस कारण, लोग कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन सूर्य की आराधना करके उनका आशीर्वाद और कृपा पाना चाहते हैं।

चार दिन तक चलने वाला छठ पर्व/ Chhath Parva continues till four days

सूर्य की बहन देवी छठ का छठ पर्व चार दिनों तक चलता है। छठ का त्यौहार सूर्य आराधना को समर्पित होता है। देवी छठ (छठ मैया) को संतुष्ट करने के लिए, षष्ठी तिथि को सूर्य की पूजा की जाती है। लोग छठ देवी(छठ मैया) का ध्यान करते हुए, अपने स्थान के समीप स्थित किसी भी जल निकाय या गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियों के तट पर सूर्य की पूजा करते हैं। छठ पूजा का मुख्य और सबसे महत्वपूर्ण संस्कार नदी तालाब या झील जैसे किसी जल निकाय पर पवित्र स्नान करके, सूर्य को अर्घ्य चढ़ाकर सूर्य की आराधना करना होता है। चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व के पहले दिन घरों को विस्तृत रूप से झाड़ कर सफाई की जाती है। ग्रामीण भारत इस परंपरा का अपने घरों की व्यापक रूप से सफाई करके धार्मिक रूप से पालन करता है। 

उत्सव के चार दिनों के दौरान, केवल शाकाहारी भोजन किया जाता है। दूसरे दिन खरना की रस्म की जाती है। तीसरे दिन अस्त होते सूर्य को संध्या अर्घ्य देकर सूर्य आराधना की जाती है। उत्सव के चौथे दिन उगते सूर्य को ऊषा अर्घ्य अर्पित किया जाता है। छठ के दिन व्रत रखना अत्यंत शुभ माना जाता है। जो कोई भी पूर्ण भक्ति और धार्मिक संस्कारों के अनुसार छठ व्रत का पालन करते हैं, उन पर सूर्य की कृपा से धन और आनंद की प्राप्ति होती है। छठ के दिन सूर्य की आराधना करने से निसंतान दंपतियों को एक नेक संतान की प्राप्ति होती है।

 नहाए-खाए- छठ पूजा का प्रथम दिवस 

यद्यपि, छठ पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मनाई जाती है लेकिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को नहाए खाए संस्कार के साथ उत्सव की शुरुआत हो जाती है। मान्यताओं के अनुसार, छठ व्रत का पालन करने वाले व्यक्ति/व्रती जल निकाय विशेषकर नदी में पवित्र स्नान करके नए कपड़े पहनते हैं और प्रसाद के रूप में शाकाहारी भोजन गृहण करते हैं। प्रथा के अनुसार, व्रतियों के पहले भोजन करने के बाद परिवार के अन्य सदस्य भोजन गृहण करते हैं। 

खरना- छठ पूजा का दूसरा दिन

कार्तिक शुक्ल पंचमी के दिन व्रती पूरे दिन व्रत/उपवास रखते हैं और शाम को पूजा करने के बाद भोजन ग्रहण करते हैं। दूसरे दिन की विधि को खरना के नाम से जाना जाता है। इस दिन व्रती पूरा दिन खाने-पीने यहां तक कि पानी की एक बूंद पीने से भी परहेज करते हैं। शाम को चावल और गुड़ की खीर बनाई जाती है। खीर  बनाने में नमक और चीनी का प्रयोग नहीं किया जाता है। शाम को प्रसाद के रूप में चावल पीठा और घी लगी रोटी परोसी जाती है। 

संध्या अर्घ्य- छठ पूजा का तृतीय दिवस

कार्तिक शुक्ल षष्ठी उत्सव के तीसरे दिन संध्या काल के दौरान सूर्य को संध्या अर्घ्य दिया जाता है। शाम के समय बांस की टोकरी में मौसमी फल रखे जाते हैं और सूपे (टोकरी) को ठेकुआ, चावल के लड्डू तथा अन्य वस्तुओं से सजाया जाता है। इन सभी का प्रबंध करने के बाद व्रती अपने परिवार के साथ पानी के अंदर खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य चढ़ाते हैं। अर्घ्य देते समय सूर्य को जल और दूध अर्पित करके सूपे की टोकरी की सामग्री अर्पित करके छठी मैया की पूजा की जाती है। शाम को डूबते सूर्य की आराधना करने के बाद रात को देवी छठी को समर्पित लोक गीत गाए जाते हैं और व्रत की कथा सुनाई जाती है।

ऊषा अर्घ्य- छठ का चतुर्थ दिवस

छठ पर्व के अंतिम दिन भगवान सूर्य को ऊषा अर्घ्य दिया जाता है। भक्त, सूर्योदय से पूर्व ही नदी तटों पर पहुंच जाते हैं और उठते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं। तब व्रती अपने संपूर्ण परिवार की शांति और समृद्धि तथा अपने बच्चों के लंबे और समृद्धशाली जीवन के लिए देवी छठ से प्रार्थना करते हैं। सूर्य को अर्घ्य चढ़ाने और पूजा करने के बाद, व्रती कच्चे दूध का काढ़ा पी कर और थोड़ा प्रसाद लेकर अपना व्रत तोड़ते हैं। व्रत खोलने को 'व्रत पारण' कहा जाता है।

छठ पूजा की विधि/ धार्मिक क्रियाएं/ Chhath Puja Vidhi/Rituals

१) छठ पूजा से पहले नीचे बताई गई वस्तुओं को इकट्ठा करके सभी महत्वपूर्ण धार्मिक क्रियाओं का पालन करते हुए भगवान सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए। 

२) तीन बड़ी बांस की टोकरियां, बांस या पीतल से बने सूपे/टोकरियां, एक प्लेट/थाली, दूध और गिलास। 

३) चावल, सिंदूर, दीपक, नारियल, हल्दी, गन्ना, थोड़े कम रतालू, सब्जियां और शकरकंद। 

३) नाशपाती या एक बड़ा नींबू, शहद, एक पान का पत्ता, साबुत सुपारी,केराव(छोटी हरी मटर), कपूर, चंदन और मिठाइयां। 

४) प्रसाद को चढ़ावे के लिए ठेकुआ, मालपुआ, खीर-पूरी, सूजी हलवा और चावल के लड्डू लेने चाहिए।

५) छठ के दिन सूर्योदय से पहले जागना चाहिए।

६) व्यक्ति को समीप में स्थित किसी झील, तालाब या नदी में पवित्र स्नान करना चाहिए। 

७) पवित्र स्नान के बाद पानी में खड़े होकर, धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ उगते सूर्य की पूजा करनी चाहिए।

८) सूर्य को शुद्ध घी का दीपक जलाकर धूप और फूल अर्पण करने चाहिए।

९) छठ के दिन, जल में सात तरह के फूल चावल चंदन और तिल मिलाकर सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए। 

१०) श्रद्धापूर्वक नमन करके, भगवान सूर्य से प्रार्थना करनी चाहिए और नीचे बताए गए मंत्रों में से किसी एक मंत्र का 108 बार जाप करना चाहिए- "ॐ घृणि सूर्याय नमः", "ॐ घृणि: सूर्याय आदित्य", "ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय सहस्रकिरणराय मनोवांछित फलम् देहि देहि स्वाहा"। 

११) अर्घ्य अर्पित करने की सही विधि उपरोक्त वस्तुओं को बांस की टोकरी में रखकर, अर्घ्य देते समय प्रसाद की वस्तुओं के साथ जलता हुआ दीपक सूपे में रखना चाहिए। फिर नदी के अंदर खड़े होकर सूर्य भगवान को अर्घ्य देना चाहिए। 

१२) अपनी क्षमतानुसार, ब्राह्मणों और गरीबों को भोजन सामग्री दान करनी चाहिए। 

१३) गरीबों को वस्त्र, भोजन, अनाज आदि का दान करना चाहिए।

छठ पूजा से संबंधित कुछ मौलिक जानकारियां/ Some basic information regarding Chhath Puja

छठ का लोकपर्व जो सूर्य षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश से आए प्रवासी लोगों द्वारा दुनिया भर में मनाया जाता है। उत्सव की बढ़ती लोकप्रियता के बावजूद, भारतीयों का एक बड़ा वर्ग आज भी छठ पूजा से संबंधित मौलिक जानकारियों से परिचित नहीं है। इसके अलावा, इस पर्व को प्रत्येक वर्ष मनाने वाले लोगों के मन में भी इस उत्सव से संबंधित कई सवाल उठते हैं।

१) सूर्य षष्ठी व्रत या छठ में किन देवताओं को पूजा जाता है?/ Which deities are worshipped on Chhath or Surya Shashti Vrat?

 छठ या सूर्य षष्ठी व्रत के दिन दैवीय शक्ति के प्रत्यक्ष स्वरूप और पृथ्वी पर जीवन के मुख्य स्त्रोत सूर्य की मुख्य देवता के रूप में पूजा की जाती है। सूर्य के साथ देवी षष्ठी, जिन्हें छठ मैया के नाम से भी जाना जाता है की भी पूजा की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवी षष्ठी बच्चों को अच्छे स्वास्थ्य (इससे संबंधित अधिक जानकारी पाने के लिए नीचे दिए गए लिंक का प्रयोग किया जा सकता है।) और लंबी उम्र का आशीर्वाद देकर सभी प्रतिकूलताओं से बचाती हैं। इस दिन सूर्य देव की पत्नियों- उषा और प्रत्यूषा को भी अर्घ्य दिया जाता है। छठ व्रत के दौरान, सूर्य और देवी षष्ठी की एक साथ पूजा की जाती है और इस कारण ही छठ पर्व भारत का सबसे अद्वितीय और लोकप्रिय उत्सव है।

२) सूर्य एक महत्वपूर्ण हिंदू देवता हैं, लेकिन छठ देवी कौन है?/ Sun is an important Hindu deity, but who is Goddess Chhath? 

पृथ्वी पर जीवन की सृजनात्मक शक्ति प्रकृति का अपने ही अभिन्न अंग के रूप में प्रकट होने को, धार्मिक ग्रंथों में देवसेना के रूप में वर्णित किया गया है। प्रकृति का छठा भाग होने के कारण देवसेना को देवी षष्ठी माना जाने लगा तथा ब्रह्मदेव की दत्तक पुत्री के रूप में भी जाना जाता है। पुराणों में उन्हें कात्यायनी के नाम से भी बताया गया है। क्षेत्रीय स्तर पर, षष्ठी तिथि को छठ मैया माना जाता है जो नि:संतान दंपतियों को संतान का आशीर्वाद देती है और संसार के सभी बच्चों की रक्षा करती हैं।

३) धार्मिक ग्रंथों में सूर्य आराधना का उल्लेख कहां मिलता है?/ Where do you find the mention of Sun-worship in our religious scripture?

हमारे धार्मिक शब्दों में सूर्य को एक गुरु, एक शिक्षक माना गया है। सूर्य भगवान हनुमान के भी गुरु थे। बुरी ताकतों पर विजय पाने के लिए रावण पर अंतिम तीर चलाने से पहले, भगवान राम ने सूर्य का आशीर्वाद पाने के लिए "आदित्यहृदयस्तोत्रम्" का जाप किया था। भगवान कृष्ण के पुत्र सांबा ने कुष्ठ  रोग से पीड़ित होने पर भगवान सूर्य की आराधना करके रोग से छुटकारा पाया था। (इससे संबंधित अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर सकते हैं।) वैदिक काल के पहले समय से ही आदिम देव सूर्य की आराधना की जाती है। 

४) सनातन धर्म के अन्य देवताओं में सूर्य का क्या स्थान है?/ What is the place of the Sun among other deities of Sanatana Dharma? 

सूर्य उन पांच प्रमुख देवताओं में स्थित हैं जिनकी किसी भी धार्मिक समारोह या कार्यक्रम में सबसे पहले पूजा की जाती है। मत्स्य पुराण के अनुसार, सामूहिक रूप से इन देवताओं को पंचदेव कहा जाता है- भगवान सूर्य, भगवान गणेश, देवी दुर्गा, भगवान शिव और भगवान विष्णु।

५) भगवान सूर्य की आराधना करने के क्या लाभ होते हैं और इस विषय पर पुराणों का क्या मत है?/ What are the benefits of worshipping the Sun God, and what does Puranas opine on this matter? 

भगवान सूर्य एक कृपालु और दयालु देता है जो अपने सभी भक्तों को लंबी उम्र, स्वस्थ जीवन, धन-समृद्धि, संतान, ऐश्वर्य, प्रसिद्धि, भाग्य और सफलता प्रदान करते हैं। सबसे बढ़कर, वह पृथ्वी पर प्रकाश का मौलिक स्त्रोत हैं जो लोगों को अंधकार पर विजय प्राप्त करने के लिए आलोकित करते हैं। जो भी पूर्ण भक्ति के साथ सूर्य की आराधना करता है उसे सभी मानसिक और शारीरिक कष्टों से छुटकारा मिल जाता है तथा जीवन में कभी भी दरिद्रता, कष्ट, दुख और अंधापन का सामना नहीं करना पड़ता है। ब्रह्मदेव की महिमा के समान ही सूर्य को माना जाता है। संपूर्ण ब्रह्मांड के रक्षक सूर्य अपने भक्तों को पुरुषार्थ अर्थात धर्म (धार्मिकता), अर्थ (समृद्धि), काम (आनंद) और मोक्ष (मुक्ति) का आशीर्वाद देते हैं। 

६) छठ पूजा के दौरान लोग नदी तटों या झील और तालाबों के आसपास क्यों एकत्रित होते हैं?/ Why do people gather at river banks or around lake and ponds during Chhath Puja?

छठ पूजा पर अर्घ्य अर्पित करके सूर्य की आराधना करना सबसे महत्वपूर्ण संस्कार होता है। गंगा जैसी नदियों में पवित्र स्नान करके, जल के अंदर खड़े होकर भगवान सूर्य को अर्घ्य अर्पित करना अत्यधिक शुभ माना जाता है। हालांकि, यह पूजा किसी भी साफ स्थान पर भी की जा सकती है। 

७) छठ के दिन जल निकायों के चारों ओर एकत्रित भारी भीड़ के बीच आराम से पूजा करने के लिए क्या उपाय लिए जा सकते हैं?/ A large crowd gathered around water bodies on Chhath. What measures can one take to comfortably perform the Puja? 

भीड़-भाड़ वाले नदी तटों पर बहुत से लोग छठ पूजा करना पसंद नहीं करते इसलिए घर पर पूजा करने की पद्धति तेजी से लोकप्रिय हो रही है। कई लोग अपने आंगन या छत से अर्घ्य अर्पित करके छठ व्रत का पालन करने लगे हैं। लोग बदलते समय के साथ अपनी सुविधानुसार रीति-रिवाजों को अपनाने लगे हैं। 

८) अधिकतर महिलाएं छठ व्रत का पालन क्यों करती हैं?/ Why do mostly women observe Chhath Vrat? 

अपने परिवार की सुरक्षा और भलाई को सुनिश्चित करने के लिए, महिलाओं द्वारा विभिन्न संस्कारों और पूजा-पाठों को करने के लिए अत्यधिक कष्ट उठाना बहुत ही सामान्य बात है। सामान्य रूप से, यह महिलाओं के त्यागपूर्ण स्वभाव से संबंधित है। अतः, यह व्रत महिलाएं अधिक रखती हैं। हालांकि, पुरुष और महिलाएं दोनों यह व्रत कर सकते हैं। निसंतान महिलाएं, संतान प्राप्ति का आशीर्वाद पाने के लिए इस व्रत का पालन करती हैं। माताएं अपने बच्चों की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए इस व्रत का पालन करती हैं। 

९) क्या यह पूजा किसी भी सामाजिक स्थिति या जाति के व्यक्ति द्वारा की जा सकती है?/ Can this Puja be performed by a person of any social status or caste? 

सूर्य अपने अधीन किसी के भी साथ भेदभाव न करके, हम पर एकरूपता और समान रूप से अपना प्रकाश और ऊर्जा प्रदान करते हैं। वर्ण या जाति के आधार पर कोई प्रतिबंध नहीं होने के कारण, सभी जाति और वर्ण के लोग इस पूजा को कर सकते हैं। समाज के सभी वर्गों के लोग पूर्ण भक्ति के साथ छठ पूजा कर सकते हैं। प्रत्येक व्यक्ति एकता और भाईचारे की भावना के साथ इन धार्मिक क्रियाओं में भाग ले सकते हैं। सूर्य में आस्था रखने वाले सभी धर्म या जाति के व्यक्ति छठ पूजा कर सकते हैं।

१०) क्या छठ पूजा कोई सामाजिक संदेश देती है?/ Does Chhath Puja give any social message?

सूर्य षष्ठी व्रत के दौरान समान भक्ति भावना से डूबते और उगते सूर्य की पूजा करते हैं, जो इस अनूठे पर्व के बारे में कई महत्वपूर्ण संकेत और ज्ञान प्रदान करता है। तथा दुनिया में भारत की आध्यात्मिक सर्वोच्चता को प्रदर्शित करता है। यह उत्सव जाति के आधार पर भेदभाव न करके, सभी लोगों के साथ समान व्यवहार करता है। सूर्य को प्रसाद अर्पित करने वाली बांस की टोकरी हमारे समाज के वंचित/दलित लोगों द्वारा बनाई जाती हैं। यह सभी विषय छठ के सामाजिक महत्व को अधिक स्पष्ट करते हैं।

११) छठ पूजा से बिहार का विशेष संबंध क्यों है?/ Why is there a special association of Bihar with Chhath Puja?

इस लोक पर्व के दौरान, भगवती षष्ठी के साथ सूर्य की आराधना करने की अनोखी परंपरा होने के कारण छठ पर्व का बिहार से गहरा संबंध है। बिहार में सूर्य आराधना की परंपरा सदियों से चली आ रही है। सूर्य पुराण में, बिहार के कई प्रसिद्ध सूर्य मंदिरों का उल्लेख देखा जा सकता है। साथ ही, बिहार सूर्यपुत्र कर्ण का जन्म स्थान है। यह सभी बातें बिहारी लोगों के दिलों में सूर्य के प्रति विशेष भक्ति बनाए रखती हैं। 

१२) बिहार के देव सूर्य मंदिर का क्या महत्व है?/ What is the significance of Bihar’s Deo Surya Mandir? 

इस मंदिर को अद्वितीय बनाने वाला सबसे महत्वपूर्ण कारक यह है कि इस मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार पश्चिम दिशा में खुलता है; जबकि सामान्यतः सूर्य मंदिर पूर्व दिशा में खुलते हैं। मान्यता यह है, कि इस अनोखे सूर्य मंदिर का निर्माण शिल्पकला के भगवान विश्वकर्मा द्वारा किया गया था। यह सूर्य मंदिर हिंदू वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। 

१३) कार्तिक माह के अलावा, साल में छठ पूजा कब बनाई जाती है? Apart from the Kartik month, when is Chhath Puja observed in a year?

छठ पर्व कार्तिक मास के अलावा, चैत्र शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तिथि तक भी मनाया जाता है। बोलचाल की भाषा में, इस छठ को चैती छठ भी कहा जाता है।

१४) छठ पूजा के दौरान, कुछ भक्त भूमि पर साष्टांग मुद्रा में नदी के किनारे तक पहुंचने का कष्ट क्यों उठाते हैं?/ During Chhath Puja, why some devotees take pains such as prostrating and reaching the river banks by rolling over the ground?

बोलचाल की भाषा में, इस प्रथा को "कष्टी देना" कहा जाता है, जिसका अर्थ "दर्द लेने के" रूप में होता है। ज्यादातर मामलों में, विभिन्न कारणों से शपथ या प्रतिज्ञा करने वाले लोग, इस क्रिया को भक्ति के संकेत के रूप में करते हैं। 

गुणवान संतान प्राप्त करने, अच्छे स्वास्थ्य और विशिष्ट रोगों के लिए ज्योतिष संबंधित हमारे विचारों की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। 

सभी प्रमुख भारतीय त्योहारों के लिए "भारतीय त्योहारों में ज्योतिष की प्रासंगिकता" जैसे हमारे लेखों से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

देव उठानी एकादशी
04 Nov, 2022

सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में होने वाली एकादशी को देवोत्थान, देवउठनी  या प्रबोधिनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। सामान्यतः यह एकादशी दिवाली के त्योहार के बाद होती है। आषाढ़ शुक्ल देवशयनी एकादशी के दिन निद्रा में जाने के बाद, कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष में होने वाली एकादशी को देवोत्थान एकादशी के नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है, कि इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में चार महीने की निद्रा के बाद जागते हैं। भगवान विष्णु के निद्राकाल के इन चार महीनों में कोई विवाह या समारोह जैसे कार्य नहीं किए जाते हैं। देवोत्थान एकादशी के दिन, भगवान हरि के उत्थान के बाद ही सभी शुभ कार्य शुरू होते हैं। इस दिन तुलसी विवाह भी किया जाता है और कहा जाता है कि इस दिन व्रत करने वाले व्यक्ति को बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। 

देवोत्थानी एकादशी का महत्व/ Importance of Dev Uthani Ekadashi

हमारे वेदों और पुराणों में ऐसी मान्यता है, कि दिवाली के बाद होने वाली इस एकादशी के दिन ईश्वर का उत्थान होता है इसलिए विवाह, उपनयन, या गृह प्रवेश आदि जैसे सभी शुभ कार्य देवोत्थानी ग्यारस के बाद से शुरू होते हैं। इसी कारण, इस ग्यारसी के दिन तुलसी विवाह भी किया जाता है। घरों में चावल के आटे से चाक बनाया जाता है तथा बांस के छत्र/कैनोपी के बीच भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। इस दिन पटाखे भी जलाए जाते हैं। देवोत्थानी ग्यारसी को, आमतौर पर छोटी दिवाली के नाम से भी जाना जाता है। ग्यारसी के इस दिन से मंगल का संवाहक फिर से अपनी शक्ति प्राप्त करता है। कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन तुलसी विवाह के साथ ही घर में सभी सकारात्मक कार्य सुचारू रूप से किए जा सकते हैं। तुलसी का पौधा प्रकृति का चित्रण करने के साथ ही एक औषधीय पौधा भी माना जाने के कारण, लाभप्रद होने से सभी को दान में दिया जाता है। चार महीनों की निद्रा से भगवान विष्णु के जागने के बाद, उस क्षण के बाद से सभी शुभ कार्य किए जा सकते हैं। भारतीय कैलेंडर के अनुसार, एकादशी का दिन वास्तव में नीरस होने के कारण, विशेष रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। इस दिन से विवाह और कई अन्य शुभ कार्यक्रमों की शुरुआत होती है। इस दिन व्रत रखने का भी अत्यधिक महत्व बताया गया है। महिलाएं तुलसी विवाह के दिन अपने लॉन/lawn को मलमल से सजाकर, इस त्यौहार को भजन और गीतों के साथ मनाती हैं। 

देवोत्थान एकादशी क्यों मनाई जाती है?/ Why is Dev Uthani Ekadashi celebrated?

श्री हरि के निद्रा से जागने के कारण, इस दिन को देव प्रबोधिनी एकादशी या देवउठनी ग्यारस कहते हैं। चार महीनों तक रुके, सभी मांगलिक कार्य भी इस दिन से शुरू हो जाते हैं। विष्णु पुराण के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी, जिसे हरिशयनी एकादशी भी कहा जाता है, के दिन श्री हरि के योग निद्रा में सोने के बाद, कार्तिक मास की एकादशी के दिन देवताओं द्वारा जगाए जाने पर शंखासुर नामक भयानक असुर का विनाश किया था। भगवान विष्णु की चार महीनों की योग निद्रा के दौरान, हम स्वाध्याय और पूजा द्वारा एकत्रित ऊर्जा को अपने कार्यों में लगाकर जीवन में लाभ प्राप्त कर सकते हैं। 

पंचभिका व्रत/ Panchashika fast

कार्तिक पंचतीर्थ महास्नान भी शुरू होकर कार्तिक पूर्णिमा तक जारी रहता है। पंचभिका व्रत, कार्तिक माह की एकादशी से शुरू होता है जिसमें निर्जला (बिना पानी के) रहकर पांच दिन तक स्नान किया जाता है, जिसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की पूर्ति के लिए करते हैं। पद्म पुराण में वर्णित एकादशी महात्म्य के अनुसार,  देवोत्थान एकादशी व्रत का फल हजार अश्वमेध यज्ञ और सौ राजसूय यज्ञ के बराबर होता है। एकादशी के दिन व्रत रखना ज्ञानवर्धक और आनंददायक होता है इसलिए पवित्र नदियों में स्नान करके भगवान विष्णु की आराधना करने का अत्यधिक महत्व है। एकादशी के इस व्रत से संसार में जन्म लेने के बाद किए जाने वाले पापों को कम करने और जन्म-मृत्यु के चक्र से बाहर निकलने में आसानी होती है। 

दीपदान के लाभ/ Benefits of donating a lamp

ऐसा कहा जाता है, कि नियमानुसार देवोत्थान एकादशी भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप और देवी वृंदा तुलसी के विवाह का दिन होता है। भगवान विष्णु की निद्रा के चार महीनों के दौरान, सृष्टि के कार्यों से मुक्त होने पर भगवान रुद्र के शांत हो जाने पर, भगवान विष्णु चार महीनों लंबी निद्रा से जागने के बाद, ब्रह्मांड के प्रबंधन कार्यों को फिर से शुरू करते हैं। अतः, इस दिन पूर्ण समर्पण और विश्वास के साथ भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। दिन के उजाले में घर की छत पर दीपक रखकर, आनंद और सुख में वृद्धि करने के लिए रात में रोशनी करके घर के किसी भी हिस्से में अंधेरा नहीं होने देना चाहिए। 

तुलसी पत्र न तोड़ें/ Do not pluck basil leaves 

देवोत्थान एकादशी के दिन पौधे में से तुलसी नहीं तोड़नी चाहिए। एकादशी के दिन शालिग्राम रूप में भगवान विष्णु और भगवती तुलसी का विवाह होने के कारण, इस दिन तुलसी पत्र टूटी या जीर्ण अवस्था में नहीं होने चाहिए। तुलसी के पौधे के नीचे दीपक जलाना चाहिए। अगले दिन, द्वादशी तिथि को तुलसी पत्र खाकर व्रत खोलना चाहिए। व्रत करने वाले व्यक्ति को तुलसी पत्र स्वयं न तोड़कर, व्रत न करने वाले बच्चों या बड़ों से तुलसी पत्र तुड़वाकर ले लेना चाहिए।

आखिर श्रीहरि निद्रा में क्यों जाते हैं?/ After all, Why does Shri Hari fall asleep?

एक समय की बात है भगवान विष्णु से उनकी प्रिया लक्ष्मी जी ने कहा- प्रभु, आप पूरे दिन जागते हैं और जब निद्रा लेते हैं, तो वर्षों के लिए निद्रा में चले जाते हैं, जिससे प्रकृति का संतुलन बिगड़ जाता है इसलिए इसे समझते हुए योजनानुसार निद्रा लें, जिससे मेरी भी मदद हो जाए। लक्ष्मी जी की बात सुनकर भगवान विष्णु ने मुस्कुराकर उत्तर दिया- देवी, आपने सत्य और उचित ही कहा है। मेरे जागने से अन्य सभी देवताओं को और विशेष रूप से आपको, मेरी सेवा के कारण विश्राम नहीं मिल पाता है। आज से, मैं वर्षा ऋतु में चार महीनों के लिए निद्रा में जाऊंगा, जो अल्पनिद्रा और योग निद्रा कहलाएंगे, जिससे मेरे अनुयायियों पर परम कृपा बनी रहेगी। इस अवधि के दौरान,  मेरी निद्रा की भावना का ध्यान रखने वाले सभी भक्तों के घरों में हमेशा आपके साथ वास करके, कृपा बरसाऊँगा। 

तुलसी-शालिग्राम विवाह/ Tulsi Shaligram marriage

कार्तिक मास में स्नान करने वाली महिलाओं द्वारा, एकादशी के दिन भगवान विष्णु, जिन्हें शालिग्राम के नाम से भी जाना जाता है, और विष्णुप्रिया तुलसी का विवाह कराया जाता है। तुलसी वृक्ष और शालिग्राम का विवाह समारोह सुंदर से मंडप में किया जाता है। समारोह के दौरान, नामाष्टक सहित विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार, इस तुलसी शालिग्राम विवाह को मनाने का कारण सुखी वैवाहिक जीवन और पुण्य की प्राप्ति होता है। कार्तिक मास में तुलसी वृक्ष दान करने से बड़ा कोई दान नहीं होता। 

पृथ्वीलोक में भगवती तुलसी को आठ नामों से जाना जाता है, जो इस प्रकार हैं- वृंदावनी, वृंदा, विश्वपूजिता, विश्वपावनी, पुष्पसारा, नंदिनी, कृष्ण जीवनी और तुलसी। श्री हरि के पवित्र प्रसाद में तुलसी पत्र का होना अनिवार्य होता है और भगवान की माला और चरणों में तुलसी पत्र अर्पित किए जाते हैं। 

देवोत्थान एकादशी व्रत और पूजा विधि/ Devotthan Ekadashi Vrat and Puja Vidhi

  • प्रबोधिनी एकादशी के दिन जागृत होने के कारण भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। इस दिन किए जाने वाले धार्मिक कार्य इस प्रकार हैं- 
  • इस दिन सुबह उठकर व्रत रखते हैं और भगवान विष्णु का ध्यान करते हैं।
  • घर की सफाई और स्नान करने के बाद घर के प्रांगण में भगवान विष्णु के पद चिन्ह बनाए जाते हैं।
  • गेरू को ओखली में कूटकर चित्र बनाने के बाद फल, मिठाई, बेर, सिंघाड़ा, मौसमी फल और गन्ना रखकर धागे से ढक दिया जाता है।
  • इस दिन, रात्रि में घर के बाहर और पूजा स्थल पर दीपक जलाकर प्रकाश करते हैं।
  • रात्रि में, प्रत्येक पारिवारिक सदस्य भगवान विष्णु और अन्य देवी देवताओं की पूजा करते हैं। 
  • इसके बाद भगवान विष्णु को शंख, घंटे-घड़ियाल आदि की मदद से जागृत किया जाता है और इस वाक्य को दोहराया जाता है- उठो देव, बैठो देव, अंगुरिया चटकाओ देव, नई कपास, नया सूत, कार्तिक मास आया देव।

मंत्रों का जाप/ Chanting of Mantras

हिंदू धर्म में, मंत्रों के जाप का अत्यधिक महत्व होता है। मंत्रों का जाप लगभग सभी विधि-विधानों द्वारा किया जाता है। देवउठनी एकादशी के दिन विधि-विधानों द्वारा मंत्र जाप, पाठ, तारों, घंटी की आवाज और भजन-कीर्तन द्वारा ईश्वर को जागृत किया जाता है। 

जाप किए जाने वाले मंत्र/ This mantra is chanted

"उत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पतये। त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत्‌ सुप्तं भवेदिदम्‌॥”

"उत्थिते चेष्टते सर्वमुत्तिष्ठोत्तिष्ठ माधव। गतामेघा वियच्चैव निर्मलं निर्मलादिशः॥"

”शारदानि च पुष्पाणि गृहाण मम केशव।" 

उपरोक्त मंत्रों को नहीं जानने पर या मंत्रोच्चार शुद्ध नहीं होने पर, श्री नारायण को उठो देव, बैठो देव बोलकर जागृत किया जाता है। श्री हरि के उत्थान के बाद, षोडशोपचार विधि द्वारा उनकी पूजा की जाती है। भाग्य और सुख में वृद्धि करने के लिए भगवान का चरणामृत लेना चाहिए। माना जाता है कि चरणामृत सभी रोगों का नाश करता है और अकाल मृत्यु से रक्षा करके सभी कष्टों को हरता है।  देवोत्थानी एकादशी के दिन व्रत और विष्णु स्तुति का पाठ तथा शालिग्राम और तुलसी महिमा का पाठ करना चाहिए।

देवोत्थानी एकादशी पौराणिक व्रत कथा/ Devothani Ekadashi: Mythological Fast Story

एक बार एक राजा था और उसके राज्य में सभी एकादशी का व्रत रखते थे। एकादशी के दिन पशुओं सहित कोई भी भोजन नहीं दिया जाता था। एक दिन दूसरे राज्य से एक आदमी ने राजा के पास आकर नौकरी पर रखने का अनुरोध किया। राजा ने उसे नौकरी पर रखने की सहमति देने से पहले शर्त रखी कि उसे एकादशी के दिन को छोड़कर प्रत्येक दिन भोजन दिया जाएगा। उस समय उस आदमी ने राजा की शर्त मान ली लेकिन एकादशी के दिन जब उसे फल दिए गए तो उसने फल लेने से मना कर दिया और राजा के पास जाकर विनती की कि यह फल उसके लिए पर्याप्त नहीं है और वह भूख से मर जाएगा और उसने राजा से खाना देने की विनती की। इसके बाद  राजा के शर्त याद दिलाने के बाद भी वह खाना छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुआ इसलिए राजा ने उसे आटा, दाल, चावल आदि दे दिए। राजा से भोजन प्राप्त करने के बाद, उस आदमी ने सामान्य रूप से नदी में स्नान करके भोजन तैयार करना शुरू किया। खाना बन जाने के बाद, वह भगवान को आकर खाने के लिए बुलाने लगा। उसके पुकारने पर भगवान पितांबर धारण करके चतुर्भुज रूप में आए और उसके साथ प्रेम से भोजन करने लगे। 

भोजन करने के बाद ईश्वर वहीं रुक गए और वह आदमी अपने काम पर चला गया। पन्द्रह दिन के बाद दोबारा एकादशी आने पर, उस आदमी ने राजा से दुगनी मात्रा में भोजन देने की विनती की। कारण पूछने पर उसने राजा को उत्तर दिया, कि वह उस दिन भूखा रहा क्योंकि ईश्वर ने भी उसके साथ भोजन किया था जो दो लोगों के लिए पर्याप्त नहीं था। यह सुनकर राजा आश्चर्यचकित रह गया तथा विश्वास करने को तैयार नहीं था कि भगवान उस आदमी के साथ भोजन करते हैं। राजा बोला कि वह एकादशी का व्रत रखते हैं, भगवान की पूजा करते हैं लेकिन भगवान कभी भी उनके सामने प्रकट नहीं हुए। यह सुनने के बाद, उस आदमी ने कहा कि अगर उन्हें विश्वास नहीं है तो वह उसके साथ चलें और वृक्ष के पीछे छिपकर वहां जो कुछ हो रहा है उसे देख लें।

उस आदमी के सच और झूठ को जानने की इच्छा से राजा नदी के पास जाकर पेड़ के पीछे छिप गए। हमेशा की तरह आदमी ने खाना पकाया और शाम तक भगवान को पुकारता रहा लेकिन भगवान नहीं आए। आखिरकार, उस आदमी ने भगवान से प्रार्थना की कि यदि वह नहीं आए तो वह नदी में कूदकर अपनी जान दे देगा। लेकिन भगवान फिर भी नहीं आए। तब वह स्वयं मरने के लिए नदी की तरफ चलने लगा। जीवन खत्म करने की उसकी दृढ़ इच्छाशक्ति जानकर ईश्वर ने जल्दी से प्रकट होकर उसे ऐसा करने से रोका और फिर दोनों ने एक साथ भोजन का आनंद लिया। भोजन करने के बाद भगवान उसे अपने विमान से अपने धाम ले गए। यह देखकर राजा को एहसास हुआ कि जब तक मन शुद्ध न हो, तब तक उपवास करने का कोई लाभ नहीं है। इससे राजा को सीख मिली और उसने भी शुद्ध मन से व्रत करना प्रारंभ किया और अंत में स्वर्ग को प्राप्त किया।

देवउठनी एकादशी कथा/ Dev Uthani Ekadashi Story

एक राजा के राज्य में सभी लोग आनंदपूर्वक रहते थे। हालांकि, उसके राज्य में कोई भी अन्न या खाद्य पदार्थ न बेचकर, सिर्फ फल बेचा करते थे। एक बार भगवान ने उनकी परीक्षा लेने का निर्णय किया और भगवान स्वयं एक सुंदर कन्या का रूप बदलकर मार्ग में बैठ गए। उसी समय राजा ने वहां से जाते हुए, उसे देखकर पूर्ण आश्चर्य के साथ उससे पूछा- 'तुम कौन हो? तुम यहां क्यों बैठी हो?' तब उस सुंदर महिला ने कहा- कि मैं बेसहारा हूं और इस शहर में मेरी कोई पहचान न होने के कारण मैं किसी से मदद नहीं मांग सकती हूं। राजा उसके रूप पर आकर्षित होकर बोला, तुम मेरे महल में मेरी रानी बनकर क्यों नहीं रहतीं। तब उस सुंदर महिला ने कहा- मैं तभी आपकी बात मानूंगी जब आप अपनी सभी जिम्मेदारियां मुझे सौंप देंगे। साथ ही मेरे पास आपके राज्य के सभी अधिकार होंगे। मैं जैसा खाना बनाऊंगी आपको खाना होगा। राजा अत्यधिक आसक्त होने के कारण उसकी सभी बातों पर सहमत हो गए। 

अगले दिन एकादशी थी और रानी ने बाजार में खाना बेचने का आदेश दिया तथा मछली और मटन पकाकर राजा से खाने को कहा। तब राजा यह देखकर बोला, कि आज एकादशी को वह केवल फल खाएंगे। उसी क्षण रानी ने उसे वादे की याद दिलाकर कहा, या तो आप खाना खाइए अन्यथा मैं आप के बड़े बेटे का सिर काट दूंगी। इस विषय पर राजा ने इस समस्या को अन्य रानी के साथ साझा करने का निर्णय करके स्थिति को स्पष्ट किया। तब महारानी बोली, प्रिय राजन्, आपको उदास नहीं होना चाहिए और आपको अपने सदाचार और नैतिकता को नहीं छोड़ना चाहिए इसलिए उन्होंने अपने बेटे का बलिदान देने की सलाह दी। उस समय बेटे ने मुड़कर अपनी मां की आंखों में अश्रु का कारण पूछा। इस सब का कारण जानने के बाद, उसने अपना सिर बलिदान करने के लिए सहमत होकर कहा कि आप को नैतिकता और सदाचार का सम्मान और रक्षा करनी चाहिए। 

तब राजा के इस पर सहमत होने पर भगवान विष्णु ने प्रकट होकर कहा- 'मैं तुम्हारे मूल्यों से प्रभावित हूं। तुम मुझसे कोई भी आशीर्वाद मांग सकते हो।' तब राजा बोले कि आपकी दया से हमारे पास सब कुछ है। हम सब आपके मार्गदर्शन की अभिलाषा रखते हैं। यह कहकर राजा ने अपने पुत्र को सौंप दिया और तब उसका पुत्र दिव्यलोक की ओर चला गया। 

देवोत्थान एकादशी पर करने वाली आवश्यक विशेष बातें/ Special things that you must perform on Devotthan Ekadashi 

१) इस दिन सर्वशक्तिमान भगवान विष्णु को केसरयुक्त दूध अर्पित करने से, ईश्वर प्रसन्न और संतुष्ट होकर आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी कर सकते हैं।

२) इस शुभ दिन भक्तों के सुबह जल्दी उठकर स्नान करने से परिवार पर भगवान की कृपा बनी रहती है। 

३) इसके बाद पवित्र और शुद्ध 'गायत्री मंत्र' का जाप करने से स्वास्थ्य बेहतर होता है। 

४) आर्थिक लाभ के लिए, एकादशी के दिन सर्वशक्तिमान भगवान विष्णु को सफेद मिठाई या चावल की खीर का तुलसी पत्र के साथ भोग लगाना चाहिए।

५) भक्तों को लगातार ग्यारह एकादशी तक भगवान विष्णु को नारियल और बादाम अर्पित करने चाहिए। 

६) इस दिन पीले रंग के वस्त्र धारण करके, ईश्वर को पीले फूल अर्पित करने चाहिए।

७) शाम को शुद्ध देसी घी का दीपक जलाकर 'ओम वासुदेवाय नमः' का ग्यारह बार जाप करके, परिक्रमा करनी चाहिए इससे घर में शांति और निर्मलता बनाए रखने में मदद मिलती है। 

८) इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए "दक्षिणावर्ती शंख" में जल भरकर भगवान विष्णु का अभिषेक करना चाहिए। 

९) पीपल वृक्ष को भगवान विष्णु का प्रतीक माने जाने के कारण, इस दिन पीपल वृक्ष पर जल चढ़ाकर दीपक जलाने से कर्जों से मुक्ति मिलती है। 

१०) भगवान विष्णु का मूर्ति-चित्र कुछ धन सहित रखकर पूजा करनी चाहिए। पूजा के बाद उस धन को अपने पास रख लेना चाहिए। 

११) इस दिन किसी आध्यात्मिक स्थान पर जाकर गायत्री मंत्र का जाप करना चाहिए।

१२) इस दिन तुलसी-शालिग्राम विवाह करने पर जीवन भर प्रभु की कृपा बनी रहती है।

१३) तुलसी के आठ नामों- वृंदावनी, वृंदा, विश्वपूजिता, विश्वपावनी, पुष्पसारा, नंदिनी, कृष्णजीवनी और तुलसी का जाप करते हुए तुलसी वृक्ष की ग्यारह बार परिक्रमा करनी चाहिए। 

इस दिन किए जाने वाले कार्य/ Things you should do:

१) इस दिन दीपक और मोमबत्ती से घर में हर तरफ रोशनी करनी चाहिए। 

२) इस दिन, तुलसी शालिग्राम विवाह किया जा सकता है। 

३) इस दिन उपवास रखना चाहिए। 

४) भगवान विष्णु की प्रार्थना करते हुए आध्यात्मिक गीत गाने चाहिए। 

५) भगवान विष्णु को तुलसी पत्र अर्पित करना चाहिए। 

६) 'तुलसी नामाष्टक' का जाप करने से विवाहित लोगों पर कृपा बनी रहती है।

७) इस दिन फल खाने चाहिए।

८) अच्छी और प्रभावी प्रार्थनाओं का जाप करना चाहिए। 

९) गरीब और जरूरतमंदों को अन्न का दान करना चाहिए। 

१०) इस दिन भगवान विष्णु के क्रोध से बचने के लिए 'ब्रह्मचर्य व्रत' का पालन करना चाहिए।

११) उपवास करने वाले व्यक्ति को जमीन पर सोना चाहिए। 

१२) पूरी रात जागकर भगवान की प्रार्थना करनी चाहिए। 


इस दिन नहीं किए जाने वाले कार्य/ Things you should not do:

  • इस दिन चावल नहीं खाने चाहिए क्योंकि इससे आपके अगले जन्म पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। 
  • किसी से झगड़ा या दुर्व्यवहार नहीं करना चाहिए।
  •  इस दिन नमक का सेवन नहीं करना चाहिए। 
  • पानी नहीं पीना चाहिए। 
  • इस दिन तुलसी पत्र नहीं तोड़ना चाहिए; अतः पहले दिन ही फूल और तुलसी पत्र तोड़ कर रख लेने चाहिए। 
  • इस दिन मदिरा-पान नहीं करना चाहिए। 
  • झूठ नहीं बोलना चाहिए। 
  • किसी का अपमान नहीं करना चाहिए।
  • किसी भी जीव को दु:ख नहीं देना चाहिए।

आप अन्य सभी प्रमुख भारतीय त्योहारों के लिए "भारतीय त्योहारों में ज्योतिष की प्रासंगिकता" जैसे हमारे लेखों से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

तुलसी विवाह
05 Nov, 2022

कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि, जिसे देवउठनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है, को तुलसी-वृक्ष और शालिग्राम का विवाह संस्कार किया जाता है। मान्यता है कि इस अनुष्ठान को करने से भगवान विष्णु और भगवती लक्ष्मी प्रसन्न होते हैं। पद्म पुराण के अनुसार, देवी तुलसी भगवती लक्ष्मी का अवतरण या अवतार हैं तथा शालिग्राम भगवान विष्णु की अभिव्यक्ति हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्राचीन लेखों में उनके अवतार का उल्लेख मिलता है। शास्त्रों के अनुसार, पवित्र तुलसी-पौधे और शालिग्राम का विवाह संस्कार करने से जीवन में शांति और समृद्धि आती है इसलिए सनातन धर्म में अत्यंत श्रद्धा के साथ भगवती तुलसी और शालिग्राम का विवाह करने की परंपरा का पालन किया जाता है। 

तुलसी विवाह का महत्व/ The significance of Tulsi Vivah

हिंदू धर्म में पवित्र माने जाने के कारण तुलसी का अपना विशेष महत्व है। धार्मिक महत्व के साथ ही, तुलसी को उसके वैज्ञानिक महत्व के लिए भी जाना जाता है। वैज्ञानिक दृष्टि से, तुलसी का पौधा अपने समृद्ध औषधीय गुणों के लिए भी जाना जाता है। हिंदू धर्म में, भगवती तुलसी को देवी लक्ष्मी का अवतार माना गया है जिनका विवाह शालिग्राम से हुआ है। शालिग्राम को भगवान विष्णु के आठवें अवतार भगवान कृष्ण के अवतरण के रूप में दर्शाया गया है।

आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी का दिन क्षीरसागर में भगवान विष्णु का चार महीने की योगनिद्रा अवधि का प्रतीक है। अपनी चार महीने लंबी निद्रा से भगवान विष्णु देवउठनी या देवोत्थान एकादशी के दिन जागृत होते हैं। तुलसी अत्यधिक प्रिय होने के कारण, भगवान विष्णु नींद से जागने पर तुलसी की प्रार्थनाएं सुनना पसंद करते हैं। देवउठनी एकादशी के दिन देवी तुलसी का विवाह शालिग्राम के साथ किया जाता है। किसी व्यक्ति की पुत्री नहीं होने पर यदि वह कन्यादान (विवाह में पुत्री का दान) का पुण्य अर्जित नहीं कर सकता है तो वह तुलसी-पौधे का विवाह संस्कार करा कर कन्यादान का पुण्य अर्जित कर सकते हैं। 

माना जाता है कि तुलसी की पूजा करने वाले लोगों के घरों में हमेशा धन की प्रचुरता रहती है। तुलसी विवाह के साथ ही चार महीने के अंतराल के बाद, विवाह जैसे शुभ समारोह आदि फिर से शुरू होते हैं। कार्तिक मास की देव प्रबोधिनी एकादशी का दिन भगवती तुलसी और शालिग्राम के विवाह संस्कार को समर्पित होता है। 

तुलसी विवाह भगवान के प्रस्तर रूप से क्यों किया जाता है?/ Why is Goddess Tulsi married off to a stone?

हिंदू धर्म में देवउठनी एकादशी के दिन चार महीने बाद, भगवान विष्णु के योग निद्रा से जागृत होने पर सभी समारोहों की फिर से शुरुआत होती है तथा देवउठनी एकादशी के ही दिन देवी तुलसी और शालिग्राम का विवाह संस्कार भी होता है। विवाह संस्कार के दौरान तुलसी के पौधे को हिंदू दुल्हन की तरह साड़ी पहना कर और सजाकर पूर्ण भक्ति और श्रद्धा के साथ, दूल्हे शालिग्राम के साथ विवाह की सभी रस्में कराई जाती है। 

श्राप के कारण भगवान विष्णु का प्रस्तर रूप (शालिग्राम) में अवतरण/ Due to a curse, Lord Vishnu turned into a stone (Shaligram)

एक पौराणिक कथा के अनुसार, विष्णु जी के छल के कारण वृंदा का प्रण टूटने से युद्ध में उसका पति जालंधर मारा गया और घर के प्रांगण में उसका सिर आकर गिर गया। अपने पति का सिर देखकर वृंदा हैरान रह गई। तब उसने अपने साथी से पूछा- कि वह कौन है? तब जालंधर के वेश में छल कर रहे भगवान विष्णु ने अपनी असली पहचान बताते हुए कहा कि उन्होंने जालंधर के लिए रखे गए वृंदा के प्रण को तोड़ने के लिए उसके साथ छल किया है। 

इस विश्वासघात के कारण वृंदा ने भगवान विष्णु को अपनी पत्नी से अलग होने के दर्द से गुजरने का श्राप दिया- जैसे वह अपने पति के अलग होने के दर्द से गुजर रही थी और जिस प्रकार तुमने वेश बदलकर मेरे साथ छल किया है वैसे ही तुम्हारी पत्नी का छल द्वारा अपहरण होगा और तुम अपनी पत्नी के वियोग के कारण जीने को मजबूर होगे। इसके बाद वृंदा बोली, छलपूर्वक मेरा प्रण तोड़ने के कारण तुम पत्थर के बन जाओगे। तब से भगवान विष्णु को शालिग्राम कहा जाने लगा। ऐसा माना जाता है कि वृंदा के श्राप के कारण ही, भगवान विष्णु ने अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र राम के रूप में अवतार लेकर पत्नी सीता के वियोग का दर्द सहा था। 

वृंदा और तुलसी पौधे का संबंध/ The association between Vrinda and Tulasi plant

इससे संबंधित दंतकथा के अनुसार, तुलसी के पौधे की उत्पत्ति ठीक उसी स्थान पर हुई थी, जहां वृंदा सती हुई थी। वृंदा के मरण स्थान पर तुलसी-पौधे की उत्पत्ति होने के कारण तुलसी को वृंदा के रूप में माना जाने लगा। ऐसा कहा जाता है कि वृंदा के श्राप देने पर भगवान विष्णु ने वृंदा को तुलसी रूप में अपनी पत्नी के रूप में सम्मान देकर अपने कर्म का पश्चाताप किया और कहा, कि वह उसकी पवित्रता का सम्मान करते हैं, अतः वह हमेशा उनके साथ पति और पत्नी के रूप में रहेगी तथा जो कोई भी कार्तिक शुक्ल एकादशी पर आपके साथ मेरा विवाह करेगा, मेरी कृपा से उसकी हर सांसारिक और गैर-सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति होगी। तब से ही, देवउठनी एकादशी के दिन से शालिग्राम और तुलसी विवाह संस्कार की परंपरा शुरू हुई। साथ ही, भगवान विष्णु जी के पूजन में तुलसी जी का विशेष महत्व होने के कारण, तुलसी-पत्र के बिना भगवान विष्णु जी का पूजन अधूरा माना जाता है। 

बिना कन्या वाले व्यक्तियों के लिए मददगार है तुलसी विवाह/ Tulsi Vivah is helpful for people who don’t have a daughter.

तुलसी विवाह के लिए कार्तिक शुक्ल एकादशी का दिन, शालिग्राम के साथ देवी तुलसी के विवाह के उत्सव के समर्पित होने के कारण, अत्यधिक शुभ माना जाता है। हिंदू वैवाहिक संस्कारों का पालन करते हुए विवाह संस्कार किया जाता है इसलिए बिना कन्या वाले दंपतियों को कन्यादान का पुण्य प्राप्त करने के लिए तुलसी विवाह संस्कार करना चाहिए। 

तुलसी पौधे का पौराणिक और औषधीय महत्व/ Medicinal and Puranic significance of Tulsi plant

स्वास्थ्य और औषधीय दृष्टि से, तुलसी एक महत्वपूर्ण पौधा है। तुलसी की कुछ पत्तियां चाय के साथ उबालकर पीने से न सिर्फ स्वाद बढ़ता है बल्कि प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ाकर पूरा दिन ऊर्जावान रहा जा सकता है। तुलसी के औषधीय गुणों के कारण, कई आयुर्वेदिक दवाइयों और सामानों में तुलसी का महत्वपूर्ण स्थान होता है। स्वास्थ्य के साथ ही, धार्मिक दृष्टि से भी तुलसी का अत्यधिक महत्व है। एक ओर, जहां तुलसी भगवान विष्णु को प्रिय है वहीं दूसरी ओर, भगवान गणेश से उनकी गहरी शत्रुता है। गणेश पूजन के दौरान किसी भी रूप में तुलसी पत्र का प्रयोग करना वर्जित होता है। 

तुलसी विवाह संबंधित चमत्कारी दंतकथा/ This miraculous legend associated with Tulsi Vivah

तुलसी विवाह से संबंधित कई किंवदंतियों में से ननद-भाभी की कथा विस्तृत रूप से सुनाई जाती है। कथा के अनुसार, ननद तुलसी की परम भक्त होने के कारण पूर्ण श्रद्धा के साथ उनकी आराधना किया करती थी, लेकिन उसकी भाभी को उसका तुलसी की पूजा करना पसंद नहीं था। वह गुस्से से चिल्ला कर अपनी ननद को ताना देती थी कि उसे शादी के उपहार या दहेज के रूप में केवल तुलसी का पौधा देगी और शादी में मेहमानों और बारातियों (दूल्हा-पक्ष) के स्वागत समारोह के रात्रिभोज में केवल तुलसी के पत्ते परोसेगी। 

जल्दी ही, ननद की शादी की उम्र होने पर उसकी शादी का दिन आ गया। बारातियों के सामने भाभी के द्वारा तुलसी के पौधे को तोड़ने पर, भगवान की कृपा से सभी पत्ते और मिट्टी स्वादिष्ट भोजन में बदल गए। इससे भाभी ने अत्यधिक हताश होकर, अपनी ननद को सोने के आभूषणों से सजाने के बजाय उसके गले में तुलसी के दानों की माला पहना दी लेकिन अगले ही क्षण वह माला सोने के खूबसूरत हार में बदल गई। भाभी यहीं नहीं रुकी और उसने अपनी ननद को दुल्हन के वस्त्र देने की जगह जनेऊ पहनने को दे दिया। लेकिन वह जनेऊ भी एक खूबसूरत सिल्क की साड़ी में बदल गया। इन घटनाओं को देखकर ननद के पति के परिवार (नए परिवार) ने उसकी तहे दिल से प्रशंसा की। इन सब चमत्कारों को देखकर भाभी को तुलसी पूजा की शक्ति और महत्व समझ में आ गया। 

कैसे भगवान तुलसी अपने सच्चे भक्तों को ही वरदान देती हैं?/ Goddess Tulsi bestows boon only to her true devotees.

सामान्य रूप से यह सर्वविदित है कि यदि मन में श्रद्धा न हो, तो सभी स्वादिष्ट मिठाइयां, फल, पुष्प आदि चढ़ाने का कोई मतलब नहीं होता लेकिन यदि ईश्वर के प्रति मन में सच्ची श्रद्धा हो, तो बिना किसी स्वार्थ के उनकी पूजा करके भगवान की कृपा के योग्य बनने के लिए एक फूल ही काफी होता है। उपरोक्त कही गई ननद-भाभी की कथा की अगली घटना से इस मत की पुष्टि होती है। 

कथा के अनुसार, जब ननद विवाह के बाद अपने पति के साथ रहने चली गई, तब भाभी को तुलसी पूजन का महत्व समझ में आ गया। उसने अपनी पुत्री को तुलसी पूजन करने का निर्देश दिया लेकिन पुत्री ने अपनी माता के निर्देशों पर ध्यान नहीं दिया। तब भाभी मैं सोचा- यदि वह अपनी पुत्री के साथ भी वैसा ही व्यवहार करें जैसा उसने अपनी ननद के विवाह के दौरान किया था तो शायद देवी तुलसी उसकी पुत्री को भी वैसा ही वरदान दे। फिर उसने अपनी पुत्री के विवाह के दौरान वही कर्म  दोहराए लेकिन इस बार कोई चमत्कार नहीं हुआ और टूटा हुआ तुलसी का गमला स्वादिष्ट भोजन में नहीं बदला, तुलसी की माला सोने के आभूषण में नहीं बदली और जनेऊ भी वैसे का वैसा बना रहा। भाभी के इन कर्मों ने उसे समाज में उपहास का विषय बना दिया और सभी ने उसकी आलोचना की। 

ज्वार का सोने और चांदी में बदलना/ When Jowar transformed into gold and silver

ननद-भाभी की कथा आगे कुछ इस प्रकार है। विवाह के दौरान यह सब होने के बाद भी, भाभी ने अपनी ननद को एक दिन के लिए भी कभी भी घर पर आने के लिए आमंत्रित नहीं किया। एक दिन भाई ने सोचा कि उसे जाकर अपनी बहन से मिलना चाहिए। उसने अपनी पत्नी को अपने विचारों से अवगत कराकर, अपनी बहन के लिए कुछ उपहार लाने को कहा। इसके लिए, भाभी ने अपनी ननद को भेंट में देने के लिए एक मुट्ठी ज्वार थैले में रख कर पति को पकड़ा दिया था। अपनी पत्नी का यह व्यवहार देखकर भाई को बहुत बुरा लगा। उसे अपनी बहन को उपहार स्वरूप ज्वार देना बहुत अजीब और अनुचित लगा और उसने रास्ते में एक गौशाला में गायों के सामने थैला खाली कर दिया। लेकिन ईश्वर की कृपा से, सभी ज्वार के दाने सोने और चांदी में बदल गए। यह देखकर गायों के मालिक ने आश्चर्य के साथ भाई से पूछा- कि वह गायों को सोना और चांदी क्यों खिला रहा है? भाई भी यह चमत्कार देखकर अचंभित हो गया और उसने संपूर्ण वृतांत चरवाहे को बताया। तब चरवाहे ने कहा- यह सब भगवती तुलसी के आशीर्वाद के कारण हुआ है। तब भाई आनंदपूर्वक चलकर अपनी बहन के यहां पहुंचा। इतने कीमती उपहार देखकर बहन और उसका परिवार अत्यधिक प्रसन्न हुए। 

तुलसी-शालिग्राम विवाह की किवदंती/ The legend of Tulsi-Shaligram marriage 

शालिग्राम भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं। पौराणिक किवदंती के अनुसार, भगवान गणेश और कार्तिकेय के अलावा भगवान शिव का जालंधर नाम का एक और पुत्र था। लेकिन जालंधर में आसुरी गुण थे। वह सभी देवताओं और असुरों में स्वयं को सबसे शक्तिशाली, पराक्रमी और अजेय योद्धा मानता था। वह देवताओं को परेशान करने के लिए अपनी शक्तियों का दुरुपयोग किया करता था। जालंधर का विवाह भगवान विष्णु की परम भक्त वृंदा से हुआ था। लेकिन जालंधर द्वारा देवताओं का राज्य छीनने के लिए लगातार कोशिश करने से और उनको परेशान करने के कारण भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव ने  उसका वध करने की योजना बनाई, लेकिन वृंदा के सदाचार और भक्ति के कारण कोई भी जालंधर को नहीं मार सका। इस समस्या का समाधान पाने के लिए देवताओं ने भगवान विष्णु से मदद मांगने का निर्णय किया। तब भगवान विष्णु ने वृंदा के प्रण को भंग करने के लिए योजनानुसार जालंधर का वेश बनाया और वृंदा के साथ छल करके उसकी प्रतिज्ञा को तोड़ दिया। इस तरीके से ब्रह्मदेव, भगवान विष्णु और शिव जी जालंधर का वध करने में सफल हुए। 

जिन भगवान विष्णु की वह परम भक्त थी, उनके विश्वासघात को जानकर वृंदा को अत्यधिक दुख हुआ। अपनी वेदना में वृंदा ने भगवान विष्णु को पत्थर बन जाने का श्राप दिया। सभी देवताओं द्वारा वृंदा से अपना श्राप वापस लेने की विनती करने पर उसने उनकी बात मान ली। अपने विश्वासघात का पश्चाताप करने के लिए, भगवान विष्णु द्वारा स्वयं ही प्रस्तर रूप में अवतरित होने पर वह शालिग्राम रूप में माने जाने लगे। 

तुलसी विवाह की पूजन-विधि/ Puja Vidhi of Tulsi Vivah

परंपरा के अनुसार, तुलसी विवाह कार्तिक शुक्ल की एकादशी के दिन किया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु देवशयनी एकादशी के दिन से शुरू होने वाली अपनी चार महीने की योग निद्रा के बाद जागृत हुए थे और इस समय के अंतराल के बाद से ही  हिंदू धर्म में यह एकादशी विवाह जैसे शुभ कार्य फिर से शुरू करने का प्रतीक है।

मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु का शालिग्राम रूप में तुलसी के साथ विवाह संस्कार करने वाले व्यक्तियों को कन्यादान के समान पुण्य प्राप्त होता है। 

संध्या काल में, विवाह से पहले गेरू के चूर्ण से आठ पत्तियों वाले कमल पुष्प की सुंदर सी रंगोली बनाई जाती है तथा गन्नों का प्रयोग करके मंडप बनाया जाता है। 

मंडप के अंदर दो चौकियां रखी जाती हैं। अब, एक चौकी पर तुलसी जी और दूसरी पर भगवान विष्णु की मूर्ति या शालिग्राम को स्थापित किया जाता है। तुलसी-पत्र को शालिग्राम जी के दाईं ओर स्थापित किया जाता है। 

शालिग्राम जी की चौकी पर आठ पत्तियों वाला कमल बनाकर कलश स्थापित किया जाता है तथा कलश पर स्वास्तिक बनाया जाता है। 

आम के पत्तों पर रोली का तिलक लगाकर कलश के किनारों पर सजाया जाता है। 

अब एक नारियल पर लाल कपड़ा लपेटकर कलश के ऊपर स्थापित किया जाता है।

तुलसी-पत्र के सामने घी का दीपक जलाकर वैवाहिक समारोह शुरू करते हैं। 

अब फूल को गंगाजल में डुबाकर "ॐ तुलसाय नमः" का मंत्रोच्चार करते हुए तुलसी-पत्र और शालिग्राम पर गंगाजल छिड़ककर तुलसी जी को रोली और शालिग्राम जी को चंदन का तिलक किया जाता है। 

देवी तुलसी को लाल चुनरी या साड़ी पहना कर चूड़ी, मेहंदी आदि सुहाग का सामान अर्पित किया जाता है। 

शालिग्राम जी का पंचामृत से अभिषेक करके पीले वस्त्र अर्पित किए जाते हैं। 

कलश पर फूल चढ़ाकर, तुलसी और शालिग्राम जी को फूलों की माला पहनाई जाती है।

तब एक कपड़े में सुपारी, फूल, कुछ इलायची और दक्षिणा(पैसे) रखते हैं। 

परिवार का एक पुरुष सदस्य हाथों में शालिग्राम जी को उठाकर तुलसी जी के चारों ओर सात फेरे कराता है। 

सातों फेरों के पूरा होने के बाद, भगवती तुलसी जी को शालिग्राम जी के बाईं ओर बैठाया जाता है।

शालिग्राम जी को तिल अर्पित कर कपूर से आरती की जाती है। 

सभी रीति-रिवाजों के पूर्ण हो जाने के बाद, देवी तुलसी और शालिग्राम जी को मिठाइयों और खीर-पूड़ी का भोग चढ़ाया जाता है। 

पूजन के बाद, पूजा के दौरान प्रयोग की गई सारी पूजन-सामग्री को तुलसी पत्र के साथ मंदिर में दान कर दिया जाता है।

संभव होने पर, घरों में तुलसी के साथ आंवले का पौधा लगाकर उसके साथ पंचोपचार पूजा करनी चाहिए। 

सूर्यास्त के बाद किसी को भी तुलसी के पत्ते कभी नहीं तोड़ना चाहिए। हमारे शास्त्रों में अमावस्या के दिन, चतुर्दशी तिथि, रविवार,  शुक्रवार और सप्तमी तिथि जैसे कुछ निश्चित दिनों और तिथियों पर तुलसी तोड़ना मना किया गया है। साथ ही, बिना किसी कारण के तुलसी के पत्तों को नहीं तोड़ना चाहिए। इन निषिद्ध दिनों के दौरान, तुलसी-पत्र की आवश्यकता होने पर गमले के चारों ओर गिरे पत्तों को एकत्रित कर सकते हैं या एक दिन पहले पत्तियों को तोड़ सकते हैं। तुलसी के एक पवित्र पौधा होने के कारण, इसके पत्तों को अनावश्यक नहीं तोड़ना चाहिए। पूजा के दौरान प्रयोग किये गए पत्तों को साफ पानी से धोकर दोबारा प्रयोग किया जा सकता है। 

तुलसी विवाह करने से पुण्य फल की प्राप्ति/ Performing Tulsi Vivah confers a person with Punya Phal

ऐसा माना जाता है कि भक्तिपूर्वक तुलसी विवाह करने से आपके विवाह में आने वाली सभी समस्याओं का अंत हो जाता है। जिन व्यक्तियों के विवाह में कठिनाई हो रही हो, तो उन्हें भी भगवती तुलसी और भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए तुलसी विवाह करना चाहिए। तुलसी विवाह करने से भी कन्यादान के समान ही उन्हें प्राप्त होता है। 

मंगलाष्टक मंत्र सहित तुलसी विवाह/ Perform Tulsi Vivah with Mangalashtak Mantra

तुलसी विवाह हिंदू वैवाहिक संस्कारों के अनुसार आयोजित किया जाता है। विवाह संस्कार के दौरान किए जाने वाले मंगलाष्टक मंत्रोच्चार की ही तरह, भगवती तुलसी और शालिग्राम विवाह के दौरान भी यह मंत्रोच्चार करने चाहिए। ऐसी मान्यता है कि इन मंत्रों की शक्ति संपूर्ण वातावरण को शुद्ध करके सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाती है। 

तुलसी विवाह आयोजन के लाभ/ The benefits of conducting the Tulsi Vivah

तुलसी विवाह देवउठनी एकादशी के दिन किया जाता है। माता पिता के रूप में भगवती तुलसी का विवाह शालिग्राम से करने पर कन्यादान के समान फल मिलता है। बिना कन्या वाली दंपतियों को सभी रीति-रिवाजों के अनुसार तुलसी विवाह कराने से कन्यादान का पुण्य प्राप्त होता है। वैवाहिक जीवन में समस्याओं का सामना करने वाले दंपतियों को सुखी वैवाहिक जीवन के लिए तुलसी विवाह करना चाहिए। श्रद्धापूर्वक तुलसी विवाह का आयोजन करने से जीवन में शांति और समृद्धि आती है और बच्चों को सफलता प्राप्त होती है।

यदि आप विवाहित जीवन में समस्याओं का सामना कर रहे हैं तो इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं। 

"भारतीय त्योहारों में ज्योतिष की प्रासंगिकता" जैसे हमारे लेखों के माध्यम से आप अन्य सभी प्रमुख भारतीय त्योहारों के लिए जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

 

गुरु नानक जयंती
08 Nov, 2022

हर साल, सिखों के पहले गुरु और सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी का जन्मदिन, गुरु नानक जयंती को गुरु पर्व, गुरु नानक जयंती या प्रकाश पर्व के रूप में कार्तिक पूर्णिमा पर दुनिया भर में मनाया जाता है। सिख धर्म के अनुयायी, गुरु नानक जयंती की सुबह प्रभात फेरी और नगर कीर्तन करते हैं और रुमाल चढ़ाते हैं। वह गुरुद्वारों में दान करते हैं और गरीबों को खाना खिलाते हैं। गुरु नानक जयंती को गुरु पर्व के रूप में जाना जाता है, इसे 'गुरु का त्योहार' भी कहा जाता है, सिख धर्म के अनुयायियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण दिन है।

गुरु नानक देव का जन्म पंजाब के शेखपुरा जिले के तलवंडी गांव में हुआ था, जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है। हर साल, सिख लोग कार्तिक पूर्णिमा के दिन को गुरु नानक दिवस के रूप में मनाते हैं। गुरु नानक देव को उनके कई महान कार्यों और मानव जाति के आध्यात्मिक विकास में योगदान के लिए याद किया जाता है और उनका सम्मान किया जाता है। गुरु नानक देव जी ने धार्मिक सद्भाव, अखंडता, शांति और भाईचारे का संदेश दिया। गुरु नानक देव ने सिख धर्म की स्थापना की, जो दुनिया भर में लाखों लोगों द्वारा अनुसरण किए जाने वाले प्रमुख धर्मों में से एक है। संत गुरु नानक देव जी ने 22 सितंबर, 1539 को करतारपुर में स्वर्ग के लिए प्रस्थान किया जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है।

गुरु नानक जी को उनकी शिक्षाओं और नेक कार्यों के लिए याद किया जाता है जो उन्होंने अपने जीवनकाल में किए थे। उनकी शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक हैं और दुनिया भर में लाखों लोग उनके संदेश का अनुसरण करते हैं। नानक देव के पिता का नाम बाबा कालूचंद बेदी और माता का नाम तृप्ता देवी था। उनके माता-पिता ने उनका नाम नानक रखा। उनके पिता अपने गांव में स्थानीय सरकार के राजस्व अधिकारी थे। गुरु नानक देव बहुत कम उम्र से ही एक व्यावहारिक और बुद्धिमान थे। उन्होंने कई भाषाओं में महारत हासिल की और बहुत कम उम्र में ही बहुत सारी भाषाओं का ज्ञान प्राप्त कर लिया था | 

उन्हें फारसी और अरबी भाषाओं का गहरा ज्ञान था। उन्होंने दौलत खान लोदी के कार्यालय में लेखा प्रबंधक के रूप में काम करना शुरू किया। नानक देव जी का विवाह 1487 में सुलखनी देवी के साथ हुआ था, जब वह सुल्तानपुर लोदी में रहते थे। वह 1491 और 1496 में दो लड़कों के माता-पिता बने।

गुरु नानक जी अपने सर्वोच्च आध्यात्मिक ज्ञान और जीवन में महान मूल्यों के लिए जाने जाते हैं। अपने भाईचारे के संदेश और 'एक ईश्वर' का प्रसार करने के लिए, गुरु नानक जी ने अपना घर छोड़ दिया और ज्यादातर पैदल ही दूरदराज के स्थानों की यात्रा की। अपनी शिक्षाओं और सिद्धांतों का प्रचार करने के लिए, वह दूर-दूर के स्थानों पर जाते और आम लोगों के साथ-साथ,विद्वान व्यक्तियों, ऋषियों और भिक्षुओं के साथ धार्मिक प्रवचन में भाग लेते। बाद में, उन्होंने अपने सांसारिक जीवन को त्याग दिया और एक साधु के रूप में रहने लगे। नानक देव जी ने समाज के वंचित और गरीब लोगों की भलाई के लिए बड़े पैमाने पर काम किया। उन्होंने भेदभाव, मूर्ति पूजा और धार्मिक अंधविश्वास के खिलाफ जागरूकता फैलाई। उन्होंने सभी धर्मों के लोगों के साथ बातचीत करने के लिए कई हिंदू और इस्लामी तीर्थ स्थलों का दौरा किया और उन्हें कई धार्मिक सदाचारों से अवगत कराया।

गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन के 25 वर्ष अपनी शिक्षाओं के प्रसार के लिए समर्पित किए, इस दौरान उन्होंने दूरदराज के स्थानों की यात्रा की और लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित किया। अपने जीवन के अंतिम चरण के दौरान, वह पंजाब के करतारपुर नामक एक गाँव में बस गए, जो अब पाकिस्तान के पंजाब प्रांत का हिस्सा है। यहीं गुरु नानक देव जी अपनी मृत्यु तक रहे। नानक देव की मृत्यु के बारह साल बाद भाई गुरदास का जन्म हुआ, जो बचपन से ही सिखों के उत्थान में शामिल हो गए थे। भाई गुरुदास को सिख समुदाय के विकास में उनके महान योगदान के लिए श्रद्धापूर्वक याद किया जाता है। उन्होंने कई धर्मशालाएं (सामुदायिक विश्राम गृह) खोली और लोगों को गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का पालन करने के लिए प्रेरित किया।

क्यों मनाई जाती है गुरु नानक जयंती?/ Why Guru Nanak Jayanti is celebrated?

गुरु पर्व, जिसे प्रकाश पर्व के रूप में भी जाना जाता है, गुरु नानक देव जी की जयंती को चिह्नित करने के लिए मनाया जाता है। पहले सिख गुरु, गुरु नानक देव का जन्म 15 अप्रैल, 1469 को ननकाना साहिब जिले में राय भोय की तलवंडी नामक स्थान पर हुआ था, जो अब पाकिस्तान के पंजाब प्रांत का हिस्सा है।

ननकाना साहिब का नाम गुरु नानक देव के नाम पर रखा गया था, जो दुनिया के सबसे लोकप्रिय धार्मिक स्थलों में से एक है, गुरुद्वारा ननकाना साहिब। यह सिख लोगों के लिए सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण पूजा स्थलों में से एक है। गुरुद्वारा ननकाना साहिब में हर साल दुनिया भर से लाखों लोग आते हैं। सिख साम्राज्य के नेता, महाराजा रणजीत सिंह, जिन्हें शेर-ए-पंजाब के नाम से जाना जाता है, ने अपनी अवधि के दौरान गुरुद्वारा ननकाना साहिब का जीर्णोद्धार किया।

गुरु नानक देव जी कौन थे?/ Who was Guru Nanak Dev Ji?

गुरु नानक देव पहले सिख गुरु और सिख धर्म के संस्थापक थे। उन्हें उनके अनुयायियों में नानक देव जी, बाबा नानक और नानकशाह के नाम से जाना जाता है। लद्दाख और तिब्बत में नानक देव जी को नानक लामा के नाम से जाना जाता है। उन्होंने अपना पूरा जीवन मानव जाति की सेवा में समर्पित कर दिया। अपनी शिक्षाओं और संदेश का प्रचार करने के लिए, नानक जी ने न केवल दक्षिण एशिया में बल्कि अफगानिस्तान, ईरान और अरब देशों तक के क्षेत्रों में व्यापक यात्रा की। पंजाबी भाषा में उनकी यात्राओं को उदासी के नाम से जाना जाता है।

उन्होंने अपनी पहली उदासी यात्रा 1507 ईसवी से 1515 ईस्वी के बीच की। सोलह वर्ष की आयु में, उन्होंने सुलखनी देवी से विवाह किया और दो पुत्रों, श्री चंद और लखमी दास के पिता बने। 

नानक देव जी ने 1539 ई. में वर्तमान पाकिस्तान के करतारपुर जिले की एक धर्मशाला में अंतिम सांस ली। अपनी मृत्यु से पहले, उन्होंने भाई लहना को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था, जिसे बाद में गुरु अंगद देव के नाम से जाना जाने लगा। गुरु अंगद देव सिखों के दूसरे गुरु थे। गुरु नानक देव जी पहले सिख गुरु थे। उन्होंने करतारपुर साहिब गुरुद्वारे की नींव रखी। उनकी जयंती को गुरु पर्व के रूप में मनाया जाता है, जिसे गुरु पर्व और प्रकाश पर्व के नाम से भी जाना जाता है।

 

दुनिया भर में गुरुद्वारों को विशेष रूप से सजाया जाता है। गुरु पर्व के दिन, जिसे प्रकाश उत्सव के रूप में भी जाना जाता है, सिख पूजा स्थल गुरुद्वारों को रोशनी और फूलों से सजाया जाता है। गुरु ग्रंथ साहिब का अखंड पाठ आयोजित किया जाता है, और लंगर चलाए जाते हैं। भव्य समारोह की तैयारी त्योहार से कई दिन पहले प्रभात फेरी नामक सुबह के जुलूस के साथ शुरू हो जाती है। बड़ी संख्या में सिख लोग प्रभात फेरी में भाग लेते हैं और गुरुवाणी और सतनाम वाहे गुरु गाते हैं। नगर-कीर्तन के बड़े जुलूस भी निकाले जाते हैं। नगर-कीर्तन में भाग लेने वाले समूहों का स्वागत उनके समुदाय के सदस्यों द्वारा फेरी के दौरान कई पड़ावों पर किया जाता है। शबद-कीर्तन आयोजित किए जाते हैं, और बड़े दिन के लिए गुरुद्वारों में विशेष व्यवस्था की जाती है। गुरु नानक जयंती के दिन गुरुपर्व तक दिन-रात उत्सव जारी रहता है।

गुरु नानक देव के बारे में दस तथ्य/ Ten facts about Guru Nanak Dev

  • गुरु नानक देव का जन्म कार्तिक शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा (पूर्णिमा) तिथि को हुआ था। लोग हर साल कार्तिक पूर्णिमा को गुरु नानक जयंती के रूप में उनकी जयंती मनाते हैं।

  • गुरु नानक के पिता का नाम मेहता कालू और उनकी माता का नाम तृप्ता देवी था। गुरु नानक देव की एक बहन भी थी; उसका नाम बेबे नानकी था।

  • गुरु नानक देव को बचपन से ही सांसारिक जीवन से वैराग्य का अनुभव हुआ। बाद में, उन्होंने अपना सारा समय आध्यात्मिक चिंतन और सत्संग (धार्मिक प्रवचन) में बिताना शुरू कर दिया।

  • छोटी उम्र से ही उनसे जुड़े कई चमत्कारों के कारण लोग उन्हें एक दिव्य व्यक्तित्व के रूप में मानने लगे थे।

  • बचपन से ही, गुरु नानक देव ने उस युग के दौरान प्रचलित विभिन्न रूढ़िवादी और पारंपरिक विश्वास प्रणालियों का विरोध किया। वह तीर्थ स्थलों पर जाते थे और उनकी कमियों को उजागर करने के लिए धर्मगुरुओं के साथ प्रवचन करते थे। वह लोगों से धार्मिक अंधविश्वास और उपदेशों के बहकावे में न आने का आग्रह करते थे।

  • गुरु नानक देव ने 1487 में माता सुलखनी से शादी की। उनके दो बेटे, श्री चंद और लिखमीदास थे।

  • गुरु नानक देव ने 'इक ओंकार' या 'एक ईश्वर' का संदेश दिया था। उन्होंने सभी धर्म और धर्म के लोगों को एक ईश्वर की पूजा करने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने मूर्ति पूजा और बहुदेववाद के विचार को खारिज कर दिया। नानक की शिक्षाएं हिंदुओं और मुसलमानों में समान रूप से गूंजती थीं।

  • गुरु नानक देव से जुड़ी एक प्रसिद्ध कहानी है। एक बार, नानक के पिता ने उन्हें एक व्यवसाय शुरू करने के लिए बीस रुपये दिए और उन्हें उन बीस रुपये के साथ एक सच्चा सौदा (लाभदायक सौदा) करने का निर्देश दिया। नानक देव शहर की यात्रा पर निकल पड़े। रास्ते में उनकी मुलाकात संतों और भिक्षुओं के एक कारवां से हुई। उन्होंने उन बीस रुपये से संतों के लिए भोजन खरीदा और घर लौट आये। घर पर उनके पिता ने पूछा कि उन्होंने कुछ लाभ कमाया या नहीं, जिस पर नानक जी ने हां में जवाब दिया और कहा कि उन्होंने उस पैसे से संतों के लिए भोजन खरीदा।

  • गुरु नानक देव ने इस विचार का समर्थन किया कि ईश्वर हमारे मन के भीतर रहता है, और यदि आपके हृदय में करुणा की कमी है और अन्य लोगों के लिए क्रोध, शत्रुता, घृणा और द्वेष से भरा है, तब भगवान ऐसे अशुद्ध हृदय में कभी नहीं रहेंगे।

  • अंतिम वर्षों के दौरान, गुरु नानक देव करतारपुर में बस गए। यह पवित्र संत 22 सितंबर, 1539 को अपने स्वर्गीय निवास के लिए रवाना हुए। उनकी मृत्यु से पहले, गुरु नानक देव ने अपने शिष्य भाई लहना को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था, जो बाद में गुरु अंगद देव के रूप में जाना जाने लगा।

गुरु नानक देव का उपदेश/ The preaching of Guru Nanak Dev

  • इक ओंकार, यानि एक ईश्वर ईश्वर सर्वव्यापी है। हम सभी ईश्वर की संतान हैं और हमें एक दूसरे के साथ एकजुटता से रहना चाहिए।

  • हमें अनावश्यक तनाव न लेते हुए अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते रहना चाहिए और हमेशा खुश रहने का प्रयास करना चाहिए।

  • उन्होंने भाईचारे के दर्शन का प्रचार किया और माना कि दुनिया के सभी नागरिक एक विस्तारित परिवार का हिस्सा हैं।

  • व्यक्ति को लालच से दूर रहना चाहिए और अपने लिए एक सम्मानजनक जीवन यापन करने के लिए लगन और ईमानदारी से काम करना चाहिए।

  • व्यक्ति को कभी भी दुर्विनियोजन में लिप्त नहीं होना चाहिए और हमेशा सत्यनिष्ठा के साथ कार्य करना चाहिए। साथ ही, वंचितों की मदद करने में कभी भी संकोच नहीं करना चाहिए।

  • अपने जीवन में प्रेम, सद्भाव, एकता, भाईचारे और आध्यात्मिक ज्ञान के विचार का हमेशा समर्थन करना चाहिए।

  • अपने धन और सांसारिक संपत्ति पर कभी भी घमंड नहीं करना चाहिए।

  • हमेशा महिलाओं का सम्मान करना चाहिए। गुरु नानक देव ने पुरुषों और महिलाओं के साथ समान व्यवहार किया।

  • दूसरों को उपदेश देने से पहले व्यक्ति को अपने दोषों और बुरी आदतों पर विजय प्राप्त करनी चाहिए।

  • व्यक्ति को हमेशा विनम्र रहना चाहिए और कभी भी अहंकार को अपने व्यवहार पर हावी नहीं होने देना चाहिए।

  • भगवान एक है; पूरी श्रद्धा से उसकी पूजा करें।

  • ईश्वर सर्वव्यापी है; प्रत्येक जीव एक ईश्वर का अंश है। ईश्वर में सदैव आस्था रखें।

  • जो लोग शुद्ध मन से भगवान की पूजा करते हैं उन्हें कभी भी किसी से और किसी चीज से डरना नहीं चाहिए।

  • व्यक्ति को अपने कर्तव्यों को लगन से पूरा करना चाहिए और उचित साधनों से अपनी आजीविका अर्जित करनी चाहिए।

  • अनैतिक कार्यों में कभी भी लिप्त नहीं होना चाहिए। ऐसी गतिविधियों के बारे में सोचना भी निंदनीय है।

  • यदि कोई गलती करता है, अनजाने में या जानबूझकर, उन्हें इसे भगवान के सामने स्वीकार करना चाहिए और अपने गलत कामों के लिए क्षमा मांगनी चाहिए।

  • हमेशा खुश और संतुष्ट रहने का प्रयास करना चाहिए।

  • उचित साधनों से अर्जित अपनी आय का एक हिस्सा हमेशा गरीब और जरूरतमंद लोगों को दान करना चाहिए।

  • लोभ, अहंकार, ईर्ष्या आदि दोषों से दूर रहना चाहिए।

सिख गुरुओं की सूची/ List of Sikh Gurus

  • प्रथम गुरु-गुरु नानक देव

  • दूसरा गुरु-गुरु अंगद देव

  • तीसरा गुरु-गुरु अमर दास

  • चौथा गुरु-गुरु राम दास

  • पांचवें गुरु-गुरु अर्जन देव

  • छठे गुरु-गुरु हर गोबिंद

  • सातवें गुरु-गुरु हर राय

  • आठवें गुरु-गुरु हर कृष्ण

  • नौवें गुरु-गुरु तेग बहादुर

  • दसवें गुरु-गुरु गोबिंद सिंह

 

दस गुरुओं के बाद, सिख धर्म के धार्मिक ग्रंथ, गुरु ग्रंथ साहिब, को जीवित गुरु या शाश्वत गुरु माना जाता है। गुरु ग्रंथ साहिब में कुल 1430 पृष्ठ हैं जिनमें सभी गुरुओं की शिक्षाएं और 30 अन्य संतों के प्रवचन शामिल हैं।

श्री गुरु नानक देव जी के जीवन से कुछ महत्वपूर्ण तथ्य/ Some important facts from the life of Shri Guru Nanak Dev Ji 

  • छोटी उम्र से ही गुरु नानक देव जी ने महान शिष्टता का प्रदर्शन किया और वह समान स्वभाव के थे। उन्होंने बहुत कम उम्र से ही रूढ़िवादिता का विरोध किया था।

  • नानक देव जी पहले सिख गुरु और सिख धर्म के संस्थापक थे। वह उस दौर में प्रचलित धार्मिक अंधविश्वासों और तमाशा के सख्त खिलाफ थे।

  • नानक देव जी एक दार्शनिक, समाज सुधारक, कवि, पारिवारिक व्यक्ति, योगी और देशभक्त थे।

  • नानक देव जी ने जाति व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया। इस सामाजिक बुराई को मिटाने के लिए, उन्होंने 'लंगर' (सामुदायिक रसोई) का संचालन शुरू किया, एक समावेशी भोजन अवधारणा जिसमें जाति, धर्म, नस्ल, जातीयता, वित्तीय पृष्ठभूमि के आधार पर भेद किए बिना सभी को मुफ्त भोजन परोसा जाता था।

  • नानक जी ने 'निर्गुण उपासना' (निराकार ईश्वर की पूजा) की अवधारणा का प्रसार किया। वह मूर्ति पूजा की अवधारणा के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने प्रतिपादित किया कि ईश्वर एक, सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी है।

  • विभिन्न सामाजिक बुराइयों के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए, गुरु नानक जी ने चारों दिशाओं में व्यापक यात्रा की। इस उद्देश्य के लिए उन्होंने जो यात्राएँ की, उन्हें उदासी कहा जाता था। उन्होंने हरिद्वार, अयोध्या, प्रयाग, काशी, गया, पटना, असम, बीकानेर, पुष्कर तीर्थ, दिल्ली, पानीपत, कुरुक्षेत्र, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम, सोमनाथ, द्वारका, नर्मदा, मुल्तान, लाहौर और कई अन्य भारतीय उपमहाद्वीप क्षेत्रों की यात्रा की। 

गुरु पर्व या गुरु नानक जयंती पर समारोह/ Celebrations on Guru Parv or Guru Nanak Jayanti 

गुरु नानक देव की जयंती के उपलक्ष्य में भव्य समारोह का आयोजन किया जाता है। सिख समुदाय गुरु पर्व से तीन सप्ताह पहले प्रभात फेरी निकालना शुरू कर देता है। गुरुद्वारों में गुरु ग्रंथ साहिब का अखंड पाठ किया जाता है। जुलूस के दौरान शबद-कीर्तन (भक्ति गीत गाते हुए) और झांकियां भी निकाली जाती हैं और लंगर चलाए जाते हैं। सिख लोग गुरु नानक जयंती के दिन त्योहार की शुभकामनाओं का आदान-प्रदान करने के लिए अपने प्रियजनों से मिलने जाते हैं, जिसे गुरु पर्व और प्रकाश पर्व के रूप में भी जाना जाता है फेसबुक, व्हाट्सएप| इंस्टाग्राम जैसे विभिन्न सामाजिक मंच के माध्यम से एक-दूसरे को त्योहार की शुभकामनाएं देते हैं, और लोग इन मंचो का उपयोग त्योहार मनाने और अपने प्रियजनों के साथ शुभकामनाओं का आदान-प्रदान करने के लिए करते हैं।

 

मकर राशि में बृहस्पति का गोचर आपके पेशेवर जीवन में कैसे मदद करता है?यह जानने के लिए क्लिक (Click) करें|

 

आप अन्य सभी प्रमुख भारतीय त्योहारों के लिए भारतीय त्योहारों में ज्योतिष की प्रासंगिकता (Relevance of Astrology) पर इसी तरह के लेख पढ़ सकते हैं।

 

वट सावित्री व्रत पूजा
30 May, 2022

हिंदू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि के दिन वट सावित्री व्रत किया जाता हैइस व्रत का हिन्दू धर्म में बहुत अधिक महत्व है क्योंकि यह व्रत पति को दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करता है. यही कारण है कि हर साल सुहागन स्त्रियां इस व्रत की बेसब्री से प्रतीक्षा करती हैं. इस व्रत को रखने से सुहागन स्त्रियों को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती हैवट सावित्री व्रत को रखने से पति के स्वास्थ्य की रक्षा होती है. इस व्रत के प्रभाव से उनके वैवाहिक और सौभाग्य सुख की बढ़ोतरी होती है और उत्तम पति सुख प्राप्त होता है. जो विवाहित महिलाएं निःसंतान हैं उनके लिए भी यह व्रत एक वरदान से कम नहीं है क्योंकि इस व्रत को करने से संतान से संबंधित समस्त बाधाएं भी दूर होती हैं और उत्तम संतान की प्राप्ति होती है. आइये जानते हैं वट सावित्री पर्व 2022 की शुभ तिथि, पूजा विधि, शुभ पूजा मुहूर्त और इसके महत्व के बारे में.

वट सावित्री व्रत का महत्व

  1. प्राचीन मान्यताओं के अनुसार इस दिन माता सावित्री ने अपने पति सत्यवान को मृत्यु के चंगुल से छुड़ाया था इसलिए इस व्रत का बहुत अधिक महत्व है.

  1. इस दिन स्त्रियां वट वृक्ष और सावित्री-सत्यवान की श्रद्धा पूर्वक पूजा-अर्चना करती हैं.

  1. देवी सावित्री ने इस व्रत के प्रभाव से अपने मृत पति सत्यवान को मृत्यु के देवता यमराज के पाश से मुक्त किया था इसलिए इस दिन यमराज की पूजा करने का भी विधान है.

  1. शास्त्रों के अनुसार वट वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवताओं की ऊर्जाओं का वास होता है इसलिए इस दिन वट वृक्ष की पूजा करने से सौभाग्यवती स्त्रियों को इन तीनों देवताओं की विशेष कृपा प्राप्त होती है और उनका सौभाग्य, संतान वैवाहिक सुख बढ़ता है.

  1.  मान्यता है कि इस दिन माता सावित्री और वट वृक्ष की भक्ति भाव से पूजा करने वट सावित्री व्रत की कथा सुनने मात्र से ही सुहागन स्त्रियों की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.

  1. इस व्रत को रखने से सुहागन महिलाओं को अखंड सौभाग्य और उत्तम संतान की प्राप्ति होती है.

  1. निसंतान स्त्रियों के लिए भी यह व्रत बहुत अधिक लाभकारी है क्योंकि इस व्रत को करने से उनकी सूनी गोद शीघ्र-अतिशीघ्र भर जाती है और उनके घरों में नन्हे-मुन्नों की किलकारियां गूंजने लगती है.

  1. इस दिन वट वृक्ष की भक्ति भाव से पूजा-अर्चना करने से घर-परिवार में सुख-शांति आती है.

  1. इस दिन वट वृक्ष की पूजा करने के बाद उसकी परिक्रमा लगाने से आर्थिक समृद्धि के द्वार खुलते हैं और घर में श्री लक्ष्मी जी का वास होता है.

वट सावित्री व्रत 2022 के दौरान इन बातों का रखें विशेष ध्यान

  1. इस दिन सौभाग्यवती स्त्रियों को वट वृक्ष के नीचे बैठकर वट सावित्री व्रत कथा का श्रवण अवश्य करना चाहिए. ऐसा करने से यह व्रत अपूर्ण माना जाता है.

  1. इस पावन दिन पर व्रत रखने वाली स्त्रियों को सूर्योदय से पूर्व ही उठ जाना चाहिए.

  1. इस दिन गंगा जल मिलाकर ही स्नान करना चाहिए.