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संकष्टी चतुर्थी
21 Jan, 2022

संकष्टी चतुर्थी हिंदुओं का एक प्रसिद्ध पर्व है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, किसी भी शुभ कार्य से पहले भगवान गणेश जी का पूजन किया जाता है। सभी देवी-देवताओं में भगवान गणेश प्रथम-पूजनीय देवता हैं तथा उन्हें बुद्धि, शक्ति और ज्ञान देने वाले देवता का दर्जा प्राप्त है। अपने भक्तों की सभी परेशानियों और बाधाओं को दूर करने के कारण भगवान गणेश को 'विघ्नहर्ता' और 'संकट मोचन' भी कहा जाता है। हिंदू धर्म में देवी-देवताओं की कृपा बनाए रखने के लिए बहुत से व्रत किए जाते हैं, लेकिन भगवान गणेश के लिए किया जाने वाला सकट चौथ या संकष्टी चतुर्थी व्रत अत्यधिक लोकप्रिय है। आइए, अब हम इस संकष्टी चतुर्थी के बारे में विस्तार से चर्चा करते हैं-

संकष्टी चतुर्थी कब होती है?/ When is Sankashti Chaturthi?

संकष्टी चतुर्थी कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन मनाई जाती है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, चतुर्थी प्रत्येक माह में दो बार आती है, जिसे लोग बड़ी श्रद्धा के साथ मनाते हैं। पूर्णिमा के बाद आने वाली चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है, जबकि अमावस्या के बाद आने वाली चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहा जाता है। संकष्टी चतुर्थी का दिन, भगवान गणेश के पूजन का विशेष दिन होता है। शास्त्रों के अनुसार, माघ मास में पूर्णिमा के बाद आने वाली चतुर्थी अत्यंत शुभ होती है। यह शुभ दिन भारत के उत्तरी और दक्षिणी राज्यों में अत्यधिक जोश और उत्साह के साथ मनाया जाता है। 

संकष्टी चतुर्थी या सकट चौथ क्या है?/ What is Sankashti Chaturthi or Sakat Chauth?

संकष्टी चतुर्थी का अर्थ है- "बाधाओं को दूर करने वाली चतुर्थी"। 'संकष्टी' शब्द संस्कृत भाषा से लिया गया है जिसका अर्थ है- "कठिन समय से छुटकारा पाना।" इस दिन अपने दुखों से छुटकारा पाने के लिए भक्तों द्वारा गणपति का पूजन किया जाता है। 

पुराणों के अनुसार, चतुर्थी के दिन गौरी पुत्र गणेश जी की आराधना करना अत्यधिक फलदायक होता है। इस दिन सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय तक लोगों द्वारा उपवास रखा जाता है। सभी वैदिक नियमों के अनुसार संकष्टी चतुर्थी पर गणेश जी का पूजन किया जाता है। 

संकष्टी चतुर्थी का महत्व/ Importance of Sankashti Chaturthi

संकष्टी के दिन गणपति जी का पूजन करने से घर की नकारात्मकता दूर होती है और शांति बनी रहती है। ऐसा कहा जाता है कि गणेश जी घर में आने वाली सभी विपत्तियों को दूर करके अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं। चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन भी अत्यधिक शुभ माना जाता है। सूर्योदय से शुरू होने वाला यह व्रत चंद्रमा के दर्शन करने के बाद समाप्त होता है। संपूर्ण वर्ष में संकष्टी चतुर्थी के तेरह व्रत रखे जाते हैं, जिनमें सभी उपवास की अलग-अलग व्रत कथा है। 

संकष्टी चतुर्थी पर चंद्र दर्शन का महत्व/ Importance of Chandra darshan on Sankashti Chaturthi

ज्योतिषियों के अनुसार/According to astrologers, यह उपवास रात में चंद्र दर्शन के बाद पूर्ण हो जाता है। पूरा दिन व्रत रखकर रात में चंद्र दर्शन के बाद तिल, गुड़, लड्डू, कुशा, चंदन और मिठाई अर्पित करते हुए गणेश पूजन करके तथा कथा सुनकर, तब प्रसाद लेना चाहिए। 

संकष्टी चतुर्थी के विभिन्न नाम/ Different Names of Sankashti Chaturthi

भगवान गणेश को समर्पित इस त्यौहार में भक्त उनका पूजन करते हैं और जीवन की कठिनाइयों और बुरे समय से छुटकारा पाने के लिए उपवास रखते हैं। संकष्टी चतुर्थी को कई अलग-अलग नामों द्वारा भी जाना जाता है। इसे कई जगहों पर 'संकट हारा' और कुछ जगहों पर 'सकट चौथ' भी कहा जाता है। किसी माह के मंगलवार के दिन इस पर्व के होने पर इसे 'अंगारकी चतुर्थी' कहा जाता है। अंगारकी चतुर्थी छ: महीने में एक बार आती है और इस दिन व्रत करने से भक्तों को पूरी संकष्टियों का लाभ प्राप्त होता है। दक्षिण भारत में लोग इस दिन को बहुत उत्साह और उल्लास के साथ मनाते हैं। इस दिन शुद्ध मन से भगवान गणेश जी का ध्यान करने से व्यक्ति की मनोकामनाएं पूरी होती हैं तथा व्यक्ति को विशेष लाभ भी प्राप्त होता है।

संकष्टी चतुर्थी के मंत्र और पूजन विधि/ Worshipping Method & Mantra of Sankashti Chaturthi

गणपति को मानने वाले लोग इस दिन उन्हें प्रसन्न करने के लिए व्रत रखकर, अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं। 

१) इस दिन सूर्योदय से पहले जागना चाहिए।

२) इस दिन उपवास रखने वालों को स्नान करके साफ-सुथरे वस्त्र धारण करनी चाहिए। इस दिन अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए लाल रंग के वस्त्र पहनना अत्यधिक शुभ माना जाता है। 

३) स्नान करने के बाद भक्तों को गणपति पूजन करना चाहिए। गणपति पूजन करते समय अपना मुख पूर्व या उत्तर दिशा में रखना चाहिए। 

४) सबसे पहले, गणपति की प्रतिमा को फूलों से सजाना चाहिए।

५) पूजन करते समय तिल, गुड़  लड्डू, फूल, तांबे के लोटे में जल, धूप, चंदन और प्रसाद के लिए नारियल और केले रखने चाहिए। 

६) पूजन करते समय देवी दुर्गा की प्रतिमा या चित्र रखना अत्यंत शुभ माना जाता है। 

७) गणपति के मस्तक पर रोली लगाकर, फूल और जल अर्पित किया जाता है। 

८) संकष्टी पर भगवान गणपति को तिल के लड्डू और मिठाईयों का भोग लगाया जाता है। 

९) गणपति के सम्मुख दीपक और धूप जलाकर इस मंत्र का जाप करना चाहिए-

गजाननं भूत गणादि सेवितं, कपित्थ जम्बू फल चारू भक्षणम्।

उमासुतं शोक विनाशकारकम्, नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम्।।

१०) पूजन के बाद फल, मूंगफली, खीर, दूध या साबूदाने की अतिरिक्त और कुछ नहीं खाना चाहिए। 

११) व्रत के दिन बहुत से लोगों द्वारा सेंधा नमक का प्रयोग किया जाता है लेकिन इस नमक का प्रयोग करने से बचने की कोशिश करनी चाहिए।

१२) शाम को चंद्रोदय से पहले, भगवान गणपति का पूजन करके संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा का पाठ करना चाहिए।

१३) पूजा समाप्त होने के बाद प्रसाद बांटना चाहिए। रात्रि में चंद्रमा के दर्शन के बाद व्रत तोड़ा जाता है और इस तरीके से संकष्टी चतुर्थी का उपवास पूर्ण होता है। 

सकट चौथ पर इन चीजों का सेवन न करें/ Do Not Eat the Following Things on Sakat Chauth

शास्त्रों के अनुसार, मूली, प्याज, गाजर, चुकंदर जैसी जड़ वाली सब्जियों से बचना चाहिए। इस दिन मूली का सेवन अशुभ माना जाता है। 

सांयकाल में चंद्रमा को तिल और गुड़ का अर्घ्य अर्पण/Offer Arghya of Sesame and Jaggery to the Moon at Evening

सूर्यास्त के बाद, चंद्रमा को गुड और तिल का अर्घ्य देकर व्रत खोलना चाहिए। गणेश जी के पूजन के बाद तिल का प्रसाद ग्रहण करना चाहिए। व्रत न रखने वाले व्यक्तियों को भी सांयकाल के समय, गणेश पूजन के बाद तिल से बनी चीजें खानी चाहिए। ऐसा कहा जाता है कि तिल खाने या तिल के नाम का उच्चारण करने से पाप दूर हो जाते हैं। इस दिन तिल का दान करना भी शुभ माना जाता है। 

कुशा से भगवान गणेश का पूजन/ Worship Lord Ganesha with Scutch Grass

गणेश जी को कुशा घास अर्पण करनी चाहिए। ऐसा माना जाता है, कि कुशा में अमृत होने से गणेश जी को कुशा अर्पित करने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है तथा प्रतिष्ठा और धन की वृद्धि होती है। संभव होने पर, प्रतिदिन गणेश जी को कुशा अर्पण करनी चाहिए लेकिन भूलकर भी गणेश जी पर तुलसी पत्र नहीं चढ़ाना चाहिए क्योंकि तुलसी द्वारा गणेश जी को श्राप देने के कारण, उसकी पत्तियां अर्पित करने से गणेशजी क्रोधित हो जाते हैं। 

गणेश आरती/ Aarti of Ganeshji

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।

माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।

एकदन्त दयावन्त, चार भुजाधारी।

माथे पर तिलक सोहे, मूसे की सवारी।।

पान चढ़े फूल चढ़े, और चढ़े मेवा।

लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करें सेवा।।

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।

माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।

अंधे को आंख देत, कोढ़िन को काया।

बांझन को पुत्र देत,निर्धन को माया।।

'सूर' श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।

माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।

दीनन की लाज राखो, शम्भु सुतवारी।

कामना को पूर्ण करो, जग बलिहारी।।

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।

माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।

पौराणिक कथा/ Mythological Story

गणेश जी की प्रसिद्ध पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार देवी-देवताओं के अनेक संकटों से घिरने पर, वह मदद मांगने भगवान शिव के पास गए। उस समय कार्तिकेय और गणेश जी भगवान शिव जी के साथ बैठे थे। देवताओं की बात सुनकर,शिव जी ने कार्तिकेय और गणेश जी से पूछा, कि उन दोनों में से कौन देवताओं की परेशानियों को कम कर सकता है? तब कार्तिकेय और गणेश जी दोनों ने उन्हें बताया कि वह दोनों ही सक्षम हैं। यह सुनकर भगवान शिव ने उन दोनों को बुलाकर कहा, कि 'तुम दोनों में से जो पहले पृथ्वी का चक्कर लगाकर आएगा वही देवताओं की मदद करेगा'। 

भगवान शिव के मुख से इन वचनों को सुनते ही कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठकर पृथ्वी का चक्कर लगाने के लिए चले गए। लेकिन गणेश जी सोचने लगे कि यदि वह चूहे पर बैठकर पृथ्वी का चक्कर लगाएंगे तो इसमें अत्यधिक समय खर्च हो जाएगा। तभी उन्हें एक युक्ति सूझी। वह अपने स्थान से उठकर अपने माता-पिता का चक्कर लगाकर अपने स्थान पर लौट गए। जब कार्तिकेय पृथ्वी का चक्कर लगा कर लौटे  तो उन्होंने स्वयं को विजेता घोषित कर दिया। तब भगवान शिव ने श्री गणेश जी से पृथ्वी का चक्कर नहीं लगाने का कारण पूछा। 

गणेश जी बोले- "संपूर्ण जगत माता-पिता के चरणों में ही स्थित है।" यह सुनकर भगवान शिव ने गणेश जी को देवताओं की बाधाओं को दूर करने का आदेश दिया। इस प्रकार भगवान शिव ने गणेश जी को आशीर्वाद देते हुए कहा- कि 'जो कोई भी चंद्र पखवाड़े के चौथे दिन (चतुर्थी के दिन) रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देकर पूजन करेगा, उसकी शारीरिक, आध्यात्मिक और भौतिक तीनों प्रकार की समस्याएं नष्ट हो जाएंगी। यह व्रत रखने से व्यक्ति की परेशानियां दूर होगी और उसके जीवन में सभी भौतिक सुखों की प्राप्ति होगी। संतान, पौत्र-पौत्री और धन-संपत्ति का आशीर्वाद प्राप्त होगा।'

संकष्टी चतुर्थी या सकट चौथ व्रत कथा/ Sankashti Chaturthi or Sakat Chauth Vrat Katha

संकष्टी चतुर्थी के उत्सव के पीछे दर्जनों पौराणिक कथाएं हैं, लेकिन हम इस पर्व से संबंधित सबसे प्रसिद्ध कथा विस्तारपूर्वक बताने जा रहे हैं। 

एक बार माता पार्वती और भगवान शिव नदी किनारे बैठे थे। तभी अचानक माता पार्वती ने चौपड़ खेलने की अपनी इच्छा प्रकट की, लेकिन वहां उनके अलावा चौपड़ के खेल में भाग लेने वाला और कोई नहीं था। इस समस्या का समाधान करते हुए भगवान शिव और पार्वती जी ने मिट्टी की प्रतिमा बनाकर उसमें प्राण डाल दिए। उन दोनों ने मिट्टी की प्रतिमा को आदेश दिया, कि वह खेल को ध्यानपूर्वक देखकर हारने वाले और विजेता को घोषित करें। खेल शुरू होने पर माता पार्वती भगवान शिव को धोखा देकर जीत रही थी। 

खेल समाप्त होने पर लड़के ने गलती से माता पार्वती को हारा हुआ घोषित कर दिया। लड़के की इस गलती से माता पार्वती ने क्रोधित होकर उसको लंगड़ा होने का श्राप दिया। लड़के ने माता पार्वती से क्षमा की भीख मांगी। लड़के को बार-बार अनुरोध करता देखकर माता बोली, कि यह श्राप बदल तो नहीं सकता लेकिन वह इस श्राप से मुक्त होने का उपाय बता सकती हैं। माता पार्वती बोली, कि संकष्टी के दिन यहां कन्या पूजन के लिए आती हैं। उनसे पूजन विधि के बारे में जानकर उसी के अनुसार पूर्ण श्रद्धा से पूजा करने को कहा। 

लड़के ने व्रत की विधि जानकर उसके अनुसार ही किया। उसकी सच्ची श्रद्धा से भगवान गणेश ने प्रसन्न होकर उसकी इच्छा पूछी। लड़के द्वारा माता पार्वती और भगवान शिव के पास जाने की इच्छा प्रकट करने पर, भगवान गणेश उसकी इच्छा पूर्ति के लिए उसे 'शिवलोक' ले गए। लेकिन वहां पहुंचने पर माता पार्वती, भगवान शिव से नाराज होकर कैलाश चली गई थी इसलिए वहां केवल शिव भगवान ही मिले। जब भगवान शिव ने लड़के से पूछा- कि वह यहां कैसे पहुंचा? तो वह बोला कि 'भगवान गणेश की पूजा करके उसे यह आशीर्वाद प्राप्त हुआ है।' यह जानकर भगवान शिव ने भी माता पार्वती को प्रसन्न करने के लिए यह उपवास किया। तब भगवान शिव से प्रसन्न होकर माता पार्वती कैलाश से लौट कर आई थीं।

एक वर्ष में आने वाली चतुर्थी तिथि की जानकारी/ Know How Many Chaturthi Day Comes in a Year

आइए, अब एक वर्ष में आने वाली चतुर्थी तिथियों के बारे में जानते हैं। पूर्णिमा के बाद आने वाली चतुर्थी के दिन को 'संकष्टी चतुर्थी' कहा जाता है। इसी प्रकार अमावस्या के बाद आने वाली चतुर्थी तिथि को 'विनायक चतुर्थी' कहते हैं। 

महत्वपूर्ण हिंदू त्योहारों के बारे में अधिक जानकारी और आज के चंद्रोदय के समय और महत्व के बारे में जानने के लिए इस लिंक पर क्लिक किया जा सकता है।

 

गणतंत्र दिवस
26 Jan, 2022

गणतंत्र दिवस वह दिन है जिसे पूरा देश एक साथ बड़े उत्साह के साथ मनाता है। २६ जनवरी भारत के लोगों के लिए गणतंत्र दिवस होता है। यह एक महत्वपूर्ण दिन है जिसे २६ जनवरी, १९५० से प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है। लंबे समय तक हमारी मातृभूमि भारत में ब्रिटिश शासन लागू था और कई वर्षों तक भारत के लोगों द्वारा गुलामी में रहने के कारण, भारत के लोगों को अंग्रेजों के कानूनों का पालन करना पड़ता था। एक लंबे संघर्ष के बाद, आखिरकार भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों ने १५ अगस्त, १९४७ के दिन भारत को आजादी दिलाई। स्वतंत्रता प्राप्ति के लगभग ढाई वर्षों के बाद, भारत ने २६ जनवरी, १९५० को अपना संविधान स्थापित किया और स्वयं को एक लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया। लगभग २ साल, ११महीने और १८ दिनों के बाद हमारी संसद द्वारा २६ जनवरी, १९५० को संविधान पारित किया गया। भारत के स्वयं को एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणतंत्र घोषित करने के बाद, २६जनवरी का दिन भारत के लोगों द्वारा गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया गया। पराधीन रहना किसी को पसंद नहीं होता। जानवरों तक को गुलामी पसंद नहीं होती, हम तो फिर भी मनुष्य हैं। चिड़िया को कितना भी सोने के पिंजरे में रखो, लेकिन फिर भी वह खुले आसमान में उड़ना चाहती है। इससे यह सिद्ध होता है कि स्वतंत्रता अत्यधिक मूल्यवान होती है। केवल आजाद होना ही पर्याप्त नहीं होता बल्कि इसे बनाए रखना और विकसित करना भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है।

गणतंत्र दिवस का महत्व/ The Importance of Republic Day

गणतंत्र दिवस हमारा राष्ट्रीय पर्व है, जो २६ जनवरी को मनाया जाता है। भारत के संविधान ने 'भारत सरकार अधिनियम १९३५' को बदल दिया। २६ जनवरी का दिन संविधान को लागू करने के लिए चुना गया था, क्योंकि १९३० में इसी दिन, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने लाहौर सत्र के दौरान, आधी रात को पूर्ण स्वराज की घोषणा की थी। गणतंत्र दिवस को संपूर्ण भारत में एक गौरवशाली राष्ट्रीय अवकाश माना जाता है। देश में गणतंत्र दिवस के अवकाश के ही समान स्वतंत्रता दिवस और गांधी जयंती के दिन भी राष्ट्रीय अवकाश होते हैं। लोकतंत्र की परिभाषा के अनुसार, यह "लोगों द्वारा, लोगों के लिए, लोगों का शासन" है। आज के समय में लोकतांत्रिक कहलाना एक फैशन बन गया है। अलग ही तरह के उन्माद के, दूर-दूर तक फैलने से बहुत मुश्किलों के बाद हमें आजादी मिली है। इसके माध्यम से, हम अपनी आने वाली पीढ़ी को अपने गौरवशाली इतिहास के बारे में बता सकते हैं। साथ ही, देश के सपूतों को देखकर हमें प्रेरणा मिलती है और देश के लिए कुछ भी करने का जज्बा पैदा होता है। 

भारतीय गणतंत्र दिवस का अर्थ/ The Meaning of Indian Republic Day 

'गण का अर्थ है-लोग', और 'तंत्र का अर्थ है-शासन'। गणतंत्र या लोकतंत्र का अर्थ है- 'लोगों का शासन,' देश या ऐसा राज्य जहां वे अपना प्रतिनिधि चुनते हैं। ऐसे राष्ट्र को एक लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में चिह्नित किया जाता है। ऐसी व्यवस्था हमारे देश में मौजूद है इसलिए हमारे देश को एक लोकतांत्रिक गणराज्य कहा जाता है। गणतंत्र का अर्थ है, एक ऐसा देश जहां आम जनता को सत्तारूढ़ सरकार को चुनने और हटाने का अधिकार है। ऐसी सरकार कभी निरंकुश नहीं होती क्योंकि सत्ता किसी के हाथ में नहीं होती है। हमारी सरकार संसदीय रूप से गठित की गई है। सरकार कुछ लोगों का समूह होती है जो निर्धारित प्रक्रिया पर काम करती है। इसके तीन भाग हैं - कार्यपालिका, न्यायपालिका और प्रशासन। 

भारतीय गणतंत्र दिवस का इतिहास/ The History of Indian Republic Day

२६ जनवरी, १९५० को लागू हुए भारतीय गणतंत्र दिवस का असाधारण इतिहास काफी प्रभावशाली है। हमारे देश में 'भारत सरकार अधिनियम' को समाप्त करके भारत के संविधान के अस्तित्व में आने के बाद से, गणतंत्र दिवस का कार्यक्रम हर साल संविधान और भारत गणराज्य के सम्मान के लिए २६ जनवरी को मनाया जाता है। लेकिन, इस दिन से जुड़ा एक और इतिहास है, और इसकी शुरुआत २६ जनवरी, १९३० को हुई थी क्योंकि यह वह ऐतिहासिक दिन माना जाता था, जब कांग्रेस ने पहली बार पूर्ण स्वराज की मांग की थी। इसकी शुरुआत तब हुई, जब १९२९ में, पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में लाहौर में कांग्रेस के सत्र के दौरान, एक प्रस्ताव पारित किया गया कि यदि २६ जनवरी, १९३० तक, अंग्रेजी सरकार ने भारत को 'राज्य का दर्जा' नहीं दिया, तो भारत पूरी तरह से स्वतंत्र घोषित हो जाएगा। इसके बाद २६ जनवरी, १९३० तक ब्रिटिश सरकार द्वारा कांग्रेस की मांग का कोई जवाब नहीं देने पर, उस दिन से कांग्रेस ने पूर्ण स्वतंत्रता के लिए अपना सक्रिय आंदोलन शुरू कर दिया। १५अगस्त, १९४७ को जब भारत आजाद हुआ, तो भारत सरकार ने २६जनवरी के ऐतिहासिक महत्व को ध्यान में रखते हुए गणतंत्र की स्थापना के लिए इस दिन को चुना। 

गणतंत्र दिवस क्यों मनाया जाता है?/ Why is Republic Day Celebrated?

हमारे देश में, लोगों को सरकार चुनने का अधिकार दिया गया है। दुनिया में कई देश लोकतांत्रिक देश हैं, लेकिन सभी गणतंत्र नहीं हैं। यह दोनों एक जैसे लगते हैं लेकिन दोनों में थोड़ा सा अंतर होता है। चलिए, इस अंतर को जानने की कोशिश करते हैं- गणतंत्र में कानून शासन के अधीन होता है, जबकि एक गणतांत्रिक देश यह सुनिश्चित करता है कि किसी को भी अधिकारों से वंचित न किया जाए, जैसे कि अल्पसंख्यक आदि। कोई शक्ति नहीं होने के कारण, यह निरंकुश नहीं है, इसलिए कुछ शक्तियां प्रधानमंत्री के साथ-साथ राष्ट्रपति को भी दी जाती हैं। इस शासन में सभी एक साथ काम करते हैं और एक-दूसरे का समर्थन करते हैं इसलिए भारत में कई बार राष्ट्रपति संसद द्वारा बनाए गए कानूनों पर हस्ताक्षर करने से मना कर देते हैं, लेकिन लोकतांत्रिक देशों में ऐसा नहीं होता है। संसद द्वारा बनाया गया नियम अंतिम और स्वीकार्य होता है। 

अब यह समझने की कोशिश करते हैं, कि भारत को किन विशेषताओं और महत्व के कारण गणतांत्रिक सरकार कहा जाता है। विश्व के सभी राष्ट्रों में लोकतंत्र है, लेकिन वे सभी देश गणतंत्र के मापदंडों में नहीं आते हैं। आइए, हम इंग्लैंड के उदाहरण से जानने की कोशिश करते हैं। इंग्लैंड में लोकतंत्र है, लेकिन यह गणतंत्रवादी देश नहीं है। हमारे संविधान में संसदीय प्रणाली इंग्लैंड से ही ली गई है। हालांकि, यह उससे अलग है। 

संविधान को तैयार होने में लगभग ढाई साल लगे/ The Constitution was prepared after about two and a half years.

स्वतंत्रता के बाद, २८ अगस्त, १९४७ के एक अधिवेशन में, एक मसौदा समिति को भारत के स्थायी संविधान का प्रारूप तैयार करने का निर्देश दिया गया था। ४ नवम्बर, १९४७ को डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की अध्यक्षता में भारत के संविधान के प्रारूप को सदन में रखा गया। लगभग तीन साल के बाद यह पूरी तरह बनकर तैयार हो गया। आखिरकार, इंतजार खत्म हुआ और अंततः २६ जनवरी, १९५० को इसे लागू किया गया।

भारत का राष्ट्रीय पर्व: गणतंत्र दिवस/ National Festival of India: Republic Day

गणतंत्र दिवस कोई साधारण दिन नहीं है। यह वह दिन था जब हमारे भारत ने पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त की थी। भले ही भारत १५अगस्त, १९४७ को स्वतंत्र हुआ, लेकिन २६ जनवरी, १९५० को यह पूरी तरह से स्वतंत्र हो गया। भारत का नवगठित संविधान 'भारत सरकार अधिनियम' को हटाकर अधिनियमित हुआ। इसलिए उस दिन से २६जनवरी को, भारत में गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह भारत के तीन राष्ट्रीय त्योहारों में से एक है। दो अन्य पर्व- गांधी जयंती और स्वतंत्रता दिवस पर भी, गणतंत्र दिवस की ही तरह राष्ट्रीय अवकाश रहता है। स्कूल और कार्यालय जैसी कई जगहों पर एक दिन पहले ही कार्यक्रम मना लिए जाते हैं।

पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव/ Proposal for Purna swaraj

२६ जनवरी के दिन को संविधान की स्थापना के लिए चुना गया था। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि १९२९ में कांग्रेस ने अंग्रेजों की गुलामी के खिलाफ पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित किया था। दिसंबर १९२९ में पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की एक बैठक हुई। यह घोषणा की गई कि यदि ब्रिटिश सरकार ने २६ जनवरी, १९३० तक भारत को राज्य का दर्जा नहीं दिया, तो भारत खुद को पूरी तरह से स्वतंत्र घोषित कर देगा।

संविधान दिवस भी मनाया जाता है।/ Constitution Day is also celebrated.

भारत की आजादी के बाद संविधान सभा का गठन हुआ, जिसने ९ दिसम्बर, १९४६ को अपना काम शुरू किया। दुनिया का सबसे व्यापक लिखित संविधान बनाने में लगभग दो साल, ११ महीने, १८ दिन लगे। भारत का संविधान २६ नवम्बर, १९४९ को, संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद को सौंपा गया था इसलिए हर साल २६ नवंबर को संविधान दिवस के रूप में मनाया जाता है। संविधान बनाने के समय, संविधान सभा ने कुल ११४ दिनों का आयोजन किया जिसमें प्रेस/संचार माध्यम और जनता भी इसका हिस्सा बनने के लिए स्वतंत्र थे। कई सुधारों और परिवर्तनों के बाद, विधानसभा के ३०८ सदस्यों ने २४ जनवरी, १९५० को संविधान की दो हस्तलिखित प्रतियों पर हस्ताक्षर किए। दो दिन बाद २६ जनवरी को पूरे देश में संविधान लागू हो गया।

गर्व से परिपूर्ण राष्ट्रीय पर्व/ A national festival full of pride

भारत में रहने वाले लोगों और विदेशों में रहने वाले भारतीयों के लिए, गणतंत्र दिवस मनाना एक सम्मान की बात है। यह दिन विशेष महत्व रखता है, और इसे कई गतिविधियों में भाग लेने वाले और उन्हें आयोजित करने वाले लोगों द्वारा बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। बार-बार इसका हिस्सा बनने के लिए लोग इस दिन का बेसब्री से इंतजार करते हैं। गणतंत्र दिवस समारोह की तैयारियां करीब एक महीने पहले से ही शुरू हो जाती हैं। इस दौरान सुरक्षा कारणों से इंडिया गेट पर लोगों की आवाजाही पर रोक लगा दी जाती है ताकि कोई भी आपराधिक घटना घटने से पहले ही टल जाए तथा उस दिन वहां उपस्थित लोगों की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो सके।

राष्ट्रीय पर्व - अनेकता में एकता का प्रतीक/ National festival - a sign of unity in diversity

भारत में इस दिन सभी राज्यों की राजधानियों में इस त्योहार के लिए विशेष व्यवस्था की जाती है। नई दिल्ली में भी इसकी व्यवस्था की जाती है। कार्यक्रम की शुरुआत राष्ट्रपति द्वारा ध्वजारोहण और राष्ट्रगान से होती है। प्रत्येक राज्य अपनी-अपनी विविधता की झाँकी प्रदर्शित करते हैं। इसके बाद तीनों सेनाओं द्वारा परेड, पुरस्कार वितरण, मार्च पास्ट आदि किया जाता है। और अंत में, पूरा वातावरण "जन गण मन" के साथ गूंज उठता है।

गणतंत्र दिवस समारोह/ Republic Day Celebrations

भारत में गणतंत्र दिवस समारोह धूमधाम से मनाया जाता है। २६ जनवरी को, भारत के राष्ट्रपति राष्ट्रीय ध्वज फहराते हैं और राष्ट्रगान गाया जाता है। वैसे तो, पूरे देश में गणतंत्र दिवस बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन दिल्ली में इसका स्वरूप देखने लायक होता है। हर साल गणतंत्र दिवस पर इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन तक भव्य परेड का आयोजन किया जाता है। इस परेड में थल सेना, वायुसेना और नौसेना के जवान भी शामिल होते हैं। इस परेड के दौरान, तीनों सेनाओं के प्रमुख राष्ट्रपति को सलामी देते हैं। इतना ही नहीं, इस दिन तीनों सेनाएं भी आधुनिक हथियारों का प्रदर्शन करती हैं, जो राष्ट्रीय शक्ति का प्रतीक है। साथ ही देश के विभिन्न स्कूलों के बच्चे इस परेड में हिस्सा लेते हैं और रंगारंग कार्यक्रम पेश करते हैं।

गणतंत्र दिवस समारोह का एक अनूठा पहलू यह है कि इस समारोह में पूरे विश्व के देशों से एक विशिष्ट अतिथि को बुलाया  जाता है, जो पूरे कार्यक्रम के दौरान वहां उपस्थित रहते हैं। गणतंत्र दिवस समारोह में परेड के दौरान सभी राज्यों की झांकी प्रस्तुत की जाती है। इस झांकी में सभी राज्य अपनी विविधता और संस्कृति की झलक पेश करते हैं। इतना ही नहीं, हर राज्य अपने राज्य में लोक-गीतों और लोक-नृत्यों का एक सुंदर रूप प्रस्तुत करते हैं। गणतंत्र दिवस समारोह में भाग लेने के लिए देश भर से लोग आते हैं और दर्शक दीर्घा में बैठते हैं। इसके साथ ही राष्ट्रीय चैनलों का सीधा प्रसारण किया जाता है, जिससे पूरे देश की जनता को इस समारोह की एक झलक दिखाई जाती है। और अंत में, पूरे भारत का वातावरण "जन गण मन गण" से गूंज उठता है। 

रंगारंग कार्यक्रम/ Colorful Program

स्कूल और कॉलेज के छात्र इस त्योहार को मनाने के लिए अत्यधिक उत्साहपूर्वक एक महीने पहले से ही इसकी तैयारी शुरू कर देते हैं। इस दिन अकादमी, खेल या अन्य शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन करने वाले छात्रों को पुरस्कार और प्रमाण-पत्र आदि प्रदान किए जाते हैं। परिवार के लोग इस दिन आयोजित सामाजिक कार्यक्रमों में अपने दोस्तों, परिवार और बच्चों के साथ शामिल होते हैं। टेलीविजन पर राजपथ पर सुबह आठ बजे होने वाले इस कार्यक्रम को देखने के लिए हर कोई उत्सुक रहता है.

गणतंत्र दिवस मनाना गर्व का विषय होता है/ Celebrating Republic Day is a matter of honor

भारत में रहने वाले लोगों और विदेशों में रहने वाले भारतीयों के लिए गणतंत्र दिवस मनाना एक बड़े सम्मान की बात होती है। स्कूलों में, कॉलेजों में, दफ्तरों आदि में हर जगह २६ जनवरी को भारत का झंडा फहराया जाता है, और ऐसे कई कार्यक्रम होते हैं जिनकी तैयारी इसके आने के महीनों पहले से ही शुरू हो जाती है। भारत के लोग २६ जनवरी को पूरे उत्साह और उल्लास के साथ मनाते हैं। इंडिया गेट पर सुरक्षा कारणों से लोगों की आवाजाही रोक दी जाती है। 

हमारी संसदीय प्रणाली इंग्लैंड की संसदीय प्रणाली से किस प्रकार भिन्न है?/ How is our parliamentary system different from the parliamentary system of England?

१. इंग्लैंड की संसदीय प्रणाली से प्रेरित, हमारे पास भी संसदीय प्रणाली है। इंग्लैंड में हमारी तरह लोग सांसद चुनते हैं और फिर वे सभी सांसद मिलकर प्रधानमंत्री का चुनाव करते हैं।

२. हमारे देश जैसे लोगों के लिए इंग्लैंड के प्रधानमंत्री के जिम्मेदार होने पर, जनता को हर पांच साल में इस प्रधानमंत्री को चुनने और हटाने का अधिकार है। इसलिए इंग्लैंड भी एक लोकतांत्रिक देश है, लेकिन फिर भी इंग्लैंड को गणतंत्र नहीं कहा जाता है।

३. इंग्लैंड अकेला ऐसा देश नहीं है, जिसकी ऐसी परंपरा है। जापान, स्पेन, बेल्जियम, डेनमार्क समेत दुनिया के कई देश है, जहां लोकतंत्र तो है, लेकिन गणतंत्र नहीं है, लेकिन भारत के साथ ऐसा नहीं है, इसलिए हमारा देश सबसे अनोखा है. वास्तव में, यह ईमानदारी से कहा गया है, "सारे जहां से अच्छा, हिंदुस्तान हमारा।"

४. इसके अलावा, एक मुख्य अंतर सत्ता के सर्वोच्च पद पर आसीन व्यक्ति का है, जिसका कोई साक्ष्य नहीं होने के कारण समझ में नहीं आता है।

५. अगर लोगों को सत्ता के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति को चुनने और हटाने का अधिकार है, तो उस देश को लोकतांत्रिक कहा जाता है। (जैसा कि भारत में है।) यदि नहीं, तो उस देश को गणतंत्र नहीं कहा जाएगा।

६. इंग्लैंड में ऐसा नहीं है। वहाँ आज भी राजशाही होने के कारण राजा (या रानी) शक्ति के सर्वोच्च पद पर  आसीन रहते हैं। इंग्लैंड के लोग प्रधानमंत्री को बदल सकते हैं, लेकिन राजा या रानी को नहीं।

गणतंत्र दिवस से जुड़े कुछ रोचक तथ्य/ Some interesting facts related to Republic Day

१. गणतंत्र दिवस पर पहली बार २६ जनवरी १९३० को पूर्ण स्वराज का कार्यक्रम मनाया गया, जिसमें ब्रिटिश शासन से पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करने का संकल्प लिया गया।

२. गणतंत्र दिवस परेड के दौरान, एक ईसाई धुन बजाई जाती है जिसका नाम "अबाइड विद मी" है क्योंकि यह महात्मा गांधी की पसंदीदा धुनों में से एक है।

३. इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो को भारत के पहले गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था।

४. गणतंत्र दिवस समारोह पहली बार राजपथ में वर्ष १९५५ में मनाया गया था।

५. भारत के गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान भारत के राष्ट्रपति को ३१ तोपों की सलामी दी जाती है।

गणतंत्र दिवस समारोह का समापन/ Conclusion of Republic Day Celebrations

गणतंत्र दिवस समारोह को उत्साहपूर्वक मनाने के बाद, समारोह का समापन बड़ी धूमधाम और शो के साथ किया जाता है, जिसे बीटिंग रिट्रीट कहा जाता है। २६ जनवरी का समारोह ३ जनवरी से २९ जनवरी तक चलता है। इस समारोह में तीन सेनाएं भी शामिल होती हैं। समारोह राष्ट्रपति भवन के पास मनाया जाता है राष्ट्रपति कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होते हैं, जिन्हें तीनों सेनाओं के प्रमुख सलामी देते हैं।

आप अन्य सभी प्रमुख भारतीय त्योहारों के लिए "भारतीय त्योहारों में ज्योतिष की प्रासंगिकता" पर इसी तरह के लेख पढ़ सकते हैं।

 

बसंत पंचमी
05 Feb, 2022

हिंदू धर्म में वसंत पंचमी/basant Panchami 2021 का विशेष महत्व है। इस दिन मां सरस्वती की पूजा की जाती है। भारत के पूर्वी भाग में यह दिन बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं पीले रंग के वस्त्र पहनकर मां सरस्वती का पूजन/Saraswati Puja करती हैं। सभी छह ऋतुओं में से लोगों द्वारा वसंत को  सबसे अधिक पसंद किया जाता है।

फूलों के पूर्ण विकसित होने, सूरजमुखी के बीजों के खेतों में फैलने, गेहूं की बालियां खिलने, आम के पेड़ों पर बौर लगने, चारों ओर तितलियों के मंडराने पर वसंत पंचमी को पहचाना जा सकता है। कुछ इस प्रकार होता है वसंत पंचमी का आकर्षण। इस दिन को श्री पंचमी के रूप में भी जाना जाता है और वसंत के मौसम की शुरुआत होती है। किसानों के लिए वसंत कटाई का सबसे अच्छा मौसम होता है। जैसा कि पहले भी उल्लेख किया है कि इस समय के दौरान, सूरजमुखी के बीज खेतों को सुशोभित करते हैं, वृक्ष और फूल आनंदित होते हैं, और लोग आकाश में पतंग उड़ाते हैं। पंजाब में, पांचवें दिन पतंग उड़ाकर और देवी सरस्वती का पूजन/Saraswati puja करके वसंत पंचमी मनाई जाती है। हिंदू धर्म में, देवी सरस्वती को शिक्षा की देवी मानने के कारण इस दिन सभी छात्रों द्वारा उनकी पूजा की जाती है। भगवतगीता में, भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है, "वसंत मेरा ही एक रूप है।" माघ मास की पंचम तिथि को भगवान विष्णु और कामदेव की आराधना करके इस पर्व का स्वागत किया जाता है इसलिए इस त्योहार को वसंत पंचमी कहा जाता है। इस त्योहार को देवी सरस्वती के जन्म दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। ऋग्वेद में, देवी सरस्वती का वर्णन इस प्रकार किया गया है:

प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु।

इस मंत्र/basant panchami mantra का अर्थ है देवी आप परम शक्ति हैं आप हमें ज्ञान और प्रगति का आशीर्वाद दें तथा हमें सही दृष्टिकोण विकसित करने में मदद करें। आप हमारे आचरण और ज्ञान की स्रोत हैं। हे देवी! आपकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है।

हमारे द्वारा बजरंगी धाम में नियमित रूप से कुछ अनुयायियों के लिए, इस दिन प्रत्येक वर्ष उनकी पूर्ण समृद्धि के लिए सुबह 7:30 बजे एक छोटा पूजा और बसंत पंचमी का समारोह का आयोजन किया जाता है।  

बसंत पंचमी का महत्व/ Importance of Basant Panchami

इस पर्व में मनुष्यों के साथ ही प्रकृति, जीव-जंतु भी प्रसन्नता से परिपूर्ण रहते हैं। वैसे तो, माघ का पूरा महीना सभी को आनंदित करता है लेकिन बसंत पंचमी की अपनी ही सुंदरता और महत्व होता है। प्राचीन काल से ही, इस पर्व के दिन को देवी सरस्वती का जन्म दिवस माना जाता है इसीलिए इस दिन उनकी, ज्ञान और बुद्धि की देवी मां शारदा के रूप में आराधना की जाती है। लेखकों, गायकों, नर्तकों, अभिनेताओं आदि रचनात्मक कलाकारों द्वारा भी बधाई स्वरूप देवी सरस्वती का पूजन किया जाता है। 

बसंत पंचमी का प्राचीन महत्व/ Ancient Importance of Basant Panchami

बसंत पंचमी का प्राचीन महत्व रामायण से संबंधित है। जब रावण, माता सीता का अपहरण करके उन्हें लंका ले गया था, तब भगवान राम उन्हें खोजते हुए दंडकण्य नामक स्थान पर पहुंचे थे जहां शबरी नाम की एक   बूढ़ी औरत रहती थी। भगवान राम के उसकी कुटिया में पहुंचने पर, उसने उन्हें प्रेमपूर्वक बेर खिलाए। ऐसा माना जाता है कि गुजरात के डांग जिले में शबरी की कुटिया आज भी स्थित है तथा जब भगवान राम इस स्थान पर पहुंचे थे उस दिन वसंत पंचमी का अवसर था। लोगों द्वारा भगवान राम की प्रतिमा की आराधना की जाती है और ऐसा माना जाता है कि भगवान राम उनके पास आकर बैठते हैं। इस स्थान पर मां शबरी का मंदिर भी है।

वसंत पंचमी हमें पृथ्वीराज चौहान का भी स्मरण कराती है। पृथ्वीराज चौहान द्वारा मोहम्मद गौरी को सोलह बार हराने के बाद भी, उसे हर बार अपनी जिंदादिली के कारण जीवित छोड़ दिया था। सत्रहवीं बार में, मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को हरा दिया और उन्हें कष्ट देने के लिए अफगानिस्तान ले जाकर राजा की आंखें निकलवा दीं। मोहम्मद गौरी राजा को मौत की सजा देने से पहले उनके "शब्दवेदी बाण" के जादुई कौशल को देखना चाहता था। इस स्थिति का लाभ उठाकर कवि चंदवरदाई ने राज को संकेत दिया-

चारबांस चौबीस गज, अंगुल अष्टप्रमन।
ता उपर सुल्तान, मत चुको चौहान।

इस बार पृथ्वीराज चौहान ने अपना निशाना न चूककर, मोहम्मद गौरी के सीने में सीधे बाण मार दिया था। इसके बाद, चौहान और चंदवरदाई ने आत्मबलिदान स्वरूप एक-दूसरे को चाकू से मार डाला था। यह घटना 1192 में वसंत पंचमी के दिन की थी।

वसंत पंचमी और सरस्वती पूजन/ Vasant Panchami And Saraswati Puja

वसंत पंचमी के दिन, ज्ञान और बुद्धि की देवी मां सरस्वती की भी पूजा की जाती है। गुरु-शिष्य परंपरा के अनुसार, औपचारिक शिक्षा की दृष्टि से शुभ होने के कारण ही, इस दिन माता-पिताओं द्वारा अपने बच्चों को गुरुकुल भेजा जाता है। ज्ञान और रचनात्मकता की देवी होने के कारण, इस दिन रचनात्मक कार्यों से संबंधित व्यक्तियों द्वारा सरस्वती जी का पूजन किया जाता है।   जैसे सैनिकों द्वारा शस्त्रों और विजयदशमी के दिन को शुभ माना जाता है, उसी प्रकार रचनात्मक व्यक्तियों द्वारा  वसंत पंचमी को उज्ज्वल दिन माना जाता है। लेखकों, गायकों, नर्तकों, अभिनेताओं आदि जैसे सभी रचनात्मक कलाकारों द्वारा देवी सरस्वती का पूजन करके उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है।

बसंत पंचमी क्यों मनाई जाती है?/ Why is Basant Panchami Celebrated?

"बसंत" शब्द का अर्थ होता है- वसंत और "पंचमी" का अर्थ है- पाँचवां दिन। इस पर्व के श्रेष्ठ होने के कारण, माघ मास में वसंत का मौसम आने पर, पंचम तिथि को यह उत्सव मनाया जाता है। साथ ही, धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, यह दिन देवी सरस्वती के जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है। वसंत पंचमी के शुरू होते ही  प्रकृति अपने पूर्ण उज्जवल रूप में आ जाती है। वृक्ष नए पत्तों का मार्ग प्रशस्त करने के लिए अपने पुराने पत्तों को छोड़ देते हैं तथा खेतों में सूरजमुखी के फूल खिलने लगते हैं। मौसम सुहावना होता है। ऐसी सुंदरता केवल वसंत पंचमी पर ही देखी जा सकती है। इस दिन  स्कूलों और कॉलेजों में छात्रों के साथ मां सरस्वती का पूजन किया जाता है। भारत में, वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर इन छह ऋतुओं में से वसंत को श्रेष्ठ ऋतु माना जाता है क्योंकि इस दौरान प्रकृति में हर तरफ हरियाली छाई होती है। साथ ही, गेहूं और सूरजमुखी कृषि का केंद्र होते हैं। ऐसा लगता है मानो गेहूँ के खेतों ने हरी साड़ी पहनी हो, और सूरजमुखी के खेतों ने स्वयं को सोने के आभूषणों से सजाया हो।

हिंदू पुराणों के अनुसार, भगवान विष्णु के अनुरोध पर ब्रह्मदेव द्वारा ब्रह्मांड, मनुष्यों और अन्य सजीव जीवों की रचना की गई। किंतु कुछ कमियों के वजह से, ब्रह्मदेव के सृष्टि से संतुष्ट नहीं होने के कारण हर तरफ शांति छा गई। तब भगवान विष्णु की अनुमति लेने के बाद, भगवान ब्रह्मा जी द्वारा ब्रह्मांड पर जल का छिड़काव करने के कंपन से वृक्षों के बीच से एक परम सुख से परिपूर्ण एक चतुर्भुज नारी शक्ति प्रकट हुईंं जिनके एक हस्त में वाद्य यंत्र वीणा और दूसरा हस्त वर मुद्रा में था। अन्य दो हाथों में से, एक में पुस्तक और दूसरे में एक माला थी। ब्रह्मदेव द्वारा वीणा बजाने का अनुरोध करने पर, जिस पल उन्होंने वीणा बजाई‌ उसी क्षण पृथ्वी के सभी जीवों को वाणी का कौशल, जल और हवा को प्रवाह मिल गया। तब ब्रह्मा जी द्वारा उन्हें सरस्वती नाम दिया गया था। देवी सरस्वती को ज्ञान, मेधा, बुद्धिमानी और संगीत की देवी कहा जाता है। वसंत पंचमी ज्ञान हस्तांतरण का शुभ दिन माना जाता है क्योंकि यह दिन अज्ञानता को दूर करता है और बच्चों को इस दिन पहला अक्षर सीखने को दिया जाता है। शिक्षा के लिए उज्जवल होने के कारण इस दिन सभी स्कूलों में देवी सरस्वती का पूजन किया जाता है। सफेद फूल पसंद होने के कारण, वसंत पंचमी के दिन, सफेद वस्त्र धारण करके तथा सफेद पुष्प अर्पित करके देवी सरस्वती की आराधना की जाती है।  

बसंत पंचमी में पीले रंग का महत्व/ Importance of Yellow Color in Basant Panchami

बसंत पंचमी का पीला रंग सफलता, प्रगति और प्रचुरता का प्रतीक होता है। वसंत पंचमी के दौरान, फूल अपनी पूर्ण सुंदरता के साथ खिलते हैं; सूरजमुखी और गेहूं की फसल सोने की तरह चमकती है। अतः, वसंत पंचमी को सभी ऋतुओं में अत्यधिक पसंद किया जाता है। 

विभिन्न स्थानों पर वसंत पंचमी का स्वरूप/ Forms of Vasant Panchami in Various Places

इस पंचमी के दिन, भक्तों द्वारा गंगा जी और अन्य धार्मिक नदियों में स्नान करके देवी सरस्वती जी की  आराधना की जाती है। इस पर्व के दौरान, हरिद्वार (उत्तराखंड) और प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) में, भक्तों द्वारा गंगा जी और संगम के तट पर पूजा-अर्चना की जाती है। इसके अलावा, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड जैसे स्थानों से लोग हिमाचल प्रदेश जाकर सल्फर के गर्म पानी में भी डुबकी लगाते हैं। भारत के उत्तरी क्षेत्र में, इस दिन लोगों द्वारा पीले वस्त्र धारण करके पीले रंग के ही व्यंजन खाए जाते हैं। पंजाब के ग्रामीण इलाकों में, सूरजमुखी के पीले खेतों में, पीले ही रंग की पतंगे उड़ाई जाती हैं। पश्चिम बंगाल के क्षेत्र में, जहां एक और देवी सरस्वती की पूजा ढाक की ध्वनि से की जाती है, वहीं दूसरी ओर बिलासपुर (छत्तीसगढ़) में, गुरु-का-लाहौर जैसे सिख स्थानों पर मेलों का आयोजन किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि गुरु गोबिंद सिंह का जन्म वसंत पंचमी के दिन हुआ था।

वसंत पंचमी की कथा/ The Story of Vasant Panchami

भगवान विष्णु के आदेशानुसार, ब्रह्मदेव द्वारा ब्रह्मांड, मनुष्यों और अन्य सजीव जीवों की रचना की गई। किंतु कुछ कमियों के कारण ब्रह्मदेव के सृष्टि से संतुष्ट नहीं होने के कारण हर तरफ शांति छा गई। तब भगवान विष्णु की अनुमति लेने के बाद, भगवान ब्रह्मा जी के द्वारा ब्रह्मांड पर जल का छिड़काव करने के कंपन से वृक्षों के बीच से एक परम सुख से परिपूर्ण एक चतुर्भुज नारी शक्ति प्रकट हुईंं जिनके एक हस्त में वाद्य यंत्र वीणा और दूसरा हस्त वर मुद्रा में था। अन्य दो हाथों में से, एक में पुस्तक और दूसरे में एक माला थी। ब्रह्मदेव द्वारा वीणा बजाने का अनुरोध करने पर, जिस पल उन्होंने वीणा बजाई‌ उसी क्षण पृथ्वी के सभी जीवों को वाणी का कौशल, जल और हवा को प्रवाह मिल गया। तब ब्रह्मा जी द्वारा उन्हें सरस्वती नाम दिया गया था। देवी सरस्वती को ज्ञान, मेधा, बुद्धिमानी और संगीत की देवी कहा जाता है। वसंत पंचमी ज्ञान हस्तांतरण का शुभ दिन माना जाता है क्योंकि यह दिन अज्ञानता को दूर करता है और बच्चों को इस दिन पहला अक्षर सीखने को दिया जाता है। शिक्षा के लिए  उज्जवल होने के कारण इस दिन सभी स्कूलों में देवी सरस्वती का पूजन किया जाता है। सफेद फूल पसंद होने के कारण वसंत पंचमी के दिन, सफेद वस्त्र धारण करके तथा सफेद पुष्प अर्पित करके देवी सरस्वती की आराधना की जाती है।  

वसंत पंचमी पर मां सरस्वती का पूजन कैसे करें?/ How to Worship Goddess Saraswati on Vasant Panchami

1. इस दिन पीले वस्त्र धारण करके, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके पूजा शुरू करनी चाहिए।
2. पीले कपड़े पर मां सरस्वती की प्रतिमा स्थापित करके रोली, केसर, हल्दी, चावल, पीले फूल, पीली मिठाई, दही, हलवा आदि प्रसाद के रूप में अर्पित करना चाहिए।
3. देवी सरस्वती के दाहिने हाथ में पीले या सफेद पुष्प रखकर सफेद चंदन अर्पण करना चाहिए।
4. मां सरस्वती को केसर के दूध की खीर का प्रसाद अर्पण करना श्रेष्ठ होता है। 
5. हल्दी की माला से "ॐ ऎं सरस्वत्यै ऎं नमः" मंत्र का जाप करना पूजन का श्रेष्ठ तरीका होता है। 
6. पूजन के दौरान, काले और नीले रंग के वस्त्र नहीं पहनने चाहिए। शिक्षा में अवरोध आने पर मां सरस्वती को आहुति देनी चाहिए। 

सरस्वती पूजन मंत्र -- १/ Saraswati Puja Mantra Number-1: 

या कुंदेंदु तुषार हार धवला या शुभ्रवस्त्रावृता। 
या वीणा वरदंडमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता। 
सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेषजाड्यापहा।1। 
शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्वयापिनीं। 
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम् ।। 
हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्। 
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवती बुद्धिप्रदां शारदाम् ।।

सरस्वती पूजन मंत्र --२/ Basant panchami Mantra Number-2:

सरस्वतीनमस्तुभ्यंवरदेकामरूपिणी, विद्यारम्भंकरिष्यामिसिद्धिर्भवतुमेंसदा।


प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, देवी रति और भगवान कामदेव की भी पूजा की जाती है, और इस संस्कार को षोडशोपचार पूजन कहा जाता है।

षोडशोपचार पूजा मंत्र:/ Shodashopachara Puja Mantra: 

ॐविष्णुःविष्णुःविष्णुः, अद्यब्रह्मणोवयसःपरार्धेश्रीश्वेतवाराहकल्पेजम्बूद्वीपेभारतवर्षे,
अमुकनामसंवत्सरेमाघशुक्लपञ्चम्याम्अमुकवासरेअमुकगोत्रःअमुकनामाहंसकलपाप - क्षयपूर्वक - श्रुति -
स्मृत्युक्ताखिल - पुण्यफलोपलब्धयेसौभाग्य - सुस्वास्थ्यलाभायअविहित - काम - रति - प्रवृत्तिरोधायमम
पत्यौ/पत्न्यांआजीवन - नवनवानुरागायरति - कामदम्पतीषोडशोपचारैःपूजयिष्ये।


वसंत पंचमी के दिन दंपतियों द्वारा षोडशोपचार मंत्र विधि से देवी रति और भगवान कामदेव का पूजन करने पर वे संतुष्ट और आनंदमय दांपत्य जीवन व्यतीत कर सकते हैं।  

देवी रति और भगवान कामदेव के मंत्र/ Devi Rati and Lord Kama’s Chants

ॐवारणेमदनंबाण - पाशांकुशशरासनान्।
धारयन्तंजपारक्तंध्यायेद्रक्त - विभूषणम्।।
सव्येनपतिमाश्लिष्यवामेनोत्पल - धारिणीम्।
पाणिनारमणांकस्थांरतिंसम्यग्विचिन्तयेत्।।

वसंत पंचमी विशेष क्यों है?/ Why is Vasant Panchami Special?

कई शुभ मुहूर्तों में, वसंत पंचमी का "अभुज समय" विशेष होता है।  
- इस दौरान विवाह और अन्य समारोह किए जा सकते हैं।
-इस ऋतु के दौरान, ज्ञान और विज्ञान के मेल को सर्वोत्तम रूप से प्राप्त किया जा सकता है।
- इस समय के दौरान, संगीत, रचनात्मकता और आध्यात्मिकता के क्षेत्र में आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है।
- इस समय के दौरान पढ़ाई के क्षेत्र में बाधाएं आने पर मां सरस्वती का पूजन करना चाहिए।

वसंत पंचमी के दिन नए कार्यों में सफलता/ New Work will attain Success on Vasant Panchami.

वसंत पंचमी के दौरान नए कार्यों को शुरू किया जा सकता है‌। वसंत पंचमी के दौरान गृह प्रवेश संस्कार किया जा सकता है। बसंत पंचमी के दिन सर्वोत्तम परिणामों के लिए नए व्यवसायों (इसके संबंधित अधिक जानकारी के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर सकते हैं) के सौदे किए जा सकते हैं। इसी तरह, इस समय के दौरान सभी प्रकार के विलंबित कार्य करके इच्छित परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।

बौद्धिक रूप से आशीर्वाद कैसे प्राप्त करें?/ How to get Blessed Intellectually? 

- इस दिन सरस्वती पूजन का अत्यधिक महत्व होता है।
- इस दिन देवी सरस्वती के सामने नील सरस्वती मंत्र का जाप करना चाहिए.
- इस दिन अज्ञान का नाश होता है।
- इस दिन ज्ञान और बुद्धि को आशीर्वाद के रूप में प्राप्त किया जा सकता है।

वसंत बसंती पर ग्रहों की स्थिति को मजबूत करने के दस तरीके/ 10 Ways to Strengthen the positioning of Planets on Vasant Basanti 

1. बुद्ध/Mercury के कमजोर होने पर बुद्धि क्षीण होने लगती है।
2. इस परिस्थिति से बाहर निकलने के लिए मां सरस्वती की आराधना की जा सकती है। 
3. मां सरस्वती को हरे रंग के फल अर्पित करने चाहिए।
4. बृहस्पति/Jupiter कमजोर होने पर ज्ञान प्राप्त करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
5. ऐसी स्थिति से बचने के लिए वसंत पंचमी/Basant Panchami के दिन पीले वस्त्र धारण करने चाहिए।
6. वसंत पंचमी के दिन पूजन करते समय पीले फलों और फूलों का प्रयोग करना चाहिए।
7. शुक्र के कमजोर होने पर बेचैनी बनी रह सकती है। 
8. करियर का चुनाव करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है (इसके बारे में अधिक जानकारी के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक किया जा सकता है)।
9. ऐसी स्थिति में मां सरस्वती का पूजन करना चाहिए। 
10. मां सरस्वती के पूजन के लिए सफेद फूलों का प्रयोग करना चाहिए।

नए व्यवसाय की योजना बनाने पर हमारे ज्योतिष/ astrology के विचारों की जानकारी द्वारा करियर का चुनाव किया जा सकता है। 

अन्य सभी प्रमुख भारतीय त्योहारों के लिए 'भारतीय त्योहारों में ज्योतिष की प्रासंगिकता'/Relevance of Astrology जैसे हमारे लेखों द्वारा जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

महा शिवरात्रि
01 Mar, 2022

शिव का अर्थ है कल्याणकारी, शिव का अर्थ है बाबा भोलेनाथ, शिव का अर्थ है शिवशंकर, शिवशंभू, शिवजी, नीलकंठ, रुद्र, आदि।

भगवान शिव सभी हिंदू देवताओं में सबसे अधिक पूजनीय भगवान हैं। उन्हें राक्षसों से भी प्यार है। उनके सादगी के कारण उन्हें प्यार किया जाता है। उनकी पूजा की रस्में भी बेहद सरल हैं। अगर भगवान शिव के शुद्ध रूप का आह्वान किया जाता है, तब वह प्रसन्न होते हैं। हर जगह महाशिवरात्रि/Mahashivratri मनाई जाती है। यह शिव और शक्ति के मिलन के लिए जाना जाता है। धार्मिक रूप से महाशिवरात्रि प्रकृति और मनुष्य के मिलन का प्रतीक है। शिव के अनुयायी इस दिन उपवास रखते हैं और भगवान का आशीर्वाद मांगते हैं। मंदिर में शिव को दूध और जल चढ़ाते हैं। 

शिव पुराण के अनुसार फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को महाशिवरात्रि मनाई जाती है। यह हिंदुओं का सबसे बड़ा त्यौहार है। सोमवार को भगवान शिव का दिन माना जाता है। इसी तरह मासिक शिवरात्रि भी मनाई जाती है। महाशिवरात्रि साल में दो बार मनाई जाती है, एक फाल्गुन और एक श्रावण के महीने में। लोग इस दिन उपवास रखते हैं और सभी अनुष्ठानों का पालन करके भगवान शिव का आह्वान करते हैं, जो बहुत ही सरल है। लोग फल चढ़ाते हैं और पूरी रात जागते हैं। गंगा जल से भगवान शिव को स्नान कराया जाता है।

नियमित दिनों के लिए बजरंगी धाम में हम हमेशा चयनित अनुयायियों के लिए एक छोटी पूजा अनुष्ठान का आयोजन करते हैं और महाशिवरात्रि उत्सव मनाते हैं। 

क्यों मनाई जाती है महाशिवरात्रि? | Why is Mahashivratri Celebrated?

शिवरात्रि अमावस्या के पहले दिन, महीने के चौदहवें दिन मनाई जाती है। सभी शिवरात्रि में फरवरी-मार्च के दौरान आने वाली शिवरात्रि का विशेष महत्व है। इस रात घरों के उत्तरी कोने को व्यवस्थित किया जाता है ताकि प्रकृति की ऊर्जा उचित रूप से प्रवेश कर सके। यह दिन लोगों को धार्मिक और आध्यात्मिक चरम पर पहुंचने में मदद करता है। यह रस्म पूरी रात चलती है पूरी रात परंपराओं का पालन किया जाता है। 

महाशिवरात्रि का महत्व/ Importance of Mahashivratri

अध्यात्म और धर्म को मानने वाले लोगों के लिए यह दिन अहमियत रखता है। पारिवारिक जीवन से जुड़ी ख्वाहिशों के जाल में फंसा हुआ मन हो या फिर लोग सांसारिक मामलों में फंसे हुए मनुष्य, वह सभी लोग महाशिवरात्रि को शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने का दिन मानते हैं। आध्यात्मिक लोगों के लिए, शिवरात्रि वह दिन है जब भगवान शिव कैलाश गए और चट्टान बन गए। यौगिक परंपरा के अनुसार, भगवान शिव को भगवान नहीं माना जाता है। उन्हें यौगिक गुरु माना जाता है जो शिष्यों को ध्यान और योग की शिक्षा देते हैं। योग की एक श्रृंखला के बाद, भगवान शिव चट्टान की तरह गतिहीन हो गए। इस दिन को महाशिवरात्रि माना जाता है। पत्थर का रूप धारण करने के बाद उसके भीतर की सारी हलचल थम गई। इसलिए कई धर्मगुरु महाशिवरात्रि की रात को गतिहीनता की रात मानते हैं।

भगवान शिव ने पहली बार लिया रूप/ Lord Shiva took a form for the first time

पुराने मिथकों के अनुसार, भगवान शिव ने पहली बार महाशिवरात्रि पर अपने दर्शन दिए थे। उन्होंने ज्योतिर्लिंगों में से एक में अग्नि में शिवलिंग के रूप में अपना दर्शन दिया, शिवलिंग जिसका कोई अंत नहीं था और कोई आरम्भ नहीं था । ऐसा माना जाता है कि भगवान ब्रह्मा ने कबूतर का रूप धारण किया और शिवलिंग के सबसे ऊपरी हिस्से को देखने की कोशिश की लेकिन सब व्यर्थ हो गया। वह लिंग के शीर्ष भाग तक नहीं पहुंच सके| यहां तक कि भगवान विष्णु ने भी शिवलिंग को वराह के रूप में जानने की कोशिश की लेकिन वह भी व्यर्थ रहा।

शिव और शक्ति का मिलन/ Union of Shiva and Shakti

महाशिवरात्रि पर भगवान शिव के भक्त पूरी रात जागते हैं। वह शिव और शक्ति के विवाह का जश्न मनाते हैं। भगवान शिव ने अपना वैराग्य जीवन छोड़ दिया और गृहस्थ जीवन को अपनाया और गृहस्थ बन गए। ऐसा माना जाता है कि महाशिवरात्रि के एक पखवाड़े बाद होली मनाने का यही कारण है।

64 जगहों पर दिखे शिवलिंग/ Shivalinga was seen at 64 places

एक कथा बताती है कि महाशिवरात्रि के दिन 64 स्थानों पर शिवलिंग का उदय हुआ था। उनमें से हम केवल 12 स्थलों के नाम जानते हैं, और हम उन्हें ज्योतिर्लिंग कहते हैं। अग्नि उन्मुख अजेय लिंग को देखने के लिए लोग उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में दीये जलाते हैं। भगवान शिव की मूर्तियों में से एक को लिंगोभव कहा जाता है, जिसका अर्थ लिंग से निकला हुआ, एक लिंग जिसका कोई अंत नहीं कोई शुरुआत नहीं है।

महाशिवरात्रि के व्रत का धार्मिक नियम/ The Religious Rule of the Fasting on Mahashivratri 

महाशिवरात्रि से जुड़े कई नियम हैं। 

  • महाशिवरात्रि पहली चतुर्दशी को मनाई जाती है, जिसे निशीथ व्यापिनी के नाम से जाना जाता है। रात में आठवां मुहूर्त एक महत्वपूर्ण चरण है। दूसरे शब्दों में, जब चतुर्दशी शुरू होती है, और आठवां मुहूर्त चतुर्थी के साथ मिलता है, तब ही महाशिवरात्रि मनाई जाती है।

  • निशीथ काल और चतुर्थी के पहले दिन, दूसरे दिन महाशिवरात्रि मनाई जाती है। चतुर्दशी पिछले दिन निशितो के पहले भाग में द्वितीय निशित के संपर्क में होनी चाहिए|

  • दो स्थानों को छोड़कर अन्य सभी क्षेत्रों में अगले दिन उपवास रखा जाता है।

महाशिवरात्रि के लिए पूजा-विधि/ Puja-Vidhi For Mahashivratri

  • पानी/दूध को मिट्टी के एक छोटे पात्र में रखा जाता है। बेलपत्र, आक धतूरे और चावल को शिवलिंग के ऊपर चढ़ाने के लिए उस मिटटी के पात्र के ऊपर रखा जाता है। यदि आसपास कोई मंदिर नहीं है, तब कोई शिव की मिट्टी की मूर्ति बना सकता है और पूजा कर सकता है।

  • इस दिन शिव पुराण का पाठ करना चाहिए और महामृत्युंजय जाप के साथ शिव पंचाक्षर मंत्र ओम नमः शिवाय का जाप करना चाहिए।रात में जागना भी एक प्रकार का महाशिवरात्रि पर अनुष्ठान है |

  • शास्त्रों के अनुसार, इस दिन को निशित काल में देखना सबसे अच्छा है। हालांकि पुरोहित अपनी सुविधा के अनुसार किसी भी प्रहर पर पूजा कर सकते हैं।

शिवरात्रि-ज्योतिष परिप्रेक्ष्य/ Shivratri- Jyotish Perspective 

चतुर्थी तिथि भगवान शिव स्वयं हैं। कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को महाशिवरात्रि मनाई जाती है। यह तिथि शुभ मानी जाती है। गणित ज्योतिष के अनुसार सूर्य उत्तरायण होता है और महाशिवरात्रि को ऋतु परिवर्तन भी होता है। महाशिवरात्रि की चतुर्थी में चंद्रमा कमजोर होता है। भगवान शिव चंद्रमा को अपने माथे में रखते हैं, इसलिए चंद्रमा नियंत्रण में है। भगवान शिव की पूजा करने से मनोकामनाएं पूरी होती है, इच्छा शक्ति मजबूत होती है और साहस बढ़ता है।

महाशिवरात्रि से जुड़ी पुरानी मान्यता/ Old Belief related to Mahashivaratri

शिवरात्रि से जुड़ी कई कथाएं हैं। देवी पार्वती ने भगवान शिव की तपस्या की। इसके परिणामस्वरूप चतुर्दशी के दिन फाल्गुन महीने में भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह हुआ। इसलिए महाशिवरात्रि को पवित्र माना जाता है।

एक बार, चित्रभानु नाम का एक शिकारी था। वह जानवरों को मारकर अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। उसने एक साहूकार से पैसे ले लिए थे, लेकिन नाराज साहूकार ने उसे एक शिव मठ में बंदी बना लिया क्योंकि वह समय पर कर्ज नहीं चुका सका, उस दिन शिवरात्रि थी। कैद होने की प्रक्रिया में शिकारी मठ में शिव की पवित्र बातें सुनता रहा, वहीं उसने शिवरात्रि की कथा भी सुनी। शाम को, साहूकार ने उसे बुलाया और ऋण चुकाने के लिए कहा, शिकारी ने अगले दिन पूरा ऋण वापस करने का वादा किया। साहूकार ने उसकी बात मानी और उसे छोड़ दिया। शिकारी जंगल में शिकार करने निकला। लेकिन दिन भर कैद में रहने के कारण वह भूख-प्यास से परेशान था। सूर्यास्त के समय, वह एक जलाशय के पास आया और वहाँ एक कण्ठ के किनारे एक पेड़ पर चढ़ गया, क्योंकि उसे उम्मीद थी कि कोई जानवर यहाँ जरूर आएगा और वह उसे मार सकेगा|

वह वृक्ष बेलपत्र का था और उसी वृक्ष के नीचे एक शिवलिंग था, जो एक सूखे बेलपत्र के पत्तों से ढका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला। भूख-प्यास से तंग आकर वह उसी मचान पर बैठ गया। मचान बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं वह संयोग से शिवलिंग पर गिर गईं। उन दिनों शिकारी भी दिन भर उपवास रखते थे और शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाते थे। रात के एक बजे एक गर्भवती मृगी तालाब पर पानी पीने आई। जैसे ही शिकारी ने हमला किया, नीचे बने शिवलिंग पर कुछ पत्ते और पानी की कुछ बूंदें गिर गई, और अनजाने में शिकारी के पहले प्रहर की पूजा की गई। मृगी ने कहा, मैं गर्भवती हूं और जल्द ही मुझे एक बच्चा भी होगा। दो जिंदगियों को मत मारो। यह नैतिक रूप से सही नहीं है।

मैं एक बच्चे को जन्म दूंगी और तब अपने आप को तुम्हारे सामने पेश करुँगी। शिकारी ने उसे नहीं मारा, और वह मृग झाड़ियों के बीच भाग गया। कुछ देर बाद झाड़ियों में से एक और मृग निकली। शिकारी खुद को एक और हमले के लिए तैयार कर रहा था। शिकारी बस हमले की तैयारी में ही था। हिरण ने कहा कि मैं बहुत दिनों बाद वापस आया हूं। मैं अपने परिवार की तलाश में हूं। पहले मैं उससे मिलूंगा और बाद में खुद को तुम्हें पेश करूंगा। शिकारी परेशान था क्योंकि उसने दो शिकार को नहीं मारा था। रात का आखिरी घंटा बीत गया। फिर एक और हिरण अपने बच्चों के साथ वहां से निकला। शिकारी मारने ही वाला था कि हिरण ने कहा, "मैं इन बच्चों को उनके पिता को लौटा दूंगा। इस बार मुझे मत मारो। तब शिकारी ने कहा की मैंने पहले ही २ शिकार छोड़ दिए हैं मैं ऐसा मूर्ख नहीं हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से पीड़ित होंगे। जवाब में, मृगी ने फिर कहा, जैसे आप अपने बच्चों के लिए चिंतित हैं, मुझे भी उनकी चिंता है। मैं उन्हें उनके पिता के पास छोड़ दूंगी और आत्मसमर्पण कर दूंगी मृग की धीमी आवाज सुनकर शिकारी को उस पर दया आई। उसने उस मृगी को भी भाग जाने दिया। शिकार के अभाव में बेल के पेड़ पर बैठा शिकारी बेल-पत्र तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था।

उसके तीसरे प्रहर की पूजा भी स्वत: ही हो गई। जब भोर हुई, तब एक और हिरण आया, और शिकारी ने उसे मारने का मन बना लिया। हिरण ने कहा, "यदि आपने मुझसे पहले आने वाले तीन हिरणों और छोटे बच्चों को मार डाला है, तब मुझे भी मारने में देरी न करें क्योंकि मैं उनकी मृत्यु के कारण दुखी नहीं होना चाहता हूं। मैं उन हिरणों का पति हूं। और यदि उनको जीवनदान दिया है तब कृपया मुझे भी जीवन दान दे दो| हिरण की बात सुनकर, शिकारी ने हिरण को पूरी कहानी सुनाई। तब हिरण ने कहा, मेरी तीन पत्नियां ने आपसे जिस तरह से वादा किया है, वह अपने वादे को नहीं निभा पाएंगी परन्तु जैसे आपने उन्हें विश्वासपात्र के रूप में छोड़ दिया है, वैसे मुझे भी जाने दो। मैं उन सब से मिलकर जल्द ही आपके पास आऊंगा। उपवास, रात्रि जागरण और शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से शिकारी का बेचैन हृदय शुद्ध हो गया। भगवद शक्ति उसमें थी। उसका हाथ धनुष और बाण से चूक गया, और उसने मृग को जाने दिया।

थोड़ी देर बाद, मृग शिकारी के सामने आया ताकि वह उसका शिकार कर सके। जंगली जानवरों की ऐसी दयालु भावना को देखकर शिकारी को बहुत खेद हुआ। उनकी आँखों में आँसुओं की झड़ी लग गयी। उस मृग परिवार को न मारकर समय ने शिकारी के कठोर हृदय को जीवित हिंसा से हटाकर सदा के लिए कोमल और दयालु बना दिया। 

देवलोक के सभी देव भी इस आयोजन को देख रहे थे। ऐसा करने के बाद, भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने तुरंत उन्हें अपना दिव्य रूप दिखाया और उन्हें सुख और समृद्धि का वरदान देकर गुहा का नाम दिया। यही वह रूप था जिससे भगवान श्री राम ने उनसे मित्रता की थी। महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की आराधना का ऐसा ही उत्कृष्ट परिणाम मिलता है,देवाधिदेव महादेव की पूजा सर्व पुण्य होगी।

इस जाप के द्वारा शिव जी के दर्शन कर सकते हैं |

देवताओं के देव महादेव की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए सबसे प्रसिद्ध मंत्र महामृत्युंजय मंत्र है। असमय मृत्यु और प्रतिशोध के भय को दूर करने वाला यही मंत्र है। महाशिवरात्रि का दिन भगवान शिव के लिए एक आवश्यक दिन है, क्योंकि इस दिन शिव और शक्ति का मिलन होता है। शिवपुराण के रुद्र प्रशिता में कहा गया है कि महाशिवरात्रि के दिन महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना सहायक हो सकता है। शिव पुराण के अनुसार महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से भक्त अपनी मनोकामना पूरी कर सकता है। इस वर्ष महाशिव योग का आयोजन किया गया है जिसमें आप इस मंत्र का जाप करके अपनी मनोकामना पूर्ति कर सकते हैं।

  1. शिव पुराण के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन महामृत्युंजय मंत्र का लाखों बार जाप करने से शारीरिक शुद्धि होती है और रोग दूर होते हैं। नकारात्मक ऊर्जा बाहर निकलती है।

  2. महामृत्युंजय मंत्र का दो लाख बार जाप करने से आप अपने पूर्व जन्म की बातों को याद करने की सिद्धि प्राप्त कर सकते हैं। पुराणों के अनुसार इस मंत्र में बहुत शक्ति है, और आप पिछले जन्म के बारे में भी जान सकते हैं।

  3. यदि भक्त महामृत्युंजय मंत्र का तीन लाख बार जाप कर लेता है तो उसे मनचाहा फल मिलता है| ऐसा होने पर उसका सांसारिक जीवन बहुत समृद्ध हो जाता है।

  4. शिव पुराण के अनुसार यदि महामृत्युंजय जाप चार लाख बार किया जाए तो सपने में भगवान शिव के दर्शन होते हैं।

  5.  भगवान शिव अपने भक्तों पर बहुत सहज हैं। वह शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते है, इसलिए उसे भोलेनाथ कहा जाता है। महाशिवरात्रि के दिन 5 लाख बार जाप पूर्ण करने पर भगवान शिव सीधे दर्शन देते हैं।

  6. महाशिवरात्रि के दिन महामृत्युंजय मंत्र का 10 लाख बार जाप करने से पूर्ण फल मिलता है। जो मोक्ष की तलाश में है वह मोक्ष प्राप्त करता है।

भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए इन्हें करें अपनी पूजा में शामिल/ Include these in your Puja to make Lord Shiva Happy

भोलेनाथ महादेव को संपूर्ण ब्रह्मांड के रचयिता होने की उपाधि प्राप्त है। शिवपुराण के रुद्र प्रशिता में कहा गया है कि महाशिवरात्रि के दिन इन चीजों को पूजा में शामिल करने से शिवजी प्रसन्न होते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शिवजी को बेलपत्र बहुत प्रिय है। इस पत्ते का प्रयोग सबसे पहले भगवान शिव की पूजा में किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि बेलपत्र के तीन पत्ते भगवान शिव के तीन नेत्रों के प्रतीक हैं

  1. यदि आप शिवजी की पूजा में तिल और जौ का प्रयोग करते हैं तब आपके सभी पापों का नाश हो जाता है। पितरों का आशीर्वाद भी मिलता है और घर से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।

  2. भोलेनाथ की पूजा में आप भस्म का प्रयोग कर सकते हैं। भस्म भगवान शिव को बहुत प्रिय है। इसे शिवरात्रि के दिन भगवान शिव की पूजा में अवश्य रखना चाहिए। उपवास रखने वाले भक्त शिवलिंग पर भस्म चढ़ाते हैं, तब उन्हें दैवीय शक्तियां प्राप्त होती हैं|

  3. महाशिवरात्रि के दिन आप भगवान शिव की पूजा में रुद्राक्ष का प्रयोग कर सकते हैं। शिव और रुद्राक्ष एक ही सिक्के के अंग हैं। रुद्राक्ष भगवान शिव के आंसुओं से बनता है। पूजा के बाद रुद्राक्ष को उस स्थान पर रखने से घर की शुद्धि होती है।

  4. धतूरे का प्रयोग आप भगवान शिव की पूजा में भी कर सकते हैं। ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव हमेशा धतूरे का प्रयोग भोजन के रूप में करते हैं। समुद्र मंथन के दौरान विष पीकर भगवान शिव काफी उत्तेजित हो गए थे। तब धतूरा ने उन्हें राहत दी थी।

  5. महाशिवरात्रि के दिन भोलेनाथ की पूजा में चांदी या तांबे के त्रिशूल और सांप का प्रयोग कर सकते हैं| भगवान शिव के गले में हमेशा सांप रहता है। घर में त्रिशूल और पूजा का नाग स्थापित करें। इससे घर को कोई नुकसान नहीं होगा।

शिवजी की पूजा करते समय किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए?/ What should be taken special care of during the worship of Shivji

शिवपुराण के रुद्र प्रशिता में बताया गया है कि इस दिन शिवजी की पूजा के दौरान कई बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। इससे न केवल शिव की पूजा पूरी होती है बल्कि उन्हें आशीर्वाद भी मिलता है। शिवरात्रि के पर्व पर शिव भक्त पूरी श्रद्धा के साथ व्रत रखते हैं। इस दिन शिव मंदिरों में भक्तों की काफी भीड़ देखी जाती है।

  • महाशिवरात्रि के दिन गन्ने के रस से शिवलिंग की पूजा करने से लक्ष्मी की सिद्धि प्राप्त होती है। साथ ही आपको हर तरह की शत्रुता से भी मुक्ति मिलती है। शिवलिंग पर गन्ने का रस चढ़ाते समय ॐ नमः शिवाय का जाप करना चाहिए।

  • किसी तीर्थ के जल से शिवलिंग पर अभिषेक करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। संबंधित रोग और दोष भी समाप्त होते हैं। आप जीवन में एक जादुई बदलाव देख सकते हैं।

  • महाशिवरात्रि के दिन यदि भगवान शिव के पति-पत्नी स्वरूप दोनों को दूध अर्पित किया जाए तो उन्हें संतान की प्राप्ति होती है (इसके बारे में अधिक पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक को देखें)।

  • ब्राह्मणों के साथ-साथ गरीबों और जरूरतमंदों को भोजन कराएं। ऐसा शिव पुराण में कहा गया है।

  • भगवान शिव की पूजा करने से न केवल धन की प्राप्ति होती है बल्कि सभी रोग दूर होते हैं। यह उपचार के लिए अच्छा माना जाता है।

  • शिवपुराण में कहा गया है कि घी की धारा से भगवान शिव की आराधना करने से वंश का विस्तार होता है और दूध में मिश्री मिलाकर अभिषेक करने से जड़ बुद्धि भी श्रेष्ठ बुद्धि में बदल जाती है।

  • महाशिवरात्रि पर भगवान शिव को साबुत अक्षत चढ़ाने से आप कर्ज से मुक्ति पा सकते हैं (इसके बारे में अधिक पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक को देखें)। 

  • यदि आप पके हुए चावल से शिवलिंग को सजाते हैं और पूजा करते हैं, तब आपकी कुंडली का मंगल दोष भी धीमा हो जाता है।

महाशिवरात्रि पर रुद्राभिषेक से करें भगवान शिव की पूजा/ Worship Lord Shiva Through Rudrabhishek on Mahashivratri 

महाशिवरात्रि पर, कई लोग भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए रुद्राभिषेक करते हैं। रुद्राभिषेक का अर्थ है भगवान रुद्र का आह्वान, यानी शिवलिंग पर रुद्र के मंत्रों का आह्वान। रुद्र को शास्त्रों में भी भगवान शिव का ही एक रूप माना गया है। ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव का यह रूप लोगों के संकट को कम करता है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा ने रुद्राभिषेक किया था। ऐसा माना जाता है कि भगवान ब्रह्मा ने अपना रूप भगवान विष्णु की नाभि से प्राप्त किया था। जब भगवान विष्णु ने अपनी उत्पत्ति का रहस्य भगवान ब्रह्मा को बताया,तब वह इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे, और उनके बीच विवाद हुआ, और दोनों लड़ने लगे। इस युद्ध के रूप में क्रोधित भगवान रुद्र प्रकट हुए। इस लिंग का न आदि था और न ही अंत। भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु ने इस लिंग के आधार और पीठ तक पहुंचने की कोशिश की लेकिन व्यर्थ। उसने अपनी हार स्वीकार कर ली और लिंग की पूजा की। इससे भगवान शिव प्रसन्न हुए। कहा जाता है कि यहीं से रुद्राभिषेक की शुरुआत हुई थी। शिव की पूजा कई तरह से की जाती है। इसमें रुद्राभिषेक का बहुत महत्व है। इससे महादेव तुरंत प्रसन्न होते हैं।

रुद्राभिषेक का अर्थ है वैदिक मंत्रों के माध्यम से भगवान शिव का आह्वान। ऐसा माना जाता है कि रुद्राभिषेक करने से शिव भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और कष्टों से मुक्ति मिलती है। यह रोगों को भी नष्ट करता है और स्वस्थ होने की ओर ले जाता है। सावन मास, शिवरात्रि, महाशिवरात्रि और प्रदोष के दिन रुद्राभिषेक करना अधिक सहायक होता है। एक बार महादेव नंदी पर सवार होकर गाड़ी चला रहे थे। देवी पार्वती ने मृत्युलोक में महादेव को देखकर भोलेनाथ से पूछा कि मृत्युलोक में उनकी पूजा क्यों की जाती है। महादेव ने कहा कि कोई भक्त यदि शुक्ल युजुर्वेद रुद्रदाष्ट्यायी से पूजा करता है। तब मैं प्रसन्न होता हूँ और शीघ्र ही उसे मनोवांछित फल प्रदान करता हूँ । भक्त जिस मनोकामना के लिए रुद्राभिषेक करता है वह पूरी होती है।

पवित्र जल स्नान/ Holy Water bath

सभी दुखों से छुटकारा पाने के लिए महादेव का जलाभिषेक करें। वहीं जलाभिषेक करते हुए भोलेनाथ के बाल रूप का चित्र लगाएं। तांबे के बर्तन में कुमकुम का पानी भरकर रख दें। इंद्राय नमः का जाप करते हुए मौली का जाप करें। एक साथ 'ॐ  नमः: शिवाय' का जाप करें। थोड़े से जल और फूल से रुद्राभिषेक करें। इस दौरान 'ॐ तन त्रिलोकीनाथये स्वाः' मंत्र का जाप करें।

पवित्र दूध स्नान/ Holy Milk Bath 

भोलेनाथ की कृपा पाने के लिए भगवान शिव को दूध से स्नान कराएं। पवित्र अनुष्ठान करते समय महादेव के प्रकाशमान स्वरूप को ध्यान में रखना चाहिए। तांबे के कलश पर कमल और कुमकुम रखें और 'ॐ  श्री कामधेनेवे नमः' का जाप करते हुए मौली बांधें। ॐ नमः शिवाय का जाप करते हुए पुष्प अर्पित करें। थोड़ी मात्रा में दूध के साथ रुद्राभिषेक करें। इस दौरान 'ॐ  सकल लोकै गुरुर्वै नमः' मंत्र का जाप करें। शिवलिंग को स्वच्छ जल से स्नान कराएं।

पवित्र फल- रस स्नान/ Holy Fruit- Juice Bath

धन लाभ और कर्ज से मुक्ति के लिए शिवलिंग को फूलों के रस से स्नान कराना चाहिए। फलों के रस से सफाई करते समय महादेव की नीली गर्दन का ध्यान करना चाहिए। कुबेराय नमः मंत्र का जाप करके मौली बांधनी चाहिए: तांबे के कमल पर कुमकुम लगाएं। ॐ नमः शिवाय का जाप करते हुए पुष्प अर्पित करें। थोड़ी मात्रा में फलों के रस के साथ रुद्राभिषेक करें। इस दौरान मंत्र का जाप करें। शिवलिंग को स्वच्छ जल से स्नान कराएं और इस मंत्र का जाप करते रहें। - 'ॐ ह्रुं नीलकंठया स्वाहा।

सरसों के तेल से अभिषेक/ Abhishek with mustard oil

होलिका दहन
17 Mar, 2022

होली के त्योहार से एक दिन पहले होलिका दहन मनाया जाता है। यह हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। ना केवल भारत में बल्कि यह त्योहार नेपाल के विभिन्न क्षेत्रों में भी मनाया जाता है। यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत को प्रदर्शित करता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार यह पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा को पड़ता है।

इस दिन लोग होलिका बनाने और जलाने के लिए लकड़ी और गाय के गोबर का उपयोग करते हैं, और फिर भगवान से मनोकामना पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं। यह दिन हमें ईश्वर में अपना विश्वास स्थापित करता है और साथ ही यह बताता है कि प्रह्लाद की तरह आप जीवन में किसी भी बाधा से पार पा सकते हैं।

होलिका दहन का महत्व/ Importance Of Holika Dahan

होलिका दहन हमारे जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और हमें सच्चाई और ईमानदारी की शक्ति का एहसास कराता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि हमें कभी भी अपनी शक्ति और हैसियत पर घमंड नहीं करना चाहिए। कभी भी किसी को प्रताड़ित न करें क्योंकि ऐसा करने वालों को बुरे परिणाम भुगतने पड़ते हैं।

इसके साथ ही होलिका दहन की प्राचीन कथाएं हमारे जीवन में अग्नि और प्रकाश के महत्व का वर्णन करती हैं। हम यह भी समझते हैं कि सत्य का मार्ग अपनाने वालों की भगवान किस प्रकार रक्षा करते हैं।

हम होलिका दहन क्यों मनाते हैं?/ Why do we celebrate Holika Dahan?

यह त्योहार दर्शाता है कि कैसे हमेशा अच्छाई की बुराई पर जीत होती है। ऐसा कहा जाता है कि इस शुभ दिन पर होलिका नामक एक दुष्ट की मृत्यु हो गई थी। प्राचीन कथाओं के अनुसार सतयुग में हिरण्यकश्यप नाम का एक अहंकारी राजा रहता था जिसे अपनी शक्तियों पर बहुत अभिमान था और अपने आप को भगवान कहने लगा था। वह चाहता था कि हर कोई भगवान के बजाय उनसे प्रार्थना करें और उसकी पूजा करे हालांकि, उसके अपने बेटे प्रह्लाद ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। उसने अपने पिता के बजाय भगवान विष्णु की पूजा करना शुरू कर दिया।

यह देखने के बाद हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को दंड देना शुरू किया लेकिन हर बार बुरी तरह विफल रहा। भगवान विष्णु ने प्रहलाद को सभी परेशानियों से बचाया और इससे हिरण्यकश्यप और भी ज्यादा चिढ़ गया। इसलिए, उसने अपनी दुष्ट बहन होलिका की मदद से अपने बेटे को मारने की योजना बनाई। होलिका के पास वरदान के रूप में एक कपड़ा था जो उसे आग से बचा सकता था इसलिए हिरण्यकश्यप ने सोचा कि उसे कुछ नहीं होगा और उसकी योजना सफल होगी। जब होलिका प्रहलाद के साथ अग्निकुंड पर बैठी, तो कपड़ा प्रह्लाद के ऊपर आ गया और उसकी बहन तुरंत जलकर राख हो गई। इस घटना के बाद भगवान विष्णु नरसिंह अवतार में प्रकट हुए क्योंकि हिरण्यकश्यप को भगवान ब्रह्मा से यह वरदान प्राप्त था कि दिन हो या रात, फर्श या आकाश, उसे कोई नहीं मार सकता, कोई भी देवता, दुष्ट, मानव या कोई भी हथियार उसे नुकसान नहीं पहुंचा सकता। .

जब भगवान विष्णु नरसिंह के रूप में प्रकट हुए तब उन्होंने कहा "मैं हर जगह रहता हूं, आपके महल में, आपके अंदर, मैं अपवित्र को पवित्र में बदल सकता हूं, हालांकि अपवित्र चीजें मुझे कभी नुकसान नहीं पहुंचा सकती और यहाँ मैं आपकी मौत की सजा हूँ" अभी यह रात नहीं है, न दिन, न मैं एक आदमी या एक जानवर हूँ और तुम्हारी मृत्यु फर्श या आकाश पर नहीं होगी। इतना कहकर भगवान विष्णु ने हिरण्यकश्यप का सीना चीर कर उसका वध कर दिया। इस दिन से, होलिका दहन त्योहार बुराई पर विजय के सबसे बड़े उदाहरण के रूप में मनाया जाता है।

कैसे मनाया जाता है होलिका दहन का पर्व?/ How is the festival of Holika Dahan celebrated?

होलिका दहन की तैयारी इसके आने से कुछ दिन पहले ही शुरू हो जाती है. अलग-अलग गांवों और कस्बों में लोग होलिका बनाने के लिए लकड़ी इकट्ठा करने लगते हैं। गाय का गोबर भी होलिका का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके बाद पवित्र समय पर होलिका दहन होता है और इलाके के लोग मिलकर बुराई को जलाने का जश्न मनाते हैं। कुछ लोग होलिका दहन की पवित्र अग्नि में अपनी सभी नकारात्मक भावना और अपनी बुराइयों का प्रवाह करने के लिए प्रार्थना करते हैं।।

यह दर्शाता है कि होली की आग सभी नकारात्मक ऊर्जा को खत्म कर सकती है और हमारे जीवन को प्रकाश की सकारात्मकता से भर सकती है और हमारी रक्षा कर सकती है। उत्तर भारत में शरीर से निकलने वाले कचरे को होलिका दहन की पवित्र अग्नि में फेंकने का रिवाज है। बहुत से लोग, अपने आप को बुरी छाया या नकारात्मक ऊर्जा से बचाने के लिए, होलिका की राख को अपने माथे पर रगड़ते हैं।

होलिका दहन की आधुनिक परंपरा/ The modern tradition of Holika Dahan

होलिका दहन की परंपरा समय के साथ बदली और विकसित हुई है। पहले लोग इस त्योहार को बुराई पर अच्छाई की जीत का एक महान उदाहरण मानते थे। प्राचीन काल में होलिका बहुत ही सरल तरीके से बनती थी और आकार मध्यम या छोटा होता था।

होलिका में लोग केवल लकड़ी, गोबर और खर-पटवार का उपयोग करते थे और इसे आवासीय स्थानों से दूर, बगीचे या किसी अन्य खाली जगह में बनाया जाता था। हालांकि, आजकल इस त्योहार से जुड़ी हर चीज पूरी तरह से बदल चुकी है।

आज के समय में विशाल होलिका, लोग रिहायशी जगहों और खेतों में जलाते हैं। इनकी आग की लपटें काफी तेज होती हैं और आग लगने की संभावना बनी रहती है। पहले लोग होलिका में लकड़ी, खरपतवार डालते थे और अब टायर-ट्यूब, प्लास्टिक और रबर जैसी हानिकारक चीजें आम हो गई है।

जब आप इन पदार्थों से युक्त होलिका को जलाते हैं तो यह हानिकारक गैसें पैदा करती है और पर्यावरण को प्रतिकूल रूप से नुकसान पहुंचाता है। इसलिए बेहतर है कि सादगी बनाए रखें और होलिका दहन मनाने के पर्यावरण के अनुकूल तरीके का प्रयोग करें। इस तरह यह त्योहार अपने मुख्य संदेश को दुनिया भर के सभी लोगों तक पहुंच सकता है।

होलिका दहन का इतिहास/ History Of Holika Dahan

एक प्रचलित हिरण्यकश्यप और नरसिंह की कहानी तो आपने ऊपर पढ़ ली होगी। यहाँ एक और कहानी है जो होलिका दहन उत्सव से संबंधित है। माता पार्वती भगवान शिव से विवाह करना चाहती थीं लेकिन उनकी तपस्या के कारण उन्होंने उनकी ओर ध्यान नहीं दिया। उस समय भगवान शिव की तपस्या को भंग करने के लिए भगवान कामदेव प्रकट हुए और उन्होंने उनकी ओर एक पुष्प बाण चलाया। भगवान शिव को बहुत क्रोध आया और उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को भस्म कर दिया।

अगले दिन कामदेव की पत्नी ने भगवान शिव को शांत होने के लिए प्रार्थना की, तब रति ने उनसे अपने पति को वापस लाने के लिए विनती की। प्राचीन कथाओं के अनुसार, कामदेव के राख में बदलने की घटना थी जिसने होलिका दहन के त्योहार को जन्म दिया। अगले दिन जब कामदेव का पुनर्जन्म हुआ, तब होली का त्योहार मनाया गया।

शास्त्रों के अनुसार होलिका दहन के नियम/ Rules Of Holika Dahan According to Shastras

फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा तक होलाष्टक काल रहता है।इस अवधि के दौरान, कोई भी पवित्र कार्य पूरी तरह से प्रतिबंधित है। पूर्णिमा के दिन होलिका दहन मनाया जाता है। शुरुआत में इसके लिए आपको दो सबसे महत्वपूर्ण नियमों का ध्यान रखना होगा:

प्रथम यह है कि उस दिन "भद्रा" नहीं होनी चाहिए। भद्रा का दूसरा नाम विष्टि करण है, जो ग्यारह कर्णों में से एक है। एक करण आधे खजूर के बराबर होता है।

दूसरा महत्वपूर्ण नियम यह है कि पूर्णिमा प्रदोषकाल-व्यापिनी हो। सरल शब्दों में, उस दिन सूर्यास्त के बाद तीन मुहूर्त में पूर्णिमा होनी चाहिए।

होलिका दहन की राख को पवित्र क्यों माना जाता है?/ Why are Holika Dahan ashes considered holy?

शास्त्रों के अनुसार होलिका दहन की राख सबसे शुद्ध और पवित्र होती है। इस राख में सभी देवी-देवताओं का आशीर्वाद होता है। इस राख को तिलक के लिए प्रयोग करने से सौभाग्य और बुद्धि में वृद्धि होती है। ऐसा माना जाता है कि यह पवित्र राख आपके जीवन से सभी नकारात्मकता को दूर कर सकती है।

वहीं अगर आप इन राख को उपटन के रूप में इस्तेमाल करते हैं तब आप आसानी से त्वचा की सभी समस्याओं से छुटकारा पा सकते हैं। होलिका दहन की ज्वाला में गेहूं, चना और गन्ना भूनने से शुभता में वृद्धि होती है। इन राख को तिलक के रूप में उपयोग करने से आपको सुख, धन और लंबी आयु का आशीर्वाद मिलता है। अपने घर में इन राख का उपयोग करने से सभी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जाओं को समाप्त किया जा सकता है और आपके जीवन में अधिक सकारात्मकता को स्थान मिल सकता है। यह भी माना जाता है कि अगर होलिका दहन की राख को तिजोरी में रखा जाए, तो इससे आपके धन में वृद्धि हो सकती है।

परिक्रमा का क्या महत्व है?/What is the importance of Parikrama (circumambulation)?

होलिका पूजा और दहन परिक्रमा के लिए सबसे आवश्यक भागों में से एक माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि परिक्रमा के दौरान अगर आप किसी चीज की कामना करते हैं तब वह जरूर पूरी होती है।

जब होलिका दहन की बात आती है तब गोबर का प्रयोग बहुत महत्वपूर्ण होता है। गाय के गोबर की मात्रा कितनी होती है और उसका आकार कैसा होता है, यह व्यक्ति की मान्यताओं और इच्छाओं के अनुसार निर्धारित किया जाना चाहिए।

परिक्रमा और गोबर आपके सभी सपनों को साकार करने में मदद करेंगे। हालांकि, प्रसाद के महत्व को कम नहीं समझना चाहिए। चाहे आप अपनी संपत्ति बढ़ाने की योजना बना रहे हों या विदेश यात्रा पर जाने की योजना बना रहे हों, या आप एक नई नौकरी या बच्चे के बारे में चिंतित हैं, आप होलिका दहन की मदद से अपनी सभी इच्छाओं को वास्तविकता में बदल सकते हैं।

होलिका दहन से पहले आपको क्या करना चाहिए?/ What you should do before Holika Dahan?

  • होलिका दहन से पहले सरसों का तेल और हल्दी उबटन को मिलाकर अपने परिवार के सभी सदस्यों के शरीर पर लगाएं।

  • एक बार जब यह सूख जाए, तो उबटन को हटा दें और इसे एक कागज के टुकड़े पर इकट्ठा कर लें।

  • अब 5 से 11 गाय के गोबर, थोड़े से सरसों दाने, चीनी, चावल और सूखे नारियल लें।

  • अब सूखे नारियल के छिलके लेकर उसमें , तिल, सरसों दाने, चीनी, चावल और घी भर दें।

  • अब इन सभी सामग्रियों को होलिका दहन की पवित्र अग्नि में फेंक दें और उबटन के एकत्रित टुकड़े भी फेंक दें।

  • होलिका दहन से पहले या बाद में अपने घर की उत्तर दिशा में दीपक जलाएं। ऐसा माना जाता है कि इससे घर में सुख-शांति बनी रहती है।

  • होलिका की परिक्रमा इस पर्व का अहम हिस्सा है। ऐसा करने से आप अपने जीवन से सभी प्रकार की समस्याओं, रोगों और दोषों को दूर कर सकते हैं। होलिका दहन के समय परिक्रमा करना न भूलें।

होलिका दहन के बाद आपको क्या करना चाहिए?/ What you should do after Holika Dahan?

  • पूजा के दौरान होलिका दहन से पहले हल्दी टीका लगाना ना भूलें।

  • पवित्र अग्नि में आवश्यक सामग्री फेंकने के बाद, अपने घर की शांति और समृद्धि के लिए प्रार्थना करें।

  • 7 परिक्रमा करें और जल चढ़ाएं। इससे घर में सुख-समृद्धि आती है।

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होली
18 Mar, 2022

होली के रंगों एक दूसरे पर लगा कर इस त्यौहार पर लोग एक दूसरे से गले मिलते हैं और पुराने सभी गिले शिकवे मिटा देते हैं।

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होली एक ऐसा त्योहार है जिसमें लोग अपने अहंकार और दोषों को पवित्र अग्नि में जलाते हैं और बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाते हैं। भारत में लोग इस त्योहार को उत्साह के साथ मनाते हैं और एक दूसरे पर अलग-अलग रंग डालते हैं इसलिए इसे रंगों के त्योहार के रूप में जाना जाता है। होली से एक दिन पहले होलिका दहन होता है और इसे छोटी होली भी कहते हैं। मथुरा के लोग त्योहार से एक सप्ताह पहले होली मनाना शुरू कर देते हैं और यह भारत में सबसे प्रसिद्ध त्योहारों में से एक है। मथुरा में इस शुभ अवसर को देखने के लिए दुनिया भर से पर्यटक आते हैं। इसके अलावा, बरसाना लट्ठमार होली के लिए प्रसिद्ध है जिसमें पतियों को मारने के लिए लकड़ी की एक मोटी छड़ी का उपयोग करना शामिल है। यह भारतीयों के बीच उत्सव के सबसे लोकप्रिय रूपों में से एक है। हिंदू पंचांग के अनुसार, त्योहार होली चैत्र महीने (मार्च-अप्रैल) में पूर्णिमा और अमावस्या के बीच पखवाड़े के दौरान आता है जिसे कृष्ण पक्ष भी कहा जाता है। यदि कृष्ण पक्ष दो दिनों तक दोहरा रहा है तो पहले दिन को होली या वसंत उत्सव (जिसे धुलंडी भी कहा जाता है) के रूप में मनाया जाता है। यह त्योहार बसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है। वसंत ऋतु रंगों का मौसम है और इसे होली में विभिन्न रंगों का उपयोग करके चित्रित किया जाता है।

होली पर्व का महत्व/ Importance of Holi Festival

होली हिंदुओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। हालांकि, न केवल हिंदू बल्कि विभिन्न धर्मों के लोग इस त्योहार का आनंद लेते हैं और इसे उत्साह के साथ मनाते हैं। उत्साह, उमंग और उल्लास के साथ यह त्योहार भाईचारे की स्थापना भी करता है और भारतीय विरासत का एक अनिवार्य हिस्सा है। होली से एक दिन पहले अलग-अलग जगहों पर होलिका दहन किया जाता है और इस त्यौहार को गुलाल से खुशियां बांटकर मनाया जाता है। यह दर्शाता है कि बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, वह कभी भी अच्छाई पर विजय नहीं पा सकती है। होली का त्योहार इस बात का प्रतीक है कि अच्छाई की हमेशा बुराई पर जीत होती है। पहले दिन केवल होलिका दहन होता है और अगले दिन खेल-कूद कर चारों ओर रंग बिखेर दिया जाता है। इसे रंगावली और धुलंडी के नाम से भी जाना जाता है। लोग होलिका की पवित्र अग्नि में अपने अहंकार, बुराइयों और कई अन्य नकारात्मक लक्षणों को जलाते हैं और फिर एक दूसरे को होली की शुभकामनाएं देते हुए इस त्योहार को मनाते हैं।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, हिरण्यकश्यप की बहन होलिका, जिसे आग से ना जलने का आशीर्वाद मिला था, विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद के साथ आग पर बैठ गई। हालांकि, अंत में प्रह्लाद को कुछ नहीं हुआ लेकिन होलिका आग में जलकर मर गई। इस दिन कई महिलाएं अपने परिवार में शांति और समृद्धि लाने और बच्चे का आशीर्वाद पाने के लिए भगवान से प्रार्थना करती हैं। होलिका दहन की तैयारी होली के करीब एक महीने पहले से ही शुरू हो जाती है। होलिका दहन के शुभ मुहूर्त में उपयोग करने के लिए लोग कांटेदार झाड़ियां और लकड़ी के डंडे इकट्ठा करते हैं।

होली का इतिहास/ History of Holi

होली शब्द कोई नई अवधारणा नहीं है। वास्तव में, प्राचीन विजयनगर साम्राज्य की राजधानी हम्पी में, आप उनकी 17 वीं शताब्दी की कला में उकेरी गई होली का एक उदाहरण पा सकते हैं। इसी तरह विंध्य पर्वत के पास बसे रामगढ़ में भी आपको 300 साल पुरानी होली का उल्लेख मिलता है। यह भारत के सबसे प्राचीन त्योहारों में से एक है और इसे होलका या होलिका के रूप में मनाया जाता था। क्योंकि यह वसंत ऋतु में मनाया जाता है, होली को वसंत उत्सव या काम त्योहार भी कहा जाता है। इतिहासकारों का मानना है कि होली का उल्लेख आयरेन (आयरें) में भी किया गया है, हालांकि, यह ज्यादातर उत्तर भारत में मनाया जाता है। विभिन्न प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में इस पर्व का वर्णन मिलता है। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण मिथुन और कथा घारी-सूत्र का पूर्व ज्ञान मीमांसा है।

नारद पौराणिक कथाओं और भविष्य की पौराणिक कथाओं की पुस्तकों में पांडुलिपि और ग्रंथ शामिल हैं जो स्पष्ट रूप से होली का उल्लेख करते हैं। विंध्य क्षेत्र में स्थित रामगढ़ में ईसा के लगभग 300 वर्ष पुराने अभिलेखों में भी इसका वर्णन मिलता है। संस्कृत साहित्य में बसंत ऋतु और वसंत उत्सव कई लेखकों के पसंदीदा विषय हैं। प्रसिद्ध मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी ने अपने ऐतिहासिक यात्रा संस्मरणों में होली का उल्लेख किया है। कई भारतीय मुस्लिम कवियों ने अपनी रचनाओं में होली का वर्णन किया है। होली सिर्फ एक हिंदू त्योहार नहीं है, कई मुसलमान भी इस त्योहार को मनाते हैं। इसका प्रमाण आपको सभी ऐतिहासिक चित्रों में मिल जाएगा।

होलिका दहन/Holika Dahan 

हम सभी जानते हैं कि हर त्योहार का अपना रंग होता है जिसे हम आमतौर पर खुशी या उल्लास कहते हैं; यह एक ऐसा त्यौहार है जिसमें हरे, पीले, गुलाबी और लाल जैसे वास्तविक रंग शामिल होते हैं जो विशेष रूप से दुनिया भर के सभी हिंदुओं द्वारा मनाया जाता है। यह रंगों का त्योहार होली है जिसमें लोग एक-दूसरे पर रंग लगाकर समाज में व्याप्त सभी प्रकार के मतभेदों को दूर करते हैं। वहीं दूसरी ओर होली धार्मिक रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका की मदद से अपने ही बेटे को मारने की कोशिश की थी जो भगवान विष्णु का परम भक्त था। हालांकि, यह भगवान का आशीर्वाद था कि प्रह्लाद की जगह होलिका आग में जलकर मर गई। इसलिए इस दिन लोग होलिका दहन मनाते हैं। अगले दिन लोग होली मनाने के लिए रंगों और पानी का उपयोग करते हैं और इसे रंगवाली होली और दुलहंडी (रंगवाली होली और दुलहंडी) के नाम से जाना जाता है।

हम होली क्यों मनाते हैं?/ Why do we celebrate Holi?

होली एक प्राचीन कथा का एक हिस्सा है और उसके अनुसार प्राचीन काल में अत्याचारी राक्षसों के राजा हिरण्यकश्यप को तपस्या के साथ भगवान ब्रह्मा से वरदान मिला था कि इस दुनिया में कोई भी इंसान, भगवान या राक्षस उसे मार नहीं सकते, वह रात में नहीं मर सकता न दिन में, न तो पृथ्वी पर, न आकाश में, न घर में, न बाहर और न ही कोई शस्त्र उसे मार सकता है। इस वरदान को प्राप्त करने के बाद, वह मानवता भूल गया। कुछ समय बाद हिरण्यकश्यप को एक पुत्र हुआ और उसने उसका नाम प्रहलाद रखा। उसका पुत्र अपने पिता के बिल्कुल विपरीत था और उसने ईश्वर में अपनी अटूट आस्था रखी। हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को आदेश दिया कि वह अपने पिता के अलावा किसी और की पूजा न करे। जब प्रहलाद ने मना किया, तब उसके पिता ने उसे मारने का आदेश दिया। हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को मारने के लिए कई उपाय किए लेकिन प्रह्लाद हमेशा भगवान के आशीर्वाद से बच गया। हिरणकश्यप अपनी बहन के साथ, जिसके पास वरदान था कि कोई भी आग उसे नुकसान नहीं पहुंचा सकती, उसने प्रह्लाद को मारने की योजना बनाई। होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठ गई।

भगवान के आशीर्वाद से प्रहलाद को आग से कोई नुकसान नहीं हुआ, हालांकि, उसने होलिका को भस्म कर दिया और उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद हिरण्यकश्यप को मारने के लिए भगवान विष्णु नरसिंह अवतार में ध्रुव से बाहर आए और सांझ के समय प्रकट हुए। नरसिंह अवतार चौखट पर बैठ गए और उन्होंने हिरण्यकश्यप को मार डाला। कहा जाता है कि इसी समय से होली का सुंदर पर्व मनाया जाने लगा।

होली कैसे मनाएं?/How to celebrate Holi

कुछ स्थानों पर, बसंत पंचमी होली के त्योहार के आगमन का प्रतीक है। हालांकि, मुख्य रूप से यह त्यौहार केवल दो दिनों तक चलता है। पहले दिन की शुरुआत होलिका दहन से होती है और दूसरे दिन एक दूसरे पर रंग फेंके जाते हैं। इस त्योहार के पहले दिन को जलती हुई होली, होलिका दहन या छोटी होली के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन आपको लगभग सभी चौराहों और गलियों में बड़ी-बड़ी सजी-धजी होली, गुलेरी, कंडन और लकड़ी के डंडे से मिल जाएगी। फिर होलिका पूजा होती है और परिक्रमा के बाद, इसे आग से जलाया जाता है। इस दौरान लोग खुशी से गाते और नाचते हैं और एक दूसरे को अबीर और गुलाल भी लगाते हैं। छोटे लोग आशीर्वाद के लिए बड़ों के चरण स्पर्श करते हैं और बड़े अपने से छोटों के अच्छे भविष्य, स्वास्थ्य और लंबे जीवन की कामना करते हैं। इस शुभ त्योहार का दूसरा दिन सभी अलग-अलग रंगों और उत्साह का होता है और इसलिए इसे रंगों के त्योहार के रूप में जाना जाता है। इस दिन लोग सफेद कपड़े पहनते हैं और एक दूसरे को टीका लगाने के लिए अबीर और गुलाल का इस्तेमाल करते हैं। दरअसल, रंगों को पानी में मिलाकर एक-दूसरे पर लगाया जाता है। छोटे बच्चे जमकर होली खेलने के लिए पिचकारी, गुब्बारों और पानी का इस्तेमाल करते हैं। गुझिया, चाट पकौड़ी और ठंडाई की महक से पूरा मोहल्ला, घर और गलियां महक उठती हैं। इस दौरान लोग एक-दूसरे के घर जाते हैं और साथ में होली खेलते हैं। ऐसा माना जाता है कि रंगों का यह त्योहार लोगों को करीब लाता है और वह सभी मतभेदों को भूल जाते हैं। होली में, लोग संगीत की थाप पर नाचना पसंद करते हैं और होलियारों की टोली इस दिन खूब मजे करते है। होली खेलने के बाद सभी लोग स्नान करते हैं और फिर शाम को मिलने का सिलसिला जारी रहता है। लोग एक-दूसरे के घर जाकर होली का उत्साह बांटते हैं और गुजिया के पैकेट बांटते हैं।

होली से जुड़ी पौराणिक कहानियां/ Mythology Stories connected to Holi - Remove this paragraph

विधि: होली पूजा/ Method: Holi Pooja

1. होलिका पूजन आमतौर पर शाम के समय होता है। इसके लिए आराम से उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुंह करके बैठ जाएं।

2. जगह के आसपास पानी की कुछ बूंदों का छिड़काव करें। ऐसा करने से आप किसी भी तरह की नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर पाएंगे।

3. इसके बाद होलिका बनाने के लिए गाय के गोबर का प्रयोग करें या किसी सार्वजनिक स्थान पर जाएं जहां पहले से होलिका बनी हो और अपना पूजन करें|

4. होलिका पूजन के लिए आगे बढ़ने से पहले गणेश पूजन करना न भूलें।

5. एक प्लेट लें और उसमें रोली, कच्ची सूत, चावल, फूल, साबुत हल्दी, बताशे, फल और एक लोटा पानी डालें।

6. इसके बाद भगवान नरसिंह से प्रार्थना करें और होलिका को रोली, चावल, बताशे, फूल अर्पित करें और मौली को होलिका के चारों ओर लपेट दें।

7. अब प्रहलाद का नाम लें और होलिका पर कुछ फूल चढ़ाएं। ऐसा करने के बाद भगवान नरसिंह का नाम लें और पांच प्रकार का भोजन अर्पित करें।

8. अब अपना नाम, अपने पिता का नाम और गोत्र का नाम लें और पुष्प अर्पित करें।

9. अंत में होलिका दहन और परिक्रमा के साथ इन चरणों का पालन करें और हाथ जोड़कर प्रणाम करें।

10. होलिका दहन की अग्नि में थोड़ा गुलाल डालें और कुछ अपने बड़ों के पैरों पर लगाएं और उनका आशीर्वाद लें।

11. होलिका दहन में झिलमिलाहट (बालें बुझाने) का रिवाज है। इसके बाद अपने दोस्तों और परिवार को शुभकामनाएं देना न भूलें।

होली मंत्र/Holi Mantra

• अहकूटा भयत्रस्तै:कृता त्वं होलि बालिशै: अतस्वां पूजयिष्यामि भूति-भूति प्रदायिनीम: |

• गुरु गृह पढ़न गए रघुराई अल्प काल विद्या सब पाई|

• ऊं नमों नगन चींटी महावीर हूं पूरों तोरी आशा तूं पूरो मोरी आशा |

• ॐ नमो भगवते रुद्राय मृतार्क मध्ये संस्थिताय मम शरीरं अमृतं कुरु कुरु स्वाहा |

होली के त्योहार में रंगों का महत्व/ Significance of Colours in Holi Festival

होली के रंगों के त्योहार के रूप में जाना जाता है और इसे दो दिनों तक मनाया जाता है। इस त्योहार का पहला दिन होलिका दहन के साथ मनाया जाता है। दूसरा दिन सभी रंगों और खुशियों के प्रसार का है। इसे धुलंडी या धूल के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन में सभी प्रकार के मतभेदों और झगड़ों को भुलाकर एक दूसरे को प्यार और सम्मान के साथ बधाई देना शामिल है। लोग अपने परिवार और दोस्तों से मिलते हैं और गुझिया और मिठाई बांटते हैं। रंग हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह सभी रंग हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा प्रदर्शित करते हैं जिसे आप होली के त्यौहार में स्पष्ट रूप से देख सकते हैं।

प्यार की होली: राधा और कृष्ण/Holi of Love

होली राधा और कृष्ण के पवित्र प्रेम की याद में मनाई जाती है। कथानक के अनुसार बाल गोपाल ने यशोदा से पूछा कि वह उनके जैसा गोरा क्यों नहीं है। यशोदा ने बालकृष्ण से मजाक में कहा कि राधा के चेहरे पर रंग लगाने से वह बिल्कुल उनके जैसी हो जाएगी। इसके बाद कान्हा ने राधा और अन्य गोपियों के साथ होली खेली और तभी से यह त्योहार रंगों के त्योहार के रूप में मनाया जाता है।

होली: रंगों से सजा एक त्योहार/ Holi: A Festival Decorated With Colours

होली का आगमन सभी के चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान लेकर आता है। आपने देखा होगा कि भारत में लोग इस त्योहार को किस तरह से मनाते हैं। चाहे युवा पीढ़ी हो या बड़ी पीढ़ी, दोनों ही इस त्योहार को समान उत्साह और खुशी के साथ मनाते हैं। इस त्योहार के महत्व को दर्शाने के लिए प्रसिद्ध गीत “होली के दिन दिल खिल जाते है रंगों में रंग मिल जाते है”काफी है। हमेशा के लिए हरे भरे इस गीत की ईमानदारी और सादगी से आज भी लोग चिपके रहते हैं। यह त्योहार सिर्फ अपने रंगों के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है। वास्तव में, यह मस्ती और उत्साह से भरा होता है और बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी इसका भरपूर आनंद लेते हैं। हर साल यह त्यौहार मार्च महीने में पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। भारत के विभिन्न राज्यों के लोग अपने-अपने तरीके से होली मनाते हैं। वृंदावन में लट्ठमार होली से लेकर फूलों से भरी मथुरा की होली तक यह सभी दुनिया भर में मशहूर हैं। होली के त्योहार की पहुंच विभिन्न देशों और दुनिया के कुछ हिस्सों में है।

इस त्योहार के आने से एक हफ्ते पहले ही सामाजिक मंच (Social Media) पर हॉलीवुड और बॉलीवुड सितारों की तरफ से होली की शुभकामनाओं की बाढ़ सी आ जाती है| यह त्योहार विभिन्न कहानियों और प्राचीन कथाओं का स्मरण करवाता है जो समय के साथ गायब हो रही हैं। होलिका दहन की कहानी हो या प्रहलाद के जन्म की, हर कथा का अपना एक महत्व होता है। कहा जाता है कि जिस तरह से प्रहलाद की अच्छाई और भगवान विष्णु के प्रति उसकी निष्ठा ने दुष्ट होलिका का नाश किया। इसी तरह, लोगों का ईश्वर पर भरोसा और नम्रता उनके जीवन और इस दुनिया से नकारात्मकता को दूर कर देगी। होलिका के दिन,  लोग होलिका के सामने झुकते हैं ताकि बुराई पर अच्छाई की जीत हो। होलिका दहन की प्रथा को पूरा करने के लिए लोग एक जगह इकट्ठा होते हैं और लकड़ी, घास और गोबर को जलाते हैं। इस रिवाज के पूरा होने के बाद, लोग अपने घरों के लिए निकल जाते हैं और होली के अगले दिन की तैयारी शुरू कर देते हैं। यह एक ऐसा त्योहार है जिसे बहुत एकता, प्रेम और भाईचारे के साथ मनाया जाता है। यह त्यौहार हमारे जीवन में विभिन्न रंगों को लाता है| कई हिंदी फिल्में इस त्योहार के माध्यम से मनोरंजन और मस्ती का सही अर्थ प्रदर्शित करती हैं। हमारे देश में इस पर्व को राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाया जाता है। इस दिन सभी स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, कार्यालय, संस्थान और किसी भी अन्य कार्यस्थलों को आधिकारिक रूप से बंद कर दिया जाता है ताकि हर कोई इस शुभ और रंगीन त्योहार पर अपने परिवार के साथ कुछ गुणवत्तापूर्ण समय बिता सके।

अपनेपन की होली/ Holi of Belongingness

रंगों, खुशियों और स्वादिष्ट व्यंजनों के अलावा यह त्योहार भाईचारे और अपनेपन के लिए भी जाना जाता है। यह अद्भुत त्योहार लोगों के जीवन में अलग-अलग रंग, मस्ती और उत्साह लेकर आता है। होली से एक दिन पहले, होलिका दहन मनाया जाता है जिसमें बुराई पर अच्छाई की जीत की मिसाल कायम करने के लिए होलिका जलाई जाती है। लोग इस पवित्र दिन को अपने दोस्तों और परिवार के साथ मनाना पसंद करते हैं। ऐसा माना जाता है कि यह त्योहार लोगों को अपने मतभेदों को भूलकर खुशियों को गले लगाने की अनुमति देता है।

रंगीन होली/Colourful Holi

होली रंगों और खुशियों से भरा भारत का त्योहार है जिसे हिंदुओं द्वारा हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। लोग अपने सभी मतभेदों और झगड़ों को भूल जाते हैं और अपने परिवार के साथ इस त्योहार के आगमन का जश्न मनाते हैं। भारत में अलग-अलग जगहों पर होली को अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है। कुछ स्थान "लट्ठमार होली" के लिए जाने जाते हैं और अन्य स्थान फूलों से भरी होली के लिए जाने जाते हैं। पूरे भारत में लोग जिस तरह से इस त्योहार को मनाते हैं, वह इस त्योहार के महत्व को प्रदर्शित करता है। रंगों के इस त्योहार को फाल्गुन महोत्सव के नाम से भी जाना जाता है जिसमें ब्रजभाषा में कई पुराने गीत गाए जाते हैं। भांग के साथ पान भी इस त्योहार का एक अनिवार्य हिस्सा है। लोग नशे में होने के बाद एक-दूसरे को गले लगाते हैं और अपने सभी झगड़ों को भूल जाते हैं और एक साथ गाते और नाचते हैं। होली के लिए सभी घरों में तरह-तरह के व्यंजन बनाए जाते हैं। भारत में सभी त्योहारों से कोई न कोई खास व्यंजन जुड़ा होता है।

लोगों के साथ होली/Holi with people

होली के दूसरे दिन को धूलिवंदन के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन लोग रंगों से खेलते हैं और सुबह से ही वह लोग अपने परिवार के सदस्यों और दोस्तों से मिलने के लिए निकल जाते हैं। घरों में उनका गुलाल और अलग-अलग रंगों से स्वागत किया जाता है, लोग अपने द्वेष और ईर्ष्या को दूर रखते हैं और एक-दूसरे से प्यार और देखभाल के साथ मिलते हैं। आपको रंग-बिरंगे कपड़े पहने लोगों के विभिन्न समूह मिलेंगे, जिन्हें तोलियान भी कहा जाता है, जो सड़कों पर घूमते हैं, होली पर गाते और नाचते हैं। बच्चे इस दिन मौज-मस्ती करने के लिए पिचकारी और पानी के रंगों का इस्तेमाल करते हैं। रंगों के सुंदर संयोजन से पूरा समाज एक जैसा दिखता है और एक हो जाता है। रंगों से खेलने के बाद लोग आमतौर पर दोपहर में नहाते हैं और शाम को नए कपड़े पहनकर बाहर जाते हैं और लोगों से मिलते हैं। कई घरों में इस पर्व पर नाच-गाने और दावत की व्यवस्था की जाती है। आप लोगों को विभिन्न प्रकार की मिठाइयाँ और विशेष रूप से गुजिया की पेशकश करते हुए पाएंगे जो कि होली की सबसे महत्वपूर्ण मिठाइयों में से एक है। बेसन सेव और दही बड़े उत्तर प्रदेश के लगभग हर घर में बनते हैं। कांजी, भांग और ठंडाई होली के त्योहार के सबसे महत्वपूर्ण पेय हैं। इस दिन उत्तर भारत में सभी सरकारी कार्यालय बंद रहते हैं लेकिन दक्षिण भारत में होली की अलोकप्रियता के कारण सरकारी कार्यालय आमतौर पर खुले रहते हैं।

भारत में अलग-अलग राज्य इस त्योहार को अपने-अपने तरीके से मनाते हैं। होली समारोह की बात करें तो ब्रज में होली अभी भी ध्यान का केंद्र है। बरसाने की लट्ठमार होली की लोकप्रियता को कोई नकार नहीं सकता। लट्ठमार होली में पुरुष महिलाओं पर रंग लगाने की कोशिश करते हैं और महिलाएं अपने पति को लकड़ी के डंडे और कपड़े के चाबुक से पीटती हैं। इसी तरह मथुरा और वृंदावन में भी यह पर्व करीब 15 दिनों तक चलता है। कुमाऊं की गीत हमें शास्त्रीय संगीत या शास्त्रीय संगीत की एक पूरी नई दुनिया में ले जाती हैं। हरियाणा में एक रिवाज है जहां भाभी जीजा को चिढ़ाती है। बंगाल की डोल यात्रा को चैतन्य महाप्रभु के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। इसके बाद जूलस और लोगों द्वारा बजाए जाने वाले गाने होते हैं। इसके अलावा, महाराष्ट्र की रंग पंचमी में सूखे गुलाल से खेलना शामिल है, गोवा के शिंगो में कई सांस्कृतिक कार्यक्रम शामिल हैं और पंजाब के होला मोहल्ला में सिख अपनी उत्कृष्ट शक्ति का प्रदर्शन करते हैं। दक्षिण गुजरात के आदिवासी एक बहुत ही महत्वपूर्ण त्योहार है, छत्तीसगढ़ होरी में क्षेत्रीय गीतों को शामिल करने का रिवाज है और मध्य प्रदेश के मालवा अंचल आदिवासी क्षेत्र में भगोरिया मनाते हैं जो होली का एक हिस्सा है। बिहार का फागुआ मौज-मस्ती करने और उत्साह प्रदर्शित करने का एक अच्छा समय है और नेपाल की होली में आपको इस त्योहार को मनाने का एक और धार्मिक तरीका मिलेगा।

इसी तरह, अन्य देशों या धार्मिक संस्थानों जैसे इस्कॉन और वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में रहने वाले भारतीय अपने तरीके से होली मनाते हैं।

संस्कृत साहित्य में होली का इतिहास/ History Of Holi In Sanskrit Literature

संस्कृत साहित्य में विभिन्न प्रकार से होली का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। श्रीमद्भागवत महापुराण में सामुह रास का उल्लेख है और ऐसी अन्य रचनाएँ हैं जो रंग नामक त्योहार का वर्णन करती हैं। भक्तिकाल और रीतिकाल के हिन्दी साहित्य में होली और फाल्गुन मास का स्पष्ट वर्णन मिलता है। आदिकालीन कवि विद्यापति से भक्तिकालीन सूरदास, रहीम, रसखान, पद्माकर, जायसी, मीराबाई, कबीर, और रीतिकालीन बिहारी, केशव, धनानंद आदि को होली उत्सव का विषय पसंद आया। महान कवि सूरदास ने 78 पद लिखे और पद्माकर ने अपनी कई रचनाओं में होली को भी जोड़ा। इस विषय के माध्यम से कई कवियों ने नायक और नायिका द्वारा निभाई गई कई स्नेही और सुंदर होली का वर्णन किया है। दूसरी ओर उन्होंने राधा और कृष्ण के बीच प्रेम और ईर्ष्या वाली होली का भी वर्णन किया। हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया, अमीर खुसरो और बहादुर शाह ज़फ़र ने होली के त्योहार पर विभिन्न रचनाएं लिखी हैं, जिन्हें आज भी पढ़ा और मनाया जाता है।

प्रेमचंद की राजा हरदोल, प्रभु जोशी की अलग अलग तालियां, तेजेंद्र शर्मा की एक बार फिर होली, ओम प्रकाश अवस्थी की “होली मंगलमय हो” और स्वदेश राणा की “होली माई होली” जैसे हिंदी कहानियां होली के विभिन्न रूपों का वर्णन करती हैं। बॉलीवुड फिल्मों में भी आप विभिन्न दृश्यों और गीतों को देख सकते हैं जो प्रदर्शित करते हैं कि होली का त्योहार कितना मनोरंजक और मजेदार है। कुछ बेहतरीन हैं शशि कपूर की उत्सव, यश चोपड़ा की  सिलसिला, वी शांताराम की  झनक झनक पायल बाजे और नवरंग आदि कई अन्य।

होली के गीतों का इतिहास/History of Holi Songs

भारतीय शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक और फिल्मों में होली के त्योहार का बहुत बड़ा महत्व है। शास्त्रीय संगीत में धामर का होली से गहरा संबंध है, हालांकि, ध्रुपद, धमार, छोटे-बड़े ख्याल और ठुमरी भी होली महोत्सव की सुंदरता को प्रदर्शित करते हैं। कथक नृत्य के साथ, होली धामर, और ठुमरी जैसे "चलो गुइयाँ आज खेले होली कन्हैया घर" जैसे विभिन्न उत्कृष्ट बंदिश अभी भी साथियों के बीच प्रसिद्ध हैं। ध्रुपद में एक प्रसिद्ध गीत है "खेलत हरि संग सकल, रंग भरी होरी साकी"। भारतीय शास्त्रीय संगीत में आपको कुछ धुनें मिलेंगी जिसमें सभी होली गीत गाए जाते हैं।

उनमें से कुछ बसंत, बहार, हिंडोल और काफ़ी है। होली का त्यौहार गाने और नाचने का माहौल बनाता है धीरे-धीरे हर कोई इसमें शामिल हो जाता है। उपशास्त्रीय संगीत में आपको छेती, दादरा और ठुमरी में तरह-तरह के होलियां देखने को मिलेगी। आप समझ सकते हैं कि संगीत की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके मुख्य भाग को होली कहा जाता है और विभिन्न प्रांतों में, आप इसके विभिन्न संस्करण पा सकते हैं। इन स्थानों का संगीत धार्मिक मान्यताओं, इतिहास और उनके महत्व को प्रदर्शित करता है। चाहे वह राधा और कृष्ण की ब्रजधाम में होली खेलने की कहानी हो या राम और सीता की अवध में होली मनाने की कहानी हो, जिसका प्रयोग "होली खेले रघुवीरा अवध माई" गीत में भी किया जाता है। राजस्थान के अजमेर में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर गाई जाने वाली होली का एक अलग ही अंदाज देखने को मिलता है। वहां की प्रसिद्ध होली में से एक है " आज रंग है री मन रंग है जी अपने महबूब के घर रंग है री"। इसी तरह, "दिगंबर खेले मसाने माई होली" में बताया गया है कि कैसे भगवान शिव होली खेलते हैं। भारतीय फिल्मों में, विभिन्न गाने विभिन्न धुनों का अनुसरण करते हैं और भारतीय दर्शकों के बीच बहुत प्रसिद्ध हैं। सिलसिला का गीत "रंग बरसे भीगे चुनर वाली" और नवरंग का "आया होली का त्योहार उड़े रंगो की बौछार" लोगों की यादों से कभी गायब नहीं हो सकता।

अलग-अलग राज्यों में मनाई गई होली/Holi in different states 

मध्य प्रदेश के मालवा अंचल जैसे कुछ जगहों पर होली के पांच दिनों के बाद रंग पंचमी मनाई जाती है और लोग इस होली को और अधिक उत्साह के साथ खेलते हैं। होली के त्योहार का सबसे अच्छा उत्सव ब्रज में होता है और विशेष रूप से बरसाना की लट्ठमार होली जो विश्व प्रसिद्ध है। मथुरा और वृंदावन भी लगभग 14 दिनों तक इस त्योहार को मनाते हैं। हरियाणा में एक ननद को अपने देवर को चिढ़ाने का रिवाज है। वहीं दूसरी तरफ महाराष्ट्र में लोग सूखे गुलाल से होली खेलना पसंद करते हैं. दक्षिण गुजरात के आदिवासियों के लिए होली एक महत्वपूर्ण त्योहार है। छत्तीसगढ़ में लोग इसे लोकगीत के साथ मनाते हैं और मालवांचल में भगोरिया मनाते हैं। रंगों का यह त्योहार हमें रंग, जाति और पंथ के आधार पर सभी मतभेदों को खत्म करने और हमारे जीवन में शांति और प्रेम लाने वाले रंगों को अपनाने के लिए प्रेरित करता है।

भद्रा काल में होली क्यों नहीं जलाई जाती?/ Why Holi is not burnt in Bhadra Kaal?

शास्त्रों के अनुसार होली जलाने के लिए भाद्र काल उपयुक्त समय नहीं है क्योंकि यह अशुभ होता है। ऐसा माना जाता है कि भद्रा का व्यवहार उग्र होता है और इसलिए इस दौरान कोई भी शुभ कार्य पूरी तरह से वर्जित होता है। एक प्राचीन कथा के अनुसार, यह भद्रकाल था जब भगवान शिव ने तांडव किया और अपना रौद्र रूप प्रदर्शित किया। यही एकमात्र कारण है कि भद्रा काल में कभी भी होलिका दहन नहीं करना चाहिए।

होलाष्टक क्या है?/ What is Holashtak?

हिंदू शास्त्र के अनुसार होलिका दहन से आठ दिन पहले होलाष्टक आता है। इस दिन आप गृह प्रवेश, शादी, मुंडन, सगाई या कोई नया और शुभ कार्य नहीं कर सकते। शास्त्रों के अनुसार होलाष्टक होली पर्व की शुरुआत है। इस दौरान कोई भी शुभ कार्य करने से आपको कोई शुभ फल नहीं मिलेगा।

होली से जुड़ी अहम बातें/ Significant things related to Holi

• होली बसंत के मौसम में मनाया जाने वाला एक शुभ त्योहार है। हिन्दू पंचांग के अनुसार यह पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा के समय मनाया जाता है। यह दिन नए साल की शुरुआत का प्रतीक है। इसलिए होली को बसंत के मौसम और नए साल की शुरुआत माना जाता है।

• होली भारत के सबसे प्राचीन त्योहारों में से एक है जिसे मस्ती और उत्साह के साथ मनाया जाता है।

• पहले होली को होलिका या होलिका कहा जाता था और आज इसके कई अलग-अलग नाम हैं जैसे फगुआ, धुलंडी, डोल।

• इतिहासकारों का मानना है कि यह त्योहार आर्यों के बीच भी प्रसिद्ध था लेकिन यह ज्यादातर भारत के उत्तर में मनाया जाता है। इसका उल्लेख विभिन्न प्राचीन पांडुलिपियों और ग्रंथों में मिलता है। हालांकि, इसमें ज्यादातर मीमांसा सूत्र और गहरिया सूत्र शामिल हैं। नारद पुराण और भविष्य पुराण की प्राचीन पांडुलिपियों और ग्रंथों में भी होली के त्योहार का उल्लेख है।

• प्रसिद्ध मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी ने अपने संस्मरण में होलिकोत्सव का उल्लेख किया है। कई मुस्लिम कवियों ने अपनी रचनाओं में होली के त्योहार का इस्तेमाल किया है और यह साबित किया है कि न केवल हिंदू बल्कि मुसलमान भी इस शुभ अवसर को मनाते हैं।

• अकबर के जोधाबाई और जहांगीर के साथ नूरजहां के साथ होली मनाने का इतिहास में वर्णन मिलता है। अलवर संग्रहालय में आप जहांगीर के होली खेलते हुए चित्र देख सकते हैं।

• शाहजहाँ के प्रकट होने तक मुगलई होली खेलने का तरीका पूरी तरह बदल गया। उस समय होली को "ईद-ए-गुलाबी" या "आब-ए-पाशी" कहा जाता था।

• मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के बारे में यह काफी प्रसिद्ध है कि उनके मंत्री होली में उन पर रंग लगाते थे। 

• हिंदी साहित्य विभिन्न कृष्ण लीलाओं से भरा है, विशेष रूप से होली के त्योहार का वर्णन।

• संस्कृत साहित्य में होली उत्सव के विभिन्न चरण शामिल हैं। श्रीमद्भागवत पुराण में होली को रास बताया गया है। महान कवि सूरदास ने वसंत और होली पर 78 पद लिखे हैं |

• होली के त्योहार से शास्त्रीय संगीत का बहुत गहरा नाता है। दरअसल, ध्रुपद, ठुमरी और धमार के बिना होली आज भी अधूरी है। इसके अलावा, अजमेर में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर गाए गए गीत इस त्योहार में एक अलग रंग जोड़ते हैं।

होली के लिए सुरक्षा सावधानियां/ Safety Precautions for Holi

1. होली एक खूबसूरत त्योहार है लेकिन जरूरी सावधानियां रखना नहीं भूलती। आजकल लोगों को रंगों में हानिकारक रसायनों के नकारात्मक प्रभावों के कारण बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसलिए बेहतर है कि इस त्योहार को प्राकृतिक गुलाल का इस्तेमाल करके ही मनाया जाए।

2. इसी तरह भांग में, आपको कई अन्य हानिकारक दवाएं और पदार्थ मिल सकते हैं जो आपको नुकसान पहुंचा सकते हैं। बेहतर होगा कि शराब पीने और किसी भी प्रकार के नशे के सेवन से बचें।

3. यदि आप हानिकारक रसायनों वाले रंगों का उपयोग करते हैं, तब आप विभिन्न नेत्र संक्रमणों को पकड़ सकते हैं। होली खेलने के लिए केवल जैविक रंगों का उ?

चैत्र नवरात्रि
02 Apr, 2022

नवरात्रि का त्यौहार भारत में बहुत ही उत्साह और धूमधाम से मनाया जाता है। यह साल में दो बार मनाया जाता है। क्या आप जानते हैं इसे क्यों मनाया जाता है? इससे कौन सी कहानी जुड़ी है? मैं, विनय बजरंगी, चैत्र नवरात्रि से संबंधित प्रसिद्ध कहानी पर प्रकाश डालता हूं।

चैत्र नवरात्रि से जुड़ी प्रसिद्ध रामायण कथा/ Famous Ramayana Story Related to Chaitra Navratri

चैत्र नवरात्रि से जुड़ी एक कहानी के अनुसार, भगवान ब्रह्मा ने राम से, चंडी देवी की पूजा करके उन्हें प्रसन्न करने के लिए कहा ताकि उन्हें रावण को मारने का आशीर्वाद मिल सके। धार्मिक नियम और शर्तों के अनुसार, भगवान ब्रह्मा ने चंडी देवी की पूजा और हवन के लिए 108 नीली जल कुमुदिनी फूलों की भी व्यवस्था की। दूसरी ओर, रावण भी अमरता प्राप्त करने के लिए और उन्हें प्रसन्न करने के लिए चंडी देवी का चंडी पाठ करने लगा। अब, भगवान इंद्र ने हवा के माध्यम से रावण के चंडी पाठ करने का संदेश राम को दिया कि वह भी माँ चंडी देवी को प्रसन्न कर रहा है|

जब रावण को पता चला कि देवी चंडी देवी को प्रसन्न करने के लिए राम द्वारा 108 नीली जल कुमुदिनी की पेशकश की जा रही है, तब उसने इन फूलों में से एक को वेदी पर रखी हवन सामग्री से गायब कर दिया, ताकि चंडी देवी की पूजा करने वाले राम बाधित हो जाएं। जब राम को इन 108 नीली कुमुदिनी में से एक फूल कम मिला तब राम को अपना संकल्प कमजोर होता दिख रहा था। तब, राम को याद आया कि इन फूलों को 'कमलनायन नवांकंज लोचन' भी कहा जाता है। उन्होंने सोचा कि उन्हें चंडी देवी को अर्पित करने के लिए अपनी एक आंख काट देनी चाहिए। जैसे ही राम ने अपनी एक आंख को तरकश से काटने की कोशिश की, देवी दुर्गा उनके सामने प्रकट हुई और कहा कि वह उनकी पूजा से प्रसन्न हैं और उन्हें युद्ध के मैदान में विजयी होने का आशीर्वाद दिया।

दूसरी ओर, भगवान हनुमान एक ब्राह्मण लड़के के वेश में प्रकट हुए और उस स्थान पर उतरे जहां रावण चंडी देवी की पूजा कर रहा था। जिस स्थान पर ब्राह्मणों द्वारा (जय देवी भुरतिहारिणी) का जाप चल रहा था, वहां हनुमान जी ने 'हारिणी' शब्द का गलत उच्चारण 'कारिणी' कर दिया। 'हारिणी ' का अर्थ लोगों के कष्टों को दूर करने वाली और 'कारिणी' का अर्थ है ' जो दूसरों को कष्ट देता है। इस शब्द के गलत उच्चारण के कारण रावण की पूजा में बाधा उत्पन्न हुई। देवी दुर्गा ने रावण पर प्रहार किया और उसे श्राप दिया। फलस्वरूप रावण की हार हुई|

चैत्र नवरात्रि इसी सत्य और धर्म की जीत के रूप में मनाई जाती है।

पूजा का अर्थ क्या है?/ What is the meaning of worshipping? 

पूजा का अर्थ है भगवान के चित्र को देखकर उनके चरित्र का अनुसरण करना।

कहने का तात्पर्य यह है कि देवी दुर्गा की पूजा करते समय आपको उनके चरित्र के गुणों का अपने जीवन में अनुसरण करना चाहिए।

हिंदू धर्म में चैत्र नवरात्रि का महत्व/ Importance of Chaitra Navratri in Hindu Religion

चैत्र नवरात्रि का हिंदू धर्म में बहुत महत्व है। ऐसा माना जाता है कि नौ दिनों तक चलने वाले नवरात्रि के दिनों में, देवी दुर्गा पृथ्वी पर रहती हैं। विभिन्न पात्रों में उनकी पूजा की जाती है। देवी की पूजा एक स्थान पर उनकी मूर्ति की स्थापना के पहले दिन से शुरू होती है और पूर्णाहुति के नौवें दिन समाप्त होती है। धार्मिक नियमों और शर्तों के अनुसार उनकी पूजा करने के बाद भक्तों की मनोकामना पूरी होती है।

घटस्थापना कब की जाती है?/ When is Ghatasthapana Done?

मुहूर्त के अनुसार घटस्थापना  चैत्र नवरात्रि के पहले दिन किया जाता है। नवरात्रि में कलश स्थापना का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कलश की स्थापना बहुत ही फलदायी मानी जाती है। नवरात्रि के दिनों में, विभिन्न देवी-शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है।

कलश स्थापना क्यों की जाती है?/ Why is Kalash Sthapana Done? 

कलश रखने से पहले उस स्थान को गंगा जल से साफ और शुद्ध किया जाता है। कलश को पांच प्रकार के पत्तों से सजाया जाता है, फिर हल्दी की जड़ें, सुपारी, कुसुम घास आदि रखी जाती हैं। उस पर कलश रखने से पहले रेत की वेदी बनाई जाती है और उसमें जौ बोया जाता है। जौ की बुवाई धन और समृद्धि देने वाली देवी अन्नपूर्णा को प्रसन्न करने के लिए की जाती है। मां दुर्गा की एक तस्वीर या मूर्ति को वेदी के केंद्र में रखा जाता है। इसके बाद श्रृंगार सामग्री, रोली, चावल, सिंदूर, माला, चुनरी, साड़ी और आभूषण उन्हें अर्पित किए जाते हैं। कलश पर अखंड दीप जलाया जाता है जो व्रत रखने के अंतिम दिन तक जलता रहता है।

कलश की पूजा विधि/ Worshipping Method of Kalash

कलश की पूजा, धार्मिक रीति रिवाजों के अनुसार करनी चाहिए। इसके लिए मिट्टी के बर्तन में सात प्रकार के अनाज बोएं और फिर उस पर कलश रखें। कलश को जल और गंगा जल के मिश्रण से भरें। अब इस कलश के चारों ओर कलावा (लाल रंग का एक धागा) बांधें। कलश के मुख पर आम या अशोक के पत्ते रखें। इसके बाद नारियल के चारों ओर कलावा बांध दे। अब नारियल के चारों ओर एक लाल कपड़ा लपेट के कलश पर रख दें। सभी देवी-देवताओं का स्मरण करें।

अन्य सभी प्रमुख भारतीय त्योहारों के लिए भारतीय त्योहारों में ज्योतिष की प्रासंगिकता (Relevance of Astrology) पर इसी तरह के लेख पढ़ सकते हैं।

 

गुडी पडवा
02 Apr, 2022

गुड़ी पड़वा में, गुड़ी का अर्थ है विजय पताकाऔर पड़वा का अर्थ है प्रतिपदा। इस त्योहार पर लोग अपने घरों को पताका, ध्वज और बंधनवार से सजाते हैं। महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा के दिन पूरन पोली या मीठी रोटी बनाई जाती है| इस दिन महाराष्ट्र में सभी लोग अपने आंगन में गुड़ी भी खेलते हैं। गुड़ी पड़वा मुख्य रूप से महाराष्ट्र में हिंदू नव वर्ष की शुरुआत या नए साल की शुरुआत को चिह्नित करने के लिए मनाया जाता है। पंचांग के अनुसार नए साल की शुरुआत चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से होती है और इस दिन इस पर्व को मनाने की परंपरा है| गुड़ी पड़वा महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और गोवा सहित दक्षिण भारतीय राज्यों में खुशी के साथ मनाया जाता है। चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को गुड़ी पड़वा के पर्व के रूप में मनाया जाता है। इस दिन को पूरे देश में एक नए त्योहार के रूप में मनाया जाता है। हिंदू धर्म में इस त्योहार को लेकर कुछ मान्यताएं हैं। गुड़ी झंडा है,और पड़वा प्रतिपदा तिथि है। कहते हैं गुड़ी पड़वा के दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी। इस दिन लोग अपने घरों को आम के पत्तों से बने बंदनवार से सजाते हैं। खासकर आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में इसे लेकर खासा उत्साह होता है। आम के पत्तों का बंदनवार लोगों के बीच खुशहाल जीवन की उम्मीद जगाता है। इस पर्व का मुख्य उद्देश्य लोगों को अच्छी फसल उगाने और घर में समृद्धि का स्वागत करने की भी उम्मीद है।

गुड़ी पड़वा की गिनती साल के तीन मुहूर्त में होती है। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी यह पर्व काफी महत्वपूर्ण है। इसलिए, गुड़ी पड़वा के दिन तैयार किए गए व्यंजन अविश्वसनीय रूप से स्वस्थ होते हैं फिर चाहे वह आंध्र प्रदेश में बनी प्रसाद पछड़ी हो या पूरन पोली या फिर महाराष्ट्र ने बनाई जाने वाली मीठी रोटी हो। पछड़ी के बारे में यह माना जाता है कि यह खाने से व्यक्ति के स्वास्थ्य में सुधार होता है। इसे खाली पेट खाने से चर्म रोगों का इलाज भी ठीक हो जाता है।

वहीं गुड़, नीम के फूल, इमली, आम आदि से भी मीठी रोटी बनाई जाती है। चूंकि इस दिन से नवरात्रि शुरू होती है, इसलिए पूरे देश में गुड़ी पड़वा का उत्सव अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है। यह रामनवमी पर दुर्गा पूजा के साथ समाप्त होता है। गुड़ी पड़वा पर, लोग अपने घरों की सफाई करते हैं और घर के आंगन और दरवाजे को रंगोली, बंदनवार आदि से सजाते हैं।घर के सामने एक गुड़ी यानी झंडा लगाया जाता है।एक बर्तन पर स्वास्तिक का चिन्ह बनाया जाता है और उसे रेशम के कपड़े में लपेटते है और उस पर रखा जाता है। पारंपरिक कपड़े पहनते हैं। सूर्य देव की पूजा की जाती है। इस दिन सुंदरकांड, राम रक्षा, देवी भगवती के मंत्रों का भी जाप किया जाता है।

गुड़ी पड़वा का महत्व/ Importance of Gudi Padwa

'गुड़ी' का अर्थ है विजय ध्वज। गुड़ी विजय ध्वज है जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। वहीं पड़वा का अर्थ प्रतिपदा तिथि है। गुड़ी पड़वा पर्व पर सुबह जल्दी उठकर बड़े डंडे की सहायता से झंडा बनाए जाता है। इसके लिए नए कपड़े या नई साड़ी जिसका इस्तेमाल पहले नहीं किया गया है उसे डंडे पर लपेटा जाता है। इसके ऊपर एक कटोरी, कांच या लोटा उल्टा करके रखते है। तब इस विजय ध्वज को भगवान के रूप में पूजा जाता है।

गुड़ी पड़वा से कई चीजें जुड़ी हुई हैं। आइए उनमें से कुछ देखते हैं 

  • गुड़ी पर्व से जुड़ी एक मान्यता काफी प्रचलित है। इस दिन शालिवाहन नाम के एक कुम्हार-पुत्र ने मिट्टी के सैनिकों की सेना से अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त की थी। यही कारण है कि इस दिन से शालिवाहन शक की शुरुआत होती है।

  • छत्रपति शिवाजी की जीत को याद करने के लिए कुछ लोग गुड़ी का इस्तेमाल भी करते हैं।

  • यह भी माना जाता है कि इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी। इसलिए गुड़ी को ब्रह्मध्वज भी माना जाता है। इसे इन्द्रध्वज के नाम से भी जाना जाता है।

  • मान्यता के अनुसार रामायण काल में गुड़ी पर्व के दिन भगवान श्री राम ने लोगों को वानर राज बलि के अत्याचारी शासन से मुक्ति दिलाई थी| तब वहां के लोगों ने अपने घरों में विजय ध्वज फहराया, जो आज भी फहराया जाता है। तभी से इस दिन को गुड़ी पड़वा के नाम से जाना जाता है।

  • ऐसा माना जाता है कि गुड़ी लगाने से घर में समृद्धि आती है।

  • गुड़ी को धर्म-ध्वज भी कहा जाता है; इसलिए इसके प्रत्येक भाग का अपना विशिष्ट अर्थ है उल्टा वर्ण सिर का प्रतिनिधित्व करता है जबकि दंड मेरुदंड का प्रतिनिधित्व करता है।

  • किसान इस त्योहार को रबी की फसल की दोबारा कटाई के बाद बुवाई की खुशी में मनाते हैं। वह अच्छी फसल के लिए प्रार्थना करने के लिए इस दिन खेतों की जुताई भी करते हैं।

  • हिंदुओं में पूरे वर्ष के दौरान साढ़े तीन मुहूर्त बहुत शुभ माने जाते हैं। साढ़े तीन मुहूर्त हैं- गुड़ी पड़वा, अक्षय तृतीया, दशहरा और दिवाली को आधा मुहूर्त माना जाता है।

गुड़ी पड़वा से जुड़ा इतिहास/ History related to Gudi Padwa

गुड़ी पड़वा पर्व से जुड़ी दो पौराणिक कथाएं भी प्रचलित है। पहली पौराणिक कथा भगवान श्रीराम से संबंधित है। इस मिथक के अनुसार, जब श्री रामचंद्र जी सीता माता को खोजने निकले और सुग्रीव से मिले, उस समय सुग्रीव अपने बड़े भाई से लड़ रहा था वह बाली की यातना का शिकार हुआ था। तब भगवान श्री राम ने सुग्रीव की मदद की और बाली को मार डाला और सुग्रीव को बाली से मुक्त कर दिया। इसी जीत के उपलक्ष्य में गुड़ी पड़वा उत्सव मनाया जाता है।

दूसरी पौराणिक कथा शालिवाहन से संबंधित है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन शालिवाहन ने शक को पराजित किया। इसके अलावा गुड़ी पड़वा पर शालिवाहन काल गधना शुरू हुई, जिसे शालिवाहन शक के नाम से जाना जाता है। साथ ही एक मिथक यह भी है कि शालिवाहन नाम के एक कुम्हार ने मिट्टी की सेना बनाकर शत्रुओं को परास्त किया। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के अवसर पर गुड़ी पड़वा मनाया गया। गुड़ी पड़वा के दिन से ही शालिवाहन संवत का प्रारंभ माना जाता है।

गुड़ी पड़वा की पूजा-विधि/ Puja-Vidhi of Gudi Padwa

निम्नलिखित विधि केवल मुख्य चैत्र पर ही की जाती है:

  • नया साल फल श्रवण (नए साल का राशिफल जानने के लिए)

  • तेल अभ्यंग (तेल से स्नान)

  • निम्बा पात्र प्राशन (नीम के पत्ते खाकर)

  • ध्वज आरोहण/ Flag hoisting

  • चैत्र नवरात्रि की शुरुआत/ Pujan-Mantra of Gudi Padwa

  • घट स्थापना

गुड़ी पड़वा का पूजन-मंत्र

कुछ लोग इस दिन व्रत भी रखते हैं। गुड़ी पड़वा पर पूजा के लिए सुबह व्रत संकल्प लेकर निम्नलिखित मंत्रों का पाठ करना चाहिए। 

सुबह व्रत संकल्प/ Morning Vrat Sankalp

ॐ विष्णु: विष्णु: विष्णु: आद्य ब्राह्मणो व्यास: परार्दे श्री श्वेता वरकालपे जम्बूद्वीप भारतवर्षे अमुक नाम संवत्सरे चैत्रसुख प्रतिपदी अमुक वासरा अमुक गोत्र अमुक नामहं प्रहर मनस्य नववर्ष्य प्रथम दिवे विश्वश्रीजाह श्री ब्राह्मणः

प्रसादाय व्रतं करिष्ये

पूजा के बाद व्रत रखने वाले व्यक्ति को इस मंत्र का जाप करना चाहिए:

ॐ चतुर्भीरवादनई: वेदना चतुरो भवन सुभान।

 ब्रह्म में जगंतं सृष्ट हृदये शाश्वतः वसेट।

इस तरह मनाया जाता है गुड़ी पड़वा

गुड़ी पड़वा नवरात्रि से शुरू होकर रामनवमी तक चलता है। यह त्योहार पूरे देश में भव्यता के साथ मनाया जाता है, लेकिन अलग-अलग राज्यों में इसे मनाने का तरीका अलग है। गुड़ी पड़वा पर लोग अपने घरों की सफाई करते हैं, सफाई के बाद अपने घरों को सजाते हैं। सजाने में घर के आंगन और दरवाजे पर रंगोली और बंदनवार बनाते हैं। घर के सामने एक झंडा लगा दिया जाता है जिसे गुड़ी कहते हैं। स्वास्तिक का चिन्ह एक बर्तन पर बना कर रेशमी कपड़े में लपेट कर वहीं रख दिया जाता है। साथ ही गुड़ी पड़वा पर लोग पारंपरिक कपड़े पहनकर सूर्य देव की पूजा करते हैं। इसके अलावा गुड़ी पड़वा पर राम रक्षा सूत्र, सुंदरकांड और देवी भगवती के मंत्रों का जाप करना उचित माना जाता है।

गुड़ी पड़वा मनाने की विधि/ The procedure of Observing Gudi Padwa

  • सुबह स्नान आदि के बाद गुड़ी को सजाया जाता है।

  • लोग घरों की सफाई करते हैं। गांवों में घरों को गाय के गोबर से रंगा जाता है।

  • शास्त्रों के अनुसार अरुणोदय के दिन अभ्यंग स्नान करना चाहिए।

  • सूर्योदय के तुरंत बाद गुड़ी की पूजा करने का रिवाज है। इसमें ज्यादा देरी नहीं करनी चाहिए।

  • चमकीले रंगों से सुंदर रंगोली बनाई जाती है, और घर को सजाने के लिए ताजे फूलों का उपयोग किया जाता है।

  • लोग नए और खूबसूरत कपड़े पहनकर तैयार हो जाते हैं। आमतौर पर मराठी महिलाएं इस दिन नौवारी (9 गज लंबी साड़ी) पहनती हैं और पुरुष केसरिया या लाल पगड़ी के साथ कुर्ता-पायजामा या धोती-कुर्ता पहनते हैं।

  • परिवार इकट्ठा होकर इस त्योहार को मनाते हैं और एक दूसरे को नए त्यौहार की बधाई देते हैं।

  • इस दिन नए साल का राशिफल सुनने की परंपरा है।

  • परंपरागत रूप से त्योहार की शुरुआत मीठी नीम की पत्तियों को प्रसाद के रूप में खाने से होती है। आमतौर पर इस दिन नीम के मीठे पत्ते, गुड़ और इमली की चटनी बनाई जाती है| ऐसा माना जाता है कि यह खून को साफ करता है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। इसका स्वाद इस बात का भी प्रतीक है कि जीवन चटनी की तरह खट्टा और मीठा होता है।

  • गुड़ी पड़वा में श्रीखंड, पूरन पोली, खीर आदि पकवान बनाए जाते हैं.

शाम के समय लोग लेजिम नामक पारंपरिक नृत्य भी करते हैं।

गुड़ी कैसे स्थापित करें/ How to Install Gudi

  • इस दिन सुबह उठकर बेसन का उबटन और तेल लगाया जाता है। इसके बाद स्नान किया जाता है।
  • जिस जगह पर गुड़ी लगाई जाती है, उस जगह को अच्छी तरह से साफ कर लें।

  • इसके बाद पूजा का संकल्प लेकर साफ जगह पर स्वास्तिक बना लें। इसके बाद बालू की वेदी बनाएं।

  • इसके बाद सफेद रंग का कपड़ा बिछाकर हल्दी कुमकुम से रंग दें। इसके बाद एक अष्टदल बनाएं और ब्रह्मा जी की मूर्ति की सभी नियमों और विनियमों के साथ पूजा करें।

  • अंत में गुड़ी का स्थापना करें।

  • घर में पताका और तोरण स्थापित किया जाता है।

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मनाए जाने वाले गुड़ी पड़वा के दिन घर में पताका और तोरण लगाने की परंपरा है क्योंकि गुड़ी का अर्थ है "विजय।" इसलिए लोग इस दिन अपने घरों में झंडे आदि लगाते हैं, जो उनकी और उनके परिवार की जीत का प्रतीक है। लेकिन कुछ लोग इसे घर की किसी भी दिशा और दशा में लगाते हैं, लेकिन धार्मिक और वास्तु शास्त्र के अनुसार इसे दक्षिण-पूर्व कोने यानी आग्नेय संहिता में रखना चाहिए। इस दिन आपको पताका लगाने की प्रक्रिया का भी ध्यान रखना चाहिए। साढ़े पांच हाथ वाले एक लाल पताका को पांच हाथ वाले ऊँचे खम्भे में प्रदर्शित करना चाहिए। बहुत से लोग इस दिन ध्वजा भी लगाते हैं। पताका के तीन कोने हैं, और ध्वज के चार कोने हैं। आप इन दोनों में से कोई भी लगा सकते हैं।

पताका की स्थापना करते समय किसके नाम से ध्यान करना चाहिए?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ध्वजा या पताका की स्थापना करते समय सोम दिगंबर कुमार और रुरु भैरव के नामों का ध्यान करना चाहिए और उनसे अपने ध्वजा या पताका की रक्षा के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। अपने घर की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करें। कहा जाता है कि ऐसा करने से जातक की जीत सुनिश्चित होती है, साथ ही जीवन में सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। केतु के शुभ फल भी प्राप्त होते हैं। इतना ही नहीं घर का वास्तु भी निश्चित होता है|

सूर्य संवाद पुष्पे, दीप्ति करुणा गंधने।

लाभा शुभम नव वर्ष शेस्मिन कूर्यत्सर्वस्य मंगलम।

अर्थात जैसे सूर्य प्रकाश देता है, फूल देता है, इंद्रियां देता है, करुणा सिखाता है, वैसे ही यह नव वर्ष हमें हर पल ज्ञान प्रदान करे और हमारा हर दिन, हर पल शुभ हो।

गुड़ी पड़वा दिवस से इन कार्यों में लाभ मिलेगा/ These works will get benefited from Gudi Padwa day

गुड़ी पड़वा त्योहार वसंत ऋतु में आता है। इस दिन नीम के फल और नीम के पत्तों का चूर्ण बना लें। इसके बाद नीम के मिश्रण में काली मिर्च, नमक, हींग, जीरा, चीनी और अजवाइन मिलाएं. अब इस मिश्रण का सेवन करें। इससे आप कई तरह की बीमारियों से दूर रहेंगे।

गुड़ी पड़वा पर बने व्यंजन/ Dishes made on Gudi Padwa

महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा के दिन कुछ अनोखे व्यंजन परोसने और खाने की परंपरा है। इस दिन महाराष्ट्र में पूरन पोली या मीठी रोटी बनाई जाती है. इस व्यंजन को बनाने के लिए गुड़, नीम का फूल, इमली और कच्चा आम मिलाया जाता है। इस व्यंजन का भी अपना एक दर्शन है। कहते हैं गुड़ जीवन में मिठास के लिए होता है, नीम के फूल जीवन से कटुता को दूर करते हैं, इमली और कच्चे आम जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों के प्रतीक हैं. अन्य राज्यों में भी इस पर्व को मनाने की अलग-अलग परंपराएं हैं।

गुड़ी पड़वा भारत के किन राज्यों में मनाया जाता है?/ In which states of India is Gudi Padwa celebrated?

कोंकण, गोवा और केरल में, इसे संवत्सर पावो के रूप में मनाया जाता है। कर्नाटक के बाकी कोंकणी प्रवासी इसे युगदी के नाम से जानते हैं। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की जनता इसे उगादी के रूप में मनाती है। कश्मीरी इसे नवरेह के रूप में मनाते हैं। मणिपुर में, इसे साजिबू नोंगमा पांडा या मीतेई चीरोबा के रूप में चिह्नित किया जाता है। उत्तर भारतीयों के लिए इसी दिन से चैत्र नवरात्रि शुरू हो जाते हैं। मान्यता है कि इसी दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना की थी। मनुष्य न केवल ब्रह्मा जी और उनके द्वारा बनाए गए ब्रह्मांड के प्रमुख देवताओं, यक्ष-राक्षसों, गंधवारों, ऋषि-मुनियों, नदियों, पहाड़ों, जानवरों, पक्षियों और कीट-पतंगों की पूजा करता है, बल्कि बीमारियों और उनके उपचार की भी पूजा करता है। इस दिन से एक नया त्योहार शुरू होता है। इसलिए, इस तिथि को 'नवम सावत्सर' के नाम से भी जाना जाता है। चैत्र एक ऐसा महीना है जिसमें पेड़ और लताएं फलती-फूलती हैं और खिलती हैं। शुक्ल प्रतिपदा का दिन चन्द्र कला का प्रथम दिन माना जाता है। जीवन की वनस्पति का प्राथमिक आधार चन्द्रमा द्वारा ही समरसता प्रदान की जाती है। इसे औषधियों और वनस्पतियों का राजा माना गया है।

विभिन्न स्थानों पर गुड़ी पड़वा उत्सव/Gudi Padwa Celebration in various places 

यह त्योहार देश में अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग नामों से मनाया जाता है।

  1. गोवा और केरल में कोंकणी समुदाय इसे संवत्सर पावो के रूप में मनाते हैं।

  2. कर्नाटक में इस पर्व को युगादि कहते हैं।

  3. आंध्र प्रदेश, तेलंगाना राज्यों में गुड़ी पड़वा को उगादी के रूप में मनाया जाता है।

  4. कश्मीरी हिंदू इस दिन को नवरेह के रूप में मनाते हैं।

  5. मणिपुर में इस दिन को साजिबू नोंगमा पांडा या मैतेई चीरा ओबा कहा जाता है।

  6. चैत्र नवरात्रि भी इसी दिन से शुरू होते हैं।

इस दिन महाराष्ट्र में लोग गुड़ी के लिए आवेदन करते हैं। इसलिए इस पर्व को गुड़ी पड़वा कहा जाता है। चांदी, तांबे या पीतल का एक उल्टा कलश उसके ऊपर बांस से रखा जाता है और उसे सुंदर कपड़े से सजाया जाता है। आमतौर पर यह कपड़ा केसरिया रंग और रेशम का होता है। गुड़ी को फिर गाठी, नीम के पत्ते, आम के डंठल और लाल फूलों से सजाया जाता है।

गुड़ी को दूर से देखने के लिए घर की छत जैसे ऊंचे स्थान पर रखा जाता है। कई लोग इसे घर के मुख्य दरवाजे या खिड़कियों पर भी लगाते हैं।

जीवन में शांति, सुख, समृद्धि, धन और मान सम्मान की प्राप्ति के लिए इस दिन करें यह कार्य।

  • पूजा का शुभ संकल्प लेने के बाद नवनिर्मित चौकी या बालू की वेदी पर एक साफ सफेद कपड़ा बिछाएं और उस पर केसरिया हल्दी से अष्टदल कमल बनाएं और उस पर ब्रह्माजी की स्वर्ण मूर्ति स्थापित करें।

  • गणेश अम्बिका की पूजा करने के बाद 'ॐ ब्रह्मणे नमः' मंत्र से ब्रह्माजी की पूजा करें और षोडशोपचार की पूजा करें।

  • शाश्वत बाधाओं के विनाश के लिए ब्रह्माजी से विनम्र प्रार्थना की जाती है। वर्ष के कल्याण और वर्ष के शुभ रहने के लिए भी प्रार्थना की जाती है 

'भगवान सत्त्व प्रसादें वर्षा क्षेम्मीहस्तु में। संवत्सरोपासर्ग मे विलायम यंतवशेषत:

  • पूजा करने के बाद ब्राह्मणों को तरह-तरह के सूक्ष्म और सात्विक पदार्थ खिलाकर ही भोजन करना चाहिए।

  • उस वर्ष के राजा, मंत्री, सेना प्रमुख आदि और नए कैलेंडर से वर्ष के परिणाम को सुनना चाहिए।

  • क्षमता के अनुसार पंचांग दान करना चाहिए और जलाशय की स्थापना करनी चाहिए।

  •  इस दिन आपको नया कपड़ा पहनना चाहिए और घर को ध्वज, पताका, वंदनवर आदि से सजाना चाहिए।

  • गुड़ी पड़वा के दिन नीम के पत्तों और फूलों का चूर्ण बनाकर उसमें काली मिर्च, नमक, हींग, जीरा, मिश्री और अजवाइन मिलाकर खाना चाहिए। इससे रक्त विकार नहीं होता और स्वस्थ जीवन की प्राप्ति होती है।

  • इस दिन नवरात्रि के लिए घट स्थापना और तिलक व्रत भी किया जाता है। इस व्रत में किसी नदी, सरोवर या घर की पूजा करनी चाहिए और संवत्सर की मूर्ति बनाकर चैत्रय नमः, वसंताय नमः आदि मंत्रों से उसकी पूजा करनी चाहिए. इसके बाद पूजा करनी चाहिए.

  • नवमी का व्रत करने के बाद शुभकामनाओं का फल पाने के लिए मां जगदंबा की हृदय से पूजा करनी चाहिए।

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अक्षय तृतीया
03 May, 2022

वैशाख शुक्ल तृतीया को अक्षय तृतीया या आखा तीज के नाम से जाना जाता है। यह सनातन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण पर्व है। इस दिन जो कोई भी अन्नदान करता है, शुद्ध जल से स्नान करता है और विभिन्न अनुष्ठान करता है, उसे किसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता है। यही कारण है कि इस पर्व का नाम 'अक्षय तृतीया' रखा गया है। आज के दिन कोई भी व्यक्ति पंचांग को देखे बिना विभिन्न पवित्र कार्य कर सकता है। इस त्योहार को 'अखतजी' के नाम से भी जाना जाता है। पारंपरिक और शास्त्रीय शास्त्रों में लिखे गए सत्य के अनुसार इस दिन से 'सतयुग' और त्रेतायुग का ही आरंभ होता है। आज के दिन किया गया कोई भी अनुष्ठान, जिसमें 'पूजा' या 'शुद्ध जल से स्नान करना' शामिल है, निश्चित रूप से फलदायी होगा। इसलिए इसे अक्षय तृतीया के नाम से भी जाना जाता है। यह दिन यदि सोमवार और रोहिणी नक्षत्र के दिन पड़े तो यह बहुत उपयोगी बताया गया है। इस दिन चावल, नमक, घी, चीनी, सब्जी, फल, इमली और वस्त्र का दान करना बहुत महत्वपूर्ण और फलदायी माना जाता है।

हर वर्ष इस पर्व पर बजरंगी धाम में चुनिंदा अनुयायियों के लिए एक छोटी पूजा और अनुष्ठान के द्वारा अक्षय तृतीया उत्सव का आयोजन किया जाता है। जिसके द्वारा बहुत सारे अनुयायी लाभान्वित होते हैं|   

अक्षय तृतीया मुहूर्त/ Akshaya Tritiya Muhurat

  • वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया प्रातःकाल हो तो इसे प्रथमार्ध कहते हैं।

  • अब यदि तृतीया तिथि लगातार दो दिन प्रातःकाल आती है तब अगले दिन ही यह पर्व मनाया जाता है। हालांकि, यह भी कुछ लोगों द्वारा माना जाता है कि यह त्योहार केवल तभी मनाया जाएगा जब यह विशेष तिथि सूर्योदय से तीन मुहूर्त पर या अधिक हो।

  • तृतीया तिथि पर, माना जाता है कि रोहिणी नक्षत्र सोमवार या बुधवार को पड़ता है; यह अत्यंत लाभकारी और फलदायी माना जाता है।

अक्षय तृतीया का महत्व/ Akshay Tritiya's Importance

इस दिन कोई भी शुभ अनुष्ठान करना अत्यंत फलदायी प्रतीत होता है। सभी को गरीबों या जरूरतमंदों को भोजन या वस्त्र दान करना चाहिए; इससे आपके अच्छे कामों में इजाफा होगा। शादीशुदा लोगों के लिए यह लगभग जरूरी माना जाता है। ऐसा करने से आपकी आर्थिक स्थिति में काफी वृद्धि होती है।  अक्षय तृतीया के इस खूबसूरत और शुभ दिन पर धार्मिक कार्यों के लिए भी दान करना चाहिए। ऐसा करने से आपकी दौलत भी दोगुनी हो जाएगी।

  1. अक्षय तृतीया का यह दिन साढ़े तीन मुहूर्तों में से एक है जिसे सबसे शुभ माना जाता है। इस दिन कई महान और आशावादी कार्य किए जाते हैं

  2. गंगा स्नान करना भी शुभ माना जाता है। जो लोग इस दिन गंगा स्नान करते हैं, वह सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं|

  3. यह भी माना जाता है कि 'इस दिन पितृ श्राद्ध भी किया जाता है। किसी भी ब्राह्मण को जौ, दही-चावल और दुग्ध उत्पादों सहित अन्य खाद्य पदार्थों का दान करना चाहिए|

  4. इस दिन अपने पूर्वजों के नाम पर श्राद्ध' और 'तर्पण' करने का अच्छा समय है और वह भी कम उम्र में।

  5. लोग यह भी मानते हैं कि इस दिन सोना खरीदना फायदेमंद होता है।

  6. इस दिन परशुराम और हयग्रीव ने अवतार लिया था।

  7. त्रेतायुग की शुरुआत इसी दिन से होती है।

  8. श्री बद्रीनाथ जी के कपाट पूरे दिन खुले रहते हैं।

अक्षय तृतीया व्रत और पूजा विधि/Akshaya Tritiya fast and worship method

  • इस दिन व्रत और स्नान करने वाले की शुद्धि होती है उनको पीले रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए।

  • मंदिर में, विष्णु को गंगा जल से स्नान कराकर तुलसी को पीले फूलों की माला या पीले फूल का भोग लगाना चाहिए।

  • अगरबत्ती जलाएं, और पीले रंग के आसन पर बैठे और विष्णु से संबंधित पवित्र मंत्रों, विष्णु सहस्त्रनाम और विष्णु चालीसा का जाप करें, और अंत में विष्णु की आरती पढ़ें।

  • इस दिन विष्णु के नाम पर गरीबों को भोजन कराना या भोग लगाना विशेष रूप से अच्छा होता है।

  • ध्यान रखें-यदि पूरे दिन उपवास में रहना संभव न हो तो आप मीठा हलवा, केला और मीठे पीले चावल खा सकते हैं।

अक्षय तृतीया मनाने के पीछे का कारण/ The reason behind the celebration of Akshaya Tritiya

हिंदू धर्म में अक्षय तृतीया को लेकर कई मान्यताएं और विचार हैं। जिनमें से कुछ हैं:

  1. भगवान परशुराम, जो भगवान विष्णु के छठे अवतार हैं। परशुराम का जन्म महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका देवी से हुआ था। इसी वजह से अक्षय तृतीया के दिन भगवान विष्णु की भी पूजा की जाती है. साथ ही परशुराम जी की भी पूजा की जाती है।

  2. माँ गंगा स्वर्ग से विदा हुई। गंगा को धरती पर उतारने के लिए राजा भगीरथ ने सदियों तक हजारों वर्षों तक तपस्या की थी। इस दिन विशेष रूप से पवित्र गंगा में डुबकी लगाने से मनुष्य के सभी दुराचार नष्ट हो जाते हैं

  3. इस दिन मां अन्नपूर्णा का जन्मदिन भी मनाया जाता है। गरीबों को खाना खिलाया जाता है। माँ अन्नपूर्णा भोजन के स्वाद का आशीर्वाद देते हैं, अपनी रसोई को पूरा करने के लिए उनकी पूजा करनी चाहिए|

  4. अक्षय तृतीया के दिन महर्षि वेद व्यास जी ने महाभारत लिखना शुरू किया था। इसे पांचवां वेद माना जाता है। सशक्त श्रीमद्भागवत गीता भी इसमें शामिल है। अक्षय तृतीया के दिन श्रीमद्भागवत गीता के 18वें अध्याय का पाठ करना चाहिए।

  5. बंगाल में व्यापारी, सर्वशक्तिमान भगवान गणेश और माता लक्ष्मी जी की पूजा करके अपना खाता शुरू करते हैं। और इसलिए इस दिन को 'हलखाता' के नाम से भी जाना जाता है।

  6. भगवान शंकर जी ने इस दिन भगवान कुबेर और माता लक्ष्मी को सर्वोपरि बनाने का सुझाव दिया था। इसलिए अक्षय तृतीया के दिन माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है यह रिवाज आज भी जारी है|

  7. अक्षय तृतीया के दिन पांडव के पुत्र युधिष्ठिर को भी अक्षय पात्र मिला था। इसकी खास बात यह है कि इसमें हमेशा भरपूर मात्रा में भोजन होता है।

  8. पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन नर-नारायण, परशुराम और हयग्रीव का अवतार हुआ था। इसलिए कुछ लोगों के अनुसार नर-नारायण की रक्षा के लिए, परशुराम और हयग्रीव जीजौ, गेहूं, खीरा और भीगी हुई चने की दाल का सत्तू अर्पण के रूप में देते हैं।

अक्षय तृतीया कथा/Akshaya Tritiya Katha

अक्षय तृतीया का महत्व युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा था। तब श्रीकृष्ण ने कहा, 'राजन! यह तिथि विशेष रूप से नैतिक है। जो कोई भी आज के दिन दोपहर के ठीक पहले स्नान करके अनुष्ठान करता है, घर में मंत्रोच्चार करता है और दोपहर से पहले दान करता है, वह अक्षय पुण्य फल प्राप्त करता है। इस दिन से सतयुग की शुरुआत होती है।

इस अवसर से जुड़ी एक प्रसिद्ध कहानी है- पुराने समय में धर्मदास नाम का एक वैश्य था जो सत्यनिष्ठा में विश्वास करता था। उनका परिवार बहुत बड़ा था। इसलिए अपने परिवार का लालन पालन करने के लिए वह हमेशा परेशान रहता था। तब उसने एक व्यक्ति से इस उपवास के महत्व का पता लगाया। बाद में, जब यह त्योहार मनाया गया, तब उसने पवित्र गंगा में स्नान किया और विधि पूर्वक सर्वशक्तिमान की पूजा की। ब्राह्मणों को लड्डू, पंखा, पानी से भरे जग, जौ, गेहूं, नमक, सत्तू, दही, चावल, गुड़, सोना और कपड़े जैसी कई चीजें दान की। 

स्त्री को नीचा दिखाने के बाद भी, परिवार के सदस्यों के लिए चिंतित होने और बुढ़ापे के कारण कई बीमारियों से पीड़ित होने के बाद भी, वह अपने भक्ति कार्य और दान करने के कारण, यह वैश्य अपने अगले जन्म में कुशावती का राजा बना। अक्षय तृतीया के दान के परिणाम के कारण उसने अमीर और सुंदर व्यक्ति के रूप में जन्म लिया। इस जन्म में अमीर होने पर भी धर्म के कार्यों से उसका मन से कभी नहीं हटा।

इतने अच्छे कर्मों के कारण ईश्वर ने उसको साक्षात दर्शन दिए|

इस दिन श्री बद्रीनारायण के कपाट खुले रहते हैं। श्री बांके बिहारी जी का मंदिर वृंदावन में स्थित है, और इस दिन ही 'श्री विग्रह' के चरण देखने को मिलते हैं अन्य दिनों में वह पूरे साल कपड़ों में लिपटे रहते हैं। इस दिन, ठाकुर जी और बद्रीनारायण जी की तस्वीर को सिंहासन पर बिठाते हैं उन्हें भीगी हुई चने की दाल और मिश्री देते हैं। कहा जाता है कि इसी दिन भगवान परशुराम का अवतार भी हुआ था।

दान दक्षिणा का त्यौहार/ Charity-Oriented Festival

यह विशिष्ट त्योहार, दान उन्मुख प्रतीत होता है। इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था और इसी दिन द्वापर युग का भी अंत हुआ था। इस दिन सत्तू का सेवन करना चाहिए और नए कपड़े और गहने पहनने चाहिए। अक्षय तृतीया के दिन गाय, भूमि, सोने के पात्र आदि का दान अवश्य करना चाहिए, यह अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है।पंचांग के अनुसार इस दिन वसंत ऋतु की समाप्ति और ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत भी होती है। इस दिन को दान का महापर्व भी माना जाता है। पुराणों के अनुसार इस दिन दान करने वाले व्यक्ति को बैकुंठ धाम में स्थान मिलता है। 

आइए देखते हैं अक्षय तृतीया के दिन क्या करें/ What to donate on the day of Akshaya Tritiya –

  • कोई भी नया काम शुरू करने के लिए इस दिन को शुभ माना जाता है।

  • इस दिन भगवान विष्णु को सत्तू का भोग लगाया जाता है और प्रसाद में दिया जाता है।

  • अक्षय तृतीया के दिन तिल, जौ और चावल का दान विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

  • इस दिन बद्रीनाथ को नया चावल चढ़ाने से सारे सपने पूरे होते हैं।

  • इस दिन सम्मान और श्राद्ध देने से और पूर्वजों या पूर्वजों के संबंध में अनुष्ठान करने से अक्षय पुण्य मिलता है।

  • मिट्टी के दो घड़े में जल भरकर एक घड़े में एक साथ और दूसरे में तिल्ली डालकर ब्रह्मा, विष्णु और शिव स्वरूप में इन घड़ों की पूजा करके ब्राह्मणों को दान कर देना चाहिए। ऐसा करने से हमारे पूर्वज हमें सभी मनोकामनाएं पूरी करने का आशीर्वाद देते हैं।

  •  इस दिन गरीबों को चावल, नमक, घी, फल, कपड़े, मिष्ठान आदि का दान करना चाहिए और व्रत रखना चाहिए|

  • अक्षय तृतीया पर गरीब, असहाय लोगों को भोजन अवश्य कराना चाहिए।

  • इस दिन खरबूजे और मटकी का दान भी सार्थक बताया गया है।

  • अक्षय तृतीया पर गंगा स्नान का विशेष महत्व है। इस दिन पवित्र गंगा में स्नान करने, जौ खाने से, जौ, सत्तू देने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। इस दिन भगवान कृष्ण की मूर्ति पर चंदन या इत्र भी लगाया जाता है।

  • कोई भी शुभ और मांगलिक कार्य कर सकते हैं

अपना समय और प्रयास पवित्र कार्य करने में लगा सकते हैं|

इस त्यौहार के महत्व और तीव्रता को इसी बात से  मापा जा सकता है कि इस दिन किसी को पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं होती है; विवाह, गृह प्रवेश, खरीदारी, गहने, घर या वाहन आदि खरीदने जैसे कोई शुभ कार्य किए जा सकता है। जैसा कि पुराणों में उल्लेख है कि इस दिन अपने पिता और पूर्वजों को दिया गया दान अक्षय फल देता है। लोग इस दिन गंगा में स्नान करते हैं क्योंकि ऐसा माना जाता है कि भगवान की पूजा करने से उनके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। यह भी माना जाता है कि यदि कोई व्यक्ति इस दिन अपने पाप स्वीकार करता है और भगवान से क्षमा मांगता है, तब उसे सर्वशक्तिमान ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

अक्षय तृतीया पर क्यों खरीदा जाता है सोना?/ Why is Gold brought on Akshaya Tritiya?

  • लोग अक्सर अक्षय तृतीया के दिन को कोई भी पवित्र कार्य करने के लिए चुनते हैं, क्योंकि इस दिन किसी भी शुभ कार्य को करने या कुछ नया खरीदने के लिए किसी मुहूर्त की जांच करने की आवश्यकता नहीं होती है। ऐसा माना जाता है कि यह दिन ग्रहों के संदर्भ में वास्तव में अलग दिन है और इस दिन किया गया कोई भी कार्य सकारात्मक परिणाम देता है।

  • यह भी माना जाता है कि अगर आप इस दिन सोना खरीदते हैं, तब यह आपके जीवन में हमेशा के लिए भाग्य लाता है; शुभ परिणाम आपके और आपके पूरे परिवार और करीबी लोगों को मिलता है। इस दिन खरीदा गया सोना आपके परिवार की सभी पीढ़ियों के साथ बढ़ता रहेगा।

  • सोना वैदिक काल से सबसे मूल्यवान धातु में शामिल है। सोना न केवल धन और समृद्धि का प्रतीक है, बल्कि समय के साथ इसकी कीमत भी बढ़ती जाती है।

  • इसी दिन सूर्य की किरणें तीव्रता के साथ पृथ्वी पर पड़ती है। इसके साथ ही यह भी माना जाता है कि इस दिन सोना खरीदना शक्ति का प्रतीक है क्योंकि इसकी तुलना सूर्य की तेज किरणों से की जाती है।

अक्षय तृतीया पर क्या करें और क्या न करें/ Things to do and not to do on Akshay Tritiya

अक्षय तृतीया को युगादि तिथि कहा जाता है। इस दिन को दो युगों की शुरुआत और दूसरे के अंत के रूप में चिह्नित किया जाता है। इस दिन को बहुत महत्व दिया गया है, जैसा कि वैदिक ग्रंथों और शास्त्रों में बताया गया है। इसलिए, इस दिन, भक्त एक साथ इकट्ठा होते हैं और पवित्र नदियों, तालाबों और समुद्रों में बड़ी संख्या में स्नान करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन किया गया पवित्र स्नान कष्टों को दूर करके सुखी जीवन की ओर ले जाता है। अक्षय तृतीया के दिन, अनुष्ठान करने और शुद्ध गंगा में डुबकी लगाने से पापों और बुराईयों से छुटकारा मिलता है। यह अपना काम शुरू करने के लिए एक महान दिन के रूप में चिह्नित क्या जाता है। हालांकि, कुछ ऐसे काम हैं जो इस दिन किसी को नहीं करना चाहिए ।

अक्षय तृतीया पर करने के लिए चीजें/ Things to do on Akshay Tritiya 

  • पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, अक्षय तृतीया के दिन तर्पण, पिंडदान, पिता और पूर्वजों के लिए किया गया कोई अन्य दान अक्षय फल सुनिश्चित करता है। ऐसा करने से व्यक्ति अपने पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त कर सकता है।

  • इस दिन गंगा में स्नान करने या किसी पवित्र नदी में स्नान करने और भागवत की पूजा करने से सभी पापों और पापों का नाश हो जाता है। अक्षय तृतीया के दिन मंत्र जाप, तप, हवन, स्वाध्याय और दान-पुण्य करने से अक्षय फल की प्राप्ति होती है।

  • यदि यह दिन सोमवार और रोहिणी नक्षत्र को आए तो इस दिन दान, जाप करने से इस दिन का फल और भी अधिक फलदायी होता है। यदि यह तिथि तृतीया के मध्याह्न से पहले प्रारंभ होकर प्रदोष काल तक रहती है तब यह उत्तम समय है। इस दिन भगवान सभी पापों को क्षमा करते हैं। अक्षय तृतीया के दिन, हठजोड़ का प्रदर्शन किया जा सकता है, और लक्ष्मी को आमंत्रित करने के लिए साधना करनी चाहिए।

  • अक्षय तृतीया पर दान करने वाले व्यक्ति को बैकुंठ धाम में स्थान मिलता है। इसलिए इसे दान का एक बड़ा कारण माना गया है। इस दिन गंगा स्नान के बाद व्यक्ति को जौ का दान करना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।

  • अक्षय तृतीया पर कलश का दान और पूजा करने से अक्षय फल मिलता है। जल से भरे इस कलश को मंदिर या किसी जरूरतमंद को दान करने से ब्रह्मा, विष्णु और महेश की कृपा प्राप्त होती है। साथ ही पितरों और पितरों को भी नवग्रह की सिद्धि और शांति मिलती है।

  • अक्षय तृतीया पर दान करने वाले व्यक्ति को बैकुंठ धाम में स्थान मिलता है। इसलिए इसे दान का एक बड़ा कारण माना गया है। इस दिन गंगा स्नान के बाद व्यक्ति को जौ का दान करना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।

  • अक्षय तृतीया पर कलश का दान और पूजा करने से अक्षय फल मिलता है। जल से भरे इस कलश को मंदिर या किसी जरूरतमंद को दान करने से ब्रह्मा, विष्णु और महेश की कृपा प्राप्त होती है। साथ ही पितरों और पितरों को भी नवग्रह की सिद्धि और शांति मिलती है।

  • धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अक्षय तृतीया पर श्री रामचरितमानस का पाठ करना चाहिए। साथ ही भगवान विष्णु के दशावतार की कथा भी पढ़नी चाहिए। इन्हें पढ़ने पर आपको ऋषि-मुनियों के दर्शन का फल मिलता है।

  • अक्षय तृतीया के दिन तुलसी की जड़ में दूध अवश्य डालें। तुलसी के पत्ते के बिना भगवान विष्णु की पूजा अधूरी मानी जाती है। ऐसा करने से व्यक्ति को भगवान विष्णु का अत्यंत शुभ आशीर्वाद प्राप्त हो सकता है

इस दिन क्या न करें/ Things not to do on this day

  • अक्षय तृतीया एक विशेष संयोग है; इसलिए इस दिन साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए। घर को साफ सुथरा रखें, और आपका पूजा कक्ष भी बेहद साफ-सुथरा होना चाहिए। श्रीहरि की स्वच्छ वस्त्रों में पूजा करने का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन उपनयन संस्कार करना वर्जित है। माना जाता है कि इससे अशुभ फल की प्राप्ति होती है। इस दिन पहली बार जनेऊ न पहनें। इस दिन कुछ स्थानों पर यात्रा करना भी शुभ नहीं माना जाता है। अक्षय तृतीया पर नया घर खरीदना शुभ है, लेकिन नया निर्माण कार्य शुरू नहीं करना चाहिए। इस दिन पेड़ लगाना भी शुभ नहीं होता है।

  • यदि अक्षय तृतीया के दिन कोई जरूरतमंद आ जाए तो उसे खाली हाथ न जाने दें। अक्षय तृतीया के दिन दान करना अत्यंत फलदायी और पुण्यदायी होता है। इस दिन किया गया दान अक्षय होता है, यानी यह कई जन्मों के लिए लाभ देता है।

  • अक्षय तृतीया पवित्र गतिविधियों को करने का दिन है। इस दिन कोई भी ऐसा काम न करें जिससे किसी का दिल दुखा हो। साथ ही किसी से कड़वी बात करना किसी भी दिन अच्छा नहीं माना जाता है। इस दिन सिर्फ अपने स्वार्थ के बारे न सोचें। अगर आप दूसरों को चोट पहुंचाते हैं, तब देवी लक्ष्मी आपको कभी आशीर्वाद नहीं देंगी।

  • यदि अक्षय तृतीया का पर्व रविवार को हो तब  इस दिन तुलसी का पत्ता नहीं तोड़ना चाहिए। भगवान विष्णु को तुलसी अर्पित करने के लिए एक दिन पहले उसे तोड़ लें। इस दिन तुलसी पूजन को विशेष माना जाता है।

  • भविष्य पुराण में कहा गया है कि अक्षय तृतीया पर उपनयन संस्कार नहीं करना चाहिए। इस दिन पहली बार जनेऊ बिल्कुल नहीं पहनना चाहिए। ऐसा करना अशुभ माना जाता है।

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गुरू पूर्णिमा/ Guru Purnima
13 Jul, 2022

हिंदू संस्कृति में, गुरु को भगवान के समान का दर्जा दिया जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वह गुरु ही होता है जो दुनिया में हर तरह की समस्या का सामना करना सिखाता है और हर मुश्किलों हल करने में मार्गदर्शन करता है। गुरु का ज्ञान प्राप्त करने और दिखाए गए मार्ग पर चलने से व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त होता है। शास्त्रों के अनुसार यदि भगवान आपको श्राप दे तो गुरु आपको बचा सकता है, लेकिन खुद भगवान गुरु के द्वारा दिए गए श्राप से आपकी रक्षा नहीं कर सकते। इसलिए कबीर जी का एक दोहा इस बात को साबित करता है -
गुरु गोबिंद दोनो खडे, काके लागू पाय।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविन्द दियो बताय।


इस त्योहार हर साल आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा/ guru purnima के नाम से मनाया जाता है। इस त्योहार पर खास तौर पर गुरुओं की पूजा की जाती है। भारत में इस पर्व को बहुत ही सम्मान के साथ मनाया जाता है। प्राचीन काल में इस पर्व का महत्व और भी ज्यादा था। उस वक्त शिष्य गुरु के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा प्राप्त करते थे। गुरु पूर्णिमा के दिन सभी शिष्य पूरी भक्ति के साथ अपने गुरु की पूजा करते थे और उनको दिए गए ज्ञान के लिए धन्यवाद देते थे।
इस दिन घर के बड़ों जैसे माता-पिता, भाई-बहन आदि को गुरु माना जाता है और उनसे आशीर्वाद लेकर दिन की शुरुआत की जाती है। भारत में सभी गुरुओं का बहुत सम्मान किया जाता है क्योंकि गुरु ही वह मानव होता है जो अपने शिष्य को सही और गलत रास्ते का फर्क बताता है और यदि कोई किसी गलत रास्ते पर है तो उसे निकाल कर सही दिशा में ले जाते हैं। पौराणिक काल में बहुत सारी कहानियां प्रचलित हैं, जो बताती हैं कि किसी को भी सफल बनाने में गुरु का उल्लेखनीय योगदान होता है। इस दिन को मनाने के पीछे का एक कारण यह भी माना जाता है कि इसी दिन ब्रह्मसूत्र, महाभारत, श्रीमद्भागवत और अठारह पुराणों जैसे महान साहित्य की रचना करने वाले महान गुरु महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। महर्षि वेदव्यास को सभी गुरुओं के गुरु माना जाता है इसलिए इस दिन का एक खास महत्व होता है। इस दिन सभी शिष्य अपने-अपने गुरुओं का आशीर्वाद लेते हैं। वह उनका धन्यवाद करते हैं कि उन्होंने अभी तक बहुत कुछ सीखा है और आगे भी सीखना चाहते हैं। 
बजरंगी धाम में हम 24 जुलाई, 2021 को सुबह लगभग 9 बजे चुनिंदा अनुयायियों के लिए एक छोटी पूजा अनुष्ठान का आयोजन करेंगे और गुरु पूर्णिमा उत्सव मनाएंगे। हर वर्ष हम ऐसा आयोजन करते हैं और आगे भी करते रहेंगे जिससे सभी को रिद्धि और सिद्धि प्राप्त हो।

गुरु का अर्थ क्या है?/ What is the Meaning of Guru?
शास्त्रों में, 'गु' का अर्थ है अंधकार, और 'रु' का अर्थ है 'प्रकाश' जो अंधकार को जड़ से खत्म कर देता है। सभी गुरुओं को गुरु इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह अज्ञानता को दूर करते हैं। इस वाक्य का अर्थ यह है कि वह 'गुरु' ही होता है जो मानव को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। गुरु को ईश्वर के समान माना गया है। इस श्रद्धा के पीछे का कारण यह है कि यह रिश्ता पूरी तरह से आध्यात्मिक प्रगति और ज्ञान की प्राप्ति के लिए है।

गुरु-शिष्य परंपरा की शुरुआत/The Beginning of Guru-Shishya Tradition 
शास्त्रों और कुछ पौराणिक कथाओं/guru purnima Story के अनुसार, सबसे पहले श्री परमेश्वर ने नारायण को विष्णु के नाम से पुकारा और उन्हें 'ॐ ' के रूप में महामंत्र का जाप करने का आदेश दिया। कुछ समय पश्चात, ब्रह्मा जी को अज्ञान से मुक्त करने के लिए, भगवान ने अपने हृदय से योगियों के ज्ञान को श्री रुद्र के सामने प्रकट किया। फिर उन्होंने ब्रह्मा जी की अंतरात्मा को शुद्ध करने के लिए 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जाप करने का ज्ञान देकर ब्रह्मा के अंधकार को शुद्ध किया। इस प्रकार शिष्य को अंधकार के स्थान पर प्रकाश की ओर ले जाना गुरुत्व कहलाता है। 

गुरु पूर्णिमा का महत्व/ The Importance of Guru Purnima
इस पर्व पर बहुत सारे लोग अपने गुरु या फिर संतों की विधि के अनुसार पूजा करते हैं। वह उनकी पादुका को सामने रख दिया, फूल, अक्षत, चंदन, नैवेद्य आदि के साथ पूरे रीति रिवाज के साथ गुरु की पूजा/ Guru Puja करते हैं।
जो अंधकार को मिटाकर प्रकाश की ओर ले जाता है, वह 'गुरु' कहलाता है। माता-पिता भले ही बच्चे को जन्म देते हैं, लेकिन गुरू उसे जीवन और दुनिया का अर्थ समझाने का काम करता है जिससे वह अपने आगे का जीवन सफलता से व्यतीत कर सके। कई शास्त्रों में गुरु को ब्रह्म इसलिए कहा गया है क्योंकि जैसे ब्रह्म जीव बनाता है, उसी तरह गुरु, एक व्यक्ति को अच्छा इंसान बनाता है। हमारी आत्मा ईश्वर के रूप में सत्य का ढूंढने के लिए बेताब रहती है, और यह मिलान गुरु की शिक्षा के बिना हो ही नहीं सकता। इसलिए मनुष्य को हर जन्म में गुरु से शिक्षा करनी पड़ती है। 
अठारह पुराणों की रचना करने वाले महान साहित्य महर्षि वेद व्यास जी का जन्म आषाढ़ पूर्णिमा को हुआ था। ऐसी मान्यता है कि वेदव्यास ऋषि पराशर के पुत्र थे। हिंदू शास्त्रों के अनुसार महर्षि व्यास तीनों काल के स्वामी थे। उनको अपनी दिव्य दृष्टि से देखकर पता चल गया था कि कलयुग में लोगों की धर्म के प्रति रुचि कम हो सकती है। धर्म में रुचि न होने के कारण मनुष्य ईश्वर को न मानने वाला, कर्तव्य विहीन, कम उम्र और बिना नैतिकता का होगा। उन्हें पहले ही पता चल गया था कि मानव के लिए एक विस्तृत और संपूर्ण वेद का अध्ययन करना आसान नहीं होगा। इसलिए महर्षि व्यास ने वेदों को चार भागों में विभाजित किया ताकि अल्प बुद्धि और अल्प स्मृति शक्ति वाले लोग भी वेदों के अध्ययन से लाभान्वित हो सकें और अपने जीवन में एक दृष्टि बना सकें। व्यास जी ने वेदों को अलग-अलग भागों में विभाजित करके ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का नाम दिया। इन सभी वेदों को वेद व्यास ने बांटा था इसलिए इनका नाम वेद व्यास जी के नाम से ही प्रसिद्ध हुए। उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद अपने प्रिय शिष्यों वैशम्पायन, सुमंतमुनि, पाल और जामिन को दिए। 
वेदव्यास जी ने पंचम वेद के रूप में पुराणों की रचना की थी जिसमें वेदों के ज्ञान को रोमांचक कहानियों के रूप में लोगों तक पहुंचाने का प्रयास था क्योंकि वेदों में जो भी बातें कही गई थी उन्हें समझना असाधारण रूप से रहस्यमय और चुनौतीपूर्ण थी। उन्होंने पुराणों का ज्ञान अपने शिष्य रोमहर्षण को दिया। व्यास जी के शिष्यों ने अपनी बुद्धि शक्ति के अनुसार, वेदों को कई शाखाओं और उप-शाखाओं में विभाजित किया। महर्षि व्यास ने महाभारत की रचना भी की थी। वह  हमारे आदि-गुरु माने जाते हैं। गुरु पूर्णिमा का यह प्रसिद्ध पर्व व्यास जी की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। इसलिए इस पर्व/Festival को व्यास पूर्णिमा/ Vyasa Purnima के नाम से जाना जाता है।

गुरु पूर्णिमा का प्राचीन महत्व क्या है?/ What is the Ancient Importance of Guru Purnima?
विभिन्न हिंदू पौराणिक वेदों के अनुसार, गुरु को त्रिदेवों से सर्वोपरि भी कहा गया है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि गुरु ही व्यक्ति को सही दिशा दिखाते हैं और अपने शिष्य का मार्गदर्शन भी करते हैं। इस पर्व/Festival को मनाने की प्रथा प्राचीन काल के समय से चलती आ रही है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, गुरु को भगवान का दर्जा दिया जाता था और उन्हें दक्षिणा के रूप में अपार श्रद्धा और सेवा दी जाती थी।
इस दिन गोवर्धन जी की परिक्रमा का भी विधान है। गोवर्धन उत्तर प्रदेश राज्य में स्थित है। यह भी देखा गया है कि इस दिन लोग पवित्र नदियों, कुंडों और तालाबों में स्नान करते हैं और अपने इच्छा अनुसार दान भी देते हैं।
गुरु की महिमा है अगम, गाकर तरता शिष्य
गुरु काल का अनुमान कर, गढ़ता आज भविष्य

वैदिक ग्रंथ में भगवान शिव को प्रथम गुरु माना गया है/ Lord Shiva is considered to be the Maiden Guru in Vedic Grantha. 
पुराणों के अनुसार भगवान शिव को प्रथम गुरु माना गया है। शनि और परशुराम उनके दो शिष्य हैं। शिवजी ने पृथ्वी पर सबसे पहले सभ्यता और धर्म का प्रचार किया, इसलिए उन्हें आदिदेव और आदि गुरु कहा जाता है। शिव को आदिनाथ भी कहा जाता है। आदिगुरु शिव ने शनि और परशुराम के साथ सात लोगों को ज्ञान दिया। इन्हें बाद में सात महर्षि कहा गया, बाद में उन्होंने शिव के ज्ञान को चारों ओर फैला दिया। 

शिष्य गुरु पूजा/ Shishya Worship Guru
गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व/Festival पर शिष्य अपने गुरुओं की पूजा करते हैं और गुरुओं को उपहार स्वरूप कुछ दान और दक्षिणा भी देते हैं और उनके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। प्रत्येक युग में, गुरु का अधिकार कण-रूपी परब्रह्म की तरह हर जगह व्याप्त रहा है। बिना गुरु के संसार अज्ञान की रात मात्र है।

गुरु पूर्णिमा पूजा की विधि/ Method of Guru Purnima Puja
शास्त्रों में गुरु पूर्णिमा पर गुरु पूजा/Guru puja की विधि का वर्णन इस प्रकार किया गया है कि सुबह भगवान विष्णु, शिव, गुरु बृहस्पति और महर्षि वेदव्यास की पूजा करने के बाद आपको अपने गुरु को प्रणाम करना चाहिए। कुछ लोग अपने अपने गुरुओं को फूलों की माला पहना कर, और नए कपड़े तोहफे के रूप में देकर उनसे आशीर्वाद लेते हैं।
•         गुरु पूर्णिमा पर केवल गुरु ही नहीं बल्कि परिवार में किसी भी बड़े यानी माता-पिता, भाई-बहन आदि को भी गुरु के बराबर मान कर उनसे आशीर्वाद लें।
•         गुरु की कृपा से ही विद्यार्थी को ज्ञान की प्राप्ति होता है। उसके हृदय का अज्ञान और अंधकार दूर हो जाता है।
•         केवल गुरु का आशीर्वाद ही मानवता के लिए लाभकारी, ज्ञानवर्धक और उपयोगी साबित होता है। संसार का सारा ज्ञान गुरु की कृपा से ही प्राप्त होता है।
•         गुरु से मंत्र प्राप्त करने के लिए इस दिन को श्रेष्ठ माना गया है।
•         इस दिन जितना हो सके गुरुओं की सेवा करें और उनसे ज्ञान प्राप्त करें।
•         इसलिए जरूरी है कि इस पर्व को पूरी श्रद्धा के साथ मनाया जाए|
 
गुरु पूर्णिमा मनाने के पीछे का मिथक/The Myth behind the Celebration of Guru Purnima
भारत की पहचान इसके आध्यात्मिक सार में छिपी है। भारत में बदलते समय और परिस्थितियों के अनुसार इस अध्यात्म को जीवन में उतारने की अद्भुत कला को यहां के ऋषि-मुनियों ने ही सिखाई है। गुरु पूर्णिमा ऐसे सर्वदेशीय गुरुओं के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का पर्व है जो स्वयं कष्ट सहकर भी समाज को प्रगति के पथ पर अग्रसर करते हैं। महाभारत काल में महर्षि वेदव्यास के नाम से सभी परिचित थे। उन्हें मुनिश्रेष्ठ भी कहा जाता था और यह वही हैं जिन्होंने चार वेदों, अठारह पुराण और श्रीमद्भागवत की रचना की थी। इतिहास में उन्हें गुरु-शिष्य परंपरा का पहला गुरु माना जाता था।
हर व्यक्ति को समझना चाहिए कि यदि कोई व्यक्ति ज्ञान देता है, तो वह हमें कुछ सीखता है; तब उस स्थिति में वह हमारे लिए एक गुरु के समान बन जाता है। आप यह भी कह सकते हैं कि वह पूजनीय बन जाता है। शास्त्रों में एक कहानी उल्लेखनीय है कि एक बार मुनिवर ने भील जाति के किसी व्यक्ति को एक पेड़ को झुकाकर उससे नारियल तोड़ते देखा। उस दिन से व्यास जी ने उस व्यक्ति का पीछा करना शुरू कर दिया क्योंकि वह इस विद्या को जानने के लिए उत्सुक थे, लेकिन वह व्यक्ति वेद व्यास जी से झिझक और भय के कारण दूर जाकर छिप जाता था। पीछा करते हुए, व्यास जी एक दिन उस व्यक्ति के घर पहुंचे,  वह व्यक्ति घर पर नहीं था, लेकिन उसका पुत्र उपस्थित था जिसने व्यास जी की बात सुनी और वह उनको वह मंत्र देने के लिए तैयार हो गया। अगले दिन व्यास जी फिर से आए और उन्होंने सभी नियमों का पालन करते हुए उस व्यक्ति से उस मंत्र को ले लिया। 
जब वह व्यक्ति घर वापस आया तब उसके पुत्र ने अपने पिता की झिझक का कारण पूछा|  पुत्र की बात सुनकर पिता ने कहा कि पुत्र, "मैं जानबूझकर यह मंत्र व्यास जी को यह मंत्र नहीं देना चाहता था क्योंकि मेरे मन में एक बात थी कि जिस व्यक्ति से कोई मंत्र लिया जाता है, वह गुरु के समान हो जाता है। वह आगे कहते हैं कि हम गरीब और छोटी जाति के लोग हैं। तब क्या व्यास जी हमारा सम्मान करेंगे?" पिता ने उसे एक बात और कही कि यदि मंत्र देने वाला व्यक्ति पूजनीय नहीं है, तो वह मंत्र सिद्ध नहीं हो सकता। इसी कारण उस व्यक्ति ने अपने पुत्र को व्यास जी की परीक्षा लेने के लिए भेजा कि क्या उनके पुत्र को गुरु के समान यह सम्मान मिलता है या नहीं?
अगले दिन उस व्यक्ति का पुत्र व्यास जी के दरबार में पहुँचा, जहाँ व्यास जी अपने साथियों के साथ किसी बात पर चर्चा कर रहे थे। अपने गुरु जो उस व्यक्ति का पुत्र था, उनको आते देख व्यास जी दौड़ते हुए आए और उनकी पूजा की और सभी नियमों का पालन करते हुए उनका सम्मान किया। यह देखकर पुत्र बेहद प्रसन्न हुआ। उसकी और उसके पिता की सारी दुविधाएं मिट गईं और एक बात सिद्ध हो गई कि गुरु अगर छोटी जाति का भी हो तब भी वह पूजनीय होता है। ऐसा वेद व्यास जी ने भी किया और गुरु-शिष्य परंपरा को जीवित रखा। व्यास जी ने भी गुरु शिष्य की परंपरा का पूर्ण रूप से पालन किया। इस पूरे वर्ष में एक दिन ब्रह्म ज्ञान सद्गुरु को समर्पित होता है जिसे व्यास पूर्णिमा या गुरु पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। 

वर्षा ऋतु गुरु पूर्णिमा के लिए सर्वश्रेष्ठ क्यों है?/ Why is Varsha Ritu Best for Guru Purnima?
भारत में सभी ऋतुओं का अपना महत्व है। गुरु पूर्णिमा/Guru Purnima 2021 के मनाए जाने के पीछे एक खास कारण है और वह है – बारिश। इसका कारण यह है कि इन चार महीनों में न तो अधिक गर्मी होती है और न ही अधिक ठंड। इस समय को पढ़ाई और अध्ययन के लिए उपयुक्त और उत्तम माना जाता है। इसलिए गुरू के चरणों में जो शिष्य होते हैं वह इस समय को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग की शक्ति प्राप्त करने के लिए उपयुक्त मानते हैं और चुनते हैं।

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हरियाली तीज
31 Jul, 2022

श्रावण मास के शुक्ल पक्ष के तीसरे दिन या तृतीया को हरियाली तीज या श्रावणी तीज का दिन निश्चित होता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार, हरियाली तीज अक्सर जुलाई या अगस्त में आती है। यह मुख्य रूप से महिलाओं का पर्व है जो श्रावण शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को उत्तम भाग्य और अच्छा वर पाने के लिए मनाया जाता है। यह पर्व सावन में आता है जब चारों ओर हरियाली होती है। यही कारण है कि इस पर्व को हरियाली तीज भी कहा जाता है। श्रावण मास में जब संपूर्ण धरती हरियाली से सजी होती है, तो प्रकृति के इन खूबसूरत पलों का आनंद उठाने के लिए महिलाओं द्वारा झूला झूलकर अत्यधिक पौराणिक रूप से यह पर्व मनाया जाता है। हरियाली तीज के अवसर पर देशभर में कई स्थानों पर मेले आयोजित किए जाते हैं और माता पार्वती की सवारी धूमधाम से निकाली जाती है। यह पर्व भगवान शिव और पार्वती जी के पुनर्मिलन को सम्मानित करने के लिए मनाया जाता है। 

 

हरियाली तीज का पौराणिक महत्व/ Mythological Significance of Hariyali Teej

हिंदू धर्म में, प्रत्येक व्रत, उपवास और त्योहारों का पौराणिक संबंध होने के कारण, उनके साथ एक रोमांचक कहानी या कथा जुड़ी होती है। हरियाली तीज भी भगवान शिव और पार्वती के पुनर्मिलन को मनाने के लिए मनाई जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार, देवी पार्वती में भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठिन तपस्या की थी। 108 जन्मों के कठिन तप के बाद, माता पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति रूप में प्राप्त किया था। यह कहा जाता है कि श्रावण मास के शुक्ल पक्ष के तीसरे दिन भगवान शिव ने पार्वती जी को पत्नी रूप में स्वीकार किया था। तबसे, ऐसा माना जाता है कि इस दिन को भगवान शिव और देवी पार्वती द्वारा विवाहित महिलाओं के लिए भाग्य का दिन होने का आशीर्वाद दिया गया था। इसलिए हरियाली तीज पर विवाहित महिलाओं द्वारा भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन और उपवास करने से परिवार में खुशहाली और सुख समृद्धि आती है। 

 

हरियाली तीज का धार्मिक महत्व/ Religious Significance of Hariyali Teej

धार्मिक विश्वासों के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि सावन में हरियाली तीज के दिन भगवान शिव और पार्वती जी फिर से एक साथ आए थे, जिसका वर्णन शिवपुराण में भी वर्णित है। इसलिए इस दिन विवाहित महिलाओं द्वारा वैवाहिक जीवन आनंदमय बनाए रखने के लिए, देवी पार्वती और शिव जी का पूजा की जाती है। उत्तर भारत में तीज पर्व अत्यधिक धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन अविवाहित कन्याएं भी योग्य वर की कामना के साथ उपवास करती है और पूरे मन से उन्हें प्राप्त करने के लिए इश्वर से प्रथना करती हैं। 

 

हरियाली तीज कैसे मनाई जाती है?/ How is Hariyali Teej celebrated?

यह उपवास करवा चौथ से भी अधिक कठिन माना जाता है। इस दिन महिलाओं द्वारा पूरा दिन व्रत रखा जाता है और अगले दिन सुबह स्नान और पूजा के बाद, महिलाओं का व्रत पूर्ण होता है और उसके बाद ही वह कुछ खाती और पीती हैं। इस अवसर पर देवी पार्वती और शिवजी की पूजा की जाती है। इस दिन महिलाओं के मायके से मेकअप का सामान और मिठाइयां ससुराल भेजी जाती हैं। घर के कार्यों को पूरा करके स्नान के बाद, महिलाओं द्वारा सोलह श्रृंगार करके निर्जला व्रत रखा जाता है तथा पूजा के बाद उपवास से संबंधित कथा सुनी जाती है। इस दिन हरे रंग के कपड़े, हरी चुनरी, हरे रंग का लहंगा पहनने, हरा श्रृंगार करने, मेहंदी लगाने, और झूला झूलने की भी मान्यता है।

 

ऐसे मनाई जाती है हरियाली तीज/ This is how Hariyali Teej is celebrated

सावन की शुरुआत के साथ ही विवाहित महिलाओं को उनके माता-पिता के घर बुलाया जाता है। हरियाली तीज से एक दिन पहले, द्वितीया को श्रृंगार दिवस या सिंजारा के रूप में मनाया जाता है। बहू-बेटियों को नौ तरह की मिठाइयां और व्यंजन खिलाए जाते हैं। सिंजारा के दिन, इस त्योहार को मनाने के लिए नवयुवतियां और नवविवाहित दुल्हनें अपने हाथों और पैरों पर मेहंदी लगाती हैं। तीज के दिन महिलाएं हरि साड़ियां और आभूषण पहनकर शाम को झील के किनारे या बगीचे में अपनी सखियों के साथ झूला झूलती हैं और गीत गाती हैं। माना जाता है कि भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए पार्वती ने एक सौ सात जन्म लिए थे तथा उनकी कठोर तपस्या और एक सौ आठवें जन्म में, भगवान शिव द्वारा देवी पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया गया था। इन सबके साथ ही इस व्रत की शुरुआत हुई। इस दिन विवाहित महिलाओं द्वारा सोलह श्रृंगार विधि के साथ भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने से, उनके पति के साथ संबंध अच्छे रहते हैं और पति की उम्र में वृद्धि भी होती है। 

 

तीज पूजा में सोलह श्रृंगार का महत्व/ Significance of 16 makeups ritual  in Teej Puja

यह व्रत अच्छे वर की प्राप्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। सौभाग्य के लिए किए जाने वाले इस व्रत में, महिलाएं मां पार्वती को शहद से बने व्यंजन का भोग लगाती हैं तथा देवी को चूड़ियां, सिंदूर, कंगन, मेहंदी, साड़ी, चुनरी आदि श्रृंगार की कुल सोलह वस्तुएं अर्पित करती हैं। व्रत रखने वाली महिलाएं इन वस्तुओं को देवी पार्वती को अर्पित करके सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। हरियाली तीज की पूजा में पार्वती जी के साथ भगवान शिव की भी पूजा की जाती है। इस दिन व्रत रखने वाली महिलाएं सोलह श्रृंगार की रस्म भी करती हैं। तीज के दिन लोकगीतों पर झूला झूलना सर्वव्यापी है।  

 

हरियाली तीज का व्रत क्यों किया जाता है?/ Why fast on Hariyali Teej

इस पर्व के इस अवसर पर  जो विवाहित महिलाएं सोलह श्रृंगार करके शिव-पार्वती की पूजा करती हैं, उनके पतियों की उम्र में वृद्धि होती है। ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करने वाली अविवाहित युवतियों को आशीर्वाद प्राप्त होता है कि उनके विवाह में आने वाले सभी अवरोध दूर हो जाएंगे हैं और उन्हें एक योग्य वर की प्राप्ति होती है। इस व्रत से विवाहित महिलाओं को पति की लंबी आयु के साथ-साथ सुख-समृद्धि और दांपत्य जीवन का सुख प्राप्त होता है।

अगर किसी युवती का विवाह  नहीं हो रहा हो तो उसे इस दिन व्रत और पूजा करनी चाहिए। इसके अलावा विवाहित महिलाओं को संयुक्त रूप से शिव और पार्वती की पूजा करनी चाहिए।

 

बहनों और बहुओं को सिंधारा दिया जाता है/ Sindhara is given to sisters and daughters-in-law

हरियाली तीज के अवसर पर महिलाएं हाथों पर मेहंदी लगाकर व्रत करती हैं। इस समय के दौरान, घेवर, फेनी और सेवइयां का अधिक प्रचलन होता है। उत्सव से एक दिन पहले, बहनों और बहुओं को वस्त्र, सौभाग्य की वस्तुएं, घेवर, फेनी, फल आदि का सिंधारा दिया जाता है। हरियाली तीज पर ठाकुरजी को मालपुए का भी भोग लगाया जाता है जो इस पर्व पर काफी शुभ माना जाता है।

 

हरियाली तीज परंपरा/ Hariyali Teej tradition

शादी के बाद नवविवाहित युवतियों के लिए पहले सावन का एक अलग ही अर्थ होता है। हरियाली तीज के अवसर पर ससुराल से लड़कियों को उनके माता-पिता के घर बुलाया जाता है।

1. सिंधारा हरियाली तीज से एक दिन पहले मनाया जाता है। इस दिन नवविवाहित युवतियों के ससुराल से कपड़े, गहने, श्रृंगार का सामान, मेहंदी और मिठाइयां भेजी जाती हैं, जिसका इस पर्व में प्रयोग भी होता है।

2. इस दिन मेहंदी लगाने का विशेष महत्व होता है। महिलाएं और लड़कियां इसे विभिन्न डिजाइनों में अपने हाथों पर लगाती हैं। इस दिन विवाहित होने के संकेत के तौर पर पैरों में आलता भी लगाया जाता है।

 3. हरियाली तीज पर विवाहित महिलाओं द्वारा सास के पैर छूकर उन्हें मिठाईयां दी जाती हैं। उनकी गैरमौजूदगी में भाभी (जेठानी) या किसी अन्य बुजुर्ग महिला को दिया जाता है।

 

4. इस दिन महिलाएं श्रृंगार और नए वस्त्र पहनकर पार्वती की पूजा करती हैं।

5. हरियाली तीज पर महिलाओं और युवतियों द्वारा मैदान या बगीचे में झूला झूला जाता है और लोक कथाएं कहीं जाती हैं। 

 

हरियाली तीज पूजा मंत्र/ Hariyali Teej Puja Mantra

देहि सौभाग्य आरोग्यं देहि मे परमं सुखम्।

पुत्रान देहि सौभाग्यम देहि सर्व।

कामांश्च देहि मे।।

 

मालपुआ भी भोग के रूप में करते अर्पित/ Malpua are also offered

श्रावण मास में घेवर, फेनी और सेवइयां बहुतायत होती है। तीज से एक दिन पहले बहनों और बहुओं को सिंधारा दिया जाता है जिसमें कपड़े, सौभाग्य की वस्तुएं, घेवर, फेनी, फल आदि शामिल होते हैं। बरसाना में राधा रानी जी के संजारा अर्पण के दर्शन को देखने के बाद भक्त आश्चर्यचकित रह जाते हैं। हरियाली तीज पर ठाकुरजी को मालपुए का भोग लगाया जाता है। 

 

हरियाली तीज व्रत कथा / Hariyali Teej Vrat Story

हरियाली तीज भगवान शिव और पार्वती के पुनर्मिलन का सम्मान करने के लिए मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। इस कठिन तप के कारण ही, देवी पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त किया था। किंवदंती के अनुसार, हिमालय के घर में माता गौरी ने पार्वती  रूप में पुनर्जन्म लिया था। पार्वती बचपन से ही शिव को वर रूप में पाना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने घोर तप किया। एक दिन नारद जी ने हिमालय से कहा कि भगवान विष्णु पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें अपनी पत्नी बनाना चाहते हैं। यह सुनकर हिमालय रोमांचित हो उठे। वैकल्पिक रूप से, नारद मुनि ने विष्णु जी के पास जाकर कहा कि हिमालय ने अपनी बेटी पार्वती की शादी आपसे करने का फैसला किया है। इस पर विष्णु भी राजी हो गए। तब नारद जी ने पार्वती के पास जाकर उन्हें बताया कि उनके पिता हिमालय में विष्णु जी के साथ उनका विवाह तय कर दिया है। यह सुनकर पार्वती दुखी होकर अपनी सखियों के साथ पिता से छुपकर एक सुनसान जंगल में जाकर फिर से तपस्या करने लगीं। उन्होंने रेत से एक शिवलिंग का निर्माण किया और उपवास करते हुए पूजा करना शुरू कर दिया। भगवान शिव इस तपस्या से प्रसन्न हुए और उनकी इच्छा पूरी करने का आश्वासन दिया। इसी बीच पार्वती के पिता हिमालय भी वहां पहुंच गए। सच्चाई जानने के बाद, वह पार्वती का विवाह भगवान शिव से करने के लिए तैयार हो गए तथा इसके बाद शिव जी ने पार्वती जी से विधिवत् विवाह किया। शिव कहते हैं, 'हे पार्वती! आपके द्वारा किए गए कठिन व्रत के कारण हमारा विवाह हो सका। अतः मैं निष्कपट रूप से इस व्रत का पालन करने वाली प्रत्येक स्त्री की मनोकामना पूरी करूंगा।'

अलग अलग राज्य में तीज की परंपरा भी अलग अलग होती है/Teej's tradition in a different state

भारत के अलग-अलग राज्य इस त्योहार को अलग-अलग अंदाज में मनाते हैं। हर राज्य इस पर्व को अपने अंदाज से मनाता है जिसमें से कुछ के बारे में नीचे दिया गया है।

जयपुर की तीज शोभायात्रा

राजस्थान के लोगों के लिए यह पर्व जीवन का सार है। विशेषकर, गुलाबी नगरी जयपुर में इसकी अलग ही भव्यता देखने को मिलती है। तीज के अवसर पर, जयपुर में लगने वाले मेले का पूरे विश्व में विशेष स्थान   है। इस दिन, पूजा के बाद तीज माता की शोभायात्रा निकाली जाती है। पार्वती जी की प्रतिमा, जिसे तीज माता कहा जाता है, को मार्च में लाया जाता है। त्योहार से पहले, प्रतिमा को रंग-रोगन करके नए वस्त्रों और आभूषणों से सजाया जाता है; तथा शुभ मुहूर्त में शोभायात्रा निकाली जाती है। इस दौरान लाखों की संख्या में लोगों द्वारा माता पार्वती के दर्शन किए जाते हैं। हाथी और घोड़े इस जुलूस की शोभा बढ़ाते हैं। छोटी चौपड़, गणगौरी बाजार और चौगान होते हुए पालिका बाग पहुंचने के बाद, यह शोभायात्रा त्रिपोलिया बाजार में विसर्जित की जाती है। रंग-बिरंगे परिधानों में सजे ग्रामीणों के साथ कई विदेशी पर्यटक भी सवारी देखने के लिए जाते हैं। चारों ओर रंग-बिरंगे कपड़ों में लोग, घेवर-फेनी की खुशबू, प्रकृति की खूबसूरती इस त्यौहार को विशेष बनाती है। खुले स्थानों में विशाल वृक्षों की डालियों पर लगे झूलों में, हाथों में रची मेहंदी के साथ महिलाओं और बच्चों के साथ मल्हार गाकर झूले का आनंद लेना एक अनोखा अनुभव होता है। महिलाओं द्वारा अपनी सखियों के साथ, झूलते  समय लोक गीत, कजरी आदि गाए जाते हैं  जिनसे सारा वातावरण मधुर और जीवंत हो उठता है।

 

राजस्थान का तीज पर्व/ Teej festival in Rajasthan

 

राजस्थान में तीज का उत्सव एक मौसमी त्योहार के रूप में मनाया जाता है। हरियाली और बादलों से आच्छादित सावन या श्रावण मास में लोगों द्वारा यह त्योहार     मनाया जाता है। आसमान में मंडराते काले बादलों के कारण, इस त्योहार को कजली तीज और हरियाली के कारण इस त्योहार को हरियाली तीज कहा जाता है। इस त्योहार पर राजस्थान में झूले लगाए जाते हैं और नदी किनारे मेलों का आयोजन किया जाता है। इस त्योहार के आसपास खरीफ फसलों की बुवाई भी शुरू हो जाती है।   बारिश के लिए चिंतित किसान तीज पर्व पर मोठ, बाजरा, फली आदि का बीजारोपण करते हैं। 

 

वृंदावन तीज/ Teej of Vrindavan

सावन में ब्रज के झूले बहुत प्रसिद्ध हैं। श्री वल्लभ सम्प्रदाय में, ठाकुर जी सावन मास के दौरान झूले पर झूलते रहते हैं। अन्य मंदिरों में सावन शुक्ल तृतीया-हरियाली तीज से रक्षाबंधन-पूर्णिमा तक हिंडोला सजाया जाता है। वृंदावन में श्री बांके बिहारी तीज की रात को, सोने और चांदी से बनी  गंगा-जमुनी को एक विशाल हिंडोले में  झुलाया जाता है। मथुरा का द्वारकाधीश  तट बहुत प्रसिद्ध है। ठाकुर जी के सारे पर्दे, हिंडोला, वस्त्र सब आसमान के रंग से मेल खाते हुए होते हैं जिनमें काली घटा का अत्यधिक महत्व होता है। 

 

हरियाली तीज पर किए जाने वाले उपाय/ Follow these remedial measures on Hariyali Teej

पति-पत्नी के बीच सामंजस्य की कमी होने पर यह उपाय किए जा सकते हैं- 

-शिव जी को पीले वस्त्र और माता पार्वती को लाल वस्त्र अर्पित करने चाहिए।

-बेहतर तालमेल के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

-इसके बाद दोनों कपड़ों में गांठ बांधकर और कुछ  दूरी पर रख दें।

 

अगर पति-पत्नी को एक-दूसरे से दूर रहना पड़े तो क्या करना चाहिए?

-भगवान शिव को पुष्प, बिल्वपत्र,   अबीर-गुलाल अर्पित करना चाहिए।

-चांदी के कलश में माता गौरी को सिंदूर अर्पण करना चाहिए।

- एक दूसरे के साथ शांत रहने की प्रार्थना करनी चाहिए।

- नियमित रूप से अर्पण किए गए सिंदूर का प्रयोग करना चाहिए।

 

यदि पति या पत्नी में से किसी एक का स्वास्थ्य खराब होता है तो

- शाम के समय शिव मंदिर जाना चाहिए।

-सर्वप्रथम शिवलिंग पर पंचामृत अर्पण करें।

-इसके बाद जलधारा से अभिषेक करें।

-जीवनसाथी के स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना करें।

 

उधार के कारण परेशानियां होने पर 

-कत्था का एक सूखा टुकड़ा लेकर जमीन पर तीन सीधी रेखाएं बना लें।

-फिर हनुमान जी का नाम लेने के बाद इन तीनों रेखाओं को पैरों से मिटा दें।

-यह उपाय तीन मंगलवार तक करने से निश्चित ही लाभ प्राप्त हो सकता है।

 

हरियाली तीज पर तीन चीजें त्यागने की परंपरा/ The tradition of giving up three things on Hariyali Teej

हरियाली तीज पर प्रत्येक स्त्री को तीन बुराइयां त्यागने का संकल्प लेना चाहिए। ये तीन चीजें हैं-

1. पति को धोखा 

2. झूठ बोलना और बुरा व्यवहार 

3. परनिंदा (दूसरों की बुराई करने से परहेज)

 

हरियाली तीज के दौरान क्या सही और क्या वर्जित होता है?/ What is right and what is forbidden during Hariyali Teej

1) हरियाली तीज पर निर्जला व्रत होने के कारण पानी नहीं पीना चाहिए। लेकिन गर्भवती और बीमार महिलाओं से इसका कोई संबंध नहीं होता।

2) व्रत रखने वाली महिलाओं को व्रत पूर्ण करने के लिए हरियाली तीज की व्रत कथा सुननी चाहिए। 

3) यह व्रत पति की लंबी उम्र और कल्याण के लिए होने के कारण इस दिन तीज माता/ माता पार्वती के गीत और कथा सुनना शुभ माना जाता है।

 

 नहीं करने वाली चीजें / What not to do?

१) इस व्रत में सफेद और काले वस्त्रों का प्रयोग वर्जित होता है।

२) कहा जाता है कि तीज के व्रत के दौरान नींद नहीं लेनी चाहिए।

३) हिंदू धर्म के अनुसार इस व्रत को करने वाली पत्नियों  का मन, कर्म और वचन शुद्ध होना चाहिए, अर्थात किसी के बारे में बुरा नहीं सोचना चाहिए, गलत काम  और अभद्र भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

 

अनिवार्य मानी जाने वाली चीजें/ These things are considered imperative

हरियाली तीज पर हरी चूड़ियां और मेहंदी जैसी चीजें महत्वपूर्ण मानी जाती हैं, जिनका विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी उम्र, स्वास्थ्य और खुशी के प्रतीक रूप में ध्यान रखा जाता है। इस दिन, आमतौर पर महिलाएं हरे रंग का प्रयोग करती हैं। इसके विपरीत, हरियाली तीज पर महिलाओं के माता-पिता द्वारा साड़ी, श्रृंगार का सामान, मिठाई, फल आदि भेजना उपयुक्त माना जाता है।

नाग पंचमी
02 Aug, 2022

प्रसिद्ध हिंदू पर्व नागपंचमी 2021/nag panchami 2021 संपूर्ण भारत में मनाया जाता है। सर्पों का हमारी संस्कृति का एक अनिवार्य हिस्सा होने के कारण इस दिन लोगों द्वारा शक्ति और सूर्य के अवतार भगवान भोलेनाथ की पूजा की जाती है। यह पर्व श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि/Fifth Tithi में होने के कारण, उत्तर भारत में सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ही नाग पूजा की जाती है। लेकिन दक्षिण भारत में यह पर्व कृष्ण पक्ष की पंचम तिथि को मनाया जाता है। हिंदू धर्म में, नाग पंचमी का दिन महत्वपूर्ण माने जाने के कारण, इस दिन नागों की दूध चढ़ाकर पूजा की जाती है। भगवान शिव को नाग अत्यधिक प्रिय होने के कारण यह पर्व सावन के महीने में आता है तथा इस दिन पूर्ण श्रद्धा के साथ नाग पंचमी का अनुष्ठान करने पर भगवान भोलेनाथ प्रसन्न होकर अपनी कृपा बरसाते हैं।

नाग पंचमी का महत्व/ Significance of Nag Panchami

हिंदू धर्म के अनुसार, सर्पों को देवता मानकर उचित विधि द्वारा उनकी पूजा की जाती है। वास्तव में, सर्प को  भगवान शिव शंकर का हार और विष्णु की शैय्या माना जाता है। साथ ही, सांपों का संबंध लोगों के जीवन से भी होता है। सावन के महीने में भारी बारिश होने के कारण, सर्पों के भूमि से बाहर निकलने पर लोगों द्वारा  दूध चढ़ाकर उनका पूजन किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन श्रद्धा के साथ नाग देवता का पूजन करने पर उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है जिससे सर्प उन्हें ना तो नुकसान पहुंचाते हैं और ना ही उनसे भयभीत होते हैं। 

कुंडली में काल सर्प दोष वाले व्यक्तियों द्वारा, इस दिन पूजन करने से इस दोष से छुटकारा मिल सकता है। यह दोष सभी ग्रहों के राहु और केतु के बीच में आने के कारण होता है तथा ऐसे व्यक्तियों को अपने जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है और कुछ हासिल करने के लिए कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसा कहा जाता है कि जीवन में राहु-केतु के कारण समस्याएं होने पर नाग पंचमी के दिन सर्पों का पूजन/Nag panchami pooja करके अपनी समस्याओं का समाधान प्राप्त किया जा सकता है। 

1. हिंदू मान्यताओं के अनुसार, पौराणिक काल से ही नागों का देवता रूप में पूजन किया जाता रहा है इसलिए नाग पंचमी/Naag panchami 2021 के दिन नाग पूजन करना शुभ माना जाता है।

2. ऐसी भी मान्यता है, कि नाग पंचमी के दिन सर्प का पूजन करने से, सांप के काटने का डर नहीं होता और  अच्छा जीवन व्यतीत किया जा सकता है।

3. ऐसी मान्यता है कि इस दिन सर्पों को दूध चढ़ाने और उनकी पूजा करने से अक्षय पुण्य/Akshay Punya की प्राप्ति होती है।

4. सपेरों के लिए भी यह पर्व विशेष महत्व रखता है।  आमतौर पर, इस दिन लोग सर्पों को दूध और पैसे  चढ़ाते हैं।

5. परंपरानुसार, इस दिन घर के प्रवेश द्वार पर सर्प का चित्र बनाना एक प्रथा है। ऐसा माना जाता है कि सर्पों की कृपा से यह चित्र घर की रक्षा करता है।


नाग पंचमी पूजन का इतिहास/ History of Nag Panchami Puja

पुराणों के अनुसार, नाग पंचमी मनाने की कई मान्यताएं हैं। ऐसा माना जाता है कि श्रावण शुक्ल की पंचमी तिथि को सभी सर्प कुल श्राप से मुक्ति पाने के लिए ब्रह्माजी से मिलने गए और तब ब्रह्माजी ने नागों को श्राप से मुक्त कर दिया। इस घटना के बाद से नाग पूजन की प्रथा शुरू हुई। 

एक और कहानी यह है कि सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को भगवान श्रीकृष्ण ने कालिया नाग का वध करके गोकुल वासियों के प्राण की रक्षा की थी और तभी से नाग पूजन का पर्व शुरू हुआ। 

एक और मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान रस्सी नहीं मिलने पर वासुकी नाग के कहने पर उनका प्रयोग रस्सी की तरह किया गया था। देवताओं द्वारा वासुकी नाग की पूंछ पकड़ी गई और राक्षसों ने वासुकी नाग का मुंह पकड़ा था। और उसी मंथन के दौरान निकले विष को भगवान शिव ने अपने कंठ में रखकर सभी की रक्षा की थी। उसके बाद उसमें से निकले अमृत को देवताओं द्वारा ग्रहण कर लिया गया जिससे सभी देवता अमर हो गए थे।  वासुकी नाग के समुद्र मंथन के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण नाग पंचमी मनाई जाती है, और तब से ही, सभी नागों और सर्पों की पूजा करने की परंपरा शुरू हुई। 

नाग पंचमी मनाने का कारण/ The reason for celebrating Nag Panchami

नाग पंचमी का त्योहार सर्पों का पूजन और उनसे प्रार्थना करके, लोगों को प्रत्येक समस्याओं से बचाने के लिए   मनाया जाता है। सावन के दौरान, भारी बारिश के कारण सर्पों के अपने बिलों से बाहर निकलने पर लोगों द्वारा दूध चढ़ाकर उनकी पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि सामान्य रूप से सर्पों की याददाश्त तेज होने के कारण, वह उन लोगों के चेहरे याद रखते हैं जो उन्हें नुकसान पहुंचाते हैं और बदला लेते समय उस व्यक्ति के परिवार वालों को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसलिए, महिलाओं द्वारा क्षमा मांग कर अपने परिवार को किसी भी नुकसान से बचाने के लिए सर्पों को दूध चढ़ाकर प्रार्थना की जाती है। 


एक पुरानी पौराणिक कथा के अनुसार, जब सर्पों के राजा तक्षक द्वारा डसने के कारण राजा जनमेजय के पिता परीक्षित की मृत्यु होने पर, मृत्यु का बदला लेने के लिए राजा जनमेजय ने संपूर्ण सर्प जाति को नष्ट करने के लिए एक यज्ञ का आयोजन किया। जिस दिन ब्राह्मण आस्तिक ऋषि के द्वारा यह यज्ञ कराया गया उस दिन नाग पंचमी थी। तब से इस दिन को नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है।

नाग पंचमी पूजन और कालसर्प दोष का संबंध/ Nag Panchami worship and relationship with kaal sarp dosha

हिंदू मान्यताओं के अनुसार, कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की नाग पंचमी के दिन भी व्रत रखा जाता है। गरुड़ पुराण में इससे संबंधित सभी जानकारी बताई गई है। व्रत करने वाले व्यक्तियों को मिट्टी या आटे से सर्प बनाकर, उसे विभिन्न रंगों से सजाने के बाद फूल, खीर, दूध, दीपक आदि से पूजन करना चाहिए। पूजन के बाद भुने हुए चने और जौ को प्रसाद के रूप में बांटना चाहिए। ज्योतिषियों/ astrologers का मानना ​​है कि जिन लोगों की कुंडली में कालसर्प दोष होता है उनके द्वारा इस दिन नाग देवता का पूजन करने से उनकी कुंडली में से यह दोष समाप्त हो जाता है।

नाग पंचमी - उपवास और पूजन विधि/ Nag Panchami – Fasting and worship method (Vidhi)

1. इस दिन उपवास/nag panchami upvas रख कर देवताओं की पूजा की जाती है। इस दिन अनंत, वासुकी, पद्म, महापद्म, तक्षक, कुलीर, कर्कोटक और शंख जैसे अष्ट नागों की पूजा की जाती है।

2. चतुर्थी के दिन एक बार भोजन करके, पंचमी के दिन व्रत/Nag Panchami Vrat करके सायंकाल भोजन करना चाहिए।

3. पूजा के लिए लकड़ी की चौकी पर सर्प का चित्र या मिट्टी की मूर्ति स्थापित की जाती है।

4. फिर नाग देवता को हल्दी, रोली (लाल सिंदूर), अक्षत और पुष्प चढ़ाए जाते हैं। 

5. इसके बाद लकड़ी की चौकी पर बैठकर नाग देवता को कच्चा दूध, घी और चीनी का मिश्रण चढ़ाना चाहिए।

6. पूजन/nag panchami pooja के बाद नाग देवता की आरती की जाती है।

7. सुविधानुसार, किसी सपेरे को थोड़ी दक्षिणा देकर सर्प को दूध दिया जा सकता है। 

8. अंत में, व्रत रखने वाले व्यक्तियों को नाग पंचमी की कथा अवश्य सुननी चाहिए।

नोट: परंपरा के अनुसार, कई राज्यों में नाग पंचमी चैत्र और भाद्रपद शुक्ल पंचमी को मनाई जाती है। भारत के अलग अलग क्षेत्र में अलग अलग तरीके से इस पर्व/Festival को मनाने की मान्यता है।

नाग पंचमी से जुड़ी मान्यताएं/ Beliefs related to Nag Panchami

1. हिंदू पुराणों के अनुसार, ब्रह्मा जी के पुत्र ऋषि कश्यप की चार पत्नियां थीं। ऐसा माना जाता है कि  उनकी पहली पत्नी से देवताओं का जन्म, दूसरी पत्नी से गरुड़ और चौथी पत्नी से राक्षसों का जन्म हुआ था, लेकिन उनकी नागा वंश की तीसरी पत्नी कद्रू ने सर्प को जन्म दिया था।

2. पुराणों में दिव्य और बौम दो प्रकार के सर्पों का वर्णन किया गया है। वासुकी और तक्षक दिव्य नाग कहे जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि शेषनाग पृथ्वी का भार वहन करते हैं और क्रोधित होने पर उनके पास प्रज्वलित अग्नि के समान दृष्टि से सम्पूर्ण जगत को राख करने की क्षमता है तथा यदि वह काट लें तो इसका कोई इलाज नहीं है। लेकिन धरती पर मौजूद सभी सर्पों में से कुल 80 प्रकार के सर्पों के ही दांतों में जहर होता है।

3. अनंत, वासुकी, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापदम, शंखपाल और कुलिक अष्टनागों को, सभी नागों में श्रेष्ठ माने गए हैं। इनमें से दो नाग ब्राह्मण, दो क्षत्रिय, दो वैश्य और दो शूद्र माने जाते हैं जिनमें अनंत और कुलिक ब्राह्मण, वासुकी और शंखपाल क्षत्रिय, तक्षक और महापदम वैश्य माने गए हैं और पद्म और कर्कोटक को शूद्र कहा गया है।

4. अर्जुन के पौत्र और परीक्षित के पुत्र जनमेजय के अनुसार, उन्होंने नागों से बदला लेने और सर्प वंश को नष्ट करने के लिए एक सर्प यज्ञ करने का ठाना था क्योंकि उनके पिता, राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के काटने से हुई थी। नागों की रक्षा करने के लिए जरत्कारु के पुत्र, आस्तिक मुनि ने जिस दिन इस यज्ञ को विफल किया, उस दिन श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि थी जिसके कारण तक्षक नाग और उनके वंशज विनाश से बच गए थे। माना जाता है कि यहीं से नाग पंचमी पर्व मनाने की परंपरा प्रचलित हुई।

नाग पंचमी की प्राचीनतम कथा/ The oldest story of Nag Panchami

प्राचीन काल में एक सेठ जी के सात पुत्र थे और सातों का विवाह हो चुका था। सबसे छोटे बेटे की पत्नी बुद्धिमान और अच्छे स्वभाव की थी, लेकिन उसके भाई की पत्नी ऐसी नहीं थी। एक दिन जब बड़ी बहू ने सभी बहुओं को घर की साज-सज्जा के लिए पीली मिट्टी लाने के लिए कहा और सभी राजी भी हो गई। उसके पश्चात सभी बहुएं एक साथ मिट्टी लेने निकल पड़े। जब वह अपनी म्यान से मिट्टी खोदने लगीं, तब मिट्टी में से एक सांप निकला, और बड़ी बहू द्वारा उसे म्यान से मारने की कोशिश करते देखकर छोटी बहू ने उसे रोककर कहा- 'यह सर्प निर्दोष है, उसे मत मारो।' यह सुनकर बड़ी बहू ने उसे नहीं मारा।

उसके बाद सर्प के एक तरफ बैठने पर छोटी बहू ने सर्प से कहा - 'हम जल्द ही वापस आएँगे, तुम यहाँ से कहीं मत जाना।' इतना कहकर वह सबके साथ घर चली गई। घर पहुंचने के बाद, कार्यों में उलझ कर सांप से किए अपने वादे को भूल गई। अगले दिन जब उसे वह बात याद आई तो वह सभी को साथ लेकर वहां पहुंची और उसने वहां सांप को बैठे हुए देखा। उसने कहा - 'नमस्कार, सर्प भाई!' सांप बोला- 'तुमने मुझे भाई कहा है, नहीं तो झूठ बोलने पर मैं तुम्हें काट लेता। उसने कहा- 'भैया मुझसे गलती हो गई, मैं आपसे माफ़ी माँगती हूँ।' इस पर सांप बोला- "ठीक है, आज से तुम मेरी बहन और मैं तुम्हारा भाई बन गया हूं। जो चाहो मांग सकती हो।" वह बोली- 'भाई, मेरा कोई नहीं है; आपको अपने भाई के रूप में पाकर अच्छा लगा।' कुछ दिनों के बाद, सांप इंसान के रूप में उसके घर आया और कहा, 'मेरी बहन को भेजो।' सबको आश्चर्य हुआ और उन्होंने उसे रोक लिया और कहा कि उसका कोई भाई नहीं है तो उसने कहा- "मैं उसका दूर का भाई हूं। मैं बचपन में ही अपनी बहन से बिछड़ गया था, इसलिए वह मुझे नहीं पहचानती।" विश्वास होने पर, उन्होंने छोटी बहू को उसके साथ भेज दिया। रास्ते में सर्प ने उससे कहा कि 'वह सर्प है, इसलिए चलते समय परेशानी होने पर बिना डरे मेरी पूछ पकड़ कर चलती रहना।' उसने जैसा कहा था वैसा ही करने पर वह उसके घर पहुंच गई। वह वहाँ की दौलत और वैभव देखकर चकित रह गई। एक दिन सांप की मां ने उससे कहा- 'मैं काम से बाहर जा रही हूं, तुम अपने भाई को ठंडा दूध दे देना।' उसने इस पर ध्यान नहीं दिया और उसे गर्म दूध दे दिया, जिससे उसका चेहरा बुरी तरह जल गया। यह देखकर सांप की मां अत्यधिक क्रोधित हो गईं लेकिन सर्प के समझाने पर वह शांत हो गईं। तब सर्प ने कहा कि अब उसकी बहन को उसके घर भेज देना चाहिए। तब सर्प (छोटी भाभी का भाई) और उसके पिता उसे बहुत सारा सोना, चाँदी, जवाहरात, कपड़े और गहने आदि देकर उसके घर ले आए। इतना धन देखकर बड़ी बहू ने ईर्ष्या से कहा, कि यदि तुम्हारा भाई इतना धनवान है तो उससे और धन लेना चाहिए। जब सर्प ने यह बातें सुनीं, तो उसने सोने की सारी चीज़ें लाकर अपनी बहन को दे दीं। यह देखकर बड़ी बहू बोली कि 'झाडू लगाने के लिए झाड़ू भी सोने की होनी चाहिए।' यह सुनकर सांप  अपनी बहन के लिए सोने की झाड़ू ले आया। 

सर्प ने छोटी बहू को हीरे-जवाहरात का शानदार हार दिया था जिसकी प्रशंसा सुनकर उस देश की रानी ने राजा से कहा कि सेठ की छोटी बहू का हार यहां मंगवाया जाए। राजा ने अपने मंत्री को तुरंत हार लाने का आदेश दिया; मंत्री ने सेठ जी के पास जाकर कहा कि 'तुम्हारी छोटी बहू का हार महारानी जी पहनना चाहती हैं इसलिए उससे हार लाकर मुझे दे दो। सेठ जी ने डरते हुए छोटी बहू से हार लेकर उसे दे दिया। छोटी बहू को इस बात का बहुत बुरा लगा; उसने अपने सर्प भाई को याद करते हुए प्रार्थना की - 'भाई! रानी ने हार छीन लिया है; आपको कुछ करना चाहिए।' उसने अपने भाई से अनुरोध किया कि जब रानी उस हार को अपने गले में पहने तो वह सांप बन जाए और जब वह मुझे लौटाए तो वह हीरे और रत्नों का हो जाए। सांप ने ठीक वही किया जैसा उसने कहा था। जैसे ही रानी ने हार पहना वह सांप बन गया। यह देख कर रानी चिल्ला कर रोने लगी। यह देखकर राजा ने सेठ जी को छोटी बहू को तुरंत भेजने के लिए खबर भेजी। सेठ जी डर गए कि राजा उनकी बहू का क्या करेगा? यह सोचकर वह स्वयं छोटी बहू को लेकर राजा के पास गए। राजा ने छोटी बहू से पूछा- "तुमने क्या जादू किया है? मै तुम्हें सजा दूंगा।" छोटी बहू बोली- सर्वशक्तिमान राजन्! मेरी  उदंडता को क्षमा कीजिए; लेकिन जब मैं इस हार को अपने गले में पहनूंगी तो यह हीरे और जवाहरात का बन जाएगा और जब कोई इसे अपने गले में पहनेगा तो यह हार सांप बन जाएगा।

यह सुनकर राजा को विश्वास नहीं हुआ। उसने सर्प में बदल चुके हार को उसे देकर कहा, कि वह इसे अभी पहन कर दिखाएं। छोटी बहू के हार पहनते ही सर्प हीरे-जवाहरात के हार में बदल गया। यह देखने के बाद, राजा ने उसके शब्दों से संतुष्ट और प्रसन्न होकर उसको पुरस्कार स्वरूप ढेर सारा धन दिया। उस धन और हार के साथ दोनों अपने घर लौट गए। उसका धन देखकर बड़ी बहू ने ईर्ष्यावश छोटी बहु के पति से कहा, कि छोटी बहू के पास कहीं से धन आया है। यह सुनकर उसके पति ने अपनी पत्नी से कहा- मुझे सही से बताओ कि यह धन उसे कौन देता है? उसने फिर से अपने भाई को याद करने पर उसी समय सांप वहां आया और बोला- अगर कोई मेरी बहन के चरित्र पर शक करेगा तो मैं उसे खा जाऊंगा। यह सुनकर छोटी बहू का पति डर गया और उसने नाग देवता का बड़ा आदर सत्कार किया। उसी दिन से, नाग पंचमी का पर्व मनाया जाता है और महिलाओं द्वारा नागों की भाई के समान पूजा की जाती है।  

नाग पंचमी के दिन न करने वाले कार्य/ what not to do on nag panchami?

-नाग पंचमी के दिन किसानों को गलती से भी खेतों में काम नहीं करना चाहिए क्योंकि यह उनके और उनके परिवार के लिए अत्यधिक नुकसानदायक हो सकता है।  

-नाग पंचमी के दिन सुई- धागे का प्रयोग नहीं होने के कारण, इस दिन सुई और धागे का प्रयोग करने से बचना चाहिए।

-नाग पंचमी के दिन, चूल्हे पर तवा नहीं रखना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से सांपों को नुकसान पहुंच सकता है। 

-इस दिन किसी से झगड़ा नहीं करना चाहिए तथा परिवार के सदस्यों को कड़वे शब्द नहीं बोलने चाहिए। 

-नाग पंचमी/Nag panchami 2021 के दिन, लोहे के बर्तनों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इस दिन लोहे के बर्तन में न तो खाना बनाना चाहिए और न ही खाना चाहिए |

रक्षा बंधन
11 Aug, 2022

दुनिया भर में प्रचलित रक्षाबंधन का त्यौहार एक बंधन के रूप में जाना जाता है जिसे न तो तोड़ा जा सकता है और न ही छोड़ा जा सकता है।

भाई बहन के प्रेम और कर्तव्य को समर्पित यह त्योहार हर साल श्रावण पूर्णिमा को मनाया जाता है। बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी/Rakhi बांधने के लिए रक्षाबंधन का इंतजार करती है। भारतीय संस्कृति में प्रत्येक संस्कृति के समाहित होने की विशेषता के कारण कश्मीर से कन्याकुमारी तक, सौराष्ट्र से लेकर असम तक, लोगों द्वारा कोई ना कोई त्योहार मनाए जाते रहते हैं जिनसे आपसी संबंधों के बीच सद्भावनाओं में वृद्धि होती रहती है। सामान्यतः भाई-बहनों के बीच प्रेम और तकरार होने के बावजूद भी, रक्षाबंधन का पर्व राखी के माध्यम से भाईयों के प्रति बहनों के अपार स्नेह और बहनों के प्रति भाईयों के फर्ज को दर्शाता है। यह प्रेम और कर्तव्य जीवन भर भाई-बहन के बंधन को बांधे रखता है।

इस दिन बहनें अपने भाईयों के माथे पर तिलक करके,   कलाई पर रक्षा सूत्र या राखी/ Rakhi बांधकर आरती उतारती हैं और उनकी लंबी उम्र की प्रार्थना करतीं हैं। भाई भी बहनों पर उपहारों की वर्षा करके कठिन समय में मदद करने के लिए उनके साथ रहने का वादा करते हैं। 

पौराणिक कथा/Mythological stories के अनुसार, द्रौपदी द्वारा अपने चीरहरण के समय श्रीकृष्ण को अपनी रक्षा के लिए पुकारने पर, उन्होंने भरी सभा में द्रौपदी की रक्षा की थी। हालांकि, कृष्ण और द्रौपदी के बीच अच्छे संबंध थे लेकिन यह कहा जाता है कि पूर्व जन्म में द्रौपदी और कृष्ण के भाई-बहन होने के कारण कृष्ण ने अपनी राखी की प्रतिज्ञा को निभाया था। वर्तमान में, यह पर्व भाई-बहन के प्रेम की गहनता को दर्शाता है। जहां एक ओर, बहने भाईयों  के प्रति अपने कर्तव्यों को और भाई बहनों के प्रति अपने दायित्वों को पूरा करने का वादा करते हैं; बहनें भी भाइयों की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती है। बहनों द्वारा भाईयों की कलाई पर जो राखी बांधी जाती है, वह सिर्फ एक धागा नहीं होता बल्कि बहन-भाइयों के अटूट और पवित्र प्रेम का बंधन और सुरक्षा की शक्ति और प्रतिबद्धता उस धागे में निहित होती है।
 

रक्षाबंधन का महत्व/ Importance of Raksha Bandhan

रक्षाबंधन का पर्व भारत में बहुत लोकप्रिय है। रक्षाबंधन का अर्थ होता है- 'रक्षा का अटूट बंधन', जिसमें बहनें अपने भाइयों को राखी का धागा बांधती हैं, जो दोस्ती की भावना से भी जुड़ा होता है। रक्षाबंधन पर, बहनें अपने भाइयों के घर जाती हैं, और राखी बांधकर कहती हैं, "मैं तुम्हारी रक्षा करूंगी, और तुम मेरी रक्षा करना।"  यह अनिवार्य नहीं होता कि वो उसका स्वयं का भाई हो, वह अपने परिचितों में से किसी को भी राखी बांध सकती है। रक्षाबंधन पर राखी बांधने की हमारी सदियों पुरानी परंपरा है। हिन्दु त्यौहारों के अनुसार, हर पूर्णिमा किसी न किसी त्योहार को समर्पित होती है। इन सभी त्योहारों में एक बात सबसे महत्वपूर्ण है, वह है जिंदगी में खुशियां का बना रहना। 

सभी भाई-बहनों को एक-दूसरे की रक्षा और प्रेम की जिम्मेदारी लेते हुए रक्षाबंधन का पर्व बहुत हर्षोल्लास के साथ मनाना चाहिए। आज, जब रिश्ते धुंधले होते जा रहे हैं तो ऐसी स्थिति में भाई-बहनों का पवित्र रिश्ता संबंधों को मजबूत आधार दे सकता है। रक्षाबंधन भाइयों और बहनों के बीच भावनात्मक बंधन का प्रतीक है। बहनों के स्नेह बंधन में बंधकर, भाई उनकी रक्षा  करने का वचन देते हैं। राखी बांधना अब केवल भाइयों और बहनों के बीच तक सीमित नहीं रह गया है। अब देश की रक्षा, पर्यावरण की रक्षा, धर्म की रक्षा, हितों की रक्षा आदि के लिए राखी बांधी जाने लगी है। रवींद्रनाथ जी ने बंगाल के विघटन के खिलाफ इस त्योहार पर जन जागरूकता फैलाई थी और इस त्योहार को एकता और भाईचारे का प्रतीक बनाया था। प्रकृति को बनाए रखने के लिए वृक्षों को राखी बांधने की परंपरा भी शुरू हो गई है। 

वहीं दूसरी ओर, सम्मान और आस्था दिखाने के लिए भी राखी बांधी जाती है। रक्षाबंधन का महत्व आज के समय में इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि समाज में आज मूल्यों की कमी होने से प्रेम और सम्मान की भावना भी कम होती जा रही है। यह त्योहार आंतरिक बंधन को मजबूत करके हमारे भीतर सामाजिकता का विकास करता है। यह त्योहार/Festival परिवार, समाज, देश और दुनिया के प्रति हमारे कर्तव्यों की जागरूकता को भी बढ़ाता है। 
 

पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व/ Mythological and historical significance

हिंदू पौराणिक कथाओं में रक्षाबंधन/Rakshabandhan का इतिहास मिलता है। इस पर्व का प्रसंग वामन अवतार की कहानी/Story में मिलता है। कहानी इस प्रकार है- राजा बलि के यज्ञ द्वारा स्वर्ग पर अपना अधिकार करने का प्रयास करने पर इंद्र ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। तब विष्णु जी के वामन ब्राह्मण के रूप में राजा बलि से भिक्षा मांगने पर गुरु के मना करने के बावजूद बाली ने तीन पग भूमि दान कर दी। भगवान वामन ने आकाश, अधोलोक और पृथ्वी को तीन चरणों में मापा और राजा बलि को गहरी खाई में फेंक दिया। तब अपनी भक्ति के कारण, उसके विष्णु जी से हर समय अपने सामने रहने का वचन लेने पर, लक्ष्मी जी चिंतित हो उठीं। तब नारद जी की सलाह पर, लक्ष्मी जी ने बाली के पास जाकर रक्षा सूत्र (रक्षा का धागा) बांधकर उसे अपना भाई बना लिया। बदले में, वह विष्णु जी को अपने साथ ले आईं। यह श्रावण की पूर्णिमा थी। इतिहास में राखी के महत्व के कई संदर्भ मिलते हैं। मेवाड़ की महारानी कर्णावती ने मुगल बादशाह हुमायूँ को राखी भेजकर सुरक्षा की कामना की थी और हुमायूं ने मुसलमान होते हुए भी राखी का सम्मान रखा था। कहा जाता है कि सिकंदर की पत्नी ने अपने पति के हिंदू शत्रु, राजा पुरु को राखी बांधकर अपना भाई बना लिया था और युद्ध के दौरान सिकंदर को नहीं मारने का प्रण लिया था। 

भाई-बहन के प्रेम का पर्व रक्षाबंधन / Rakshabandhan brother and sister love

वैसे भी भाई-बहन का विशेष संबंध रक्षा से संबंधित होता है, जहां भाई और बहन एक दूसरे की रक्षा करने का संकल्प लेते हैं। इस दिन सभी बहनें अपने भाइयों को राखी बांधती हैं और हर समय उनकी रक्षा करने का वादा करती हैं, और भाई भी अपनी बहनों से वादा करते हैं कि जो भी हो वह उनके साथ खड़े रहेंगे। राजस्थान में राखी बांधने की एक अनूठी परंपरा है, जिसमें ननद द्वारा भाभी को एक विशेष प्रकार की राखी बांधी जाती है जिसे लुंबा के नाम से जाना जाता है। कुछ क्षेत्रों पर बहनें, अपनी बहनों को भी राखी बांधती हैं।

भाई-बहन के संबंधों का प्रतीक/ Symbol of brother-sister relationship

हिंदुओं का प्रमुख त्योहार रक्षाबंधन भाई-बहन के संबंधों का पर्व है जो भारत के कई हिस्सों में भाइयों और बहनों के बंधन को मजबूत बनाने के लिए मनाया जाता है। इसके साथ ही इसे नेपाल और पाकिस्तान में भी बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। हिंदुओं के अलावा, भारत में अन्य धर्मों के लोग भी इस पर्व बड़े उत्साह और जोश के साथ मनाते हैं। यह एक ऐसा त्योहार है जो पारिवारिक संबंधों की एकता और विशेषता को दर्शाता है जो मुख्य रूप से भाई-बहनों के रिश्ते को समर्पित है। यह त्योहार भारत में लंबे समय से मनाया जाता रहा है।

रक्षा बंधन का सामाजिक संदर्भ/ Social Context of Raksha Bandhan

इस दिन बहनें अपने भाईयों के दाहिने हाथ पर राखी बांधती हैं और उनके माथे पर तिलक करती हैं और उनकी लंबी उम्र की कामना करती हैं। बदले में, भाइयों द्वारा बहनों की रक्षा करने का वचन दिया जाता है। ऐसा माना जाता है कि राखी के रंग-बिरंगे धागे भाई-बहनों के प्रेम के बंधन को मजबूत करते हैं। रक्षाबंधन स्नेह के बंधन के साथ संबंधों को मजबूत करने का त्योहार है। यही कारण है कि इस अवसर पर न केवल बहन-भाइयों  बल्कि अन्य संबंधों में भी रक्षा सूत्र (या राखी) बांधने की प्रथा है। गुरु शिष्य को धागा बांधता है और शिष्य गुरु को।

प्राचीन काल में जब स्नातक अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद गुरुकुल छोड़ते थे, तो वे आचार्य से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए रक्षा सूत्र बांधा करते थे, जबकि आचार्य अपने छात्रों को रक्षा सूत्र इस कामना से बाँधते थे कि वे  ज्ञान अर्जित कर चुके हैं  तथा शिक्षक की गरिमा और अपने ज्ञान की सफलतापूर्वक रक्षा करने के लिए उन्हें अपने जीवन में इसका उचित उपयोग करना चाहिए। 

इस परंपरा के अनुसार, आज भी किसी भी धार्मिक अनुष्ठान से पहले पुजारियों द्वारा यजमानों को रक्षा सूत्र बांधा जाता है। इस तरह, दोनों एक-दूसरे के सम्मान की रक्षा करने का वचन लेते हैं। रक्षाबंधन पर्व सामाजिक और पारिवारिक एकता का प्रतीक रहा है। विवाह के उपरांत, बहनों के दूसरे घर चले जाने पर, इसी बहाने हर साल उनके रिश्तेदार ही नहीं, बल्कि दूर के भाई भी उनके घर जाकर राखी बंधवाते हैं और अपने संबंधों को पुनर्जीवित करते हैं। यह दो परिवारों और कुलों का मिलन होता है। इस त्योहार को समाज के विभिन्न वर्गों के बीच एकता के प्रतीक के रूप में भी प्रयोग किया जाता है ताकि जो संपर्क टूट जाते हैं उन्हें इसके द्वारा जोड़ा जा सके।

स्वतंत्रता संग्राम में रक्षा बंधन की भूमिका/ Role of Raksha Bandhan in Freedom Struggle

इस त्योहार को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में, जन जागरूकता के माध्यम के रूप में भी इस्तेमाल किया गया था। प्रसिद्ध भारतीय नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर जी का मानना ​​​​था कि रक्षाबंधन न केवल भाई और बहन के बीच के बंधन को मजबूत करने का दिन है, बल्कि हमें इस दिन अपने हमवतनों के साथ अपने संबंधों को भी मजबूत करना चाहिए। ब्रिटिश सरकार की ,'फूट करो और राज करो' वाली नीति के तहत वह बंगाल के विभाजन के बारे में सुनकर टूट गए थे। यह विभाजन हिंदुओं और मुसलमानों के बीच तेजी से बढ़ते संघर्षों के आधार पर किया गया था। यह वह समय था जब रवींद्रनाथ टैगोर जी ने हिंदुओं और मुसलमानों को करीब लाने के लिए रक्षाबंधन उत्सव की शुरुआत करके, दोनों धर्मों के लोगों से इस पवित्र धागे को एक-दूसरे को बांधने और उनकी रक्षा करने के लिए कहा था। दोनों धर्मों के लोगों के बीच संबंध मजबूत करने के लिए आज भी, पश्चिम बंगाल में लोगों द्वारा एकता और सद्भाव में वृद्धि करने के लिए अपने दोस्तों और पड़ोसियों को राखी बांधी जाती है। 

रक्षा बंधन पर सरकारी व्यवस्था/ Government Arrangement on Raksha Bandhan

इस अवसर पर भारत सरकार के डाक एवं तार विभाग द्वारा दस रुपये मूल्य के आकर्षक लिफाफों की बिक्री की जाती है जिसकी कीमत पांच रुपये और डाक शुल्क पांच रुपये होता है। राखी के त्योहार पर बहनें अपने भाईयों को महज पांच रुपये में तीन-चार राखियां भेज सकती हैं। डाक विभाग द्वारा बहनों को दिए गए इस उपहार के तहत पचास ग्राम वजन का राखी का लिफाफा सिर्फ पांच रुपये में भेजा जा सकता है, जबकि सामान्य तौर पर, बीस ग्राम के लिफाफे में सिर्फ एक राखी भेजी जा सकती है। यह सुविधा केवल रक्षाबंधन तक उपलब्ध रहती है। बारिश के मौसम को ध्यान में रखते हुए, रक्षाबंधन/Rakshabandhan 2022 के अवसर पर वर्ष २००७ से बारिश से बचाने वाले जलरोधी लिफाफे भी डाक-तार विभाग द्वारा उपलब्ध कराये जाते हैं। यह लिफाफे दूसरे लिफाफों से अलग होते हैं और इनका आकार और डिजाइन अलग होने के कारण इनमें राखी ज्यादा सुरक्षित रहती हैं। सरकार इस अवसर पर कन्याओं और महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा का भी प्रावधान करती है जिससे बहनें बिना धन खर्च किए अपने भाइयों के पास राखी बांधने जा सकती हैं। यह सुविधा रक्षा बंधन पर ही उपलब्ध होती है लेकिन यह सुविधा हर जगह नहीं होती। 

राखी और आधुनिक तकनीकी माध्यम/ Rakhi 2022 and modern technical medium

तकनीकी युग और सूचना संचार का राखी जैसे त्योहारों पर भी प्रभाव पड़ा है। आजकल बहुत से भारतीय विदेश में रहते हैं, और उनके परिवार के सदस्य (भाई-बहन) भारत या अन्य देशों में रहते हैं। इंटरनेट की शुरुआत के बाद, कई ई-कॉमर्स साइट्स खुल गई हैं जो ऑनलाइन ऑर्डर लेकर राखी और अन्य सभी संबंधित सामान दिए गए पते पर पहुंचाती हैं। दूर रहने के कारण राखी पर नहीं मिल सकने वाले भाई बहनों द्वारा, आधुनिक तरीकों से देखकर और सुनकर इस त्यौहार को मनाया जाता है।

रक्षाबंधन मंत्र/ Rakshabandhan Mantra

भारतीय संस्कृति में कथा/Story, पूजन/Rakshabandhan Pooja और अनेक अनुष्ठानों के समय रक्षा सूत्र बांधने का विशेष महत्व है। सुरक्षा के तीन धागों को तीन बार लपेट कर इस मंत्र से बांधा जाता है।

येन बद्धो बलि राजा,दानवेन्द्रो महाबल: 

तेन त्वाम् प्रतिबद्धनामि रक्षे माचल माचल:।

राखी के इस मंत्र का अर्थ है- जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बांधा गया था, उसी रक्षाबंधन से मैं तुम्हें बांधता हूं, जो तुम्हारी रक्षा करेगा| हे रक्षे! (रक्षासूत्र) तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो। 

राखी बांधने का पारंपरिक तरीका/ The traditional method for tying Rakhi

१) सबसे पहले राखी के दिन पवित्र स्नान करके देवी-देवताओं का आशीर्वाद लेने के लिए देवताओं की पूजा करनी चाहिए। 

२) राखी, चावल, रोली, या सिंदूर को चांदी, पीतल या तांबे की प्लेट में एक छोटी कटोरी में रखें और इसे पानी या इत्र से मिला लें।

 ३) राखी की थाली को पूजा स्थल पर रखकर सबसे पहले बाल गोपाल या अपने इष्ट देवता को राखी अर्पित करके प्रार्थना करनी चाहिए। 

४) राखी बांधते समय भाई का मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। इससे राखी पर भी देवताओं की कृपा बनी रहती है। 

५) राखी बांधते समय भाइयों को अपने सिर पर रूमाल या कोई साफ कपड़ा रखना चाहिए।

६) बहनों को सबसे पहले भाई के माथे पर रोली का टीका लगाना चाहिए।

७) तिलक के ऊपर कच्चे चावल (अक्षत) लगाएं और आशीर्वाद के रूप में भाई पर कुछ अक्षत छिड़कने चाहिए।

८) भाईयों को अमंगल से बचाने के लिए दीपक से आरती उतारने चाहिए। यदा-कदा बहनें अपने भाइयों को काजल लगाती हैं।

९) मंत्र का जाप करते हुए, भाई की दाहिनी कलाई पर राखी का पवित्र धागा बांधने से, राखी के धागों को शक्ति मिलती है।

१०) भाई-बहनों को एक-दूसरे को मिठाई खिलानी चाहिए।

११) भाई बड़ा हो, तो बहनों को भाई के पैर छूने चाहिए। बहनें बड़ी हों, तो भाइयों को पैर छूकर आशीर्वाद लेना चाहिए।

१२) भाई को वस्त्र, आभूषण या धन देकर बहन के सुखी जीवन की कामना करनी चाहिए।

रक्षाबंधन के अवसर पर बनाए जाने वाले व्यंजन/ Delicacies prepared on the occasion of Raksha Bandhan

भारत में कोई भी उत्सव बिना व्यंजनों को बनाए पूर्ण नहीं होता है। प्रत्येक उत्सव पर कुछ खास व्यंजन बनाए जाते हैं। इसी तरह रक्षाबंधन के मौके पर घेवर, शकरपारे, नमकीन पारे आदि चीजें खास तौर से बनाई जाती हैं। सावन के महीने में घेवर मुख्य मिठाई मानी जाती है। इसका सेवन पूरे उत्तर भारत में पूरे महीने में किया जाता है। हलवा, पूड़ी और खीर भी इस त्योहार की कुछ प्रचलित मिठाइयां हैं।

निष्कर्ष/ Conclusion

आखिरकार कहा जा सकता है कि राखी के इस पर्व का भाई-बहनों के लिए विशेष महत्व है। आज के युग में यह पर्व हमारी संस्कृति की विशेषता बन गया है और हमें इस पर गर्व होना चाहिए। इस पर्व को मनाने के साथ ही, हमें एक-दूसरे के साथ सद्भाव से रहने का संकल्प भी लेना चाहिए। उतार-चढ़ाव में सभी के साथ तालमेल बिठाकर रहना चाहिए। आज कई भाई अपनी कलाई पर राखी नहीं बांध पा रहे हैं क्योंकि उनकी बहनों को इस संसार में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है। यह शर्म की बात है कि जिस देश में कन्याओं की पूजा की जाती है वहां पर कन्या-भ्रूण हत्या के मामले सामने आते रहते हैं। यह त्योहार हमें यह भी याद दिलाता है कि बहनें हमारे जीवन में कितना महत्व रखती हैं। यह त्योहार सामान्य लोगों तथा देवी-देवताओं द्वारा भाई-बहनों के पवित्र संबंध को बनाए रखने के लिए भी मनाया जाता है। कई भाई-बहनें व्यावसायिक और व्यक्तिगत कारणों से एक-दूसरे से नहीं मिल पाते हैं। फिर भी, इस विशेष अवसर पर, वे निस्संदेह एक-दूसरे के लिए समय निकालते हैं और इस पवित्र त्योहार को मनाते हैं। हमें इस त्योहार को खुशी और नैतिक मूल्यों के साथ मनाना चाहिए।

अगले पांच वर्षों में इन तिथि पर आएगी रक्षाबंधन

यह है अगले पांच वर्षों के लिए रक्षाबंधन की तारीखें।

  • गुरुवार-   11 अगस्त 2022 
  • बुधवार-   30 अगस्त 2023 
  • सोमवार-  19 अगस्त 2024  
  • शनिवार-    9 अगस्त 2025 
  • शुक्रवार-  28 अगस्त 2026

कजरी तीज
14 Aug, 2022

सभी लोग हरियाली तीज के बारे में जानते ही होंगे। इसी तीज की तरह एक और तीज होती है – कजरी तीज। महिलाओं के लिए हरियाली तीज की तरह ही कजरी तीज/kajari teej 2021 उतनी ही महत्व रखता है। यह भाद्रपद मास के दौरान कृष्ण पक्ष के तीसरे दिन मनाया जाता है। यह त्यौहार उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान में भव्य रूप से मनाया जाता है। कजरी तीज को कजली तीज/Kajli Teej के नाम से भी जाना जाता है। इस त्यौहार का महत्व/Significance of Kajri Teej महिलाओं के लिए सबसे अधिक होता है। इस दिन विवाहित महिलाएं अपने वैवाहिक जीवन की सुख-समृद्धि के लिए व्रत/ Kajari Teej Vart रखती हैं। कजली तीज को अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग नामों से जाना जाता है लेकिन पूरे भारत में इसकी मान्यता एक जैसी है। यह मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार जैसे राज्यों में मनाया जाता है। इन राज्यों में इसे बुरी तीज और सतूड़ी तीज के नाम से भी जाना जाता है।

दांपत्य जीवन में सुख-समृद्धि के लिए यह व्रत/ Fasting किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि अगर कोई कन्या या विवाहित महिला इस दिन भगवान शिव और देवी पार्वती की पूरी भक्ति और आराधना के साथ पूजा करती है, तब उन्हें एक सही जीवनसाथी की प्राप्ति होती है। यह भी माना जाता है कि इस दिन बहुत समय बाद ही देवी पार्वती भगवान शिव के साथ होती हैं। कई जगहों पर कजली तीज के अवसर पर मुख्य रूप से गौरी की पूजा/ Kajari Teej Puja की जाती है। यदि किसी की कुंडली में कोई भी बाधा हो, और वह इस पूजा को पूर्ण रीति रिवाज/ Rituals of Kajli Teej के साथ करे, तो उसकी सभी बाधाएं दूर हो जाती है। हालांकि, इस पूजा का फल तभी प्राप्त होगा यदि आप अविवाहित और स्वयं इस पूजा को करें। ऐसी मान्यता है कि कजली तीज के दिन देवी पार्वती को इसी दिन भगवान शिव की प्राप्ति हुई थी। देवी पार्वती ने इसके लिए चुनौतीपूर्ण ध्यान साधना का सामना किया था। इस पर्व/Festival के अवसर पर विवाहित महिलाओं को भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करनी चाहिए। ऐसा कहा जाता है कि जिन महिलाओं का विवाह नहीं होता, उन्हें इस पर्व पर व्रत रखने से अच्छे जीवनसाथी का आशीर्वाद मिलता है। 

इस पर्व के दिन पति और पत्नी को एक दूसरे से विश्वासघात, गलत व्यवहार और एक दूसरे के पीठ पीछे बुराई नहीं कहना चाहिए। इस दिन विवाहित और अविवाहित महिलाएं व्रत रखती हैं। यह व्रत उनके लिए एक आवश्यक कार्य बन जाता है। इस दिन सभी महिलाएं अपना श्रृंगार करती हैं। और फिर, शाम को, वह सभी एक मंदिर में जाकर भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करते हैं। इस दिन पत्नी अपने पति की लंबी उम्र की कामना करती है। कजली तीज के दिन घर में झूला लगाने की प्रथा है। इस दिन महिलाएं दिन भर अपने दोस्तों के साथ बैठकर गीत गाती हैं और साथ में नृत्य भी करती हैं। विवाहित महिलाएं अपने पति के लिए व्रत/Kajri Teej Vrat रखती हैं और अविवाहित महिलाएं सही जीवनसाथी पाने के लिए इसका पूर्ण रूप से पालन करती हैं।

कजली तीज का महत्व/ Importance of Kajali Teej

विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और उसके सुख समृद्धि के लिए इस व्रत को रखती हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन देवी पार्वती ने भगवान शिव का साथ प्राप्त करने के लिए गहन ध्यान और कड़े परिश्रम से गुजरी थी। जिनको अच्छे जीवनसाथी की तलाश होती है उन्हें इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूरे मन से पूजा करनी चाहिए। ऐसा करने से अविवाहितों को योग्य वर का वरदान प्राप्त होता है और विवाहित स्त्रियों को सदा के लिए भाग्यशाली होने का वरदान मिल जाता है। जो महिलाएं मां पार्वती की पूजा पूरे मन से करती हैं उनकी मनोकामना जरूर पूरी होती है। कजरी तीज पर मां पार्वती की पूजा करने वाली सभी महिलाओं को अपने पति के साथ सुखी जीवन का आशीर्वाद मिलता है। 

एक पौराणिक कथा के अनुसार, देवी पार्वती ने 108 जन्मों के बाद भगवान शिव से विवाह करने में सफलता प्राप्त की थी। इतने कड़े परिश्रम के बाद ही देवी पार्वती को भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त हुआ था। इस दिन को निस्वार्थ प्रेम की भावना के साथ मनाया जाता है। यह और कुछ नहीं बल्कि देवी पार्वती की निस्वार्थ भक्ति ही थी जिसने भगवान शिव को उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करने पर मजबूर किया। कजरी तीज/Kajali Teej 2021 के दिन जौ, गेहूं, चना मटर और चावल के सत्तू को घी में मिलाकर कई तरह के व्यंजन बनाए जाते हैं। चांद को देखने के बाद व्रत/Fasting खोलने के लिए भोजन किया जाता है।

कजली तीज क्यों मनाई जाती है?/ Why is Kajli Teej Celebrated?

तीज का त्यौहार विवाहित जोड़ों के लिए बहुत महत्व रखता है क्योंकि यह एक ऐसा त्योहार है जो पति और पत्नी के रिश्ते को और भी ज्यादा मजबूत करता है। इस दिन सत्तू खाकर व्रत खोलने की परंपरा है। नीम के पेड़ की पूजा करना इस त्योहार का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा है। लोग इस दिन नए कपड़े पहन कर व्रत करते हैं और बाद विभिन्न व्यंजनों का आनंद लेते हैं। ऐसा माना जाता है कि देवी पार्वती को कजरी तीज पर गहन ध्यान करने के बाद अपने जीवन में भगवान शिव के होने का फल मिला था। इसलिए इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती दोनों की पूजा की जाती है। यदि कोई अविवाहित महिला इस दिन व्रत रखती है और पूरी पूजा मन से करती है तो उसे अपनी पसंद का वर मिलता है।

कजली तीज को कजली तीज क्यों कहा जाता है?/ Why is Kajali Teej known as Kajli Teej?

प्राचीन किवदंतियों के अनुसार भारत के मध्य भाग में कजली नाम का एक जंगल मौजूद था, जहां ददुरै नाम का एक राजा शासन करता था। इस राज्य में लोग कजली के आधार पर गीत गाते थे। यही कारण है कि उनका स्थान पूरे भारत में  प्रसिद्ध हो गया था। कुछ वर्षों के बाद राजा ददुरै की मृत्यु हो गई, राजा की मृत्यु के बाद उसकी रानी नागमती विधवा हो गई। इन सबके कारण उनकी प्रजा बहुत दुखी और उदास कर दिया। इसलिए, कजली के गीत पति और पत्नी की एकता के लिए गाए जाते हैं।

दूसरी ओर, एक प्रेमपूर्ण मिथक के अनुसार, देवी पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में चाहा। हालांकि उस समय भगवान शिव ने उनके सामने एक शर्त रखी थी। शर्त के अनुसार, देवी पार्वती को भगवान शिव के लिए अपनी सच्ची भक्ति और प्रेम साबित करना पड़ा था। इसके पश्चात, देवी पार्वती ने भगवान शिव के नाम पर 108 वर्षों तक तपस्या की और भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए सभी परीक्षा में खड़ी रहीं। इसके बाद तीज के दिन भगवान शिव ने देवी पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इसी वजह से इस दिन को कजरी तीज के नाम से भी जाना जाता है। इसी कारण इस दिन सभी देवता तीज पर देवी पार्वती और भगवान शिव की पूजा करते हैं क्योंकि इससे वह प्रसन्न होते हैं।

कजली तीज कैसे मनाया जाता है?/How is Kajali Teej Celebrated?

कजली तीज/Kajli teej 2021 के दिन, विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं, और अविवाहित महिलाएं इस दिन अपनी पसंद का वर प्राप्त करने का आशीर्वाद पाने के लिए व्रत रखती हैं। इस दिन जौ, गेहूं, चना मटर और चावल के सत्तू को घी में मिलाकर कई तरह के व्यंजन बनाए जाते हैं। चंद्रमा की पूजा करने के बाद व्रत का समापन होता है। इसके अलावा कजरी तीज पर गायों की पूजा करने का भी प्रावधान है। साथ ही इस दिन झूले भी लगाए जाते हैं और महिलाएं एक साथ बैठकर गीत गाती हैं और साथ में नृत्य भी करती हैं। कजरी गीत गाना इस त्योहार का एक अविभाज्य हिस्सा है। नीम के पेड़ की भी पूजा की जाती है।

कजली तीज पर की जाने वाली परंपरा/The tradition followed on Kajli Teej.

1. इस दिन विवाहित महिलाएं व्रत रखती हैं ताकि उनके पति को लंबी आयु प्राप्त हो और अविवाहित लड़कियां अपनी पसंद का वर के वरदान के लिए यह व्रत रखती हैं।

2. इस दिन जौ, गेहूं, चना मटर और चावल के सत्तू को घी में मिलाकर कई तरह के व्यंजन बनाए जाते हैं। चंद्रमा के उदय होने के बाद व्रत खोलने के लिए भोजन किया जाता है।

3. इस दिन विशेष रूप से गायों की पूजा की जाती है। गेहूँ के सात छोटे गोले बनाकर उन पर घी, गुड़ लगाया जाता है। इसके बाद इन्हें गायों को खिलाया जाता है, और फिर भोजन किया जाता है।

4. कजली तीज पर झूले लगाए जाते हैं। लोग झूले पर एक साथ बैठते हैं और एक साथ कजली तीज/Kajli Teej 2021 के गीत गाते हैं और नृत्य करते हैं।

5. इस दिन कजरी गीत गाने की अनूठी परंपरा है।

कजली तीज के अनुष्ठान/ Rituals of Kajli Teej

इस पर्व पर निमड़ी देवी की पूजा करने का विधान है। पूजा/ Kajari Teej Puja से पूर्व दीवार पर घी और गुड़ से बनी पाल बांधकर मिट्टी और गाय के गोबर का उपयोग कर तालाब जैसी संरचना बनाई जाती है। और फिर उसके बगल में नीम के पेड़ की एक शाखा रखी जाती है। तालाब में कच्चा दूध और पानी चढ़ाया जाता है, और एक दीया जलाया जाता है और वहां रखा जाता है। एक प्लेट में नींबू, खीरा, केला, सेब, सत्तू, रोली, मौली, अक्षत आदि रखे जाते हैं। इसके अलावा किसी पात्र में थोड़ा कच्चा दूध लें और शाम को उसका श्रृंगार कर लें। सारी तैयारी करने के पश्चात निम्नलिखित तरीकों से देवी निमड़ी की पूजा करें:

1. सबसे पहले देवी निमड़ी पर थोड़ा पानी और रोली छिड़कें और फिर चावल चढ़ाएं।

2. देवी निमड़ी के पीछे की दीवार पर मेहंदी, रोली और काजल के 13 टीके उँगलियों से लगाए। मेहंदी का टीका, अनामिका से रोली और तर्जनी से काजल का टीका लगाना चाहिए।

3. देवी निमड़ी को मौली अर्पित करने के बाद उन्हें मेंहदी, काजल और वस्त्र अर्पित करें। दीवार पर टीके का सहारा लेकर लच्छा बांधें या रोली बांधे।

4. देवी निमड़ी को फल और दक्षिणा अर्पित करें और पूजा पात्र पर रोली का टीका लगाकर लच्छा बांधें।

5. पूजा स्थल पर तालाब के किनारे रखे दीये की रोशनी में नींबू, खीरा, नीम की टहनी, नाक की नथनी, साड़ी का पल्ला आदि देखें। इसके बाद चंद्रमा को अर्घ्य दें।

चन्द्रमा को अर्घ्य देने का विधान/ Ritual of offering Arghya to the Moon

कजरी तीज की शाम को देवी निमड़ी की पूजा करने के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा सदियों पुरानी है और इसे आज भी उसी निष्ठा से निभाया जाता है।

1. चंद्रमा को जल, रोली, मौली और अक्षत की बूंदें चढ़ाएं और फिर भोग लगाएं।

2. हाथों में चांदी की अंगूठी और गेहूं के दाने पकड़कर जल को अर्घ्य दें और फिर एक स्थान पर खड़े होकर चार बार घुमाएं।

कजरी तीज का नियम/ Rule of Kajari Teej

1. आमतौर पर यह व्रत निर्जल उपवास होता है। हालांकि, गर्भवती महिलाओं को फल खाने की अनुमति होती है।

2. यदि किसी कारण चंद्रमा नहीं देखता तो रात के लगभग 11:30 बजे आकाश की ओर देखते हुए अर्घ्य देकर व्रत को खोला जा सकता है।

3. उद्यान के बाद यदि पूर्ण व्रत रखने की क्षमता ना हो तो आप फलों का सेवन भी कर सकते हैं।

ऊपर बताए गए नियमों/ Rule of Kajari Teej के अनुसार यदि विवाहित महिला कजरी का व्रत करती है तो उसके परिवार को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। और यदि अविवाहित कन्या व्रत करती है तो उसे अपनी पसंद का वर प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त होता है।

कजरी तीज या कजली तीज का प्राचीन मिथक/ Ancient Myth of Kajari Teej or Kajli Teej

एक गाँव में एक गरीब ब्राह्मण रहता था। उनके साथ उनकी ब्राह्मण पत्नी भी रहती थी। उस समय भाद्रपद के महीने में कजरी तीज का आगमन हुआ था। ब्राह्मण पत्नी ने देवी तीज के नाम पर व्रत रखा। उसने अपने पति से कहा कि उसने कजरी तीज का व्रत रखा है और उसे सत्तू की जरूरत है, और उसने उसे चने से बना सत्तू लाने को कहा। ब्राह्मण पति ने अपनी ब्राह्मणी पत्नी से पूछा कि उसे सत्तू कैसे और कहाँ से मिलेगा। इस पर, उसने अपने पति से कहा कि किसी भी कीमत पर वह इसकी व्यवस्था करें, चाहे वह चोरी से हो या लूट से। ब्राह्मण घर से निकल कर साहूकार की दुकान पर गया। यहां से उसने सवा किलो चना दाल, घी, चीनी लिया। फिर उसने इनमें से सत्तू बनाया। जैसे ही वह जा रहा था, सभी नौकर जाग गए। शोर सुनकर सब लोग चोर-चोर चिल्लाने लगे| साहूकार ने आकर ब्राह्मण को पकड़ लिया। ब्राह्मण ने कहा कि वह चोर नहीं है और वह एक गरीब ब्राह्मण है। उसकी पत्नी ने तीज का व्रत रखा है इसलिए वह सवा किलो सत्तू तैयार करने आया था ताकि वह उसे अपनी पत्नी के पास ले जा सके। जब साहूकार ने ब्राह्मण की जाँच की, तो उसे सत्तू के अलावा कुछ नहीं मिला। दूसरी तरफ चंद्रमा का उदय हो चुका था और ब्राह्मण पत्नी सत्तू की प्रतीक्षा कर रही थी। साहूकार ने ब्राह्मण से कहा कि आज से वह ब्राह्मण की पत्नी को अपनी धर्म बहन मानेगा। वह ब्राह्मण को सत्तू, आभूषण, धन, मेंहदी और लच्छा सहित ढेर सारी सामान देकर आदर सत्कार से विदाई देता है। इसके बाद सभी ने देवी कजली की पूजा की। जिस प्रकार ब्राह्मण को सुख की प्राप्ति हुई, उसी प्रकार देवी कजली की कृपा से सभी पर कृपा बनी रहती है।

गाय की पूजा होती है/ Cow is worshipped

इस पर्व पर जो जो बनाया जाता है उन सभी के बारे में आपको पहले ही बताया गया है। इस दिन गाय की विशेष रूप से पूजा की जाती है। गेहूं की रोटी पर गुड़ और चने रखकर गाय को चढ़ाया जाता है। और फिर, उपवास खोला जाता है।

कजरी तीज और सोलह श्रृंगार/ Kajari Teej and Solah Shringar

कजरी तीज पर देवी पार्वती की मूर्ति का झांकी निकाली जाती है। अविवाहित महिलाएं नृत्य भी करती हैं। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए प्रार्थना करती हैं और अखंड दीपक जलाकर पूरी रात जागती हैं। ऐसा करना अनिवार्य नहीं है लेकिन महिलाएं यह अपने लिए करती हैं। इस दिन महिलाएं हाथों में मेहंदी लगाती हैं और सोलह श्रृंगार करती हैं। इस दिन घर में झूला भी लगाया जाता है।

कजरी तीज पर महिलाएं मालपुआ और घेवर जैसे स्वादिष्ट व्यंजन बनाती हैं। वह  इस दिन चारों ओर हरियाली का आनंद लेते हैं और झूलों पर झूलते हुए गीत भी गाते हैं।

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भारत में कहां मनाई जाती है कजरी तीज?/ Where is Kajari Teej Observed in India?

कजरी तीज भारत के कई हिस्सों में मनाई जाती है। यह भारत के अलग अलग राज्यों में अलग-अलग तरीकों से मनाई जाती है। यह उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि में बड़े धूमधाम से मनाई जाती है।

विभिन्न राज्यों में अलग अलग तरह से यह त्यौहार मनाया जाता है|

1. बिहार और उत्तर प्रदेश में नावों पर कजरी गीत गाए जाते हैं। वाराणसी और मिर्जापुर में वार्षिक गीतों के साथ कजरी गीत भी गाए जाते हैं। ऐसे एक ही राज्य में इसे मनाने के दो तरीके मिल गए।

2. राजस्थान में इस पर्व को विशेष महत्व दिया जाता है। विशेष रूप से बूंदी शहर में बहुत धूमधाम और शोर शराबे के साथ मनाया जाता है। इस दिन लोग घोड़ों और ऊंटों की सवारी भी करते हैं। बूंदी में तीज का उत्सव दुनिया भर में प्रसिद्ध है, और लोग इसकी भव्यता को देखने के लिए दूर-दूर से आते हैं।

कजरी तीज पर महिलाओं को क्या नहीं करना चाहिए/ What should not be done by Women on Kajari Teej?

  • इस दिन विवाहित महिलाओं को सफेद साड़ी नहीं पहननी चाहिए और उन्हें बिना गहनों के नहीं रहना चाहिए।
  • कजरी तीज पर भोजन और पानी का सेवन न करें क्योंकि यह व्रत निर्जला व्रत होता है। बिना पानी पिए इसका पालन करना इस पर्व की आवश्यकता है।
  • आस-पास साफ-सफाई रखने पर ध्यान दें क्योंकि कजरी तीज पर साफ-सफाई का काफी महत्व/Significance है।
  • कजरी तीज पर कृपया अपने पति से ऐसा कुछ भी न कहें जिससे उन्हें दुख पहुंचे।
  • कजरी तीज पर पति से दूर न रहें।
  • कजरी तीज के अवसर पर अपशब्द न कहें।
  • कजरी तीज पर किसी से पीठ पीछे न बोलें और न ही किसी से जलन महसूस करें।
  • कजरी तीज पर घर में कोई लड़ाई ना करें। परिवार के सदस्यों के साथ अच्छा व्यवहार करें।
  • इस दिन विवाहित महिलाओं को अपनी हथेलियों पर मेहंदी लगानी चाहिए। शास्त्रों के अनुसार  मेहंदी प्यार का प्रतीक है।
  • इस दिन चूड़ियां जरूर पहननी चाहिए। बिना चूड़ियों के रहना अशुभ माना जाता है।

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कृष्ण जन्माष्टमी
18 Aug, 2022

पृथ्वी को पापों के भार से रहित करने के लिए भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि रोहिणी नक्षत्र में भगवान विष्णु का कृष्ण के रूप में अवतार हुआ । जन्माष्टमी/ krishna Janmashtami को भगवान कृष्ण का जन्मदिन माना जाता है; यह पर्व विश्व भर में आस्था और भक्ति के साथ मनाया जाता है। लोगों की श्रीकृष्ण के प्रति आस्था सदियों से है। वह कभी यशोदा नंदन हैं तो कभी ब्रज के नटखट गिरधर गोपाल। भारतवर्ष में यह बड़े ही उत्साह से मनाया जाता है; इसकी तैयारियां इसके आगमन से पूर्व ही प्रारम्भ हो जाती हैं। कृष्ण-भक्ति  के रंगों में सारा माहौल गुंजायमान हो जाता है। जन्माष्टमी का पर्व आस्था और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। श्रीमद्भागवत को प्रमाण मानकर स्मार्त सम्प्रदाय के लोग चंद्रोदय व्यापनी अष्टमी अर्थात रोहिणी नक्षत्र को जन्माष्टमी मनाते हैं और वैष्णव व्यापानी अष्टमी और उदयकाल रोहिणी नक्षत्र को जन्माष्टमी मनाते हैं। 

जन्माष्टमी के अलग-अलग रूप हैं और इस पर्व को अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है। कहीं रंगों की होली होती है तो कहीं फूलों की महक और कहीं, दही हांडी का भव्य आयोजन होता है, और कहीं, भगवान कृष्ण के जीवन के मोहक पझालू झांकियों के रूप में देखने को मिलते हैं। मंदिरों को भव्यता से सजाया जाता है। इस अवसर पर श्रद्धालु उपवास रखते हैं। इस दिन, मंदिरों को सजाया जाता है, और भगवान कृष्ण का झूला बनाया जाता है, और कृष्ण रासलीला का आयोजन भी किया जाता है।

जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर श्रद्धालु भगवान कृष्ण के दर्शन के लिए मथुरा आते हैं। मंदिरों को मोहकता से सजाया जाता है। मथुरा में जन्माष्टमी पर आयोजित श्रीकृष्ण जयंती को देखने के लिए विदेशों से भी लाखों कृष्ण भक्त पहुंचते हैं। भगवान की प्रतिमा पर हल्दी, दही, घी, तेल, गुलाब जल, मक्खन, केसर, कपूर आदि चढ़ाकर लोग इसे एक-दूसरे पर छिड़कते हैं। जन्माष्टमी का व्रत सभी नियमों के अनुसार करने से भक्त मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह व्रत मनोकामना पूर्ति के लिए किया जाता है। श्रीकृष्ण की भक्ति का यह पावन पर्व सभी को कृष्ण भक्ति से परिपूर्ण देता है। यह पर्व सनातन धर्म मानने वालों के लिए आवश्यक माना जाता है। इस दिन व्रत रखा जाता है और लोग कृष्ण भक्ति के गीत सुनते हैं। श्रीकृष्ण-लीला की झाँकी को घरों और मंदिरों में सजाया जाता है।

जन्माष्टमी का महत्व/ Importance of Janmashtami

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी/ krishna Janmashtami का पर्व देशभर के लिए विशेष महत्व रखता है। यह हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। भगवान श्रीकृष्ण को विष्णु का आठवां अवतार माना जाता है । बच्चों से लेकर बड़ों तक, सभी अपने आराध्य के जन्म का आनंद मनाने और भगवान कृष्ण की महिमा का गुणगान करने के लिए पूरे दिन उपवास रखते हैं। भगवान श्रीकृष्ण को साज-सज्जा के सामान से  सुशोभित किया जाता है, झूलों को सजाया जाता है,  और भगवान कृष्ण को झूले में बैठाया जाता हैं। महिलाएं और पुरुष मध्यरात्रि तक उपवास रखते हैं। तदोपरांत , श्रीकृष्ण के जन्म का समाचार हर गूंजता है। श्रीकृष्ण की आरती होती है और प्रसाद बांटा जाता है।

कृष्ण जन्माष्टमी का इतिहास/ History of Krishna Janmashtami

ऐसा माना जाता है कि श्रीकृष्ण के अवतार का एक मुख्य उद्देश्य आतताई  कंस का वध करना था। कंस की एक बहन थी, देवकी। कंस उससे बहुत प्रेम करता था। जब कंस अपनी बहन का विवाह करके लौट रहा था, तब एक आकाशवाणी हुई , "हे कंस, तुम्हारी प्यारी बहनकी अष्टम संतान , तुम्हारी मृत्यु का कारण होगी।" इस कारण कंस ने अपनी बहन को बंदी बना लिया।

जिस क्षण देवकी किसी भी बच्चे को जन्म देती, कंस तुरंत उस बच्चे को मौत के घात उतार देता था। जब देवकी ने आठवें बच्चे, श्रीकृष्ण को जन्म दिया, तब भगवान विष्णु की माया से कारागृह  के ताले टूट गए और भगवान कृष्ण के पिता वासुदेव  उन्हें गोकुल में नंद बाबा के महल में छोड़ आये| वहां एक लड़की जन्मी थी। वह लड़की देवी योगमाया का अवतार थी। वासुदेव उस लड़की को लेकर वापस कारागृह में आ गए। कंस ने उस लड़की को देखा और उसे मारने की इच्छा से उसने उसे फर्श पर पटक दिया। जैसे ही उसे नीचे फेंका, वह लड़की हवा में उछल पड़ी और बोली, "कंस, तुम्हारा काल यहाँ से चला गया है। वह कुछ समय बाद तुम्हें नष्ट कर देगा। मैं सिर्फ एक माया हूँ।" कुछ वर्ष बाद ऐसा ही हुआ। भगवान श्रीकृष्ण उसी महल में आए और उन्होंने कंस का वध किया।

श्रीकृष्ण के मस्तक पर मोर पंख का महत्व/ Importance of Peacock Feather on Sri Krishna's Head

एक राजा अपनी प्रजा के हर सुख दुःख के लिए जिम्मेदार होता है। इन उत्तरदायित्वों का भार वह मुकुट के रूप में अपने सिर पर धारण करते हैं। लेकिन, श्रीकृष्ण ने अपने सभी कर्तव्यों को एक खेल की तरह सहजता से पूरा किया। जैसे एक मां अपने बच्चों की देखभाल करना बोझ नहीं समझती। इसी तरह, श्रीकृष्ण अपनी जिम्मेदारियों को बोझ नहीं मानते। वह मोर के मुकुट (जो बहुत हल्का भी होता है) के रूप में अपने सिर पर विभिन्न रंगों के साथ इन जिम्मेदारियों को बहुत जल्दी से वहन करते है। श्रीकृष्ण हम सभी में एक आकर्षक और आनंदमय प्रवाह हैं। जब मन में कोई बेचैनी, चिंता या इच्छा न हो, तभी हमें गहरा विश्राम मिल सकता है, और गहरे विश्राम में ही श्रीकृष्ण का जन्म होता है

जन्माष्टमी कैसे मनाई जाती है/ How is Janmashtami Celebrated

जन्माष्टमी/krishna janmashtami 2021 भिन्न-भिन्न जगहों पर अलग-अलग तरीके से मनाई जाती है। कई स्थानों पर इसे फूलों की होली के रूप में मनाते हैं और इसके साथ ही देश के विभिन्न प्रान्तों में रंगों की होली भी खेली जाती है। श्रीकृष्ण के जन्म की नगरी मथुरा में जन्माष्टमी बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाई जाती है। श्रीकृष्ण को मक्खन और दूध अति-प्रिय था क्योंकि उनके पास गांव का मक्खन हुआ करता था, जिसे वह चुराते थे। एक दिन उन्हें माखन की चोरी करने से रोकने के लिए उसकी माता यशोदा को उन्हें एक खंभे से बांधना पड़ा और इसी कारण भगवान कृष्ण का नाम माखन चोर पड़ा। वृंदावन में लोगों ने मक्खन की मटकी को ऊंचाई पर टांगना प्रारम्भ कर दिया ताकि वह कृष्ण के हाथ से दूर रहे । फिर भी नटखट कृष्ण की समझ के आगे यह योजना भी निरर्थक साबित हुई, माखन चुराने के लिए श्री कृष्ण ने अपने बाल-सखाओं के साथ एक योजना बनाई और उन्होंने मटकी से दही और माखन चुरा लिया, जो ऊंचाई पर लटका हुआ था। यहीं से दही-हांडी का त्योहार का शुभारम्भ हुआ।

श्रीकृष्ण के अन्य नाम का अर्थ- "माखन चोर।"/ The meaning of Sri Krishna's Other Name- "Makhan Chor." 

श्रीकृष्ण को माखन चोर भी कहा जाता है। दूध पोषण का स्रोत है, और दही दूध का ही एक रूप है। दूध को मथने से मक्खन बनता है और ऊपर तैरने लगता है । यह हल्का और स्वस्थवर्धक  होता है। जब हमारी बुद्धि जाग्रत होती है तब वह मक्खन के समान हो जाती है। तब चेतना में ज्ञान का उदय होता है। और व्यक्ति अपने आप को समझने में सक्षम हो जाता है। वह इस संसार में रहते हुए अनासक्त रहता है। उसकी चेतना संसार की बातों और व्यवहार से निराश नहीं होती। माखनचोरी की लीला श्री कृष्ण के प्रेम की महिमा के चित्रण का प्रतीक है। श्रीकृष्ण का आकर्षण और कौशल इतना गहरा है कि वह सबसे धैर्यवान व्यक्ति की चेतना भी चुरा लेते हैं।

दही-हांडी के पीछे क्या मान्यता है?/ What is the belief behind Dahi-Handi?

दही-हांडी का उत्सव  मनाने के पीछे मान्यता यह है कि भगवान कृष्ण को मक्खन बहुत पसंद था। अपने बालरूप में, वह पड़ोसी के घर से मक्खन चुराते थे। इसलिए, उन्हें "माखन चोर" के रूप में विख्यात हुए। भगवान कृष्ण सभी लोगों के घरों से मक्खन की चोरी करते थे, जिससे माता जशोदा को बहुत परेशानी होती थी। इसके लिए माता यशोदा ने सभी पड़ोसियों को अपनी दही-हांडी ऊंचाई पर बांधने की सलाह दी। परन्तु फिर भी, भगवान कृष्ण अपने सखाओं के साथ मानव श्रृंखला बनाकर हांडी तक पहुंच जाते  हैं और हांडी तोड़कर माखन और दही आपस में बांट लेते हैं। इसी वजह से जन्माष्टमी पर कई जगहों पर दही-हांडी का उत्सव बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। जन्माष्टमी के दिन लोग अपनी गलियों में दही-हांडी प्रतियोगिता करते हैं; फिर लोग मटकी तोड़ने के लिए एक श्रंखला बना कर उस तक पहुंच जाते हैं और उसे तोड़ देते हैं|   यह मुख्य रूप से भारत के राज्य गुजरात और महाराष्ट्र में देखी जाती है।

जन्माष्टमी पर रोहिणी नक्षत्र का महत्व/ The importance of Rohini Nakshatra on Janmashtami

भगवान कृष्ण का जन्म भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र/ RohiniNakshatra on Janmashtamiमें हुआ था। रोहिणी नक्षत्र की इस तिथि के कारण इसे कृष्ण जन्माष्टमी के नाम से जाना जाता है। अब चूंकि भगवान कृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ था, इसलिए जन्माष्टमी के निर्धारण में रोहिणी नक्षत्र की स्थिति बेहद महत्वपूर्ण है।

जन्माष्टमी मध्य रात्रि को मनाई जाती है/ Birthday Celebrations happen at 12 on Janmashtami.

तिथि के अनुसार भगवान कृष्ण का जन्म भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को अर्धरात्री में हुआ था, इसलिए घरों और मंदिरों में आधी रात को भगवान कृष्ण की जयंती मनाई जाती है। रात में जन्म के बाद दूध से लड्डू गोपाल की मूर्ति को स्नान कराकर श्रीकृष्ण को नए और सुंदर वस्त्र पहनाए जाते हैं और उनका श्रृंगार किया जाता है। फिर, उन्हें पालने में बैठाया जाता है, और फिर पूजन के उपरान्त , चरणामृत, पंजीरी, ताजे फल, पंचमेवा आदि का भोग लगाया जाता है, जिसे तदोपरांत प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।

संतान प्राप्ति में फलदायी है जन्माष्टमी पर्व/ Janmashtami Festival is Fruitful in Having Children

जन्माष्टमी का त्योहार पर लोग व्रत/janmashtami vrat रखते हैं और पूजा करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस पर्व को मनाने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। जिन लोगों का चंद्रमा कमजोर है उन्हें इस दिन विशेष पूजा करने से लाभ मिल सकता है। इस दिन श्रीकृष्ण पूजा करने से लोगों को संतान, लंबी आयु और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

जन्माष्टमी पर झूला झूलने से होती है हर मनोकामना पूरी Every Wish Gets Fulfilled by Swinging on Janmashtami 

ऐसी मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से कई व्रतों का फल मिलता है। हमारे शास्त्रों में कृष्ण जन्माष्टमी को "व्रत राजा" कहा गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बाल गोपाल को झूला झूलाने का विशेष महत्व है, और इस दिन लोग भगवान कृष्ण को झूला झूलाने के लिए उत्साहित होते हैं। यदि कोई व्यक्ति भगवान को पालने में झूला देता है, तब उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

जन्माष्टमी का व्रत कैसे रखें/ How to keep the fast of Janmashtami

जन्माष्टमी पर, भक्त पूरे दिन उपवास रखते हैं और भगवान का आशीर्वाद लेते हैं; पूजा करते हैं। जन्माष्टमी का उपवास रखने के अपने नियम हैं। जो लोग जन्माष्टमी पर उपवास रखना चाहते हैं उन्हें जन्माष्टमी के एक दिन पहले केवल एक बार भोजन करना चाहिए। जन्माष्टमी की सुबह स्नान के उपरान्त भक्त व्रत का संकल्प लेते हैं और अगले दिन रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि की समाप्ति के बाद उपवास खोलते हैं।

जन्माष्टमी पूजा के नियम/ Rules of Janmashtami Puja

जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने का विधान है। 

यदि आप भी जन्माष्टमी का व्रत/janmashtami vrat कर रहे हैं तो इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण की पूजा/Gokulashtami Puja/ करें।

  • सुबह स्नान के उपरान्त निर्मल वस्त्र धारण करें |
  • यह पूजा हमेशा मुहूर्त/Puja Muhurt के अनुसार करनी चाहिए  |
  • जन्माष्टमी पर, बाल कृष्ण की स्थापना होती है (ठाकुरजी या लड्डू गोपाल)। कृष्ण जी की स्थापना आप अपनी इच्छानुसार किसी भी रूप में कर सकते हैं।
  • इसके अतिरिक्त घर के मंदिर में सर्वप्रथम कृष्ण जी या ठाकुर जी की मूर्ति को गंगाजल से स्नान कराएं।
  • इसके पश्चात दूध, दही, घी, चीनी, शहद और केसर से निर्मित पंचामृत से मूर्ति का स्नान करें।
  • अब शुद्ध जल से स्नान करें। शास्त्रों में लिखा है कि शंख से स्नान करना उत्तम होता है।
  • बाल-गोपाल की मूर्ती को नए कपड़े पहनाएं, उसे पीले रंग के कपड़े पहनाएं और उसे सजाएं।
  • श्रीकृष्ण के झूले को फूलों से सजाया जाना चाहिए । इसके लिए आप पारिजात और वैजयंती के पुष्पों से सजा सकते हैं। कृष्ण के जन्म के बाद उन्हें झूला बनाया जाता है।
  • श्रीकृष्ण जी के भोग के लिए पंचामृत बनाकर उसमें तुलसी के पत्ते, मेवा, माखन और मिश्री डाल दें। आप अपनी क्षमता के अनुसार धनिये की पंजीरी बनाकर 56 भोग लगा सकते हैं.
  • जहां तक ​​हो सके यह व्रत धैर्य और नियमों का पालन करते हुए करना चाहिए। अस्वस्थ लोगों को व्रत नहीं रखना चाहिए।
  • भगवान कृष्ण का जन्म उत्सव मध्यरात्रि में मनाया जाता है । भक्तों को यह पूरी रात जागकर बितानी चाहिए और भजन-कीर्तन करना चाहिए।
  • अर्धरात्री को लड्डू गोपाल को भोग लगाकर उनकी पूजा करें और फिर आरती करें।
  • अगले दिन सुबह अन्न का सेवन करें। अगर कोई इससे पहले भोजन करना चाहता है, तो वह भगवान की जयंती मनाने और मध्यरात्रि में प्रसाद ग्रहण करने के बाद ऐसा कर सकता है।

कृष्ण जन्माष्टमी व्रत सभी पापों को नष्ट करता है। इस व्रत का निर्वहन सभी नियमों और धैर्य के साथ इसका पालन करने से इंद्रलोक परलोक में आध्यात्मिक सुख प्राप्त करने में सहायता मिलती है।

श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। जैसे ही उनका जन्म हुआ, कारागार में चारों ओर एक दिव्या-प्रकाश की आभा फैल गई। वासुदेव-देवकी के समक्ष , शंख, चक्र, गदा और कमल के फूल धारण करने वाले चतुर्भुज भगवान ने अपना रूप प्रकट किया और कहा, अब मैं एक बालक का रूप लेता हूं। आप मुझे तुरंत गोकुल में नंद के पास ले जाएं और उस लड़की को कंस को सौंप दें जो अभी-अभी पैदा हुई है। वासुदेव ने वैसा ही किया और उस कन्या को कंस को सौंप दिया। कंस ने जब उस कन्या को मारना चाहा तो वह उसके हाथ से छूट कर आकाश में उड़ गई। उसने देवी का रूप धारण किया और कहा, "मुझे मारने का क्या लाभ ? तुम्हारा काल गोकुल तक पहुंच गया है"। यह देखकर कंस चकित हो गया। कंस ने श्रीकृष्ण को मारने के लिए कई असुरों को गोकुल में भेजा। श्रीकृष्ण ने अपनी अलौकिक माया से उन सभी का वध किया। वृद्ध होने पर उसने कंस का वध किया और कंस तथा देवकी के पिता उग्रसेन को राज्य सौंप दिया ।

भगवान कृष्ण को क्यों चढ़ाया जाता है छप्पन भोग/ Why Lord Krishna is offered 56 Bhog

जन्माष्टमी/ Krishna Janmashtami पर भगवान कृष्ण को छप्पन भोग लगाने का रिवाज है। धार्मिक मान्यता है कि छप्पन भोग से भगवान कृष्ण प्रसन्न होते हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। आइए, जानते हैं छप्पन भोग के पीछे का कारण-

जब भगवान कृष्ण नंदलाल और माता यशोदा के साथ गोकुल में रहते थे, तो उनकी मां उन्हें दिन में आठ बार अपने हाथों से खाना खिलाती थीं। एक बार, ब्रजवासी इंद्र की पूजा के लिए एक बड़े समारोह का आयोजन कर रहे थे। कृष्ण ने नंद बाबा से पूछा कि अनुष्ठान के पीछे क्या कारण है। तब, नंद बाबा ने कहा कि देवराज इंद्र इस पूजा से प्रसन्न होंगे, और वर्षा करेंगे। कृष्ण जी ने कहा कि वर्षा भेजना इंद्र का कर्तव्य है, तो इसके लिए उनकी पूजा करने की आवश्यकता क्यों है। यदि पूजा करनी है तब गोवर्धन पर्वत की पूजा करें क्योंकि उनसे हमें फल और सब्जियां मिलती हैं और जानवरों को चारा मिलता है।

फिर, सभी को कृष्ण की सलाह पसंद आई और सभी ने इंद्र की पूजा करने के बजाय गोवर्धन की पूजा प्रारम्भ कर दी । इंद्र ने इसे अपमान माना, और वह क्रोधित हो गए। क्रोधित इंद्र ने ब्रज में भारी बारिश भेजी, हर जगह पानी भर गया था। यह देखकर ब्रज के लोगों के मन में भय व्याप्त हो गया, तब कृष्ण ने उनसे कहा, "चलो गोवर्धन की शरण में चलते हैं। केवल वही इंद्र के प्रकोप से हमारी रक्षा कर सकते हैं।" कृष्ण ने अपनी छोटी उंगली से गोवर्धन पर्वत को उठा लिया और समस्त से ब्रज की रक्षा की। भगवान कृष्ण सात दिनों तक बिना कुछ खाए गोवर्धन पर्वत को उठाये रहे। जब आठवें दिन बारिश थम गई और सभी ब्रजवासी पर्वत की नीचे से  निकल आए, और उसके बाद, सभी ने सोचा कि कृष्ण ने सात दिनों तक बिना कुछ खाए गोवर्धन पर्वत को पकड़कर हमारी रक्षा की।

फिर माता यशोदा ने कन्हैया और ब्रजवासियों के लिए सात दिन सहित आठ पहर तक छप्पन प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन बनाए। कई भक्त बीस प्रकार की मिठाइयाँ, सोलह प्रकार के नमकीन और बीस प्रकार के सूखे मेवे चढ़ाते हैं। छप्पन भोग में आमतौर पर माखन मिश्री, खीर, बादाम दूध, टिक्की, काजू, पिस्ता, रसगुल्ला, जलेबी, लड्डू, रबड़ी, मठरी, मालपुआ, मोहनभोग, चटनी, मूंग दाल का हलवा, पकोड़ा, खिचड़ी, बैंगन की सब्जी, लौकी की सब्जी, पुरी, मुरब्बा, साग, दही, चावल, इलायची, दालें, कढ़ी, घेवर, चीला और पापड़ शामिल होते हैं। 

छप्पन भोग के संबंध में एक और मान्यता है कि गो लोक में भगवान श्रीकृष्ण राधा जी के साथ कमल पर विराजमान हैं। उस कमल की तीन परतें हैं। पहली परत में आठ और दूसरी परत में सोलह, तीसरी परत में बत्तीस पंखुड़ियां हैं। प्रत्येक पंखुड़ी पर एक धुरी सखी होती है, और भगवान बीच में विराजमान होते हैं। इस प्रकार, संख्या में छप्पन पंखुड़ियाँ हैं। यहाँ छप्पन अंक का यही अर्थ है। इसलिए, भगवान कृष्ण अपनी सखियों की संगति में छप्पन भोगों से संतुष्ट होते हैं।

क्यों रखा जाता है जन्माष्टमी का व्रत?/ Why Janmashtami fast is observed?

जन्माष्टमी के दिन व्रत रखकर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है। व्रत/ janmashtami vratका पालन इसलिए किया जाता है ताकि भगवान की पूजा करते समय हमारा चेतन, शरीर और विचार तीनों शुद्ध रहें। जब पूजा स्पष्ट सचेत और नेक विचारों से की जाती है, तो वह हमें शांति प्रदान करती है। जन्माष्टमी पर व्रत रखने का महत्व सिर्फ कृष्ण के जन्म से ही नहीं जुड़ा है, इसके चार प्राथमिक कारण हैं।

1) अष्टमी तिथि। अष्टमी तिथि को जया तिथि के नाम से भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है दिल जीतने की तिथि। इस दिन व्रत रखकर भगवान की पूजा करने से व्यक्ति को उसके सभी प्रयासों में विजय प्राप्त होती है।

2) अष्टमी तिथि के स्वामी शिव हैं और इसी दिन भगवान विष्णु ने भी अवतार लिया था। यह दो प्रमुख देवताओं के पूजन का दिन है।

3) मांसाहारी ना खाने और सिर्फ फलाहार करने से शरीर शुद्ध हो जाता है। उपवास के दौरान मन में सांसारिक विचार नहीं आते और चेतन ईश्वर भक्ति में लीन रहता है।

4) हमें भगवान श्रीकृष्ण के ज्ञान को अपने जीवन में अपनाना चाहिए । आतम-शुद्धि के बगैर ज्ञान प्राप्त करना संभव नहीं है। इसलिए इस दिन भोजन का त्याग कर असत्य, भौतिक सुख और हिंसा जैसी भावनाओं से दूर रहना चाहिए।

जन्माष्टमी विदेशों में भी मनाई जाती है/ Janmashtami is celebrated in Foreign Countries Too.

न केवल भारत में बल्कि विदेशों में रहने वाले भारतीय जन्माष्टमी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाते हैं। मथुरा के कारागार  में, श्री कृष्ण ने अपने क्रोधी मामा कंस का नाश करने के लिए माता देवकी के गर्भ से आधी रात को जन्म लिया था। इस लिहाज से इस दिन को पृथ्वी पर भगवान कृष्ण के अवतार का दिन माना जाता है। विदेशों में भी इस दिन भव्य कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।

जन्माष्टमी पर मथुरा में धूमधाम से प्रदर्शन होता है/ Pomp and show happen in Mathura on Janmashtami.

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर दूर-दूर से श्रद्धालु भगवान कान्हा की दीप्तिमान प्रतिमा के दर्शन के लिए मथुरा पहुंचते हैं। इस दिन पूरी मथुरा नगरी कृष्णभावनामृत हो जाती है। इसलिए कृष्ण जन्माष्टमी/ Krishna Janmashtami के अवसर पर मथुरा भक्ति के रंगों से जगमगा उठता है।

जन्माष्टमी पर झाँकी की सजावट/ The Decoration of Jhanki on Janmashtami

जन्माष्टमी को लोग उत्साह और उमंग के साथ मनाते हैं। पूजा और व्रत के साथ-साथ इस दिन घरों और मंदिरों में भी झाँकी सजाई जाती है। इन झांकियों  में श्रीकृष्ण के बचपन की लीलाओं और समस्त जीवन काल का चित्रण किया जाता है । चूंकि भगवान का जन्म कारागार में हुआ था, इसलिए कई पुलिस लाइनों में आज भी भगवान की खूबसूरत झाँकी सजाई जाती  हैं। इसके अतिरिक्त लोग अपने घरों में सुंदर झाँकी स्थापित करते हैं।

जन्माष्टमी पूजा में इन चीजों को शामिल करें / Include these items in Janmashtami Puja

1. तुलसी पूजा का है विशेष महत्व

जन्माष्टमी के दिन तुलसी पूजा का विशेष महत्व है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन शाम के समय तुलसी की पूजा के साथ-साथ उसमें घी का दिया जलाने से भी लाभ होता है। अगर आपके घर में तुलसी का पौधा नहीं है तो किसी मंदिर में जाकर दीपक जलाएं। कभी भी किसी दूसरे के घर की तुलसी की पूजा न करें।

2. पान के पत्ते को शामिल करना शुभ होता है

जन्माष्टमी के दिन कृष्ण पूजा में पान के पत्ते का विशेष महत्व है। ऐसा माना जाता है कि पूजा में पान के पत्ते को शामिल करने से हमें देवी लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। ज्योतिषियों के अनुसार पूजा में एक पान के पत्ते पर "ॐ वासुदेवाय नमः' लिखकर श्रीकृष्ण को अर्पित करें। ऐसा करने से पूजा फलदायी होती है।

3. माखन के बिना अधूरी है जन्माष्टमी पूजा

नंद के लाल गोपाल को माखन बहुत प्रिय है। इसलिए, पूजा में माखन को अवश्य शामिल करें । अपने बाल रूप में, भगवान कृषण गोपियों से माखन चुराते थे क्योंकि वह माखन खाने के शौकीन थे। इसलिए नंद लाल की पूजा में माखन मिश्री को भोग के रूप में अवश्य शामिल करें।

4. मोर पंख भी आवश्यक है 

भगवान कृष्ण सदा-सर्वदा अपने सिर पर मोर पंख लगाते हैं। मोर पंख उनके सिर की सुंदरता को बढ़ाता है और उनके अलंकरण का एक एक महत्वपूर्ण अंग है। इसलिए जन्माष्टमी पूजा में भगवान कृष्ण को मोर पंख अवश्य अर्पित करें ।

5. पूजा में पारिजात के फूलों का विशेष महत्व

भगवान श्री हरि विष्णु और माता लक्ष्मी को पारिजात के फूल अति प्रिय हैं और कृष्ण जी विष्णु के अवतार हैं। इसलिए पारिजात के फूलों को जन्माष्टमी के दिन पूजा में जरूर शामिल करना चाहिए।

6. बांसुरी के बिना अधूरी होगी पूजा

भगवान कृष्ण बांसुरी से भी अत्याधिक प्रेम करते हैं। उनकी बांसुरी की धुन सुनकर गोपियां प्रसन्न हो जाती थीं और अपना सारा काम-काज छोड़कर कृष्ण के पास चली जाती थीं। बांसुरी के बिना कृष्ण की तस्वीर भी अधूरी है। जन्माष्टमी पर कृष्ण जी को चांदी की बांसुरी चढ़ाएं। साथ ही पूजा के उपरान्त बांसुरी को अपने बटुए या उस स्थान पर रख दें जहां पैसा रखा गया है.

7. राखी से रक्षा का वर मांगें

रक्षाबंधन का पर्व असाधारण है। रक्षाबंधन के दिन से आठवें दिन तक राखी बांधी जा सकती है। इसलिए जन्माष्टमी के दिन भगवान कृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम को राखी बांधें। इससे आपको भगवान कृष्ण की विशेष कृपा प्राप्त होगी।

8. शंख में दूध से अभिषेक करें

जन्माष्टमी/ janmashtami 2021 के दिन दूध लेकर भगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप का अभिषेक करें। ऐसा करने से आपकी  हर मनोकामना पूर्ण होगी।

9. बछड़े की मूर्ति दूर करती है परेशानियां

कृष्ण जी को ग्वाल के नाम से जाना जाता है। अपने बचपन में श्रीकृष्ण ने गायों और बछड़ों के साथ कई लीलाएं की हैं। इसलिए जन्माष्टमी के दिन गाय और बछड़ों की छोटी-छोटी मूर्तियाँ लाएँ। ऐसा करने ससे आर्थिक कठिनाइयों और बच्चों से संबंधित समस्याओं को हल किया जाता है।

जन्माष्टमी पर क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए?/ What should be done and what should not be done on Janmashtami?

  • ऐसी मान्यता है कि जन्माष्टमी के व्रत से एक रात पहले सादा भोजन करें और अगले दिन ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करना चाहिए।
  • व्रत के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करके श्रीकृष्ण का ध्यान करना चाहिए।
  • भगवान के ध्यान के उपरान्त , उनके उपवास का संकल्प लेकर गोकुलाष्टमी पूजा/ Gokulashtami Puja की तैयारी शुरू करनी चाहिए।
  • इस दिन भगवान श्रीकृष्ण को माखन मिश्री तथा , पान, नारियल से बनी मिठाई का भोग लगाएं।
  • हाथों में जल, फूल, गंध, फल, कुश लेकर इस मंत्र का पाठ करना चाहिए:

           ममखिलपाप्रशमन पूर्ववक स्वाभिष्ट सिद्धये

          श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतमहं करिश्ये।

  • आधी रात को प्रभु का जन्म उत्सव मनाएं । इसके बाद पंचामृत से उनका अभिषेक करें। उसे नए कपड़े पहनाएं और सजाएं|
  • भगवान को चंदन का तिलक करें और भोग लगाएं। उनके भोग में तुलसी अवश्य डालनी चाहिए।
  • नंद के आनंद भयो जय कन्नैया लाल की का उच्चारण करते हुए कृष्ण को झूला झुलाना चाहिए|
  • घी और अगरबत्ती से बने दीये से भगवान कृष्ण की आरती करें और पूरी रात उनके  भजन गाएं।

जन्माष्टमी पर ऐसा ना करें/Do not do on Janamashtami

जन्माष्टमी का व्रत/ janmashtami vrat करने वाले व्यक्ति को एक दिन पहले ही अच्छे आचरण का अभ्यास करना चाहिए। जो लोग उपवास नहीं रखते हैं उन्हें लहसुन, प्याज, बैगन, मांस-शराब, सुपारी- मेवा और तंबाकू से बचना चाहिए। व्रत करने वाले व्यक्ति को भगवान कृष्ण का ध्यान करना चाहिए और यौन, विलासिता से परिपूर्ण भावनाओं से दूरी बना लेनी चाहिए। साथ ही मूंग और मसूर की दाल के सेवन से भी दूर रहना चाहिए। नकारात्मक सार को प्रवेश न करने दें।

जन्माष्टमी पर पूजा स्थल को फूलों से सजाएं/ Decorate the Puja Place with flowers on Janmashtami 

अपने घर में मौजूद मंदिर या पूजा स्थल को सजाने के लिए आप फूलों का प्रयोग  कर सकते हैं। गेंदे के फूलों से सजाने के बजाय आप अपने पूजा स्थल को सजाने के लिए चमेली और मोगरा के फूलों का उपयोग कर सकते हैं क्योंकि भगवान कृष्ण को यह फूल अति-प्रिय हैं। आप चाहें तो इन फूलों की एक विशाल माला बनाकर बाल गोपाल के झूले पर सजा सकते हैं।

जन्माष्टमी पर पूजा स्थल को रंग-बिरंगी रोशनी से सजाएं/ Decorate the Puja Place with Colourful Lights on Janmashtami

आप चाहें तो फूलों के अतिरिक्त पूजा स्थल और मंदिर को रोशनी से सजा सकते हैं। लाल, हरा, नीला, पीला, सफेद, जो भी रंग आपको पसंद हो, उस रंग को अपने पूजा स्थल और मंदिर में स्थापित करें और उन्हें शानदार ढंग से सजाएं।

गणेश चतुर्थी
31 Aug, 2022

भारत के कई राज्यों में गणेश चतुर्थी/ Ganesh Chaturthi 2021 को बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने घरों में सबसे पहले भगवान गणेश जी की स्थापना पूरे जश्न के साथ करते हैं। जो व्यक्ति गणेश जी की पूजा सच्चे मन से करते हैं वह उनकी सभी बाधाओं को दूर करते हैं। इसी कारण गणेश जी को विघ्नहर्ता भी कहा जाता है। घरों में उनके स्थापना के साथ उनका विसर्जन भी बहुत धूमधाम से होता है। सनातन धर्म में गणेश जी का विशेष महत्व है। कई पुराणों और वेदों में भगवान गणेश को गजानना या विघ्नहर्ता के नाम से भी जाना गया है। गणेश जी अपने भक्तों को ऋद्धि-सिद्धि और सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं। शास्त्रों के अनुसार, गणपति बप्पा अपने भक्तों को मुसीबत, कष्टों, गरीबी और बीमारियों से मुक्त कर उनके जीवन में खुशहाली भर देते हैं। इस दिन को गणेश उत्सव के नाम से भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है गणेश चतुर्थी का उत्सव। दसवें दिन सभी भक्त गणपति बप्पा को पूरे रिवाज से विदाई देते हैं। अनंत चतुर्दशी के दिन भक्त रंगो और नाचते झूमते गणेश जी की मूर्ति का विसर्जन करते हैं।
गणेश चतुर्थी भाद्रपद की शुक्ल चतुर्थी को मनाई जाती है। ऐसी मान्यता है कि गणेश जी का जन्म भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी को मध्याह्न, सोमवार, स्वाति नक्षत्र और सिंह लग्न में हुआ था, इसी कारणवश इस चतुर्थी को मुख्य रूप से गणेश चतुर्थी या विनायक चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। भारत के कई क्षेत्रों में इसे डंडा चौथ के नाम से भी जाना जाता है।
विशेष रूप से इस पर्व को महाराष्ट्र, पश्चिमी भारत में बड़ी आस्था और धूमधाम के साथ मनाया जाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार गणेश जी को नाम विघ्नहर्ता के नाम से भी जाना जाता है। इन दस दिनों के दौरान गणेश की पूजा श्रद्धा और नियमों के अनुसार की जाती है। भगवान गणेश अपने भक्तों के जीवन में सभी बाधाओं को समाप्त करते हैं और अपने उन पर आशीर्वाद और सुख समृद्धि की वर्षा करते हैं।

गणेश चतुर्थी का महत्व/Importance of Ganesh Chaturthi 2021

पौराणिक कथाओं के अनुसार, गणेश जी का जन्म देवी पार्वती के शरीर के तत्व से हुआ था। माता पार्वती ने गणेश जी को घर के द्वार पर खडा कर अपना रक्षक बनाकर स्नान करने चली गईं था। शिव जी को इस बात का ज्ञात नहीं था। उन्होंने गणेश जी को पार्वती से मिलने के मार्ग में विरोधी समझ कर उनका सिर धड़ से अलग कर दिया। तब पार्वती जी बहुत क्रोधित हो गई| जब शिव जी को वास्तविकता का पता चला, तो उन्होंने वहां मौजूद सभी लोगों को आदेश दिया कि वह किसी ऐसे बच्चे का सिर काटकर ले आए जिसकी माँ की पीठ उसके बच्चे की तरफ है।

जब शिव की प्रजा को एक हाथी का पुत्र उस अवस्था में मिला तो वह उसका सिर ले आए और शिव जी ने हाथी का सिर बालक के सिर पर लगा कर उसे जीवित कर दिया। यह सारी घटना भाद्र मास की चतुर्थी को हुई थी। इसलिए इस तिथि को गणेश चतुर्थी माना जाता है, और ऐसा माना जाता है कि इसी दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था। गणेश जी को आशीर्वाद प्राप्त है कि उन्हें सभी देवताओं में प्रथम पूजनीय माना जाएगा। इस दिन गणपति बप्पा को घर में लाने से उनके सभी भक्तों की बाधाएं और मुश्किलें दूर हो जाती हैं। इसी कारण उन्हें विघ्नहर्ता के नाम से भी पूजा और जाना जाता है। गणेश चतुर्थी के अवसर पर लोग गणेश जी को अपने घर में बड़े धूमधाम से लाते हैं और ग्यारह दिन तक उनकी पूजा करते हैं। ग्यारहवें दिन बडे धूम धाम से उनका विसर्जन होता है। किसी भी कार्य को शुरू करने से पहले गणेश जी की पूजा की जाती है।

बप्पा सभी देवों के स्वामी है। इसी कारण उन्हें गणपति के नाम से भी जाना जाता है। गणेश चतुर्थी को विनायक चतुर्थी भी कहते हैं। इसे कई जगहों पर डंडा चौथ भी कहा जाता है। गणेश जी को कई नामों से जाना जाता है। उन्हें ज्ञान-बुद्धि प्रदान करने वाला, सभी विघ्नों का नाश करने वाला और मंगल कार्यों को करने वाला माना जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन गणेश जी की विशेष पूजा/ Ganesh Chaturthi Puja की जाती है। जब भी गणेश चतुर्थी मंगलवार के दिन होती है तो इसे अंगारक चतुर्थी/Angarak Chaturthi कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस पर्व के कारण शुद्ध और उदार परिणाम प्राप्त होते हैं। गणेश चतुर्थी/ Ganesh Chaturthi 2021 को ऐसा त्यौहार माना जाता है जो पूरे भारत को एक सूत्र में बांधने का कार्य करता है। यदि हम इतिहास की ओर मुड़ें, तो हमें पता चलता है कि गणेश चतुर्थी की पूजा चालुक्य सातवाहन और राष्ट्ररुक्त के बाद से चली आ रही है। इसका स्पष्ट विवरण आपको छत्रपति शिवाजी के शासनकाल से मिल सकता है जब उन्होंने राष्ट्रीय संस्कृति और एकता को बढ़ावा देने के लिए गणेश वंदना पूजा करना शुरू किया था।

गणेश महोत्सव का इतिहास/History of Ganeshotsav

गणेश चतुर्थी की सटीक तिथि/ Ganesh Chaturthi date कोई नहीं जानता। इतिहास के अनुसार, शिवाजी महाराज के युग (मराठा साम्राज्य के संस्थापक) में, 1630-1680 के दौरान यह पर्व महत्वपूर्ण हो गया था, जिसे बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। उस दौरान इस पर्व को एक सार्वजनिक समारोह के रूप में मनाया जाता था। शिवाजी महाराज के समय में कुलदेवता के रूप में गणेशोत्सव का नियमित रूप से पालन किया जाने लगा। जब पेशवाओं का अंत हुआ तो यह त्योहार एक पारिवारिक उत्सव के रूप में प्रचलित हो गया|1893 में, लोकमान्य तिलक (भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक) के राज में इस पर्व का उत्सव फिर से शुरू किया गया था। गणेश चतुर्थी को एक वार्षिक उत्सव के रूप में मनाया जाने लगा, जिसका लोग पूरे वर्ष बेसब्री से इंतजार करते हैं।

आम तौर पर, लोगों में एकता लाने और ब्राह्मणों और गैर-ब्राह्मणों के बीच समस्या को दूर करने के लिए इस पर्व को राष्ट्रीय त्योहार के रूप में मनाया जाने लगा। ब्रिटिश शासन के दौरान, अपने क्रूर व्यवहार से खुद को मुक्त करने के लिए, महाराष्ट्र के लोगों ने बड़े साहस और राष्ट्रवादी उत्साह के साथ इस पर्व का पालन किया और हर साल इसे धूमधाम से मनाते थे। लोकमान्य तिलक ने गणेश विसर्जन की विधि/ Ganesh Visarjan Vidhi की स्थापना की थी। धीरे-धीरे लोगों ने इस त्योहार को अपनाना शुरू किया और विधि पूर्वक इस पर्व को मनाना शुरू कर दिया। हर वर्ष व्यक्ति पंचांग से गणेश विसर्जन की तिथि Ganesh Visarjan date को देख अपने कार्य करते थे। इस पर्व पर सामूहिक रूप से बौद्धिक भाषण, कविता, नृत्य, भक्ति गीत, नाटक, संगीत उत्सव, लोक नृत्य आदि करते हैं।

गणेश चतुर्थी तिथि/Ganesh Chaturthi date आने से पहले, लोग एक साथ मिलते हैं और इस त्यौहार को मनाने के लिए एक समारोह का फैसला करते हैं और सभी योजना बना कर त्यौहार मनाते हैं।
गणेश चतुर्थी, एक पवित्र हिंदू पर्व है। इस पर्व को भगवान गणेश के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। हिंदू प्राचीन मिथकों के अनुसार, ऐसा माना जाता है कि गणेश जी का जन्म माघ महीने की चतुर्थी (उज्ज्वल पखवाड़ा के चौथे दिन) को हुआ था। तभी से गणेश जी की जन्म तिथि को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाने लगा। आजकल, इस त्योहार को दुनिया भर में मनाया जाता है और इस पर्व को कोई एक धर्म नहीं बल्कि सभी लोग मना रहे हैं।

गणेशोत्सव की समयरेखा/Timeline for Ganeshotsav

जैसा कि पहले बताया गया है कि भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश जी का पर्व मनाया जाता है। गणेश जी के पूजन/ Ganesh Chaturthi Puja के साथ ही गणपति की मूर्ति की स्थापना करने का रिवाज है। लगातार दस दिनों तक उन्हें घर में रखा जाता है और पूरी श्रद्धा से उनकी पूजा की जाती है। अनंत चतुर्दशी या ग्यारहवें दिन लोग गणेश जी का विसर्जन करते हैं। इस दिन, लोग पूरे बाजे और रंगों के साथ गणेश की मूर्ति को विसर्जन के लिए ले जाते है। ढोल बजाते और नाचते गाते गणेश जी के विसर्जन के साथ इस पर्व का समापन होता है। विसर्जन के समाप्त होने का साथ लोग अगले साल आने वाली गणपती महोत्सव/ Ganesh Chaturthi 2022 के बारे में सोचने लग जाते हैं।

गणेश उत्सव कैसे मनाया जाता है?/How is Ganesh Utsav Celebrated?

दस दिनों तक चलने वाला यह पर्व हिन्दुओं की भक्ति का अद्भुत प्रमाण है। इस पर्व के दौरान शिव-पार्वती-नंदन और श्री गणेश की अलग अलग आकार की मूर्ति की स्थापना घरों, मंदिरों और पंडालों में की जाती है। इन मूर्तियों को फिर सजाया जाता है और एक को बुलाया जाता है जो दस दिनों तक बप्पा की पूजा करते हैं। अनंत-चतुर्दशी तक, गणेश की प्रतिमा की हर दिन सभी नियमों के साथ पूजा की जाती है और लड्डू का भोग लगाकर उसे प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। ग्यारहवें दिन, इस मूर्ति का विसर्जन एक स्वच्छ जल या नदी या महासागर में किया जाता है।

गणेश चतुर्थी क्यों मनाई जाती है?/Why is Ganesha Chaturthi Celebrated?

एक बार देवता भगवान शिव के पास पहुंचे और शिव से पूछने लगे कि सभी देवताओं में किसे पूजनीय माना जाए? तब, शिव ने कहा कि जो व्यक्ति पूरी सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा लगाएगा, वह इसी आधार पर सबसे पहले पूजा के योग्य माना जाएगा। इस प्रकार सभी देवता अपने-अपने वाहन में बैठ कर पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिए निकल पड़े। भगवान गणेश का वाहन एक चूहा है और गणेश जी का शरीर विशाल है, वह पृथ्वी की परिक्रमा कैसे कर सकते हैं। फिर, भगवान गणेश ने अपने पिता भगवान शिव और माता पार्वती के चारों ओर तीन चक्कर पूरे किए और हाथ जोड़कर वहीं उन्हीं के सामने खड़े हो गए। तब भगवान शिव ने कहा, "पूरे ब्रह्मांड में गणेश से बड़ा और बुद्धिमान कोई नहीं है।" अपने माता-पिता की परिक्रमा करके सभी लोकों की परिक्रमा पूरी की है। इसी के फल स्वरूप जो व्यक्ति किसी भी कार्य को शुरू करने से पहले गणेश जी पूजा करेगा उसे किसी भी प्रकार की कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ेगा। तभी से, भगवान गणेश सभी देवी-देवताओं के सामने सम्मानित और पूजनीय हो गए, इसलिए किसी भी पूजा से पहले भगवान गणेश की पूजा की जाती है उसके पश्चात ही अन्य सभी देवताओं की पूजा की जाती है। गणेश चतुर्थी मनाने वाले सभी लोग भगवान गणेश की मूर्ति का विसर्जन करते हैं। विसर्जन के साथ ही गणेश उत्सव समाप्त हो जाता है।

गणेश जी को ज्ञान का देवता क्यों कहा जाता है?/Why is Ganesha ji Known as the god of knowledge?

पूरे दुनिया के परिक्रमा की कहानी आपने ऊपर पढा होगा। इस परिक्रमा से पहले देवी पार्वती ने अपने दोनों पुत्रों को एक बात कही थी कि जो भी इस परिक्रमा को सबसे पहले पूरा करेगा उसे भेट के रूप में ज्ञान का फल प्राप्त होगा। जब परिक्रमा खत्म हुई तो गणेश जी विजेता घोषित हुए क्योंकि उन्होंने अपने माता-पिता के चारों तरफ परिक्रमा लगाई जो उनके ज्ञान को दर्शाती है। शिव और पार्वती जी इस वाक्य से प्रभावित हुए, और इसलिए, उन्होंने उसे ज्ञान का फल दिया। 

बप्पा हर मुसीबत को दूर करते हैं। ऐसा माना जाता है कि जिन घरों में दस दिनों तक बप्पा का आदर, सत्कार और पूजा की जाती है, वहां उनकी विशेष कृपा रहती है और ऐसे घरों में कभी भी विपत्तियां नहीं आती हैं। गणेश जी की ही कृपा से सभी कार्य बिना किसी बाधा के पूर्ण होते हैं और सभी की मनोकामनाएं भी पूर्ण होती हैं।

गणेश जी की मिट्टी की मूर्ति की स्थापना

गणेश जी की पूजा/Ganesh Chaturthi Puja सभी देवताओं में सबसे आसान पूजा मानी जाती है। इस पर्व के दिन हर घर में गणेश जी की मिट्टी की मूर्ति की स्थापना होती है। इस पर्व की मान्यता है कि यह शरीर पांच तत्वों से बना है और इन पांच तत्वों में ही विलीन हो जाएगा। इसी मान्यता के आधार पर अनंत चौदस के दिन गणपति जी का विसर्जन किया जाता है और उन्हें विदाई दी जाती है।

यह त्यौहार दस दिनों तक चलता है भाद्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरू होकर यह पर्व दस दिनों तक आनंद चौदस तक चलता है। चतुर्थी पर, गणपति बप्पा हर घर में विराजमान होते हैं, और दस दिनों के बाद, बप्पा की मूर्ति को विसर्जित किया जाता है। ज्यादातर लोग इस पर्व पर गणपति को दस दिन तक घर में बैठते हैं लेकिन कुछ लोग अपनी क्षमता के अनुसार दो-तीन दिन की पूजा के बाद बप्पा को विदा करते हैं। ऐसा करना गलत नहीं है क्योंकि जिसकी जितनी क्षमता होती है, वह उससे अधिक जा कर इस पर्व को मनाता है।

गणेश चतुर्थी व्रत की विधि/ The Vidhi of Ganesha Chaturthi Fast 

  • 1. प्रात:काल स्नान के बाद सोने, तांबे या मिट्टी से बनी गणेश जी की मूर्ति को घर लाएं और स्थापित करें।
  • 2. एक खाली कलश लेकर उसमें पानी भर दें और उसके मुंह को सादे कपड़े से बांधकर उस पर गणेश जी को विराजमान करें।
  • 3. गणेश जी को सिंदूर और दूर्वा चढ़ाएं और उन्हें इक्कीस लड्डू का भोग लगाएं। इनमें से पांच लड्डू भगवान गणेश को चढ़ाएं और बचे हुए लड्डू गरीबों या ब्राह्मणों में प्रसाद के रूप में बांट दें।
  • 4. गणेश जी का पूजन/ Ganesh Chaturthi Puja Muhurat शाम के समय करना सबसे उत्तम माना जाता है। गणेश चतुर्थी कथा/ ganesh chaturthi katha, गणेश चालीसा और आरती का पाठ करने के बाद आँखें नीची करके चंद्रमा को अर्घ्य देना चाहिए।
  • 5. इस दिन गणेश जी की सिद्धिविनायक के रूप में पूजा की जाती है और उस दिन व्रत/ ganeshchaturthivrat रखा जाता है।

गणेश चतुर्थी पर भोग/ The Bhog on Ganesh Chaturthi 

गणेश जी की स्थापना के बाद प्रतिदिन सभी नियम-कायदों के साथ उनकी पूजा की जाती है। फिर उन्हें सुबह और शाम भोग लगाया जाता है। गणेश जी को मोदक सबसे अधिक प्रिय है, इसलिए, उन्हें गणेश चतुर्थी पर मोदक से बना भोग चढ़ाएं।

गणेश चतुर्थी पर गलती से भी चंद्रमा के दर्शन न करें।

एक बार गणेश जी अपने वाहन चूहे पर सवार होकर घूमने निकले परन्तु वह फिसल गए, जिसे देख कर चंद्रमा ने उनका उपहास किया। गणेश जी को क्रोध आ गया और उन्होंने अपने क्रोध में चंद्रमा को शाप दिया कि, "तुम किसी को अपना मुंह नहीं दिखाओगे, और यदि कोई तुम्हें देखा, तो वह पाप का भागीदार बन जाए।" यह कहते ही गणेश जी वहां से चला गए।

इसके पश्चात चंद्रमा उदास हो गया, और वह चिंतित और अपने आप को अपराधी समझने लगे। चंद्रमा ने अपने आप से कहा, "मैंने सर्वगुण संपन्न भगवान के साथ क्या किया"? चंद्रमा को ना देखने के संबंध में सभी देवता भी निराश हो गए। फिर, इंद्र के कहने पर सभी देवता गजानन की पूजा करने लगे। उनकी पूजा से प्रसन्न होकर गणेश जी ने उनसे कोई वर मांगने को कहा|

सभी देवताओं ने कहा, "प्रभु, यह हमारा आपसे अनुरोध है, कृपया चंद्रमा को पहले जैसा बना दें।" गणेश जी ने देवताओं से कहा, "मैं अपना श्राप वापस नहीं ले सकता, लेकिन मैं इसे थोड़ा बदल सकता हूं। जो कोई भी जानबूझकर या अनजाने में भाद्र, शुक्ल, चतुर्थी पर चंद्रमा का दर्शन करता है, वह व्यक्ति शापित होगा, और उसे बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। यदि इस दिन कोई चंद्रमा का दर्शन करता है तो इस पाप से बचने के लिए निम्न मंत्र का पाठ करें-
''सिंह प्रसेनमवधित्सिंहो जाम्बवता हताः
सुकुमारक माँ रोदिस्तव हर्ष स्यामंतक''
तभी सभी देवताओं ने चंद्रमा से कहा, "आपने हंसकर गणेश का अपमान किया है। हमने मिलकर उनसे आपके पापों को क्षमा करने के लिए प्रार्थना की है, हमारे प्रयासों से प्रसन्न होकर गजानन ने केवल एक बार भाद्र शुक्ल चतुर्थी पर अदृश्य रहने का वचन देकर श्राप की ताकत को बहुत कम कर दिया है। आप भी उनका आशीर्वाद प्राप्त करें और फिर ब्रह्मांड को शीतलता प्रदान करें"। यह सुनकर चंद्रमा खुशी खुशी अपने कार्य पर लौट गए।
बाएं दांत वाले गणेश जी की स्थापना करें

श्री गणेश पूजा में श्री गणेश के दांत की दिशा का बहुत महत्व है। ऐसा माना जाता है कि घर में बायीं सूंड वाले गणेश जी की स्थापना करना चाहिए, इससे उस घर में मौजूद लोगों को बहुत सहायता मिलेगी। ऐसा करने से वह तुरंत प्रसन्न हो जाते है जबकि दाहिनी सूंड वाले गणेश जी को प्रसन्न करने में समय लगता है।

भगवान गणेश के बारे में कुछ रोचक तथ्य/ Some Interesting Facts About Lord Ganesha

1.  भगवान गणेश को भगवान शिव और माता पार्वती की पहली संतान माना जाता है।
2.  गणों के स्वामी होने के कारण उन्हें गणपति कहा जाता है।
3.  ज्योतिष में भगवान गणेश को 'केतु का देवता' भी कहा गया है।
4.  उनका नाम 'गजानन' है क्योंकि उनका चेहरा हाथी के आकार का होता है।
5.  उन्हें यह वरदान प्राप्त है कि उनकी पूजा के बिना कोई भी पूजा और कोई भी कार्य पूर्ण नहीं होगा। इसलिए उन्हें 'आदि पूज्य' कहा जाता है और किसी भी कार्य को करने से पहले उनकी पूजा अवश्य करना चाहिए।
6.  भारत में केवल भगवान गणेश की पूजा करने वाले संप्रदाय को 'गणपतये संप्रदाय' कहा जाता है, जो मुख्य रूप से महाराष्ट्र में पाया जाता है। इसके सिवाय कोई समुदाय नहीं है।
7.  गणेश जी की लंबी हाथी जैसी सूंड महा बुद्धित्व का प्रतीक हैं।
8.  शिव मानस शास्त्र में गणेश जी को प्रणव (ॐ) कहा गया है। ऊपरी भाग गणेश जी का मस्तक है, निचला भाग उदर है, चंद्रबिंदु लड्डू है, और मंत्र सूंड है।
9.  कुछ धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि गणेश की एक बहन भी थी जिसका नाम अशोक सुंदरी था।
10.  गणेश जी की दो पत्नियां हैं, जिनका नाम रिद्धि और सिद्धि है।
11.  देवी लक्ष्मी और देवी पार्वती दोनों ही आदि शक्ति यानी देवी दुर्गा हैं। देवी लक्ष्मी की पूजा उनके पुत्र गणेश के बिना नहीं की जाती है क्योंकि लक्ष्मी का मूल्य वही समझ सकता है जिसके पास ज्ञान हो, और गणेश जी को ज्ञान माता पार्वती से ज्ञान का फल प्राप्त है।

भगवान श्री गणेश को कैसे प्रसन्न किया जा सकता है?/ How can Lord Sri Ganesha be Made Happy? 

गणेशोत्सव शुरू होते ही श्री गणेश को प्रसन्न करने के प्रयास तेज होने लगते हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि न्यूनतम उपाय से ही गणेश जी प्रसन्न हो जाते हैं।
जानिए श्री गणेश को प्रसन्न करने के सरल उपाय
1. गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश के नामों का स्मरण करना चाहिए। किसी मंदिर में नियमों के अनुसार पूजा करने से भगवान प्रसन्न हो जाते हैं।
2. इस पर्व के दिन गणेश जी को भोग के रूप में घी और गुड़ का भोग लगाया जाता है। घी और गुड़ का भोग लगाकर गाय को खिलाने से आपको फल की प्राप्त होगी। ऐसा करने से आर्थिक समृद्धि आती है।
3. यदि आपको अपने घर में विरोधी शक्तियां का आभास हो तो गणेश चतुर्थी के दिन सफेद रंग के गणपति की घर के मंदिर में स्थापना करनी चाहिए। यह सभी प्रकार की बुरी शक्तियों का नाश कर आपके घर में सुख और समृद्धि लाता है।
4. इस दिन गणेश जी को दूर्वा चढ़ाएं। हो सके तो दूर्वा से गणेश जी की मूर्ति बना कर उसे अपने घर में स्थापित कर सही मुहूर्त/Ganesh Chaturthi Puja Muhurat पर उनकी पूजा करनी चाहिए।
5. भगवान गणेश को सिंदूर टीका अवश्य लगाना चाहिए। इसके बाद माथे पर तिलक भी करना चाहिए, जिससे आपको अच्छे फल की प्राप्ति होती है।

श्री गणेश के जन्म से जुड़े तीन रोचक प्राचीन मिथक/ 3 Interesting Ancient Myths Related to the Birth of Shri Ganesha 

1.  वराह पुराण के अनुसार, भगवान शिव ने पांच तत्वों से गणेश जी की रचना की। जब भगवान शिव गणेश जी की रचना कर रहे थे, तो उन्हें एक अनोखा और प्यारा रूप मिला। इसके बाद देवताओं को यह समाचार प्राप्त हुआ। इस समाचार को पाते ही सभी देवताएं भयभीत हो गए कि कहीं वह सभी के आकर्षण का केंद्र न बन जाएं। भगवान शिव को इस भय का आभास हुआ, जिसके बाद उन्होंने उनका पेट बड़ा किया और चेहरे को बदल कर हाथी के समान कर दिया।
2.  वहीं, शिवपुराण में कथा इससे बिल्कुल अलग है। इस पुराण के अनुसार माता पार्वती ने अपने शरीर पर हल्दी लगाई थी। जब उन्होंने अपने शरीर से उस हल्दी को निकाला तो उससे एक पुतला बनाया। बाद में उन्होंने उसी पुतले में जीवन डाल दिया। और इस तरह विनायक या विघ्नहर्ता का जन्म हुआ। इसके बाद, देवी पार्वती ने गणेश जी को घर के दरवाजे पर बैठने और उनकी रक्षा करने का आदेश दिया। उन्हें बताया गया कि वह किसी को भी अंदर ना आने दें। कुछ समय बाद, शिव जी घर की और आए, और उन्होंने कहा कि उन्हें पार्वती से मिलना है। गणेश जी ने उन्हें तुरंत मना कर दिया क्योंकि वह नहीं जानते थे कि शिव जी कौन हैं और शिवा जी भी नहीं जानते थे कि गणेश जी कौन थे। दोनों में विवाद हो गया और कठ ही समय में इस विवाद ने युद्ध का रूप ले लिया। इस दौरान शिवाजी ने अपना त्रिशूल निकाला और गणेश जी का सिर धड़ से अलग कर दिया। जब पार्वती को पता चला तो वह बाहर आई और रोने लगी। उसने शिव से कहा कि तुमने मेरे बेटे का सिर काट दिया। शिवा जी ने पूछा कि वह आपका पुत्र कैसे हो सकता है; इसके बाद पार्वती ने शिव जी को अपनी पूरी कहानी सुनाई। परिस्थिति को देखते हुए शिव जी ने पार्वती को से कहा कि मैं आपके पुत्र को फिर से जीवित कर सकता हूं, लेकिन मुझे एक सिर की आवश्यकता है।
फिर उन्होंने सभी से एक बच्चे का सिर लाने को कहा उसकी माँ उसकी तरफ पीठ करके सोई हो। गरुड़ जी हर दिशा में भटकते रहे, लेकिन उन्हें ऐसी कोई मां नहीं मिली क्योंकि हर मां अपने बच्चे के सामने मुंख करके सो रही थी। अंत में एक हाथी दिखाई दिया। उन्हें इस अवस्था में एक हाथी और उसका बच्चा मिला और वह हाथी के बच्चे का सिर ले आए। भगवान शिव ने उस सिर को गणेश जी के शरीर से जोड़ कर उसे जीवित कर दिया। इस तरह गणेश जी को हाथी का सिर मिला।
3.  श्री गणेश चालीसा में वर्णित है कि माता पार्वती ने पुत्र प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या की थी। माता पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर श्री गणेश ने स्वयं एक ब्राह्मण का रूप लिया और उन्हें वरदान दिया कि बिना गर्भ धारण किए ही आपको एक दिव्य और बुद्धिमान पुत्र की प्राप्ति होगी। यह सुनकर माता बहुत प्रसन्न हुई और पालने में एक बालक को देख उसकी खुशी का ठिकाना ना रहा। चारों लोकों में आनंद फैल गया था। भगवान शिव और पार्वती ने एक विशाल उत्सव का आयोजन किया। जिसे देखने के लिए चारों ओर से देवी-देवता, गंधर्व, राक्षस और ऋषि-मुनियों का आगमन होने लगा। वहीं उन्हीं के बीच शनि महाराज भी दर्शन करने आए। माता पार्वती ने उनसे आग्रह किया कि वह उनके बच्चे को आशीर्वाद दें। वहीं शनि महाराज अपनी दृष्टि के कारण पार्वती के बच्चे को देखने से बच रहे थे। माता पार्वती को यह देख बहुत बुरा लगा। उन्होंने शनिदेव से एक प्रश्न पूछ लिया कि क्या आपको बच्चे का आना अच्छा नहीं लगा। शनिदेव बिना कुछ बोले बालक को देखने गए, लेकिन जैसे ही शनि की दृष्टि उस बालक पर पड़ी, तो बालक का सिर आकाश में उड़ गया। त्योहार का माहौल तुरंत मातम में बदल गया। यह देख माता पार्वती चिंतित हो गईं। चारों तरफ अफरातफरी का माहौल था। जल्द ही गरुड़ जी को चारों दिशाओं से सर्वश्रेष्ठ सिर लाने के लिए कहा गया। गरुड़ जी को हाथी का सिर मिला। शंकर जी ने उस सर को बालक के शरीर से जोड़ दिया | इस प्रकार गणेश जी को हाथी का मस्तक प्राप्त हुआ।

गणेश जी की प्रतिमा का विसर्जन क्यों किया जाता है?/Why is the Visarjan of Ganesha Idol Performed

धार्मिक ग्रंथों और पौराणिक कथाओं के अनुसार जब वेदव्यास जी ने दस दिनों तक लगातार भगवान गणेश को महाभारत की कथा सुनाई तो उन्होंने अपनी आंखें बंद कर ली थी। दस दिनों के बाद जब उन्होंने अपनी आँखें खोली तो उन्होंने देखा कि भगवान गणेश का तापमान बहुत बढ़ गया है। उसी समय वेद व्यास जी ने उन्हें पास के कुंड में स्नान कराया। ऐसा करने से उनके शरीर का तापमान कम नीचे आ गया, इसलिए गणपति की स्थापना के बाद अगले दस दिनों तक गणेश जी की पूजा की जाती है और फिर भगवान गणेश की मूर्ति का उत्सव शुरू होने के दसवें दिन विसर्जन कर दिया जाता है। गणेश विसर्जन को एक और नजरिए से भी देखा जा सकता है। यह पर्व इस बात का प्रतीक है कि मानव शरीर धूल से बना है और अंत में उसे धूल में मिल जाना है।

इसी कथा में एक और बात का जिक्र है गणपति जी के शरीर को गर्म होने से बचाने के लिए वेद व्यास जी ने उनके शरीर पर सुगंधित मिट्टी का लेप लगाया जिससे उनके शरीर का तापमान कम होने लगा। लेप सूखने के बाद गणेश जी का शरीर सख्त हो गया। सूखी मिट्टी भी गिरने लगी। फिर व्यास जी ने उन्हें एक ठंडे सरोवर में ले जाकर पानी में स्नान करवाया। जब तक गणेश जी वेद व्यास जी के स्थान पर थे, वेदव्यास जी ने दस दिनों तक श्री गणेश को उनका पसंदीदा भोजन दिया। बस तभी से गणेश जी की मूर्ति की स्थापना और विसर्जन का चलन है। इसी प्रथा में गणेश जी के पसंदीदा भोजन बना कर गरीबों या ब्राह्मणों को खिलाने की प्रथा भी है।

गणेश विसर्जन का महत्व

हिंदू पौराणिक कथाओं में, भगवान गणेश के विसर्जन के पीछे एक अनेक और मजेदार कहानियां हैं। गणेश चतुर्थी/Ganesh Chaturthi का उत्सव मानव जीवन के चक्र का प्रतिनिधित्व करता है: जन्म, जीवन और मृत्यु। ऐसा माना जाता है कि गणेश चतुर्थी के अंतिम दिन, भगवान गणेश अपने माता-पिता के पास कैलाश लौटते हैं। लोग भगवान गणेश की पूजा करते हैं और आशीर्वाद मांगते हैं ताकि वह उन्हें सभी बाधाओं से मुक्त जीवन दें। यह भी माना जाता है कि जब भगवान गणेश घर किसी व्यक्ति के घर से निकलते हैं, तो वह सभी नकारात्मक ऊर्जा और समस्याएं उस व्यक्ति के जीवन से दूर करके जाते हैं।

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार अगर गणेश विसर्जन/Ganesha Visarjan भी शुभ मुहूर्त के अनुसार किया जाए तो यह लाभदायक साबित होता है।

एक चूहा कैसे बना गणेश का वाहन?/ How did a rat become the Vaahan of Ganesha?

गणेश जी का वाहन एक चूहा है। उनकी शारीरिक संरचना की तुलना में उनका वाहन बहुत छोटा प्रतीत होता है। गणेश जी ने एक छोटे से जीव को अपने वाहन के रूप में क्यों चुना? यह प्रश्न अकसर लोगों के मन में आता होगा। यह बात तो सबको पता है कि गणेश ज्ञान और विद्या के अधिष्ठाता देवता हैं। ज्ञान में उनसे ऊपर किसी का दर्जा नहीं है और ना ही कोई उनसे तर्क-वितर्क और वाद-विवाद में उनसे बढ़कर है। आप यह भी कह सकते हैं कि उनका जुनून हर एक चीज या समस्या की गहराई तक जाना, और उस विषय में शोध करना और निष्कर्ष निकालना है। आप मूषक को भी वाद-विवाद में कम नहीं आंक सकते। यह हर वस्तु को कुतरता है और समान रूप से हमेशा सक्रिय रहता है। यह हमेशा सतर्क रहने का संदेश देता है। गणेश जी के पास अपना वाहन चुनना का पूरा अवसर था और उन्होंने चूहे की यह सब विशेषता देखकर ही उसे अपना वाहन चुना।
एक बार गणेश जी को महर्षि पाराशर के आश्रम में आमंत्रित किया गया था। उसी समय एक एक विशाल चूहे ने आश्रम में कदम रखा और सब कुछ नष्ट कर दिया। भगवान गणेश यह सब देख कर उस विशाल चूहे से मिलने और उसे सबक सिखाने का फैसला किया। गणेश जी उससे मिलने पहुंचे। उनके पास 'पाशा' नामक एक हथियार रहता है। जैसे ही उन्होने उस विशाल चूहे के गले की ओर फेंका, वह उसके गले से लिपट कर उस चूहे को गणेश जी के चरणों में ले गया। उस विशाल चूहे ने गणेश जी से माफी मांगी। तब गणेश जी ने उसे अपना वाहन बनाने की पेशकश की और वह मान गया। तभी से ही मूषक देव गणेश जी के वाहन है।

इन वस्तुओं को गणेश जी को अवश्य अर्पित करें।/ These items Must be offered to Lord Ganesha 

मोदक: मोदक एक खास तरह की मिठाई है, जिसे गणेश उत्सव पर खास तौर पर बनाया जाता है। गणेश जी इसे बहुत पसंद करते हैं और मोदक चढ़ाने से भक्तों की मनोकामना भी पूरी है।
हरा दूर्वा: गणेश जी को हरा दूर्वा विशेष रूप से प्रिय है। ऐसा माना जाता है कि हरा दूर्वा उन्हें ताजगी और शीतलता प्रदान करता है।
बूंदी के लड्डू: गणेश जी को बूंदी के लड्डू भी बहुत पसंद हैं। यदि गणपति जी को भोग के रूप में बूंदी के लड्डू चढ़ाए जाते हैं, तो वह अपने भक्तों को धन और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं और उनके घर में खुशियों की कभी कमी नहीं होती है।
श्रीफल: गणेश जी को श्रीफल सभी फलों में प्रिय है। इसलिए गजानन की आरती में श्रीफल का भोग अवश्य लगाया जाता है।
सिंदूर: गणेश जी को प्रसन्न करने के लिए उन पर सिंदूर का तिलक जरूर लगाएं। गणपति जी को सिंदूर का तिलक लगाने के बाद हमें अपने ऊपर भी सिंदूर का तिलक लगाना चाहिए। इससे आपको गणेश जी का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

देवी शैलपुत्री
26 Sep, 2022

मां शैलपुत्री देवी दुर्गा के नौ रूपों में से पहली देवी हैं, भक्त नवरात्रि के दौरान सबसे पहले उनकी पूजा करते हैं। नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के इन नौ अलग-अलग रूपों की अलग-अलग पूजा की जाती है। नवरात्रि का पहला दिन मां शैलपुत्री को समर्पित है। इनके बाद क्रमशः ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। पहला दिन देवी शैलपुत्री का सम्मान करने का दिन है। वह पहाड़ों के राजा शैल की बेटी थी; इसलिए उन्हें शैलपुत्री का नाम दिया गया। वह प्रकृति की देवी है; इसलिए हम नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा करते हैं। देवी शैलपुत्री को देवी पार्वती का अवतार माना जाता है।

देवी शैलपुत्री के रूप/ Looks of Goddess Shailputri

 

  • देवी शैलपुत्री के माथे पर अर्धचंद्र,
  • दाहिने हाथ में त्रिशूल और उनके बाएं हाथ में कमल है| 
  • वह नंदी बैल की सवारी करती हैं| 
  • देवी का वाहन बैल है। 

देवी शैलपुत्री को जड़ चक्र की देवी के रूप में जाना जाता है। देवी शैलपुत्री योग करने से व्यक्ति देवी शैलपुत्री से शक्ति प्राप्त कर सकता है। मां दुर्गा के प्रथम रूप में शैलपुत्री मानव मन पर नियंत्रण रखती हैं। शैलपुत्री, जो चंद्रमा को नियंत्रित करती है, उस नवजात शिशु की स्थिति को संबोधित करती है जो स्वच्छ और शांत है और मानव संसार के सभी भ्रमों से दूर है।

मां शैलपुत्री की पूजा करने से चंद्रमा के दोष दूर होते हैं/Worshipping Goddess Shailputri remove the defects of the moon.

देवी शैलपुत्री महादेव की पत्नी हैं। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, देवी शैलपुत्री चंद्रमा के दोषों को दूर करती हैं। जिन लोगों की चंद्र राशि कमजोर है, जो तनाव महसूस करते हैं उन्हें देवी शैलपुत्री की पूजा करनी चाहिए। मां शैलपुत्री की पूजा करने से चंद्रमा के दोष दूर होते हैं। शैलपुत्री का अर्थ है पहाड़ों की बेटी। सती के शरीर को छोड़ने के बाद, वह अगले जन्म में हिमालय के राजा शैलराज की बेटी के रूप में पैदा हुईं और शैलपुत्री के नाम से जानी गई।

देवी शैलपुत्री की कथा/ Story of Goddess Shailputri

संस्कृत में शैलपुत्री का अर्थ है 'पहाड़ों की बेटी।' पौराणिक कथाओं के अनुसार, शैलपुत्री, अपने पिछले जन्म में, भगवान शिव की पत्नी (सती) और दक्ष की बेटी थी। एक दिन दक्ष ने महायज्ञ का आयोजन किया; उन्होंने भगवान शिव को छोड़कर सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया। दूसरी ओर, सती महायज्ञ में शामिल होने के लिए अधीर हो रही थी। भगवान शिव ने उसे बताया कि उसके अलावा अन्य सभी देवताओं को महा यज्ञ में आमंत्रित किया गया था। इसलिए उनका वहां जाना बहुत अनुचित होगा। लेकिन सती के प्रबल अनुरोध पर, भगवान शिव ने उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति दी।

सती जब अपने घर पहुंची तो उन्होंने देखा कि पति के प्रति अनादर की भावना वहां की हवा में भरी हुई थी। दक्ष ने भी उनसे कुछ बहुत ही अपमानजनक शब्द कहे। इससे सती का हृदय बहुत आहत हो गया। वह अपने पति के अपमान को सहन नहीं कर सकी और उसने खुद को महायज्ञ की अग्नि में भस्म कर दिया। इस असहनीय पीड़ा से दुखी होकर भगवान शिव ने महायज्ञ का विनाश किया। अपने अगले जन्म में, सती ने हिमालय के राजा शैल की बेटी के रूप में जन्म लिया और उनका नाम शैलपुत्री रखा गया। 

हिमालय के राजा को हिमावत के नाम से भी जाना जाता था, इसलिए देवी शैलपुत्री को देवी हेमवती के नाम से भी जाना जाता है। उनका वाहन एक वृक्ष है, इसलिए उन्हें वृक्षरुधा भी कहा जाता है।

शैलपुत्री मंत्र/Shailputri Mantra

देवी शैल पुत्र्यैनमः॥

वन्दे वांछित लाभाय, चंद्रार्ध कृत शेखराम्।

वृषारूढां शूल धरां, शैलपुत्रीं यश स्विनीम्॥

पूणेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्॥

पटाम्बर परिधानां रत्ना किरीटानामालंकार भूषिता॥

प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरांकातं कपोलां तुंग कुचाम्।

कमनीयांलावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्॥

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ शैलपुत्री रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥

घटस्थापना की प्रक्रिया 

देवी शैलपुत्री की पूजा करने से पहले घटस्थापना की प्रक्रिया की जाती है।

नवरात्रि के इस पहले दिन आपको क्या पहनना चाहिए/What should you do on the first day of Navratri?

इस दिन सफेद वस्त्र धारण करें और मां शैलपुत्री को सफेद फूल चढ़ाएं। देवी को जड़ों वाली सब्जी और मौसमी फल चढ़ाएं। दोपहर के समय इनकी पूजा करें।
एक शब्द मूल मंत्र का जाप करें - ॐ शैलपुत्रेय नमः।

मंत्र:/ Mantra 

दुर्गे देवि नमस्तुभ्यं सर्वकामार्थ साधिके।

ममसिद्घिम सिद्घिंवा स्वप्ने सर्व प्रदर्शय॥

ध्यान के दौरान साधक को विचारों, श्रृंगार और कामुक भावनाओं से दूर रहना चाहिए। मां शैलपुत्री की पूजा करने से मनचाहा फल मिलता है और कन्याओं को मनचाहा वर मिलता है। साथ ही साधक को मूल चक्र से उत्पन्न शक्तियों का लाभ मिलेगा।

देवी शैलपुत्री की आरती/Aarti of Maa Shailputri

शैलपुत्री मां बैल असवार।करें देवता जय जयकार।

शिव शंकर की प्रिय भवानी।तेरी महिमा किसी ने ना जानी।

पार्वती तू उमा कहलावे।जो तुझे सिमरे सो सुख पावे।

ऋद्धि-सिद्धि परवान करे तू।दया करे धनवान करे तू।

सोमवार को शिव संग प्यारी।आरती तेरी जिसने उतारी।

उसकी सगरी आस पुजादो।सगरे दुख तकलीफ मिटा दो।

घी का सुंदर दीप जला के।गोला गरी का भोग लगा  के।

श्रद्धा भाव से मंत्र गाएं।प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं।

जय गिरिराज किशोरी अंबे।शिव मुख चंद्र चकोरी  अंबे।

मनोकामना पूर्ण कर दो।भक्त सदा सुख संपत्ति भर दो।

देवी शैलपुत्री का प्रिय प्रसाद/ Goddess Shailputri's favorite Prasadam

सफेद चीजें देवी शैलपुत्री को प्रिय हैं। नवरात्र के पहले दिन मां शैलपुत्री को सफेद चीजें, सफेद फूल और सफेद प्रसाद का भोग लगाना चाहिए। साथ ही उन्हें सफेद बर्फी भी चढ़ानी चाहिए। मां के इस प्रथम रूप को जीवन में शांति और दृढ़ता का प्रतीक माना जाता है। शैल का अर्थ है चट्टान, और चट्टानों को दृढ़ता का प्रतीक माना जाता है। इनकी पूजा से महिलाओं को असाधारण फल की प्राप्ति होती है।

नवरात्रि के नौ दिनों के लिए क्या करें और क्या न करें:

परिवार में  शांति बनाए रखने के लिए सभी को शुद्ध प्रेम और भक्ति के साथ पूजा करने की आवश्यकता है। आइए जानते हैं नौ दिनों की इस शुभ अवधि के लिए क्या करें और क्या न करें करने योग्य:

क्या करना चाहिए/What should we do?

  • अपने घर में कुछ ज्वार रखें।

  • प्रतिदिन मंदिर जाते हैं।

  • देवी को जल अर्पित करें।

  • नंगे पैर रहें।

  • इन नौ दिनों के लिए उपवास का अभ्यास करें।

  • विशेष रूप से इन नौ दिनों के दौरान देवी को सजाएं।

  • अष्टमी और नवमी अर्थात अष्टमी और नवमी पर विशेष पूजा करें।

  • कन्या भोज का आयोजन करें।

  • देवी के लिए एक अनंत अखंड दीपक जलाएं।

क्या नहीं करना चाहिए/What should we not do?

  • इन नौ दिनों तक अपने बाल और नाखून न काटें।

  • खाना बनाते समय छोंक और बघार न करें।

  • लहसुन और प्याज से खाना न बनाएं।

आप भारतीय त्योहारों, चैत्र नवरात्रि, अन्य सभी प्रमुख भारतीय त्योहारों के लिए लोकप्रिय व्रत तिथियों में ज्योतिष की प्रासंगिकता पर इसी तरह के लेख पढ़ सकते हैं।

 

देवी ब्रह्मचारिणी
27 Sep, 2022

नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। देवी का यह रूप देवी पार्वती का अविवाहित रूप है। ब्रह्मचारिणी एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है ब्रह्म जैसा व्यवहार करना। उनकी कठोर तपस्या के कारण उन्हें तपस्चारिणी भी कहा जाता है। देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से व्यक्ति को अपने हर काम में हमेशा सफलता मिलती है। देवी ब्रह्मचारिणी बुराई को अच्छे मार्ग की ओर निर्देशित करती हैं। देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से तप, त्याग, सदाचार, संयम और वैराग्य के गुण भी आ जाते हैं।

देवी ब्रह्मचारिणी का रूप/ Goddess Brahmacharini's form

माता ब्रह्मचारिणी श्वेत वस्त्रों से सुशोभित हैं। वह अपने दाहिने हाथ में एक मंत्र माला और अपने बाएं हाथ में एक ईवर रखती है। उनका रूप अत्यंत उज्ज्वल और मनमोहक है। वह प्रेम की देवी भी हैं। देवी दुर्गा के इस रूप की पूजा करने से व्यक्ति भक्ति और सिद्धि प्राप्त कर सकता है। उनकी एक हजार वर्षों की कठोर तपस्या के कारण ही उन्हें ब्रह्मचारिणी कहा जाता है। इस तपस्या अवधि के दौरान, उन्होंने  कई वर्षों तक भोजन नहीं किया और भगवान शिव को प्रसन्न करने में सफल रही, और इस तरह उन्हें ब्रह्मचारिणी के रूप में जाना जाने लगा। जब देवी ब्रह्मचारिणी अपने भक्तों पर प्रसन्न होती हैं, तब वह उन्हें तप, त्याग, सदाचार, संयम, वैराग्य और धैर्य के गुणों का आशीर्वाद देती हैं।

देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा का महत्व/ The Value of Worshipping Goddess Brahmacharini

मानव जीवन हमेशा दर्द, दुख, बीमारी और भय से प्रभावित होता है। इसलिए सभी कष्टों से मुक्ति पाने के लिए मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। 'ब्रह्म' का अर्थ है तपस्या, और 'चारिणी' का अर्थ है व्यवहार करना। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ है तपस्वी। देवी का रूप भी उनके नाम से मेल खाता है। वह सफेद वस्त्रों को पसंद करती है और अपने दाहिने हाथ में एक मंत्र की माला और अपने बाएं हाथ में एक ईवर रखती है। मां दुर्गा का यह रूप अपने भक्तों को अनंत फल देता है। उनके आशीर्वाद से तप, त्याग, सदाचार, संयम, वैराग्य और धैर्य के गुण बढ़ने लगते हैं। देवी ब्रह्मचारिणी ने सभी राक्षसों को हराकर दुनिया को उनसे छुटकारा दिलाया। 

इसी तरह, वह अपने भक्तों को उनकी इच्छा के अनुसार फल प्रदान करती है। इनकी पूजा करने से व्यक्ति का धैर्य, आत्मविश्वास, शक्ति और नैतिक बुद्धि भी बढ़ती है। उसकी तपस्या के प्रभाव से भेदभाव, असंतोष, लोभ आदि का नाश होता है। आपका जीवन उत्साह, धैर्य और साहस से भर जाता है| आदमी मेहनती बन जाता है। जिन लोगों का जीवन अंधकार से भरा है और उन्होंने कठिन समय में धैर्य और साहस खो दिया है, उनके लिए देवी का यह दूसरा ब्रह्मचारिणी रूप दिव्य और अलौकिक प्रकाश लाता है। देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से उनके जीवन में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, धैर्य में वृद्धि का अनुभव होता है। उनका मन बुरे से बुरे समय में भी जिम्मेदारियों के रास्ते से विचलित नहीं होता है। देवी अपने भक्तों के जीवन से किसी भी गंदगी, दूरदर्शिता और दोषों को दूर करती हैं। देवी की कृपा से सदैव  विजय प्राप्त होती है।

देवी ब्रह्मचारिणी /Goddess Brahmacharini

नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। देवी दुर्गा का यह दूसरा रूप उनके भक्तों और उनकी पूजा करने वाले साधुओं को प्रभावी फल देता है| उनकी पूजा करने से तप, त्याग, सदाचार, संयम, वैराग्य और धैर्य के गुण बढ़ते हैं। देवी ब्रह्मचारिणी की कृपा से सदैव  विजय प्राप्त होती है तथा कष्टों का नाश होता है। देवी ब्रह्मचारिणी का रूप अपने आप में ज्ञानवर्धक है। देवी दुर्गा की नौ शक्तियों में से, देवी ब्रह्मचारिणी दोहरी शक्ति हैं। ब्रह्मा का अर्थ है तपस्या, और चारिणी का अर्थ है व्यवहार| यह देवी शांति से ध्यान में विसर्जित है। उनकी कठोर तपस्या के कारण उनके मुख पर तेज का ऐसा अनुपम संगम है, जो तीनों लोकों को उजागर कर रहा है। देवी ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में अक्ष माला और दूसरे हाथ में ईवर है। देवी ब्रह्मचारिणी वास्तव में भगवान ब्रह्मा का रूप हैं । इस देवी के कई अलग-अलग नाम भी हैं, जैसे तपक्षरिणी, अपर्णा और उमा। 

कौन हैं देवी ब्रह्मचारिणी?/ Who is Goddess Brahmacharini

शिवपुराण और रामचरित्रमानस में लिखा है कि देवी पार्वती भगवान शिव को अपना पति बनाना चाहती थीं। उस इच्छा को पूरा करने के लिए, उन्होंने केवल फल खाते हुए कई हजार साल तपस्या में बिताए। और इस अवधि के बाद, देवी ब्रह्मचारिणी अगले तीन हजार वर्षों तक पेड़ों के पत्तों पर जीवित रहीं। इतनी कठोर तपस्या के बाद, वह ब्रह्मचारिणी के रूप को संग्रहीत करने में सक्षम थी। नवरात्रि के दूसरे दिन, भक्त अपने मन को ब्रह्मचारिणी के पवित्र चरणों में केंद्रित करते हैं और उन्हें स्वाधिष्ठान चक्र में रखते हैं। इनके मंत्रों का जाप करने से इन्हें मनोवांछित मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

देवी ब्रह्मचारिणी की कथा/ The Story of Goddess Brahmacharini

सदियों पुरानी मान्यताओं के अनुसार, देवी पार्वती ने भगवान शिव से विवाह करने की इच्छा व्यक्त की, जिसके बाद उनके माता-पिता ने उन्हें हतोत्साहित करने का प्रयास किया। हालांकि इसके बाद देवी पार्वती ने काम के देवता कामदेव भगवान से मदद मांगी। ऐसा माना जाता है कि कामदेव ने भगवान शिव पर कामुकता का एक तीर चलाया था; इस प्रकार, उनकी ध्यान की स्थिति भंग हो गई; इस पर भगवान ने क्रोध से आगबबूला होकर खुद को जला लिया। इसके बाद देवी पार्वती भगवान शिव की तरह रहने लगीं। वह पहाड़ों पर गई, और वहाँ उन्होंने कई वर्षों तक तपस्या की। जिसके कारण वह ब्रह्मचारिणी देवी के रूप में लोकप्रिय हो गईं। इस कठिन तपस्या के कारण, देवी भगवान शिव का ध्यान आकर्षित करने में सफल हुई। इसके बाद, भगवान शिव ने अपना रूप बदल लिया, और उनके सामने गए, और अपने बारे में बुरी बातें करने लगे, लेकिन देवी भगवान शिव के खिलाफ कुछ भी सुन नहीं सकीं। अंत में, भगवान शिव ने उन्हें स्वीकार कर लिया और उन्होंने पार्वती जी से विवाह कर लिया।

देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा करने की विधि/ Procedure to worship Goddess Brahmacharini

देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा करने का सिलसिला चलता रहता है। 

सबसे पहले आपके द्वारा कलश में निमंत्रित देवी-देवताओं और योगियों को फूल, अक्षत, चंदन से सम्मानित करना चाहिए और दूध, दही, चीनी, धृत और शहद से स्नान कराना चाहिए। देवी को जो भी प्रसाद चढ़ाया जाता है उसका एक हिस्सा उन्हें भी प्रदान किया जाना चाहिए। प्रसाद चढ़ाने के बाद उनके मुख को धोकर उन्हें सुपारी भेंट करें और फिर उनके चारों ओर दक्षिणावर्त घूमें। भगवान की पूजा करने के बाद, कलश से नौ ग्रहों की पूजा करते हैं, उनकी पूजा करने के बाद देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा करें। देवी ब्रह्मचारिणी का सम्मान करते समय सबसे पहले आपको अपने हाथ में एक फूल लेकर प्रार्थना करनी चाहिए। उन्हें पंचामृत से स्नान कराएं और फिर विभिन्न पुष्प, अक्षत, कुमकुम और सिंदूर चढ़ाएं। देवी को लाल फूल बहुत पसंद होते हैं। घी और कपूर के मिश्रण से उसकी पूजा करें। अंत में क्षमा प्रार्थना करें|

 

आवाहनं न जानामि न जानामि वसर्जनं, पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरी 

देवी की पूजा के दौरान इस मंत्र का जाप करना चाहिए। इस मंत्र का जाप करना जरूरी है। 

(ॐ देवी ब्रह्मचारिणी नमः॥)

(या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।)

(नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।)

(दधाना करपद्माभ्या मक्षमाला कमण्डलू।)

(देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्य नुत्तमा॥)

मंत्रों के जाप के दौरान आप देवी ब्रह्मचारिणी के स्रोत ग्रंथों को भी पढ़ सकते हैं, जो इस प्रकार हैं-

मां ब्रह्मचारिणी का स्रोत पाठ/ Maa Brahmacharini ka strot paath

(तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्।)

(ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥)

(शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी।)

(शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥)

“मां ब्रह्मचारिणी का कवच

(त्रिपुरा में हृदयं पातु ललाटे पातु शंकरभामिनी।)

(अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥)

(पंचदशी कण्ठे पातुमध्यदेशे पातुमहेश्वरी॥)

(षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।)

(अंग प्रत्यंग सतत पातु ब्रह्मचारिणी।)

ध्यान मंत्र/Meditation Mantra

(वन्दे वाञ्छित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखराम्।)

(जपमाला कमण्डलु धरा ब्रह्मचारिणी शुभाम्॥)

(गौरवर्णा स्वाधिष्ठान स्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।)

(धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालङ्कार भूषिताम्॥)

(परम वन्दना पल्लवाधरां कान्त कपोला पीन।)

(पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥)

देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा करने के नियम/ Rules to Worship Goddess Brahmacharini

  • देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा के दौरान पीले या सफेद वस्त्र धारण करें।

  • देवी को सफेद वस्तुएँ अर्पित करें जैसे- जमी हुई चीनी, चीनी का पंचामृत।

  • स्वाधिष्ठान चक्र पर दीपक और अर्धचंद्र की ज्वाला का ध्यान करें।

  • "ऐ नमः" का पाठ करें और तरल और फलों के आहार पर विशेष ध्यान दें।

देवी ब्रह्मचारिणी की आरती/ Aarti of Goddess Brahmacharini

जय ब्रह्मचारिणी माता

(जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता)

(जय चतुरानन प्रिय सुख दाता)

(ब्रह्मा जी के मन भाती हो)

(ज्ञान सभी को सिखलाती हो)

(ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा)

(जिसको जपे सकल संसारा)

(जय गायत्री वेद की माता)

(जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता)

(कमी कोई रहने न पाए)

(कोई भी दुख सहने न पाए)

(उसकी विरति रहे ठिकाने)

(जो तेरी महिमा को जाने)

(रुद्राक्ष की माला ले कर)

(जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर)

(आलस छोड़ करे गुणगाना)

(मां तुम उसको सुख पहुंचाना)

(ब्रह्माचारिणी तेरो नाम)

(पूर्ण करो सब मेरे काम)

(भक्त तेरे चरणों का पुजारी)

(रखना लाज मेरी महतारी)

देवी ब्रह्मचारिणी को यह भोजन प्रसाद पसंद है/Goddess Brahmacharini likes this food offering

देवी ब्रह्मचारिणी को गुलहड़ और कमल का फूल बहुत पसंद है, इसलिए आपको उनकी पूजा करते समय इन फूलों को उनके चरणों में अर्पित करना चाहिए। चूंकि देवी को जमी हुई चीनी और सफेद चीनी पसंद है, इसलिए आपको उन्हें जमी हुई चीनी और पंचामृत का भोग लगाना चाहिए। वह इस पेशकश से प्रभावित होंगी। इन चीजों को चढ़ाने से आपकी लंबी उम्र सुनिश्चित होती है।

इनकी पूजा करने से आपको ये फल मिलते हैं/Worshipping her provides you these fruits

देवी ब्रह्मचारिणी को प्रभावित करना सरल है। पूजा के दौरान उन्हें सफेद चीनी और जमी हुई चीनी चढ़ाएं। इस दिन की पूजा प्रक्रिया के दौरान भक्तों को अपना ध्यान स्वाधिष्ठान चक्र पर केंद्रित करना चाहिए। यह सुस्ती, तनाव और चिंता को दूर करता है। प्रसन्नता, निष्ठा, आत्म-विश्वास और ऊर्जा में वृद्धि होती है और भक्त को सफलता प्राप्त होती है।

स्वाधिष्ठान चक्र/ Svadhisthana Chakra

देवी ब्रह्मचारिणी को ज्ञान, तपस्या और वैरागी की देवी के रूप में जाना जाता है। वह हमेशा कठोर तपस्या और तप में लीन रहती है जिसके कारण उसे ब्रह्मचारिणी कहा जाता है। उनकी पूजा छात्रों और तपस्वियों के लिए बहुत फायदेमंद है। जिन लोगों का स्वाधिष्ठान चक्र कमजोर होता है, उनके लिए मां ब्रह्मचारिणी की पूजा बहुत ही अनुकूल होती है।

स्वाधिष्ठान चक्र कमजोर होने पर क्या होता है?/ What happens when the Svadishthan Chakra is weak?

  • व्यक्ति में अविश्वास होता है।

  • इन लोगों के साथ हमेशा कुछ भयानक होने की संभावना बनी रहती है।

  • ये लोग कभी-कभी क्रूर भी हो सकते हैं।

स्वाधिष्ठान चक्र को मजबूत करने के लिए क्या करें? What to do to strengthen the Svadishthan Chakra?

  • रात के समय सफेद वस्त्र धारण करें।

  • सफेद आसन पर बैठना उत्तम रहेगा।

  • इसके बाद देवी को सफेद फूल चढ़ाएं।

  • सबसे पहले अपने गुरु को याद करो।

  • इसके बाद आज्ञा चक्र का ध्यान करें।

  • ध्यान करने के बाद, अपने शिक्षक या देवी से अपने स्वाधिष्ठान चक्र को मजबूत करने का अनुरोध करें।

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देवी चंद्रघंटा
28 Sep, 2022

नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। मां चंद्रघंटा का नाम दो शब्दों को मिलकर बना है-चंद्र, जिसका अर्थ है चंद्रमा, और घंटा का अर्थ है घंटी। देवी का नाम उनके माथे पर रखी गई घंटी के आकार के आधे चंद्रमा से लिया गया है। उन्हें देवी चंद्रखंड के रूप में भी जाना जाता है। देवी दुर्गा का यह तीसरा रूप उनकी पूजा करने वालों को शक्ति और वीरता प्रदान करता है और माना जाता है कि उनके सभी दुख दूर हो जाते हैं। भले ही देवी चंद्रखंड देवी पार्वती का अधिक मजबूत रूप हैं, ऐसा माना जाता है कि वह केवल तभी प्रकट होती हैं जब किसी मुद्दे पर उग्र होती हैं। नहीं तो वह शांत स्वभाव की ही होती हैं| देवी पार्वती के विवाहित संस्करण को देवी चंद्रघंटा के नाम से भी जाना जाता है। देवी चंद्रघंटा की पूजा करने से उपासकों को शक्ति, शांति और वीरता की अनुभूति होती है।

देवी चंद्रघंटा का प्रतिनिधित्व/The representation of Goddess ChandraGhanta

देवी चंद्रघंटा सिंह की सवारी करती हैं, और उनका शरीर सोने की तरह चमकीला होता है। उनकी दस भुजाएं हैं जहाँ चार, बायीं भुजाओं में एक त्रिशूल, तलवार, और एक कमंडल है जबकि पाँचवीं भुजा एक मुद्रा बनाती है। दाहिनी ओर अन्य चार भुजाओं में कमल, तीर, धनुष और एक जप माला है। अस्त्र-शस्त्रों के साथ देवी दुर्गा का यह रूप युद्ध के समय प्रकट होता है।

देवी चंद्रघंटा कौन हैं?/ Who is Goddess ChandraGhanta?

देवी दुर्गा ने देवी चंद्रघंटा का यह रूप असुरों को हराने और दुनिया के नकारात्मक प्रभाव को खत्म करने के लिए लिया था। असुरों को हराकर, देवी दुर्गा ने असुरों की निरंतर यातना से देवताओं को राहत दी। देवी चंद्रघंटा को देवी पार्वती के विवाहित रूप में भी जाना जाता है। जैसे ही देवी पार्वती का भगवान शिव से विवाह हुआ, उन्होंने अपने माथे पर चंद्रमा रखा और देवी चंद्रघंटा के रूप में जानी गईं। जैसा कि वह शेर की सवारी करती है, माना जाता है कि उन्होंने युद्ध के लिए आक्रामक रूप ले लिया है। वह अपनी बाहों में कमल, हथियार और कमंडल लिए हुए हैं।

देवी चंद्रघंटा की पूजा का महत्व/ Significance of worshipping Goddess ChandraGhanta

माता चंद्रघंटा की पूजा करते समय लोग आमतौर पर अपने सभी डर से छुटकारा पा लेते हैं और ताकत की भावना में वृद्धि का अनुभव करते हैं। उनके पास कई हथियारों के साथ दस भुजाएँ हैं जो देवी पार्वती के चरम संस्करण का प्रतिनिधित्व करती हैं। शेर की सवारी करते हुए, वह हमेशा युद्ध के मैदान में प्रवेश करने के लिए तैयार रहती है। तंत्र साधना के अनुसार, देवी चंद्रघंटा का यह रूप मणिपुर चक्र को जागृत करता है। देवी चंद्रघंटा ग्रह से दुष्टों का सफाया करने के लिए हमेशा तैयार रहती हैं। 

जो लोग चंद्रघंटा मां की पूजा करते हैं उन लोगों को उनकी कुंडली में मंगल ग्रह के दोषों से छुटकारा मिल सकता है। इसलिए हमेशा नवरात्रि के तीसरे दिन देवी चंद्रघंटा की पूजा करनी चाहिए। उचित विधि से देवी की पूजा करने से व्यक्ति के पापों का नाश होता है। देवी चंद्रघंटा के आशीर्वाद से, विवाहित जोड़े ऐश्वर्य और समृद्धि के साथ एक सुखी वैवाहिक जीवन जीते हैं। जैसे-जैसे विवाहित जोड़े उनकी पूजा करते हैं, वह अपने वैवाहिक जीवन में आने वाली कई समस्याओं का समाधान आसानी से कर सकते हैं। देवी चंद्रघंटा परिवार की रक्षक हैं। वह शुक्र ग्रह से जुड़ी हुई है। यदि आपकी कुंडली में शुक्र किसी भी तरह से प्रभावित है, तब देवी चंद्रघंटा की पूजा करने से मदद मिल सकती है।

नवरात्रि के तीसरे दिन का महत्व/ Significance of third Navratri Day 

तीसरे नवरात्र का बहुत महत्व है। ऐसा माना जाता है कि इस शुभ दिन पर देवियों के देवता की पूजा की जाती है। यह सच है कि देवी की घंटी की आवाज अत्याचारियों, और राक्षसों को डराती है। देवी के आशीर्वाद से, उपासकों को अक्सर अलौकिक वस्तुओं की प्राप्ति होती है।हिंदू शास्त्रों के अनुसारदेवी चंद्रघंटा की पूजा करने से शांति और विनम्रता के साथ साथ निर्भयता और साहस की शक्ति भक्तों में पैदा होती है।

मां चंद्रघंटा कथा/ Maa ChandraGhanta Story

  1. जब भगवान शिव ने देवी पार्वती से कहा कि वह किसी से विवाह नहीं करना चाहते हैं, तब वह नाराज हो गईं। देवी पार्वती को इस तरह देखकर भगवान शिव भावनात्मक रूप से आहत हुए। इसलिए, वह देवी पार्वती से विवाह करने के लिए बारात के साथ भगवान हिमवान के घर गए। बारात में कई प्रकार की जीवित प्रजातियां, देव, भूत और अघोरी शामिल थे। अपने दरवाजे पर बारात को देखकर, देवी पार्वती की मां डर के मारे बेहोश हो गईं। देवी पार्वती तब अपने परिवार को शांत करने की कोशिश कर रही थीं। इसके बाद उन्होंने देवी चंद्रघंटा के रूप में भगवान शिव के दर्शन किए। उन्होंने शिव को दूल्हे के रूप में घर में प्रवेश करने के लिए विनम्रता से मनाने की कोशिश की। भगवान शिव ने उनकी बात मान ली और खुद को कई प्रकार के गहनों से सुसज्जित किया।

  2. महिषासुर नाम के एक असुर ने स्वर्गलोक पर आक्रमण किया, उसने स्वर्गलोक पर सफलतापूर्वक शासन करने के लिए भगवान इंद्र को हराया। युद्ध के मैदान में हार के बाद, देवता स्वर्गलोक से भगवान की मदद लेने के लिए त्रिदेव के पास गए। उन्होंने त्रिदेव को महिषासुर के बारे में बताया कि वह स्वर्गलोक पर शासन करने के लिए भगवान इंद्र, सूर्य, वायु, अन्य लोगों को हरा चुका है वह स्वर्गलोक में अन्य भगवानों पर अत्याचार कर रहा है। पूरी स्थिति सुनकर त्रिदेव क्रोधित हो गए और जैसे ही उन्होंने अपना क्रोध व्यक्त किया, उनके मुंह से तीव्र ऊर्जा निकल गई। यह ऊर्जा सभी दस दिशाओं में फैल गई थी। तभी सबके सामने उस ऊर्जा ने एक देवी ने रूप धारण किया। भगवान शिव ने अपना त्रिशूल देवी को दिया और भगवान विष्णु ने उन्हें चक्र दिया। अन्य भगवान भी देवी को अपने सभी हथियार प्रदान करने के लिए एकत्र हुए। भगवान इंद्र ने देवी को अपना चंद्रमा और घंटी भेंट की। भगवान सूर्य ने अपनी ऊर्जा और तलवार दी। अंत में उन्हें  सवारी करने के लिए एक शेर भी दिया गया। सभी हथियारों और शक्ति के साथ, देवी चंद्रघंटा महिषासुर के साथ युद्ध करने के लिए रवाना हुईं। चूंकि देवी का चेहरा बहुत सारी ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता था, महिषासुर  देखकर डर गया था। फिर उसने अपने असुरों को देवी पर हमला करने का आदेश दिया। देवी दुर्गा को हराने के लिए सभी असुर युद्ध के मैदान में थे। कुछ ही समय में, देवी दुर्गा ने उनमें से प्रत्येक पर विजय प्राप्त कर ली। फिर उसने महिषासुर का वध किया और सभी भगवानों को उसके कब्जे से मुक्त कर दिया, और स्वर्गलोक उन्हें वापस कर दिया।

देवी चंद्रघंटा पूजा प्रक्रिया/ Goddess ChandraGhanta Puja Procedure

  • सूर्योदय से पूर्व स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए। फिर, एक आसन पर स्वच्छ कपड़ा बिछा कर देवी की मूर्ति को स्थापित करना चाहिए और उस स्थान को पवित्र गंगा जल से साफ करना चाहिए।

  • देवी को अर्पित की जाने वाली पूजा के लिए आवश्यक सामग्री में कपड़े, एक सौभाग्य धागा, चंदन, सिंदूर, हल्दी, गहने, रोली, दूर्वा, फूल, सुगंधित अगरबत्ती, दीया, फल, नैवेद्य और पान शामिल हैं।

  • फिर, आपको मंत्र "पिण्डजप्रवरारुढा चण्डकोपास्त्र कैर्युता दोहराने की आवश्यकता है। इस चंद्रघंटा मंत्र को दोहराते हुए देवी को फूल चढ़ाएं और अनुष्ठान करें।

  • दुर्गा सप्तशती के मंत्र का जाप करें और उनकी कथा सुनें। दीये से देवी की आरती करें।

  • इस दिन दूध से बनी मिठाई देवी चंद्रघंटा को कुछ सेब और गुड़ के साथ भेंट करें। 

इसे देवी चंद्रघंटा को अर्पित करें/ Offer this to Goddess ChandraGhanta

देवी के हर रूप को एक अलग प्रकार का प्रसाद चढ़ाया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि प्रसाद देवी के प्रति आपकी भक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। देवी चंद्रघंटा को हमेशा दूध से बनी मिठाइयों से ही भोग लगाना चाहिए। इसे देवी को अर्पित करने के बाद स्वयं खाएं और दूसरों को भी अर्पित करें। ऐसा माना जाता है कि देवी को यह प्रसाद चढ़ाने से आपके सभी दुखों का अंत हो जाएगा।

मंत्र/Mantra

ॐ देवी चन्द्र घण्टायै नमः

पूजा मंत्र /Puja Mantra

पिण्डज प्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता

प्रसादं तनुते मह्यम् चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥

स्तुति मंत्र/ Stuti  Mantra

या देवी सर्वभूतेषु माँ चन्द्रघण्टा रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

ध्यान मंत्र /Meditation Mantra

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।

सिंहारूढा चन्द्रघण्टा यशस्विनीम्॥

मणिपुर स्थिताम् तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्। 

खङ्ग, गदा, त्रिशूल, चापशर, पद्म कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥

पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्।

मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥

प्रफुल्ल वन्दना बिबाधारा कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।

कमनीयां लावण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥

स्रोत /Source 

आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम्।

अणिमादि सिद्धिदात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्॥

चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टम् मन्त्र स्वरूपिणीम्।

धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्॥

नानारूपधारिणी इच्छामयी ऐश्वर्यदायिनीम्।

सौभाग्यारोग्यदायिनी चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्॥)

माँ चंद्रघंटा की आरती 

जय माँ चन्द्रघंटा सुख धाम।

पूर्ण कीजो मेरे काम॥

चन्द्र समाज तू शीतल दाती।

चन्द्र तेज किरणों में समाती॥

क्रोध को शांत बनाने वाली।

मीठे बोल सिखाने वाली॥

मन की मालिक मन भाती हो।

चंद्रघंटा तुम वर दाती हो॥

सुन्दर भाव को लाने वाली।

हर संकट में बचाने वाली॥

हर बुधवार को तुझे ध्याये।

श्रद्दा सहित तो विनय सुनाए॥

मूर्ति चन्द्र आकार बनाए।

शीश झुका कहे मन की बाता॥

पूर्ण आस करो जगत दाता।

कांचीपुर स्थान तुम्हारा॥

कर्नाटिका में मान तुम्हारा।

नाम तेरा रटू महारानी॥

भक्त की रक्षा करो भवानी।

पूजा के समय पीले वस्त्र धारण करें

देवी चंद्रघंटा की पूजा हमेशा पीले वस्त्र पहनकर करनी चाहिए। इसका कारण अपनी सवारी के लिए देवी का प्रेम है- सिंह, जो पीले रंग का होता है।

नवरात्रि में न करें यह गलतियां

  • तुलसी के पत्ते न चढ़ाएं।

  • मां चंद्रघंटा की किसी भी छवि में शेर की दहाड़ नहीं होनी चाहिए।

  • देवी को दूर्वा न चढ़ाएं।

  • ज्वार की बुवाई करें और घर में अखंड ज्योति हो तब घर को खाली न छोड़ें।

  • देवी के प्रत्येक चित्र या मूर्ति के बाईं ओर एक दीया रखें।

  • ज्वार को देवी के चित्र या मूर्ति के दायीं ओर रखें।

  • पूजा हमेशा आसन पर बैठकर करें।

  • आसन जूट या ऊनी का होना चाहिए।

नवरात्रि में व्रत रखते समय रखें इन बातों का हमेशा ध्यान रखें

  • नवरात्रि में पूरे नौ दिनों तक व्रत रखने पर कभी भी अपनी दाढ़ी, मूंछ या बाल नहीं कटवाना चाहिए। लेकिन, एक बच्चे का सिर मुंडवाने के लिए, नवरात्रि एक शुभ समय है।

  • नवरात्रि में नाखून नहीं काटने चाहिए।

  • अगर आप नवरात्रि में कलश, जागरण या अखंड ज्योति लगा रहे हैं तब घर को खाली न छोड़ें।

  • नवरात्रि के दौरान प्याज, लहसुन या मांसाहारी भोजन का सेवन न करें।

  • अगर आपने नवरात्रि का व्रत रखा है तब काले कपड़े नहीं पहनने चाहिए।

  • नवरात्रि में चमड़े से बनी किसी भी चीज का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, जैसे चमड़े के जूते, बैग या बेल्ट।

  • अगर कोई नवरात्रि का व्रत कर रहा है तब उसे कभी भी नींबू नहीं काटना चाहिए।

  • जब किसी ने नवरात्रि का व्रत रखा हो तो नमक के दानों का सेवन नहीं करें। उसे केवल एक प्रकार का आटा, समारी चावल, शाहबलूत आटा, साबूदाना, सेंधा नमक, फल, आलू, मेवा और मूंगफली का सेवन करना चाहिए।

  • विष्णु पुराण के अनुसार दिन में सोने, तंबाकू का सेवन और शारीरिक संबंध बनाने से व्रत का फल नहीं मिलता ।

आप भारतीय त्योहारों, चैत्र नवरात्रि, अन्य सभी प्रमुख भारतीय त्योहारों के लिए लोकप्रिय व्रत तिथियों में ज्योतिष की प्रासंगिकता (Relevance of Astrology) पर इसी तरह के लेख पढ़ सकते हैं।

 

देवी कुष्मांडा
29 Sep, 2022

नवरात्रि के चौथे दिन शक्ति की देवी मां दुर्गा के चौथे रूप में मां कुष्मांडा की पूजा की जाती है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, यह दुनिया केवल अंधेरे में ढकी हुई थी; फिर, उसने अपने ईश्वरीय विचार से इस दुनिया की रचना की। यही कारण है कि उन्हें ब्रह्मांड के निर्माता के रूप में भी जाना जाता है। उन्हें "आदि स्वरूप" या "आदिशक्ति" के रूप में भी जाना जाता है। नवरात्रि के चौथे दिन मां कुष्मांडा की पूजा का बहुत महत्व है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, जो व्यक्ति नवरात्रि के चौथे दिन देवी कुष्मांडा की पूरी भक्ति के साथ पूजा करता है, उसे आशीर्वाद के रूप में आयु, प्रसिद्धि और शक्ति प्राप्त होती है। चेहरे पर हल्की मुस्कान के साथ, देवी कुष्मांडा के आठ हाथ हैं। उन्हें "अष्टभुजा" के नाम से भी जाना जाता है। उनके सात हाथों में क्रमशः ईवर, धनुष, बाण, कमल का फूल, कलश, घूमने वाला पहिया और एक गदा है। देवी पार्वती के बाद देवी इस रूप में थीं जब तक उन्होंने भगवान कार्तिकेय को जन्म नहीं दिया। इस रूप में देवी पूरे ब्रह्मांड को धारण करती हैं और उसका पोषण करती हैं। जो लोग संतान की इच्छा रखते हैं उन्हें देवी के इस रूप की पूजा करनी चाहिए। सांसारिक लोगों यानी परिवार चलाने वालों के लिए इस देवी की पूजा करना बहुत फायदेमंद होता है।

कुष्मांडा कौन है?/ Who is Kushmanda?

"कू" का अर्थ है "कुछ", "ऊष्मा" का अर्थ है गर्मी, और "अंडा" का अर्थ है "ब्रह्मांड।" शास्त्रों के अनुसार, देवी कुष्मांडा ने अपनी दिव्य मुस्कान से दुनिया के सभी अंधकारों को दूर किया। उनके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान के साथ, देवी कुष्मांडा को सभी दुखों के हरण के रूप में जाना जाता है। उसका निवास सूर्य है। यही एकमात्र कारण है कि देवी कूष्मांडा के पीछे से तेज प्रकाश आ रहा है। वह देवी दुर्गा का एकमात्र रूप हैं जिनके पास सूर्य पर रहने की शक्ति है।

देवी कुष्मांडा का प्रतिनिधित्व/ The Representation of Goddess Kushmanda

उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान के साथ, देवी कुष्मांडा के आठ हाथ हैं, इसलिए उन्हें "अष्टभुजा" भी कहा जाता है। उनके सात हाथों में क्रमशः ईवर, धनुष, बाण, कमल का फूल, कलश, घूमने वाला पहिया और एक गदा है। अष्टम हाथ पर जप की माला है जो सिद्धि की सभी विधियों को निर्धारित करती है। देवी के हाथ में अमृत कलश भक्तों को लंबी उम्र और उत्तम स्वास्थ्य का आशीर्वाद देता है। देवी कुष्मांडा सिंह की पीठ पर सवार है जो धर्म का प्रतीक है।

वह कैसे कुष्मांडा के नाम से जानी जाने लगी? How did she come to be known as Kushmanda?

कुष्मांडा का अर्थ है कद्दू। दुनिया को राक्षसों से छुटकारा दिलाने के लिए देवी दुर्गा कुष्मांडा के अवतार में आईं। पौराणिक कथाओं के अनुसार देवी कुष्मांडा ने ब्रह्मांड की रचना की थी। ऐसी मान्यता है कि अगर आप कद्दू का भोग लगाएं तब वह उससे प्रभावित होंगी। ब्रह्मांड और कद्दू से जुड़े होने के कारण उन्हें कुष्मांडा के नाम से जाना जाने लगा।

नवरात्रि के चौथे दिन का महत्व/ The importance of the fourth day of Navratri

देवी कुष्मांडा नवरात्रि के चौथे दिन की प्रमुख देवता हैं। यह एक व्यापक मान्यता है कि यदि कोई भक्त शुद्ध मन से सभी सभी नियमों के अनुसार देवी की पूजा करता है वह अपने जीवन में शीघ्र ही सर्वोपरि हो जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन उनकी पूजा करने से भक्त के सभी प्रकार के रोग नष्ट हो जाते हैं।

देवी का प्रिय फल/ Favourite fruit of Goddess.

सफेद कद्दू के फल मां कुष्मांडा को अर्पित करें। इसके बाद उन्हें दही और हलवा चढ़ाएं। ब्रह्मांड को एक कद्दू की तरह माना जाता है जो केंद्र में खाली होता है। देवी ब्रह्मांड के केंद्र में निवास करती हैं और पूरे ब्रह्मांड की रक्षा करती हैं। यदि आपको कच्चा कद्दू नहीं मिल रहा है, तब आप उन्हें एक पका हुआ कद्दू भी अर्पित कर सकते हैं। ऐसा करने से सभी रोग और शोक दूर हो जाते हैं।

ऐसा करने से आपके रोग और शोक दूर हो जाएंगे।/All disease and mournings disappear.

देवी की कृपा से भक्त की आयु, यश, शक्ति और स्वास्थ्य में समृद्धि आती है। जो लोग अक्सर बीमारी होते हैं उन्हें देवी कूष्मांडा की पूरी भक्ति के साथ पूजा करनी चाहिए।

देवी कुष्मांडा की कथा/ The tale of Goddess Kushmanda

जब चारों दिशाओं में अंधेरा छा गया था, तब कोई ब्रह्मांड नहीं था। यह वह समय था जब देवी कुष्मांडा ने अपने चेहरे पर हल्की मुस्कान के साथ ब्रह्मांड की रचना की थी। देवी का यह रूप ऐसा है कि वह सूर्य के भीतर भी निवास कर सकती हैं। यह रूप सूर्य के समान चमकीला है। ब्रह्मांड बनाने के बाद, देवी ने त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) और त्रिदेवियों (काली, लक्ष्मी और सरस्वती) को उत्पन्न किया। नवरात्रि के चौथे दिन मां कुष्मांडा की पूजा की जाती है। वह शक्ति का चौथा रूप है, जिसे सूर्य के समान तेजस्वी माना जाता है। 

हमारी देवी के इस रूप का वर्णन कुछ इस प्रकार किया गया है। देवी कुष्मांडा, अपने आठ हाथों से, हमें कर्मयोगी जीवन के लिए प्रोत्साहित करती हैं और साहस प्रदान करती हैं; उसकी प्यारी मुस्कान हमारी जीवन शक्ति को बढ़ाती है और हमें अपने चेहरे पर मुस्कान के साथ सबसे कठिन रास्तों पर चलने में सक्षम बनाती है। देवी दुर्गा के चौथे रूप को देवी कुष्मांडा के नाम से जाना जाता है। अपनी हल्की सी मुस्कान से उन्होंने अण्ड यानि ब्रह्मांड को उत्पन्न किया, यही कारण है कि उन्हें कुष्मांडा के नाम से जाना जाता है। एक पौराणिक कथा के अनुसारजब ब्रह्मांड नहीं था, तब हर जगह अंधेरा था। तब देवी ने अपनी उज्ज्वल मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की। इसलिए, वह आदि स्वरूप, आद्यरूप आदि शक्ति है। अष्टम हाथ पर जप की माला है जो सिद्धि की सभी विधियों को निर्धारित करती है। उनका घर सौर मंडल की आंतरिक दुनिया में स्थित है। 

वह अकेली है जिसके पास वहां रहने की क्षमता और शक्ति है। उसके शरीर का तेज और प्रभाव सूर्य के समान तेजस्वी है। देवी कुष्मांडा की पूजा करने से भक्तों के जीवन से सभी रोग और शोक दूर हो जाते हैं। देवी की कृपा से भक्त की आयु, यश, शक्ति और स्वास्थ्य में समृद्धि आती है। देवी को छोटी-छोटी चीजें देने पर भी प्रसन्नता का अनुभव होता है लेकिन पूरी भक्ति के साथ। सिंह उसका वाहन है। नवरात्रि के चौथे दिन केवल देवी के इस रूप की पूजा की जाती है। इस दिन देवी कुष्मांडा की पूजा करने से भक्त की आयु, प्रसिद्धि, शक्ति और स्वास्थ्य में समृद्धि आती है।

माता कुष्मांडा की पूजा विधि/ Pooja Vidhi of Mata Kushmanda

  • नवरात्रि के चौथे दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान के बाद हरे रंग के वस्त्र धारण करें।

  • इस दिन देवी की पूजा के लिए हरे आसन का प्रयोग करें।

  • देवी कुष्मांडा की मूर्ति या फोटो के सामने घी का दीपक जलाएं और उस पर तिलक लगाएं।

  • देवी की पूजा करते समय उन्हें वस्त्र, सौभाग्य सूत्र, चंदन, रोली, हल्दी, सिंदूर, दूर्वा, बिल्वपत्र, आभूषण, फूलों का हार, सुगंधित, अगरबत्ती, नैवेध, फल, पान के पत्ते चढ़ाएं।

  • अब उसे हरी इलायची, सौंफ और कच्चा कद्दू फल चढ़ाएं।

  • अब ॐ कुष्मांडा देव्यै नमः का 108 बार जाप करें।

  • देवी कुष्मांडा की आरती करें और किसी ब्राह्मण को भोजन कराएं अन्यथा दान करें।

  • इसके बाद त्रिदेव और देवी लक्ष्मी की पूजा करना भी आवश्यक है।

  • आप चाहें तो सिद्ध कुंजिका का पाठ और जाप कर सकते हैं।

  • इसके बाद आप खुद भी प्रसाद लें।

  • मालपुआ कुष्मांडा देवी को बहुत प्रिय है, इसलिए पूजा करने के बाद आप सभी को प्रसाद चढ़ाकर देवी को अर्पित कर सकते हैं, और फिर आप भी ले सकते हैं।

देवी कुष्मांडा का भोग/ The Bhog of Goddess Kushmanda

ऐसा माना जाता है कि अगर देवी कुष्मांडा को कोई चीज पूरी श्रद्धा के साथ अर्पित की जाती है, तब वह उसे सहर्ष स्वीकार कर लेती हैं। लेकिन मालपुए देवी कूष्मांडा को बहुत प्रिय हैं।

देवी कुष्मांडा मंत्र/ Kushmanda Mantra

(ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः॥)

प्रार्थना मंत्र/ Prayer Mantra

(सुरासम्पूर्ण कलशं रुधिराप्लुतमेव च।)

(दधाना हस्त पद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥)

स्तुति/ Stuti

या देवी सर्वभूतेषु मां कूष्मांडा रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

कुष्मांडा ध्यान मंत्र/Kushmanda Meditation Mantra

(वन्दे वाञ्छित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।)

(सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्विनीम्॥)

(भास्वर भानु निभाम् अनाहत स्थिताम् चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।)

(कमण्डलु, चाप, बाण, पद्म, सुधा कलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥)

(पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्।)

(मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥)

(प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।)

(कोमलाङ्गी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥)

कुष्मांडा स्रोत/Kushmanda source

(दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दारिद्रादि विनाशिनीम्।)

(जयंदा धनदां कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥)

(जगन्माता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्।)

(चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥)

(त्रैलोक्यसुन्दरी त्वंहि दुःख शोक निवारिणीम्।)

(परमानन्दमयी, कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥)

देवी कुष्मांडा की आरती/ Aarti of Goddess Kushmanda

(चौथा जब नवरात्र हो, कूष्मांडा को ध्याते।)

(जिसने रचा ब्रह्मांड यह, पूजन है उनका)

(आद्य शक्ति कहते जिन्हें, अष्टभुजी है रूप।)

(इस शक्ति के तेज से कहीं छांव कहीं धूप॥)

(कुम्हड़े की बलि करती है तांत्रिक से स्वीकार।)

(पेठे से भी रीझती सात्विक करें विचार॥)

(क्रोधित जब हो जाए यह उल्टा करे व्यवहार।)

(उसको रखती दूर मां, पीड़ा देती अपार॥)

(सूर्य चंद्र की रोशनी यह जग में फैलाए।)

(शरणागत की मैं आया तू ही राह दिखाए॥)

(नवरात्रों की मां कृपा कर दो मां)

(नवरात्रों की मां कृपा करदो मां॥)

(जय मां कूष्मांडा मैया।)

(जय मां कूष्मांडा मैया॥)

देवी कुष्मांडा की पूजा करने के लाभ/ Benefits of Worshipping Goddess Kushmanda

  • मां कूष्मांडा की पूजा करने से सभी प्रकार के रोग दूर रहते हैं।

  • देवी कुष्मांडा की पूजा करने से जीवन रेखा की प्रसिद्धि और शक्ति में वृद्धि होती है।

  • देवी कूष्मांडा की थोड़ी सी पूजा उन्हें प्रसन्न करती है, और भक्तों को एक आरामदायक, संतुष्ट और समृद्धि से भरा जीवन प्राप्त होता है।

भूल कर भी देवी कूष्मांडा की पूजा करते समय न करें ये काम.../Don't do these things while worshipping Goddess Kushmanda, even if you forget.

यह करें

  • मां दुर्गा के 108 नामों का जाप करें।

  • अपने घर में अनंत अखंड दीपक जलाएं।

  • देवी दुर्गा की दिन में दो बार पूजा करें, यानी सुबह और शाम, और उनकी पूजा करने से पहले भगवान गणेश का ध्यान करें।

  • केवल मंत्र जाप के बाद या पूजा के बाद भोजन न करें।

  • 12 साल और कम उम्र की लड़कियों को फल और कद्दू के फल का प्रसाद चढ़ाएं। अपने मन और विचारों में पवित्रता धारण करें|

यह ना करें/ Dont's:

  • देवी दुर्गा के मंत्र का जाप करते समय अपने शरीर को न हिलाएं और न ही गायन-गीत के रूप में मंत्र का जाप करें।

  • अपने मन और विचारों में पवित्रता धारण करें।

  • नवरात्रि के दौरान अपनी मां और उनकी उम्र की अन्य महिलाओं का सम्मान करें। उनका आशीर्वाद लेकर कोई भी काम शुरू करें।

  • छल, कपट और अपशब्द का प्रयोग न करें।

  • ब्रह्मचर्य के मार्ग पर चलें और गलत लोगों की संगति में न आएं।

सभी समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए करें इस मंत्र का जाप/ Chant this mantra to get relieved of all problems

(शरणागत दीनार्थ परित्राण परायणे)

(सर्वस्यार्ति हरे देवि नारायणी नमोस्तुते)

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देवी स्कंदमाता
30 Sep, 2022

देवी स्कंदमाता पहाड़ियों में निवास करती हैं और दुनिया भर के जीवों को नई ऊर्जा और ज्ञान का आशीर्वाद देती हैं। नवरात्रि के पांचवें दिन इस देवी की पूजा की जाती है। ऐसा कहा जाता है कि देवी स्कंदमाता की कृपा से मूर्ख भी बुद्धिमान बन सकता है। देवी दुर्गा के पांचवें रूप को देवी स्कंदमाता के रूप में जाना जाता है। उनका नाम स्कंदमाता उनके पुत्र भगवान स्कंद कुमार (कार्तिकेय) के नाम पर रखा गया है। देवी स्कंदमाता हमेशा अपने पुत्र, भगवान स्कंद कुमार को गोद में एक बच्चे के रूप में लेकर बैठे हुए दिखाई देती हैं। ऐसा माना जाता है कि नवरात्रि के पांचवें दिन साधक का मन विश्राम करता है और मन ही मन माता का एक पूरा चक्कर पूरा करता है। देवी स्कंदमाता की मूर्ति प्रेम और मूल्य का प्रतीक है, जो देवी दुर्गा के महत्व को बताती है। देवी दुर्गा के पांचवें रूप का नाम भगवान कार्तिकेय के नाम पर पड़ा। चूंकि देवी दुर्गा ने भगवान कार्तिकेय को इस रूप में जन्म दिया था, इसलिए उनके नाम पर इस रूप का नाम रखा गया।

देवी स्कंदमाता का प्रतिनिधित्व/ The representation of Goddess Skandamata

देवी स्कंदमाता चार भुजाओं से अपना रूप धारण करती हैं। ऊपरी दाहिने हाथ में भगवान स्कंद कुमार है, और निचले दाहिने हाथ में कमल है। देवी दुर्गा का हर रूप अत्यंत शुभ है और कमल पर विराजमान है। यही कारण है कि देवी स्कंदमाता को देवी विद्या वाहिनी और देवी पद्मासन के रूप में भी जाना जाता है। देवी स्कंदमाता भी सिंह की सवारी करती हैं। देवी स्कंदमाता को सौर मंडल की स्वामी माना जाता है। देवी स्कंदमाता की पूजा करने से भक्तों को अलौकिक सुख की प्राप्ति होती है। यह अलौकिक वरदान साधक की तपस्या पूर्ण करता है। यदि कोई अत्यधिक एकाग्रता के साथ देवी की पूजा करता है, वह अपनी सभी समस्याओं से छुटकारा पाता है और मोक्ष के मार्ग की ओर अग्रसर होता है।

देवी स्कंदमाता कौन हैं?/ Who is Goddess Skandamata?

स्कंदमाता का अर्थ है भगवान स्कंद की माता। देवी पार्वती के बड़े पुत्र का नाम स्कंद है। जब देवी पार्वती ने भगवान स्कंद को जन्म दिया, इसलिए उन्हें देवी स्कंदमाता के नाम से जाना गया। हालांकि, एक कहावत यह भी है कि आदिशक्ति जगदम्बा ने दुनिया को बाणासुर की यातना से मुक्त करने के लिए अपनी ऊर्जा से एक बच्चे को जन्म दिया। छह सिर वाले सनत कुमार को स्कंद कहा जाता है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, देवी स्कंदमाता हिमालय की पुत्री हैं, इसलिए उन्हें पार्वती के नाम से भी जाना जाता है। चूंकि वह भगवान शिव की पत्नी भी हैं, इसलिए उन्हें देवी माहेश्वरी भी कहा जाता है। देवी स्कंदमाता का शरीर गोरा है और उन्हें देवी गौरी के नाम से भी जाना जाता है। भगवान स्कंद, या भगवान कार्तिकेय, को देवता और असुरों के बीच एक प्रसिद्ध युद्ध में देवताओं के प्रमुख के रूप में नियुक्त किया गया था। इसलिए शक्ति और कुमार हमेशा प्राचीन ग्रंथों में भगवान स्कंद के नाम से जाने जाते हैं। देवी स्कंदमाता की चार भुजाएं हैं। उनकी दायीं ओर की निचली भुजा में कमल है, जबकि बायीं ओर की ऊपरी भुजा में वरमुद्रा है। बाईं ओर की निचली भुजा में भी कमल है। उसका पूरा प्रतिनिधित्व शुद्ध है, और वह शेर की सवारी करती है।

देवी स्कंदमाता का महत्व/ Importance of Goddess Skandamata

देवी स्कंदमाता सिंह की सवारी करती हैं, वह क्रोध का प्रतीक हैं, और उनकी गोद में एक बच्चा है जो भगवान कार्तिकेय हैं, जो मातृ प्रेम का प्रतिनिधित्व करते हैं। देवी दुर्गा का यह रूप हमें सिखाता है कि यदि हम भक्ति के मार्ग पर चलने का निर्णय लेते हैं, तब हमें अपने क्रोध पर अत्यधिक नियंत्रण रखना चाहिए, जिस तरह देवी अपने शेर को नियंत्रित करती हैं। दूसरी ओर, देवी की गोद में एक बच्चा हमें सिखाता है कि हम वास्तविक दुनिया में सभी लाभों और प्रेम के साथ, भक्ति का मार्ग भी चुन सकते हैं। इसके लिए बस आपको दृढ़ संकल्प की जरूरत है। यह भी माना जाता है कि मां स्कंदमाता की पूजा करने से महिला को संतान की प्राप्ति होती है। देवी स्कंदमाता के आशीर्वाद से बेहतर सोचने समझने की क्षमता प्राप्त होती है। यह भी कहा जाता है कि केवल देवी स्कंदमाता के आशीर्वाद के कारण, कालिदास ने महाकाव्य रघुवंशम और मेघदूत का निर्माण किया।

देवी स्कंदमाता की पूजा का महत्व/ Significance of worshipping Goddess Skandamata

यदि देवी स्कंदमाता की पूजा दृढ़ मन से की जाती है, तब ऐसा माना जाता है कि वह अपने उपासकों को दुनिया की हर खुशी का आशीर्वाद देते हैं। यदि कोई दंपत्ति गर्भधारण नहीं कर पा रहा है या ऐसा करने में कठिनाई का सामना कर रहा है, तब नवरात्रि में देवी स्कंदमाता की पूजा करना लाभकारी होता है। मां स्कंदमाता की पूजा करने से दंपति की संतान संबंधी सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं। यदि बृहस्पति ग्रह का आपकी कुंडली पर मजबूत या अच्छा प्रभाव नहीं है, तब देवी स्कंदमाता की पूजा करने से मदद मिल सकती है। उनकी पूजा करने से लोगों को घर में चल रहे सभी तर्कों से छुटकारा पाने में भी मदद मिल सकती है। यह शुभ और उज्ज्वल ऊर्जा के साथ  देवी के आशीर्वाद के रूप में प्राप्त होता है।

मां स्कंदमाता के आशीर्वाद से संतान की प्राप्ति होती है/ Goddess Skandamata blessed with a child.

जिन लोगों को संतान प्राप्ति में कठिनाई हो रही है उन्हें मां दुर्गा के इस रूप की पूजा करनी चाहिए। माना जाता है कि आदिशक्ति के इस रूप से लोगों को संतान की प्राप्ति होती है। जब आप एक बच्चे के लिए देवी स्कंदमाता की पूजा कर रहे हों तो भगवान कार्तिकेय का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है।

देवी स्कंदमाता एकता सिखाती हैं/ Goddess Skandamata teaches unity.

देवी स्कंदमाता हमें सिखाती हैं कि जीवन किस तरह से अपने आप में अच्छाई और बुराई के बीच निरंतर लड़ाई है जैसे कि भगवान और असुरों के बीच की लड़ाई, और व्यक्ति स्वयं ऐसे सभी युद्धों का सेनापति बन कर सभी समस्याओं का सामना कर सकता है। विवेकपूर्ण निर्णय लेने की शक्ति प्राप्त करने के लिए हमें देवी स्कंदमाता की पूजा करनी चाहिए। इस पूजा के लिए मन, वृत्ति और मध्यस्थता के लिए दृढ़ मन होना चाहिए। यह संयोजन व्यक्ति को सुख और शांति प्रदान करता है।

देवी सभी समस्याओं को दूर करती हैं/ Goddess takes away all the problems.

शास्त्रों में देवी स्कंदमाता की पूजा का विशेष महत्व है। मां स्कंदमाता की पूजा करने से साधक अपनी सभी मनोकामनाएं पूरी कर सकता है। भक्तों को शांति मिलती है। चूंकि वह सौरमंडल की सबसे शक्तिशाली देवी हैं, इसलिए उनकी प्रचंड ऊर्जा और भी अधिक महत्वपूर्ण है। अत: दृढ़ निश्चय और शुद्ध मन से इस देवी की आराधना करने से साधक को समुद्र पार करने जैसी क्षमता भी प्राप्त हो जाती है।

स्कंदमाता प्रेम की देवी हैं/ Skandamata is the Goddess of love.

कार्तिकेय को भगवान का सेनापति माना जाता है, और देवी स्कंदमाता को अपने पुत्र के प्रति अत्यधिक स्नेह है। जब भी राक्षस पृथ्वी पर शासन करना शुरू करते हैं, देवी सिंह पर सवार होकर अपने उपासकों को बचाने के लिए पृथ्वी पर आती हैं। देवी स्कंदमाता अपने बेटे के नाम से जुड़ना पसंद करती हैं। इसलिए इन्हें प्रेम और मातृत्व की देवी माना जाता है।

देवी स्कंदमाता की पूजा के लिए निम्नलिखित सामग्री का महत्व/ Importance of the following ingredients for worshipping Goddess Skandamata

देवी स्कंदमाता की पूजा में धनुष वाण अर्पित करना महत्वपूर्ण है। उन्हें लाल दुपट्टा, सिंदूर, नाख़ून पालिश, बिंदी, मेहंदी, लाल चूड़ियाँ, लिपस्टिक, और अन्य सामान भी देना चाहिए जो एक विवाहित महिला उपयोग करती है। नवरात्रि के पांचवें दिन, यदि कोई महिला देवी स्कंदमाता को लाल फूलों के साथ सभी सामग्री अर्पित करती है, तब उन्हें लंबे समय तक विवाहित जीवन और बच्चों का आशीर्वाद मिलता है। देवी दुर्गा के अन्य रूपों की तरह ही उनकी पूजा भी की जाती रही है।

देवी स्कंदमाता पूजा प्रक्रिया/ Goddess Skandamata Puja Procedure

  • नवरात्रि के पांचवें दिन प्रात:काल स्नान कर धुले हुए वस्त्र धारण करें।

  • अब अपने घर के मंदिर या पूजा स्थल में देवी स्कंदमाता का चित्र लगाएं।

  • गंगाजल से स्वयं को शुद्ध करें।

  • देवी की मूर्ति को जल से साफ करें।

  • अब कलश में कुछ सिक्के पानी में डालें।

  • मंत्रों का जाप करते हुए व्रत का संकल्प पढ़ें।

  • अब मां स्कंदमाता को कुमकुम और रोली लगाएं।

  • मूर्ति को पोशाक पहनाएं और भोग लगाएं। 

देवी स्कंदमाता की आरती/Goddess Skandamata Aarti

जय तेरी हो स्कंदमाता

पांचवा नाम तुम्हारा आता

सब के मन की जानन हारी

जग जननी सब की महतारी 

तेरी ज्योत जलाता रहूं मैं

हरदम तुम्हे ध्याता रहूं मैं

कई नामो से तुझे पुकारा

मुझे एक है तेरा सहारा

कहीं पहाड़ों पर है डेरा

कई शहरों में तेरा बसेरा

हर मंदिर में तेरे नजारे गुण गाए

तेरे भगत प्यारे भगति

अपनी मुझे दिला दो शक्ति

मेरी बिगड़ी बना दो

इन्द्र आदी देवता मिल सारे

करे पुकार तुम्हारे द्वारे

दुष्ट दत्य जब चढ़ कर आये

तुम ही खंडा हाथ उठाये

दासो को सदा बचाने आई

चमनकी आस पुजाने आई

जय तेरी हो स्कंदमाता...

मां स्कंदमाता को भोग लगाएं/ Offer Bhog to Goddess Skandamata

देवी स्कंदमाता को केले पसंद हैं, इसलिए आपको उन्हें केले का भोग लगाना चाहिए और फिर वही केले ब्राह्मणों या पंडितों को देना चाहिए। ऐसा करने से साधक का स्वास्थ्य अच्छा बना रहता है। आप देवी स्कंदमाता को भोग के रूप में खीर और मेवा भी चढ़ा सकते हैं, वह उससे भी प्रसन्न हो जाती है।

 पूजा मंत्र/ Puja Mantra

ओम देवी स्कन्दमातायै नमः॥

प्रार्थना / Prayer

सिंहासनगता नित्यं पद्माञ्चित करद्वया।

शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥

स्तुति मंत्र

या देवी सर्वभू‍तेषु मां स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

सर्वदा पातु मां देवी चान्यान्यासु हि दिक्षु वै॥

देवी स्कंदमाता के लिए श्लोक/Shlok for Goddess Skandamata

देवी स्कंदमाता से सभी आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए, देवी को प्रसन्न करने के लिए नवरात्रि के पांचवें दिन इन श्लोकों को दोहराना चाहिए।

  • या देवी सर्वभू‍तेषु माँ स्कंदमाता रूपेण संस्थिता।

  • नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और स्कंदमाता के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, मैं आपको बारंबार प्रणाम करता/करती हूँ. हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें. 

इस दिन साधक का मन 'विशुद्ध' चक्र में अवस्थित होता है. इनके विग्रह में भगवान स्कंद बालरूप में इनकी गोद में बैठे होते हैं.

इस मंत्र से ध्यान लगाकर करें माता की आराधना..

  • वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।

  • सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा स्कन्दमाता यशस्वनीम्।।

  • धवलवर्णा विशुध्द चक्रस्थितों पंचम दुर्गा त्रिनेत्रम्।

  • अभय पद्म युग्म करां दक्षिण उरू पुत्रधराम् भजेम्॥

  • पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानांलकार भूषिताम्।

  • मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल धारिणीम्॥

  • प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वांधरा कांत कपोला पीन पयोधराम्।

  • कमनीया लावण्या चारू त्रिवली नितम्बनीम्॥

मां स्कंदमाता कथा/ Maa Skandmata Story

  • भगवानों के सेनापति- दुर्गा पूजा के पांचवें दिन भगवान कार्तिकेय की मां की पूजा की जाती है। कार्तिकेय कुमार का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में सनत कुमार और स्कंद कुमार के रूप में किया गया है। देवी स्कंदमाता का रूप धारण करने पर देवी को अपनी सारी ममता अपने बालक को देते हुए देखा जाता है। देवी के इस रूप को सबसे शुद्ध कहा जाता है।

  • जब भी बुराई बहुत फैलती है, देवी शेर की सवारी करने वाले उपासक के उद्धार करने के लिए, बुराई को नष्ट करने के लिए आती हैं। देवी स्कंदमाता की चार भुजाएं हैं जिनमें से दो में कमल और दूसरे में उनके पुत्र हैं, जबकि चौथी भुजा सभी को आशीर्वाद देने वाली मानी जाती है।

  • देवी स्कंदमाता हिमालय की पुत्री हैं, और उन्हें माहेश्वरी और गौरी के नाम से भी जाना जाता है। उन्हें पार्वती कहा जाता है, भगवान हिमराज की बेटी होने के नाते, माहेश्वरी भगवान शिव की पत्नी हैं, और गौरी उनकी गोरी त्वचा के लिए हैं। उसे अपने बेटे से बहुत प्यार है और इसलिए उन्हें अपने बेटे के नाम से पुकारा जाना पसंद है। जो कोई भी देवी दुर्गा के इस रूप की पूजा करता है, वह उस उपासक को अपने पुत्र के समान मानती है।

  • देवी स्कंदमाता ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए बहुत प्रार्थना की है, और इसलिए जब वह देवी की पूजा कर रहे हों तब हमेशा भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए, अन्यथा उन्हें देवी का आशीर्वाद नहीं मिलेगा।

  • जब वह देवी स्कंदमाता की पूजा करते हैं तब वह शांति के मार्ग पर चलते हैं। उनके आशीर्वाद से, महान विद्वानों और सेवकों का जन्म होता है। ऐसा माना जाता है कि कालिदास देवी के आशीर्वाद से ही रघुवंशम और मेघदूत की रचना कर सकते थे।

स्कंदमाता की पूजा करने से क्या मिलता है?

  • देवी स्कंदमाता की कृपा से शीघ्र ही संतान की प्राप्ति हो सकती है।

  • यदि आपके बच्चे से संबंधित कोई समस्या है, तो देवी उसमें भी मदद कर सकती हैं।

  • देवी स्कंदमाता को हमेशा पीले फूल और अन्य सामान चढ़ाएं।

  • अगर आप भी पीले रंग के कपड़े पहनते हैं, तो आपको पूजा का ज्यादा से ज्यादा फायदा मिलना तय है।

  • इसके बाद अपनी इच्छाएं पूरी कर सकते हैं, खासकर बच्चों से जुड़ी हुई।

विशुद्ध चक्र कमजोर हो तो क्या करें?/ What if the Vishudh Chakra is weak?

विशुद्ध चक्र गले के ठीक पीछे होता है। यदि यह कमजोर है, तो किसी की आवाज तुलनात्मक रूप से कमजोर होती है। इस समस्या से किसी को हकलाने या गूंगेपन जैसी समस्या भी हो सकता है। यह कमजोरी कान, नाक और गर्दन की समस्या भी पैदा कर सकती है। नवरात्रि के पांचवे दिन स्कंदमाता की पूजा करने से आपको इस समस्या से छुटकारा मिल सकता है|

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देवी कात्यायनी
01 Oct, 2022

नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। देवी कात्यायनी का जन्म ऋषि कात्यायन के घर हुआ था। इसलिए उन्हें कात्यायनी के नाम से जाना जाता है। महिषासुर नाम के राक्षस का वध करने के लिए देवी ने यह रूप धारण किया था। देवी के इस रूप को बहुत हिंसक माना जाता है  इसलिए उन्हें युद्ध के देवता के रूप में भी जाना जाता है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी कात्यायनी की पूजा करने से विवाह में दोष दूर हो जाते हैं, बृहस्पति देवता प्रसन्न हो जाते हैं और इस वजह से एक अद्भुत विवाह का योग बनता है| अगर इनकी पूजा पूरी श्रद्धा से की जाए तब दांपत्य जीवन में सुख-शांति आती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवी कात्यायनी की पूजा करने से भक्त को आज्ञा चक्र उत्पन्न करने का आशीर्वाद मिलता है; इसके अलावा, वह अलौकिक चमक और प्रभाव से परिपूर्ण हो जाता है|देवी कात्यायनी की पूजा करने से सभी रोग, दुख और भय नष्ट हो जाते हैं।

देवी कात्यायनी कौन हैं?/ Who is Goddess Katyayani?

यह एक व्यापक मान्यता है कि महान ऋषि कात्यायन ने बहुत तपस्या की, जिससे आदिशक्ति प्रसन्न हुई। आशीर्वाद के रूप में, उन्होंने उनकी बेटी के रूप में जन्म लिया; इसलिए उनको देवी कात्यायनी के नाम से जाना जाता है। देवी कात्यायनी को बृज की देवी शिष्टात्री भी माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, गोपियों ने भगवान श्रीकृष्ण को पति के रूप में पाने के लिए यमुना नदी के तट पर देवी कात्यायनी की पूजा की थी। यह भी माना जाता है कि देवी कात्यायनी ने अत्याचारी राक्षस महिषासुर का वध किया और तीनों लोकों को उसके आतंक से मुक्त किया। 

देवी कात्यायनी का प्रतिनिधित्व/ The representation of Goddess Katyayani