प्रीमियम उत्पाद

भारतीय त्यौहार & मुहुर्त

अगले वर्ष के लिए संबंधित त्यौहार टैब के अंदर क्लिक करें
गुरू पूर्णिमा/ Guru Purnima
21 Jul, 2024

हिंदू संस्कृति में, गुरु को भगवान के समान का दर्जा दिया जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वह गुरु ही होता है जो दुनिया में हर तरह की समस्या का सामना करना सिखाता है और हर मुश्किलों हल करने में मार्गदर्शन करता है। गुरु का ज्ञान प्राप्त करने और दिखाए गए मार्ग पर चलने से व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त होता है। शास्त्रों के अनुसार यदि भगवान आपको श्राप दे तो गुरु आपको बचा सकता है, लेकिन खुद भगवान गुरु के द्वारा दिए गए श्राप से आपकी रक्षा नहीं कर सकते। इसलिए कबीर जी का एक दोहा इस बात को साबित करता है -
गुरु गोबिंद दोनो खडे, काके लागू पाय।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविन्द दियो बताय।

इस त्योहार हर साल आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा/ guru purnima के नाम से मनाया जाता है। इस त्योहार पर खास तौर पर गुरुओं की पूजा की जाती है। भारत में इस पर्व को बहुत ही सम्मान के साथ मनाया जाता है। प्राचीन काल में इस पर्व का महत्व और भी ज्यादा था। उस वक्त शिष्य गुरु के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा प्राप्त करते थे। गुरु पूर्णिमा के दिन सभी शिष्य पूरी भक्ति के साथ अपने गुरु की पूजा करते थे और उनको दिए गए ज्ञान के लिए धन्यवाद देते थे।
इस दिन घर के बड़ों जैसे माता-पिता, भाई-बहन आदि को गुरु माना जाता है और उनसे आशीर्वाद लेकर दिन की शुरुआत की जाती है। भारत में सभी गुरुओं का बहुत सम्मान किया जाता है क्योंकि गुरु ही वह मानव होता है जो अपने शिष्य को सही और गलत रास्ते का फर्क बताता है और यदि कोई किसी गलत रास्ते पर है तो उसे निकाल कर सही दिशा में ले जाते हैं। पौराणिक काल में बहुत सारी कहानियां प्रचलित हैं, जो बताती हैं कि किसी को भी सफल बनाने में गुरु का उल्लेखनीय योगदान होता है। इस दिन को मनाने के पीछे का एक कारण यह भी माना जाता है कि इसी दिन ब्रह्मसूत्र, महाभारत, श्रीमद्भागवत और अठारह पुराणों जैसे महान साहित्य की रचना करने वाले महान गुरु महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। महर्षि वेदव्यास को सभी गुरुओं के गुरु माना जाता है इसलिए इस दिन का एक खास महत्व होता है। इस दिन सभी शिष्य अपने-अपने गुरुओं का आशीर्वाद लेते हैं। वह उनका धन्यवाद करते हैं कि उन्होंने अभी तक बहुत कुछ सीखा है और आगे भी सीखना चाहते हैं। 
बजरंगी धाम में हम 13 जुलाई, 2022 को सुबह लगभग 9 बजे चुनिंदा अनुयायियों के लिए एक छोटी पूजा अनुष्ठान का आयोजन करेंगे और गुरु पूर्णिमा उत्सव मनाएंगे। हर वर्ष हम ऐसा आयोजन करते हैं और आगे भी करते रहेंगे जिससे सभी को रिद्धि और सिद्धि प्राप्त हो।

गुरु का अर्थ क्या है?/ What is the Meaning of Guru?

शास्त्रों में, 'गु' का अर्थ है अंधकार, और 'रु' का अर्थ है 'प्रकाश' जो अंधकार को जड़ से खत्म कर देता है। सभी गुरुओं को गुरु इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह अज्ञानता को दूर करते हैं। इस वाक्य का अर्थ यह है कि वह 'गुरु' ही होता है जो मानव को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। गुरु को ईश्वर के समान माना गया है। इस श्रद्धा के पीछे का कारण यह है कि यह रिश्ता पूरी तरह से आध्यात्मिक प्रगति और ज्ञान की प्राप्ति के लिए है।

गुरु-शिष्य परंपरा की शुरुआत/The Beginning of Guru-Shishya Tradition 

शास्त्रों और कुछ पौराणिक कथाओं/guru purnima Story के अनुसार, सबसे पहले श्री परमेश्वर ने नारायण को विष्णु के नाम से पुकारा और उन्हें 'ॐ ' के रूप में महामंत्र का जाप करने का आदेश दिया। कुछ समय पश्चात, ब्रह्मा जी को अज्ञान से मुक्त करने के लिए, भगवान ने अपने हृदय से योगियों के ज्ञान को श्री रुद्र के सामने प्रकट किया। फिर उन्होंने ब्रह्मा जी की अंतरात्मा को शुद्ध करने के लिए 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जाप करने का ज्ञान देकर ब्रह्मा के अंधकार को शुद्ध किया। इस प्रकार शिष्य को अंधकार के स्थान पर प्रकाश की ओर ले जाना गुरुत्व कहलाता है। 

गुरु पूर्णिमा का महत्व/ The Importance of Guru Purnima

इस पर्व पर बहुत सारे लोग अपने गुरु या फिर संतों की विधि के अनुसार पूजा करते हैं। वह उनकी पादुका को सामने रख दिया, फूल, अक्षत, चंदन, नैवेद्य आदि के साथ पूरे रीति रिवाज के साथ गुरु की पूजा/ Guru Puja करते हैं।
जो अंधकार को मिटाकर प्रकाश की ओर ले जाता है, वह 'गुरु' कहलाता है। माता-पिता भले ही बच्चे को जन्म देते हैं, लेकिन गुरू उसे जीवन और दुनिया का अर्थ समझाने का काम करता है जिससे वह अपने आगे का जीवन सफलता से व्यतीत कर सके। कई शास्त्रों में गुरु को ब्रह्म इसलिए कहा गया है क्योंकि जैसे ब्रह्म जीव बनाता है, उसी तरह गुरु, एक व्यक्ति को अच्छा इंसान बनाता है। हमारी आत्मा ईश्वर के रूप में सत्य का ढूंढने के लिए बेताब रहती है, और यह मिलान गुरु की शिक्षा के बिना हो ही नहीं सकता। इसलिए मनुष्य को हर जन्म में गुरु से शिक्षा करनी पड़ती है। 

अठारह पुराणों की रचना करने वाले महान साहित्य महर्षि वेद व्यास जी का जन्म आषाढ़ पूर्णिमा को हुआ था। ऐसी मान्यता है कि वेदव्यास ऋषि पराशर के पुत्र थे। हिंदू शास्त्रों के अनुसार महर्षि व्यास तीनों काल के स्वामी थे। उनको अपनी दिव्य दृष्टि से देखकर पता चल गया था कि कलयुग में लोगों की धर्म के प्रति रुचि कम हो सकती है। धर्म में रुचि न होने के कारण मनुष्य ईश्वर को न मानने वाला, कर्तव्य विहीन, कम उम्र और बिना नैतिकता का होगा। उन्हें पहले ही पता चल गया था कि मानव के लिए एक विस्तृत और संपूर्ण वेद का अध्ययन करना आसान नहीं होगा। इसलिए महर्षि व्यास ने वेदों को चार भागों में विभाजित किया ताकि अल्प बुद्धि और अल्प स्मृति शक्ति वाले लोग भी वेदों के अध्ययन से लाभान्वित हो सकें और अपने जीवन में एक दृष्टि बना सकें। व्यास जी ने वेदों को अलग-अलग भागों में विभाजित करके ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का नाम दिया। इन सभी वेदों को वेद व्यास ने बांटा था इसलिए इनका नाम वेद व्यास जी के नाम से ही प्रसिद्ध हुए। उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद अपने प्रिय शिष्यों वैशम्पायन, सुमंतमुनि, पाल और जामिन को दिए। 

वेदव्यास जी ने पंचम वेद के रूप में पुराणों की रचना की थी जिसमें वेदों के ज्ञान को रोमांचक कहानियों के रूप में लोगों तक पहुंचाने का प्रयास था क्योंकि वेदों में जो भी बातें कही गई थी उन्हें समझना असाधारण रूप से रहस्यमय और चुनौतीपूर्ण थी। उन्होंने पुराणों का ज्ञान अपने शिष्य रोमहर्षण को दिया। व्यास जी के शिष्यों ने अपनी बुद्धि शक्ति के अनुसार, वेदों को कई शाखाओं और उप-शाखाओं में विभाजित किया। महर्षि व्यास ने महाभारत की रचना भी की थी। वह  हमारे आदि-गुरु माने जाते हैं। गुरु पूर्णिमा का यह प्रसिद्ध पर्व व्यास जी की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। इसलिए इस पर्व/Festival को व्यास पूर्णिमा/ Vyasa Purnima के नाम से जाना जाता है।

गुरु पूर्णिमा का प्राचीन महत्व क्या है?/ What is the Ancient Importance of Guru Purnima?

विभिन्न हिंदू पौराणिक वेदों के अनुसार, गुरु को त्रिदेवों से सर्वोपरि भी कहा गया है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि गुरु ही व्यक्ति को सही दिशा दिखाते हैं और अपने शिष्य का मार्गदर्शन भी करते हैं। इस पर्व/Festival को मनाने की प्रथा प्राचीन काल के समय से चलती आ रही है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, गुरु को भगवान का दर्जा दिया जाता था और उन्हें दक्षिणा के रूप में अपार श्रद्धा और सेवा दी जाती थी।
इस दिन गोवर्धन जी की परिक्रमा का भी विधान है। गोवर्धन उत्तर प्रदेश राज्य में स्थित है। यह भी देखा गया है कि इस दिन लोग पवित्र नदियों, कुंडों और तालाबों में स्नान करते हैं और अपने इच्छा अनुसार दान भी देते हैं।
गुरु की महिमा है अगम, गाकर तरता शिष्य
गुरु काल का अनुमान कर, गढ़ता आज भविष्य

वैदिक ग्रंथ में भगवान शिव को प्रथम गुरु माना गया है/ Lord Shiva is considered to be the Maiden Guru in Vedic Grantha. 

पुराणों के अनुसार भगवान शिव को प्रथम गुरु माना गया है। शनि और परशुराम उनके दो शिष्य हैं। शिवजी ने पृथ्वी पर सबसे पहले सभ्यता और धर्म का प्रचार किया, इसलिए उन्हें आदिदेव और आदि गुरु कहा जाता है। शिव को आदिनाथ भी कहा जाता है। आदिगुरु शिव ने शनि और परशुराम के साथ सात लोगों को ज्ञान दिया। इन्हें बाद में सात महर्षि कहा गया, बाद में उन्होंने शिव के ज्ञान को चारों ओर फैला दिया। 

शिष्य गुरु पूजा/ Shishya Worship Guru

गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व/Festival पर शिष्य अपने गुरुओं की पूजा करते हैं और गुरुओं को उपहार स्वरूप कुछ दान और दक्षिणा भी देते हैं और उनके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। प्रत्येक युग में, गुरु का अधिकार कण-रूपी परब्रह्म की तरह हर जगह व्याप्त रहा है। बिना गुरु के संसार अज्ञान की रात मात्र है।

गुरु पूर्णिमा पूजा की विधि/ Method of Guru Purnima Puja

शास्त्रों में गुरु पूर्णिमा पर गुरु पूजा/Guru puja की विधि का वर्णन इस प्रकार किया गया है कि सुबह भगवान विष्णु, शिव, गुरु बृहस्पति और महर्षि वेदव्यास की पूजा करने के बाद आपको अपने गुरु को प्रणाम करना चाहिए। कुछ लोग अपने अपने गुरुओं को फूलों की माला पहना कर, और नए कपड़े तोहफे के रूप में देकर उनसे आशीर्वाद लेते हैं।

  • गुरु पूर्णिमा पर केवल गुरु ही नहीं बल्कि परिवार में किसी भी बड़े यानी माता-पिता, भाई-बहन आदि को भी गुरु के बराबर मान कर उनसे आशीर्वाद लें।
  • गुरु की कृपा से ही विद्यार्थी को ज्ञान की प्राप्ति होता है। उसके हृदय का अज्ञान और अंधकार दूर हो जाता है।
  • केवल गुरु का आशीर्वाद ही मानवता के लिए लाभकारी, ज्ञानवर्धक और उपयोगी साबित होता है। संसार का सारा ज्ञान गुरु की कृपा से ही प्राप्त होता है।
  • गुरु से मंत्र प्राप्त करने के लिए इस दिन को श्रेष्ठ माना गया है।
  • इस दिन जितना हो सके गुरुओं की सेवा करें और उनसे ज्ञान प्राप्त करें।
  • इसलिए जरूरी है कि इस पर्व को पूरी श्रद्धा के साथ मनाया जाए|

गुरु पूर्णिमा मनाने के पीछे का मिथक/The Myth behind the Celebration of Guru Purnima

भारत की पहचान इसके आध्यात्मिक सार में छिपी है। भारत में बदलते समय और परिस्थितियों के अनुसार इस अध्यात्म को जीवन में उतारने की अद्भुत कला को यहां के ऋषि-मुनियों ने ही सिखाई है। गुरु पूर्णिमा ऐसे सर्वदेशीय गुरुओं के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का पर्व है जो स्वयं कष्ट सहकर भी समाज को प्रगति के पथ पर अग्रसर करते हैं। महाभारत काल में महर्षि वेदव्यास के नाम से सभी परिचित थे। उन्हें मुनिश्रेष्ठ भी कहा जाता था और यह वही हैं जिन्होंने चार वेदों, अठारह पुराण और श्रीमद्भागवत की रचना की थी। इतिहास में उन्हें गुरु-शिष्य परंपरा का पहला गुरु माना जाता था।
हर व्यक्ति को समझना चाहिए कि यदि कोई व्यक्ति ज्ञान देता है, तो वह हमें कुछ सीखता है; तब उस स्थिति में वह हमारे लिए एक गुरु के समान बन जाता है। आप यह भी कह सकते हैं कि वह पूजनीय बन जाता है। शास्त्रों में एक कहानी उल्लेखनीय है कि एक बार मुनिवर ने भील जाति के किसी व्यक्ति को एक पेड़ को झुकाकर उससे नारियल तोड़ते देखा। उस दिन से व्यास जी ने उस व्यक्ति का पीछा करना शुरू कर दिया क्योंकि वह इस विद्या को जानने के लिए उत्सुक थे, लेकिन वह व्यक्ति वेद व्यास जी से झिझक और भय के कारण दूर जाकर छिप जाता था। पीछा करते हुए, व्यास जी एक दिन उस व्यक्ति के घर पहुंचे,  वह व्यक्ति घर पर नहीं था, लेकिन उसका पुत्र उपस्थित था जिसने व्यास जी की बात सुनी और वह उनको वह मंत्र देने के लिए तैयार हो गया। अगले दिन व्यास जी फिर से आए और उन्होंने सभी नियमों का पालन करते हुए उस व्यक्ति से उस मंत्र को ले लिया। 
जब वह व्यक्ति घर वापस आया तब उसके पुत्र ने अपने पिता की झिझक का कारण पूछा|  पुत्र की बात सुनकर पिता ने कहा कि पुत्र, "मैं जानबूझकर यह मंत्र व्यास जी को यह मंत्र नहीं देना चाहता था क्योंकि मेरे मन में एक बात थी कि जिस व्यक्ति से कोई मंत्र लिया जाता है, वह गुरु के समान हो जाता है। वह आगे कहते हैं कि हम गरीब और छोटी जाति के लोग हैं। तब क्या व्यास जी हमारा सम्मान करेंगे?" पिता ने उसे एक बात और कही कि यदि मंत्र देने वाला व्यक्ति पूजनीय नहीं है, तो वह मंत्र सिद्ध नहीं हो सकता। इसी कारण उस व्यक्ति ने अपने पुत्र को व्यास जी की परीक्षा लेने के लिए भेजा कि क्या उनके पुत्र को गुरु के समान यह सम्मान मिलता है या नहीं?
अगले दिन उस व्यक्ति का पुत्र व्यास जी के दरबार में पहुँचा, जहाँ व्यास जी अपने साथियों के साथ किसी बात पर चर्चा कर रहे थे। अपने गुरु जो उस व्यक्ति का पुत्र था, उनको आते देख व्यास जी दौड़ते हुए आए और उनकी पूजा की और सभी नियमों का पालन करते हुए उनका सम्मान किया। यह देखकर पुत्र बेहद प्रसन्न हुआ। उसकी और उसके पिता की सारी दुविधाएं मिट गईं और एक बात सिद्ध हो गई कि गुरु अगर छोटी जाति का भी हो तब भी वह पूजनीय होता है। ऐसा वेद व्यास जी ने भी किया और गुरु-शिष्य परंपरा को जीवित रखा। व्यास जी ने भी गुरु शिष्य की परंपरा का पूर्ण रूप से पालन किया। इस पूरे वर्ष में एक दिन ब्रह्म ज्ञान सद्गुरु को समर्पित होता है जिसे व्यास पूर्णिमा या गुरु पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है 

वर्षा ऋतु गुरु पूर्णिमा के लिए सर्वश्रेष्ठ क्यों है?/ Why is Varsha Ritu Best for Guru Purnima?

भारत में सभी ऋतुओं का अपना महत्व है। गुरु पूर्णिमा/Guru Purnima 2021 के मनाए जाने के पीछे एक खास कारण है और वह है – बारिश। इसका कारण यह है कि इन चार महीनों में न तो अधिक गर्मी होती है और न ही अधिक ठंड। इस समय को पढ़ाई और अध्ययन के लिए उपयुक्त और उत्तम माना जाता है। इसलिए गुरू के चरणों में जो शिष्य होते हैं वह इस समय को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग की शक्ति प्राप्त करने के लिए उपयुक्त मानते हैं और चुनते हैं।

आप अन्य सभी प्रमुख भारतीय त्योहारों के लिए भारतीय त्योहारों में ज्योतिष की प्रासंगिकता (Relevance of Astrology) पर इसी तरह के लेख पढ़ सकते हैं|

हरियाली तीज
07 Aug, 2024

श्रावण मास के शुक्ल पक्ष के तीसरे दिन या तृतीया को हरियाली तीज या श्रावणी तीज का दिन निश्चित होता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार, हरियाली तीज अक्सर जुलाई या अगस्त में आती है। यह मुख्य रूप से महिलाओं का पर्व है जो श्रावण शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को उत्तम भाग्य और अच्छा वर पाने के लिए मनाया जाता है। यह पर्व सावन में आता है जब चारों ओर हरियाली होती है। यही कारण है कि इस पर्व को हरियाली तीज भी कहा जाता है। श्रावण मास में जब संपूर्ण धरती हरियाली से सजी होती है, तो प्रकृति के इन खूबसूरत पलों का आनंद उठाने के लिए महिलाओं द्वारा झूला झूलकर अत्यधिक पौराणिक रूप से यह पर्व मनाया जाता है। हरियाली तीज के अवसर पर देशभर में कई स्थानों पर मेले आयोजित किए जाते हैं और माता पार्वती की सवारी धूमधाम से निकाली जाती है। यह पर्व भगवान शिव और पार्वती जी के पुनर्मिलन को सम्मानित करने के लिए मनाया जाता है। 

 

हरियाली तीज का पौराणिक महत्व/ Mythological Significance of Hariyali Teej

हिंदू धर्म में, प्रत्येक व्रत, उपवास और त्योहारों का पौराणिक संबंध होने के कारण, उनके साथ एक रोमांचक कहानी या कथा जुड़ी होती है। हरियाली तीज भी भगवान शिव और पार्वती के पुनर्मिलन को मनाने के लिए मनाई जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार, देवी पार्वती में भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठिन तपस्या की थी। 108 जन्मों के कठिन तप के बाद, माता पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति रूप में प्राप्त किया था। यह कहा जाता है कि श्रावण मास के शुक्ल पक्ष के तीसरे दिन भगवान शिव ने पार्वती जी को पत्नी रूप में स्वीकार किया था। तबसे, ऐसा माना जाता है कि इस दिन को भगवान शिव और देवी पार्वती द्वारा विवाहित महिलाओं के लिए भाग्य का दिन होने का आशीर्वाद दिया गया था। इसलिए हरियाली तीज पर विवाहित महिलाओं द्वारा भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन और उपवास करने से परिवार में खुशहाली और सुख समृद्धि आती है। 

 

हरियाली तीज का धार्मिक महत्व/ Religious Significance of Hariyali Teej

धार्मिक विश्वासों के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि सावन में हरियाली तीज के दिन भगवान शिव और पार्वती जी फिर से एक साथ आए थे, जिसका वर्णन शिवपुराण में भी वर्णित है। इसलिए इस दिन विवाहित महिलाओं द्वारा वैवाहिक जीवन आनंदमय बनाए रखने के लिए, देवी पार्वती और शिव जी का पूजा की जाती है। उत्तर भारत में तीज पर्व अत्यधिक धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन अविवाहित कन्याएं भी योग्य वर की कामना के साथ उपवास करती है और पूरे मन से उन्हें प्राप्त करने के लिए इश्वर से प्रथना करती हैं। 

 

हरियाली तीज कैसे मनाई जाती है?/ How is Hariyali Teej celebrated?

यह उपवास करवा चौथ से भी अधिक कठिन माना जाता है। इस दिन महिलाओं द्वारा पूरा दिन व्रत रखा जाता है और अगले दिन सुबह स्नान और पूजा के बाद, महिलाओं का व्रत पूर्ण होता है और उसके बाद ही वह कुछ खाती और पीती हैं। इस अवसर पर देवी पार्वती और शिवजी की पूजा की जाती है। इस दिन महिलाओं के मायके से मेकअप का सामान और मिठाइयां ससुराल भेजी जाती हैं। घर के कार्यों को पूरा करके स्नान के बाद, महिलाओं द्वारा सोलह श्रृंगार करके निर्जला व्रत रखा जाता है तथा पूजा के बाद उपवास से संबंधित कथा सुनी जाती है। इस दिन हरे रंग के कपड़े, हरी चुनरी, हरे रंग का लहंगा पहनने, हरा श्रृंगार करने, मेहंदी लगाने, और झूला झूलने की भी मान्यता है।

 

ऐसे मनाई जाती है हरियाली तीज/ This is how Hariyali Teej is celebrated

सावन की शुरुआत के साथ ही विवाहित महिलाओं को उनके माता-पिता के घर बुलाया जाता है। हरियाली तीज से एक दिन पहले, द्वितीया को श्रृंगार दिवस या सिंजारा के रूप में मनाया जाता है। बहू-बेटियों को नौ तरह की मिठाइयां और व्यंजन खिलाए जाते हैं। सिंजारा के दिन, इस त्योहार को मनाने के लिए नवयुवतियां और नवविवाहित दुल्हनें अपने हाथों और पैरों पर मेहंदी लगाती हैं। तीज के दिन महिलाएं हरि साड़ियां और आभूषण पहनकर शाम को झील के किनारे या बगीचे में अपनी सखियों के साथ झूला झूलती हैं और गीत गाती हैं। माना जाता है कि भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए पार्वती ने एक सौ सात जन्म लिए थे तथा उनकी कठोर तपस्या और एक सौ आठवें जन्म में, भगवान शिव द्वारा देवी पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया गया था। इन सबके साथ ही इस व्रत की शुरुआत हुई। इस दिन विवाहित महिलाओं द्वारा सोलह श्रृंगार विधि के साथ भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने से, उनके पति के साथ संबंध अच्छे रहते हैं और पति की उम्र में वृद्धि भी होती है। 

 

तीज पूजा में सोलह श्रृंगार का महत्व/ Significance of 16 makeups ritual  in Teej Puja

यह व्रत अच्छे वर की प्राप्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। सौभाग्य के लिए किए जाने वाले इस व्रत में, महिलाएं मां पार्वती को शहद से बने व्यंजन का भोग लगाती हैं तथा देवी को चूड़ियां, सिंदूर, कंगन, मेहंदी, साड़ी, चुनरी आदि श्रृंगार की कुल सोलह वस्तुएं अर्पित करती हैं। व्रत रखने वाली महिलाएं इन वस्तुओं को देवी पार्वती को अर्पित करके सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। हरियाली तीज की पूजा में पार्वती जी के साथ भगवान शिव की भी पूजा की जाती है। इस दिन व्रत रखने वाली महिलाएं सोलह श्रृंगार की रस्म भी करती हैं। तीज के दिन लोकगीतों पर झूला झूलना सर्वव्यापी है।  

 

हरियाली तीज का व्रत क्यों किया जाता है?/ Why fast on Hariyali Teej

इस पर्व के इस अवसर पर  जो विवाहित महिलाएं सोलह श्रृंगार करके शिव-पार्वती की पूजा करती हैं, उनके पतियों की उम्र में वृद्धि होती है। ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करने वाली अविवाहित युवतियों को आशीर्वाद प्राप्त होता है कि उनके विवाह में आने वाले सभी अवरोध दूर हो जाएंगे हैं और उन्हें एक योग्य वर की प्राप्ति होती है। इस व्रत से विवाहित महिलाओं को पति की लंबी आयु के साथ-साथ सुख-समृद्धि और दांपत्य जीवन का सुख प्राप्त होता है।

अगर किसी युवती का विवाह  नहीं हो रहा हो तो उसे इस दिन व्रत और पूजा करनी चाहिए। इसके अलावा विवाहित महिलाओं को संयुक्त रूप से शिव और पार्वती की पूजा करनी चाहिए।

 

बहनों और बहुओं को सिंधारा दिया जाता है/ Sindhara is given to sisters and daughters-in-law

हरियाली तीज के अवसर पर महिलाएं हाथों पर मेहंदी लगाकर व्रत करती हैं। इस समय के दौरान, घेवर, फेनी और सेवइयां का अधिक प्रचलन होता है। उत्सव से एक दिन पहले, बहनों और बहुओं को वस्त्र, सौभाग्य की वस्तुएं, घेवर, फेनी, फल आदि का सिंधारा दिया जाता है। हरियाली तीज पर ठाकुरजी को मालपुए का भी भोग लगाया जाता है जो इस पर्व पर काफी शुभ माना जाता है।

 

हरियाली तीज परंपरा/ Hariyali Teej tradition

शादी के बाद नवविवाहित युवतियों के लिए पहले सावन का एक अलग ही अर्थ होता है। हरियाली तीज के अवसर पर ससुराल से लड़कियों को उनके माता-पिता के घर बुलाया जाता है।

1. सिंधारा हरियाली तीज से एक दिन पहले मनाया जाता है। इस दिन नवविवाहित युवतियों के ससुराल से कपड़े, गहने, श्रृंगार का सामान, मेहंदी और मिठाइयां भेजी जाती हैं, जिसका इस पर्व में प्रयोग भी होता है।

2. इस दिन मेहंदी लगाने का विशेष महत्व होता है। महिलाएं और लड़कियां इसे विभिन्न डिजाइनों में अपने हाथों पर लगाती हैं। इस दिन विवाहित होने के संकेत के तौर पर पैरों में आलता भी लगाया जाता है।

 3. हरियाली तीज पर विवाहित महिलाओं द्वारा सास के पैर छूकर उन्हें मिठाईयां दी जाती हैं। उनकी गैरमौजूदगी में भाभी (जेठानी) या किसी अन्य बुजुर्ग महिला को दिया जाता है।

 

4. इस दिन महिलाएं श्रृंगार और नए वस्त्र पहनकर पार्वती की पूजा करती हैं।

5. हरियाली तीज पर महिलाओं और युवतियों द्वारा मैदान या बगीचे में झूला झूला जाता है और लोक कथाएं कहीं जाती हैं। 

 

हरियाली तीज पूजा मंत्र/ Hariyali Teej Puja Mantra

देहि सौभाग्य आरोग्यं देहि मे परमं सुखम्।

पुत्रान देहि सौभाग्यम देहि सर्व।

कामांश्च देहि मे।।

 

मालपुआ भी भोग के रूप में करते अर्पित/ Malpua are also offered

श्रावण मास में घेवर, फेनी और सेवइयां बहुतायत होती है। तीज से एक दिन पहले बहनों और बहुओं को सिंधारा दिया जाता है जिसमें कपड़े, सौभाग्य की वस्तुएं, घेवर, फेनी, फल आदि शामिल होते हैं। बरसाना में राधा रानी जी के संजारा अर्पण के दर्शन को देखने के बाद भक्त आश्चर्यचकित रह जाते हैं। हरियाली तीज पर ठाकुरजी को मालपुए का भोग लगाया जाता है। 

 

हरियाली तीज व्रत कथा / Hariyali Teej Vrat Story

हरियाली तीज भगवान शिव और पार्वती के पुनर्मिलन का सम्मान करने के लिए मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। इस कठिन तप के कारण ही, देवी पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त किया था। किंवदंती के अनुसार, हिमालय के घर में माता गौरी ने पार्वती  रूप में पुनर्जन्म लिया था। पार्वती बचपन से ही शिव को वर रूप में पाना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने घोर तप किया। एक दिन नारद जी ने हिमालय से कहा कि भगवान विष्णु पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें अपनी पत्नी बनाना चाहते हैं। यह सुनकर हिमालय रोमांचित हो उठे। वैकल्पिक रूप से, नारद मुनि ने विष्णु जी के पास जाकर कहा कि हिमालय ने अपनी बेटी पार्वती की शादी आपसे करने का फैसला किया है। इस पर विष्णु भी राजी हो गए। तब नारद जी ने पार्वती के पास जाकर उन्हें बताया कि उनके पिता हिमालय में विष्णु जी के साथ उनका विवाह तय कर दिया है। यह सुनकर पार्वती दुखी होकर अपनी सखियों के साथ पिता से छुपकर एक सुनसान जंगल में जाकर फिर से तपस्या करने लगीं। उन्होंने रेत से एक शिवलिंग का निर्माण किया और उपवास करते हुए पूजा करना शुरू कर दिया। भगवान शिव इस तपस्या से प्रसन्न हुए और उनकी इच्छा पूरी करने का आश्वासन दिया। इसी बीच पार्वती के पिता हिमालय भी वहां पहुंच गए। सच्चाई जानने के बाद, वह पार्वती का विवाह भगवान शिव से करने के लिए तैयार हो गए तथा इसके बाद शिव जी ने पार्वती जी से विधिवत् विवाह किया। शिव कहते हैं, 'हे पार्वती! आपके द्वारा किए गए कठिन व्रत के कारण हमारा विवाह हो सका। अतः मैं निष्कपट रूप से इस व्रत का पालन करने वाली प्रत्येक स्त्री की मनोकामना पूरी करूंगा।'

अलग अलग राज्य में तीज की परंपरा भी अलग अलग होती है/Teej's tradition in a different state

भारत के अलग-अलग राज्य इस त्योहार को अलग-अलग अंदाज में मनाते हैं। हर राज्य इस पर्व को अपने अंदाज से मनाता है जिसमें से कुछ के बारे में नीचे दिया गया है।

जयपुर की तीज शोभायात्रा

राजस्थान के लोगों के लिए यह पर्व जीवन का सार है। विशेषकर, गुलाबी नगरी जयपुर में इसकी अलग ही भव्यता देखने को मिलती है। तीज के अवसर पर, जयपुर में लगने वाले मेले का पूरे विश्व में विशेष स्थान   है। इस दिन, पूजा के बाद तीज माता की शोभायात्रा निकाली जाती है। पार्वती जी की प्रतिमा, जिसे तीज माता कहा जाता है, को मार्च में लाया जाता है। त्योहार से पहले, प्रतिमा को रंग-रोगन करके नए वस्त्रों और आभूषणों से सजाया जाता है; तथा शुभ मुहूर्त में शोभायात्रा निकाली जाती है। इस दौरान लाखों की संख्या में लोगों द्वारा माता पार्वती के दर्शन किए जाते हैं। हाथी और घोड़े इस जुलूस की शोभा बढ़ाते हैं। छोटी चौपड़, गणगौरी बाजार और चौगान होते हुए पालिका बाग पहुंचने के बाद, यह शोभायात्रा त्रिपोलिया बाजार में विसर्जित की जाती है। रंग-बिरंगे परिधानों में सजे ग्रामीणों के साथ कई विदेशी पर्यटक भी सवारी देखने के लिए जाते हैं। चारों ओर रंग-बिरंगे कपड़ों में लोग, घेवर-फेनी की खुशबू, प्रकृति की खूबसूरती इस त्यौहार को विशेष बनाती है। खुले स्थानों में विशाल वृक्षों की डालियों पर लगे झूलों में, हाथों में रची मेहंदी के साथ महिलाओं और बच्चों के साथ मल्हार गाकर झूले का आनंद लेना एक अनोखा अनुभव होता है। महिलाओं द्वारा अपनी सखियों के साथ, झूलते  समय लोक गीत, कजरी आदि गाए जाते हैं  जिनसे सारा वातावरण मधुर और जीवंत हो उठता है।

 

राजस्थान का तीज पर्व/ Teej festival in Rajasthan

 

राजस्थान में तीज का उत्सव एक मौसमी त्योहार के रूप में मनाया जाता है। हरियाली और बादलों से आच्छादित सावन या श्रावण मास में लोगों द्वारा यह त्योहार     मनाया जाता है। आसमान में मंडराते काले बादलों के कारण, इस त्योहार को कजली तीज और हरियाली के कारण इस त्योहार को हरियाली तीज कहा जाता है। इस त्योहार पर राजस्थान में झूले लगाए जाते हैं और नदी किनारे मेलों का आयोजन किया जाता है। इस त्योहार के आसपास खरीफ फसलों की बुवाई भी शुरू हो जाती है।   बारिश के लिए चिंतित किसान तीज पर्व पर मोठ, बाजरा, फली आदि का बीजारोपण करते हैं। 

 

वृंदावन तीज/ Teej of Vrindavan

सावन में ब्रज के झूले बहुत प्रसिद्ध हैं। श्री वल्लभ सम्प्रदाय में, ठाकुर जी सावन मास के दौरान झूले पर झूलते रहते हैं। अन्य मंदिरों में सावन शुक्ल तृतीया-हरियाली तीज से रक्षाबंधन-पूर्णिमा तक हिंडोला सजाया जाता है। वृंदावन में श्री बांके बिहारी तीज की रात को, सोने और चांदी से बनी  गंगा-जमुनी को एक विशाल हिंडोले में  झुलाया जाता है। मथुरा का द्वारकाधीश  तट बहुत प्रसिद्ध है। ठाकुर जी के सारे पर्दे, हिंडोला, वस्त्र सब आसमान के रंग से मेल खाते हुए होते हैं जिनमें काली घटा का अत्यधिक महत्व होता है। 

 

हरियाली तीज पर किए जाने वाले उपाय/ Follow these remedial measures on Hariyali Teej

पति-पत्नी के बीच सामंजस्य की कमी होने पर यह उपाय किए जा सकते हैं- 

-शिव जी को पीले वस्त्र और माता पार्वती को लाल वस्त्र अर्पित करने चाहिए।

-बेहतर तालमेल के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

-इसके बाद दोनों कपड़ों में गांठ बांधकर और कुछ  दूरी पर रख दें।

 

अगर पति-पत्नी को एक-दूसरे से दूर रहना पड़े तो क्या करना चाहिए?

-भगवान शिव को पुष्प, बिल्वपत्र,   अबीर-गुलाल अर्पित करना चाहिए।

-चांदी के कलश में माता गौरी को सिंदूर अर्पण करना चाहिए।

- एक दूसरे के साथ शांत रहने की प्रार्थना करनी चाहिए।

- नियमित रूप से अर्पण किए गए सिंदूर का प्रयोग करना चाहिए।

 

यदि पति या पत्नी में से किसी एक का स्वास्थ्य खराब होता है तो

- शाम के समय शिव मंदिर जाना चाहिए।

-सर्वप्रथम शिवलिंग पर पंचामृत अर्पण करें।

-इसके बाद जलधारा से अभिषेक करें।

-जीवनसाथी के स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना करें।

 

उधार के कारण परेशानियां होने पर 

-कत्था का एक सूखा टुकड़ा लेकर जमीन पर तीन सीधी रेखाएं बना लें।

-फिर हनुमान जी का नाम लेने के बाद इन तीनों रेखाओं को पैरों से मिटा दें।

-यह उपाय तीन मंगलवार तक करने से निश्चित ही लाभ प्राप्त हो सकता है।

 

हरियाली तीज पर तीन चीजें त्यागने की परंपरा/ The tradition of giving up three things on Hariyali Teej

हरियाली तीज पर प्रत्येक स्त्री को तीन बुराइयां त्यागने का संकल्प लेना चाहिए। ये तीन चीजें हैं-

1. पति को धोखा 

2. झूठ बोलना और बुरा व्यवहार 

3. परनिंदा (दूसरों की बुराई करने से परहेज)

 

हरियाली तीज के दौरान क्या सही और क्या वर्जित होता है?/ What is right and what is forbidden during Hariyali Teej

1) हरियाली तीज पर निर्जला व्रत होने के कारण पानी नहीं पीना चाहिए। लेकिन गर्भवती और बीमार महिलाओं से इसका कोई संबंध नहीं होता।

2) व्रत रखने वाली महिलाओं को व्रत पूर्ण करने के लिए हरियाली तीज की व्रत कथा सुननी चाहिए। 

3) यह व्रत पति की लंबी उम्र और कल्याण के लिए होने के कारण इस दिन तीज माता/ माता पार्वती के गीत और कथा सुनना शुभ माना जाता है।

नहीं करने वाली चीजें / What not to do?

१) इस व्रत में सफेद और काले वस्त्रों का प्रयोग वर्जित होता है।

२) कहा जाता है कि तीज के व्रत के दौरान नींद नहीं लेनी चाहिए।

३) हिंदू धर्म के अनुसार इस व्रत को करने वाली पत्नियों  का मन, कर्म और वचन शुद्ध होना चाहिए, अर्थात किसी के बारे में बुरा नहीं सोचना चाहिए, गलत काम  और अभद्र भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

 

अनिवार्य मानी जाने वाली चीजें/ These things are considered imperative

हरियाली तीज पर हरी चूड़ियां और मेहंदी जैसी चीजें महत्वपूर्ण मानी जाती हैं, जिनका विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी उम्र, स्वास्थ्य और खुशी के प्रतीक रूप में ध्यान रखा जाता है। इस दिन, आमतौर पर महिलाएं हरे रंग का प्रयोग करती हैं। इसके विपरीत, हरियाली तीज पर महिलाओं के माता-पिता द्वारा साड़ी, श्रृंगार का सामान, मिठाई, फल आदि भेजना उपयुक्त माना जाता है।

नाग पंचमी
09 Aug, 2024

प्रसिद्ध हिंदू पर्व नागपंचमी 2024/nag panchami 2024 संपूर्ण भारत में मनाया जाता है। सर्पों का हमारी संस्कृति का एक अनिवार्य हिस्सा होने के कारण इस दिन लोगों द्वारा शक्ति और सूर्य के अवतार भगवान भोलेनाथ की पूजा की जाती है। यह पर्व श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि/Fifth Tithi में होने के कारण, उत्तर भारत में सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ही नाग पूजा की जाती है। लेकिन दक्षिण भारत में यह पर्व कृष्ण पक्ष की पंचम तिथि को मनाया जाता है। हिंदू धर्म में, नाग पंचमी का दिन महत्वपूर्ण माने जाने के कारण, इस दिन नागों की दूध चढ़ाकर पूजा की जाती है। भगवान शिव को नाग अत्यधिक प्रिय होने के कारण यह पर्व सावन के महीने में आता है तथा इस दिन पूर्ण श्रद्धा के साथ नाग पंचमी का अनुष्ठान करने पर भगवान भोलेनाथ प्रसन्न होकर अपनी कृपा बरसाते हैं।

नाग पंचमी का महत्व/ Significance of Nag Panchami

हिंदू धर्म के अनुसार, सर्पों को देवता मानकर उचित विधि द्वारा उनकी पूजा की जाती है। वास्तव में, सर्प को  भगवान शिव शंकर का हार और विष्णु की शैय्या माना जाता है। साथ ही, सांपों का संबंध लोगों के जीवन से भी होता है। सावन के महीने में भारी बारिश होने के कारण, सर्पों के भूमि से बाहर निकलने पर लोगों द्वारा  दूध चढ़ाकर उनका पूजन किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन श्रद्धा के साथ नाग देवता का पूजन करने पर उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है जिससे सर्प उन्हें ना तो नुकसान पहुंचाते हैं और ना ही उनसे भयभीत होते हैं। 

कुंडली में काल सर्प दोष वाले व्यक्तियों द्वारा, इस दिन पूजन करने से इस दोष से छुटकारा मिल सकता है। यह दोष सभी ग्रहों के राहु और केतु के बीच में आने के कारण होता है तथा ऐसे व्यक्तियों को अपने जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है और कुछ हासिल करने के लिए कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसा कहा जाता है कि जीवन में राहु-केतु के कारण समस्याएं होने पर नाग पंचमी के दिन सर्पों का पूजन/Nag panchami pooja करके अपनी समस्याओं का समाधान प्राप्त किया जा सकता है। 

1. हिंदू मान्यताओं के अनुसार, पौराणिक काल से ही नागों का देवता रूप में पूजन किया जाता रहा है इसलिए नाग पंचमी/Naag panchami 2024 के दिन नाग पूजन करना शुभ माना जाता है।

2. ऐसी भी मान्यता है, कि नाग पंचमी के दिन सर्प का पूजन करने से, सांप के काटने का डर नहीं होता और  अच्छा जीवन व्यतीत किया जा सकता है।

3. ऐसी मान्यता है कि इस दिन सर्पों को दूध चढ़ाने और उनकी पूजा करने से अक्षय पुण्य/Akshay Punya की प्राप्ति होती है।

4. सपेरों के लिए भी यह पर्व विशेष महत्व रखता है।  आमतौर पर, इस दिन लोग सर्पों को दूध और पैसे  चढ़ाते हैं।

5. परंपरानुसार, इस दिन घर के प्रवेश द्वार पर सर्प का चित्र बनाना एक प्रथा है। ऐसा माना जाता है कि सर्पों की कृपा से यह चित्र घर की रक्षा करता है।


नाग पंचमी पूजन का इतिहास/ History of Nag Panchami Puja

पुराणों के अनुसार, नाग पंचमी मनाने की कई मान्यताएं हैं। ऐसा माना जाता है कि श्रावण शुक्ल की पंचमी तिथि को सभी सर्प कुल श्राप से मुक्ति पाने के लिए ब्रह्माजी से मिलने गए और तब ब्रह्माजी ने नागों को श्राप से मुक्त कर दिया। इस घटना के बाद से नाग पूजन की प्रथा शुरू हुई। 

एक और कहानी यह है कि सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को भगवान श्रीकृष्ण ने कालिया नाग का वध करके गोकुल वासियों के प्राण की रक्षा की थी और तभी से नाग पूजन का पर्व शुरू हुआ। 

एक और मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान रस्सी नहीं मिलने पर वासुकी नाग के कहने पर उनका प्रयोग रस्सी की तरह किया गया था। देवताओं द्वारा वासुकी नाग की पूंछ पकड़ी गई और राक्षसों ने वासुकी नाग का मुंह पकड़ा था। और उसी मंथन के दौरान निकले विष को भगवान शिव ने अपने कंठ में रखकर सभी की रक्षा की थी। उसके बाद उसमें से निकले अमृत को देवताओं द्वारा ग्रहण कर लिया गया जिससे सभी देवता अमर हो गए थे।  वासुकी नाग के समुद्र मंथन के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण नाग पंचमी मनाई जाती है, और तब से ही, सभी नागों और सर्पों की पूजा करने की परंपरा शुरू हुई। 

नाग पंचमी मनाने का कारण/ The reason for celebrating Nag Panchami

नाग पंचमी का त्योहार सर्पों का पूजन और उनसे प्रार्थना करके, लोगों को प्रत्येक समस्याओं से बचाने के लिए   मनाया जाता है। सावन के दौरान, भारी बारिश के कारण सर्पों के अपने बिलों से बाहर निकलने पर लोगों द्वारा दूध चढ़ाकर उनकी पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि सामान्य रूप से सर्पों की याददाश्त तेज होने के कारण, वह उन लोगों के चेहरे याद रखते हैं जो उन्हें नुकसान पहुंचाते हैं और बदला लेते समय उस व्यक्ति के परिवार वालों को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसलिए, महिलाओं द्वारा क्षमा मांग कर अपने परिवार को किसी भी नुकसान से बचाने के लिए सर्पों को दूध चढ़ाकर प्रार्थना की जाती है। 


एक पुरानी पौराणिक कथा के अनुसार, जब सर्पों के राजा तक्षक द्वारा डसने के कारण राजा जनमेजय के पिता परीक्षित की मृत्यु होने पर, मृत्यु का बदला लेने के लिए राजा जनमेजय ने संपूर्ण सर्प जाति को नष्ट करने के लिए एक यज्ञ का आयोजन किया। जिस दिन ब्राह्मण आस्तिक ऋषि के द्वारा यह यज्ञ कराया गया उस दिन नाग पंचमी थी। तब से इस दिन को नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है।

नाग पंचमी पूजन और कालसर्प दोष का संबंध/ Nag Panchami worship and relationship with kaal sarp dosha

हिंदू मान्यताओं के अनुसार, कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की नाग पंचमी के दिन भी व्रत रखा जाता है। गरुड़ पुराण में इससे संबंधित सभी जानकारी बताई गई है। व्रत करने वाले व्यक्तियों को मिट्टी या आटे से सर्प बनाकर, उसे विभिन्न रंगों से सजाने के बाद फूल, खीर, दूध, दीपक आदि से पूजन करना चाहिए। पूजन के बाद भुने हुए चने और जौ को प्रसाद के रूप में बांटना चाहिए। ज्योतिषियों/ astrologers का मानना ​​है कि जिन लोगों की कुंडली में कालसर्प दोष होता है उनके द्वारा इस दिन नाग देवता का पूजन करने से उनकी कुंडली में से यह दोष समाप्त हो जाता है।

नाग पंचमी - उपवास और पूजन विधि/ Nag Panchami – Fasting and worship method (Vidhi)

1. इस दिन उपवास/nag panchami upvas रख कर देवताओं की पूजा की जाती है। इस दिन अनंत, वासुकी, पद्म, महापद्म, तक्षक, कुलीर, कर्कोटक और शंख जैसे अष्ट नागों की पूजा की जाती है।

2. चतुर्थी के दिन एक बार भोजन करके, पंचमी के दिन व्रत/Nag Panchami Vrat करके सायंकाल भोजन करना चाहिए।

3. पूजा के लिए लकड़ी की चौकी पर सर्प का चित्र या मिट्टी की मूर्ति स्थापित की जाती है।

4. फिर नाग देवता को हल्दी, रोली (लाल सिंदूर), अक्षत और पुष्प चढ़ाए जाते हैं। 

5. इसके बाद लकड़ी की चौकी पर बैठकर नाग देवता को कच्चा दूध, घी और चीनी का मिश्रण चढ़ाना चाहिए।

6. पूजन/nag panchami pooja के बाद नाग देवता की आरती की जाती है।

7. सुविधानुसार, किसी सपेरे को थोड़ी दक्षिणा देकर सर्प को दूध दिया जा सकता है। 

8. अंत में, व्रत रखने वाले व्यक्तियों को नाग पंचमी की कथा अवश्य सुननी चाहिए।

नोट: परंपरा के अनुसार, कई राज्यों में नाग पंचमी चैत्र और भाद्रपद शुक्ल पंचमी को मनाई जाती है। भारत के अलग अलग क्षेत्र में अलग अलग तरीके से इस पर्व/Festival को मनाने की मान्यता है।

नाग पंचमी से जुड़ी मान्यताएं/ Beliefs related to Nag Panchami

1. हिंदू पुराणों के अनुसार, ब्रह्मा जी के पुत्र ऋषि कश्यप की चार पत्नियां थीं। ऐसा माना जाता है कि  उनकी पहली पत्नी से देवताओं का जन्म, दूसरी पत्नी से गरुड़ और चौथी पत्नी से राक्षसों का जन्म हुआ था, लेकिन उनकी नागा वंश की तीसरी पत्नी कद्रू ने सर्प को जन्म दिया था।

2. पुराणों में दिव्य और बौम दो प्रकार के सर्पों का वर्णन किया गया है। वासुकी और तक्षक दिव्य नाग कहे जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि शेषनाग पृथ्वी का भार वहन करते हैं और क्रोधित होने पर उनके पास प्रज्वलित अग्नि के समान दृष्टि से सम्पूर्ण जगत को राख करने की क्षमता है तथा यदि वह काट लें तो इसका कोई इलाज नहीं है। लेकिन धरती पर मौजूद सभी सर्पों में से कुल 80 प्रकार के सर्पों के ही दांतों में जहर होता है।

3. अनंत, वासुकी, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापदम, शंखपाल और कुलिक अष्टनागों को, सभी नागों में श्रेष्ठ माने गए हैं। इनमें से दो नाग ब्राह्मण, दो क्षत्रिय, दो वैश्य और दो शूद्र माने जाते हैं जिनमें अनंत और कुलिक ब्राह्मण, वासुकी और शंखपाल क्षत्रिय, तक्षक और महापदम वैश्य माने गए हैं और पद्म और कर्कोटक को शूद्र कहा गया है।

4. अर्जुन के पौत्र और परीक्षित के पुत्र जनमेजय के अनुसार, उन्होंने नागों से बदला लेने और सर्प वंश को नष्ट करने के लिए एक सर्प यज्ञ करने का ठाना था क्योंकि उनके पिता, राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के काटने से हुई थी। नागों की रक्षा करने के लिए जरत्कारु के पुत्र, आस्तिक मुनि ने जिस दिन इस यज्ञ को विफल किया, उस दिन श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि थी जिसके कारण तक्षक नाग और उनके वंशज विनाश से बच गए थे। माना जाता है कि यहीं से नाग पंचमी पर्व मनाने की परंपरा प्रचलित हुई।

नाग पंचमी की प्राचीनतम कथा/ The oldest story of Nag Panchami

प्राचीन काल में एक सेठ जी के सात पुत्र थे और सातों का विवाह हो चुका था। सबसे छोटे बेटे की पत्नी बुद्धिमान और अच्छे स्वभाव की थी, लेकिन उसके भाई की पत्नी ऐसी नहीं थी। एक दिन जब बड़ी बहू ने सभी बहुओं को घर की साज-सज्जा के लिए पीली मिट्टी लाने के लिए कहा और सभी राजी भी हो गई। उसके पश्चात सभी बहुएं एक साथ मिट्टी लेने निकल पड़े। जब वह अपनी म्यान से मिट्टी खोदने लगीं, तब मिट्टी में से एक सांप निकला, और बड़ी बहू द्वारा उसे म्यान से मारने की कोशिश करते देखकर छोटी बहू ने उसे रोककर कहा- 'यह सर्प निर्दोष है, उसे मत मारो।' यह सुनकर बड़ी बहू ने उसे नहीं मारा।

उसके बाद सर्प के एक तरफ बैठने पर छोटी बहू ने सर्प से कहा - 'हम जल्द ही वापस आएँगे, तुम यहाँ से कहीं मत जाना।' इतना कहकर वह सबके साथ घर चली गई। घर पहुंचने के बाद, कार्यों में उलझ कर सांप से किए अपने वादे को भूल गई। अगले दिन जब उसे वह बात याद आई तो वह सभी को साथ लेकर वहां पहुंची और उसने वहां सांप को बैठे हुए देखा। उसने कहा - 'नमस्कार, सर्प भाई!' सांप बोला- 'तुमने मुझे भाई कहा है, नहीं तो झूठ बोलने पर मैं तुम्हें काट लेता। उसने कहा- 'भैया मुझसे गलती हो गई, मैं आपसे माफ़ी माँगती हूँ।' इस पर सांप बोला- "ठीक है, आज से तुम मेरी बहन और मैं तुम्हारा भाई बन गया हूं। जो चाहो मांग सकती हो।" वह बोली- 'भाई, मेरा कोई नहीं है; आपको अपने भाई के रूप में पाकर अच्छा लगा।' कुछ दिनों के बाद, सांप इंसान के रूप में उसके घर आया और कहा, 'मेरी बहन को भेजो।' सबको आश्चर्य हुआ और उन्होंने उसे रोक लिया और कहा कि उसका कोई भाई नहीं है तो उसने कहा- "मैं उसका दूर का भाई हूं। मैं बचपन में ही अपनी बहन से बिछड़ गया था, इसलिए वह मुझे नहीं पहचानती।" विश्वास होने पर, उन्होंने छोटी बहू को उसके साथ भेज दिया। रास्ते में सर्प ने उससे कहा कि 'वह सर्प है, इसलिए चलते समय परेशानी होने पर बिना डरे मेरी पूछ पकड़ कर चलती रहना।' उसने जैसा कहा था वैसा ही करने पर वह उसके घर पहुंच गई। वह वहाँ की दौलत और वैभव देखकर चकित रह गई। एक दिन सांप की मां ने उससे कहा- 'मैं काम से बाहर जा रही हूं, तुम अपने भाई को ठंडा दूध दे देना।' उसने इस पर ध्यान नहीं दिया और उसे गर्म दूध दे दिया, जिससे उसका चेहरा बुरी तरह जल गया। यह देखकर सांप की मां अत्यधिक क्रोधित हो गईं लेकिन सर्प के समझाने पर वह शांत हो गईं। तब सर्प ने कहा कि अब उसकी बहन को उसके घर भेज देना चाहिए। तब सर्प (छोटी भाभी का भाई) और उसके पिता उसे बहुत सारा सोना, चाँदी, जवाहरात, कपड़े और गहने आदि देकर उसके घर ले आए। इतना धन देखकर बड़ी बहू ने ईर्ष्या से कहा, कि यदि तुम्हारा भाई इतना धनवान है तो उससे और धन लेना चाहिए। जब सर्प ने यह बातें सुनीं, तो उसने सोने की सारी चीज़ें लाकर अपनी बहन को दे दीं। यह देखकर बड़ी बहू बोली कि 'झाडू लगाने के लिए झाड़ू भी सोने की होनी चाहिए।' यह सुनकर सांप  अपनी बहन के लिए सोने की झाड़ू ले आया। 

सर्प ने छोटी बहू को हीरे-जवाहरात का शानदार हार दिया था जिसकी प्रशंसा सुनकर उस देश की रानी ने राजा से कहा कि सेठ की छोटी बहू का हार यहां मंगवाया जाए। राजा ने अपने मंत्री को तुरंत हार लाने का आदेश दिया; मंत्री ने सेठ जी के पास जाकर कहा कि 'तुम्हारी छोटी बहू का हार महारानी जी पहनना चाहती हैं इसलिए उससे हार लाकर मुझे दे दो। सेठ जी ने डरते हुए छोटी बहू से हार लेकर उसे दे दिया। छोटी बहू को इस बात का बहुत बुरा लगा; उसने अपने सर्प भाई को याद करते हुए प्रार्थना की - 'भाई! रानी ने हार छीन लिया है; आपको कुछ करना चाहिए।' उसने अपने भाई से अनुरोध किया कि जब रानी उस हार को अपने गले में पहने तो वह सांप बन जाए और जब वह मुझे लौटाए तो वह हीरे और रत्नों का हो जाए। सांप ने ठीक वही किया जैसा उसने कहा था। जैसे ही रानी ने हार पहना वह सांप बन गया। यह देख कर रानी चिल्ला कर रोने लगी। यह देखकर राजा ने सेठ जी को छोटी बहू को तुरंत भेजने के लिए खबर भेजी। सेठ जी डर गए कि राजा उनकी बहू का क्या करेगा? यह सोचकर वह स्वयं छोटी बहू को लेकर राजा के पास गए। राजा ने छोटी बहू से पूछा- "तुमने क्या जादू किया है? मै तुम्हें सजा दूंगा।" छोटी बहू बोली- सर्वशक्तिमान राजन्! मेरी  उदंडता को क्षमा कीजिए; लेकिन जब मैं इस हार को अपने गले में पहनूंगी तो यह हीरे और जवाहरात का बन जाएगा और जब कोई इसे अपने गले में पहनेगा तो यह हार सांप बन जाएगा।

यह सुनकर राजा को विश्वास नहीं हुआ। उसने सर्प में बदल चुके हार को उसे देकर कहा, कि वह इसे अभी पहन कर दिखाएं। छोटी बहू के हार पहनते ही सर्प हीरे-जवाहरात के हार में बदल गया। यह देखने के बाद, राजा ने उसके शब्दों से संतुष्ट और प्रसन्न होकर उसको पुरस्कार स्वरूप ढेर सारा धन दिया। उस धन और हार के साथ दोनों अपने घर लौट गए। उसका धन देखकर बड़ी बहू ने ईर्ष्यावश छोटी बहु के पति से कहा, कि छोटी बहू के पास कहीं से धन आया है। यह सुनकर उसके पति ने अपनी पत्नी से कहा- मुझे सही से बताओ कि यह धन उसे कौन देता है? उसने फिर से अपने भाई को याद करने पर उसी समय सांप वहां आया और बोला- अगर कोई मेरी बहन के चरित्र पर शक करेगा तो मैं उसे खा जाऊंगा। यह सुनकर छोटी बहू का पति डर गया और उसने नाग देवता का बड़ा आदर सत्कार किया। उसी दिन से, नाग पंचमी का पर्व मनाया जाता है और महिलाओं द्वारा नागों की भाई के समान पूजा की जाती है।  

नाग पंचमी के दिन न करने वाले कार्य/ what not to do on nag panchami?

-नाग पंचमी के दिन किसानों को गलती से भी खेतों में काम नहीं करना चाहिए क्योंकि यह उनके और उनके परिवार के लिए अत्यधिक नुकसानदायक हो सकता है।  

-नाग पंचमी के दिन सुई- धागे का प्रयोग नहीं होने के कारण, इस दिन सुई और धागे का प्रयोग करने से बचना चाहिए।

-नाग पंचमी के दिन, चूल्हे पर तवा नहीं रखना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से सांपों को नुकसान पहुंच सकता है। 

-इस दिन किसी से झगड़ा नहीं करना चाहिए तथा परिवार के सदस्यों को कड़वे शब्द नहीं बोलने चाहिए। 

-नाग पंचमी/Nag panchami 2024 के दिन, लोहे के बर्तनों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इस दिन लोहे के बर्तन में न तो खाना बनाना चाहिए और न ही खाना चाहिए |

रक्षा बंधन
19 Aug, 2024

दुनिया भर में प्रचलित रक्षाबंधन का त्यौहार एक बंधन के रूप में जाना जाता है जिसे न तो तोड़ा जा सकता है और न ही छोड़ा जा सकता है।

भाई बहन के प्रेम और कर्तव्य को समर्पित यह त्योहार हर साल श्रावण पूर्णिमा को मनाया जाता है। बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी/Rakhi बांधने के लिए रक्षाबंधन का इंतजार करती है। भारतीय संस्कृति में प्रत्येक संस्कृति के समाहित होने की विशेषता के कारण कश्मीर से कन्याकुमारी तक, सौराष्ट्र से लेकर असम तक, लोगों द्वारा कोई ना कोई त्योहार मनाए जाते रहते हैं जिनसे आपसी संबंधों के बीच सद्भावनाओं में वृद्धि होती रहती है। सामान्यतः भाई-बहनों के बीच प्रेम और तकरार होने के बावजूद भी, रक्षाबंधन का पर्व राखी के माध्यम से भाईयों के प्रति बहनों के अपार स्नेह और बहनों के प्रति भाईयों के फर्ज को दर्शाता है। यह प्रेम और कर्तव्य जीवन भर भाई-बहन के बंधन को बांधे रखता है।

इस दिन बहनें अपने भाईयों के माथे पर तिलक करके,   कलाई पर रक्षा सूत्र या राखी/ Rakhi बांधकर आरती उतारती हैं और उनकी लंबी उम्र की प्रार्थना करतीं हैं। भाई भी बहनों पर उपहारों की वर्षा करके कठिन समय में मदद करने के लिए उनके साथ रहने का वादा करते हैं। 

पौराणिक कथा/Mythological stories के अनुसार, द्रौपदी द्वारा अपने चीरहरण के समय श्रीकृष्ण को अपनी रक्षा के लिए पुकारने पर, उन्होंने भरी सभा में द्रौपदी की रक्षा की थी। हालांकि, कृष्ण और द्रौपदी के बीच अच्छे संबंध थे लेकिन यह कहा जाता है कि पूर्व जन्म में द्रौपदी और कृष्ण के भाई-बहन होने के कारण कृष्ण ने अपनी राखी की प्रतिज्ञा को निभाया था। वर्तमान में, यह पर्व भाई-बहन के प्रेम की गहनता को दर्शाता है। जहां एक ओर, बहने भाईयों  के प्रति अपने कर्तव्यों को और भाई बहनों के प्रति अपने दायित्वों को पूरा करने का वादा करते हैं; बहनें भी भाइयों की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती है। बहनों द्वारा भाईयों की कलाई पर जो राखी बांधी जाती है, वह सिर्फ एक धागा नहीं होता बल्कि बहन-भाइयों के अटूट और पवित्र प्रेम का बंधन और सुरक्षा की शक्ति और प्रतिबद्धता उस धागे में निहित होती है।
 

रक्षाबंधन का महत्व/ Importance of Raksha Bandhan

रक्षाबंधन का पर्व भारत में बहुत लोकप्रिय है। रक्षाबंधन का अर्थ होता है- 'रक्षा का अटूट बंधन', जिसमें बहनें अपने भाइयों को राखी का धागा बांधती हैं, जो दोस्ती की भावना से भी जुड़ा होता है। रक्षाबंधन पर, बहनें अपने भाइयों के घर जाती हैं, और राखी बांधकर कहती हैं, "मैं तुम्हारी रक्षा करूंगी, और तुम मेरी रक्षा करना।"  यह अनिवार्य नहीं होता कि वो उसका स्वयं का भाई हो, वह अपने परिचितों में से किसी को भी राखी बांध सकती है। रक्षाबंधन पर राखी बांधने की हमारी सदियों पुरानी परंपरा है। हिन्दु त्यौहारों के अनुसार, हर पूर्णिमा किसी न किसी त्योहार को समर्पित होती है। इन सभी त्योहारों में एक बात सबसे महत्वपूर्ण है, वह है जिंदगी में खुशियां का बना रहना। 

सभी भाई-बहनों को एक-दूसरे की रक्षा और प्रेम की जिम्मेदारी लेते हुए रक्षाबंधन का पर्व बहुत हर्षोल्लास के साथ मनाना चाहिए। आज, जब रिश्ते धुंधले होते जा रहे हैं तो ऐसी स्थिति में भाई-बहनों का पवित्र रिश्ता संबंधों को मजबूत आधार दे सकता है। रक्षाबंधन भाइयों और बहनों के बीच भावनात्मक बंधन का प्रतीक है। बहनों के स्नेह बंधन में बंधकर, भाई उनकी रक्षा  करने का वचन देते हैं। राखी बांधना अब केवल भाइयों और बहनों के बीच तक सीमित नहीं रह गया है। अब देश की रक्षा, पर्यावरण की रक्षा, धर्म की रक्षा, हितों की रक्षा आदि के लिए राखी बांधी जाने लगी है। रवींद्रनाथ जी ने बंगाल के विघटन के खिलाफ इस त्योहार पर जन जागरूकता फैलाई थी और इस त्योहार को एकता और भाईचारे का प्रतीक बनाया था। प्रकृति को बनाए रखने के लिए वृक्षों को राखी बांधने की परंपरा भी शुरू हो गई है। 

वहीं दूसरी ओर, सम्मान और आस्था दिखाने के लिए भी राखी बांधी जाती है। रक्षाबंधन का महत्व आज के समय में इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि समाज में आज मूल्यों की कमी होने से प्रेम और सम्मान की भावना भी कम होती जा रही है। यह त्योहार आंतरिक बंधन को मजबूत करके हमारे भीतर सामाजिकता का विकास करता है। यह त्योहार/Festival परिवार, समाज, देश और दुनिया के प्रति हमारे कर्तव्यों की जागरूकता को भी बढ़ाता है। 
 

पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व/ Mythological and historical significance

हिंदू पौराणिक कथाओं में रक्षाबंधन/Rakshabandhan का इतिहास मिलता है। इस पर्व का प्रसंग वामन अवतार की कहानी/Story में मिलता है। कहानी इस प्रकार है- राजा बलि के यज्ञ द्वारा स्वर्ग पर अपना अधिकार करने का प्रयास करने पर इंद्र ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। तब विष्णु जी के वामन ब्राह्मण के रूप में राजा बलि से भिक्षा मांगने पर गुरु के मना करने के बावजूद बाली ने तीन पग भूमि दान कर दी। भगवान वामन ने आकाश, अधोलोक और पृथ्वी को तीन चरणों में मापा और राजा बलि को गहरी खाई में फेंक दिया। तब अपनी भक्ति के कारण, उसके विष्णु जी से हर समय अपने सामने रहने का वचन लेने पर, लक्ष्मी जी चिंतित हो उठीं। तब नारद जी की सलाह पर, लक्ष्मी जी ने बाली के पास जाकर रक्षा सूत्र (रक्षा का धागा) बांधकर उसे अपना भाई बना लिया। बदले में, वह विष्णु जी को अपने साथ ले आईं। यह श्रावण की पूर्णिमा थी। इतिहास में राखी के महत्व के कई संदर्भ मिलते हैं। मेवाड़ की महारानी कर्णावती ने मुगल बादशाह हुमायूँ को राखी भेजकर सुरक्षा की कामना की थी और हुमायूं ने मुसलमान होते हुए भी राखी का सम्मान रखा था। कहा जाता है कि सिकंदर की पत्नी ने अपने पति के हिंदू शत्रु, राजा पुरु को राखी बांधकर अपना भाई बना लिया था और युद्ध के दौरान सिकंदर को नहीं मारने का प्रण लिया था। 

भाई-बहन के प्रेम का पर्व रक्षाबंधन / Rakshabandhan brother and sister love

वैसे भी भाई-बहन का विशेष संबंध रक्षा से संबंधित होता है, जहां भाई और बहन एक दूसरे की रक्षा करने का संकल्प लेते हैं। इस दिन सभी बहनें अपने भाइयों को राखी बांधती हैं और हर समय उनकी रक्षा करने का वादा करती हैं, और भाई भी अपनी बहनों से वादा करते हैं कि जो भी हो वह उनके साथ खड़े रहेंगे। राजस्थान में राखी बांधने की एक अनूठी परंपरा है, जिसमें ननद द्वारा भाभी को एक विशेष प्रकार की राखी बांधी जाती है जिसे लुंबा के नाम से जाना जाता है। कुछ क्षेत्रों पर बहनें, अपनी बहनों को भी राखी बांधती हैं।

भाई-बहन के संबंधों का प्रतीक/ Symbol of brother-sister relationship

हिंदुओं का प्रमुख त्योहार रक्षाबंधन भाई-बहन के संबंधों का पर्व है जो भारत के कई हिस्सों में भाइयों और बहनों के बंधन को मजबूत बनाने के लिए मनाया जाता है। इसके साथ ही इसे नेपाल और पाकिस्तान में भी बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। हिंदुओं के अलावा, भारत में अन्य धर्मों के लोग भी इस पर्व बड़े उत्साह और जोश के साथ मनाते हैं। यह एक ऐसा त्योहार है जो पारिवारिक संबंधों की एकता और विशेषता को दर्शाता है जो मुख्य रूप से भाई-बहनों के रिश्ते को समर्पित है। यह त्योहार भारत में लंबे समय से मनाया जाता रहा है।

रक्षा बंधन का सामाजिक संदर्भ/ Social Context of Raksha Bandhan

इस दिन बहनें अपने भाईयों के दाहिने हाथ पर राखी बांधती हैं और उनके माथे पर तिलक करती हैं और उनकी लंबी उम्र की कामना करती हैं। बदले में, भाइयों द्वारा बहनों की रक्षा करने का वचन दिया जाता है। ऐसा माना जाता है कि राखी के रंग-बिरंगे धागे भाई-बहनों के प्रेम के बंधन को मजबूत करते हैं। रक्षाबंधन स्नेह के बंधन के साथ संबंधों को मजबूत करने का त्योहार है। यही कारण है कि इस अवसर पर न केवल बहन-भाइयों  बल्कि अन्य संबंधों में भी रक्षा सूत्र (या राखी) बांधने की प्रथा है। गुरु शिष्य को धागा बांधता है और शिष्य गुरु को।

प्राचीन काल में जब स्नातक अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद गुरुकुल छोड़ते थे, तो वे आचार्य से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए रक्षा सूत्र बांधा करते थे, जबकि आचार्य अपने छात्रों को रक्षा सूत्र इस कामना से बाँधते थे कि वे  ज्ञान अर्जित कर चुके हैं  तथा शिक्षक की गरिमा और अपने ज्ञान की सफलतापूर्वक रक्षा करने के लिए उन्हें अपने जीवन में इसका उचित उपयोग करना चाहिए। 

इस परंपरा के अनुसार, आज भी किसी भी धार्मिक अनुष्ठान से पहले पुजारियों द्वारा यजमानों को रक्षा सूत्र बांधा जाता है। इस तरह, दोनों एक-दूसरे के सम्मान की रक्षा करने का वचन लेते हैं। रक्षाबंधन पर्व सामाजिक और पारिवारिक एकता का प्रतीक रहा है। विवाह के उपरांत, बहनों के दूसरे घर चले जाने पर, इसी बहाने हर साल उनके रिश्तेदार ही नहीं, बल्कि दूर के भाई भी उनके घर जाकर राखी बंधवाते हैं और अपने संबंधों को पुनर्जीवित करते हैं। यह दो परिवारों और कुलों का मिलन होता है। इस त्योहार को समाज के विभिन्न वर्गों के बीच एकता के प्रतीक के रूप में भी प्रयोग किया जाता है ताकि जो संपर्क टूट जाते हैं उन्हें इसके द्वारा जोड़ा जा सके।

स्वतंत्रता संग्राम में रक्षा बंधन की भूमिका/ Role of Raksha Bandhan in Freedom Struggle

इस त्योहार को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में, जन जागरूकता के माध्यम के रूप में भी इस्तेमाल किया गया था। प्रसिद्ध भारतीय नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर जी का मानना ​​​​था कि रक्षाबंधन न केवल भाई और बहन के बीच के बंधन को मजबूत करने का दिन है, बल्कि हमें इस दिन अपने हमवतनों के साथ अपने संबंधों को भी मजबूत करना चाहिए। ब्रिटिश सरकार की ,'फूट करो और राज करो' वाली नीति के तहत वह बंगाल के विभाजन के बारे में सुनकर टूट गए थे। यह विभाजन हिंदुओं और मुसलमानों के बीच तेजी से बढ़ते संघर्षों के आधार पर किया गया था। यह वह समय था जब रवींद्रनाथ टैगोर जी ने हिंदुओं और मुसलमानों को करीब लाने के लिए रक्षाबंधन उत्सव की शुरुआत करके, दोनों धर्मों के लोगों से इस पवित्र धागे को एक-दूसरे को बांधने और उनकी रक्षा करने के लिए कहा था। दोनों धर्मों के लोगों के बीच संबंध मजबूत करने के लिए आज भी, पश्चिम बंगाल में लोगों द्वारा एकता और सद्भाव में वृद्धि करने के लिए अपने दोस्तों और पड़ोसियों को राखी बांधी जाती है। 

रक्षा बंधन पर सरकारी व्यवस्था/ Government Arrangement on Raksha Bandhan

इस अवसर पर भारत सरकार के डाक एवं तार विभाग द्वारा दस रुपये मूल्य के आकर्षक लिफाफों की बिक्री की जाती है जिसकी कीमत पांच रुपये और डाक शुल्क पांच रुपये होता है। राखी के त्योहार पर बहनें अपने भाईयों को महज पांच रुपये में तीन-चार राखियां भेज सकती हैं। डाक विभाग द्वारा बहनों को दिए गए इस उपहार के तहत पचास ग्राम वजन का राखी का लिफाफा सिर्फ पांच रुपये में भेजा जा सकता है, जबकि सामान्य तौर पर, बीस ग्राम के लिफाफे में सिर्फ एक राखी भेजी जा सकती है। यह सुविधा केवल रक्षाबंधन तक उपलब्ध रहती है। बारिश के मौसम को ध्यान में रखते हुए, रक्षाबंधन/Rakshabandhan 2024 के अवसर पर वर्ष २००७ से बारिश से बचाने वाले जलरोधी लिफाफे भी डाक-तार विभाग द्वारा उपलब्ध कराये जाते हैं। यह लिफाफे दूसरे लिफाफों से अलग होते हैं और इनका आकार और डिजाइन अलग होने के कारण इनमें राखी ज्यादा सुरक्षित रहती हैं। सरकार इस अवसर पर कन्याओं और महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा का भी प्रावधान करती है जिससे बहनें बिना धन खर्च किए अपने भाइयों के पास राखी बांधने जा सकती हैं। यह सुविधा रक्षा बंधन पर ही उपलब्ध होती है लेकिन यह सुविधा हर जगह नहीं होती। 

राखी और आधुनिक तकनीकी माध्यम/ Rakhi 2024 and modern technical medium

तकनीकी युग और सूचना संचार का राखी जैसे त्योहारों पर भी प्रभाव पड़ा है। आजकल बहुत से भारतीय विदेश में रहते हैं, और उनके परिवार के सदस्य (भाई-बहन) भारत या अन्य देशों में रहते हैं। इंटरनेट की शुरुआत के बाद, कई ई-कॉमर्स साइट्स खुल गई हैं जो ऑनलाइन ऑर्डर लेकर राखी और अन्य सभी संबंधित सामान दिए गए पते पर पहुंचाती हैं। दूर रहने के कारण राखी पर नहीं मिल सकने वाले भाई बहनों द्वारा, आधुनिक तरीकों से देखकर और सुनकर इस त्यौहार को मनाया जाता है।

रक्षाबंधन मंत्र/ Rakshabandhan Mantra

भारतीय संस्कृति में कथा/Story, पूजन/Rakshabandhan Pooja और अनेक अनुष्ठानों के समय रक्षा सूत्र बांधने का विशेष महत्व है। सुरक्षा के तीन धागों को तीन बार लपेट कर इस मंत्र से बांधा जाता है।

येन बद्धो बलि राजा,दानवेन्द्रो महाबल: 

तेन त्वाम् प्रतिबद्धनामि रक्षे माचल माचल:।

राखी के इस मंत्र का अर्थ है- जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बांधा गया था, उसी रक्षाबंधन से मैं तुम्हें बांधता हूं, जो तुम्हारी रक्षा करेगा| हे रक्षे! (रक्षासूत्र) तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो। 

राखी बांधने का पारंपरिक तरीका/ The traditional method for tying Rakhi

१) सबसे पहले राखी के दिन पवित्र स्नान करके देवी-देवताओं का आशीर्वाद लेने के लिए देवताओं की पूजा करनी चाहिए। 

२) राखी, चावल, रोली, या सिंदूर को चांदी, पीतल या तांबे की प्लेट में एक छोटी कटोरी में रखें और इसे पानी या इत्र से मिला लें।

 ३) राखी की थाली को पूजा स्थल पर रखकर सबसे पहले बाल गोपाल या अपने इष्ट देवता को राखी अर्पित करके प्रार्थना करनी चाहिए। 

४) राखी बांधते समय भाई का मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। इससे राखी पर भी देवताओं की कृपा बनी रहती है। 

५) राखी बांधते समय भाइयों को अपने सिर पर रूमाल या कोई साफ कपड़ा रखना चाहिए।

६) बहनों को सबसे पहले भाई के माथे पर रोली का टीका लगाना चाहिए।

७) तिलक के ऊपर कच्चे चावल (अक्षत) लगाएं और आशीर्वाद के रूप में भाई पर कुछ अक्षत छिड़कने चाहिए।

८) भाईयों को अमंगल से बचाने के लिए दीपक से आरती उतारने चाहिए। यदा-कदा बहनें अपने भाइयों को काजल लगाती हैं।

९) मंत्र का जाप करते हुए, भाई की दाहिनी कलाई पर राखी का पवित्र धागा बांधने से, राखी के धागों को शक्ति मिलती है।

१०) भाई-बहनों को एक-दूसरे को मिठाई खिलानी चाहिए।

११) भाई बड़ा हो, तो बहनों को भाई के पैर छूने चाहिए। बहनें बड़ी हों, तो भाइयों को पैर छूकर आशीर्वाद लेना चाहिए।

१२) भाई को वस्त्र, आभूषण या धन देकर बहन के सुखी जीवन की कामना करनी चाहिए।

रक्षाबंधन के अवसर पर बनाए जाने वाले व्यंजन/ Delicacies prepared on the occasion of Raksha Bandhan

भारत में कोई भी उत्सव बिना व्यंजनों को बनाए पूर्ण नहीं होता है। प्रत्येक उत्सव पर कुछ खास व्यंजन बनाए जाते हैं। इसी तरह रक्षाबंधन के मौके पर घेवर, शकरपारे, नमकीन पारे आदि चीजें खास तौर से बनाई जाती हैं। सावन के महीने में घेवर मुख्य मिठाई मानी जाती है। इसका सेवन पूरे उत्तर भारत में पूरे महीने में किया जाता है। हलवा, पूड़ी और खीर भी इस त्योहार की कुछ प्रचलित मिठाइयां हैं।

निष्कर्ष/ Conclusion

आखिरकार कहा जा सकता है कि राखी के इस पर्व का भाई-बहनों के लिए विशेष महत्व है। आज के युग में यह पर्व हमारी संस्कृति की विशेषता बन गया है और हमें इस पर गर्व होना चाहिए। इस पर्व को मनाने के साथ ही, हमें एक-दूसरे के साथ सद्भाव से रहने का संकल्प भी लेना चाहिए। उतार-चढ़ाव में सभी के साथ तालमेल बिठाकर रहना चाहिए। आज कई भाई अपनी कलाई पर राखी नहीं बांध पा रहे हैं क्योंकि उनकी बहनों को इस संसार में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है। यह शर्म की बात है कि जिस देश में कन्याओं की पूजा की जाती है वहां पर कन्या-भ्रूण हत्या के मामले सामने आते रहते हैं। यह त्योहार हमें यह भी याद दिलाता है कि बहनें हमारे जीवन में कितना महत्व रखती हैं। यह त्योहार सामान्य लोगों तथा देवी-देवताओं द्वारा भाई-बहनों के पवित्र संबंध को बनाए रखने के लिए भी मनाया जाता है। कई भाई-बहनें व्यावसायिक और व्यक्तिगत कारणों से एक-दूसरे से नहीं मिल पाते हैं। फिर भी, इस विशेष अवसर पर, वे निस्संदेह एक-दूसरे के लिए समय निकालते हैं और इस पवित्र त्योहार को मनाते हैं। हमें इस त्योहार को खुशी और नैतिक मूल्यों के साथ मनाना चाहिए।

अगले पांच वर्षों में इन तिथि पर आएगी रक्षाबंधन

यह है अगले पांच वर्षों के लिए रक्षाबंधन की तारीखें।

  • सोमवार-  19 अगस्त 2024  
  • शनिवार-    9 अगस्त 2025 
  • शुक्रवार-  28 अगस्त 2026
  • शनिवार , 05 अगस्त 2028

कजरी तीज
22 Aug, 2024

सभी लोग हरियाली तीज के बारे में जानते ही होंगे। इसी तीज की तरह एक और तीज होती है – कजरी तीज। महिलाओं के लिए हरियाली तीज की तरह ही कजरी तीज/kajari teej 2024 उतनी ही महत्व रखता है। यह भाद्रपद मास के दौरान कृष्ण पक्ष के तीसरे दिन मनाया जाता है। यह त्यौहार उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान में भव्य रूप से मनाया जाता है। कजरी तीज को कजली तीज/Kajli Teej के नाम से भी जाना जाता है। इस त्यौहार का महत्व/Significance of Kajri Teej महिलाओं के लिए सबसे अधिक होता है। इस दिन विवाहित महिलाएं अपने वैवाहिक जीवन की सुख-समृद्धि के लिए व्रत/ Kajari Teej Vart रखती हैं। कजली तीज को अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग नामों से जाना जाता है लेकिन पूरे भारत में इसकी मान्यता एक जैसी है। यह मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार जैसे राज्यों में मनाया जाता है। इन राज्यों में इसे बुरी तीज और सतूड़ी तीज के नाम से भी जाना जाता है।

दांपत्य जीवन में सुख-समृद्धि के लिए यह व्रत/ Fasting किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि अगर कोई कन्या या विवाहित महिला इस दिन भगवान शिव और देवी पार्वती की पूरी भक्ति और आराधना के साथ पूजा करती है, तब उन्हें एक सही जीवनसाथी की प्राप्ति होती है। यह भी माना जाता है कि इस दिन बहुत समय बाद ही देवी पार्वती भगवान शिव के साथ होती हैं। कई जगहों पर कजली तीज के अवसर पर मुख्य रूप से गौरी की पूजा/ Kajari Teej Puja की जाती है। यदि किसी की कुंडली में कोई भी बाधा हो, और वह इस पूजा को पूर्ण रीति रिवाज/ Rituals of Kajli Teej के साथ करे, तो उसकी सभी बाधाएं दूर हो जाती है। हालांकि, इस पूजा का फल तभी प्राप्त होगा यदि आप अविवाहित और स्वयं इस पूजा को करें। ऐसी मान्यता है कि कजली तीज के दिन देवी पार्वती को इसी दिन भगवान शिव की प्राप्ति हुई थी। देवी पार्वती ने इसके लिए चुनौतीपूर्ण ध्यान साधना का सामना किया था। इस पर्व/Festival के अवसर पर विवाहित महिलाओं को भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करनी चाहिए। ऐसा कहा जाता है कि जिन महिलाओं का विवाह नहीं होता, उन्हें इस पर्व पर व्रत रखने से अच्छे जीवनसाथी का आशीर्वाद मिलता है। 

इस पर्व के दिन पति और पत्नी को एक दूसरे से विश्वासघात, गलत व्यवहार और एक दूसरे के पीठ पीछे बुराई नहीं कहना चाहिए। इस दिन विवाहित और अविवाहित महिलाएं व्रत रखती हैं। यह व्रत उनके लिए एक आवश्यक कार्य बन जाता है। इस दिन सभी महिलाएं अपना श्रृंगार करती हैं। और फिर, शाम को, वह सभी एक मंदिर में जाकर भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करते हैं। इस दिन पत्नी अपने पति की लंबी उम्र की कामना करती है। कजली तीज के दिन घर में झूला लगाने की प्रथा है। इस दिन महिलाएं दिन भर अपने दोस्तों के साथ बैठकर गीत गाती हैं और साथ में नृत्य भी करती हैं। विवाहित महिलाएं अपने पति के लिए व्रत/Kajri Teej Vrat रखती हैं और अविवाहित महिलाएं सही जीवनसाथी पाने के लिए इसका पूर्ण रूप से पालन करती हैं।

कजली तीज का महत्व/ Importance of Kajali Teej

विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और उसके सुख समृद्धि के लिए इस व्रत को रखती हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन देवी पार्वती ने भगवान शिव का साथ प्राप्त करने के लिए गहन ध्यान और कड़े परिश्रम से गुजरी थी। जिनको अच्छे जीवनसाथी की तलाश होती है उन्हें इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूरे मन से पूजा करनी चाहिए। ऐसा करने से अविवाहितों को योग्य वर का वरदान प्राप्त होता है और विवाहित स्त्रियों को सदा के लिए भाग्यशाली होने का वरदान मिल जाता है। जो महिलाएं मां पार्वती की पूजा पूरे मन से करती हैं उनकी मनोकामना जरूर पूरी होती है। कजरी तीज पर मां पार्वती की पूजा करने वाली सभी महिलाओं को अपने पति के साथ सुखी जीवन का आशीर्वाद मिलता है। 

एक पौराणिक कथा के अनुसार, देवी पार्वती ने 108 जन्मों के बाद भगवान शिव से विवाह करने में सफलता प्राप्त की थी। इतने कड़े परिश्रम के बाद ही देवी पार्वती को भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त हुआ था। इस दिन को निस्वार्थ प्रेम की भावना के साथ मनाया जाता है। यह और कुछ नहीं बल्कि देवी पार्वती की निस्वार्थ भक्ति ही थी जिसने भगवान शिव को उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करने पर मजबूर किया। कजरी तीज/Kajali Teej 2024 के दिन जौ, गेहूं, चना मटर और चावल के सत्तू को घी में मिलाकर कई तरह के व्यंजन बनाए जाते हैं। चांद को देखने के बाद व्रत/Fasting खोलने के लिए भोजन किया जाता है।

कजली तीज क्यों मनाई जाती है?/ Why is Kajli Teej Celebrated?

तीज का त्यौहार विवाहित जोड़ों के लिए बहुत महत्व रखता है क्योंकि यह एक ऐसा त्योहार है जो पति और पत्नी के रिश्ते को और भी ज्यादा मजबूत करता है। इस दिन सत्तू खाकर व्रत खोलने की परंपरा है। नीम के पेड़ की पूजा करना इस त्योहार का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा है। लोग इस दिन नए कपड़े पहन कर व्रत करते हैं और बाद विभिन्न व्यंजनों का आनंद लेते हैं। ऐसा माना जाता है कि देवी पार्वती को कजरी तीज पर गहन ध्यान करने के बाद अपने जीवन में भगवान शिव के होने का फल मिला था। इसलिए इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती दोनों की पूजा की जाती है। यदि कोई अविवाहित महिला इस दिन व्रत रखती है और पूरी पूजा मन से करती है तो उसे अपनी पसंद का वर मिलता है।

कजली तीज को कजली तीज क्यों कहा जाता है?/ Why is Kajali Teej known as Kajli Teej?

प्राचीन किवदंतियों के अनुसार भारत के मध्य भाग में कजली नाम का एक जंगल मौजूद था, जहां ददुरै नाम का एक राजा शासन करता था। इस राज्य में लोग कजली के आधार पर गीत गाते थे। यही कारण है कि उनका स्थान पूरे भारत में  प्रसिद्ध हो गया था। कुछ वर्षों के बाद राजा ददुरै की मृत्यु हो गई, राजा की मृत्यु के बाद उसकी रानी नागमती विधवा हो गई। इन सबके कारण उनकी प्रजा बहुत दुखी और उदास कर दिया। इसलिए, कजली के गीत पति और पत्नी की एकता के लिए गाए जाते हैं।

दूसरी ओर, एक प्रेमपूर्ण मिथक के अनुसार, देवी पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में चाहा। हालांकि उस समय भगवान शिव ने उनके सामने एक शर्त रखी थी। शर्त के अनुसार, देवी पार्वती को भगवान शिव के लिए अपनी सच्ची भक्ति और प्रेम साबित करना पड़ा था। इसके पश्चात, देवी पार्वती ने भगवान शिव के नाम पर 108 वर्षों तक तपस्या की और भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए सभी परीक्षा में खड़ी रहीं। इसके बाद तीज के दिन भगवान शिव ने देवी पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इसी वजह से इस दिन को कजरी तीज के नाम से भी जाना जाता है। इसी कारण इस दिन सभी देवता तीज पर देवी पार्वती और भगवान शिव की पूजा करते हैं क्योंकि इससे वह प्रसन्न होते हैं।

कजली तीज कैसे मनाया जाता है?/How is Kajali Teej Celebrated?

कजली तीज/Kajli teej 2024 के दिन, विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं, और अविवाहित महिलाएं इस दिन अपनी पसंद का वर प्राप्त करने का आशीर्वाद पाने के लिए व्रत रखती हैं। इस दिन जौ, गेहूं, चना मटर और चावल के सत्तू को घी में मिलाकर कई तरह के व्यंजन बनाए जाते हैं। चंद्रमा की पूजा करने के बाद व्रत का समापन होता है। इसके अलावा कजरी तीज पर गायों की पूजा करने का भी प्रावधान है। साथ ही इस दिन झूले भी लगाए जाते हैं और महिलाएं एक साथ बैठकर गीत गाती हैं और साथ में नृत्य भी करती हैं। कजरी गीत गाना इस त्योहार का एक अविभाज्य हिस्सा है। नीम के पेड़ की भी पूजा की जाती है।

कजली तीज पर की जाने वाली परंपरा/The tradition followed on Kajli Teej.

1. इस दिन विवाहित महिलाएं व्रत रखती हैं ताकि उनके पति को लंबी आयु प्राप्त हो और अविवाहित लड़कियां अपनी पसंद का वर के वरदान के लिए यह व्रत रखती हैं।

2. इस दिन जौ, गेहूं, चना मटर और चावल के सत्तू को घी में मिलाकर कई तरह के व्यंजन बनाए जाते हैं। चंद्रमा के उदय होने के बाद व्रत खोलने के लिए भोजन किया जाता है।

3. इस दिन विशेष रूप से गायों की पूजा की जाती है। गेहूँ के सात छोटे गोले बनाकर उन पर घी, गुड़ लगाया जाता है। इसके बाद इन्हें गायों को खिलाया जाता है, और फिर भोजन किया जाता है।

4. कजली तीज पर झूले लगाए जाते हैं। लोग झूले पर एक साथ बैठते हैं और एक साथ कजली तीज/Kajli Teej 2024 के गीत गाते हैं और नृत्य करते हैं।

5. इस दिन कजरी गीत गाने की अनूठी परंपरा है।

कजली तीज के अनुष्ठान/ Rituals of Kajli Teej

इस पर्व पर निमड़ी देवी की पूजा करने का विधान है। पूजा/ Kajari Teej Puja से पूर्व दीवार पर घी और गुड़ से बनी पाल बांधकर मिट्टी और गाय के गोबर का उपयोग कर तालाब जैसी संरचना बनाई जाती है। और फिर उसके बगल में नीम के पेड़ की एक शाखा रखी जाती है। तालाब में कच्चा दूध और पानी चढ़ाया जाता है, और एक दीया जलाया जाता है और वहां रखा जाता है। एक प्लेट में नींबू, खीरा, केला, सेब, सत्तू, रोली, मौली, अक्षत आदि रखे जाते हैं। इसके अलावा किसी पात्र में थोड़ा कच्चा दूध लें और शाम को उसका श्रृंगार कर लें। सारी तैयारी करने के पश्चात निम्नलिखित तरीकों से देवी निमड़ी की पूजा करें:

1. सबसे पहले देवी निमड़ी पर थोड़ा पानी और रोली छिड़कें और फिर चावल चढ़ाएं।

2. देवी निमड़ी के पीछे की दीवार पर मेहंदी, रोली और काजल के 13 टीके उँगलियों से लगाए। मेहंदी का टीका, अनामिका से रोली और तर्जनी से काजल का टीका लगाना चाहिए।

3. देवी निमड़ी को मौली अर्पित करने के बाद उन्हें मेंहदी, काजल और वस्त्र अर्पित करें। दीवार पर टीके का सहारा लेकर लच्छा बांधें या रोली बांधे।

4. देवी निमड़ी को फल और दक्षिणा अर्पित करें और पूजा पात्र पर रोली का टीका लगाकर लच्छा बांधें।

5. पूजा स्थल पर तालाब के किनारे रखे दीये की रोशनी में नींबू, खीरा, नीम की टहनी, नाक की नथनी, साड़ी का पल्ला आदि देखें। इसके बाद चंद्रमा को अर्घ्य दें।

चन्द्रमा को अर्घ्य देने का विधान/ Ritual of offering Arghya to the Moon

कजरी तीज की शाम को देवी निमड़ी की पूजा करने के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा सदियों पुरानी है और इसे आज भी उसी निष्ठा से निभाया जाता है।

1. चंद्रमा को जल, रोली, मौली और अक्षत की बूंदें चढ़ाएं और फिर भोग लगाएं।

2. हाथों में चांदी की अंगूठी और गेहूं के दाने पकड़कर जल को अर्घ्य दें और फिर एक स्थान पर खड़े होकर चार बार घुमाएं।

कजरी तीज का नियम/ Rule of Kajari Teej

1. आमतौर पर यह व्रत निर्जल उपवास होता है। हालांकि, गर्भवती महिलाओं को फल खाने की अनुमति होती है।

2. यदि किसी कारण चंद्रमा नहीं देखता तो रात के लगभग 11:30 बजे आकाश की ओर देखते हुए अर्घ्य देकर व्रत को खोला जा सकता है।

3. उद्यान के बाद यदि पूर्ण व्रत रखने की क्षमता ना हो तो आप फलों का सेवन भी कर सकते हैं।

ऊपर बताए गए नियमों/ Rule of Kajari Teej के अनुसार यदि विवाहित महिला कजरी का व्रत करती है तो उसके परिवार को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। और यदि अविवाहित कन्या व्रत करती है तो उसे अपनी पसंद का वर प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त होता है।

कजरी तीज या कजली तीज का प्राचीन मिथक/ Ancient Myth of Kajari Teej or Kajli Teej

एक गाँव में एक गरीब ब्राह्मण रहता था। उनके साथ उनकी ब्राह्मण पत्नी भी रहती थी। उस समय भाद्रपद के महीने में कजरी तीज का आगमन हुआ था। ब्राह्मण पत्नी ने देवी तीज के नाम पर व्रत रखा। उसने अपने पति से कहा कि उसने कजरी तीज का व्रत रखा है और उसे सत्तू की जरूरत है, और उसने उसे चने से बना सत्तू लाने को कहा। ब्राह्मण पति ने अपनी ब्राह्मणी पत्नी से पूछा कि उसे सत्तू कैसे और कहाँ से मिलेगा। इस पर, उसने अपने पति से कहा कि किसी भी कीमत पर वह इसकी व्यवस्था करें, चाहे वह चोरी से हो या लूट से। ब्राह्मण घर से निकल कर साहूकार की दुकान पर गया। यहां से उसने सवा किलो चना दाल, घी, चीनी लिया। फिर उसने इनमें से सत्तू बनाया। जैसे ही वह जा रहा था, सभी नौकर जाग गए। शोर सुनकर सब लोग चोर-चोर चिल्लाने लगे| साहूकार ने आकर ब्राह्मण को पकड़ लिया। ब्राह्मण ने कहा कि वह चोर नहीं है और वह एक गरीब ब्राह्मण है। उसकी पत्नी ने तीज का व्रत रखा है इसलिए वह सवा किलो सत्तू तैयार करने आया था ताकि वह उसे अपनी पत्नी के पास ले जा सके। जब साहूकार ने ब्राह्मण की जाँच की, तो उसे सत्तू के अलावा कुछ नहीं मिला। दूसरी तरफ चंद्रमा का उदय हो चुका था और ब्राह्मण पत्नी सत्तू की प्रतीक्षा कर रही थी। साहूकार ने ब्राह्मण से कहा कि आज से वह ब्राह्मण की पत्नी को अपनी धर्म बहन मानेगा। वह ब्राह्मण को सत्तू, आभूषण, धन, मेंहदी और लच्छा सहित ढेर सारी सामान देकर आदर सत्कार से विदाई देता है। इसके बाद सभी ने देवी कजली की पूजा की। जिस प्रकार ब्राह्मण को सुख की प्राप्ति हुई, उसी प्रकार देवी कजली की कृपा से सभी पर कृपा बनी रहती है।

गाय की पूजा होती है/ Cow is worshipped

इस पर्व पर जो जो बनाया जाता है उन सभी के बारे में आपको पहले ही बताया गया है। इस दिन गाय की विशेष रूप से पूजा की जाती है। गेहूं की रोटी पर गुड़ और चने रखकर गाय को चढ़ाया जाता है। और फिर, उपवास खोला जाता है।

कजरी तीज और सोलह श्रृंगार/ Kajari Teej and Solah Shringar

कजरी तीज पर देवी पार्वती की मूर्ति का झांकी निकाली जाती है। अविवाहित महिलाएं नृत्य भी करती हैं। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए प्रार्थना करती हैं और अखंड दीपक जलाकर पूरी रात जागती हैं। ऐसा करना अनिवार्य नहीं है लेकिन महिलाएं यह अपने लिए करती हैं। इस दिन महिलाएं हाथों में मेहंदी लगाती हैं और सोलह श्रृंगार करती हैं। इस दिन घर में झूला भी लगाया जाता है।

कजरी तीज पर महिलाएं मालपुआ और घेवर जैसे स्वादिष्ट व्यंजन बनाती हैं। वह  इस दिन चारों ओर हरियाली का आनंद लेते हैं और झूलों पर झूलते हुए गीत भी गाते हैं।

भारत में कहां मनाई जाती है कजरी तीज?/ Where is Kajari Teej Observed in India?

कजरी तीज भारत के कई हिस्सों में मनाई जाती है। यह भारत के अलग अलग राज्यों में अलग-अलग तरीकों से मनाई जाती है। यह उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि में बड़े धूमधाम से मनाई जाती है।

विभिन्न राज्यों में अलग अलग तरह से यह त्यौहार मनाया जाता है|

1. बिहार और उत्तर प्रदेश में नावों पर कजरी गीत गाए जाते हैं। वाराणसी और मिर्जापुर में वार्षिक गीतों के साथ कजरी गीत भी गाए जाते हैं। ऐसे एक ही राज्य में इसे मनाने के दो तरीके मिल गए।

2. राजस्थान में इस पर्व को विशेष महत्व दिया जाता है। विशेष रूप से बूंदी शहर में बहुत धूमधाम और शोर शराबे के साथ मनाया जाता है। इस दिन लोग घोड़ों और ऊंटों की सवारी भी करते हैं। बूंदी में तीज का उत्सव दुनिया भर में प्रसिद्ध है, और लोग इसकी भव्यता को देखने के लिए दूर-दूर से आते हैं।

कजरी तीज पर महिलाओं को क्या नहीं करना चाहिए/ What should not be done by Women on Kajari Teej?

  • इस दिन विवाहित महिलाओं को सफेद साड़ी नहीं पहननी चाहिए और उन्हें बिना गहनों के नहीं रहना चाहिए।
  • कजरी तीज पर भोजन और पानी का सेवन न करें क्योंकि यह व्रत निर्जला व्रत होता है। बिना पानी पिए इसका पालन करना इस पर्व की आवश्यकता है।
  • आस-पास साफ-सफाई रखने पर ध्यान दें क्योंकि कजरी तीज पर साफ-सफाई का काफी महत्व/Significance है।
  • कजरी तीज पर कृपया अपने पति से ऐसा कुछ भी न कहें जिससे उन्हें दुख पहुंचे।
  • कजरी तीज पर पति से दूर न रहें।
  • कजरी तीज के अवसर पर अपशब्द न कहें।
  • कजरी तीज पर किसी से पीठ पीछे न बोलें और न ही किसी से जलन महसूस करें।
  • कजरी तीज पर घर में कोई लड़ाई ना करें। परिवार के सदस्यों के साथ अच्छा व्यवहार करें।
  • इस दिन विवाहित महिलाओं को अपनी हथेलियों पर मेहंदी लगानी चाहिए। शास्त्रों के अनुसार  मेहंदी प्यार का प्रतीक है।
  • इस दिन चूड़ियां जरूर पहननी चाहिए। बिना चूड़ियों के रहना अशुभ माना जाता है।

आप अन्य सभी प्रमुख भारतीय त्योहारों में ज्योतिष की प्रासंगिकता (Relevance of Astrology) पर इसी तरह के लेख पढ़ सकते हैं।

कृष्ण जन्माष्टमी
26 Aug, 2024

पृथ्वी को पापों के भार से रहित करने के लिए भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि रोहिणी नक्षत्र में भगवान विष्णु का कृष्ण के रूप में अवतार हुआ । जन्माष्टमी/ krishna Janmashtami को भगवान कृष्ण का जन्मदिन माना जाता है; यह पर्व विश्व भर में आस्था और भक्ति के साथ मनाया जाता है। लोगों की श्रीकृष्ण के प्रति आस्था सदियों से है। वह कभी यशोदा नंदन हैं तो कभी ब्रज के नटखट गिरधर गोपाल। भारतवर्ष में यह बड़े ही उत्साह से मनाया जाता है; इसकी तैयारियां इसके आगमन से पूर्व ही प्रारम्भ हो जाती हैं। कृष्ण-भक्ति  के रंगों में सारा माहौल गुंजायमान हो जाता है। जन्माष्टमी का पर्व आस्था और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। श्रीमद्भागवत को प्रमाण मानकर स्मार्त सम्प्रदाय के लोग चंद्रोदय व्यापनी अष्टमी अर्थात रोहिणी नक्षत्र को जन्माष्टमी मनाते हैं और वैष्णव व्यापानी अष्टमी और उदयकाल रोहिणी नक्षत्र को जन्माष्टमी मनाते हैं। 

जन्माष्टमी के अलग-अलग रूप हैं और इस पर्व को अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है। कहीं रंगों की होली होती है तो कहीं फूलों की महक और कहीं, दही हांडी का भव्य आयोजन होता है, और कहीं, भगवान कृष्ण के जीवन के मोहक पझालू झांकियों के रूप में देखने को मिलते हैं। मंदिरों को भव्यता से सजाया जाता है। इस अवसर पर श्रद्धालु उपवास रखते हैं। इस दिन, मंदिरों को सजाया जाता है, और भगवान कृष्ण का झूला बनाया जाता है, और कृष्ण रासलीला का आयोजन भी किया जाता है।

जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर श्रद्धालु भगवान कृष्ण के दर्शन के लिए मथुरा आते हैं। मंदिरों को मोहकता से सजाया जाता है। मथुरा में जन्माष्टमी पर आयोजित श्रीकृष्ण जयंती को देखने के लिए विदेशों से भी लाखों कृष्ण भक्त पहुंचते हैं। भगवान की प्रतिमा पर हल्दी, दही, घी, तेल, गुलाब जल, मक्खन, केसर, कपूर आदि चढ़ाकर लोग इसे एक-दूसरे पर छिड़कते हैं। जन्माष्टमी का व्रत सभी नियमों के अनुसार करने से भक्त मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह व्रत मनोकामना पूर्ति के लिए किया जाता है। श्रीकृष्ण की भक्ति का यह पावन पर्व सभी को कृष्ण भक्ति से परिपूर्ण देता है। यह पर्व सनातन धर्म मानने वालों के लिए आवश्यक माना जाता है। इस दिन व्रत रखा जाता है और लोग कृष्ण भक्ति के गीत सुनते हैं। श्रीकृष्ण-लीला की झाँकी को घरों और मंदिरों में सजाया जाता है।

जन्माष्टमी का महत्व/ Importance of Janmashtami

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी/ krishna Janmashtami का पर्व देशभर के लिए विशेष महत्व रखता है। यह हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। भगवान श्रीकृष्ण को विष्णु का आठवां अवतार माना जाता है । बच्चों से लेकर बड़ों तक, सभी अपने आराध्य के जन्म का आनंद मनाने और भगवान कृष्ण की महिमा का गुणगान करने के लिए पूरे दिन उपवास रखते हैं। भगवान श्रीकृष्ण को साज-सज्जा के सामान से  सुशोभित किया जाता है, झूलों को सजाया जाता है,  और भगवान कृष्ण को झूले में बैठाया जाता हैं। महिलाएं और पुरुष मध्यरात्रि तक उपवास रखते हैं। तदोपरांत , श्रीकृष्ण के जन्म का समाचार हर गूंजता है। श्रीकृष्ण की आरती होती है और प्रसाद बांटा जाता है।

कृष्ण जन्माष्टमी का इतिहास/ History of Krishna Janmashtami

ऐसा माना जाता है कि श्रीकृष्ण के अवतार का एक मुख्य उद्देश्य आतताई  कंस का वध करना था। कंस की एक बहन थी, देवकी। कंस उससे बहुत प्रेम करता था। जब कंस अपनी बहन का विवाह करके लौट रहा था, तब एक आकाशवाणी हुई , "हे कंस, तुम्हारी प्यारी बहनकी अष्टम संतान , तुम्हारी मृत्यु का कारण होगी।" इस कारण कंस ने अपनी बहन को बंदी बना लिया।

जिस क्षण देवकी किसी भी बच्चे को जन्म देती, कंस तुरंत उस बच्चे को मौत के घात उतार देता था। जब देवकी ने आठवें बच्चे, श्रीकृष्ण को जन्म दिया, तब भगवान विष्णु की माया से कारागृह  के ताले टूट गए और भगवान कृष्ण के पिता वासुदेव  उन्हें गोकुल में नंद बाबा के महल में छोड़ आये| वहां एक लड़की जन्मी थी। वह लड़की देवी योगमाया का अवतार थी। वासुदेव उस लड़की को लेकर वापस कारागृह में आ गए। कंस ने उस लड़की को देखा और उसे मारने की इच्छा से उसने उसे फर्श पर पटक दिया। जैसे ही उसे नीचे फेंका, वह लड़की हवा में उछल पड़ी और बोली, "कंस, तुम्हारा काल यहाँ से चला गया है। वह कुछ समय बाद तुम्हें नष्ट कर देगा। मैं सिर्फ एक माया हूँ।" कुछ वर्ष बाद ऐसा ही हुआ। भगवान श्रीकृष्ण उसी महल में आए और उन्होंने कंस का वध किया।

श्रीकृष्ण के मस्तक पर मोर पंख का महत्व/ Importance of Peacock Feather on Sri Krishna's Head

एक राजा अपनी प्रजा के हर सुख दुःख के लिए जिम्मेदार होता है। इन उत्तरदायित्वों का भार वह मुकुट के रूप में अपने सिर पर धारण करते हैं। लेकिन, श्रीकृष्ण ने अपने सभी कर्तव्यों को एक खेल की तरह सहजता से पूरा किया। जैसे एक मां अपने बच्चों की देखभाल करना बोझ नहीं समझती। इसी तरह, श्रीकृष्ण अपनी जिम्मेदारियों को बोझ नहीं मानते। वह मोर के मुकुट (जो बहुत हल्का भी होता है) के रूप में अपने सिर पर विभिन्न रंगों के साथ इन जिम्मेदारियों को बहुत जल्दी से वहन करते है। श्रीकृष्ण हम सभी में एक आकर्षक और आनंदमय प्रवाह हैं। जब मन में कोई बेचैनी, चिंता या इच्छा न हो, तभी हमें गहरा विश्राम मिल सकता है, और गहरे विश्राम में ही श्रीकृष्ण का जन्म होता है

जन्माष्टमी कैसे मनाई जाती है/ How is Janmashtami Celebrated

जन्माष्टमी/krishna janmashtami 2024 भिन्न-भिन्न जगहों पर अलग-अलग तरीके से मनाई जाती है। कई स्थानों पर इसे फूलों की होली के रूप में मनाते हैं और इसके साथ ही देश के विभिन्न प्रान्तों में रंगों की होली भी खेली जाती है। श्रीकृष्ण के जन्म की नगरी मथुरा में जन्माष्टमी बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाई जाती है। श्रीकृष्ण को मक्खन और दूध अति-प्रिय था क्योंकि उनके पास गांव का मक्खन हुआ करता था, जिसे वह चुराते थे। एक दिन उन्हें माखन की चोरी करने से रोकने के लिए उसकी माता यशोदा को उन्हें एक खंभे से बांधना पड़ा और इसी कारण भगवान कृष्ण का नाम माखन चोर पड़ा। वृंदावन में लोगों ने मक्खन की मटकी को ऊंचाई पर टांगना प्रारम्भ कर दिया ताकि वह कृष्ण के हाथ से दूर रहे । फिर भी नटखट कृष्ण की समझ के आगे यह योजना भी निरर्थक साबित हुई, माखन चुराने के लिए श्री कृष्ण ने अपने बाल-सखाओं के साथ एक योजना बनाई और उन्होंने मटकी से दही और माखन चुरा लिया, जो ऊंचाई पर लटका हुआ था। यहीं से दही-हांडी का त्योहार का शुभारम्भ हुआ।

श्रीकृष्ण के अन्य नाम का अर्थ- "माखन चोर।"/ The meaning of Sri Krishna's Other Name- "Makhan Chor." 

श्रीकृष्ण को माखन चोर भी कहा जाता है। दूध पोषण का स्रोत है, और दही दूध का ही एक रूप है। दूध को मथने से मक्खन बनता है और ऊपर तैरने लगता है । यह हल्का और स्वस्थवर्धक  होता है। जब हमारी बुद्धि जाग्रत होती है तब वह मक्खन के समान हो जाती है। तब चेतना में ज्ञान का उदय होता है। और व्यक्ति अपने आप को समझने में सक्षम हो जाता है। वह इस संसार में रहते हुए अनासक्त रहता है। उसकी चेतना संसार की बातों और व्यवहार से निराश नहीं होती। माखनचोरी की लीला श्री कृष्ण के प्रेम की महिमा के चित्रण का प्रतीक है। श्रीकृष्ण का आकर्षण और कौशल इतना गहरा है कि वह सबसे धैर्यवान व्यक्ति की चेतना भी चुरा लेते हैं।

दही-हांडी के पीछे क्या मान्यता है?/ What is the belief behind Dahi-Handi?

दही-हांडी का उत्सव  मनाने के पीछे मान्यता यह है कि भगवान कृष्ण को मक्खन बहुत पसंद था। अपने बालरूप में, वह पड़ोसी के घर से मक्खन चुराते थे। इसलिए, उन्हें "माखन चोर" के रूप में विख्यात हुए। भगवान कृष्ण सभी लोगों के घरों से मक्खन की चोरी करते थे, जिससे माता जशोदा को बहुत परेशानी होती थी। इसके लिए माता यशोदा ने सभी पड़ोसियों को अपनी दही-हांडी ऊंचाई पर बांधने की सलाह दी। परन्तु फिर भी, भगवान कृष्ण अपने सखाओं के साथ मानव श्रृंखला बनाकर हांडी तक पहुंच जाते  हैं और हांडी तोड़कर माखन और दही आपस में बांट लेते हैं। इसी वजह से जन्माष्टमी पर कई जगहों पर दही-हांडी का उत्सव बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। जन्माष्टमी के दिन लोग अपनी गलियों में दही-हांडी प्रतियोगिता करते हैं; फिर लोग मटकी तोड़ने के लिए एक श्रंखला बना कर उस तक पहुंच जाते हैं और उसे तोड़ देते हैं|   यह मुख्य रूप से भारत के राज्य गुजरात और महाराष्ट्र में देखी जाती है।

जन्माष्टमी पर रोहिणी नक्षत्र का महत्व/ The importance of Rohini Nakshatra on Janmashtami

भगवान कृष्ण का जन्म भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र/ RohiniNakshatra on Janmashtamiमें हुआ था। रोहिणी नक्षत्र की इस तिथि के कारण इसे कृष्ण जन्माष्टमी के नाम से जाना जाता है। अब चूंकि भगवान कृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ था, इसलिए जन्माष्टमी के निर्धारण में रोहिणी नक्षत्र की स्थिति बेहद महत्वपूर्ण है।

जन्माष्टमी मध्य रात्रि को मनाई जाती है/ Birthday Celebrations happen at 12 on Janmashtami.

तिथि के अनुसार भगवान कृष्ण का जन्म भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को अर्धरात्री में हुआ था, इसलिए घरों और मंदिरों में आधी रात को भगवान कृष्ण की जयंती मनाई जाती है। रात में जन्म के बाद दूध से लड्डू गोपाल की मूर्ति को स्नान कराकर श्रीकृष्ण को नए और सुंदर वस्त्र पहनाए जाते हैं और उनका श्रृंगार किया जाता है। फिर, उन्हें पालने में बैठाया जाता है, और फिर पूजन के उपरान्त , चरणामृत, पंजीरी, ताजे फल, पंचमेवा आदि का भोग लगाया जाता है, जिसे तदोपरांत प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।

संतान प्राप्ति में फलदायी है जन्माष्टमी पर्व/ Janmashtami Festival is Fruitful in Having Children

जन्माष्टमी का त्योहार पर लोग व्रत/janmashtami vrat रखते हैं और पूजा करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस पर्व को मनाने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। जिन लोगों का चंद्रमा कमजोर है उन्हें इस दिन विशेष पूजा करने से लाभ मिल सकता है। इस दिन श्रीकृष्ण पूजा करने से लोगों को संतान, लंबी आयु और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

जन्माष्टमी पर झूला झूलने से होती है हर मनोकामना पूरी Every Wish Gets Fulfilled by Swinging on Janmashtami 

ऐसी मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से कई व्रतों का फल मिलता है। हमारे शास्त्रों में कृष्ण जन्माष्टमी को "व्रत राजा" कहा गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बाल गोपाल को झूला झूलाने का विशेष महत्व है, और इस दिन लोग भगवान कृष्ण को झूला झूलाने के लिए उत्साहित होते हैं। यदि कोई व्यक्ति भगवान को पालने में झूला देता है, तब उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

जन्माष्टमी का व्रत कैसे रखें/ How to keep the fast of Janmashtami

जन्माष्टमी पर, भक्त पूरे दिन उपवास रखते हैं और भगवान का आशीर्वाद लेते हैं; पूजा करते हैं। जन्माष्टमी का उपवास रखने के अपने नियम हैं। जो लोग जन्माष्टमी पर उपवास रखना चाहते हैं उन्हें जन्माष्टमी के एक दिन पहले केवल एक बार भोजन करना चाहिए। जन्माष्टमी की सुबह स्नान के उपरान्त भक्त व्रत का संकल्प लेते हैं और अगले दिन रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि की समाप्ति के बाद उपवास खोलते हैं।

जन्माष्टमी पूजा के नियम/ Rules of Janmashtami Puja

जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने का विधान है। 

यदि आप भी जन्माष्टमी का व्रत/janmashtami vrat कर रहे हैं तो इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण की पूजा/Gokulashtami Puja/ करें।

  • सुबह स्नान के उपरान्त निर्मल वस्त्र धारण करें |
  • यह पूजा हमेशा मुहूर्त/Puja Muhurt के अनुसार करनी चाहिए  |
  • जन्माष्टमी पर, बाल कृष्ण की स्थापना होती है (ठाकुरजी या लड्डू गोपाल)। कृष्ण जी की स्थापना आप अपनी इच्छानुसार किसी भी रूप में कर सकते हैं।
  • इसके अतिरिक्त घर के मंदिर में सर्वप्रथम कृष्ण जी या ठाकुर जी की मूर्ति को गंगाजल से स्नान कराएं।
  • इसके पश्चात दूध, दही, घी, चीनी, शहद और केसर से निर्मित पंचामृत से मूर्ति का स्नान करें।
  • अब शुद्ध जल से स्नान करें। शास्त्रों में लिखा है कि शंख से स्नान करना उत्तम होता है।
  • बाल-गोपाल की मूर्ती को नए कपड़े पहनाएं, उसे पीले रंग के कपड़े पहनाएं और उसे सजाएं।
  • श्रीकृष्ण के झूले को फूलों से सजाया जाना चाहिए । इसके लिए आप पारिजात और वैजयंती के पुष्पों से सजा सकते हैं। कृष्ण के जन्म के बाद उन्हें झूला बनाया जाता है।
  • श्रीकृष्ण जी के भोग के लिए पंचामृत बनाकर उसमें तुलसी के पत्ते, मेवा, माखन और मिश्री डाल दें। आप अपनी क्षमता के अनुसार धनिये की पंजीरी बनाकर 56 भोग लगा सकते हैं.
  • जहां तक ​​हो सके यह व्रत धैर्य और नियमों का पालन करते हुए करना चाहिए। अस्वस्थ लोगों को व्रत नहीं रखना चाहिए।
  • भगवान कृष्ण का जन्म उत्सव मध्यरात्रि में मनाया जाता है । भक्तों को यह पूरी रात जागकर बितानी चाहिए और भजन-कीर्तन करना चाहिए।
  • अर्धरात्री को लड्डू गोपाल को भोग लगाकर उनकी पूजा करें और फिर आरती करें।
  • अगले दिन सुबह अन्न का सेवन करें। अगर कोई इससे पहले भोजन करना चाहता है, तो वह भगवान की जयंती मनाने और मध्यरात्रि में प्रसाद ग्रहण करने के बाद ऐसा कर सकता है।

कृष्ण जन्माष्टमी व्रत सभी पापों को नष्ट करता है। इस व्रत का निर्वहन सभी नियमों और धैर्य के साथ इसका पालन करने से इंद्रलोक परलोक में आध्यात्मिक सुख प्राप्त करने में सहायता मिलती है।

श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। जैसे ही उनका जन्म हुआ, कारागार में चारों ओर एक दिव्या-प्रकाश की आभा फैल गई। वासुदेव-देवकी के समक्ष , शंख, चक्र, गदा और कमल के फूल धारण करने वाले चतुर्भुज भगवान ने अपना रूप प्रकट किया और कहा, अब मैं एक बालक का रूप लेता हूं। आप मुझे तुरंत गोकुल में नंद के पास ले जाएं और उस लड़की को कंस को सौंप दें जो अभी-अभी पैदा हुई है। वासुदेव ने वैसा ही किया और उस कन्या को कंस को सौंप दिया। कंस ने जब उस कन्या को मारना चाहा तो वह उसके हाथ से छूट कर आकाश में उड़ गई। उसने देवी का रूप धारण किया और कहा, "मुझे मारने का क्या लाभ ? तुम्हारा काल गोकुल तक पहुंच गया है"। यह देखकर कंस चकित हो गया। कंस ने श्रीकृष्ण को मारने के लिए कई असुरों को गोकुल में भेजा। श्रीकृष्ण ने अपनी अलौकिक माया से उन सभी का वध किया। वृद्ध होने पर उसने कंस का वध किया और कंस तथा देवकी के पिता उग्रसेन को राज्य सौंप दिया ।

भगवान कृष्ण को क्यों चढ़ाया जाता है छप्पन भोग/ Why Lord Krishna is offered 56 Bhog

जन्माष्टमी/ Krishna Janmashtami पर भगवान कृष्ण को छप्पन भोग लगाने का रिवाज है। धार्मिक मान्यता है कि छप्पन भोग से भगवान कृष्ण प्रसन्न होते हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। आइए, जानते हैं छप्पन भोग के पीछे का कारण-

जब भगवान कृष्ण नंदलाल और माता यशोदा के साथ गोकुल में रहते थे, तो उनकी मां उन्हें दिन में आठ बार अपने हाथों से खाना खिलाती थीं। एक बार, ब्रजवासी इंद्र की पूजा के लिए एक बड़े समारोह का आयोजन कर रहे थे। कृष्ण ने नंद बाबा से पूछा कि अनुष्ठान के पीछे क्या कारण है। तब, नंद बाबा ने कहा कि देवराज इंद्र इस पूजा से प्रसन्न होंगे, और वर्षा करेंगे। कृष्ण जी ने कहा कि वर्षा भेजना इंद्र का कर्तव्य है, तो इसके लिए उनकी पूजा करने की आवश्यकता क्यों है। यदि पूजा करनी है तब गोवर्धन पर्वत की पूजा करें क्योंकि उनसे हमें फल और सब्जियां मिलती हैं और जानवरों को चारा मिलता है।

फिर, सभी को कृष्ण की सलाह पसंद आई और सभी ने इंद्र की पूजा करने के बजाय गोवर्धन की पूजा प्रारम्भ कर दी । इंद्र ने इसे अपमान माना, और वह क्रोधित हो गए। क्रोधित इंद्र ने ब्रज में भारी बारिश भेजी, हर जगह पानी भर गया था। यह देखकर ब्रज के लोगों के मन में भय व्याप्त हो गया, तब कृष्ण ने उनसे कहा, "चलो गोवर्धन की शरण में चलते हैं। केवल वही इंद्र के प्रकोप से हमारी रक्षा कर सकते हैं।" कृष्ण ने अपनी छोटी उंगली से गोवर्धन पर्वत को उठा लिया और समस्त से ब्रज की रक्षा की। भगवान कृष्ण सात दिनों तक बिना कुछ खाए गोवर्धन पर्वत को उठाये रहे। जब आठवें दिन बारिश थम गई और सभी ब्रजवासी पर्वत की नीचे से  निकल आए, और उसके बाद, सभी ने सोचा कि कृष्ण ने सात दिनों तक बिना कुछ खाए गोवर्धन पर्वत को पकड़कर हमारी रक्षा की।

फिर माता यशोदा ने कन्हैया और ब्रजवासियों के लिए सात दिन सहित आठ पहर तक छप्पन प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन बनाए। कई भक्त बीस प्रकार की मिठाइयाँ, सोलह प्रकार के नमकीन और बीस प्रकार के सूखे मेवे चढ़ाते हैं। छप्पन भोग में आमतौर पर माखन मिश्री, खीर, बादाम दूध, टिक्की, काजू, पिस्ता, रसगुल्ला, जलेबी, लड्डू, रबड़ी, मठरी, मालपुआ, मोहनभोग, चटनी, मूंग दाल का हलवा, पकोड़ा, खिचड़ी, बैंगन की सब्जी, लौकी की सब्जी, पुरी, मुरब्बा, साग, दही, चावल, इलायची, दालें, कढ़ी, घेवर, चीला और पापड़ शामिल होते हैं। 

छप्पन भोग के संबंध में एक और मान्यता है कि गो लोक में भगवान श्रीकृष्ण राधा जी के साथ कमल पर विराजमान हैं। उस कमल की तीन परतें हैं। पहली परत में आठ और दूसरी परत में सोलह, तीसरी परत में बत्तीस पंखुड़ियां हैं। प्रत्येक पंखुड़ी पर एक धुरी सखी होती है, और भगवान बीच में विराजमान होते हैं। इस प्रकार, संख्या में छप्पन पंखुड़ियाँ हैं। यहाँ छप्पन अंक का यही अर्थ है। इसलिए, भगवान कृष्ण अपनी सखियों की संगति में छप्पन भोगों से संतुष्ट होते हैं।

क्यों रखा जाता है जन्माष्टमी का व्रत?/ Why Janmashtami fast is observed?

जन्माष्टमी के दिन व्रत रखकर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है। व्रत/ janmashtami vratका पालन इसलिए किया जाता है ताकि भगवान की पूजा करते समय हमारा चेतन, शरीर और विचार तीनों शुद्ध रहें। जब पूजा स्पष्ट सचेत और नेक विचारों से की जाती है, तो वह हमें शांति प्रदान करती है। जन्माष्टमी पर व्रत रखने का महत्व सिर्फ कृष्ण के जन्म से ही नहीं जुड़ा है, इसके चार प्राथमिक कारण हैं।

1) अष्टमी तिथि। अष्टमी तिथि को जया तिथि के नाम से भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है दिल जीतने की तिथि। इस दिन व्रत रखकर भगवान की पूजा करने से व्यक्ति को उसके सभी प्रयासों में विजय प्राप्त होती है।

2) अष्टमी तिथि के स्वामी शिव हैं और इसी दिन भगवान विष्णु ने भी अवतार लिया था। यह दो प्रमुख देवताओं के पूजन का दिन है।

3) मांसाहारी ना खाने और सिर्फ फलाहार करने से शरीर शुद्ध हो जाता है। उपवास के दौरान मन में सांसारिक विचार नहीं आते और चेतन ईश्वर भक्ति में लीन रहता है।

4) हमें भगवान श्रीकृष्ण के ज्ञान को अपने जीवन में अपनाना चाहिए । आतम-शुद्धि के बगैर ज्ञान प्राप्त करना संभव नहीं है। इसलिए इस दिन भोजन का त्याग कर असत्य, भौतिक सुख और हिंसा जैसी भावनाओं से दूर रहना चाहिए।

जन्माष्टमी विदेशों में भी मनाई जाती है/ Janmashtami is celebrated in Foreign Countries Too.

न केवल भारत में बल्कि विदेशों में रहने वाले भारतीय जन्माष्टमी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाते हैं। मथुरा के कारागार  में, श्री कृष्ण ने अपने क्रोधी मामा कंस का नाश करने के लिए माता देवकी के गर्भ से आधी रात को जन्म लिया था। इस लिहाज से इस दिन को पृथ्वी पर भगवान कृष्ण के अवतार का दिन माना जाता है। विदेशों में भी इस दिन भव्य कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।

जन्माष्टमी पर मथुरा में धूमधाम से प्रदर्शन होता है/ Pomp and show happen in Mathura on Janmashtami.

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर दूर-दूर से श्रद्धालु भगवान कान्हा की दीप्तिमान प्रतिमा के दर्शन के लिए मथुरा पहुंचते हैं। इस दिन पूरी मथुरा नगरी कृष्णभावनामृत हो जाती है। इसलिए कृष्ण जन्माष्टमी/ Krishna Janmashtami के अवसर पर मथुरा भक्ति के रंगों से जगमगा उठता है।

जन्माष्टमी पर झाँकी की सजावट/ The Decoration of Jhanki on Janmashtami

जन्माष्टमी को लोग उत्साह और उमंग के साथ मनाते हैं। पूजा और व्रत के साथ-साथ इस दिन घरों और मंदिरों में भी झाँकी सजाई जाती है। इन झांकियों  में श्रीकृष्ण के बचपन की लीलाओं और समस्त जीवन काल का चित्रण किया जाता है । चूंकि भगवान का जन्म कारागार में हुआ था, इसलिए कई पुलिस लाइनों में आज भी भगवान की खूबसूरत झाँकी सजाई जाती  हैं। इसके अतिरिक्त लोग अपने घरों में सुंदर झाँकी स्थापित करते हैं।

जन्माष्टमी पूजा में इन चीजों को शामिल करें / Include these items in Janmashtami Puja

1. तुलसी पूजा का है विशेष महत्व

जन्माष्टमी के दिन तुलसी पूजा का विशेष महत्व है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन शाम के समय तुलसी की पूजा के साथ-साथ उसमें घी का दिया जलाने से भी लाभ होता है। अगर आपके घर में तुलसी का पौधा नहीं है तो किसी मंदिर में जाकर दीपक जलाएं। कभी भी किसी दूसरे के घर की तुलसी की पूजा न करें।

2. पान के पत्ते को शामिल करना शुभ होता है

जन्माष्टमी के दिन कृष्ण पूजा में पान के पत्ते का विशेष महत्व है। ऐसा माना जाता है कि पूजा में पान के पत्ते को शामिल करने से हमें देवी लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। ज्योतिषियों के अनुसार पूजा में एक पान के पत्ते पर "ॐ वासुदेवाय नमः' लिखकर श्रीकृष्ण को अर्पित करें। ऐसा करने से पूजा फलदायी होती है।

3. माखन के बिना अधूरी है जन्माष्टमी पूजा

नंद के लाल गोपाल को माखन बहुत प्रिय है। इसलिए, पूजा में माखन को अवश्य शामिल करें । अपने बाल रूप में, भगवान कृषण गोपियों से माखन चुराते थे क्योंकि वह माखन खाने के शौकीन थे। इसलिए नंद लाल की पूजा में माखन मिश्री को भोग के रूप में अवश्य शामिल करें।

4. मोर पंख भी आवश्यक है 

भगवान कृष्ण सदा-सर्वदा अपने सिर पर मोर पंख लगाते हैं। मोर पंख उनके सिर की सुंदरता को बढ़ाता है और उनके अलंकरण का एक एक महत्वपूर्ण अंग है। इसलिए जन्माष्टमी पूजा में भगवान कृष्ण को मोर पंख अवश्य अर्पित करें ।

5. पूजा में पारिजात के फूलों का विशेष महत्व

भगवान श्री हरि विष्णु और माता लक्ष्मी को पारिजात के फूल अति प्रिय हैं और कृष्ण जी विष्णु के अवतार हैं। इसलिए पारिजात के फूलों को जन्माष्टमी के दिन पूजा में जरूर शामिल करना चाहिए।

6. बांसुरी के बिना अधूरी होगी पूजा

भगवान कृष्ण बांसुरी से भी अत्याधिक प्रेम करते हैं। उनकी बांसुरी की धुन सुनकर गोपियां प्रसन्न हो जाती थीं और अपना सारा काम-काज छोड़कर कृष्ण के पास चली जाती थीं। बांसुरी के बिना कृष्ण की तस्वीर भी अधूरी है। जन्माष्टमी पर कृष्ण जी को चांदी की बांसुरी चढ़ाएं। साथ ही पूजा के उपरान्त बांसुरी को अपने बटुए या उस स्थान पर रख दें जहां पैसा रखा गया है.

7. राखी से रक्षा का वर मांगें

रक्षाबंधन का पर्व असाधारण है। रक्षाबंधन के दिन से आठवें दिन तक राखी बांधी जा सकती है। इसलिए जन्माष्टमी के दिन भगवान कृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम को राखी बांधें। इससे आपको भगवान कृष्ण की विशेष कृपा प्राप्त होगी।

8. शंख में दूध से अभिषेक करें

जन्माष्टमी/ janmashtami 2021 के दिन दूध लेकर भगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप का अभिषेक करें। ऐसा करने से आपकी  हर मनोकामना पूर्ण होगी।

9. बछड़े की मूर्ति दूर करती है परेशानियां

कृष्ण जी को ग्वाल के नाम से जाना जाता है। अपने बचपन में श्रीकृष्ण ने गायों और बछड़ों के साथ कई लीलाएं की हैं। इसलिए जन्माष्टमी के दिन गाय और बछड़ों की छोटी-छोटी मूर्तियाँ लाएँ। ऐसा करने ससे आर्थिक कठिनाइयों और बच्चों से संबंधित समस्याओं को हल किया जाता है।

जन्माष्टमी पर क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए?/ What should be done and what should not be done on Janmashtami?

  • ऐसी मान्यता है कि जन्माष्टमी के व्रत से एक रात पहले सादा भोजन करें और अगले दिन ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करना चाहिए।
  • व्रत के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करके श्रीकृष्ण का ध्यान करना चाहिए।
  • भगवान के ध्यान के उपरान्त , उनके उपवास का संकल्प लेकर गोकुलाष्टमी पूजा/ Gokulashtami Puja की तैयारी शुरू करनी चाहिए।
  • इस दिन भगवान श्रीकृष्ण को माखन मिश्री तथा , पान, नारियल से बनी मिठाई का भोग लगाएं।
  • हाथों में जल, फूल, गंध, फल, कुश लेकर इस मंत्र का पाठ करना चाहिए:

           ममखिलपाप्रशमन पूर्ववक स्वाभिष्ट सिद्धये

          श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतमहं करिश्ये।

  • आधी रात को प्रभु का जन्म उत्सव मनाएं । इसके बाद पंचामृत से उनका अभिषेक करें। उसे नए कपड़े पहनाएं और सजाएं|
  • भगवान को चंदन का तिलक करें और भोग लगाएं। उनके भोग में तुलसी अवश्य डालनी चाहिए।
  • नंद के आनंद भयो जय कन्नैया लाल की का उच्चारण करते हुए कृष्ण को झूला झुलाना चाहिए|
  • घी और अगरबत्ती से बने दीये से भगवान कृष्ण की आरती करें और पूरी रात उनके  भजन गाएं।

जन्माष्टमी पर ऐसा ना करें/Do not do on Janamashtami

जन्माष्टमी का व्रत/ janmashtami vrat करने वाले व्यक्ति को एक दिन पहले ही अच्छे आचरण का अभ्यास करना चाहिए। जो लोग उपवास नहीं रखते हैं उन्हें लहसुन, प्याज, बैगन, मांस-शराब, सुपारी- मेवा और तंबाकू से बचना चाहिए। व्रत करने वाले व्यक्ति को भगवान कृष्ण का ध्यान करना चाहिए और यौन, विलासिता से परिपूर्ण भावनाओं से दूरी बना लेनी चाहिए। साथ ही मूंग और मसूर की दाल के सेवन से भी दूर रहना चाहिए। नकारात्मक सार को प्रवेश न करने दें।

जन्माष्टमी पर पूजा स्थल को फूलों से सजाएं/ Decorate the Puja Place with flowers on Janmashtami 

अपने घर में मौजूद मंदिर या पूजा स्थल को सजाने के लिए आप फूलों का प्रयोग  कर सकते हैं। गेंदे के फूलों से सजाने के बजाय आप अपने पूजा स्थल को सजाने के लिए चमेली और मोगरा के फूलों का उपयोग कर सकते हैं क्योंकि भगवान कृष्ण को यह फूल अति-प्रिय हैं। आप चाहें तो इन फूलों की एक विशाल माला बनाकर बाल गोपाल के झूले पर सजा सकते हैं।

जन्माष्टमी पर पूजा स्थल को रंग-बिरंगी रोशनी से सजाएं/ Decorate the Puja Place with Colourful Lights on Janmashtami

आप चाहें तो फूलों के अतिरिक्त पूजा स्थल और मंदिर को रोशनी से सजा सकते हैं। लाल, हरा, नीला, पीला, सफेद, जो भी रंग आपको पसंद हो, उस रंग को अपने पूजा स्थल और मंदिर में स्थापित करें और उन्हें शानदार ढंग से सजाएं।

आप हमारी वेबसाइट से अन्य भारतीय त्योहारों, लोकप्रिय व्रत तिथियों के बारे में भी पढ़ सकते हैं।

गणेश चतुर्थी
07 Sep, 2024

भारत के कई राज्यों में गणेश चतुर्थी/ Ganesh Chaturthi 2024 को बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने घरों में सबसे पहले भगवान गणेश जी की स्थापना पूरे जश्न के साथ करते हैं। जो व्यक्ति गणेश जी की पूजा सच्चे मन से करते हैं वह उनकी सभी बाधाओं को दूर करते हैं। इसी कारण गणेश जी को विघ्नहर्ता भी कहा जाता है। घरों में उनके स्थापना के साथ उनका विसर्जन भी बहुत धूमधाम से होता है। सनातन धर्म में गणेश जी का विशेष महत्व है। कई पुराणों और वेदों में भगवान गणेश को गजानना या विघ्नहर्ता के नाम से भी जाना गया है। गणेश जी अपने भक्तों को ऋद्धि-सिद्धि और सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं। शास्त्रों के अनुसार, गणपति बप्पा अपने भक्तों को मुसीबत, कष्टों, गरीबी और बीमारियों से मुक्त कर उनके जीवन में खुशहाली भर देते हैं। इस दिन को गणेश उत्सव के नाम से भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है गणेश चतुर्थी का उत्सव। दसवें दिन सभी भक्त गणपति बप्पा को पूरे रिवाज से विदाई देते हैं। अनंत चतुर्दशी के दिन भक्त रंगो और नाचते झूमते गणेश जी की मूर्ति का विसर्जन करते हैं।
गणेश चतुर्थी भाद्रपद की शुक्ल चतुर्थी को मनाई जाती है। ऐसी मान्यता है कि गणेश जी का जन्म भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी को मध्याह्न, सोमवार, स्वाति नक्षत्र और सिंह लग्न में हुआ था, इसी कारणवश इस चतुर्थी को मुख्य रूप से गणेश चतुर्थी या विनायक चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। भारत के कई क्षेत्रों में इसे डंडा चौथ के नाम से भी जाना जाता है।
विशेष रूप से इस पर्व को महाराष्ट्र, पश्चिमी भारत में बड़ी आस्था और धूमधाम के साथ मनाया जाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार गणेश जी को नाम विघ्नहर्ता के नाम से भी जाना जाता है। इन दस दिनों के दौरान गणेश की पूजा श्रद्धा और नियमों के अनुसार की जाती है। भगवान गणेश अपने भक्तों के जीवन में सभी बाधाओं को समाप्त करते हैं और अपने उन पर आशीर्वाद और सुख समृद्धि की वर्षा करते हैं।

गणेश चतुर्थी का महत्व/Importance of Ganesh Chaturthi 2024

पौराणिक कथाओं के अनुसार, गणेश जी का जन्म देवी पार्वती के शरीर के तत्व से हुआ था। माता पार्वती ने गणेश जी को घर के द्वार पर खडा कर अपना रक्षक बनाकर स्नान करने चली गईं था। शिव जी को इस बात का ज्ञात नहीं था। उन्होंने गणेश जी को पार्वती से मिलने के मार्ग में विरोधी समझ कर उनका सिर धड़ से अलग कर दिया। तब पार्वती जी बहुत क्रोधित हो गई| जब शिव जी को वास्तविकता का पता चला, तो उन्होंने वहां मौजूद सभी लोगों को आदेश दिया कि वह किसी ऐसे बच्चे का सिर काटकर ले आए जिसकी माँ की पीठ उसके बच्चे की तरफ है।

जब शिव की प्रजा को एक हाथी का पुत्र उस अवस्था में मिला तो वह उसका सिर ले आए और शिव जी ने हाथी का सिर बालक के सिर पर लगा कर उसे जीवित कर दिया। यह सारी घटना भाद्र मास की चतुर्थी को हुई थी। इसलिए इस तिथि को गणेश चतुर्थी माना जाता है, और ऐसा माना जाता है कि इसी दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था। गणेश जी को आशीर्वाद प्राप्त है कि उन्हें सभी देवताओं में प्रथम पूजनीय माना जाएगा। इस दिन गणपति बप्पा को घर में लाने से उनके सभी भक्तों की बाधाएं और मुश्किलें दूर हो जाती हैं। इसी कारण उन्हें विघ्नहर्ता के नाम से भी पूजा और जाना जाता है। गणेश चतुर्थी के अवसर पर लोग गणेश जी को अपने घर में बड़े धूमधाम से लाते हैं और ग्यारह दिन तक उनकी पूजा करते हैं। ग्यारहवें दिन बडे धूम धाम से उनका विसर्जन होता है। किसी भी कार्य को शुरू करने से पहले गणेश जी की पूजा की जाती है।

बप्पा सभी देवों के स्वामी है। इसी कारण उन्हें गणपति के नाम से भी जाना जाता है। गणेश चतुर्थी को विनायक चतुर्थी भी कहते हैं। इसे कई जगहों पर डंडा चौथ भी कहा जाता है। गणेश जी को कई नामों से जाना जाता है। उन्हें ज्ञान-बुद्धि प्रदान करने वाला, सभी विघ्नों का नाश करने वाला और मंगल कार्यों को करने वाला माना जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन गणेश जी की विशेष पूजा/ Ganesh Chaturthi Puja की जाती है। जब भी गणेश चतुर्थी मंगलवार के दिन होती है तो इसे अंगारक चतुर्थी/Angarak Chaturthi कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस पर्व के कारण शुद्ध और उदार परिणाम प्राप्त होते हैं। गणेश चतुर्थी/ Ganesh Chaturthi 2024 को ऐसा त्यौहार माना जाता है जो पूरे भारत को एक सूत्र में बांधने का कार्य करता है। यदि हम इतिहास की ओर मुड़ें, तो हमें पता चलता है कि गणेश चतुर्थी की पूजा चालुक्य सातवाहन और राष्ट्ररुक्त के बाद से चली आ रही है। इसका स्पष्ट विवरण आपको छत्रपति शिवाजी के शासनकाल से मिल सकता है जब उन्होंने राष्ट्रीय संस्कृति और एकता को बढ़ावा देने के लिए गणेश वंदना पूजा करना शुरू किया था।

गणेश महोत्सव का इतिहास/History of Ganeshotsav

गणेश चतुर्थी की सटीक तिथि/ Ganesh Chaturthi date कोई नहीं जानता। इतिहास के अनुसार, शिवाजी महाराज के युग (मराठा साम्राज्य के संस्थापक) में, 1630-1680 के दौरान यह पर्व महत्वपूर्ण हो गया था, जिसे बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। उस दौरान इस पर्व को एक सार्वजनिक समारोह के रूप में मनाया जाता था। शिवाजी महाराज के समय में कुलदेवता के रूप में गणेशोत्सव का नियमित रूप से पालन किया जाने लगा। जब पेशवाओं का अंत हुआ तो यह त्योहार एक पारिवारिक उत्सव के रूप में प्रचलित हो गया|1893 में, लोकमान्य तिलक (भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक) के राज में इस पर्व का उत्सव फिर से शुरू किया गया था। गणेश चतुर्थी को एक वार्षिक उत्सव के रूप में मनाया जाने लगा, जिसका लोग पूरे वर्ष बेसब्री से इंतजार करते हैं।

आम तौर पर, लोगों में एकता लाने और ब्राह्मणों और गैर-ब्राह्मणों के बीच समस्या को दूर करने के लिए इस पर्व को राष्ट्रीय त्योहार के रूप में मनाया जाने लगा। ब्रिटिश शासन के दौरान, अपने क्रूर व्यवहार से खुद को मुक्त करने के लिए, महाराष्ट्र के लोगों ने बड़े साहस और राष्ट्रवादी उत्साह के साथ इस पर्व का पालन किया और हर साल इसे धूमधाम से मनाते थे। लोकमान्य तिलक ने गणेश विसर्जन की विधि/ Ganesh Visarjan Vidhi की स्थापना की थी। धीरे-धीरे लोगों ने इस त्योहार को अपनाना शुरू किया और विधि पूर्वक इस पर्व को मनाना शुरू कर दिया। हर वर्ष व्यक्ति पंचांग से गणेश विसर्जन की तिथि Ganesh Visarjan date को देख अपने कार्य करते थे। इस पर्व पर सामूहिक रूप से बौद्धिक भाषण, कविता, नृत्य, भक्ति गीत, नाटक, संगीत उत्सव, लोक नृत्य आदि करते हैं।

गणेश चतुर्थी तिथि/Ganesh Chaturthi date आने से पहले, लोग एक साथ मिलते हैं और इस त्यौहार को मनाने के लिए एक समारोह का फैसला करते हैं और सभी योजना बना कर त्यौहार मनाते हैं।
गणेश चतुर्थी, एक पवित्र हिंदू पर्व है। इस पर्व को भगवान गणेश के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। हिंदू प्राचीन मिथकों के अनुसार, ऐसा माना जाता है कि गणेश जी का जन्म माघ महीने की चतुर्थी (उज्ज्वल पखवाड़ा के चौथे दिन) को हुआ था। तभी से गणेश जी की जन्म तिथि को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाने लगा। आजकल, इस त्योहार को दुनिया भर में मनाया जाता है और इस पर्व को कोई एक धर्म नहीं बल्कि सभी लोग मना रहे हैं।

गणेशोत्सव की समयरेखा/Timeline for Ganeshotsav

जैसा कि पहले बताया गया है कि भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश जी का पर्व मनाया जाता है। गणेश जी के पूजन/ Ganesh Chaturthi Puja के साथ ही गणपति की मूर्ति की स्थापना करने का रिवाज है। लगातार दस दिनों तक उन्हें घर में रखा जाता है और पूरी श्रद्धा से उनकी पूजा की जाती है। अनंत चतुर्दशी या ग्यारहवें दिन लोग गणेश जी का विसर्जन करते हैं। इस दिन, लोग पूरे बाजे और रंगों के साथ गणेश की मूर्ति को विसर्जन के लिए ले जाते है। ढोल बजाते और नाचते गाते गणेश जी के विसर्जन के साथ इस पर्व का समापन होता है। विसर्जन के समाप्त होने का साथ लोग अगले साल आने वाली गणपती महोत्सव/ Ganesh Chaturthi 2024 के बारे में सोचने लग जाते हैं।

गणेश उत्सव कैसे मनाया जाता है?/How is Ganesh Utsav Celebrated?

दस दिनों तक चलने वाला यह पर्व हिन्दुओं की भक्ति का अद्भुत प्रमाण है। इस पर्व के दौरान शिव-पार्वती-नंदन और श्री गणेश की अलग अलग आकार की मूर्ति की स्थापना घरों, मंदिरों और पंडालों में की जाती है। इन मूर्तियों को फिर सजाया जाता है और एक को बुलाया जाता है जो दस दिनों तक बप्पा की पूजा करते हैं। अनंत-चतुर्दशी तक, गणेश की प्रतिमा की हर दिन सभी नियमों के साथ पूजा की जाती है और लड्डू का भोग लगाकर उसे प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। ग्यारहवें दिन, इस मूर्ति का विसर्जन एक स्वच्छ जल या नदी या महासागर में किया जाता है।

गणेश चतुर्थी क्यों मनाई जाती है?/Why is Ganesha Chaturthi Celebrated?

एक बार देवता भगवान शिव के पास पहुंचे और शिव से पूछने लगे कि सभी देवताओं में किसे पूजनीय माना जाए? तब, शिव ने कहा कि जो व्यक्ति पूरी सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा लगाएगा, वह इसी आधार पर सबसे पहले पूजा के योग्य माना जाएगा। इस प्रकार सभी देवता अपने-अपने वाहन में बैठ कर पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिए निकल पड़े। भगवान गणेश का वाहन एक चूहा है और गणेश जी का शरीर विशाल है, वह पृथ्वी की परिक्रमा कैसे कर सकते हैं। फिर, भगवान गणेश ने अपने पिता भगवान शिव और माता पार्वती के चारों ओर तीन चक्कर पूरे किए और हाथ जोड़कर वहीं उन्हीं के सामने खड़े हो गए। तब भगवान शिव ने कहा, "पूरे ब्रह्मांड में गणेश से बड़ा और बुद्धिमान कोई नहीं है।" अपने माता-पिता की परिक्रमा करके सभी लोकों की परिक्रमा पूरी की है। इसी के फल स्वरूप जो व्यक्ति किसी भी कार्य को शुरू करने से पहले गणेश जी पूजा करेगा उसे किसी भी प्रकार की कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ेगा। तभी से, भगवान गणेश सभी देवी-देवताओं के सामने सम्मानित और पूजनीय हो गए, इसलिए किसी भी पूजा से पहले भगवान गणेश की पूजा की जाती है उसके पश्चात ही अन्य सभी देवताओं की पूजा की जाती है। गणेश चतुर्थी मनाने वाले सभी लोग भगवान गणेश की मूर्ति का विसर्जन करते हैं। विसर्जन के साथ ही गणेश उत्सव समाप्त हो जाता है।

गणेश जी को ज्ञान का देवता क्यों कहा जाता है?/Why is Ganesha ji Known as the god of knowledge?

पूरे दुनिया के परिक्रमा की कहानी आपने ऊपर पढा होगा। इस परिक्रमा से पहले देवी पार्वती ने अपने दोनों पुत्रों को एक बात कही थी कि जो भी इस परिक्रमा को सबसे पहले पूरा करेगा उसे भेट के रूप में ज्ञान का फल प्राप्त होगा। जब परिक्रमा खत्म हुई तो गणेश जी विजेता घोषित हुए क्योंकि उन्होंने अपने माता-पिता के चारों तरफ परिक्रमा लगाई जो उनके ज्ञान को दर्शाती है। शिव और पार्वती जी इस वाक्य से प्रभावित हुए, और इसलिए, उन्होंने उसे ज्ञान का फल दिया। 

बप्पा हर मुसीबत को दूर करते हैं। ऐसा माना जाता है कि जिन घरों में दस दिनों तक बप्पा का आदर, सत्कार और पूजा की जाती है, वहां उनकी विशेष कृपा रहती है और ऐसे घरों में कभी भी विपत्तियां नहीं आती हैं। गणेश जी की ही कृपा से सभी कार्य बिना किसी बाधा के पूर्ण होते हैं और सभी की मनोकामनाएं भी पूर्ण होती हैं।

गणेश जी की मिट्टी की मूर्ति की स्थापना

गणेश जी की पूजा/Ganesh Chaturthi Puja सभी देवताओं में सबसे आसान पूजा मानी जाती है। इस पर्व के दिन हर घर में गणेश जी की मिट्टी की मूर्ति की स्थापना होती है। इस पर्व की मान्यता है कि यह शरीर पांच तत्वों से बना है और इन पांच तत्वों में ही विलीन हो जाएगा। इसी मान्यता के आधार पर अनंत चौदस के दिन गणपति जी का विसर्जन किया जाता है और उन्हें विदाई दी जाती है।

यह त्यौहार दस दिनों तक चलता है भाद्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरू होकर यह पर्व दस दिनों तक आनंद चौदस तक चलता है। चतुर्थी पर, गणपति बप्पा हर घर में विराजमान होते हैं, और दस दिनों के बाद, बप्पा की मूर्ति को विसर्जित किया जाता है। ज्यादातर लोग इस पर्व पर गणपति को दस दिन तक घर में बैठते हैं लेकिन कुछ लोग अपनी क्षमता के अनुसार दो-तीन दिन की पूजा के बाद बप्पा को विदा करते हैं। ऐसा करना गलत नहीं है क्योंकि जिसकी जितनी क्षमता होती है, वह उससे अधिक जा कर इस पर्व को मनाता है।

गणेश चतुर्थी व्रत की विधि/ The Vidhi of Ganesha Chaturthi Fast 

  • 1. प्रात:काल स्नान के बाद सोने, तांबे या मिट्टी से बनी गणेश जी की मूर्ति को घर लाएं और स्थापित करें।
  • 2. एक खाली कलश लेकर उसमें पानी भर दें और उसके मुंह को सादे कपड़े से बांधकर उस पर गणेश जी को विराजमान करें।
  • 3. गणेश जी को सिंदूर और दूर्वा चढ़ाएं और उन्हें इक्कीस लड्डू का भोग लगाएं। इनमें से पांच लड्डू भगवान गणेश को चढ़ाएं और बचे हुए लड्डू गरीबों या ब्राह्मणों में प्रसाद के रूप में बांट दें।
  • 4. गणेश जी का पूजन/ Ganesh Chaturthi Puja Muhurat शाम के समय करना सबसे उत्तम माना जाता है। गणेश चतुर्थी कथा/ ganesh chaturthi katha, गणेश चालीसा और आरती का पाठ करने के बाद आँखें नीची करके चंद्रमा को अर्घ्य देना चाहिए।
  • 5. इस दिन गणेश जी की सिद्धिविनायक के रूप में पूजा की जाती है और उस दिन व्रत/ ganeshchaturthivrat रखा जाता है।

गणेश चतुर्थी पर भोग/ The Bhog on Ganesh Chaturthi 

गणेश जी की स्थापना के बाद प्रतिदिन सभी नियम-कायदों के साथ उनकी पूजा की जाती है। फिर उन्हें सुबह और शाम भोग लगाया जाता है। गणेश जी को मोदक सबसे अधिक प्रिय है, इसलिए, उन्हें गणेश चतुर्थी पर मोदक से बना भोग चढ़ाएं।

गणेश चतुर्थी पर गलती से भी चंद्रमा के दर्शन न करें।

एक बार गणेश जी अपने वाहन चूहे पर सवार होकर घूमने निकले परन्तु वह फिसल गए, जिसे देख कर चंद्रमा ने उनका उपहास किया। गणेश जी को क्रोध आ गया और उन्होंने अपने क्रोध में चंद्रमा को शाप दिया कि, "तुम किसी को अपना मुंह नहीं दिखाओगे, और यदि कोई तुम्हें देखा, तो वह पाप का भागीदार बन जाए।" यह कहते ही गणेश जी वहां से चला गए।

इसके पश्चात चंद्रमा उदास हो गया, और वह चिंतित और अपने आप को अपराधी समझने लगे। चंद्रमा ने अपने आप से कहा, "मैंने सर्वगुण संपन्न भगवान के साथ क्या किया"? चंद्रमा को ना देखने के संबंध में सभी देवता भी निराश हो गए। फिर, इंद्र के कहने पर सभी देवता गजानन की पूजा करने लगे। उनकी पूजा से प्रसन्न होकर गणेश जी ने उनसे कोई वर मांगने को कहा|

सभी देवताओं ने कहा, "प्रभु, यह हमारा आपसे अनुरोध है, कृपया चंद्रमा को पहले जैसा बना दें।" गणेश जी ने देवताओं से कहा, "मैं अपना श्राप वापस नहीं ले सकता, लेकिन मैं इसे थोड़ा बदल सकता हूं। जो कोई भी जानबूझकर या अनजाने में भाद्र, शुक्ल, चतुर्थी पर चंद्रमा का दर्शन करता है, वह व्यक्ति शापित होगा, और उसे बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। यदि इस दिन कोई चंद्रमा का दर्शन करता है तो इस पाप से बचने के लिए निम्न मंत्र का पाठ करें-


''सिंह प्रसेनमवधित्सिंहो जाम्बवता हताः
सुकुमारक माँ रोदिस्तव हर्ष स्यामंतक''


तभी सभी देवताओं ने चंद्रमा से कहा, "आपने हंसकर गणेश का अपमान किया है। हमने मिलकर उनसे आपके पापों को क्षमा करने के लिए प्रार्थना की है, हमारे प्रयासों से प्रसन्न होकर गजानन ने केवल एक बार भाद्र शुक्ल चतुर्थी पर अदृश्य रहने का वचन देकर श्राप की ताकत को बहुत कम कर दिया है। आप भी उनका आशीर्वाद प्राप्त करें और फिर ब्रह्मांड को शीतलता प्रदान करें"। यह सुनकर चंद्रमा खुशी खुशी अपने कार्य पर लौट गए।
बाएं दांत वाले गणेश जी की स्थापना करें

श्री गणेश पूजा में श्री गणेश के दांत की दिशा का बहुत महत्व है। ऐसा माना जाता है कि घर में बायीं सूंड वाले गणेश जी की स्थापना करना चाहिए, इससे उस घर में मौजूद लोगों को बहुत सहायता मिलेगी। ऐसा करने से वह तुरंत प्रसन्न हो जाते है जबकि दाहिनी सूंड वाले गणेश जी को प्रसन्न करने में समय लगता है।

भगवान गणेश के बारे में कुछ रोचक तथ्य/ Some Interesting Facts About Lord Ganesha

1.  भगवान गणेश को भगवान शिव और माता पार्वती की पहली संतान माना जाता है।
2.  गणों के स्वामी होने के कारण उन्हें गणपति कहा जाता है।
3.  ज्योतिष में भगवान गणेश को 'केतु का देवता' भी कहा गया है।
4.  उनका नाम 'गजानन' है क्योंकि उनका चेहरा हाथी के आकार का होता है।
5.  उन्हें यह वरदान प्राप्त है कि उनकी पूजा के बिना कोई भी पूजा और कोई भी कार्य पूर्ण नहीं होगा। इसलिए उन्हें 'आदि पूज्य' कहा जाता है और किसी भी कार्य को करने से पहले उनकी पूजा अवश्य करना चाहिए।
6.  भारत में केवल भगवान गणेश की पूजा करने वाले संप्रदाय को 'गणपतये संप्रदाय' कहा जाता है, जो मुख्य रूप से महाराष्ट्र में पाया जाता है। इसके सिवाय कोई समुदाय नहीं है।
7.  गणेश जी की लंबी हाथी जैसी सूंड महा बुद्धित्व का प्रतीक हैं।
8.  शिव मानस शास्त्र में गणेश जी को प्रणव (ॐ) कहा गया है। ऊपरी भाग गणेश जी का मस्तक है, निचला भाग उदर है, चंद्रबिंदु लड्डू है, और मंत्र सूंड है।
9.  कुछ धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि गणेश की एक बहन भी थी जिसका नाम अशोक सुंदरी था।
10.  गणेश जी की दो पत्नियां हैं, जिनका नाम रिद्धि और सिद्धि है।
11.  देवी लक्ष्मी और देवी पार्वती दोनों ही आदि शक्ति यानी देवी दुर्गा हैं। देवी लक्ष्मी की पूजा उनके पुत्र गणेश के बिना नहीं की जाती है क्योंकि लक्ष्मी का मूल्य वही समझ सकता है जिसके पास ज्ञान हो, और गणेश जी को ज्ञान माता पार्वती से ज्ञान का फल प्राप्त है।

भगवान श्री गणेश को कैसे प्रसन्न किया जा सकता है?/ How can Lord Sri Ganesha be Made Happy? 

गणेशोत्सव शुरू होते ही श्री गणेश को प्रसन्न करने के प्रयास तेज होने लगते हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि न्यूनतम उपाय से ही गणेश जी प्रसन्न हो जाते हैं।
जानिए श्री गणेश को प्रसन्न करने के सरल उपाय
1. गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश के नामों का स्मरण करना चाहिए। किसी मंदिर में नियमों के अनुसार पूजा करने से भगवान प्रसन्न हो जाते हैं।
2. इस पर्व के दिन गणेश जी को भोग के रूप में घी और गुड़ का भोग लगाया जाता है। घी और गुड़ का भोग लगाकर गाय को खिलाने से आपको फल की प्राप्त होगी। ऐसा करने से आर्थिक समृद्धि आती है।
3. यदि आपको अपने घर में विरोधी शक्तियां का आभास हो तो गणेश चतुर्थी के दिन सफेद रंग के गणपति की घर के मंदिर में स्थापना करनी चाहिए। यह सभी प्रकार की बुरी शक्तियों का नाश कर आपके घर में सुख और समृद्धि लाता है।
4. इस दिन गणेश जी को दूर्वा चढ़ाएं। हो सके तो दूर्वा से गणेश जी की मूर्ति बना कर उसे अपने घर में स्थापित कर सही मुहूर्त/Ganesh Chaturthi Puja Muhurat पर उनकी पूजा करनी चाहिए।
5. भगवान गणेश को सिंदूर टीका अवश्य लगाना चाहिए। इसके बाद माथे पर तिलक भी करना चाहिए, जिससे आपको अच्छे फल की प्राप्ति होती है।

श्री गणेश के जन्म से जुड़े तीन रोचक प्राचीन मिथक/ 3 Interesting Ancient Myths Related to the Birth of Shri Ganesha 

1.  वराह पुराण के अनुसार, भगवान शिव ने पांच तत्वों से गणेश जी की रचना की। जब भगवान शिव गणेश जी की रचना कर रहे थे, तो उन्हें एक अनोखा और प्यारा रूप मिला। इसके बाद देवताओं को यह समाचार प्राप्त हुआ। इस समाचार को पाते ही सभी देवताएं भयभीत हो गए कि कहीं वह सभी के आकर्षण का केंद्र न बन जाएं। भगवान शिव को इस भय का आभास हुआ, जिसके बाद उन्होंने उनका पेट बड़ा किया और चेहरे को बदल कर हाथी के समान कर दिया।
2.  वहीं, शिवपुराण में कथा इससे बिल्कुल अलग है। इस पुराण के अनुसार माता पार्वती ने अपने शरीर पर हल्दी लगाई थी। जब उन्होंने अपने शरीर से उस हल्दी को निकाला तो उससे एक पुतला बनाया। बाद में उन्होंने उसी पुतले में जीवन डाल दिया। और इस तरह विनायक या विघ्नहर्ता का जन्म हुआ। इसके बाद, देवी पार्वती ने गणेश जी को घर के दरवाजे पर बैठने और उनकी रक्षा करने का आदेश दिया। उन्हें बताया गया कि वह किसी को भी अंदर ना आने दें। कुछ समय बाद, शिव जी घर की और आए, और उन्होंने कहा कि उन्हें पार्वती से मिलना है। गणेश जी ने उन्हें तुरंत मना कर दिया क्योंकि वह नहीं जानते थे कि शिव जी कौन हैं और शिवा जी भी नहीं जानते थे कि गणेश जी कौन थे। दोनों में विवाद हो गया और कठ ही समय में इस विवाद ने युद्ध का रूप ले लिया। इस दौरान शिवाजी ने अपना त्रिशूल निकाला और गणेश जी का सिर धड़ से अलग कर दिया। जब पार्वती को पता चला तो वह बाहर आई और रोने लगी। उसने शिव से कहा कि तुमने मेरे बेटे का सिर काट दिया। शिवा जी ने पूछा कि वह आपका पुत्र कैसे हो सकता है; इसके बाद पार्वती ने शिव जी को अपनी पूरी कहानी सुनाई। परिस्थिति को देखते हुए शिव जी ने पार्वती को से कहा कि मैं आपके पुत्र को फिर से जीवित कर सकता हूं, लेकिन मुझे एक सिर की आवश्यकता है।
फिर उन्होंने सभी से एक बच्चे का सिर लाने को कहा उसकी माँ उसकी तरफ पीठ करके सोई हो। गरुड़ जी हर दिशा में भटकते रहे, लेकिन उन्हें ऐसी कोई मां नहीं मिली क्योंकि हर मां अपने बच्चे के सामने मुंख करके सो रही थी। अंत में एक हाथी दिखाई दिया। उन्हें इस अवस्था में एक हाथी और उसका बच्चा मिला और वह हाथी के बच्चे का सिर ले आए। भगवान शिव ने उस सिर को गणेश जी के शरीर से जोड़ कर उसे जीवित कर दिया। इस तरह गणेश जी को हाथी का सिर मिला।
3.  श्री गणेश चालीसा में वर्णित है कि माता पार्वती ने पुत्र प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या की थी। माता पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर श्री गणेश ने स्वयं एक ब्राह्मण का रूप लिया और उन्हें वरदान दिया कि बिना गर्भ धारण किए ही आपको एक दिव्य और बुद्धिमान पुत्र की प्राप्ति होगी। यह सुनकर माता बहुत प्रसन्न हुई और पालने में एक बालक को देख उसकी खुशी का ठिकाना ना रहा। चारों लोकों में आनंद फैल गया था। भगवान शिव और पार्वती ने एक विशाल उत्सव का आयोजन किया। जिसे देखने के लिए चारों ओर से देवी-देवता, गंधर्व, राक्षस और ऋषि-मुनियों का आगमन होने लगा। वहीं उन्हीं के बीच शनि महाराज भी दर्शन करने आए। माता पार्वती ने उनसे आग्रह किया कि वह उनके बच्चे को आशीर्वाद दें। वहीं शनि महाराज अपनी दृष्टि के कारण पार्वती के बच्चे को देखने से बच रहे थे। माता पार्वती को यह देख बहुत बुरा लगा। उन्होंने शनिदेव से एक प्रश्न पूछ लिया कि क्या आपको बच्चे का आना अच्छा नहीं लगा। शनिदेव बिना कुछ बोले बालक को देखने गए, लेकिन जैसे ही शनि की दृष्टि उस बालक पर पड़ी, तो बालक का सिर आकाश में उड़ गया। त्योहार का माहौल तुरंत मातम में बदल गया। यह देख माता पार्वती चिंतित हो गईं। चारों तरफ अफरातफरी का माहौल था। जल्द ही गरुड़ जी को चारों दिशाओं से सर्वश्रेष्ठ सिर लाने के लिए कहा गया। गरुड़ जी को हाथी का सिर मिला। शंकर जी ने उस सर को बालक के शरीर से जोड़ दिया | इस प्रकार गणेश जी को हाथी का मस्तक प्राप्त हुआ।

गणेश जी की प्रतिमा का विसर्जन क्यों किया जाता है?/Why is the Visarjan of Ganesha Idol Performed

धार्मिक ग्रंथों और पौराणिक कथाओं के अनुसार जब वेदव्यास जी ने दस दिनों तक लगातार भगवान गणेश को महाभारत की कथा सुनाई तो उन्होंने अपनी आंखें बंद कर ली थी। दस दिनों के बाद जब उन्होंने अपनी आँखें खोली तो उन्होंने देखा कि भगवान गणेश का तापमान बहुत बढ़ गया है। उसी समय वेद व्यास जी ने उन्हें पास के कुंड में स्नान कराया। ऐसा करने से उनके शरीर का तापमान कम नीचे आ गया, इसलिए गणपति की स्थापना के बाद अगले दस दिनों तक गणेश जी की पूजा की जाती है और फिर भगवान गणेश की मूर्ति का उत्सव शुरू होने के दसवें दिन विसर्जन कर दिया जाता है। गणेश विसर्जन को एक और नजरिए से भी देखा जा सकता है। यह पर्व इस बात का प्रतीक है कि मानव शरीर धूल से बना है और अंत में उसे धूल में मिल जाना है।

इसी कथा में एक और बात का जिक्र है गणपति जी के शरीर को गर्म होने से बचाने के लिए वेद व्यास जी ने उनके शरीर पर सुगंधित मिट्टी का लेप लगाया जिससे उनके शरीर का तापमान कम होने लगा। लेप सूखने के बाद गणेश जी का शरीर सख्त हो गया। सूखी मिट्टी भी गिरने लगी। फिर व्यास जी ने उन्हें एक ठंडे सरोवर में ले जाकर पानी में स्नान करवाया। जब तक गणेश जी वेद व्यास जी के स्थान पर थे, वेदव्यास जी ने दस दिनों तक श्री गणेश को उनका पसंदीदा भोजन दिया। बस तभी से गणेश जी की मूर्ति की स्थापना और विसर्जन का चलन है। इसी प्रथा में गणेश जी के पसंदीदा भोजन बना कर गरीबों या ब्राह्मणों को खिलाने की प्रथा भी है।

गणेश विसर्जन का महत्व

हिंदू पौराणिक कथाओं में, भगवान गणेश के विसर्जन के पीछे एक अनेक और मजेदार कहानियां हैं। गणेश चतुर्थी/Ganesh Chaturthi का उत्सव मानव जीवन के चक्र का प्रतिनिधित्व करता है: जन्म, जीवन और मृत्यु। ऐसा माना जाता है कि गणेश चतुर्थी के अंतिम दिन, भगवान गणेश अपने माता-पिता के पास कैलाश लौटते हैं। लोग भगवान गणेश की पूजा करते हैं और आशीर्वाद मांगते हैं ताकि वह उन्हें सभी बाधाओं से मुक्त जीवन दें। यह भी माना जाता है कि जब भगवान गणेश घर किसी व्यक्ति के घर से निकलते हैं, तो वह सभी नकारात्मक ऊर्जा और समस्याएं उस व्यक्ति के जीवन से दूर करके जाते हैं।

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार अगर गणेश विसर्जन/Ganesha Visarjan भी शुभ मुहूर्त के अनुसार किया जाए तो यह लाभदायक साबित होता है।

एक चूहा कैसे बना गणेश का वाहन?/ How did a rat become the Vaahan of Ganesha?

गणेश जी का वाहन एक चूहा है। उनकी शारीरिक संरचना की तुलना में उनका वाहन बहुत छोटा प्रतीत होता है। गणेश जी ने एक छोटे से जीव को अपने वाहन के रूप में क्यों चुना? यह प्रश्न अकसर लोगों के मन में आता होगा। यह बात तो सबको पता है कि गणेश ज्ञान और विद्या के अधिष्ठाता देवता हैं। ज्ञान में उनसे ऊपर किसी का दर्जा नहीं है और ना ही कोई उनसे तर्क-वितर्क और वाद-विवाद में उनसे बढ़कर है। आप यह भी कह सकते हैं कि उनका जुनून हर एक चीज या समस्या की गहराई तक जाना, और उस विषय में शोध करना और निष्कर्ष निकालना है। आप मूषक को भी वाद-विवाद में कम नहीं आंक सकते। यह हर वस्तु को कुतरता है और समान रूप से हमेशा सक्रिय रहता है। यह हमेशा सतर्क रहने का संदेश देता है। गणेश जी के पास अपना वाहन चुनना का पूरा अवसर था और उन्होंने चूहे की यह सब विशेषता देखकर ही उसे अपना वाहन चुना।
एक बार गणेश जी को महर्षि पाराशर के आश्रम में आमंत्रित किया गया था। उसी समय एक एक विशाल चूहे ने आश्रम में कदम रखा और सब कुछ नष्ट कर दिया। भगवान गणेश यह सब देख कर उस विशाल चूहे से मिलने और उसे सबक सिखाने का फैसला किया। गणेश जी उससे मिलने पहुंचे। उनके पास 'पाशा' नामक एक हथियार रहता है। जैसे ही उन्होने उस विशाल चूहे के गले की ओर फेंका, वह उसके गले से लिपट कर उस चूहे को गणेश जी के चरणों में ले गया। उस विशाल चूहे ने गणेश जी से माफी मांगी। तब गणेश जी ने उसे अपना वाहन बनाने की पेशकश की और वह मान गया। तभी से ही मूषक देव गणेश जी के वाहन है।

इन वस्तुओं को गणेश जी को अवश्य अर्पित करें।/ These items Must be offered to Lord Ganesha 

मोदक: मोदक एक खास तरह की मिठाई है, जिसे गणेश उत्सव पर खास तौर पर बनाया जाता है। गणेश जी इसे बहुत पसंद करते हैं और मोदक चढ़ाने से भक्तों की मनोकामना भी पूरी है।


हरा दूर्वा: गणेश जी को हरा दूर्वा विशेष रूप से प्रिय है। ऐसा माना जाता है कि हरा दूर्वा उन्हें ताजगी और शीतलता प्रदान करता है।
बूंदी के लड्डू: गणेश जी को बूंदी के लड्डू भी बहुत पसंद हैं। यदि गणपति जी को भोग के रूप में बूंदी के लड्डू चढ़ाए जाते हैं, तो वह अपने भक्तों को धन और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं और उनके घर में खुशियों की कभी कमी नहीं होती है।


श्रीफल: गणेश जी को श्रीफल सभी फलों में प्रिय है। इसलिए गजानन की आरती में श्रीफल का भोग अवश्य लगाया जाता है।


सिंदूर: गणेश जी को प्रसन्न करने के लिए उन पर सिंदूर का तिलक जरूर लगाएं। गणपति जी को सिंदूर का तिलक लगाने के बाद हमें अपने ऊपर भी सिंदूर का तिलक लगाना चाहिए। इससे आपको गणेश जी का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

गांधी जयंती
02 Oct, 2024

गांधी जी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में हुआ । राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का जन्म दिवस  पूरे देश में हर्षोल्लास से मनाया जाता है । बापू के जन्म दिवस पर पूरे देश के विद्यालयों तथा कार्यालयों में कार्यक्रमों  का आयोजन किया जाता है। बापू का पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। बापू, जिन्होंने अहिंसा के सिद्धांतों पर चलते हुए देश को आज़ादी दिलाई, लोगों के दिलों में आज भी जीवित है । गांधीजी को देश की स्वाधीन्ता के लिए कई बार कारावास की सज़ा भी हुई थी । गांधीजी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात में पोरबंदर नामक स्थान पर हुआ था। वह वकालत पढने तथा वकील बनने लन्दन गए थे । गांधीजी को लन्दन में  अपनी पढाई पूर्ण करने के पश्चात वकालत की डिग्री भी प्राप्त हो गयी। जब वह वापस भारत लौटे  तो देश की दशा ने उन्हें इतना द्रवित कर दिया की उन्होने देश की आज़ादी की खातिर एक लम्बी लड़ाई लड़ी। गांधीजी की निरंतर प्रयासों की बदौलत हम आज स्वाधीन हैं ।

देश की आज़ादी में बापू का बहुत बड़ा योगदान है। उन्हें याद करने के साथ-साथ वह उनके द्वारा अपनाई गयी पद्धति को भी याद करते हैं । गांधी जी ने अहिंसा, सत्य और शांति के साथ देश  में एक आंदोलन चलाया। बापू ने इन सिद्धांतों की सहायता से देश को आज़ाद कराया। गांधी जी का मानना ​​था कि, भारत में लोगों के मध्य मतभेदों और एकता की कमी के कारण अंग्रेज़ी औपनिवेशिक शक्तियां देश पर हावी हो सकी । उन्होंने असहयोग आंदोलन जैसे कई आंदोलन प्रारम्भ किए, क्योंकि उनका मानना था कि यह भारत पर औपनिवेशिक पकड़ को कमजोर करने में सहायक  हो सकता है।

बापू ने देश की आज़ादी के लिए कई आंदोलन प्रारम्भ किए और ये सभी अंतत: सफल रहे। इनमें से सबसे पहले आंदोलन का प्रारम्भ वर्ष 1919 में हुआ। वर्ष 1919 में जलियांवाला बाग कांड के खिलाफ आंदोलन हुआ था जिसमें देशवासियों ने बापू को पूरा समर्थन दिया था। उसके पश्चात  गांधीजी ने नमक सत्याग्रह प्रारम्भ किया किया, इस सत्याग्रह को डांडी यात्रा के नाम से भी जाना जाता है। यह यात्रा 26 दिनों तक चली, जो 12 मार्च, 1930 को प्रारम्भहुई और 6 अप्रैल, 1930 को तटीय गाँव डांडी में इसका समापन हुआ ।

प्रारम्भ में गांधीजी के आन्दोलन के साथ कुछ ही लोग जुड़े थे ,लेकिन जैसे-जैसे यह बढ़ते गए, और लोग भी इनसे जुड़ने लगे। नमक आंदोलन  इसका  एक उदाहरण है, जो कुछ लोगों के साथ शुरू हुआ, लेकिन बाद में पूरा देश इसमें शामिल हो गया। पूरा देश गांधीजी के मार्गदर्शन पर चलने को तैयार था। नमक आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य अंग्रेज़ी कर प्रणाली के खिलाफ आवाज़ बुलंद करना था। इसके चलते भारतीयों का जीवन कठिन हो गया था। इस आंदोलन में कई लोग गिरफ्तार हुए। हालाँकि, ब्रितानिया हुकूमत इसको रोकने में विफल रही और यह एक एक बड़ी सफलता थी क्योंकि अंग्रेज़ो को एहसास हुआ कि उनके शासन की नीवं चरमराने लगी थी।

अंग्रेज़ यह सोचने पर भी विवश हो गए की अहिंसा आंदोलन का सामना करना उनके लिए चुनौतीपूर्ण था। उन्हें यह प्रतीत होने लगा कि हिंसक गतिविधियों का सामना करना इससे कहीं आसान है। ब्रितानिया सरकार को अब अपना शासन खोने का दर सताने लगा था । पहली बार पूरा देश अहिंसा के पथ पर चलते हुए एक स्वर में स्वाधीनता के लिए संघर्ष कर रहा था। महिलाएं भी देश के स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया। महात्मा गांधी ने पूरे देश को स्वाधीन कराने का फैसला किया और अभियान प्रारम्भ किया। उन्होंने पूरे देश को समझाया कि हर लड़ाई के लिए लहू बहाने की आवश्यकता नहीं होती । युद्ध अहिंसा का पालन करते हुए भी लड़ा जा सकता है, भले ही वह देश की स्वाधीनता का ही क्यों ना हो।

गांधी जयंती अक्टूबर में क्यों मनाई जाती है?/ Why is Gandhi Jayanti Celebrated in October?

गांधी जयंती हर वर्ष 2 अक्टूबर को मनाई जाती है। गांधीजी का जन्म इसी दिन हुआ था। इस दिन को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। गांधी जी अपने अहिंसा आंदोलन के लिए विश्व भर में  प्रसिद्ध हैं। यह दिन उन्हें विश्व स्तर पर स्वीकार्यता प्रदान करने के लिए मनाया जाता है। गांधीजी का मत था कि अहिंसा एक बेहतर समाज के निर्माण पर आधारित दर्शन, सिद्धांत और अनुभव है।

गांधी जयंती किस प्रकार मनाई जाती है?/ How is Gandhi Jayanti Celebrated?

गांधी जयंती के अवसर पर, लोग नई दिल्ली में राजघाट पर  गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। इस दिन राष्ट्रीय अवकाश होता है। भारत के राष्ट्रपति और प्रधान मंत्री महात्मा गांधी की समाधि पर प्रार्थना करते है। गांधी जयंती का पर्व सभी विद्यालयों और कार्यालयों में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है ।

महात्मा गांधी के विषय में/About Mahatma Gandhi 

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का विवाह 13 वर्ष की आयु में कस्तूरबा गांधी से हुआ था । वह वकालत पढ़ने के लिए इंग्लॅण्ड गए थे, जहां डिग्री प्राप्त करने के पश्चात उन्होंने कुछ समय वहां वकालत की, जिसमें उन्हें वांछित सफलता प्राप्त नहीं हुई। कुछ समय बाद वह स्वदेश लौट आये और आज़ादी की लड़ाई को सशक्त बनाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।

उन्हें दक्षिण अफ्रीका की यात्रा करने का भी अवसर प्राप्त हुआ। उन्हें दक्षिण अफ्रीका में नस्लीय भेदभाव का भी सामना करना पड़ा। दक्षिण अफ्रीका में प्रथम श्रेणी के रेलगाड़ी डिब्बे  में यात्रा करते समय, गांधी को एक अंग्रेज़ ने सामान के साथ डिब्बे से बाहर धक्का दे दिया था।

इसके चलते उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले भारतीयों के साथ अमानवीय व्यवहार और भेदभाव के खिलाफ भारतीय कांग्रेस का गठन किया। दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के अधिकारों के लिए संघर्ष के दौरान, गांधी ने आत्म-शुद्धि और सत्याग्रह के सिद्धांतों का भी उपयोग किया , जो अहिंसा की उनकी व्यापक दृष्टि का हिस्सा थे। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में भारतीय श्रमिकों, खनन मज़दूरों और खेतिहर मज़दूरों को एकजुट किया और अंग्रेज़ी शासन के अन्याय के खिलाफ आवाज़ बुलंद की। दक्षिण अफ्रीका में इक्कीस साल बिताने के पश्चात, वह वर्ष 1915 में भारत लौट आये ।
महात्मा गांधी एक कुशल राजनीतिज्ञ थे जिन्होंने अंग्रेजों से भारत को मुक्त कराने के लिए लड़ाई लड़ी और गरीबों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई। उन्होंने देश भर में लोगों को अपनी देशभक्ति से अवगत कराया। सकल विश्व उनको अहिंसा के पुजारी के रूप में स्मरण करता है।

महात्मा गांधी अपने सरल जीवन और उच्च आदर्शों के कारण भारतीयों के लिए प्रेरणा स्त्रोत बने। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, विभिन्न आंदोलनों, जैसे सविनय अवज्ञा, भारत छोडो और डांडी  आन्दोलन के कारण, गांधीजी ने अंग्रेज़ी राज को भारत को  15 अगस्त, 1947 को स्वाधीन करने के लिए विवश  कर दिया था।
30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या कर दी थी। गोडसे हिंदू महासभा के सदस्य थे। उन्होंने महात्मा गांधी पर पाकिस्तान का पक्षधर होने का आरोप लगाया और उनके अहिंसा के सिद्धांत का विरोध किया।

महात्मा गांधी के विषय में कुछ रोचक तथ्य/Interesting Facts Related to Mahatma Gandhi

विश्व की जानी-मानी मोबाइल कंपनियों में से एक एपल के संस्थापक स्टीव जॉब्स ने गांधीजी के सम्मान में गोल चश्मा पहना था।

भारत में छोटी सड़कों के अतिरिक्त महात्मा गांधी के नाम पर पचास  से अधिक सड़कें हैं। साथ ही विदेशों में उनके नाम पर करीब साठ सड़कें हैं।

महात्मा गांधी को पांच बार नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया था, लेकिन उन्हें एक बार भी नोबेल पुरस्कार नहीं मिला।

गांधीजी प्रतिदिन अठारह किलोमीटर पैदल चलते थे।

गांधीजी 'महात्मा' और 'राष्ट्रपिता' के रूप में किस प्रकार  विख्यात हुए/How Gandhiji came to be known as 'Mahatma' and 'Father of the Nation 

12 जनवरी, 1918 को गांधी द्वारा लिखे गए एक पत्र में रवींद्रनाथ टैगोर को गुरुदेव कहकर संबोधित किया गया था।

टैगोर ने प्रथम बार एक पत्र में  गांधी को 12 अप्रैल, 1919 के दिन ' महात्मा कहकर  संबोधित किया था ।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने पहली बार 6 जुलाई 1944 को रेडियो सिंगापुर से प्रसारित अपने एक भाषण में गांधी को राष्ट्रपिता कहकर संबोधित किया था। एक कथन यह भी है कि उन्होंने इससे पूर्व 4 जून 1944 को आज़ाद हिंद रेडियो रंगून से प्रसारित एक संदेश में गांधीजी को "राष्ट्र  पिता" कहकर संबोधित किया था। 

गांधीजी की मृत्यु पर, पंडित नेहरू ने रेडियो पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा, "राष्ट्रपति अब नहीं रहे।"

महात्मा गांधी के पांच आंदोलनों ने भारत की स्वाधीनता में सहायता की/Mahatma Gandhi's five movements Helped India in Getting Freedom

गांधीजी द्वारा चालाया गया प्रथम सत्याग्रह वर्ष 1906 में ट्रांसवाल एशियाई पंजीकरण अधिनियम के विरोध में था। वर्ष 1920 में गांधीजी  भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी का हिस्सा बने और 26 जनवरी 1930 को अंग्रेज़ी शासन से भारत की स्वतंत्रता की घोषणा की। इसके अतिरिक्त वर्ष 1917 में उन्होंने चंपारण सत्याग्रह, असहयोग आंदोलन जैसे कई आंदोलन चलाए। इन्हीं आंदोलनों के कारण भारत को अंग्रेजों से आज़ादी  मिली। गांधीजी द्वारा चलाए गए आंदोलनों के विषय में यहां पढ़ें:

असहयोग आंदोलन- गांधीजी के असहयोग आन्दोलन  प्रारम्भ  करने का सबसे प्रमुख कारण था,अंग्रेजी सरकार की दमनकारी नीतियों।सरकार के सुधारों से जनता असंतुष्ट थी और हर तरफ  आर्थिक संकट छाया हुआ था तथा महामारी और अकाल फैला हुआ था। ऐसे समय में अंग्रेजी सरकार द्वारा वर्ष 1919  में रोलेट अधिनियम  लाया गया जो भारतीयों के हितों के लिए एक दमनकारी नीति का अंग  था।

चंपारण सत्याग्रह: बिहार के  चंपारण में  महात्मा गांधी की अगुवाई में पहला सत्याग्रह हुआ था। वर्ष 1917 में, बिहार के चंपारण पहुंचने के बाद, उन्होंने उन किसानों का समर्थन करने के लिए एक सत्याग्रह का आयोजन किया, जिन्हें अनाज नहीं बल्कि नील और अन्य नकद फसलों की खेती को मजबूर किया जा रहा था।

महात्मा गांधी- शांति के नायक/Mahatma Gandhi- The Hero of Peace

2 अक्टूबर,भारत को अपने राष्ट्रपिता की शिक्षाओं को याद करने का एक स्वर्णिम अवसर प्रदान करता है। भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में गांधी का आगमन बहुत से लोगों को खुश और हजारों भारतीयों को आकर्षित करने का अवसर प्रदान करता है और इसके साथ ही उनका जीवन-दर्शन  एक प्रेरणा स्त्रोत है, जिसे गांधी दर्शन कहा जाता है। यह और भी आश्चर्य की बात है कि गांधीजी के व्यक्तित्व ने करोड़ों देशवासियों के दिलों में जगह बनाई। इसके पश्चात  विश्व भर में कई लोग उनकी विचारधारा की ओर आकर्षित हुए।

विद्यालयों और महाविद्यालयों में जश्न/The Celebration at the Schools and Colleges

अहिंसा और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में गांधी के प्रयासों पर विद्यालयों, महाविद्यालयों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों में नाटक, खेल और भाषण जैसी विभिन्न प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। अन्य रोमांचक गतिविधियों जैसे निबंध लेखन, महात्मा गांधी नारा प्रतियोगिता, गांधी जयंती भाषण, प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता और चित्रकला प्रतियोगिताएँ सदा ही विभिन्न संस्थानों में आयोजित की जाती हैं।

विभिन्न प्रतियोगिताओं में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले प्रतियोगियों को पुरस्कार भी वितरित किये जाते हैं। इसके अतिरिक्त , विद्यालयों और महाविद्यालयों को गांधीजी के पोस्टर, महात्मा गांधी के नारे और इससे संबंधित चित्रों से सजाया जाता है। इसके अतिरिक्त छोटे बच्चे गांधी की तरह तैयार होते हैं।

गांधी सदा-सर्वदा युवाओं के लिए एक आदर्श और प्रेरक नेता रहे हैं। नेल्सन मंडेला की तरह ही , जेम्स लॉसन ने स्वतंत्रता और स्वाधीनता के लिए गांधी के अहिंसा के सिद्धांत की प्रशंसा की।
स्वराज प्राप्त करने में गांधीजी ने बेहतरीन कार्य किया। उन्होंने किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने की दिशा में भी कार्य किया । उन्होंने छुआछूत या अस्पृश्यता जैसी अन्य सामाजिक विसंगतियों को समाप्त किया। इसके अलावा उन्होंने महिला सशक्तिकरण का भी समर्थन किया।

गांधीजी ने असहयोग आंदोलन (1920), डांडी यात्रा (1930), और भारत छोड़ो आंदोलन (1942) जैसे विभिन्न आंदोलनों का नेतृत्व किया है। यह सभी आंदोलन अत्यंत प्रभावी और सफल रहे और इन्हें युवाओं का भी समर्थन प्राप्त हुआ।

स्वतंत्रता के लिए भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में महात्मा गांधी की भूमिका/Role of Mahatma Gandhi in the Indian National Movement for Independence

गांधीजी की अगुवाई में सबसे महत्वपूर्ण और सफल आंदोलनों में चंपारण सत्याग्रह आंदोलन था। जब महात्मा गांधी भारत वापस आये , तब उन्होंने देखा कि भारत के किसान कितनी समस्याओं से जूझ रहे हैं।

चंपारण, उत्तर बिहार में स्थित एक छोटा सा जिला है, जहां किसानों को अपनी ज़मीन पर नील की खेती करने के लिए विवश किया जाता था। उपजाऊ भूमि पर नील की खेती से किसानों को भारी नुकसान हुआ।

गांधी ने गरीब किसानों की मज़दूरी बढ़ाने के संघर्ष का भी नेतृत्व किया और उसमें सफल रहे। आंदोलन के पश्चात मज़दूरी में पैंतीस प्रतिशत  की वृद्धि हुई।  वर्ष 2007 में, गांधी जयंती के अवसर को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा "अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस" ​​घोषित किया गया था। 30 जनवरी 1948 को हिंदू राष्ट्रवादी नाथू राम गोडसे द्वारा हमले के कारण महात्मा गांधी की मृत्यु हो गई।

निष्कर्ष/Conclusion

गांधी जयंती मनाने का मुख्य  उद्देश्य महात्मा गांधी के दर्शन, सिद्धांतों और अनमोल विचारों का जन-प्रसार और सकल विश्व में अहिंसा और विश्वास की भावना को प्रस्फुटित करना है। ऐसे में हम हर वर्ष अपने महान नेता को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। हम हर गांधी जयंती पर बापू को उनके द्वारा किये गए महान कार्यों के लिए स्मरण करते हैं।

आप अन्य प्रमुख भारतीय त्योहारों के लिए भारतीय त्योहारों में ज्योतिष की प्रासंगिकता पर इसी तरह के लेख पढ़ सकते हैं।

देवी शैलपुत्री
03 Oct, 2024

हिन्दू धर्म में नवरात्रि का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। नवरात्रि शक्ति की उपासना का प्रतीक है। समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त जो ऊर्जा है वही शक्ति है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन्हीं नौ दिनों में मां दुर्गा धरती पर आती हैं और अपने भक्तों को आशीर्वाद देती हैं। उनके आने की खुशी में ही नौ रातों और दस दिनों का दुर्गा उत्सव देशभर में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। इस दौरान देवी के नौ रूपों की पूजा पूरे भक्ति भाव से की जाती है। माता के इन 9 रूपों को 'नवदुर्गा' के नाम से जाना जाता है। नवरात्र के 9 दिनों में मां दुर्गा के जिन 9 रूपों का पूजन किया जाता है, उनमें पहला शैलपुत्री, दूसरा ब्रह्मचारिणी, तीसरा चंद्रघंटा, चौथा कूष्मांडा, पांचवां स्कंदमाता, छठा कात्यायनी, सातवां कालरात्रि, आठवां महागौरी और नौवां सिद्धिदात्री है।

To read this page in English click on Goddess Shailputri

प्रथम नवरात्रि पर देवी शैलपुत्री की पूजा का महत्त्व

इन नौ दिनों में देवी मां के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है। मां दुर्गा का पहला स्वरूप शैलपुत्री का है। शैलपुत्री हिमालय की पुत्री हैं और हिमालय पर्वतों का राजा है। पर्वतराज हिमालय के यहां पुत्री रूप में जन्म लेने कारण देवी शैलपुत्री नाम से विख्यात हुईं। देवी का यह स्वरूप इच्छाशक्ति और आत्मबल को दर्शाता है। उनके इस स्वरुप को पार्वती, हेमवती और सती के नाम से भी जाना जाता है।

 

क्या आप जानते हैं कि देवी शैलपुत्री अपने पिछले जन्म में कौन थीं?

माँ शैलपुत्री ही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम 'शैलपुत्री' पड़ा। नवरात्री पूजन के पहले दिन इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, शैलपुत्री अपने पिछले जन्म में राजा दक्ष की बेटी और भगवान शिव की पत्नी सती थीं। सती अपने पिता द्वारा किये गए अपने पति भगवान शिव-शंकर के अपमान को सहन ना कर सकीं, इसलिए उन्होंने यज्ञ की अग्नि में आत्मदाह कर लिया। अपने अगले जन्म में उन्होंने हिमालय की पुत्री शैलपुत्री के रूप में जन्म लिया। पार्वती, हेमवती भी उन्हीं के नाम हैं। 'शैलपुत्री' देवी का विवाह भी शंकरजी से ही हुआ। पूर्वजन्म की भाँति इस जन्म में भी वे शिवजी की ही अर्द्धांगिनी बनीं। नवदुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री दुर्गा का महत्व और शक्तियाँ अनंत हैं।

 

देवी शैलपुत्री की सवारी क्या है?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवी शैलपुत्री की सवारी बैल है जो धर्म या धार्मिकता की शक्ति को दर्शाता हैं। उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल है जो धर्म का प्रतीक है। उनके बाएं हाथ में कमल-पुष्प है जो हमें सिखाता है की किस तरह हम इस बुराइयों से भरे जग में रहकर भी कमल की तरह खिल सकते हैं। शास्त्रों में मां शैलपुत्री के रूप का सुंदर वर्णन किया गया है। माता शैलपुत्री को संपूर्ण हिमालय पर विराजमान दर्शाया गया हैं। उन्हें मूलाधार चक्र की देवी के रूप में भी जाना जाता है, जो मानव अस्तित्व की जड़ या नींव का प्रतिनिधित्व करती हैं।

शास्त्रों के अनुसार देवी शैलपुत्री का रूप राजसी है। उनका शांत चेहरा और शांत व्यवहार मन मोह लेने वाला है। उनके हाथ में कमल का फूल पवित्रता और वैराग्य को दर्शाता है वहीं दूसरी ओर उनके हाथ का त्रिशूल पूरे ब्रह्माण्ड में अस्तित्व के तीन पहलुओं- निर्माण, संरक्षण और विनाश को दर्शाता है। 

 

लोगो की ऐसे मान्यता है की देवी शैलपुत्री का वास काशी नगरी वाराणसी में है। यहां शैलपुत्री का एक बेहद प्राचीन मंदिर है जिसके बारे में मान्यता है कि यहां मां शैलपुत्री के सिर्फ दर्शन करने से ही भक्तजनों की मुरादें पूरी हो जाती हैं। लोग अपने जीवन में सुख, समृद्धि, और सौभाग्य लाने के लिए पूरे भक्ति भाव से मां की पूजा अर्चना करते हैं। देवी भी फलस्वरूप अपने भक्तों के जीवन में स्थिरता, संतुलन और शक्ति लाती हैं।

नवरात्रि उत्सव के दौरान, भक्त धार्मिक अनुष्ठान करते हैं और अपने-अपने रीति रिवाज़ो के अनुसार देवी की पूजा अर्चना करते हैं। यह त्योहार पूरी भक्ति और जोश के साथ नौ दिनों तक मनाया जाता है, और प्रत्येक दिन देवी दुर्गा के एक अलग रूप को समर्पित होता है। हिन्दू धर्म में विश्वास रखने वाले लोग इस उत्सव को बहुत ही हर्षोलास और धूम-धाम के साथ मनाते हैं।

 

देवी शैलपुत्री के राजसी रूप का वर्णन

देवी शैलपुत्री नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। इसलिए इनकी पूजा नवरात्रि के पहले दिन की जाती है। इन्हें पार्वती या हेमवती के नाम से भी जाना जाता है। "शैल" शब्द का अर्थ है पर्वत और "पुत्री" का अर्थ है बेटी। अतः शैलपुत्री हिमालय की पुत्री हैं।

शास्त्रों में भी देवी शैलपुत्री के रूप का मनमोहक वर्णन किया गया है। उनके रूप को राजसी और विस्मयकारी दर्शाया गया है। उन्हें एक सुंदर और सशक्त महिला के रूप में चित्रित किया गया है जो चेहरे से शांत है लेकिन अत्यंत शक्तिशाली हैं। वो चार भुजाओं वाली हैं और हर भुजा में एक अलग अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए हैं। उनके ऊपर वाले दाहिने हाथ में त्रिशूल है, जो उनके अदम्य साहस और शक्ति का प्रदर्शन करता है। त्रिशूल उनकी आध्यात्मिक जागृति का भी प्रतीक है। उनके ऊपरी बाएं हाथ में कमल का फूल है, जो पवित्रता और ज्ञान का प्रतिनिधित्व करता है। अपने निचले दाहिने हाथ में, देवी ने एक छोटा डमरू पकड़ा हुआ है जो जीवन और मृत्यु के लयबद्ध चक्र का प्रतीक है। अपने निचले बाएँ हाथ में उन्होंने एक माला धारण की हुई है जो एकाग्रता और ध्यान का प्रतिनिधित्व करती है। उनके हाथ चूड़ियों और कंगन से सजे हैं जो जीवन में श्रृंगार के महत्त्व को दर्शाते हैं। लाल साड़ी में देवी का रूप अतुलनीय है जो शक्ति और जुनून का प्रतीक है।

 

देवी शैलपुत्री के माथे पर तीसरा नेत्र है, जो उनकी दिव्य शक्तियों और अंतर्दृष्टि का प्रतीक है। उनकी फूलों से सजी हुई केशसज्जा मनमोहक है। देवी ने अपने सर पर मुकुट धारण किया हुआ है जो उनके शाही अंदाज़ को दर्शाता है।

यह कहना गलत नहीं होगा की देवी का स्वरुप अनुपम और मन मोह लेने वाला है। उनके रूप में शक्ति, सुंदरता और दिव्यता का अनूठा मेल है। शैलपुत्री एक शक्तिशाली देवी हैं जिनकी लाखों लोग पूजा करते हैं, और उनका स्वरूप उनके उपासकों में भक्ति और श्रद्धा को प्रेरित करता है। 

 

माँ शैलपुत्री की पूजा करने से मिलने वाले ज्योतिषीय लाभ?

मां शैलपुत्री, मां दुर्गा के नौ रूपों में से प्रथम हैं। देवी के इस स्वरूप की पूजा करने से कई ज्योतिषीय लाभ भी प्राप्त होते हैं जो इस प्रकार हैं:

चंद्र ग्रह के हानिकारक प्रभावों को कम करता है: वैदिक ज्योतिष के अनुसार, यदि आप देवी के शैलपुत्री रूप की पूजा करते हैं तो आपका चंद्र ग्रह मजबूत होता है। फलस्वरूप आप अपने मन और भावनाओं को बेहतर ढंग से नियंत्रित कर पाते हो। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में चंद्रमा कमजोर या पीड़ित है, तो यह आपके  शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को ख़राब कर सकता है। यह आपको भावनात्मक रूप से भी बहुत कमजोर बना सकता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अगर आप देवी के शैलपुत्री स्वरुप की पूजा करते हैं तो आपके जीवन पर चंद्रमा ग्रह के बुरे प्रभाव नहीं पड़ते या शांत हो जाते हैं। देवी के आशीर्वाद से आपके मन में स्थिरता और शांति आती है।

इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास बढ़ाती है मां शैलपुत्री : माँ शैलपुत्री शक्ति और साहस की प्रतिमूर्ति हैं। वह अपने भक्तों को जीवन में कभी भी हार न मानने के लिए प्रेरित करती हैं। वह अपने भक्तो को इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास का आशीर्वाद देती हैं जिससे की वह किसी भी चुनौती का डटकर सामना कर सकें। यदि आपको अपने जीवन में उचित आत्मसम्मान नहीं मिलता या फिर आपके अंदर आत्मविश्वास की कमी है, तो आपको माता के शैलपुत्री स्वरुप की पूजा अर्चना जरूर करनी चाहिए।

बेहतर करियर की संभावनाओं में सुधार: मां शैलपुत्री का स्वरुप राजसी है। उन्हें धन और समृद्धि की देवी के रूप में भी जाना जाता है। ऐसा माना जाता है की देवी के शैलपुत्री स्वरुप की पूजा करने से आप अपने करियर में अपार सफलता पा सकते हो और आपकी वित्तीय स्तिथि भी मजबूत होती है। अगर आप नौकरी की समस्या से जूझ रहे हो या फिर आपके पास मनचाही नौकरी नहीं है तो देवी के आशीर्वाद से आपको मनचाही नौकरी मिल सकती है।

प्रजनन क्षमता और प्रसव को बढ़ाता है: नवरात्री के पहले दिन पूजे जाने वाली मां शैलपुत्री का संबंध स्त्री की प्रजनन क्षमता और मातृत्व से भी जुड़ा हुआ है। ऐसी स्त्रियां जो गर्भ धारण करना चाहती है या जो गर्भावस्था की अवधि से गुजर रही हैं उन्हें देवी शैलपुत्री की पूजा अवश्य करनी चाहिए। मां अपने भक्तों की सच्ची भक्ति से अवश्य ही प्रसन्न होती हैं। उनका आशीर्वाद गर्भवती महिलाओं के सुरक्षित प्रसव और बच्चे के संपूर्ण विकास को सुनिश्चित करता है।

जीवन से नकारात्मकता को दूर करता है: ऐसी मान्यता है की मां शैलपुत्री के आशीर्वाद से नकारात्मक ऊर्जा आपके मन और आस-पास के वातावरण से भी दूर हो जाती हैं। देवी का आशीर्वाद आपको बुरी शक्तियों से सुरक्षा प्रदान करता है। उनकी पूजा करने से आपके अंदर सकारात्मक पूजा का प्रवाह होता हैं जो आपको जीवन में किसी भी प्रकार की चुनौतियों का सामना करने में मदद करता है।

 

माँ शैलपुत्री की कथा

हिन्दू मान्यताओं के अनुसार मां शैलपुत्री की पूजा नवरात्रि के पहले दिन पूरे विधि-विधान के साथ की जाती है। मां शैलपुत्री को हिमालयराज पर्वत की बेटी कहा जाता है। इसके पीछे एक अत्यंत रोचक पौराणिक कथा है, एक बार सती के पिताजी प्रजापति दक्ष ने यज्ञ के दौरान सभी देवताओं को आमंत्रित किया। लेकिन उन्होंने जान बूझकर भगवान शिव और सती को निमंत्रण नहीं भेजा। लेकिन सती अपने परिवार के मोह में बिना निमंत्रण भी यज्ञ में जाने को तैयार थी। ऐसे में भगवान शिव ने उन्हें बहुत समझाने कि कोशिश की। शिव जी ने उन्हें समझाया की बिना निमंत्रण यज्ञ में जाना ठीक नहीं होता। लेकिन सती नहीं मानी तो भगवान शिव ने उन्हें जाने की इजाजत दे दी।

 

सती अपने पिता के यहां बिना निमंत्रण मिले ही पहुंच गई और उन्हें वहां बिना बुलाए मेहमान वाला व्यवहार ही झेलना पड़ा। उनकी माता के अलावा सती से किसी ने भी सही से बात नहीं की। सबने उनका तिरस्कार किया। उनकी अपनी बहनों ने भी यज्ञ में उनका खूब मज़ाक उड़ाया। इस तरह का कठोर व्यवहार और अपने पति का अपमान वे बर्दाश नहीं कर सकीं और क्रोधित हो गईं। अपने इसी क्रोध, अपमान और ग्लानि में आकर उन्होंने खुद को यज्ञ में भस्म कर दिया। जैसे ही यह समाचार भगवान शिव को मिला उन्होंने अपने गणों को दक्ष के यहाँ भेजा और उनके यहां चल रहा यज्ञ विध्वंस करा दिया। अपने अगले जन्म में, सती ने हिमालय के राजा शैल की बेटी के रूप में पुनर्जन्म लिया और उन्हें शैलपुत्री नाम मिला। उन्हें हेमवती के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि उनके पिता को हिमवत भी कहा जाता था। उनका वाहन एक वृक्ष है, इसलिए उन्हें कभी-कभी वृक्षारूढ़ा भी कहा जाता है। पूर्वजन्म की भाँति इस जन्म में भी वे शिवजी की ही अर्द्धांगिनी बनीं। नवदुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री दुर्गा का महत्व और शक्तियाँ अनंत हैं।

 

मां शैलपुत्री की कथा की महत्वता

नवरात्री के पहले दिन माँ शैलपुत्री की कथा पढ़ना अत्यंत ही शुभ माना गया है।  शैलपुत्री हिमालयराज की पुत्री हैं और शैल का मतलब होता है पत्थर या पहाड़। नवरात्रि के पहले दिन माँ शैलपुत्री की ही पूजा इसलिए की जाती है, ताकि आपके जीवन में भी माँ के नाम की तरह विशालता और स्थिरता बनी रहे और आप अपने जीवन में आने वाली हर मुसीबत के सामने पहाड़ की तरह डट कर खड़े रहो। आप अपने जीवन में अडिग रहकर अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सको। नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना के बाद मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। दुर्गासप्तशती का पाठ किया जाता है। वेद-पुराणों में कलश को भगवान श्री गणेश जी का स्वरुप माना गया है इसलिए नवरात्रि में सबसे पहले कलश पूजा की जाती है।

 

नवरात्रि के पहले दिन का चमत्कारिक मंत्र

नवरात्रि के पहले दिन भक्त अपनी पूर्ण श्रद्धा के साथ देवी शैलपुत्री की पूजा अर्चना करते हैं और उनका आशीर्वाद लेने के लिए विभिन्न अनुष्ठान भी करते हैं। माँ शैलपुत्री को इस संसार में पवित्रता, शक्ति और प्रकृति का प्रतीक माना गया हैं। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार देवी शैलपुत्री का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए इस सिद्ध मंत्र का जाप किया जाना चाहिए।

 "वन्दे वंचित लाभाय चंद्रार्धकृत शेखराम| वृषारुधम शूलधरम शैलपुत्रीम यशस्विनीम"

इसका अर्थ है : मैं पर्वत की पुत्री शैलपुत्री की वंदना करता हूं, जो बैल पर सवार हैं और हाथ में त्रिशूल धारण करती हैं। वह अपने माथे पर अर्धचंद्र धारण करती हैं और अपनी शरण में आने वाले हर भक्त की सभी मनोकामनाओं को पूरा करती हैं। अगर आप इस मंत्र का जाप पूरे श्रद्धा और विश्वास के साथ करेंगे तो आपके जीवन में अवश्य ही सुख, शांति, समृद्धि और सफलता का आगमन होगा। माँ आपके जीवन को सौभाग्य से भर देंगी।

 

नवरात्रि के पहले दिन कैसे कपड़े पहन कर करें मां दुर्गा को प्रसन्न?

नवरात्रि का नौ दिवसीय उत्सव हमारे जीवन में सौभाग्य लेकर आता है। इसका पहला दिन मां शैलपुत्री को समर्पित है। इस उत्सव को मनाने के लिए अधिकतर लोग रंग-बिरंगी पारंपरिक पोशाकों का चयन करते हैं। मां शैलपुत्री को प्रसन्न करने के लिए, कुछ ऐसे रंगों के कपड़े पहनें:

ब्राइट और वाइब्रेंट कलर्स: नवरात्रि खुशियों का त्यौहार है। यह प्रकृति में सकारात्मक परिवर्तन का समय है। इस समय हर तरफ सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह हो रहा होता है इसलिए इस समय आपको खिलते हुए रंगो के कपड़े पहनने चाहिए जो आपको मौज मस्ती करने के लिए प्रेरित करें। इस मौके पर लाल, पीला, हरा और नारंगी रंग पहनना बहुत ही शुभ माना जाता है।

जातीय पोशाक: नवरात्रि एक पारंपरिक त्योहार है, और लोग इसको मिल जुलकर मनाना  पसंद करते हैं। आजकल तो नवरात्रि पर बड़े- बड़े सांस्कृतिक कार्यकर्मों का आयोजन किया जाता है। अपनी सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित करने के लिए जातीय परिधान पहनना सबसे अच्छा होता है। महिलाएं इस उत्सव को मनाने के लिए लहंगा, चनिया चोली और साड़ी पहन सकती हैं, जबकि पुरुष कुर्ता पायजामा या धोती कुर्ता पहन सकते हैं। 

आभूषण: इस दिन महिलाएं पारंपरिक पोशाक के साथ -साथ पारंपरिक गहने पहनकर भी अपने रूप में चार चाँद लगा सकती हैं। रंग-बिरंगी चूड़ियां,  झुमके, हार और मांग टीका महिलाओं के रूप को और आकर्षक बना सकते हैं। जबकि पुरुष पगड़ी या साफा पहन कर और आकर्षित लग सकते हैं।

आरामदायक जूते पहनना :  आपको यह बात अवश्य ध्यान रखनी चाहिए की आपके अच्छे परिधानों के साथ-साथ आपके जूते भी बहुत आरामदायक होने चाहिए। आजकल नवरात्रि के दिनों में जगह-जगह गरबा डांस का आयोजन किया जाता है। बड़े-बड़े मेले आयोजित किए जाते हैं इसलिए आपको आरामदायक जूते ही पहनने चाहिए जिससे आप गरबा और मेलों का भरपूर आनंद ले सकें। महिलाएं आरामदायक फ्लैट या पारंपरिक मोजरी चुन सकती हैं, जबकि पुरुष सैंडल या जूती पहन सकते हैं।

व्यक्तिगत शैली: इस शुभ अवसर पर पारंपरिक परिधानों को प्राथमिकता दी जाती है, लेकिन आपको अपनी व्यक्तिगत शैली और आराम के स्तर को भी नहीं भूलना चाहिए। सबसे ज्यादा जरूरी है की आप जो भी पहनें पूरे आत्मविश्वास के साथ पहनें तभी आप आकर्षक लग सकते हो। अपने प्रियजनों के साथ इस उत्सव का पूरा आनंद लें। 

 

देवी शैलपुत्री की मंगलकारी आरती

नवरात्र के पहले दिन मां दुर्गा के पहले स्वरूप माता शैलपुत्री की पूजा होती है। वह पहाड़ों की बेटी है और शक्ति, पवित्रता और प्रकृति का प्रतीक है। भक्त मां का आशीर्वाद पाने के लिए पूरी श्रद्धा के साथ उनकी पूजा करते हैं। पूजा के सबसे लोकप्रिय रूपों में से एक आरती है। आरती एक भक्ति गीत होता है जिसे देवी देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए गाया जाता है। देवी शैलपुत्री जी की आरती इस प्रकार है:

 

शैलपुत्री मां बैल पर सवार। करें देवता जय जयकार।

शिव शंकर की प्रिय भवानी। तेरी महिमा किसी ने ना जानी।

पार्वती तू उमा कहलावे। जो तुझे सिमरे सो सुख पावे।

ऋद्धि-सिद्धि परवान करे तू। दया करे धनवान करे तू।

सोमवार को शिव संग प्यारी। आरती तेरी जिसने उतारी।

उसकी सगरी आस पुजा दो। सगरे दुख तकलीफ मिला दो।

घी का सुंदर दीप जला के। गोला गरी का भोग लगा के।

श्रद्धा भाव से मंत्र गाएं। प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं।

जय गिरिराज किशोरी अंबे। शिव मुख चंद्र चकोरी अंबे।

मनोकामना पूर्ण कर दो। भक्त सदा सुख संपत्ति भर दो।

 

देवी शैलपुत्री की मंगलकारी आरती का अर्थ

हे देवी शैलपुत्री, आप महान हैं। सभी देवी देवता आपकी जय जयकार करते हैं। आप पूरे ब्रह्मांड में पवित्रता और शक्ति का प्रतीक हैं। हम सभी भक्तगण आपका आशीर्वाद पाने की मनोकामना के साथ आपके सामने यह आरती गा रहे हैं।

हे मां शैलपुत्री, आपसे विनती है की आप अपने सभी भक्तों को सुख और समृद्धि का आशीर्वाद दो। कृपया सभी बुराइयों से हमारी रक्षा करें और हमें अपने प्रति अटूट भक्ति का आशीर्वाद दो।

 

हे देवी दुर्गा, आप पर हमारी श्रद्धा अटूट है। हम पूरे हृदय से आपका नमन करते हैं। आपका आशीर्वाद पाने के लिए हम बार-बार आपसे प्रार्थना करते हैं। हम जानते है की आप पूरे ब्रह्मांड में शक्ति की अवतार हैं और आपके आशीर्वाद से ही हमारा जीवन सफल हो सकता है। कृपया हमारे ऊपर हमेशा अपनी दिव्य कृपा का आशीर्वाद बनाए रखें और हमे जीवन की सभी कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति दें। आप इस  ब्रह्मांड में भक्तों के विश्वास की नींव हैं।

देवी शैलपुत्री की आरती भक्त लोग पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ गाते हैं।  लोगो का ऐसा विश्वास है कि इस आरती का जाप करने से उनके जीवन में सुख, समृद्धि और सौभाग्य का आगमन होगा।

 

हिन्दू धर्म में प्रसादम/भोग का महत्त्व

हिंदू धर्म में, प्रसाद की महिमा बहुत अधिक मानी जाती है। प्रसादम एक पवित्र खाद्य पदार्थ है जिसे पूजा के दौरान देवी देवताओं को चढ़ाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार भगवान को भोग लगाने के बाद ही भोजन ग्रहण करना चाहिए। दरअसल, भगवान को भोग लगाने के बाद साधारण भोजन अमृत प्रसाद में परिवर्तित हो जाता है।

 

देवी शैलपुत्री का प्रिय प्रसादम/भोग

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रत्येक देवता का एक विशिष्ट पसंदीदा प्रसादम या भोग होता है, जो उन्हें पूजा के दौरान चढ़ाया जाता है। देवी शैलपुत्री का पसंदीदा प्रसाद साबूदाना खीर या टैपिओका हलवा माना जाता है।

साबूदाना खीर बहुत ही स्वादिष्ट होती है और यह टैपिओका मोती, दूध, चीनी और इलायची और केसर से मिलाकर बनाई जाती है। यह पूरी तरह शुद्ध होती है इसलिए अक्सर त्योहारों के दौरान बनाई जाती है। देवी शैलपुत्री के भक्त इस प्रसादम को नवरात्रि के पहले दिन बनाते हैं और फिर देवी का भोग लगा कर भक्तों में वितरित करते हैं।

भक्तों का ऐसा विश्वास है की देवी शैलपुत्री साबूदाने की खीर चढ़ाने से प्रसन्न होती है और अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है की प्रसादम को हमेशा भक्ति भाव और पूरी शुद्धता के साथ तैयार किया जाना चाहिए तभी आपके जीवन में सौभाग्य और समृद्धि आ सकती है।

प्रसादम के रूप में आप साबूदाने की खीर के अलावा, देवी शैलपुत्री को फल, नारियल और फूल भी चढ़ा सकते हैं। प्रसादम एक माध्यम है जिसके द्वारा आप अपने प्रेम, भक्ति भाव और कृतज्ञता को देवी या देवता के सामने दर्शाते हैं।

 

आइए जानते है कि क्या कहते हैं आपके सितारे नवरात्रि के पहले दिन के शुभ अवसर पर

मेष राशि - मेष राशि वालों को यह जानकार खुशी होगी की नवरात्रि का पहला दिन उनके जीवन में नई शुरुआत और सकारात्मक ऊर्जा लेकर आने वाला है। अपने लक्ष्य निर्धारित कीजिए और उन्हें पूरा करने के लिए काम करना शुरू कर दीजिए। यकीन मानिए, यह समय आपके लिए बहुत अच्छा है। अपने व्यस्त जीवन में से कुछ समय ध्यान के लिए भी जरूर निकालेें और अपना पूरा ध्यान अपने  लक्ष्यों को निर्धारित करने और उन्हें हासिल करने में लगाएं।

वृष राशि - वृषभ राशि वालों के लिए नवरात्रि का पहला दिन थोड़ा मुश्किल भरा हो सकता हैं। आप अपने जीवन को थोड़ा बिखरा हुआ महसूस करेंगे और कोई भी महत्वपूर्ण निर्णय लेने में आपको परेशानी होगी। लेकिन आपको अपने लक्ष्यों को प्राथमिकता देने के लिए कुछ समय निकालना होगा। आपको स्मार्ट योजना बना कर कार्य करना होगा। आपके लिए अच्छा होगा की आप ज़मीन से जुड़े रहकर अपने सपनों को पूरा करने की कोशिश करें।

मिथुन राशि - नवरात्रि का यह पावन पर्व, मिथुन राशि वालों के जीवन में रचनात्मकता और प्रेरणा लेकर आ रहे हैं। यह समय आपके लिए अनुकूल है। आप अपनी ऊर्जा का प्रयोग नई-नई चीज़ों को जानने समझने और अपने जुनून को आगे बढ़ाने के लिए करें। इस अवधि के दौरान आपका झुकाव अध्यात्म की ओर भी हो सकता है।

कर्क राशि - कर्क राशि वालों के लिए नवरात्रि का पहला दिन आत्मचिंतन का हो सकता है। आपके लिए जरूरी है कि आप अपने व्यस्त जीवन से अपने लिए कुछ समय निकालें और अपनी आंतरिक दुनिया पर ध्यान दें। आप अपनी भावनाओं से भी जुड़ने का प्रयास करें। आपके सितारे आपके साथ हैं इसलिए इस समय का उपयोग आप अपनी नकारात्मक या बुरी आदतों को छोड़ने के लिए भी कर सकते हो।

सिंह राशि - नवरात्रि का पहला दिन सिंह राशि वालों के लिए ऊर्जा और उत्साह से भरपूर रहेगा। इस सकारात्मक ऊर्जा का भरपूर फ़ायदा आप अपने लक्ष्यों की प्राप्ति और अपने जुनून को आगे बढ़ाने के लिए करें। आप पर माता रानी का आशीर्वाद है इसलिए नई चीजों को आजमाने से न डरें और अपने जीवन में पूरे आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ें।

कन्या राशि - नवरात्रि का पहला दिन आपको भावनात्मक रूप से कुछ कमज़ोर बना सकता है इसलिए कोई भी मत्वपूर्ण निर्णय सोच विचार कर ही लें। अपने मानसिक और शारीरिक स्वास्थय पर पूरा ध्यान दें। इन दिनों वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह हो रहा होता है। इसलिए इस शुभ समय का उपयोग अपने रिश्तों को मजबूत करने के लिए करें। याद रखें कि खुश रहना ही अच्छे स्वास्थ्य की कुंजी है।

तुला राशि - देवी के आशीर्वाद से नवरात्रि का पहला दिन तुला राशि वालों के लिए आत्मविश्वास और सकारात्मकता से भरा हुआ होगा। हमारा सुझाव है की आप इस ऊर्जा का उपयोग अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए करें। अगर आपको अपने सपने पूरे करने के लिए कुछ साहसिक कदम उठाने पड़ें, तो घबराएं नहीं। इस दिन आपका झुकाव कुछ रचनात्मक और कलात्मक गतिविधियों की तरफ भी हो सकता है।

वृश्चिक राशि - नवरात्रि के पहले दिन वृश्चिक राशि वाले अपने अंदर गज़ब की ऊर्जा महसूस कर सकते हैं। लेकिन बेहतर होगा की आप इस ऊर्जा का प्रयोग अपनी बुराइओं को ख़त्म करने और अपने झूठे विश्वासों को तोड़ने के लिए करें। हमारा सुझाव है की आप इस शुभ समय का उपयोग आप अपनी आंतरिक शक्ति को मजबूत करने के लिए करें।

धनु राशि - नवरात्रि का पहला दिन धनु राशि वालों के लिए रोमांचकारी साबित होने वाला है। इस दिन आप ऊर्जा से परिपूर्ण होंगे और अपने जीवन में नई-नई चीज़े करना चाहोगे। अपनी इस सकारात्मक ऊर्जा का उपयोग अपने जीवन में नई ऊंचाइयों को छूने के लिए करें। हो सकता है कि इस दिन आपका कहीं यात्रा करने का मन करें या आप जीवन में कुछ नया करना चाहो।

मकर राशि - नवरात्रि का पहला दिन आपको सिखाता है की कभी-कभी जीवन में आत्मनिरीक्षण करना भी जरूरी होता है और आज आपके लिए आत्मनिरीक्षण का सही समय है। अपनी व्यस्त दिनचर्या से कुछ समय अपने लिए भी निकालें। यह समय आपके लिए अपनी भावनाओं से जुड़े रहने का भी है। अपनी ऊर्जा का उपयोग अपनी बुरी आदतों को छोड़ने के लिए करें। आपका दिन अवशय ही मंगलकारी होगा।

कुंभ राशि- माता के आशीर्वाद से नवरात्रि का पहला दिन कुंभ राशि वालों के लिए ऊर्जा से भरपूर होगा। आपके लिए बेहतर होगा की आप अपनी ऊर्जा का उपयोग अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए करें। नवरात्रि का पहला दिन आपके लिए सौभाग्य लेकर आ रहा है, इसलिए जोख़िम उठाने से ना डरें और पूर्ण विश्वास के साथ जीवन में आगे बढ़ें।

मीन राशि - नवरात्रि के पहले दिन मीन राशि वालों को अपना पूरा ध्यान रखने की आवश्यकता है। आज आप भावनात्मक रूप से कुछ कमजोर महसूस कर सकते हो। इस बात का ध्यान रखें की खुशहाल जीवन के लिए अच्छा स्वास्थ्य परम आवश्यक हैं। इसलिए काम के साथ-साथ अपना पूरा ध्यान रखें। इस समय हर तरफ खुशहाली का माहौल होता है। इसलिए इस समय का सदुपयोग करें और प्रियजनों के साथ जुड़ने और अपने रिश्तों को सुधारने का प्रयास करें। देवी के आशीर्वाद से आपका दिन अवश्य ही मंगलकारी होगा।

 

आइये जानते है की नवरात्रि के शुभ अवसर पर आपको क्या करना चाहिए और क्या नहीं।

ऐसी बातें जो जीवन में सौभाग्य ला सकती हैं

अपने लक्ष्य तय करें: नवरात्रि के दिन बहुत ही शुभ होते हैं। इसलिए इन दिनों का सदुपयोग करने के लिए जरूरी है की आप पहले ही अपने लक्ष्य निर्धारित कर लें। आपको यह अच्छे से पता होना चाहिए की आपको जीवन में क्या चाहिए। इस शुभ समय आप अपना पूरा ध्यान अपने लक्ष्यों को पाने के लिए लगाएं।

साफ़-सफाई का ध्यान रखें: लोगो का ऐसा विश्वास है की इन दिनों कुछ नकारात्मक शक्तियां भी सक्रिय हो जाती हैं। इसलिए आपके लिए जरूरी है की आप अपने घर और कार्यस्थल पर साफ़ सफाई का पूरा ध्यान रखें। देवी को प्रसन्न करने के लिए आप धूप-अगरबत्ती जलाकर रखें या हवा को शुद्ध करने के लिए आवश्यक तेलों का उपयोग करें।

प्रार्थना करें: इन दिनों पूरे भक्ति भाव से देवी की पूजा अर्चना करनी चाहिए। पूरी श्रद्धा के साथ देवी को प्रसाद चढ़ाएं और अपने सुखी और समृद्ध जीवन के लिए उनसे प्रार्थना करें। एक दीपक या मोमबत्ती जलाएं और देवी को फल, फूल और मिठाई चढ़ाएं। याद रखें की प्रार्थना में बहुत शक्ति होती हैं।

पारंपरिक कपड़े पहनें: नवरात्रि उत्सव को धूम-धाम से मनाने के लिए पारंपरिक पोशाक पहनें। आप इन दिनों लाल, पीले और नारंगी रंगों का चुनाव कर सकते हो क्योंकि ऐसे रंग हमारे अंदर जोश पैदा करते हैं।

उपवास या हल्का भोजन करें: ऐसी मान्यता है कि उपवास करने से हमारे तन और मन की शुद्धि होती है। बहुत से लोग पूरे नवरात्रि व्रत रखते हैं। कुछ लोग सिर्फ पहला और आखिरी नवरात्रि व्रत रखते हैं। इन दिनों को उपवास के लिए शुभ दिन माना जाता है। यदि आप उपवास नहीं कर रहे हैं, तो आप हल्का या सीमित आहार लीजिए। इन दिनों मांसाहारी भोजन बिल्कुल नहीं करना चाहिए।

 

ऐसी बातें जो जीवन में दुर्भाग्य ला सकती हैं

नकारात्मक विचारों और कार्यों से बचें: नवरात्रि के दिन शुभ होते हैं और आपके अंदर सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह करते हैं इसलिए इन दिनों का पूरा फ़ायदा उठाने के लिए नकारात्मक विचारों या कार्यों में शामिल होने से बचें, अन्यथा आप खुद को या दूसरों को नुकसान पहुंचा सकते हो।

गपशप में शामिल न हों: नवरात्रि आत्म-चिंतन और आध्यात्मिक विकास का समय है। फ़ालतू की गपशप या दूसरों के बारे में बुरा बोलने से बचें। अपने आध्यात्मिक विकास पर ध्यान केंद्रित करें।

शराब और मांसाहारी भोजन से बचें: यदि आप इन दिनों देवी का आशीर्वाद पाना चाहते हो तो आपको इस अवधि में गलती से भी मांसाहारी भोजन और शराब का सेवन नहीं करना चाहिए।

आलस्य न करें: नवरात्रि के दिनों में वातावरण में नई ऊर्जा का प्रवाह हो रहा होता है। इसलिए आप भी इन दिनों आलस में ना रहे। आपसे अनुरोध है की पहले दिन की ऊर्जा का उपयोग अपने अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए करें। किसी भी कार्य के प्रत्ति आलस्य या टालमटोल करने से बचें।

अपनी आध्यात्मिक साधनाओं को न छोड़ें: यदि आप कोई ध्यान, योग या प्रार्थना करते हैं तो नवरात्रि के दौरान भी आप अपनी आध्यात्मिक साधनाओं को जारी रखें। इस त्योहार के शुभ दिन और सकारात्मक ऊर्जा आपको अपने लक्ष्यों के प्रति और ध्यान केंद्रित करने में मदद करेगी।

आप अन्य सभी प्रमुख भारतीय त्योहारों के लिए भारतीय त्योहारों में ज्योतिष की प्रासंगिकता (Relevance of Astrology) पर इसी तरह के लेख पढ़ सकते हैं।

देवी ब्रह्मचारिणी
04 Oct, 2024

नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। देवी का यह रूप देवी पार्वती का अविवाहित रूप है। ब्रह्मचारिणी एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है ब्रह्म जैसा व्यवहार करना। उनकी कठोर तपस्या के कारण उन्हें तपस्चारिणी भी कहा जाता है। देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से व्यक्ति को अपने हर काम में हमेशा सफलता मिलती है। देवी ब्रह्मचारिणी बुराई को अच्छे मार्ग की ओर निर्देशित करती हैं। देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से तप, त्याग, सदाचार, संयम और वैराग्य के गुण भी आ जाते हैं।

देवी ब्रह्मचारिणी का रूप/ Goddess Brahmacharini's form

माता ब्रह्मचारिणी श्वेत वस्त्रों से सुशोभित हैं। वह अपने दाहिने हाथ में एक मंत्र माला और अपने बाएं हाथ में एक ईवर रखती है। उनका रूप अत्यंत उज्ज्वल और मनमोहक है। वह प्रेम की देवी भी हैं। देवी दुर्गा के इस रूप की पूजा करने से व्यक्ति भक्ति और सिद्धि प्राप्त कर सकता है। उनकी एक हजार वर्षों की कठोर तपस्या के कारण ही उन्हें ब्रह्मचारिणी कहा जाता है। इस तपस्या अवधि के दौरान, उन्होंने  कई वर्षों तक भोजन नहीं किया और भगवान शिव को प्रसन्न करने में सफल रही, और इस तरह उन्हें ब्रह्मचारिणी के रूप में जाना जाने लगा। जब देवी ब्रह्मचारिणी अपने भक्तों पर प्रसन्न होती हैं, तब वह उन्हें तप, त्याग, सदाचार, संयम, वैराग्य और धैर्य के गुणों का आशीर्वाद देती हैं।

देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा का महत्व/ The Value of Worshipping Goddess Brahmacharini

मानव जीवन हमेशा दर्द, दुख, बीमारी और भय से प्रभावित होता है। इसलिए सभी कष्टों से मुक्ति पाने के लिए मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। 'ब्रह्म' का अर्थ है तपस्या, और 'चारिणी' का अर्थ है व्यवहार करना। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ है तपस्वी। देवी का रूप भी उनके नाम से मेल खाता है। वह सफेद वस्त्रों को पसंद करती है और अपने दाहिने हाथ में एक मंत्र की माला और अपने बाएं हाथ में एक ईवर रखती है। मां दुर्गा का यह रूप अपने भक्तों को अनंत फल देता है। उनके आशीर्वाद से तप, त्याग, सदाचार, संयम, वैराग्य और धैर्य के गुण बढ़ने लगते हैं। देवी ब्रह्मचारिणी ने सभी राक्षसों को हराकर दुनिया को उनसे छुटकारा दिलाया। 

इसी तरह, वह अपने भक्तों को उनकी इच्छा के अनुसार फल प्रदान करती है। इनकी पूजा करने से व्यक्ति का धैर्य, आत्मविश्वास, शक्ति और नैतिक बुद्धि भी बढ़ती है। उसकी तपस्या के प्रभाव से भेदभाव, असंतोष, लोभ आदि का नाश होता है। आपका जीवन उत्साह, धैर्य और साहस से भर जाता है| आदमी मेहनती बन जाता है। जिन लोगों का जीवन अंधकार से भरा है और उन्होंने कठिन समय में धैर्य और साहस खो दिया है, उनके लिए देवी का यह दूसरा ब्रह्मचारिणी रूप दिव्य और अलौकिक प्रकाश लाता है। देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से उनके जीवन में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, धैर्य में वृद्धि का अनुभव होता है। उनका मन बुरे से बुरे समय में भी जिम्मेदारियों के रास्ते से विचलित नहीं होता है। देवी अपने भक्तों के जीवन से किसी भी गंदगी, दूरदर्शिता और दोषों को दूर करती हैं। देवी की कृपा से सदैव  विजय प्राप्त होती है।

देवी ब्रह्मचारिणी /Goddess Brahmacharini

नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। देवी दुर्गा का यह दूसरा रूप उनके भक्तों और उनकी पूजा करने वाले साधुओं को प्रभावी फल देता है| उनकी पूजा करने से तप, त्याग, सदाचार, संयम, वैराग्य और धैर्य के गुण बढ़ते हैं। देवी ब्रह्मचारिणी की कृपा से सदैव  विजय प्राप्त होती है तथा कष्टों का नाश होता है। देवी ब्रह्मचारिणी का रूप अपने आप में ज्ञानवर्धक है। देवी दुर्गा की नौ शक्तियों में से, देवी ब्रह्मचारिणी दोहरी शक्ति हैं। ब्रह्मा का अर्थ है तपस्या, और चारिणी का अर्थ है व्यवहार| यह देवी शांति से ध्यान में विसर्जित है। उनकी कठोर तपस्या के कारण उनके मुख पर तेज का ऐसा अनुपम संगम है, जो तीनों लोकों को उजागर कर रहा है। देवी ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में अक्ष माला और दूसरे हाथ में ईवर है। देवी ब्रह्मचारिणी वास्तव में भगवान ब्रह्मा का रूप हैं । इस देवी के कई अलग-अलग नाम भी हैं, जैसे तपक्षरिणी, अपर्णा और उमा। 

कौन हैं देवी ब्रह्मचारिणी?/ Who is Goddess Brahmacharini

शिवपुराण और रामचरित्रमानस में लिखा है कि देवी पार्वती भगवान शिव को अपना पति बनाना चाहती थीं। उस इच्छा को पूरा करने के लिए, उन्होंने केवल फल खाते हुए कई हजार साल तपस्या में बिताए। और इस अवधि के बाद, देवी ब्रह्मचारिणी अगले तीन हजार वर्षों तक पेड़ों के पत्तों पर जीवित रहीं। इतनी कठोर तपस्या के बाद, वह ब्रह्मचारिणी के रूप को संग्रहीत करने में सक्षम थी। नवरात्रि के दूसरे दिन, भक्त अपने मन को ब्रह्मचारिणी के पवित्र चरणों में केंद्रित करते हैं और उन्हें स्वाधिष्ठान चक्र में रखते हैं। इनके मंत्रों का जाप करने से इन्हें मनोवांछित मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

देवी ब्रह्मचारिणी की कथा/ The Story of Goddess Brahmacharini

सदियों पुरानी मान्यताओं के अनुसार, देवी पार्वती ने भगवान शिव से विवाह करने की इच्छा व्यक्त की, जिसके बाद उनके माता-पिता ने उन्हें हतोत्साहित करने का प्रयास किया। हालांकि इसके बाद देवी पार्वती ने काम के देवता कामदेव भगवान से मदद मांगी। ऐसा माना जाता है कि कामदेव ने भगवान शिव पर कामुकता का एक तीर चलाया था; इस प्रकार, उनकी ध्यान की स्थिति भंग हो गई; इस पर भगवान ने क्रोध से आगबबूला होकर खुद को जला लिया। इसके बाद देवी पार्वती भगवान शिव की तरह रहने लगीं। वह पहाड़ों पर गई, और वहाँ उन्होंने कई वर्षों तक तपस्या की। जिसके कारण वह ब्रह्मचारिणी देवी के रूप में लोकप्रिय हो गईं। इस कठिन तपस्या के कारण, देवी भगवान शिव का ध्यान आकर्षित करने में सफल हुई। इसके बाद, भगवान शिव ने अपना रूप बदल लिया, और उनके सामने गए, और अपने बारे में बुरी बातें करने लगे, लेकिन देवी भगवान शिव के खिलाफ कुछ भी सुन नहीं सकीं। अंत में, भगवान शिव ने उन्हें स्वीकार कर लिया और उन्होंने पार्वती जी से विवाह कर लिया।

देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा करने की विधि/ Procedure to worship Goddess Brahmacharini

देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा करने का सिलसिला चलता रहता है। 

सबसे पहले आपके द्वारा कलश में निमंत्रित देवी-देवताओं और योगियों को फूल, अक्षत, चंदन से सम्मानित करना चाहिए और दूध, दही, चीनी, धृत और शहद से स्नान कराना चाहिए। देवी को जो भी प्रसाद चढ़ाया जाता है उसका एक हिस्सा उन्हें भी प्रदान किया जाना चाहिए। प्रसाद चढ़ाने के बाद उनके मुख को धोकर उन्हें सुपारी भेंट करें और फिर उनके चारों ओर दक्षिणावर्त घूमें। भगवान की पूजा करने के बाद, कलश से नौ ग्रहों की पूजा करते हैं, उनकी पूजा करने के बाद देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा करें। देवी ब्रह्मचारिणी का सम्मान करते समय सबसे पहले आपको अपने हाथ में एक फूल लेकर प्रार्थना करनी चाहिए। उन्हें पंचामृत से स्नान कराएं और फिर विभिन्न पुष्प, अक्षत, कुमकुम और सिंदूर चढ़ाएं। देवी को लाल फूल बहुत पसंद होते हैं। घी और कपूर के मिश्रण से उसकी पूजा करें। अंत में क्षमा प्रार्थना करें|

 

आवाहनं न जानामि न जानामि वसर्जनं, पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरी 

देवी की पूजा के दौरान इस मंत्र का जाप करना चाहिए। इस मंत्र का जाप करना जरूरी है। 

(ॐ देवी ब्रह्मचारिणी नमः॥)

(या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।)

(नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।)

(दधाना करपद्माभ्या मक्षमाला कमण्डलू।)

(देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्य नुत्तमा॥)

मंत्रों के जाप के दौरान आप देवी ब्रह्मचारिणी के स्रोत ग्रंथों को भी पढ़ सकते हैं, जो इस प्रकार हैं-

मां ब्रह्मचारिणी का स्रोत पाठ/ Maa Brahmacharini ka strot paath

(तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्।)

(ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥)

(शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी।)

(शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥)

“मां ब्रह्मचारिणी का कवच

(त्रिपुरा में हृदयं पातु ललाटे पातु शंकरभामिनी।)

(अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥)

(पंचदशी कण्ठे पातुमध्यदेशे पातुमहेश्वरी॥)

(षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।)

(अंग प्रत्यंग सतत पातु ब्रह्मचारिणी।)

ध्यान मंत्र/Meditation Mantra

(वन्दे वाञ्छित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखराम्।)

(जपमाला कमण्डलु धरा ब्रह्मचारिणी शुभाम्॥)

(गौरवर्णा स्वाधिष्ठान स्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।)

(धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालङ्कार भूषिताम्॥)

(परम वन्दना पल्लवाधरां कान्त कपोला पीन।)

(पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥)

देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा करने के नियम/ Rules to Worship Goddess Brahmacharini

  • देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा के दौरान पीले या सफेद वस्त्र धारण करें।

  • देवी को सफेद वस्तुएँ अर्पित करें जैसे- जमी हुई चीनी, चीनी का पंचामृत।

  • स्वाधिष्ठान चक्र पर दीपक और अर्धचंद्र की ज्वाला का ध्यान करें।

  • "ऐ नमः" का पाठ करें और तरल और फलों के आहार पर विशेष ध्यान दें।

देवी ब्रह्मचारिणी की आरती/ Aarti of Goddess Brahmacharini

जय ब्रह्मचारिणी माता

(जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता)

(जय चतुरानन प्रिय सुख दाता)

(ब्रह्मा जी के मन भाती हो)

(ज्ञान सभी को सिखलाती हो)

(ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा)

(जिसको जपे सकल संसारा)

(जय गायत्री वेद की माता)

(जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता)

(कमी कोई रहने न पाए)

(कोई भी दुख सहने न पाए)

(उसकी विरति रहे ठिकाने)

(जो तेरी महिमा को जाने)

(रुद्राक्ष की माला ले कर)

(जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर)

(आलस छोड़ करे गुणगाना)

(मां तुम उसको सुख पहुंचाना)

(ब्रह्माचारिणी तेरो नाम)

(पूर्ण करो सब मेरे काम)

(भक्त तेरे चरणों का पुजारी)

(रखना लाज मेरी महतारी)

देवी ब्रह्मचारिणी को यह भोजन प्रसाद पसंद है/Goddess Brahmacharini likes this food offering

देवी ब्रह्मचारिणी को गुलहड़ और कमल का फूल बहुत पसंद है, इसलिए आपको उनकी पूजा करते समय इन फूलों को उनके चरणों में अर्पित करना चाहिए। चूंकि देवी को जमी हुई चीनी और सफेद चीनी पसंद है, इसलिए आपको उन्हें जमी हुई चीनी और पंचामृत का भोग लगाना चाहिए। वह इस पेशकश से प्रभावित होंगी। इन चीजों को चढ़ाने से आपकी लंबी उम्र सुनिश्चित होती है।

इनकी पूजा करने से आपको ये फल मिलते हैं/Worshipping her provides you these fruits

देवी ब्रह्मचारिणी को प्रभावित करना सरल है। पूजा के दौरान उन्हें सफेद चीनी और जमी हुई चीनी चढ़ाएं। इस दिन की पूजा प्रक्रिया के दौरान भक्तों को अपना ध्यान स्वाधिष्ठान चक्र पर केंद्रित करना चाहिए। यह सुस्ती, तनाव और चिंता को दूर करता है। प्रसन्नता, निष्ठा, आत्म-विश्वास और ऊर्जा में वृद्धि होती है और भक्त को सफलता प्राप्त होती है।

स्वाधिष्ठान चक्र/ Svadhisthana Chakra

देवी ब्रह्मचारिणी को ज्ञान, तपस्या और वैरागी की देवी के रूप में जाना जाता है। वह हमेशा कठोर तपस्या और तप में लीन रहती है जिसके कारण उसे ब्रह्मचारिणी कहा जाता है। उनकी पूजा छात्रों और तपस्वियों के लिए बहुत फायदेमंद है। जिन लोगों का स्वाधिष्ठान चक्र कमजोर होता है, उनके लिए मां ब्रह्मचारिणी की पूजा बहुत ही अनुकूल होती है।

स्वाधिष्ठान चक्र कमजोर होने पर क्या होता है?/ What happens when the Svadishthan Chakra is weak?

  • व्यक्ति में अविश्वास होता है।

  • इन लोगों के साथ हमेशा कुछ भयानक होने की संभावना बनी रहती है।

  • ये लोग कभी-कभी क्रूर भी हो सकते हैं।

स्वाधिष्ठान चक्र को मजबूत करने के लिए क्या करें? What to do to strengthen the Svadishthan Chakra?

  • रात के समय सफेद वस्त्र धारण करें।

  • सफेद आसन पर बैठना उत्तम रहेगा।

  • इसके बाद देवी को सफेद फूल चढ़ाएं।

  • सबसे पहले अपने गुरु को याद करो।

  • इसके बाद आज्ञा चक्र का ध्यान करें।

  • ध्यान करने के बाद, अपने शिक्षक या देवी से अपने स्वाधिष्ठान चक्र को मजबूत करने का अनुरोध करें।

आप हमारी वेबसाइट से अन्य भारतीय त्योहारों, लोकप्रिय व्रत तिथियों के बारे में भी पढ़ सकते हैं।

साथ ही जन्मकुंडलीलव या अरेंज मैरिज में चुनाव, व्यवसायिक नामों के सुझावस्वास्थ्य ज्योतिषनौकरी या व्यवसाय के चुनाव के बारे में भी पढ़ सकते हैं।        

देवी चंद्रघंटा
05 Oct, 2024

नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। मां चंद्रघंटा का नाम दो शब्दों को मिलकर बना है-चंद्र, जिसका अर्थ है चंद्रमा, और घंटा का अर्थ है घंटी। देवी का नाम उनके माथे पर रखी गई घंटी के आकार के आधे चंद्रमा से लिया गया है। उन्हें देवी चंद्रखंड के रूप में भी जाना जाता है। देवी दुर्गा का यह तीसरा रूप उनकी पूजा करने वालों को शक्ति और वीरता प्रदान करता है और माना जाता है कि उनके सभी दुख दूर हो जाते हैं। भले ही देवी चंद्रखंड देवी पार्वती का अधिक मजबूत रूप हैं, ऐसा माना जाता है कि वह केवल तभी प्रकट होती हैं जब किसी मुद्दे पर उग्र होती हैं। नहीं तो वह शांत स्वभाव की ही होती हैं| देवी पार्वती के विवाहित संस्करण को देवी चंद्रघंटा के नाम से भी जाना जाता है। देवी चंद्रघंटा की पूजा करने से उपासकों को शक्ति, शांति और वीरता की अनुभूति होती है।

देवी चंद्रघंटा का प्रतिनिधित्व/The representation of Goddess ChandraGhanta

देवी चंद्रघंटा सिंह की सवारी करती हैं, और उनका शरीर सोने की तरह चमकीला होता है। उनकी दस भुजाएं हैं जहाँ चार, बायीं भुजाओं में एक त्रिशूल, तलवार, और एक कमंडल है जबकि पाँचवीं भुजा एक मुद्रा बनाती है। दाहिनी ओर अन्य चार भुजाओं में कमल, तीर, धनुष और एक जप माला है। अस्त्र-शस्त्रों के साथ देवी दुर्गा का यह रूप युद्ध के समय प्रकट होता है।

देवी चंद्रघंटा कौन हैं?/ Who is Goddess ChandraGhanta?

देवी दुर्गा ने देवी चंद्रघंटा का यह रूप असुरों को हराने और दुनिया के नकारात्मक प्रभाव को खत्म करने के लिए लिया था। असुरों को हराकर, देवी दुर्गा ने असुरों की निरंतर यातना से देवताओं को राहत दी। देवी चंद्रघंटा को देवी पार्वती के विवाहित रूप में भी जाना जाता है। जैसे ही देवी पार्वती का भगवान शिव से विवाह हुआ, उन्होंने अपने माथे पर चंद्रमा रखा और देवी चंद्रघंटा के रूप में जानी गईं। जैसा कि वह शेर की सवारी करती है, माना जाता है कि उन्होंने युद्ध के लिए आक्रामक रूप ले लिया है। वह अपनी बाहों में कमल, हथियार और कमंडल लिए हुए हैं।

देवी चंद्रघंटा की पूजा का महत्व/ Significance of worshipping Goddess ChandraGhanta

माता चंद्रघंटा की पूजा करते समय लोग आमतौर पर अपने सभी डर से छुटकारा पा लेते हैं और ताकत की भावना में वृद्धि का अनुभव करते हैं। उनके पास कई हथियारों के साथ दस भुजाएँ हैं जो देवी पार्वती के चरम संस्करण का प्रतिनिधित्व करती हैं। शेर की सवारी करते हुए, वह हमेशा युद्ध के मैदान में प्रवेश करने के लिए तैयार रहती है। तंत्र साधना के अनुसार, देवी चंद्रघंटा का यह रूप मणिपुर चक्र को जागृत करता है। देवी चंद्रघंटा ग्रह से दुष्टों का सफाया करने के लिए हमेशा तैयार रहती हैं। 

जो लोग चंद्रघंटा मां की पूजा करते हैं उन लोगों को उनकी कुंडली में मंगल ग्रह के दोषों से छुटकारा मिल सकता है। इसलिए हमेशा नवरात्रि के तीसरे दिन देवी चंद्रघंटा की पूजा करनी चाहिए। उचित विधि से देवी की पूजा करने से व्यक्ति के पापों का नाश होता है। देवी चंद्रघंटा के आशीर्वाद से, विवाहित जोड़े ऐश्वर्य और समृद्धि के साथ एक सुखी वैवाहिक जीवन जीते हैं। जैसे-जैसे विवाहित जोड़े उनकी पूजा करते हैं, वह अपने वैवाहिक जीवन में आने वाली कई समस्याओं का समाधान आसानी से कर सकते हैं। देवी चंद्रघंटा परिवार की रक्षक हैं। वह शुक्र ग्रह से जुड़ी हुई है। यदि आपकी कुंडली में शुक्र किसी भी तरह से प्रभावित है, तब देवी चंद्रघंटा की पूजा करने से मदद मिल सकती है।

नवरात्रि के तीसरे दिन का महत्व/ Significance of third Navratri Day 

तीसरे नवरात्र का बहुत महत्व है। ऐसा माना जाता है कि इस शुभ दिन पर देवियों के देवता की पूजा की जाती है। यह सच है कि देवी की घंटी की आवाज अत्याचारियों, और राक्षसों को डराती है। देवी के आशीर्वाद से, उपासकों को अक्सर अलौकिक वस्तुओं की प्राप्ति होती है।हिंदू शास्त्रों के अनुसारदेवी चंद्रघंटा की पूजा करने से शांति और विनम्रता के साथ साथ निर्भयता और साहस की शक्ति भक्तों में पैदा होती है।

मां चंद्रघंटा कथा/ Maa ChandraGhanta Story

  1. जब भगवान शिव ने देवी पार्वती से कहा कि वह किसी से विवाह नहीं करना चाहते हैं, तब वह नाराज हो गईं। देवी पार्वती को इस तरह देखकर भगवान शिव भावनात्मक रूप से आहत हुए। इसलिए, वह देवी पार्वती से विवाह करने के लिए बारात के साथ भगवान हिमवान के घर गए। बारात में कई प्रकार की जीवित प्रजातियां, देव, भूत और अघोरी शामिल थे। अपने दरवाजे पर बारात को देखकर, देवी पार्वती की मां डर के मारे बेहोश हो गईं। देवी पार्वती तब अपने परिवार को शांत करने की कोशिश कर रही थीं। इसके बाद उन्होंने देवी चंद्रघंटा के रूप में भगवान शिव के दर्शन किए। उन्होंने शिव को दूल्हे के रूप में घर में प्रवेश करने के लिए विनम्रता से मनाने की कोशिश की। भगवान शिव ने उनकी बात मान ली और खुद को कई प्रकार के गहनों से सुसज्जित किया।

  2. महिषासुर नाम के एक असुर ने स्वर्गलोक पर आक्रमण किया, उसने स्वर्गलोक पर सफलतापूर्वक शासन करने के लिए भगवान इंद्र को हराया। युद्ध के मैदान में हार के बाद, देवता स्वर्गलोक से भगवान की मदद लेने के लिए त्रिदेव के पास गए। उन्होंने त्रिदेव को महिषासुर के बारे में बताया कि वह स्वर्गलोक पर शासन करने के लिए भगवान इंद्र, सूर्य, वायु, अन्य लोगों को हरा चुका है वह स्वर्गलोक में अन्य भगवानों पर अत्याचार कर रहा है। पूरी स्थिति सुनकर त्रिदेव क्रोधित हो गए और जैसे ही उन्होंने अपना क्रोध व्यक्त किया, उनके मुंह से तीव्र ऊर्जा निकल गई। यह ऊर्जा सभी दस दिशाओं में फैल गई थी। तभी सबके सामने उस ऊर्जा ने एक देवी ने रूप धारण किया। भगवान शिव ने अपना त्रिशूल देवी को दिया और भगवान विष्णु ने उन्हें चक्र दिया। अन्य भगवान भी देवी को अपने सभी हथियार प्रदान करने के लिए एकत्र हुए। भगवान इंद्र ने देवी को अपना चंद्रमा और घंटी भेंट की। भगवान सूर्य ने अपनी ऊर्जा और तलवार दी। अंत में उन्हें  सवारी करने के लिए एक शेर भी दिया गया। सभी हथियारों और शक्ति के साथ, देवी चंद्रघंटा महिषासुर के साथ युद्ध करने के लिए रवाना हुईं। चूंकि देवी का चेहरा बहुत सारी ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता था, महिषासुर  देखकर डर गया था। फिर उसने अपने असुरों को देवी पर हमला करने का आदेश दिया। देवी दुर्गा को हराने के लिए सभी असुर युद्ध के मैदान में थे। कुछ ही समय में, देवी दुर्गा ने उनमें से प्रत्येक पर विजय प्राप्त कर ली। फिर उसने महिषासुर का वध किया और सभी भगवानों को उसके कब्जे से मुक्त कर दिया, और स्वर्गलोक उन्हें वापस कर दिया।

देवी चंद्रघंटा पूजा प्रक्रिया/ Goddess ChandraGhanta Puja Procedure

  • सूर्योदय से पूर्व स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए। फिर, एक आसन पर स्वच्छ कपड़ा बिछा कर देवी की मूर्ति को स्थापित करना चाहिए और उस स्थान को पवित्र गंगा जल से साफ करना चाहिए।

  • देवी को अर्पित की जाने वाली पूजा के लिए आवश्यक सामग्री में कपड़े, एक सौभाग्य धागा, चंदन, सिंदूर, हल्दी, गहने, रोली, दूर्वा, फूल, सुगंधित अगरबत्ती, दीया, फल, नैवेद्य और पान शामिल हैं।

  • फिर, आपको मंत्र "पिण्डजप्रवरारुढा चण्डकोपास्त्र कैर्युता दोहराने की आवश्यकता है। इस चंद्रघंटा मंत्र को दोहराते हुए देवी को फूल चढ़ाएं और अनुष्ठान करें।

  • दुर्गा सप्तशती के मंत्र का जाप करें और उनकी कथा सुनें। दीये से देवी की आरती करें।

  • इस दिन दूध से बनी मिठाई देवी चंद्रघंटा को कुछ सेब और गुड़ के साथ भेंट करें। 

इसे देवी चंद्रघंटा को अर्पित करें/ Offer this to Goddess ChandraGhanta

देवी के हर रूप को एक अलग प्रकार का प्रसाद चढ़ाया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि प्रसाद देवी के प्रति आपकी भक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। देवी चंद्रघंटा को हमेशा दूध से बनी मिठाइयों से ही भोग लगाना चाहिए। इसे देवी को अर्पित करने के बाद स्वयं खाएं और दूसरों को भी अर्पित करें। ऐसा माना जाता है कि देवी को यह प्रसाद चढ़ाने से आपके सभी दुखों का अंत हो जाएगा।

मंत्र/Mantra

ॐ देवी चन्द्र घण्टायै नमः

पूजा मंत्र /Puja Mantra

पिण्डज प्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता

प्रसादं तनुते मह्यम् चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥

स्तुति मंत्र/ Stuti  Mantra

या देवी सर्वभूतेषु माँ चन्द्रघण्टा रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

ध्यान मंत्र /Meditation Mantra

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।

सिंहारूढा चन्द्रघण्टा यशस्विनीम्॥

मणिपुर स्थिताम् तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्। 

खङ्ग, गदा, त्रिशूल, चापशर, पद्म कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥

पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्।

मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥

प्रफुल्ल वन्दना बिबाधारा कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।

कमनीयां लावण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥

स्रोत /Source 

आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम्।

अणिमादि सिद्धिदात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्॥

चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टम् मन्त्र स्वरूपिणीम्।

धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्॥

नानारूपधारिणी इच्छामयी ऐश्वर्यदायिनीम्।

सौभाग्यारोग्यदायिनी चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्॥)

माँ चंद्रघंटा की आरती 

जय माँ चन्द्रघंटा सुख धाम।

पूर्ण कीजो मेरे काम॥

चन्द्र समाज तू शीतल दाती।

चन्द्र तेज किरणों में समाती॥

क्रोध को शांत बनाने वाली।

मीठे बोल सिखाने वाली॥

मन की मालिक मन भाती हो।

चंद्रघंटा तुम वर दाती हो॥

सुन्दर भाव को लाने वाली।

हर संकट में बचाने वाली॥

हर बुधवार को तुझे ध्याये।

श्रद्दा सहित तो विनय सुनाए॥

मूर्ति चन्द्र आकार बनाए।

शीश झुका कहे मन की बाता॥

पूर्ण आस करो जगत दाता।

कांचीपुर स्थान तुम्हारा॥

कर्नाटिका में मान तुम्हारा।

नाम तेरा रटू महारानी॥

भक्त की रक्षा करो भवानी।

पूजा के समय पीले वस्त्र धारण करें

देवी चंद्रघंटा की पूजा हमेशा पीले वस्त्र पहनकर करनी चाहिए। इसका कारण अपनी सवारी के लिए देवी का प्रेम है- सिंह, जो पीले रंग का होता है।

नवरात्रि में न करें यह गलतियां

  • तुलसी के पत्ते न चढ़ाएं।

  • मां चंद्रघंटा की किसी भी छवि में शेर की दहाड़ नहीं होनी चाहिए।

  • देवी को दूर्वा न चढ़ाएं।

  • ज्वार की बुवाई करें और घर में अखंड ज्योति हो तब घर को खाली न छोड़ें।

  • देवी के प्रत्येक चित्र या मूर्ति के बाईं ओर एक दीया रखें।

  • ज्वार को देवी के चित्र या मूर्ति के दायीं ओर रखें।

  • पूजा हमेशा आसन पर बैठकर करें।

  • आसन जूट या ऊनी का होना चाहिए।

नवरात्रि में व्रत रखते समय रखें इन बातों का हमेशा ध्यान रखें

  • नवरात्रि में पूरे नौ दिनों तक व्रत रखने पर कभी भी अपनी दाढ़ी, मूंछ या बाल नहीं कटवाना चाहिए। लेकिन, एक बच्चे का सिर मुंडवाने के लिए, नवरात्रि एक शुभ समय है।

  • नवरात्रि में नाखून नहीं काटने चाहिए।

  • अगर आप नवरात्रि में कलश, जागरण या अखंड ज्योति लगा रहे हैं तब घर को खाली न छोड़ें।

  • नवरात्रि के दौरान प्याज, लहसुन या मांसाहारी भोजन का सेवन न करें।

  • अगर आपने नवरात्रि का व्रत रखा है तब काले कपड़े नहीं पहनने चाहिए।

  • नवरात्रि में चमड़े से बनी किसी भी चीज का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, जैसे चमड़े के जूते, बैग या बेल्ट।

  • अगर कोई नवरात्रि का व्रत कर रहा है तब उसे कभी भी नींबू नहीं काटना चाहिए।

  • जब किसी ने नवरात्रि का व्रत रखा हो तो नमक के दानों का सेवन नहीं करें। उसे केवल एक प्रकार का आटा, समारी चावल, शाहबलूत आटा, साबूदाना, सेंधा नमक, फल, आलू, मेवा और मूंगफली का सेवन करना चाहिए।

  • विष्णु पुराण के अनुसार दिन में सोने, तंबाकू का सेवन और शारीरिक संबंध बनाने से व्रत का फल नहीं मिलता ।

आप भारतीय त्योहारों, चैत्र नवरात्रि, अन्य सभी प्रमुख भारतीय त्योहारों के लिए लोकप्रिय व्रत तिथियों में ज्योतिष की प्रासंगिकता (Relevance of Astrology) पर इसी तरह के लेख पढ़ सकते हैं।

देवी कुष्मांडा
07 Oct, 2024

नवरात्रि के चौथे दिन शक्ति की देवी मां दुर्गा के चौथे रूप में मां कुष्मांडा की पूजा की जाती है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, यह दुनिया केवल अंधेरे में ढकी हुई थी; फिर, उसने अपने ईश्वरीय विचार से इस दुनिया की रचना की। यही कारण है कि उन्हें ब्रह्मांड के निर्माता के रूप में भी जाना जाता है। उन्हें "आदि स्वरूप" या "आदिशक्ति" के रूप में भी जाना जाता है। नवरात्रि के चौथे दिन मां कुष्मांडा की पूजा का बहुत महत्व है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, जो व्यक्ति नवरात्रि के चौथे दिन देवी कुष्मांडा की पूरी भक्ति के साथ पूजा करता है, उसे आशीर्वाद के रूप में आयु, प्रसिद्धि और शक्ति प्राप्त होती है। चेहरे पर हल्की मुस्कान के साथ, देवी कुष्मांडा के आठ हाथ हैं। उन्हें "अष्टभुजा" के नाम से भी जाना जाता है। उनके सात हाथों में क्रमशः ईवर, धनुष, बाण, कमल का फूल, कलश, घूमने वाला पहिया और एक गदा है। देवी पार्वती के बाद देवी इस रूप में थीं जब तक उन्होंने भगवान कार्तिकेय को जन्म नहीं दिया। इस रूप में देवी पूरे ब्रह्मांड को धारण करती हैं और उसका पोषण करती हैं। जो लोग संतान की इच्छा रखते हैं उन्हें देवी के इस रूप की पूजा करनी चाहिए। सांसारिक लोगों यानी परिवार चलाने वालों के लिए इस देवी की पूजा करना बहुत फायदेमंद होता है।

कुष्मांडा कौन है?/ Who is Kushmanda?

"कू" का अर्थ है "कुछ", "ऊष्मा" का अर्थ है गर्मी, और "अंडा" का अर्थ है "ब्रह्मांड।" शास्त्रों के अनुसार, देवी कुष्मांडा ने अपनी दिव्य मुस्कान से दुनिया के सभी अंधकारों को दूर किया। उनके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान के साथ, देवी कुष्मांडा को सभी दुखों के हरण के रूप में जाना जाता है। उसका निवास सूर्य है। यही एकमात्र कारण है कि देवी कूष्मांडा के पीछे से तेज प्रकाश आ रहा है। वह देवी दुर्गा का एकमात्र रूप हैं जिनके पास सूर्य पर रहने की शक्ति है।

देवी कुष्मांडा का प्रतिनिधित्व/ The Representation of Goddess Kushmanda

उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान के साथ, देवी कुष्मांडा के आठ हाथ हैं, इसलिए उन्हें "अष्टभुजा" भी कहा जाता है। उनके सात हाथों में क्रमशः ईवर, धनुष, बाण, कमल का फूल, कलश, घूमने वाला पहिया और एक गदा है। अष्टम हाथ पर जप की माला है जो सिद्धि की सभी विधियों को निर्धारित करती है। देवी के हाथ में अमृत कलश भक्तों को लंबी उम्र और उत्तम स्वास्थ्य का आशीर्वाद देता है। देवी कुष्मांडा सिंह की पीठ पर सवार है जो धर्म का प्रतीक है।

वह कैसे कुष्मांडा के नाम से जानी जाने लगी? How did she come to be known as Kushmanda?

कुष्मांडा का अर्थ है कद्दू। दुनिया को राक्षसों से छुटकारा दिलाने के लिए देवी दुर्गा कुष्मांडा के अवतार में आईं। पौराणिक कथाओं के अनुसार देवी कुष्मांडा ने ब्रह्मांड की रचना की थी। ऐसी मान्यता है कि अगर आप कद्दू का भोग लगाएं तब वह उससे प्रभावित होंगी। ब्रह्मांड और कद्दू से जुड़े होने के कारण उन्हें कुष्मांडा के नाम से जाना जाने लगा।

नवरात्रि के चौथे दिन का महत्व/ The importance of the fourth day of Navratri

देवी कुष्मांडा नवरात्रि के चौथे दिन की प्रमुख देवता हैं। यह एक व्यापक मान्यता है कि यदि कोई भक्त शुद्ध मन से सभी सभी नियमों के अनुसार देवी की पूजा करता है वह अपने जीवन में शीघ्र ही सर्वोपरि हो जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन उनकी पूजा करने से भक्त के सभी प्रकार के रोग नष्ट हो जाते हैं।

देवी का प्रिय फल/ Favourite fruit of Goddess.

सफेद कद्दू के फल मां कुष्मांडा को अर्पित करें। इसके बाद उन्हें दही और हलवा चढ़ाएं। ब्रह्मांड को एक कद्दू की तरह माना जाता है जो केंद्र में खाली होता है। देवी ब्रह्मांड के केंद्र में निवास करती हैं और पूरे ब्रह्मांड की रक्षा करती हैं। यदि आपको कच्चा कद्दू नहीं मिल रहा है, तब आप उन्हें एक पका हुआ कद्दू भी अर्पित कर सकते हैं। ऐसा करने से सभी रोग और शोक दूर हो जाते हैं।

ऐसा करने से आपके रोग और शोक दूर हो जाएंगे।/All disease and mournings disappear.

देवी की कृपा से भक्त की आयु, यश, शक्ति और स्वास्थ्य में समृद्धि आती है। जो लोग अक्सर बीमारी होते हैं उन्हें देवी कूष्मांडा की पूरी भक्ति के साथ पूजा करनी चाहिए।

देवी कुष्मांडा की कथा/ The tale of Goddess Kushmanda

जब चारों दिशाओं में अंधेरा छा गया था, तब कोई ब्रह्मांड नहीं था। यह वह समय था जब देवी कुष्मांडा ने अपने चेहरे पर हल्की मुस्कान के साथ ब्रह्मांड की रचना की थी। देवी का यह रूप ऐसा है कि वह सूर्य के भीतर भी निवास कर सकती हैं। यह रूप सूर्य के समान चमकीला है। ब्रह्मांड बनाने के बाद, देवी ने त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) और त्रिदेवियों (काली, लक्ष्मी और सरस्वती) को उत्पन्न किया। नवरात्रि के चौथे दिन मां कुष्मांडा की पूजा की जाती है। वह शक्ति का चौथा रूप है, जिसे सूर्य के समान तेजस्वी माना जाता है। 

हमारी देवी के इस रूप का वर्णन कुछ इस प्रकार किया गया है। देवी कुष्मांडा, अपने आठ हाथों से, हमें कर्मयोगी जीवन के लिए प्रोत्साहित करती हैं और साहस प्रदान करती हैं; उसकी प्यारी मुस्कान हमारी जीवन शक्ति को बढ़ाती है और हमें अपने चेहरे पर मुस्कान के साथ सबसे कठिन रास्तों पर चलने में सक्षम बनाती है। देवी दुर्गा के चौथे रूप को देवी कुष्मांडा के नाम से जाना जाता है। अपनी हल्की सी मुस्कान से उन्होंने अण्ड यानि ब्रह्मांड को उत्पन्न किया, यही कारण है कि उन्हें कुष्मांडा के नाम से जाना जाता है। एक पौराणिक कथा के अनुसारजब ब्रह्मांड नहीं था, तब हर जगह अंधेरा था। तब देवी ने अपनी उज्ज्वल मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की। इसलिए, वह आदि स्वरूप, आद्यरूप आदि शक्ति है। अष्टम हाथ पर जप की माला है जो सिद्धि की सभी विधियों को निर्धारित करती है। उनका घर सौर मंडल की आंतरिक दुनिया में स्थित है। 

वह अकेली है जिसके पास वहां रहने की क्षमता और शक्ति है। उसके शरीर का तेज और प्रभाव सूर्य के समान तेजस्वी है। देवी कुष्मांडा की पूजा करने से भक्तों के जीवन से सभी रोग और शोक दूर हो जाते हैं। देवी की कृपा से भक्त की आयु, यश, शक्ति और स्वास्थ्य में समृद्धि आती है। देवी को छोटी-छोटी चीजें देने पर भी प्रसन्नता का अनुभव होता है लेकिन पूरी भक्ति के साथ। सिंह उसका वाहन है। नवरात्रि के चौथे दिन केवल देवी के इस रूप की पूजा की जाती है। इस दिन देवी कुष्मांडा की पूजा करने से भक्त की आयु, प्रसिद्धि, शक्ति और स्वास्थ्य में समृद्धि आती है।

माता कुष्मांडा की पूजा विधि/ Pooja Vidhi of Mata Kushmanda

  • नवरात्रि के चौथे दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान के बाद हरे रंग के वस्त्र धारण करें।

  • इस दिन देवी की पूजा के लिए हरे आसन का प्रयोग करें।

  • देवी कुष्मांडा की मूर्ति या फोटो के सामने घी का दीपक जलाएं और उस पर तिलक लगाएं।

  • देवी की पूजा करते समय उन्हें वस्त्र, सौभाग्य सूत्र, चंदन, रोली, हल्दी, सिंदूर, दूर्वा, बिल्वपत्र, आभूषण, फूलों का हार, सुगंधित, अगरबत्ती, नैवेध, फल, पान के पत्ते चढ़ाएं।

  • अब उसे हरी इलायची, सौंफ और कच्चा कद्दू फल चढ़ाएं।

  • अब ॐ कुष्मांडा देव्यै नमः का 108 बार जाप करें।

  • देवी कुष्मांडा की आरती करें और किसी ब्राह्मण को भोजन कराएं अन्यथा दान करें।

  • इसके बाद त्रिदेव और देवी लक्ष्मी की पूजा करना भी आवश्यक है।

  • आप चाहें तो सिद्ध कुंजिका का पाठ और जाप कर सकते हैं।

  • इसके बाद आप खुद भी प्रसाद लें।

  • मालपुआ कुष्मांडा देवी को बहुत प्रिय है, इसलिए पूजा करने के बाद आप सभी को प्रसाद चढ़ाकर देवी को अर्पित कर सकते हैं, और फिर आप भी ले सकते हैं।

देवी कुष्मांडा का भोग/ The Bhog of Goddess Kushmanda

ऐसा माना जाता है कि अगर देवी कुष्मांडा को कोई चीज पूरी श्रद्धा के साथ अर्पित की जाती है, तब वह उसे सहर्ष स्वीकार कर लेती हैं। लेकिन मालपुए देवी कूष्मांडा को बहुत प्रिय हैं।

देवी कुष्मांडा मंत्र/ Kushmanda Mantra

(ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः॥)

प्रार्थना मंत्र/ Prayer Mantra

(सुरासम्पूर्ण कलशं रुधिराप्लुतमेव च।)

(दधाना हस्त पद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥)

स्तुति/ Stuti

या देवी सर्वभूतेषु मां कूष्मांडा रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

कुष्मांडा ध्यान मंत्र/Kushmanda Meditation Mantra

(वन्दे वाञ्छित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।)

(सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्विनीम्॥)

(भास्वर भानु निभाम् अनाहत स्थिताम् चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।)

(कमण्डलु, चाप, बाण, पद्म, सुधा कलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥)

(पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्।)

(मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥)

(प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।)

(कोमलाङ्गी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥)

कुष्मांडा स्रोत/Kushmanda source

(दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दारिद्रादि विनाशिनीम्।)

(जयंदा धनदां कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥)

(जगन्माता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्।)

(चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥)

(त्रैलोक्यसुन्दरी त्वंहि दुःख शोक निवारिणीम्।)

(परमानन्दमयी, कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥)

देवी कुष्मांडा की आरती/ Aarti of Goddess Kushmanda

(चौथा जब नवरात्र हो, कूष्मांडा को ध्याते।)

(जिसने रचा ब्रह्मांड यह, पूजन है उनका)

(आद्य शक्ति कहते जिन्हें, अष्टभुजी है रूप।)

(इस शक्ति के तेज से कहीं छांव कहीं धूप॥)

(कुम्हड़े की बलि करती है तांत्रिक से स्वीकार।)

(पेठे से भी रीझती सात्विक करें विचार॥)

(क्रोधित जब हो जाए यह उल्टा करे व्यवहार।)

(उसको रखती दूर मां, पीड़ा देती अपार॥)

(सूर्य चंद्र की रोशनी यह जग में फैलाए।)

(शरणागत की मैं आया तू ही राह दिखाए॥)

(नवरात्रों की मां कृपा कर दो मां)

(नवरात्रों की मां कृपा करदो मां॥)

(जय मां कूष्मांडा मैया।)

(जय मां कूष्मांडा मैया॥)

देवी कुष्मांडा की पूजा करने के लाभ/ Benefits of Worshipping Goddess Kushmanda

  • मां कूष्मांडा की पूजा करने से सभी प्रकार के रोग दूर रहते हैं।

  • देवी कुष्मांडा की पूजा करने से जीवन रेखा की प्रसिद्धि और शक्ति में वृद्धि होती है।

  • देवी कूष्मांडा की थोड़ी सी पूजा उन्हें प्रसन्न करती है, और भक्तों को एक आरामदायक, संतुष्ट और समृद्धि से भरा जीवन प्राप्त होता है।

भूल कर भी देवी कूष्मांडा की पूजा करते समय न करें ये काम.../Don't do these things while worshipping Goddess Kushmanda, even if you forget.

यह करें

  • मां दुर्गा के 108 नामों का जाप करें।

  • अपने घर में अनंत अखंड दीपक जलाएं।

  • देवी दुर्गा की दिन में दो बार पूजा करें, यानी सुबह और शाम, और उनकी पूजा करने से पहले भगवान गणेश का ध्यान करें।

  • केवल मंत्र जाप के बाद या पूजा के बाद भोजन न करें।

  • 12 साल और कम उम्र की लड़कियों को फल और कद्दू के फल का प्रसाद चढ़ाएं। अपने मन और विचारों में पवित्रता धारण करें|

यह ना करें/ Dont's:

  • देवी दुर्गा के मंत्र का जाप करते समय अपने शरीर को न हिलाएं और न ही गायन-गीत के रूप में मंत्र का जाप करें।

  • अपने मन और विचारों में पवित्रता धारण करें।

  • नवरात्रि के दौरान अपनी मां और उनकी उम्र की अन्य महिलाओं का सम्मान करें। उनका आशीर्वाद लेकर कोई भी काम शुरू करें।

  • छल, कपट और अपशब्द का प्रयोग न करें।

  • ब्रह्मचर्य के मार्ग पर चलें और गलत लोगों की संगति में न आएं।

सभी समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए करें इस मंत्र का जाप/ Chant this mantra to get relieved of all problems

(शरणागत दीनार्थ परित्राण परायणे)

(सर्वस्यार्ति हरे देवि नारायणी नमोस्तुते)

आप भारतीय त्योहारों, चैत्र नवरात्रि, अन्य सभी प्रमुख भारतीय त्योहारों के लिए लोकप्रिय व्रत तिथियों में ज्योतिष की प्रासंगिकता (Relevance of Astrology) पर इसी तरह के लेख पढ़ सकते हैं।

आप हमारी वेबसाइट से अन्य भारतीय त्योहारों, लोकप्रिय व्रत तिथियों के बारे में भी पढ़ सकते हैं।

साथ ही जन्मकुंडली, लव या अरेंज मैरिज में चुनाव, व्यवसायिक नामों के सुझावस्वास्थ्य ज्योतिषनौकरी या व्यवसाय के चुनाव के बारे में भी पढ़ सकते हैं।           

देवी स्कंदमाता
08 Oct, 2024

देवी स्कंदमाता पहाड़ियों में निवास करती हैं और दुनिया भर के जीवों को नई ऊर्जा और ज्ञान का आशीर्वाद देती हैं। नवरात्रि के पांचवें दिन इस देवी की पूजा की जाती है। ऐसा कहा जाता है कि देवी स्कंदमाता की कृपा से मूर्ख भी बुद्धिमान बन सकता है। देवी दुर्गा के पांचवें रूप को देवी स्कंदमाता के रूप में जाना जाता है। उनका नाम स्कंदमाता उनके पुत्र भगवान स्कंद कुमार (कार्तिकेय) के नाम पर रखा गया है। देवी स्कंदमाता हमेशा अपने पुत्र, भगवान स्कंद कुमार को गोद में एक बच्चे के रूप में लेकर बैठे हुए दिखाई देती हैं। ऐसा माना जाता है कि नवरात्रि के पांचवें दिन साधक का मन विश्राम करता है और मन ही मन माता का एक पूरा चक्कर पूरा करता है। देवी स्कंदमाता की मूर्ति प्रेम और मूल्य का प्रतीक है, जो देवी दुर्गा के महत्व को बताती है। देवी दुर्गा के पांचवें रूप का नाम भगवान कार्तिकेय के नाम पर पड़ा। चूंकि देवी दुर्गा ने भगवान कार्तिकेय को इस रूप में जन्म दिया था, इसलिए उनके नाम पर इस रूप का नाम रखा गया।

देवी स्कंदमाता का प्रतिनिधित्व/ The representation of Goddess Skandamata

देवी स्कंदमाता चार भुजाओं से अपना रूप धारण करती हैं। ऊपरी दाहिने हाथ में भगवान स्कंद कुमार है, और निचले दाहिने हाथ में कमल है। देवी दुर्गा का हर रूप अत्यंत शुभ है और कमल पर विराजमान है। यही कारण है कि देवी स्कंदमाता को देवी विद्या वाहिनी और देवी पद्मासन के रूप में भी जाना जाता है। देवी स्कंदमाता भी सिंह की सवारी करती हैं। देवी स्कंदमाता को सौर मंडल की स्वामी माना जाता है। देवी स्कंदमाता की पूजा करने से भक्तों को अलौकिक सुख की प्राप्ति होती है। यह अलौकिक वरदान साधक की तपस्या पूर्ण करता है। यदि कोई अत्यधिक एकाग्रता के साथ देवी की पूजा करता है, वह अपनी सभी समस्याओं से छुटकारा पाता है और मोक्ष के मार्ग की ओर अग्रसर होता है।

देवी स्कंदमाता कौन हैं?/ Who is Goddess Skandamata?

स्कंदमाता का अर्थ है भगवान स्कंद की माता। देवी पार्वती के बड़े पुत्र का नाम स्कंद है। जब देवी पार्वती ने भगवान स्कंद को जन्म दिया, इसलिए उन्हें देवी स्कंदमाता के नाम से जाना गया। हालांकि, एक कहावत यह भी है कि आदिशक्ति जगदम्बा ने दुनिया को बाणासुर की यातना से मुक्त करने के लिए अपनी ऊर्जा से एक बच्चे को जन्म दिया। छह सिर वाले सनत कुमार को स्कंद कहा जाता है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, देवी स्कंदमाता हिमालय की पुत्री हैं, इसलिए उन्हें पार्वती के नाम से भी जाना जाता है। चूंकि वह भगवान शिव की पत्नी भी हैं, इसलिए उन्हें देवी माहेश्वरी भी कहा जाता है। देवी स्कंदमाता का शरीर गोरा है और उन्हें देवी गौरी के नाम से भी जाना जाता है। भगवान स्कंद, या भगवान कार्तिकेय, को देवता और असुरों के बीच एक प्रसिद्ध युद्ध में देवताओं के प्रमुख के रूप में नियुक्त किया गया था। इसलिए शक्ति और कुमार हमेशा प्राचीन ग्रंथों में भगवान स्कंद के नाम से जाने जाते हैं। देवी स्कंदमाता की चार भुजाएं हैं। उनकी दायीं ओर की निचली भुजा में कमल है, जबकि बायीं ओर की ऊपरी भुजा में वरमुद्रा है। बाईं ओर की निचली भुजा में भी कमल है। उसका पूरा प्रतिनिधित्व शुद्ध है, और वह शेर की सवारी करती है।

देवी स्कंदमाता का महत्व/ Importance of Goddess Skandamata

देवी स्कंदमाता सिंह की सवारी करती हैं, वह क्रोध का प्रतीक हैं, और उनकी गोद में एक बच्चा है जो भगवान कार्तिकेय हैं, जो मातृ प्रेम का प्रतिनिधित्व करते हैं। देवी दुर्गा का यह रूप हमें सिखाता है कि यदि हम भक्ति के मार्ग पर चलने का निर्णय लेते हैं, तब हमें अपने क्रोध पर अत्यधिक नियंत्रण रखना चाहिए, जिस तरह देवी अपने शेर को नियंत्रित करती हैं। दूसरी ओर, देवी की गोद में एक बच्चा हमें सिखाता है कि हम वास्तविक दुनिया में सभी लाभों और प्रेम के साथ, भक्ति का मार्ग भी चुन सकते हैं। इसके लिए बस आपको दृढ़ संकल्प की जरूरत है। यह भी माना जाता है कि मां स्कंदमाता की पूजा करने से महिला को संतान की प्राप्ति होती है। देवी स्कंदमाता के आशीर्वाद से बेहतर सोचने समझने की क्षमता प्राप्त होती है। यह भी कहा जाता है कि केवल देवी स्कंदमाता के आशीर्वाद के कारण, कालिदास ने महाकाव्य रघुवंशम और मेघदूत का निर्माण किया।

देवी स्कंदमाता की पूजा का महत्व/ Significance of worshipping Goddess Skandamata

यदि देवी स्कंदमाता की पूजा दृढ़ मन से की जाती है, तब ऐसा माना जाता है कि वह अपने उपासकों को दुनिया की हर खुशी का आशीर्वाद देते हैं। यदि कोई दंपत्ति गर्भधारण नहीं कर पा रहा है या ऐसा करने में कठिनाई का सामना कर रहा है, तब नवरात्रि में देवी स्कंदमाता की पूजा करना लाभकारी होता है। मां स्कंदमाता की पूजा करने से दंपति की संतान संबंधी सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं। यदि बृहस्पति ग्रह का आपकी कुंडली पर मजबूत या अच्छा प्रभाव नहीं है, तब देवी स्कंदमाता की पूजा करने से मदद मिल सकती है। उनकी पूजा करने से लोगों को घर में चल रहे सभी तर्कों से छुटकारा पाने में भी मदद मिल सकती है। यह शुभ और उज्ज्वल ऊर्जा के साथ  देवी के आशीर्वाद के रूप में प्राप्त होता है।

मां स्कंदमाता के आशीर्वाद से संतान की प्राप्ति होती है/ Goddess Skandamata blessed with a child.

जिन लोगों को संतान प्राप्ति में कठिनाई हो रही है उन्हें मां दुर्गा के इस रूप की पूजा करनी चाहिए। माना जाता है कि आदिशक्ति के इस रूप से लोगों को संतान की प्राप्ति होती है। जब आप एक बच्चे के लिए देवी स्कंदमाता की पूजा कर रहे हों तो भगवान कार्तिकेय का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है।

देवी स्कंदमाता एकता सिखाती हैं/ Goddess Skandamata teaches unity.

देवी स्कंदमाता हमें सिखाती हैं कि जीवन किस तरह से अपने आप में अच्छाई और बुराई के बीच निरंतर लड़ाई है जैसे कि भगवान और असुरों के बीच की लड़ाई, और व्यक्ति स्वयं ऐसे सभी युद्धों का सेनापति बन कर सभी समस्याओं का सामना कर सकता है। विवेकपूर्ण निर्णय लेने की शक्ति प्राप्त करने के लिए हमें देवी स्कंदमाता की पूजा करनी चाहिए। इस पूजा के लिए मन, वृत्ति और मध्यस्थता के लिए दृढ़ मन होना चाहिए। यह संयोजन व्यक्ति को सुख और शांति प्रदान करता है।

देवी सभी समस्याओं को दूर करती हैं/ Goddess takes away all the problems.

शास्त्रों में देवी स्कंदमाता की पूजा का विशेष महत्व है। मां स्कंदमाता की पूजा करने से साधक अपनी सभी मनोकामनाएं पूरी कर सकता है। भक्तों को शांति मिलती है। चूंकि वह सौरमंडल की सबसे शक्तिशाली देवी हैं, इसलिए उनकी प्रचंड ऊर्जा और भी अधिक महत्वपूर्ण है। अत: दृढ़ निश्चय और शुद्ध मन से इस देवी की आराधना करने से साधक को समुद्र पार करने जैसी क्षमता भी प्राप्त हो जाती है।

स्कंदमाता प्रेम की देवी हैं/ Skandamata is the Goddess of love.

कार्तिकेय को भगवान का सेनापति माना जाता है, और देवी स्कंदमाता को अपने पुत्र के प्रति अत्यधिक स्नेह है। जब भी राक्षस पृथ्वी पर शासन करना शुरू करते हैं, देवी सिंह पर सवार होकर अपने उपासकों को बचाने के लिए पृथ्वी पर आती हैं। देवी स्कंदमाता अपने बेटे के नाम से जुड़ना पसंद करती हैं। इसलिए इन्हें प्रेम और मातृत्व की देवी माना जाता है।

देवी स्कंदमाता की पूजा के लिए निम्नलिखित सामग्री का महत्व/ Importance of the following ingredients for worshipping Goddess Skandamata

देवी स्कंदमाता की पूजा में धनुष वाण अर्पित करना महत्वपूर्ण है। उन्हें लाल दुपट्टा, सिंदूर, नाख़ून पालिश, बिंदी, मेहंदी, लाल चूड़ियाँ, लिपस्टिक, और अन्य सामान भी देना चाहिए जो एक विवाहित महिला उपयोग करती है। नवरात्रि के पांचवें दिन, यदि कोई महिला देवी स्कंदमाता को लाल फूलों के साथ सभी सामग्री अर्पित करती है, तब उन्हें लंबे समय तक विवाहित जीवन और बच्चों का आशीर्वाद मिलता है। देवी दुर्गा के अन्य रूपों की तरह ही उनकी पूजा भी की जाती रही है।

देवी स्कंदमाता पूजा प्रक्रिया/ Goddess Skandamata Puja Procedure

  • नवरात्रि के पांचवें दिन प्रात:काल स्नान कर धुले हुए वस्त्र धारण करें।

  • अब अपने घर के मंदिर या पूजा स्थल में देवी स्कंदमाता का चित्र लगाएं।

  • गंगाजल से स्वयं को शुद्ध करें।

  • देवी की मूर्ति को जल से साफ करें।

  • अब कलश में कुछ सिक्के पानी में डालें।

  • मंत्रों का जाप करते हुए व्रत का संकल्प पढ़ें।

  • अब मां स्कंदमाता को कुमकुम और रोली लगाएं।

  • मूर्ति को पोशाक पहनाएं और भोग लगाएं। 

देवी स्कंदमाता की आरती/Goddess Skandamata Aarti

जय तेरी हो स्कंदमाता

पांचवा नाम तुम्हारा आता

सब के मन की जानन हारी

जग जननी सब की महतारी 

तेरी ज्योत जलाता रहूं मैं

हरदम तुम्हे ध्याता रहूं मैं

कई नामो से तुझे पुकारा

मुझे एक है तेरा सहारा

कहीं पहाड़ों पर है डेरा

कई शहरों में तेरा बसेरा

हर मंदिर में तेरे नजारे गुण गाए

तेरे भगत प्यारे भगति

अपनी मुझे दिला दो शक्ति

मेरी बिगड़ी बना दो

इन्द्र आदी देवता मिल सारे

करे पुकार तुम्हारे द्वारे

दुष्ट दत्य जब चढ़ कर आये

तुम ही खंडा हाथ उठाये

दासो को सदा बचाने आई

चमनकी आस पुजाने आई

जय तेरी हो स्कंदमाता...

मां स्कंदमाता को भोग लगाएं/ Offer Bhog to Goddess Skandamata

देवी स्कंदमाता को केले पसंद हैं, इसलिए आपको उन्हें केले का भोग लगाना चाहिए और फिर वही केले ब्राह्मणों या पंडितों को देना चाहिए। ऐसा करने से साधक का स्वास्थ्य अच्छा बना रहता है। आप देवी स्कंदमाता को भोग के रूप में खीर और मेवा भी चढ़ा सकते हैं, वह उससे भी प्रसन्न हो जाती है।

 पूजा मंत्र/ Puja Mantra

ओम देवी स्कन्दमातायै नमः॥

प्रार्थना / Prayer

सिंहासनगता नित्यं पद्माञ्चित करद्वया।

शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥

स्तुति मंत्र

या देवी सर्वभू‍तेषु मां स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

सर्वदा पातु मां देवी चान्यान्यासु हि दिक्षु वै॥

देवी स्कंदमाता के लिए श्लोक/Shlok for Goddess Skandamata

देवी स्कंदमाता से सभी आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए, देवी को प्रसन्न करने के लिए नवरात्रि के पांचवें दिन इन श्लोकों को दोहराना चाहिए।

  • या देवी सर्वभू‍तेषु माँ स्कंदमाता रूपेण संस्थिता।

  • नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और स्कंदमाता के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, मैं आपको बारंबार प्रणाम करता/करती हूँ. हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें. 

इस दिन साधक का मन 'विशुद्ध' चक्र में अवस्थित होता है. इनके विग्रह में भगवान स्कंद बालरूप में इनकी गोद में बैठे होते हैं.

इस मंत्र से ध्यान लगाकर करें माता की आराधना..

  • वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।

  • सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा स्कन्दमाता यशस्वनीम्।।

  • धवलवर्णा विशुध्द चक्रस्थितों पंचम दुर्गा त्रिनेत्रम्।

  • अभय पद्म युग्म करां दक्षिण उरू पुत्रधराम् भजेम्॥

  • पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानांलकार भूषिताम्।

  • मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल धारिणीम्॥

  • प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वांधरा कांत कपोला पीन पयोधराम्।

  • कमनीया लावण्या चारू त्रिवली नितम्बनीम्॥

मां स्कंदमाता कथा/ Maa Skandmata Story

  • भगवानों के सेनापति- दुर्गा पूजा के पांचवें दिन भगवान कार्तिकेय की मां की पूजा की जाती है। कार्तिकेय कुमार का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में सनत कुमार और स्कंद कुमार के रूप में किया गया है। देवी स्कंदमाता का रूप धारण करने पर देवी को अपनी सारी ममता अपने बालक को देते हुए देखा जाता है। देवी के इस रूप को सबसे शुद्ध कहा जाता है।

  • जब भी बुराई बहुत फैलती है, देवी शेर की सवारी करने वाले उपासक के उद्धार करने के लिए, बुराई को नष्ट करने के लिए आती हैं। देवी स्कंदमाता की चार भुजाएं हैं जिनमें से दो में कमल और दूसरे में उनके पुत्र हैं, जबकि चौथी भुजा सभी को आशीर्वाद देने वाली मानी जाती है।

  • देवी स्कंदमाता हिमालय की पुत्री हैं, और उन्हें माहेश्वरी और गौरी के नाम से भी जाना जाता है। उन्हें पार्वती कहा जाता है, भगवान हिमराज की बेटी होने के नाते, माहेश्वरी भगवान शिव की पत्नी हैं, और गौरी उनकी गोरी त्वचा के लिए हैं। उसे अपने बेटे से बहुत प्यार है और इसलिए उन्हें अपने बेटे के नाम से पुकारा जाना पसंद है। जो कोई भी देवी दुर्गा के इस रूप की पूजा करता है, वह उस उपासक को अपने पुत्र के समान मानती है।

  • देवी स्कंदमाता ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए बहुत प्रार्थना की है, और इसलिए जब वह देवी की पूजा कर रहे हों तब हमेशा भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए, अन्यथा उन्हें देवी का आशीर्वाद नहीं मिलेगा।

  • जब वह देवी स्कंदमाता की पूजा करते हैं तब वह शांति के मार्ग पर चलते हैं। उनके आशीर्वाद से, महान विद्वानों और सेवकों का जन्म होता है। ऐसा माना जाता है कि कालिदास देवी के आशीर्वाद से ही रघुवंशम और मेघदूत की रचना कर सकते थे।

स्कंदमाता की पूजा करने से क्या मिलता है?

  • देवी स्कंदमाता की कृपा से शीघ्र ही संतान की प्राप्ति हो सकती है।

  • यदि आपके बच्चे से संबंधित कोई समस्या है, तो देवी उसमें भी मदद कर सकती हैं।

  • देवी स्कंदमाता को हमेशा पीले फूल और अन्य सामान चढ़ाएं।

  • अगर आप भी पीले रंग के कपड़े पहनते हैं, तो आपको पूजा का ज्यादा से ज्यादा फायदा मिलना तय है।

  • इसके बाद अपनी इच्छाएं पूरी कर सकते हैं, खासकर बच्चों से जुड़ी हुई।

विशुद्ध चक्र कमजोर हो तो क्या करें?/ What if the Vishudh Chakra is weak?

विशुद्ध चक्र गले के ठीक पीछे होता है। यदि यह कमजोर है, तो किसी की आवाज तुलनात्मक रूप से कमजोर होती है। इस समस्या से किसी को हकलाने या गूंगेपन जैसी समस्या भी हो सकता है। यह कमजोरी कान, नाक और गर्दन की समस्या भी पैदा कर सकती है। नवरात्रि के पांचवे दिन स्कंदमाता की पूजा करने से आपको इस समस्या से छुटकारा मिल सकता है|

आप हमारी वेबसाइट से अन्य भारतीय त्योहारों, लोकप्रिय व्रत तिथियों के बारे में भी पढ़ सकते हैं।

साथ ही जन्मकुंडलीलव या अरेंज मैरिज में चुनाव, व्यवसायिक नामों के सुझावस्वास्थ्य ज्योतिषनौकरी या व्यवसाय के चुनाव के बारे में भी पढ़ सकते हैं।        

देवी कात्यायनी
09 Oct, 2024

नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। देवी कात्यायनी का जन्म ऋषि कात्यायन के घर हुआ था। इसलिए उन्हें कात्यायनी के नाम से जाना जाता है। महिषासुर नाम के राक्षस का वध करने के लिए देवी ने यह रूप धारण किया था। देवी के इस रूप को बहुत हिंसक माना जाता है  इसलिए उन्हें युद्ध के देवता के रूप में भी जाना जाता है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी कात्यायनी की पूजा करने से विवाह में दोष दूर हो जाते हैं, बृहस्पति देवता प्रसन्न हो जाते हैं और इस वजह से एक अद्भुत विवाह का योग बनता है| अगर इनकी पूजा पूरी श्रद्धा से की जाए तब दांपत्य जीवन में सुख-शांति आती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवी कात्यायनी की पूजा करने से भक्त को आज्ञा चक्र उत्पन्न करने का आशीर्वाद मिलता है; इसके अलावा, वह अलौकिक चमक और प्रभाव से परिपूर्ण हो जाता है|देवी कात्यायनी की पूजा करने से सभी रोग, दुख और भय नष्ट हो जाते हैं।

देवी कात्यायनी कौन हैं?/ Who is Goddess Katyayani?

यह एक व्यापक मान्यता है कि महान ऋषि कात्यायन ने बहुत तपस्या की, जिससे आदिशक्ति प्रसन्न हुई। आशीर्वाद के रूप में, उन्होंने उनकी बेटी के रूप में जन्म लिया; इसलिए उनको देवी कात्यायनी के नाम से जाना जाता है। देवी कात्यायनी को बृज की देवी शिष्टात्री भी माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, गोपियों ने भगवान श्रीकृष्ण को पति के रूप में पाने के लिए यमुना नदी के तट पर देवी कात्यायनी की पूजा की थी। यह भी माना जाता है कि देवी कात्यायनी ने अत्याचारी राक्षस महिषासुर का वध किया और तीनों लोकों को उसके आतंक से मुक्त किया। 

देवी कात्यायनी का प्रतिनिधित्व/ The representation of Goddess Katyayani

देवी कात्यायनी का रूप तेजस्वी और भव्य है। उनकी चार भुजाएं हैं। देवी कात्यायनी के दाहिने तरफ का ऊपरी हाथ अभय मुद्रा या निर्भयता के भाव में है, और निचला हाथ वर मुद्रा या उदारता का प्रतीक है। बाईं ओर ऊपर वाले हाथ में तलवार और निचले हाथ में कमल का फूल है। देवी कात्यायनी सिंह की पीठ पर सवार हैं।

मूल/ Roots (Origin)

कात्यायनी देवी दुर्गा का छठा अवतार है, जिनकी पूजा नवरात्रि के छठे दिन की जाती है। प्राचीन किंवदंतियों और हिंदू शास्त्रों के अनुसार, उनका जन्म ऋषि कात्यायन की बेटी के रूप में हुआ था। ऋषि कात्यायनी का जन्म कात्या वंशावली में हुआ था। इस वंशावली की उत्पत्ति महान ऋषि विश्वामित्र से हुई थी। इस तरह उनका नाम "कात्यायनी" रखा गया, जिसका अर्थ है कात्यायन की बेटी। अन्य किंवदंतियों के अनुसार, ऋषि कात्यायन वह व्यक्ति थे जिन्होंने देवी कात्यायन की पूजा की थी; यही कारण है कि "कात्यायनी उसे अपना नाम स्वीकार करती है"|

देवी कात्यायनी की पूजा का महत्व/ The importance of the Worship of Goddess Katyayani

शास्त्रों के अनुसार, देवी आदिशक्ति के छठे रूप यानी देवी कात्यायनी की नवरात्रि के छठे दिन पूजा की जाती है। दुर्गा सप्तशती के केंद्रीय चरित्र में, महिषासुर का उल्लेख मिलता है, देवी कात्यायनी ने उसका वध किया था। इसलिए उनके भक्त उन्हें महिषासुर मर्दिनी भी कहते हैं। इस देवी की पूजा करने से लड़कियों को सही जीवन साथी मिलता है और उनके विवाह में आने वाली बाधाएं भी दूर होती हैं। भागवत पुराण के अनुसार देवी कात्यायनी के भक्तों को इस संसार के सभी सुख सुलभ हो जाते हैं। देवी अपने भक्तों के प्रति हमेशा उदार रहती हैं और उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। देवी कात्यायनी का रूप अपने आप में इस तथ्य की अभिव्यक्ति है। 

ऋषि कात्यायन देवी आदिशक्ति के सबसे बड़े भक्त थे। उनकी तपस्या से प्रभावित होकर, उन्होंने उन्हें अपने परिवार में उनकी बेटी के रूप में पैदा होने का वरदान दिया। ऐसा माना जाता है कि भगवान राम और भगवान श्री कृष्ण ने भी देवी कात्यायनी के इस रूप की पूजा की थी। बृज मंडल की गोपियों ने भी भगवान श्री कृष्ण को अपने पति के रूप में पाने की इच्छा से उनकी पूजा की। देवी कात्यायनी ने ऋषि कात्यायन से कहा कि वह उनकी बेटी के रूप में पैदा होंगी, लेकिन इस बात के पीछे मूल कारण, इस ब्रह्मांड में धर्म को बनाए रखना है, और महिषासुर का अंत करने के लिए भी यह आवश्यक था। देवी ने महिषासुर का वध किया और संसार को भय से मुक्त किया। 

हिंदू मान्यताओं और हिंदू शास्त्रों के अनुसार/According to Hindu beliefs

यह माना जाता है कि भक्त देवी कात्यायनी की पूजा करते हैं क्योंकि वह बहादुरी, ज्ञान और शक्ति की मूर्ति है। कहा जाता है कि उनकी पूजा करने से भक्तों को आंतरिक शक्ति प्राप्त होती है। शास्त्रों और वेदों के अनुसार, यह उल्लेख किया गया है कि विवाह योग्य लड़कियां अच्छे पति की प्राप्ति के लिए एक महीने तक कात्यायनी व्रत करती हैं। एक महीने में, देवी कात्यायनी की नियमित रूप से फूल, प्रार्थना, अगरबत्ती और चंदन से पूजा की जाती है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, देवी कात्यायनी अपनी स्त्री भक्तों के लिए अधिक महत्व रखती है। इसलिए, तमिलनाडु के कुछ क्षेत्रों में, पोंगल के समय, युवा लड़कियां समृद्धि और अच्छे भाग्य की प्राप्ति के लिए देवी कात्यायनी की पूजा करती हैं। 

देवी कात्यायनी की पूजा करने से उनके भक्तों के जीवन से सभी प्रकार की नकारात्मकताएं भी दूर हो जाती हैं। नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। सिंह सवार देवी कात्यायनी ने महिषासुर का वध किया, इसलिए इनकी पूजा से अद्भुत शक्ति मिलती है, और आपको अपने शत्रुओं से लड़ने की शक्ति प्राप्त होती है। देवी जगदम्बा के इस मंत्र का जाप हमेशा फलदायी होता है।

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता। 

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥

अर्थ: हे देवी! शक्ति और कीर्ति के रूप में सर्वव्यापक अम्बा, मैं आपके सामने बार-बार नमन करता हूं। 

देवी दुर्गा के छठे रूप, यानी देवी कात्यायनी की भगवान राम और भगवान श्री कृष्ण ने भी पूजा की थी। बृज मंडल की गोपियों ने भी भगवान श्रीकृष्ण को पति के रूप में पाने की इच्छा से उनकी पूजा की। देवी कात्यायनी की कथाएं देवी भागवत, मार्कंडेय और स्कंद पुराण में पाई जा सकती हैं। शास्त्रों में उल्लेख है कि ऋषि कात्यायन देवी आदिशक्ति के भक्त थे। उसके कोई संतान न थी। उन्होंने देवी के लिए तपस्या की और बदले में एक बेटी को वरदान के रूप में मांगा। इस दौरान महिषासुर के अत्याचार दिन-ब-दिन बढ़ते ही जा रहे थे। उसने देवताओं को स्वर्ग से भगा दिया। देवताओं के क्रोध से ऊर्जा का निर्माण  हुआ, जिसने एक बालिका के रूप में जन्म लिया। यह ऊर्जा ऋषि कात्यायन के घर उनकी पुत्री के रूप में उत्पन्न हुई । ऋषि जानते थे कि देवी का जन्म उनके घर में उनकी पुत्री के रूप में हुआ है। देवी की पूजा करने वाले पहले ऋषि थे, और इसलिए उन्हें कात्यायनी के नाम से जाना जाने लगा।

देवी ने महिषासुर का वध किया/ The Goddess killed Mahishasura.

देवी के प्रकट होने का मूल उद्देश्य महिषासुर की मृत्यु थी। आश्विन शुक्ल नवमी के दिन कात्यायन मुनि की पूजा के बाद वह महिषासुर का वध करने के लिए प्रकट हुईं। इसके बाद नवरात्रि के नवमी और दशमी दिन देवी महिषासुर से युद्ध में लग गईं। दशमी के दिन देवी ने शहद से भरा एक भृंग का पत्ता खाया और महिषासुर का वध किया। इसके बाद उन्हें महिषासुर मर्दिनी के नाम से जाना जाने लगा। उनकी पूजा करने से मानव जीवन के सभी चार लक्ष्यों, अर्थ (धन), काम (इच्छा), धर्म (धार्मिकता), और मोक्ष (मुक्ति) को प्राप्त करता है। 

स्कंद पुराण में वर्णित है कि देवी कात्यायनी का जन्म भगवान के प्राकृतिक क्रोध से हुआ था। जिसने देवी पार्वती द्वारा दिए गए शेर की पीठ पर सवार होकर महिषासुर का वध किया था। वह शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है। देवी कात्यायनी का उल्लेख मार्कंडेय पुराण के देवी भागवत पुराण और देवी महात्म्य में पाया जाता है, जिसकी रचना ऋषि मार्कंडेय ने की थी। देवी कात्यायनी का उल्लेख बौद्ध, जैन शास्त्रों, तांत्रिक ग्रंथों और कालिका पुराण (दसवीं शताब्दी) में भी मिलता है, जिसमें विशेष रूप से देवी का उल्लेख है कि भगवान जगन्नाथ और देवी कात्यायनी ओडिशा में रहते हैं। 

नवरात्रि के छठे दिन देवी की शोभायात्रा/ The procession of The Goddess on the Sixth day of Navratri

पूजा पंडालों में, छठे दिन शाम को, देवी को पालकी पर ले जाने के लिए एक संगीतमय जुलूस निकाला जाता है। दो उलझी हुई लताओं वाले बेल के पेड़ की पूजा की जाती है और देवी को पूजा के लिए आमंत्रित किया जाता है। नवरात्रि के सातवें दिन सुबह-सुबह इस बेल को पालकी पर भी ले जाया जाता है और फिर देवी की आंखों में प्रकाश प्रवाहित करने के लिए इसकी पूजा की जाती है। पूजा पंडालों में इस कार्य को पूरा करने के बाद, देवी का चेहरा खुला रहता है, और भक्त उनके रूप का दर्शन करते हैं और धन्य महसूस करते हैं।

देवी कात्यायनी की पूजा की विधि/ The procedure of worshipping Goddess Katyayani

  • नवरात्रि के छठे दिन यानी षष्ठी के दिन स्नान के बाद लाल या पीले रंग के वस्त्र धारण करें।

  • सबसे पहले देवी कात्यायनी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।

  • अब गंगाजल को चारों तरफ छिड़कें और शुद्ध करें।

  • अब देवी के सामने एक जलता हुआ दीपक रखें।

  • अब अपने हाथ में एक फूल रखें और देवी के सामने बैठ कर ध्यान करें।

  • प्रसाद, पीले फूल, कच्ची हल्दी की गांठ और शहद चढ़ाएं।

  • अगरबत्ती और दीपक से देवी की पूजा करें।

  • उनकी पूजा करने के बाद प्रसाद को सभी में बांटे और फिर स्वयं भी इसका सेवन करें।

देवी कात्यायनी का प्रिय भोजन और रंग/The favourite food and colour of Goddess Katyayani

देवी कात्यायनी का पसंदीदा रंग लाल रंग है, और ऐसा माना जाता है, कि वह शहद के प्रसाद से प्रसन्न हो सकती हैं। ऐसा भी माना जाता है कि नवरात्रि के छठे दिन देवी कात्यायनी को शहद चढ़ाना शुभ होता है। देवताओं की प्रार्थना सुनने के परिणामस्वरूप, देवी कात्यायनी महिषासुर का वध करने के लिए युद्ध पर चली गई। महिषासुर के साथ द्वंद्व के दौरान जब देवी कात्यायनी को थकान महसूस हुई, तब उन्होंने शहद से भरा एक भृंग का पत्ता खा लिया जिससे उनकी सारी थकान दूर हो गई और वह महिषासुर को मारने में सक्षम हो गईं। देवी कात्यायनी को प्रसन्न करने और उनकी पूजा करने के लिए, उन्हें शहद से भरे पान के पत्ते चढ़ाने चाहिए। देवी कात्यायनी का ध्यान करने का सही समय गोधूलि काल है। ऐसा माना जाता है कि धूप, दीप और गुग्गुल से मां की पूजा करने से सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं। जो भक्त देवी को पांच प्रकार की मिठाइयां अर्पित करता है और फिर अविवाहित लड़कियों को भोग लगाता है, उसे स्वयं देवी द्वारा सभी सुखों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। जातक अपनी मेहनत और क्षमता के अनुसार धन कमाने में सफल होता है। 

देवी की उपासना किस प्रकार की मनोकामना पूर्ण करती है?/ What kind of desires does her worship fulfill?

अविवाहित कन्याओं का विवाह कराने के लिए देवी पूजा करना अत्यंत आवश्यक माना जाता है। मनोवांछित विवाह और प्रेम विवाह के लिए भी इनकी पूजा की जाती है। इनकी पूजा वैवाहिक जीवन के लिए फलदायी है। जातक की कुंडली में विवाह की संभावना कम होने पर  विवाह भी होगा।

देवी का संबंध किस ग्रह और देवी-देवताओं से है?/ The Goddess is related to which planet and Gods and Goddesses?

  • स्त्री के विवाह से जुड़े होने का कारण देवी का सम्बन्ध बृहस्पति ग्रह से जुड़ा है।

  • युगल के जीवन के साथ अपने संबंधों के कारण वह आंशिक रूप से शुक्र से भी संबंधित है।

  • शुक्र और बृहस्पति दोनों अलौकिक और तेज ग्रह हैं; इसलिए देवी का तेज अलौकिक और पूर्ण है।

  • देवी भगवान श्री कृष्ण और उनकी गोपियों से संबंधित हैं, और वह ब्रजमंडल की अष्टियत्री देवी हैं।

जल्दी शादी के लिए कैसे करें मां कात्यायनी की पूजा?/ How to worship Mother Katyayani for early marriage?

  • गोधूलि के समय पीले वस्त्र धारण करें।

  • देवी के सामने दीपक जलाएं और उन्हें पीले फूल चढ़ाएं।

  • इसके बाद उन्हें हल्दी की तीन गांठ अर्पित करें। हल्दी की गांठ अपने पास सुरक्षित रखें।

  • मां कात्यायनी को शहद का भोग लगाएं।

  • यह शहद चांदी के बर्तन में पढ़ाया जाए तो सबसे अच्छा रहेगा।

  • इससे आपका प्रभाव और आकर्षण बढ़ेगा।

देवी कात्यायनी के मंत्रों का जाप करें।

मंत्र इस प्रकार हैं- "कात्यायनी महामाये,

महायोगिनौधिश्वरी("कात्यायनी महामाये, महायोगिनधीश्वरी।

नंदगोपसुतन देवी, पति मे कुरु ते नमः।।"

नंदगोपस्तं देवी, पति से कुरु ते नमः:

देवी कात्यायनी की पूजा से लाभ/ Benefits from the worship of Goddess Katyayani

देवी कात्यायनी की पूजा करने से अविवाहित लड़कियों के विवाह की सभी बाधाएं नष्ट हो जाती हैं और उन्हें एक योग्य पति की प्राप्ति होती है। साथ ही, यदि निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार देवी की पूजा की जाती है, तब भक्त सफलता प्राप्त करने के रास्ते में आने वाली किसी भी बाधा पर विजय प्राप्त कर सकता है। देवी दुर्गा के छठे रूप यानी कात्यायनी की पूजा करने से राहु और कालसर्प दोष दूर होता है। ऐसा माना जाता है कि देवी कात्यायनी की पूजा करने से सभी मानसिक, त्वचा, हड्डी से संबंधित संक्रमण और रोग दूर हो जाते हैं और कैंसर की संभावना कम हो जाती है। देवी कात्यायनी को लौकी का भोग लगाएं। वैसे, देवी को प्रसन्न करने के लिए आप उन्हें शहद और मीठे भृंग का पत्ता भी चढ़ा सकते हैं। 

यदि आपकी कुंडली में बृहस्पति ग्रह खराब स्थिति में है, तब केवल देवी कात्यायनी की पूजा करने से आपके बृहस्पति को बेहतर स्थिति में रखा जा सकता है। देवी कात्यायनी की पूजा करने से आज्ञा चक्र उत्पन्न होता है, जिससे साधक स्वयं सभी सिद्धियों को प्राप्त करता है। देवी की आराधना से समस्त दुःख, क्रोध, भय आदि का नाश होता है। 

देवी कात्यायनी की कथा/ The tale of Goddess Katyayani

हिंदू पौराणिक कथाओं और शिव महापुराण के अनुसार, एक बार महिषासुर नाम का एक राक्षस था, जिसके पास अपार मानसिक और शारीरिक शक्तियाँ थीं। महिषासुर का उद्देश्य पृथ्वी सहित सभी रचनाकारों और उनकी रचनाओं को नष्ट करना था। इसलिए अपनी  पाशविक शक्ति से पृथ्वी की रक्षा करने और महिषासुर का वध करने के लिए देवी पार्वती, देवी दुर्गा अर्थात देवी कात्यायनी, के दूसरे रूप में प्रकट हुईंमहिषासुर कई बार अपना रूप बदल सकता था। एक बार जब उसने भैंस का रूप धारण किया, तब देवी कात्यायनी अपने शेर से उठीं और अपने त्रिशूल से राक्षस की गर्दन पर हमला किया और उसे मार डाला। यही कारण है कि उन्हें पृथ्वी की योद्धा देवी और उद्धारकर्ता के रूप में जाना जाता है। 

एक अन्य प्रसिद्ध कथा के अनुसार, महान ऋषि कात्यायन ने देवी आदिशक्ति के लिए घोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर, देवी ने उन्हें वरदान दिया कि वह उनकी बेटी के रूप में उनके घर पैदा होंगी। देवी का जन्म ऋषि कात्यायन के आश्रम में हुआ था। देवी का पालन-पोषण स्वयं ऋषि कात्यायन ने किया था। 

शास्त्रों के अनुसार महिषासुर नाम के दैत्य का अत्याचार काफी बढ़ गया था।उस समय त्रिदेवों की महिमा से देवी का जन्म हुआ था। देवी का जन्म अश्विन मास (माह) के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन ऋषि कात्यायन के यहाँ हुआ था। इसके बाद ऋषि कात्यायन ने तीन दिनों तक उनकी पूजा की। दशमी तिथि को देवी ने महिषासुर का वध किया था। इसके बाद, शुंभ और निशुंभ ने भी स्वर्ग पर आक्रमण किया और इंद्र का सिंहासन छीन लिया, और नवग्रहों (नौ ग्रहों) को बंधक बना लिया। उन्होंने अग्नि और वायु के देवताओं की शक्तियों को भी पूरी तरह से छीन लिया। उन दोनों ने देवताओं का अपमान किया और उन्हें स्वर्ग से बाहर फेंक दिया। इसके बाद सभी देवताओं ने देवी कात्यायनी से प्रार्थना की, जिसके बाद उन्होंने शुंभ और निशुंभ दोनों का वध किया और ऐसा करने से देवताओं को इस संकट से मुक्ति मिली क्योंकि माता ने देवताओं को आशीर्वाद दिया था कि वह संकट के समय उनकी रक्षा करेंगी। 

देवी कात्यायनी मंत्र/ Goddess Katyayani Mantra

ओम देवी कात्यायनी नमः

वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।

सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्वनीम्॥

स्वर्णाआज्ञा चक्र स्थितां षष्टम दुर्गा त्रिनेत्राम्।

वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥

पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालंकार भूषिताम्।

मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥

प्रसन्नवदना पञ्वाधरां कांतकपोला तुंग कुचाम्।

कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम॥

देवी कात्यानी पाठ

कंचनाभा वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलां।

स्मेरमुखीं शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोअस्तुते॥

पटाम्बर परिधानां नानालंकार भूषितां।

सिंहस्थितां पदमहस्तां कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥

मां कात्यायनी की आरती/ Maa Katyayani Ki Aarti 

जय कात्यायनि माँ, मैया जय कात्यायनि माँ 

उपमा रहित भवानी, दूँ किसकी उपमा ॥

मैया जय कात्यायनि, गिरजापति शिव का तप, असुर रम्भ कीन्हाँ 

वर-फल जन्म रम्भ गृह, महिषासुर लीन्हाँ ॥

मैया जय कात्यायनि, कर शशांक-शेखर तप, महिषासुर भारी

शासन कियो सुरन पर, बन अत्याचारी ॥

मैया जय कात्यायनि, त्रिनयन ब्रह्म शचीपति, पहुँचे, अच्युत गृह

महिषासुर बध हेतू, सुर कीन्हौं आग्रह ॥

मैया जय कात्यायनि, सुन पुकार देवन मुख, तेज हुआ मुखरित

जन्म लियो कात्यायनि, सुर-नर-मुनि के हित ॥

मैया जय कात्यायनि, अश्विन कृष्ण-चौथ पर, प्रकटी भवभामिनि

पूजे ऋषि कात्यायन, नाम कात्यायिनि ॥

मैया जय कात्यायनि, अश्विन शुक्ल-दशी को, महिषासुर मारा

(पटाम्बर परिधानां नानालंकार भूषितां।)

(सिंहस्थितां पदमहस्तां कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥)

आप हमारी वेबसाइट से अन्य भारतीय त्योहारों, लोकप्रिय व्रत तिथियों के बारे में भी पढ़ सकते हैं।

साथ ही जन्मकुंडलीलव या अरेंज मैरिज में चुनाव, व्यवसायिक नामों के सुझावस्वास्थ्य ज्योतिषनौकरी या व्यवसाय के चुनाव के बारे में भी पढ़ सकते हैं।        

 

देवी कालरात्रि
10 Oct, 2024

मां दुर्गा की सातवीं शक्ति का नाम कालरात्रि है। दुर्गा पूजा के सातवें दिन देवी कालरात्रि की पूजा की जाती है। देवी कालरात्रि का रूप थोड़ा डराने वाला है, फिर भी वह सभी को सुख ही देते हैं। यही कारण है कि उन्हें "शुभंकारी" भी कहा जाता है। भक्तों को उनके रूप से डरना नहीं चाहिए क्योकि वह कल्याणकारी है| कालरात्रि, काली और तीन आंखों वाली देवी दुर्गा का सातवां रूप हैं। देवी कालरात्रि के गले में एक असाधारण विद्युत माला लिपटी हुई है। उसके हाथ में एक छड़ी और एक कांटा है, और वह एक गधे की सवारी करती है। लेकिन, वह हमेशा अपने भक्तों का भला करती है जो उसकी पूजा करते हैं। वह बुराई को नष्ट करने के लिए जानी जाती है। देवी कालरात्रि से राक्षस और भूत तक भयभीत हो जाते हैं। वह हर किसी की कुंडली में ग्रहों की स्थिति भी तय करती है। 

जो कोई भी देवी कालरात्रि की पूजा करता है, वह कभी भी अग्नि, जल, शत्रु या अंधकार से नहीं डरता। मां कालरात्रि की कृपा से व्यक्ति अपने सारे भय दूर कर सकता है। एक व्यक्ति को देवी कालरात्रि के मजबूत स्वरूप को ध्यान में रखना चाहिए और एकाग्र मन से उनकी पूजा करनी चाहिए। उन्हें उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए पूरे धैर्य के साथ उसकी पूजा करनी चाहिए। जब वह देवी कालरात्रि की पूजा करते हैं तब उनके दिल में हमेशा शुद्ध इरादे होने चाहिए। शास्त्रों में, देवी दुर्गा ने पृथ्वी पर बुराई को नष्ट करने के लिए अपनी ऊर्जा से यह रूप लिया था। यह भी माना जाता है कि देवी कालरात्रि की पूजा करने से व्यक्ति सब कुछ प्राप्त करता है। जो लोग काला जादू करते हैं वह विशेष रूप से देवी कालरात्रि की पूजा करते हैं। मां कालरात्रि की पूजा करने से सभी कष्ट दूर होते हैं और ग्रहों की स्थिति भी ठीक हो जाती है।

देवी कालरात्रि का स्वरूप/ The appearance of Goddess Kaalratri 

पहली नजर में देवी कालरात्रि का रूप डरावना लगता है। लेकिन, वह अपने उपासकों को उत्कृष्ट सहायता प्रदान करती है और सभी बुराइयों को नष्ट कर देती है। देवी कालरात्रि लौकी की माला पहनती हैं। देवी कालरात्रि की तीन आंखें हैं जो पूरी तरह गोल है, और उनका स्वरूप गहरा है। वह हमेशा खुले बालों में नजर आती हैं। उनका वाहन गधा है। उनका ऊपरी दाहिना हाथ हमेशा उपासकों को आशीर्वाद देता है जबकि निचला हाथ अभय मुद्रा में है। बाईं ओर देवी के ऊपरी हाथ में लोहे का कांटा है, जबकि निचले हिस्से में खड़ग है। देवी दुर्गा के सातवें रूप की पूजा करने से उस व्यक्ति के निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद मिलती है।

देवी कालरात्रि की उत्पत्ति/ Origin of Goddess Kaalratri 

कथा के अनुसार, शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज नाम के राक्षस तीनों लोकों को नष्ट कर रहे थे। यह देखते हुए, सभी भगवान उनकी मदद लेने के लिए भगवान शिव के पास गए। भगवान शिव ने देवी पार्वती की ओर देखा और उन्हें इन राक्षसों को नष्ट करके, अपने उपासकों को बचाने के लिए कहा। भगवान शिव से सहमत होकर, देवी पार्वती ने देवी दुर्गा का रूप धारण किया और शुंभ-निशुंभ का वध किया। लेकिन, जब उन्होंने रक्तबीज को मारने की कोशिश की, तब उनके खून ने लाखों लोगों को जन्म दिया। यह देखकर, देवी दुर्गा ने अपनी सारी ऊर्जा देवी कालरात्रि के रूप पर केंद्रित कर दी। फिर, जैसे ही देवी कालरात्रि ने रक्तबीज का वध किया, उन्होंने उसका खून लिया और उसे अपने मुंह पर लगा लिया। उसका सिर काटकर, उसने आखिरकार रक्तबीज को मार डाला।

मां कालरात्रि की पूजा का महत्व/ Significance of Worshipping Maa Kaalratri

नवरात्रि के सातवें दिन माता कालरात्रि की पूजा की जाती है, जिनका स्वरूप भयानक होता है। वह बुराई का अंत करती है और उसकी पूजा करने वालों के लिए शुभ समाचार लाती है। भूत, विभिन्न प्रजातियों, अग्नि, शत्रु, जल और अंधकार से संबंधित सभी भय से व्यक्ति को छुटकारा मिल जाता है। यदि किसी की कुंडली में अलग-अलग ग्रहों की स्थिति में दोष है, तब उन्हें नवरात्रि के सातवें दिन देवी कालरात्रि की पूजा करनी चाहिए क्योंकि सभी ग्रह देवी कालरात्रि से संबंधित है। मां कालरात्रि की कृपा से भक्तों की सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं। शास्त्रों के अनुसार देवी कालरात्रि की पूजा करने से शनि ग्रह का प्रभाव उलट जाता है। इनकी पूजा करने से असाधारण मृत्यु की संभावना भी समाप्त हो जाती है। देवी कालरात्रि की पूजा करने से लोगों को हड्डियों या सांस से संबंधित कई बीमारियों से भी छुटकारा मिल सकता है। भक्तों को देवी कालरात्रि के प्रकट होने के बारे में चिंता करने की आवश्यकता नहीं है उन्हें अति शीघ्र ही माता के दर्शन होते है| यदि कोई भी भक्त  देवी कालरात्रि की पूजा करता है तब उसके डर, चिंता और निराशा से भी उसको छुटकारा मिलता है।

इसलिए देवी कालरात्रि को कहा जाता है/ This is why Goddess Kalratri is called so: 

नवरात्रि के सातवें दिन देवी की पूजा की जाती है। देवी कालरात्रि देवी दुर्गा का सातवां रूप हैं। चूंकि देवी कालरात्रि को काल का अंत करने वाला माना जाता है, इसलिए उन्हें कालरात्रि कहा जाता है। यह भी सच है कि रक्तबीज, शुंभ और निशुंभ का अंत करने के लिए देवी दुर्गा को देवी कालरात्रि का रूप धारण करना पड़ा था। मां कालरात्रि की पूजा करने से जीवन की किसी भी समस्या का समाधान करने की शक्ति मिलती है। अपने शत्रुओं का जमकर नाश करने वाली देवी कालरात्रि अपने उपासकों को किसी भी स्थिति पर विजय दिलाने में मदद करती हैं।

देवी कालरात्रि भक्तों को काल से बचाती है/ Goddess Kaalratri Saves Worshippers from Kaal

अगर कोई नवरात्रि के सातवें दिन देवी कालरात्रि की पूजा करता है, तो वह उसे काल से बचाती है, और वह उन्हें लंबी उम्र देती है। शास्त्रों में, उन्हें उपलब्धियों की देवी भी कहा जाता है, और यही कारण है कि जो लोग काला जादू करते हैं, वह आज भी देवी कालरात्रि की पूजा दृढ़ संकल्प के साथ करते हैं।

शक्ति की देवी है देवी कालरात्रि/ Goddess Kaalratri is the Goddess of Power

मां कालरात्रि अपनी पूजा करने वाले सभी लोगों को खुश और मजबूत बनाती है। उनका रूप भयानक है क्योंकि वह अंधेरे की तरह काली है, उसके हाथ में कांटा है, उसके बाल खुले हैं। लेकिन, यह उपस्थिति केवल राक्षसों और ग्रह पर बुराई के लिए ही खतरनाक है। जो उनकी पूजा करता है, उसके लिए देवी दुर्गा का यह रूप फलदायी होता है और उन्हें किसी भी नकारात्मक विचार या कार्य से दूर रखता है। मां कालरात्रि के इस स्वरूप की पूजा करने से लोगों को सुख की प्राप्ति होती है और हर संभव कष्ट से मुक्ति मिलती है। याद रखें, देवी कालरात्रि किसी व्यक्ति को उसके गलत कार्यों को न करने में मदद कर सकती है। यदि वह अपने भक्तों की पूजा से प्रभावित हो जाए तब पृथ्वी की सभी नकारात्मक शक्तियों को समाप्त किया जा सकता है।

देवी कालरात्रि की पूजा की विधि/ Puja Procedure of worshipping Goddess Kaalratri

  • देवी कालरात्रि की पूजा तड़के या आधी रात को की जाती है। पूजा की तैयारी के लिए सूर्योदय से पहले स्नान कर लें।

  • देवी कालरात्रि की पूजा करने की कोई विशेष प्रक्रिया नहीं है। आप उस दिन माता की तस्वीर किसी साफ स्थान पर रखें |

  • फिर देवी को फूल, कुमकुम और लाल धागा अर्पित करें। इसके अलावा, नींबू की एक माला चढ़ाएं और पूजा शुरू करते ही तेल से एक दीया जलाएं।

  • देवी को हमेशा लाल फूल अर्पित करें और उन्हें गुड़ का भोग लगाएं।

  • देवी कालरात्रि के लिए मंत्रों का जाप करें या सप्तशती की कथा का पाठ करें।

  • फिर देवी कालरात्रि की कथा सुनें और दीये से आरती करें.

  • फिर, प्रसाद चढ़ाएं और क्षमा मांगें यदि आपने कभी जानबूझकर या अनजाने में कोई गलती की है।

  • आधा गुड़ परिवार के सदस्यों को प्रसाद के रूप में बांटे और दूसरा आधा पुजारी को दें।

  • काले कपड़े न पहनें, और किसी भी तरह से किसी को नुकसान पहुंचाने की प्रार्थना न करें।

रात में विशेष पूजा/ Special Puja In the Night

देवी कालरात्रि की पूजा करके आप अपने क्रोध पर विजय पा सकते हैं। देवी कालरात्रि को देवी काली का ही एक रूप माना जाता है। उन्होंने यह रूप मां दुर्गा से लिया है। भले ही देवी कालरात्रि की पूजा नियमित दिनों की तरह की जाती है, आप रात में भी विशेष पूजा कर सकते हैं।

यदि आप बहुत सारे शत्रुओं और प्रतिस्पर्धियों से परेशान हैं और उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं, तो आप यह कर सकते हैं, पूजा। 

  • सबसे पहले, आपको देवी कालरात्रि की पूजा करने के लिए लाल या सफेद कपड़े पहनने होंगे और यह सुनिश्चित करना होगा कि आप केवल रात में ही यह पूजा करें।

  • देवी कालरात्रि के सामने एक दीया जलाएं और उन्हें गुड़ का भोग लगाएं।

  • फिर, जब भी आप मंत्र समाप्त करें तो हर बार एक लौंग चढ़ाते हुए देवी कालरात्रि मंत्र का 108 बार दोहराएं।

  • मंत्र है: "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे, उन 108 लोगों को पवित्र अग्नि में अर्पित करें|

ऐसा करने से आपके शत्रु और प्रतिद्वंदी शांत हो जाएंगे और देवी कालरात्रि व्यक्तिगत रूप से आपके सभी कष्टों का निवारण करेंगी।

देवी कालरात्रि को कौन सा विशेष प्रसाद चढ़ाएं?/ What Special Prasad to Offer to Goddess Kalratri? 

मां कालरात्रि को गुड़ का भोग लगाएं और फिर परिवार के सभी सदस्यों को प्रसाद के रूप में वितरित करें। आप सभी लंबे समय तक अच्छे स्वास्थ्य का का आनंद लेंगे|

मां कालरात्रि मंत्र

(ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।)

(दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तु ते।।)

(जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि।)

(जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोस्तु ते।।)

(जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोस्तु ते।।

सीड मंत्र/Seed Mantra

ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। इस मंत्र को तीन, सात और ग्यारह बार दोहराएं |

यदि आप नवरात्रि के दिन इस मंत्र का जाप करते हैं तब यह मंत्र आपकी सभी इच्छाओं को पूरा करेगा|

  • एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता, लम्बोष्टी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।

  • वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा,वर्धनमूर्धध्वज,कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥)

आपकी मनोकामना पूर्ण करेगा यह मंत्र:

नवरात्रि के सातवें दिन आप इस मंत्र से करें मां कालरात्रि का स्मरण:

एकवेणी जपाकर्णपुर नगना खरस्थिता, लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलभ्यक्तशरीरिणी

वाम्पाडोलसल्लोहल्टाकंटकभूष्ण, वर्धनमूर्धध्वज कृष्ण कालरात्रिभयंकारी

माँ कालरात्रि की आरती/ Goddess Kaalratri's Aarti 

कालरात्रि जय-जय-महाकाली।

काल के मुंह से बचाने वाली॥

दुष्ट संघारक नाम तुम्हारा।

महाचंडी तेरा अवतार॥

पृथ्वी और आकाश पे सारा।

महाकाली है तेरा पसारा॥

खडग खप्पर रखने वाली।

दुष्टों का लहू चखने वाली॥

कलकत्ता स्थान तुम्हारा।

सब जगह देखूं तेरा नजारा॥

सभी देवता सब नर-नारी।

गावें स्तुति सभी तुम्हारी॥

रक्तदंता और अन्नपूर्णा।

कृपा करे तो कोई भी दुःख ना॥

ना कोई चिंता रहे बीमारी।

ना कोई गम ना संकट भारी|

उस पर कभी कष्ट ना आवे।

महाकाली मां जिसे बचावे॥

तू भी भक्त प्रेम से कह।

कालरात्रि मां तेरी जय॥

मां कालरात्रि के इन १०८ नामों को दोहराएं

शीत नवरात्रि के सातवें दिन देवी की कृपा प्राप्त करने के लिए आपको देवी कालरात्रि के इन 108 नामों का जप करना चाहिए। अकेले रहकर किसी शांत स्थान पर देवी के इन नामों का जप करें। देवी की मूर्ति के सामने घी का दीपक अवश्य जलाएं।

काली, कपालिनी, कांता, कामदा, कामसुंदरी, कालरात्रि, कालिका, काल भैरव पराजित, कुरुकुल्ला, कामिनी, कमनीय स्वभाविनी, कुलीना, कुलकर्त्री, कुलवर्त्मप्रकाशिनी, कस्तूरीरसनीला, काम्या, कामस्वरूपिणी, ककार वर्ण नीलया, कामधेनु, करालिका, कुलकान्ता, करालास्या, कामार्त्त, कलावती, कृशोदरी,कामाख्या, कौमारी, कुलपालिनी, कुलजा, कुलकन्या, कलहा, कुलपूजिताः, कामेश्वरी, कामकान्ता, कुब्जेश्वरगामिनी, कामदात्री, कामहर्त्री, कृष्णा, कपर्दिनी, कुमुदा, कृष्णदेहा, कालिन्दी, कुलपूजिता, काश्यपि, कृष्णमाला, कुलिशांगी, कला, क्रींरूपा, कुलगम्या, कमला, कृष्णपूजिता, कृशांगी कन्नरी, कर्त्री, कलकण्ठी, कार्तिकी, काम्बुकण्ठी, कौलिनी, कुमुद, कामजीवन, कुलस्त्री, कार्तिकी, कृत्या, कीर्ति, कुलपालिका, कामदेवकला,कल्पलता,कामांगबद्धिनी,कुन्ती,कुमुदप्रिया, कदम्बकुसुमोत्सुका,कादम्बिनी,कमलिनी,कृष्णानंदप्रदायिनी, कुमारिपूजनरता, कुमारीगणशोभिता, कुमारीरंश्चरता, कुमारीव्रतधारिणी, कंकाली, कमनीया, कामशास्त्रविशारदा, कपालखड्वांगधरा, कालभैरवरूपिणि, कोटरी, कोटराक्षी, काशी, कैलाशवासिनी, कात्यायिनी, कार्यकरी, काव्यशास्त्रप्रमोदिनी, कामामर्षणरूपा, कामपीठनिवासिनी, कंकिनी, काकिनी, क्रिडा, कुत्सिता, कलहप्रिया, कुण्डगोलोद्-भवाप्राणा, कौशिकी, कीर्तीवर्धिनी, कुम्भस्तिनी, कटाक्षा, काव्या, कोकनदप्रिया, कान्तारवासिनी, कान्ति, कठिना, कृष्णवल्लभा।

मां कालरात्रि की पूजा करने के फायदे/ Benefits of Worshipping Goddess Kaalratri

  • अपने शत्रुओं और प्रतिस्पर्धियों का नाश करने के लिए देवी कालरात्रि की पूजा करना लाभकारी होता है। 

  • देवी कालरात्रि की पूजा करके व्यक्ति अपने सभी भयों से भी छुटकारा पा सकता है और किसी भी दुर्घटना से बच सकता है। 

  • देवी कालरात्रि की पूजा करने से काला जादू के दुष्प्रभाव से भी लोगों की रक्षा होती है। 

  • ज्योतिष में यह भी कहा गया है कि देवी कालरात्रि की पूजा करने से शनि ग्रह के नकारात्मक परिणाम भी नियंत्रित होते हैं।

  • नवरात्रि की सातवीं रात को उपलब्धियों की रात भी कहा जाता है। जो कोई भी कुंडलिनी जागरण के लिए जागता है और सातवीं रात को देवी की पूजा करता है, उसकी सहस्राब्दी अवधि शुरू हो जाती है। 

  • देवी कालरात्रि की गुड़हल के फूलों की पूजा करनी चाहिए।

​​​आप हमारी वेबसाइट से अन्य भारतीय त्योहारों, लोकप्रिय व्रत तिथियों के बारे में भी पढ़ सकते हैं।

साथ ही जन्मकुंडलीलव या अरेंज मैरिज में चुनाव, व्यवसायिक नामों के सुझावस्वास्थ्य ज्योतिषनौकरी या व्यवसाय के चुनाव के बारे में भी पढ़ सकते हैं।        

देवी महागौरी
11 Oct, 2024

देवी दुर्गा के आठवें स्वरूप, देवी महागौरी देवी का नवरात्रि की अष्टमी के दिन/eighth day of Navratri पूजन किया जाता है। उनकी अपार शक्ति हमेशा फलदायक होती है तथा उनका पूजन भक्तों के पूर्व संचित पापों को नष्ट कर देता है और भविष्य में अन्य पापों और दुखों को समीप नहीं आने देता। भक्त शुद्ध होकर सभी प्रकार के अपार गुणों के साथ सम्मान का भागीदार बन जाता है। महा अष्टमी के दिन , देवी दुर्गा के महागौरी स्वरूप का विधि-विधान सहित पूजन करने से, भक्तों को जीवन में सुख-शांति और सौभाग्य की प्राप्ति होती है तथा भक्तों के सभी दुःख दूर होने से वे सभी पाप रहित हो जाते हैं। महा अष्टमी के दिन देवी का पूजन करने के बाद कन्याओं का पूजन करने का विधान होता है। रात्रि में देवी महागौरी का पूजन करते समय उनका प्रिय पारिजात पुष्प अर्पण करके, दुर्गा चालीसा और देवी दुर्गा की आरती करनी चाहिए। ऐसा करने से महागौरी प्रसन्न होकर सभी मनोकामनाओं की पूर्ति करती हैं।  

देवी महागौरी का स्वरूप / The representation of Goddess Mahagauri

हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महागौरी को शिव के नाम से भी जाना जाता है। महागौरी के एक हाथ में, दुर्गा शक्ति का प्रतीक चिन्ह त्रिशूल और दूसरे हाथ में, भगवान शिव का प्रतीक चिन्ह डमरू है। माता महागौरी का सांसारिक स्वरूप तेजयुक्त, कोमल, श्वेत वस्त्र धारिणी तथा चार भुजाओं वाला है जिनके एक हाथ में त्रिशूल, दूसरे में डमरू, तीसरा हाथ वर-मुद्रा में और चौथा हस्त गृहस्थ नारी शक्ति को दर्शाता है। श्वेत वृषभ पर सवार तथा श्वेत आभूषणों से सुसज्जित देवी महागौरी को गायन और संगीत अति प्रिय है। ऐसा माना जाता है कि इनकी पूजा करने से पूर्व संचित पाप भी दूर हो जाते हैं।

देवी महागौरी के पूजन का महत्व / The importance of worshipping Goddess Mahagauri

नवरात्रि की अष्टमी/eighth day of Navratri के दिन देवी महागौरी का पूजन करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और व्यक्ति मानसिक और शारीरिक रूप से शुद्ध हो जाता है। देवी महागौरी द्वारा धर्म का मार्ग दिखाने के कारण सभी अशुद्ध और अनैतिक विचार भी नष्ट हो जाते हैं। देवी दुर्गा के इस निर्मल स्वरूप का सम्मान करने से मन की पवित्रता और सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि होती है, जिससे मन की एकाग्रता बढ़ती है। देवी गौरी का पूजन करने से सभी दुखों का नाश होता है और सभी अलौकिक सिद्धियां प्राप्त होती हैं तथा देवी की कृपा से असंभव कार्य भी आसानी से पूर्ण हो जाते हैं। अतः नवरात्रि की अष्टमी/Ashtami of Navratri के दिन देवी का ध्यान, स्मरण और पूजन करना शुभ होता है। मां गौरी का पूजन करने से, मनुष्य सत्य पथ पर चलकर असत्य का त्याग कर देता है। महागौरी की कृपा से, जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं तथा जीवन के सभी सुखों की प्राप्ति होती है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन, देवी काली ने मां दुर्गा के मस्तक से प्रकट होकर चंड और मुंड राक्षसों का वध किया था। ऐसा माना जाता है कि पूर्ण समर्पण और भक्ति के साथ दुर्गाष्टमी का उपवास करने से सौभाग्य, सफलता और सुख की प्राप्ति होती है। अष्टमी/Ashtami के दिन, महिलाओं द्वारा अपने सुहाग (पति) के लिए देवी मां को चुनरी चढ़ाई जाती है। इस दिन 'अस्त्र पूजा' का भी विधान होने के कारण, देवी दुर्गा के शस्त्रों का पूजन किया जाता है। अतः इस दिन को "वीर अष्टमी"/Veer Ashtami के नाम से भी जाना जाता है।

नवरात्रि अष्टमी की व्रत कथा / Tale for the fast on the day of Navratri Ashtami

भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप करने के कारण देवी का तन श्याम वर्ण का होने पर, देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव द्वारा उनके तन को गंगाजल से धोने पर, देवी विद्युत के समान तेजवान बन गईं और तभी से उनका नाम गौरी पड़ गया। देवी महागौरी के इस करुणामयी, स्नेही, शांत और कोमल स्वरूप के कारण देवताओं और ऋषियों द्वारा यह है प्रार्थना की जाती है --

“सर्वमंगल मांग्ल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके।
 शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते।।”

देवी महागौरी से संबंधित एक अन्य कथा के अनुसार,  जहां देवी उमा तप में लीन थीं, उस स्थान पर एक भूखा शेर आ पहुंचा। देवी को देखकर शेर की भूख और बढ़ गई, लेकिन वह वहीं बैठकर देवी का तपस्या से उठने का इंतजार करने लगा। इंतजार करते-करते वह काफी दुर्बल हो गया। जब देवी तपस्या पूर्ण करके उठीं, तो उन्हें शेर पर दया आ गई। हालांकि, सिंह ने भी एक तरह से तपस्या की थी, इस कारण माता ने उसे अपना वाहन बना लिया। अतः, सिंह और वृषभ दोनों ही देवी गौरी के वाहन बन गए। 

मां महागौरी की पूजन विधि / Worship Goddess Mahagauri in this way

-स्नान के बाद देवी का पूजन करना चाहिए। 
-मंदिर में देवी महागौरी की प्रतिमा स्थापित करके जल से अभिषेक करना चाहिए।
-देवी को नारियल का अर्पण करना चाहिए।
-देवी को पुष्पमाला पहनाकर पुष्प अर्पित करें।
- पूजा के दौरान, देवी को लाल पुष्प अर्पण करने चाहिए। 
-घर के प्रत्येक कोण में गंगाजल का छिड़काव करके शुद्धि करनी चाहिए।  
-व्रत का संकल्प करते समय उच्च स्वर में मंत्रोच्चार करना चाहिए। 
-देवी को प्रसन्न करने के लिए कथा का पाठ करके आरती अवश्य करनी चाहिए। 

महागौरी की आरती / Aarti of Mahagauri

जय महागौरी जगत की माया।
जया उमा भवानी जय महामाया॥
हरिद्वार कनखल के पासा।
महागौरी तेरी वहां निवासा॥
चंद्रकाली ओ' ममता अंबे।
जय शक्ति जय जय माँ जगंदबे॥
भीमा देवी विमला माता।
कौशिकी देवी जग विख्यता॥
हिमाचल के घर गौरी रूप तेरा।
महाकाली दुर्गा है स्वरूप तेरा॥
सती सत हवन कुंड में था जलाया।
उसी धुएं ने रूप काली बनाया॥
बना धर्म सिंह जो सवारी में आया।
तो शंकर ने त्रिशूल अपना दिखाया॥
तभी माँ ने महागौरी नाम पाया।
शरण आनेवाले का संकट मिटाया॥
शनिवार को तेरी पूजा जो करता।
माँ बिगड़ा हुआ काम उसका सुधरता॥
भक्त बोलो तो सोच तुम क्या रहे हो।
महागौरी माँ तेरी हरदम ही जय हो॥

मंत्र / Mantra
Om devi mahagaurye namah:
(ॐ देवी महागौर्यै नमः॥)

प्रार्थना मंत्र / Prayer Mantra

Shrevte vrishesamarudha shwetaambardhara shuuchi
Mahagauri shubham dadhanamahadev pramodada
(श्वेते वृषेसमारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेव प्रमोददा॥)

स्तुति / Stuti

Ya devi sarvabhuteshu maa mahagauri roopen sansthita
Namastasyey Namastasyey Namastasyey namoh namah:
(या देवी सर्वभू‍तेषु माँ महागौरी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥)

ध्यान मंत्र / Mantra for Meditation

Vande vanchit kamarthey chandrardhkritshekhram
(वन्दे वाञ्छित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।)
Singharudha chaturbhuja Mahagauri yashaswini
(सिंहारूढा चतुर्भुजा महागौरी यशस्विनीम्॥)
Purnandu nibham gauri somchakrasthitam ashtmum Mahagauri trinetram
(पूर्णन्दु निभाम् गौरी सोमचक्रस्थिताम् अष्टमम् महागौरी त्रिनेत्राम्।)
Varaabheetikaram trishul damrudharam Mahagauri bhajem
(वराभीतिकरां त्रिशूल डमरूधरां महागौरी भजेम्॥)
Pataambar paridhanam mriduhasya nanalandkaar bhusitaam
(पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्।)
Manjeer, haar, keyur, kindkini, ratnkundal manditaam
(मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥)
Prafull vandana pallavadharam kaant kapolam treylokya mohanam
(प्रफुल्ल वन्दना पल्लवाधरां कान्त कपोलाम् त्रैलोक्य मोहनम्।)
Kamniyam lavnyam mrinalam chandan gandhliptam
(कमनीयां लावण्यां मृणालां चन्दन गन्धलिप्ताम्॥)

उत्पत्ति /Origin

Sarvsandkat hantri tuamhi Dhan Aishwarya pradyaneem
(सर्वसङ्कट हन्त्री त्वंहि धन ऐश्वर्य प्रदायनीम्।)
Gyanda chaturvedmayi Mahagauri pranamamyyaham
(ज्ञानदा चतुर्वेदमयी महागौरी प्रणमाम्यहम्॥)
Sukh shaantidaatri dhan dhanya pradanyaneem
(सुख शान्तिदात्री धन धान्य प्रदायनीम्।)
Damruvaady priya adhya Mahagauri pranamamyaham
(डमरूवाद्य प्रिया अद्या महागौरी प्रणमाम्यहम्॥)
Treylokyamangal tuamhi taaptrya harineem
(त्रैलोक्यमङ्गल त्वंहि तापत्रय हारिणीम्।)
Vaddam chaetanyamayi Mahagauri pranmamyahum
(वददम् चैतन्यमयी महागौरी प्रणमाम्यहम्॥)

सुरक्षा मंत्र / Shield Mantra

Omkaar: paatu shirsho maa, heem beejam maa hridyo
(ॐकारः पातु शीर्षो माँ, हीं बीजम् माँ, हृदयो।)
Kalim beejam sadapaatu nabho graho cha padyo
(क्लीं बीजम् सदापातु नभो गृहो च पादयो॥)
Lalaatam karno hoom beejam paatu Mahagauri maa netram ghrano
(ललाटम् कर्णो हुं बीजम् पातु महागौरी माँ नेत्रम्‌ घ्राणो।)
Kapot chibuko fatt paatu swaha maa sarv vadno
(कपोत चिबुको फट् पातु स्वाहा माँ सर्ववदनो॥)

अष्टमी कन्या पूजन का महत्व / The importance of Ashthami Kanyapoojan

नवरात्रि के दौरान, नौ कन्याओं का पूजन करना अति उत्तम माना जाता है। हालांकि, नवरात्रि के प्रत्येक दिन एक कन्या का पूजन करके इच्छित परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। संभव न होने पर भी, कम से कम दो कन्याओं को भोजन अवश्य कराना चाहिए। इसके अलावा, कन्याओं के साथ ही, एक बालक का भी बटुक भैरव और लंगूर के रूप में पूजन किया जाता है। भगवान शिव द्वारा शक्तिपीठ के प्रत्येक स्वरूप के साथ एक भैरव को स्थापित करने के कारण, देवी के साथ भैरवों का पूजन करना आवश्यक होता है। यदि किसी शक्तिपीठ में देवी का आशीर्वाद प्राप्त करने के दौरान, भैरव का आशीर्वाद नहीं लेने पर वह आशीर्वाद अधूरा माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इच्छित फलों की प्राप्ति के लिए दो से दस वर्ष तक की आयु वर्ग की कन्याओं का पूजन करने का प्रयास करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार, नवरात्रि के दिनों में कन्याएं अप्रत्यक्ष ऊर्जा का प्रतीक होती हैं जो पूजन करने से सक्रिय हो जाती है इसलिए इनकी उपासना करने पर ब्रह्मांड के सभी देवताओं और ईश्वरीय शक्तियों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। कन्या पूजन के लिए आमंत्रित कन्याओं के देवी-देवताओं का प्रतीक होने के कारण, पूजन से पूर्व घरों की साफ-सफाई की जाती है। घर का वातावरण स्वच्छ होने से इच्छित फलों की प्राप्ति होती है। कन्याओं को देवी स्वरूप मानकर देवी  का स्तुतिगान करते हुए, उनका स्वागत करके, पैर धुलाकर चौकी पर बैठाना चाहिए और उनके मस्तक पर रोली और कुमकुम का तिलक लगाकर हाथों पर मौली बांधनी चाहिए। 
इसके बाद, सभी कन्याओं और बटुक की आरती उतारकर देवी का प्रसाद अर्पण करना चाहिए। कन्याओं को देवी की प्रिय खीर, मिठाइयां, फल, हलवा, चने, मालपुआ आदि अर्पित करने चाहिए। कन्याओं को उनकी क्षमतानुसार केसर की खीर, हलवा और पूड़ी का भोग कराना चाहिए तथा प्रसाद में किसी भी रूप में प्याज और लहसुन का प्रयोग नहीं करना चाहिए।  प्रचलित मान्यता के अनुसार, बिना प्याज और लहसुन के बने आलू या कद्दू की सब्जी का भोग लगाने से इच्छित परिणामों की प्राप्ति होती है। भोजन के उपरांत, कन्याओं के पैरों में देवी का प्रतीक, आलता लगाकर उनका पूजन किया जाता है तथा मौसमी फल, सफेद वस्त्र, खिलौने, अन्य चीजें और नारियल, केला या पेड़ा और कुछ दक्षिणा भेंट की जाती है। इसके बाद कन्याओं के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लेकर विदा किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि विधिवत कन्या पूजन करने से नवरात्रि का व्रत पूर्ण होता है और देवी प्रसन्न होकर सभी मनोकामनाओं को पूरा करती हैं।  

देवी महागौरी पूजन के लाभ / Benefits of Worshipping Goddess Mahagauri

-नवरात्रि की अष्टमी/eighth day of Navratri के दिन शीघ्र विवाह का वरदान प्राप्त होता है। साथ ही, वैवाहिक जीवन शांतिपूर्ण बनता है।  
-ऐसा माना जाता है कि भगवान राम को अपने पति के रूप में प्राप्त करने के लिए सीता द्वारा देवी का पूजन किया गया था। 
-देवी का पूजन, विवाह संबंधी सभी समस्याओं में औषधि की तरह माना जाता है। 
-ज्योतिष के अनुसार, शुक्र ग्रह देवी से संबंधित होता है। 
-देवी अंबे को संगीत और गायन प्रिय होने के कारण, अष्टमी के दिन/Ashtami day देवी को प्रसन्न करने के लिए घरों में भजन-कीर्तन किया जाता है तथा छोटी कन्याओं को घर बुलाकर देवी रूप में पूजा जाता है। 
-शांत और कोमल स्वभाव वाली देवी महागौरी के मुख पर करुणा, स्नेह और प्रेम के भाव प्रकट होने के कारण, महिलाओं को आनंदपूर्वक शुद्ध मन से देवी महागौरी का पूजन करना चाहिए।

 शुक्र की प्रबलता हेतु देवी महागौरी पूजन विधि / How to worship Goddess Mahagauri to strengthen Venus

सफेद वस्त्र धारण करके, देवी को सफेद पुष्पों और मिठाइयों का भोग लगाकर इत्र अर्पित करना चाहिए।  तत्पश्चात, देवी के मंत्रों का जाप करके शुक्र के मूल मंत्र-  "Om shun shukraye Namah" 
 "ॐ शुं शुक्राय नमः।"  का जाप करना चाहिए तथा देवी को अर्पित किए गए इत्र को अपने पास रखकर उसका प्रयोग करते रहना चाहिए।

वैवाहिक जीवन की समस्याओं हेतु पूजन विधि / If you have problems in your marriage, then worship The Goddess in this way

-लकड़ी की चौकी पर स्वच्छ पीला कपड़ा बिछाकर देवी महागौरी की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए।
-पीले वस्त्र धारण करके गंगाजल से स्थापित किए गए मंदिर की शुद्धि करनी चाहिए। 
-देवी महागौरी के समक्ष गाय के घी का दीपक जलाकर उनका ध्यान करें। 
-दोनों हाथों से देवी को सफेद या पीले पुष्प अर्पण करके  मंत्रों का जाप करें।
-नारियल अर्पित करने से इच्छित फलों की प्राप्ति होती है।
-कन्याओं को योग्य वर प्राप्ति के लिए प्रसाद के रूप में देवी महागौरी को नारियल अर्पण करना चाहिए। 
धन की कमी होने पर मां गौरी का पूजन करना चाहिए। एक कटोरी दूध में देवी गौरी को चांदी का सिक्का अर्पण करके, देवी महागौरी से धन स्थिर रहने की प्रार्थना करनी चाहिए। पूजन के बाद, सिक्के को धोकर हमेशा के लिए अपने पास रख लेना चाहिए।

 

आप हमारी वेबसाइट से अन्य भारतीय त्योहारों, लोकप्रिय व्रत तिथियों के बारे में भी पढ़ सकते हैं।

साथ ही जन्मकुंडलीलव या अरेंज मैरिज में चुनाव, व्यवसायिक नामों के सुझावस्वास्थ्य ज्योतिषनौकरी या व्यवसाय के चुनाव के बारे में भी पढ़ सकते हैं।        

दुर्गा विसर्जन
12 Oct, 2024

दुर्गा पूजा उत्सव मां दुर्गा के विसर्जन के साथ समाप्त होता है। दुर्गा विसर्जन मुहूर्त सुबह या दोपहर में शुरू होता है जब विजयादशमी शुरू होती है। इसलिए जब विजयादशमी सुबह या दोपहर में हो तो मां दुर्गा की मूर्ति का विसर्जन करना चाहिए। कई वर्षों से विसर्जन सुबह के समय किया जाता रहा है। हालांकि, मां दुर्गा के विसर्जन के लिए सबसे अच्छा समय तब माना जाता है जब दोपहर में श्रवण नक्षत्र और दशमी तिथि एक साथ आती है। दुर्गा पूजा भारत में एक धार्मिक त्योहार है जिसे दुनिया भर में हिंदू धर्म द्वारा भव्य रूप से मनाया जाता है। दुर्गा पूजा नौ दिनों तक चलती है, और कुछ लोग इसे पांच या सात दिनों तक मनाते हैं। लोग षष्ठी को दुर्गा देवी की मूर्ति की पूजा शुरू करते हैं और दशमी पर मां दुर्गा के विसर्जन के साथ इसे समाप्त करते हैं। दुर्गा पूजा को दुर्गा उत्सव या नवरात्रि के नाम से भी जाना जाता है। 

दुर्गा पूजा का त्योहार व्यापक रूप से असम, उड़ीसा, बंगाल, झारखंड, मणिपुर और त्रिपुरा, में मनाया जाता है। बंगाल के अलावा, दुर्गा पूजा दिल्ली, उत्तर प्रदेश, गुजरात, पंजाब, महाराष्ट्र, आदि भारत में नवरात्रि पूजा के नाम से मनाई जाती है। दुर्गा पूजा या नवरात्रि पूजा साल में दो बार चैत्र और अश्विन के महीने में मनाई जाती है। दुर्गा पूजा एक महत्वपूर्ण हिंदू त्योहार है जिसका धार्मिक, दार्शनिक, सांस्कृतिक और सांसारिक महत्व है। लोग षष्ठी से मां दुर्गा की पूजा शुरू करते हैं और दशमी को समाप्त करते हैं। इन दिनों सभी मंदिरों को सजाया जाता है, और पूरा माहौल भक्तिमय और पवित्र हो जाता है। कुछ लोग अपने घरों में सभी व्यवस्थाओं के साथ मां दुर्गा के सभी नौ रूपों की पूजा करते हैं और उपवास रखते हैं। हम दुर्गा पूजा के रूप में नारी शक्ति की पूजा करते हैं। इस त्योहार के दौरान कई जगहों पर मेलों का आयोजन किया जाता है।

नवरात्रि के दौरान दुर्गा विसर्जन का क्या महत्व है?

हमारी सनातन परंपरा में विसर्जन का विशेष महत्व है। विसर्जन का अर्थ है पूर्णता, जीवन की पूर्णता, आध्यात्मिक ध्यान, या प्रकृति। जब कोई संस्था पूर्णता प्राप्त कर लेती है, तो उसे अनिवार्य रूप से विसर्जित कर दिया जाना चाहिए, या उसका विसर्जन करना होगा।

 आध्यात्मिक क्षेत्र में, विसर्जन अंत के लिए नहीं बल्कि पूर्णता के लिए खड़ा है। मां दुर्गा के विसर्जन के पीछे यही एकमात्र मुख्य कारण है। शारदीय नवरात्र शुरू होते ही हम देवी की मूर्ति बनाते हैं और फिर उसे कपड़े और आभूषणों से सजाते हैं। हम एक ही मूर्ति की नौ दिनों तक पूरी श्रद्धा से पूजा करते हैं और फिर एक दिन उसका विसर्जन करते हैं।

हमारे सनातन धर्म में ही विसर्जन की परंपरा का पालन किया जाता है। इस परंपरा में बहुत साहस शामिल है। सनातन धर्म मानता है कि एक रूप केवल शुरुआत है, और पूर्णता हमेशा निराकार होती है। यहाँ निराकार का अर्थ निराकार नहीं, सर्वव्यापी रूप होने में है। निराकार का अर्थ है कि ब्रह्मांड के सभी रूप एक ईश्वर के हैं।

निराकार होने का अर्थ एक रूप तक सीमित होना नहीं है, बल्कि सभी रूपों का प्रतिनिधित्व करना है। जब कोई भक्त आध्यात्मिक ध्यान को पूरा करता है, तब वह किसी भी रूप या कर्मकांड से परे चला जाता है। इसलिए, सभी महान लोगों ने कहा है, "छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिला के।"

नवरात्रि के नौ दिन इस बात का प्रतीक हैं कि हमें खुद को एक रूप की पूजा करने तक सीमित नहीं रखना चाहिए। इसके बजाय, हमें अपना आध्यात्मिक ध्यान पूरा करना चाहिए, अपने देवता को विसर्जित करना चाहिए ताकि वह निराकार हो सके। जब भक्त ऐसी निराकार अवस्था को प्राप्त कर लेता है, तब वह पूरे ब्रह्मांड में इसका साक्षी होता है। आप इस निराकार को कोई भी नामकरण दे सकते हैं। उसकी निराकारता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। अध्यात्म के इस पड़ाव पर हमें सर्व खलिविदं ब्रह्म की याद आती है; यही ईश्वर का एकमात्र सत्य है।

दुर्गा पूजा की शुरुआत कैसे हुई? दुर्गा पूजा का इतिहास

17वीं और 18वीं शताब्दी में, जमींदारों और अमीर लोगों ने बड़े पैमाने पर दुर्गा पूजा का आयोजन किया, जहाँ सभी लोग एक छत के नीचे देवी दुर्गा की पूजा करने के लिए एकत्रित हुए। उदाहरण के लिए, अचला पूजा कोलकाता में बहुत प्रसिद्ध है, जिसकी शुरुआत जमींदार लक्ष्मीकांत मजूमदार ने 1610 में कोलकाता के शोभा बाजार, छोटी राजबाड़ी के 33 राजा नबकृष्ण रोड से की थी, जो मुख्य रूप से 1757 में शुरू हुई थी। इतना ही नहीं, माँ दुर्गा की मूर्ति का इस्तेमाल किया गया था। बंगाल के बाहर पंडालों में स्थापित किया जाता था, और उसकी भव्य पूजा की जाती थी।

दुर्गा पूजा से जुड़े मिथक

ऐसा माना जाता है कि देवी दुर्गा ने इसी दिन महिषासुर नाम के राक्षस का वध किया था, जो भगवान ब्रह्मा का वरदान पाकर बहुत शक्तिशाली हो गया था। भगवान ब्रम्हा ने महिषासुर को वरदान दिया कि कोई भी देवता या दानव उसे हरा नहीं सकते। इस वरदान को प्राप्त करने के बाद, उसने स्वर्ग में देवताओं को परेशान करना शुरू कर दिया और पृथ्वी पर भी लोगों को आतंकित किया। उसने स्वर्ग में एक यादृच्छिक हमला किया और इंद्र को हरा दिया, और स्वर्ग पर शासन करना शुरू कर दिया। सभी देवता चिंतित हो गए और मदद के लिए त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास पहुंचे। सभी देवताओं ने उसे हराने के लिए एक साथ युद्ध किया लेकिन व्यर्थ। जब कोई समाधान नहीं निकला, तब त्रिमूर्ति ने देवी दुर्गा को उसके विनाश के लिए बनाया। उन्हें शक्ति और पार्वती के नाम से भी जाना जाता है। देवी दुर्गा ने महिषासुर से नौ दिनों तक युद्ध किया और दसवें दिन उनका वध किया। इस अवसर पर, हिंदू दुर्गा पूजा का त्योहार मनाते हैं, और दसवें दिन को विजयदशमी के रूप में जाना जाता है।

दुर्गा पूजा सभी बुराईयों को दूर करने के लिए सारी शक्ति एकत्रित करने की इच्छा का उत्सव है। लोगों का मानना है कि देवी दुर्गा उन्हें आशीर्वाद देंगी और उन्हें सभी समस्याओं और नकारात्मक ऊर्जा से दूर रखेंगी। हिंदू धर्म के हर त्योहार के पीछे कोई न कोई सामाजिक कारण होता है। दुर्गा पूजा एक ऐसा त्योहार है जो हमारे जीवन को सकारात्मक ऊर्जा और खुशियों से भरने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

विसर्जन का अनुष्ठान

  • कन्या पूजन के बाद हथेली में एक फूल और कुछ चावल के दाने लेकर संकल्प लें।
  • पात्र में रखे नारियल को प्रसाद के रूप में ही लें और परिवार को अर्पित करें।
  • पात्र के पवित्र जल को पूरे घर में छिड़कें और फिर पूरे परिवार को प्रसाद के रूप में इसका सेवन करना चाहिए।
  • सिक्कों को एक कटोरी में रखो ; आप इन सिक्कों को अपने बचत स्थान में भी रख सकते हैं।
  • परिवार में सुपारी को प्रसाद के रूप में बांटें।
  • अब घर में माता की चौकी का आयोजन करें और सिंघासन को अपने मंदिर में रखें।
  • घर की महिलाएं साड़ियों और गहनों आदि का प्रयोग कर सकती हैं।
  • घर के मंदिर में श्री गणेश जी की मूर्ति को उनके स्थान पर स्थापित करें।
  • परिवार में सभी फल और मिठाइयां प्रसाद के रूप में बांटें।
  • चावल को चौकी और कलश  के ढक्कन पर रखें । उन्हें पक्षियों को अर्पित करें।
  • मां दुर्गा की मूर्ति या फोटो के सामने झुकें और उनका आशीर्वाद लें। इसके अलावा, उस कलश  का आशीर्वाद लें जिसमें आपने ज्वार और अन्य पूजा की आवश्यक चीजें बोई थीं। फिर किसी नदी, सरोवर या समुद्र में विसर्जन का अनुष्ठान करें।
  • विसर्जन के बाद एक ब्राह्मण को एक नारियल, दक्षिणा और चौकी के कपड़े दें।
  • विसर्जन करते समय इन बातों का  ध्यान रखें|
  • किसी नदी या सरोवर में विसर्जन करना बहुत शुभ माना जाता है। माता की मूर्ति, पात्र या जवार को पूरे विश्वास के साथ विसर्जित करें। पूजा के सभी आवश्यक सामानों को भी पवित्र जल में विसर्जित कर देना चाहिए।
  • विसर्जन के लिए मां दुर्गा की मूर्ति का उसी तरह ख्याल रखें जैसे आपने मां दुर्गा को लाते समय उनकी देखभाल की थी। विसर्जन से पहले मां दुर्गा की मूर्ति को कोई नुकसान नहीं होना चाहिए। मां दुर्गा के विसर्जन से पहले उचित आरती की जानी चाहिए।
  • आरती के दिव्य प्रकाश को मां दुर्गा की कृपा और शुद्ध प्रसाद के रूप में ग्रहण करना चाहिए। विसर्जन के बाद ब्राह्मण को नारियल, दक्षिणा और चौकी के कपड़े दान करना शुभ माना जाता है।

हम क्यों करते हैं मां दुर्गा का विसर्जन

ऐसा माना जाता है कि बेटी पराया धन होती है। उसे अपने मायके छोड़कर अपने पति के साथ उसके घर में रहने के लिए जाना पड़ता है, जो कि उसका ससुराल है। शादी के बाद बेटियां मेहमान की तरह मायके आती हैं। यह एक प्राचीन परंपरा है। माँ दुर्गा भी इस धरती पर अपने मायके और अपने बच्चों के पास जाती हैं, और कुछ दिन बिताने के बाद, वह वापस भगवान शिव के पास अपने ससुराल जाती हैं।

बारिश के बाद सितंबर और अक्टूबर में फसल कटाई के लिए तैयार हो जाती है। किसान उपज को अपने घरों में लाकर और उन्हें संग्रह करने के लिए कारखानों की सफाई करके अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को पूरा करते हैं। इस मौके पर किसानों की पत्नियां अपने बच्चों के साथ अपने मायके जाती हैं, कुछ खुशनुमा पल बिताती हैं और अपने ससुराल लौट जाती हैं। महिलाओं को आशीर्वाद और सद्भावना के साथ मायके से वापस भेज दिया जाता है।

इसी तरह, अपने बच्चों, कार्तिक और गणेश के साथ, लक्ष्मी, सरस्वती, माँ दुर्गा पृथ्वी पर चार दिन बिताने के लिए अपने घर आती हैं, और फिर वह अपने ससुराल भगवान शिव के पास जाती हैं। इस क्षण को विसर्जन के रूप में मनाया जाता है जिसमें भक्त परंपरा के अनुसार मूर्ति का विसर्जन करते हैं। विसर्जन से पहले मां दुर्गा का पूरा श्रृंगार होता है। महिलाएं एक दूसरे की मांग और चूड़ा पर सिंदूर लगाती हैं जो समृद्धि का प्रतीक है।

बंगाल में इस पर्व का विशेष महत्व है, जहां इसे सिंदूरखेला कहा जाता है। यह सिंदूर पति की लंबी उम्र का प्रतीक है। इस  अनुष्ठान से खुशी का माहौल बनाता है और फिर कुछ समय बाद मां दुर्गा के विसर्जन के समय हर कोई भावुक हो जाता है। पंडाल का माहौल अचानक बदल जाता है, और हर कोई माँ दुर्गा के जाने के गीत गाता है, "मा छोलेचे सोशूर बारी", जिसका अर्थ है माँ दुर्गा अपने ससुराल की ओर बढ़ रही हैं। वह आने वाले वर्ष में फिर से हमसे मिलने आएगी। उसे विसर्जन की प्रक्रिया के माध्यम से उसके ससुराल भेज दिया जाता है।

सिंदूर खेला

दुर्गा पूजा के दौरान सिंदूर खेला, पश्चिम बंगाल में मनाया जाने वाला एक अनूठा अनुष्ठान है। विजयदशमी पर दुर्गा विसर्जन से पहले सिंदूर खेला की रस्म निभाई जाती है। इस मौके पर विवाहित महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं और एक-दूसरे की सलामती की कामना करती हैं। सिंदूर उत्सव को सिंदूर खेला के नाम से भी जाना जाता है।

सोनागाछी की मिट्टी से क्यों बनाई जाती है मां दुर्गा की मूर्ति?

भारत त्यौहारों का देश है। हर प्रांत के अपने त्योहार होते हैं। दुर्गा पूजा एक ऐसा त्योहार है जो बंगाल में रहने वाले सभी लोगों को ऊर्जा और उत्साह से भर देता है।दुर्गा पूजा बंगालियों का एक अनिवार्य त्योहार है। यह पर्व चार दिनों तक चलता है। तैयारी पहले से शुरू हो जाती है। त्योहार के दौरान, पंडालों की स्थापना की जाती है, और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की व्यवस्था की जाती है। लोग नए कपड़े खरीदते हैं। बंगाल में दुर्गा पूजा सदियों से महत्वपूर्ण रही है। अठारहवीं शताब्दी में जब हमारे देश पर कब्जा किया गया था, तब भी जबलपुर में दुर्गा पूजा मनाई जाती थी।

महालय के दिन से हर बंगाली घर में चांदीपथ का मंत्र बजाया जाता है। रेडियो पर चांदीपथ सुनने की प्रथा आज भी कोलकाता में प्रचलित है। चांदीपथ को बीरेंद्र कृष्ण भद्र ने गाया है जिसमें वह महिषासुर मर्दिनी की कहानी को संस्कृत और बंगला मंत्रों के रूप में मधुर और लयबद्ध रूप से सुनाते हैं। आज वह जीवित नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज अमर है।

दुर्गा पूजा कितनी ही पवित्रता से मनाई जाए, मां दुर्गा की मूर्ति को सोनागाछी की मिट्टी से ही स्वरूप मिलता है।

दुर्गा माँ ने एक धर्मनिष्ठ वेश्या को वरदान दिया कि उसकी मूर्ति उसके हाथ से प्रदान की गई गंगा की चिकनी मिट्टी से बनेगी। उन्होंने  महिला को सामाजिक अपमान से बचाने के लिए ऐसा किया। तभी से सोनागाछी की मिट्टी से देवी की मूर्ति बनाने की परंपरा शुरू हो गई।

महालय के दिन मां दुर्गा की अपूर्ण रूप से बनी प्रतिमा में ऑंखें बनायीं जाती हैं। इस दिन लोग अपने मृत रिश्तेदारों को तर्पण चढ़ाते हैं और उसके बाद ही देवी पक्ष शुरू होता है। माँ दुर्गा अपने ससुराल और पति शिव के घर कैलाश को छोड़कर दस दिनों के लिए गणेश, कार्तिकेय, लक्ष्मी और सरस्वती के साथ पृथ्वी पर अपने घर चली जाती हैं।

लोग यह जानने के लिए ग्रहों और सितारों की स्थिति का निरीक्षण करते हैं कि माँ दुर्गा पृथ्वी की ओर कैसे चल रही हैं। यदि वह हाथी पर सवार होकर आती है, तो पृथ्वी पर मनुष्यों के जीवन के साथ-साथ खुशियाँ फैलाते हुए खेती धन्य हो जाती है। अगर वह घोड़े पर बैठ कर आती है, तो बारिश नहीं होती है और सूखा पड़ता है|यदि वह झूले पर आती है, तो यह चारों ओर फैली बीमारियों का प्रतीक है, और यदि वह नाव पर आती है, तो ऐसा माना जाता है कि बारिश अच्छी होगी, फसल अच्छी होगी, नए साल का आगमन भी अच्छा होगा, पृथ्वी के चारों ओर खुशी होगी।

छठे दिन दुर्गा की मूर्ति को पंडाल में लाया जाता है। बंगाल का कुमारतुली दुर्गा की सुंदर मूर्तियाँ बनाने के लिए प्रसिद्ध है, जहाँ इन मूर्तियों को मिट्टी से बनाया जाता है। कोलकाता में दुर्गा पूजा में लगभग 95 प्रतिशत मूर्तियाँ कुमारतुली से आती हैं। इन मूर्तियों को बनाने के लिए पहले लकड़ी के ढांचे पर जूट बांधकर एक फ्रेम तैयार किया जाता है और फिर मिट्टी में धान मिलाकर मूर्ति तैयार की जाती है। फिर मूर्ति को गहनों और कपड़ों से सजाया जाता है।

न केवल दुर्गा की मूर्ति, बल्कि पंडाल भी बहुत खूबसूरती से बनाए जाते हैं। कोलकाता में अमृतसर का स्वर्ण मंदिर बांस और कपड़े से बना है। दुर्गा पंडाल पेरिस में एफिल टॉवर की तरह भव्य दिखता है। पंडालों की रोशनी से पूरा शहर दुल्हन की तरह जगमगाता और खूबसूरत नजर आता है।

षष्ठी की शाम को बोधों की रस्म के साथ दुर्गा के मुंह से कपडा हटा दिया जाता है। फिर महाशष्टी की सुबह महिलाएं लाल किनारी वाली साड़ी पहनकर पूजा करती हैं। महाष्टमी के दिन का अपना महत्व है। संधि पूजा अष्टमी को होती है।

इसका अपना शुभ मुहूर्त होता है और उस समय यज्ञ किया जाता है। 

पुराने समय में लोग बकरे की बलि चढ़ाते थे, लेकिन यह प्रथा अब नहीं देखी जाती है। कहीं-कहीं किसी फल या कद्दू आदि की कुर्बानी भी दी जाती है। लोग निर्जला व्रत का पालन कर संधि के बीच 108 दीये जलाते हैं। ऐसा लगता है जैसे कुछ देर के लिए पूरा ब्रह्मांड खामोश हो जाता है। ऐसा माना जाता है कि संधि के दौरान मां दुर्गा की मूर्ति जीवित हो जाती है।

धुनुची नृत्य बंगाल में किया जाता है। ढुंची मिट्टी से बना एक बड़े बर्तन में दिया सजाया जाता है। सुगंधित धुनों के साथ इन बर्तनों में नारियल के छिलकों को जलाया जाता है। फिर, इन बर्तनों को हाथों में पकड़कर माँ दुर्गा के सामने नृत्य किया जाता है। लोग 4-5 धुनुची को एक साथ ले जाते हैं और गिरती आग के बीच नृत्य करते हैं।

दशमी की सुबह विवाहित महिलाएं मां दुर्गा की मूर्ति पर सिंदूर लगाने के लिए पंडाल आती हैं और होली की तरह सिंदूर से खेलती हैं। इसे सिंदूरखेला कहते हैं। मंत्र जाप से मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। विसर्जन के समय ऐसा लगता है मानो प्यारी बेटी मां दुर्गा अपने मायके से ससुराल जा रही हैं। दशहरे के दिन छोटे लोग परिवार के बड़े सदस्यों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लेते हैं। एक दूसरे को मिठाई खिलाते हैं। लोग एक-दूसरे से मिलने और बधाई देने के लिए एक-दूसरे के घर जाते हैं। और, इस तरह दुर्गा पूजा का त्यौहार पूरा होता है और मनाया जाता है।

आप अन्य सभी प्रमुख भारतीय त्योहारों के लिए भारतीय त्योहारों में ज्योतिष की प्रासंगिकता पर इसी तरह के लेख पढ़ सकते हैं।

देवी सिद्धिदात्री
12 Oct, 2024

नवरात्रि के नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। जैसा कि नाम से पता चलता है, देवी सिद्धिदात्री अपने भक्तों को सभी प्रकार की सिद्धियां प्रदान करती हैं। नवरात्रि के अंतिम तीन दिन, मां सरस्वती को समर्पित हैं। देवी सिद्धिदात्री को देवी सरस्वती का एक रूप माना जाता है। सभी प्रकार की सिद्धियां उसके अधीन हैं। सिद्धि और मोक्ष प्रदान करने वाली देवी दुर्गा की मूर्ति को सिद्धिदात्री के नाम से जाना जाता है। नवरात्रि के नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। यह एक धार्मिक मान्यता है कि अगर देवी की पूरी भक्ति के साथ पूजा की जाती है, तब वह अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। मनुष्य, देवता, यक्ष, किन्नर, दानव, ऋषि आदि सभी प्राणी, देवी सिद्धिदात्री की पूजा करते हैं। इनकी पूजा करने से यश, शक्ति और धन की प्राप्ति होती है। वह अपने भक्तों को महान ज्ञान और आठ प्रकार की सिद्धियों का आशीर्वाद देती हैं। ऐसा माना जाता है कि देवी सिद्धिदात्री से देवताओं ने भी सिद्धियां प्राप्त की थीं। देवी सिद्धिदात्री देवी सरस्वती के कई रूपों में से एक हैं जो सफेद कपड़े पहनती हैं, ज्ञान से भरपूर हैं और अपने मधुर स्वर से अपने भक्तों को सम्मोहित करती हैं।

नौवें दिन मां सिद्धिदात्री को मौसमी फल, हलवा, पूड़ी, काले चने और नारियल का भोग लगाएं। जो भक्त देवी की पूजा करते हैं और नवमी के दिन उपवास भी करते हैं, उन्हें इस संसार में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त होता है। भगवती सिद्धिदात्री अपने उपासकों को उपरोक्त पूर्ण सिद्धियाँ प्रदान करती हैं। देवी दुर्गा के इस अंतिम रूप की पूजा के साथ ही नवरात्रि की रस्म समाप्त हो जाती है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व आठ सिद्धियां हैं जो देवी सिद्धिदात्री भक्तों और साधकों को यह  सभी सिद्धियां प्रदान कर सकती हैं। देवी पुराण के अनुसार, भगवान शिव ने यह सिद्धियां देवी सिद्धिदात्री के आशीर्वाद से प्राप्त की थी और उनकी कृपा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का था। इसी कारण वह विश्व में 'अर्धनारीश्वर' के नाम से प्रसिद्ध हुए।

देवी सिद्धिदात्री का प्रतिनिधित्व/ The representation of Goddess Siddhidatri

पुराणों में देवी सिद्धिदात्री की कृपा से सभी देवी देवताओं ने सिद्धियां प्राप्त की हैं। इस रूप में, देवी कमल पर विराजमान हैं और अपने हाथों में एक शंख, कमल, सुदर्शन चक्र और एक गदा धारण करती हैं। सिद्धिदात्री भी देवी सरस्वती का ही रूप हैं और उन्होंने श्वेत वस्त्र भी धारण किए हैं।

देवी सिद्धिदात्री कौन हैं?/ Who is Goddess Siddhidatri?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवी सिद्धिदात्री की कृपा से ही भगवान शिव सिद्धियों को प्राप्त करने में सक्षम थे। देवी की कृपा से ही भगवान शिव का आधा शरीर उन्हीं का था। इसी कारण वह विश्व में 'अर्धनारीश्वर' के नाम से प्रसिद्ध हुए। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व आठ सिद्धियां हैं, जिन्हें भक्त पूरी भक्ति के साथ उनकी पूजा करने से प्राप्त कर सकते हैं।

नवम देवी सिद्धिदात्री की उत्पत्ति/ Origin of Navam Devi Siddhidatri

इस धरती पर राक्षसों के अत्याचार को नष्ट करने के लिए, मानव जगत के उत्थान के लिए और धर्म की रक्षा के लिए, देवी भगवती दुर्गा नवरात्रि के नौवें दिन देवी सिद्धिदात्री के रूप में प्रकट हुईं। इस माता का आशीर्वाद पूर्णता और समृद्धि का प्रतीक है जो सभी प्रकार के राक्षसों का दमन करके प्रत्येक भक्त को वांछित परिणाम देने वाली है। प्रतिपदा से नवमी तक माँ भगवती दुर्गा द्वारा सभी अभिमानी राक्षसों का वध किया जाता है। यह सभी देवताओं और मनुष्यों को मोक्ष की ओर ले जाता है, और देवी को सिद्धिदात्री के रूप में दुनिया में प्रसिद्धि मिलती है यानी साक्षात देवी सिद्धिदात्री देवी-देवताओं सहित सभी भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने के लिए अवतरित होती हैं। यह सर्वोच्च कल्याण और मोक्ष दाता है। उन्हें सिद्धिदात्री के रूप में जाना जाता है और उनकी पूजा की जाती है क्योंकि मनुष्य का अंतिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति है। यदि वह प्रसन्न हो जाती है, तब वह सभी भक्तों को सिद्धियों का आशीर्वाद देती है।

देवी सिद्धिदात्री कमल पर विराजमान हैं, और वह सिंह की सवारी करती हैं। सिद्धिदात्री की पूजा करने से भक्तों को उनकी महत्वाकांक्षाओं, असंतोष, आलस्य, ईर्ष्या, प्रतिशोध से छुटकारा मिलता है। अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व, आठ सिद्धियां हैं जिन्हें देवी सिद्धिदात्री की पूजा से प्राप्त किया जा सकता है। नवरात्रि के दौरान देवी के इस रूप की पूजा करने से सभी प्रकार के कार्यों को पूरा करना आसान हो जाता है। अंतिम दिन, देवी सिद्धिदात्री की पूजा करते समय, भक्तों को अपना सारा ध्यान निर्वाण चक्र पर केंद्रित करना चाहिए, जो हमारे माथे के बीच में स्थित है। ऐसा करने से देवी की कृपा से इस चक्र से संबंधित शक्तियां भक्त को स्वतः ही प्राप्त हो जाती हैं। मां सिद्धिदात्री की कृपा से भक्त के लिए कोई भी कार्य असंभव नहीं होता और उसे हर प्रकार से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

देवी सिद्धिदात्री का महत्व/ The importance of Goddess Siddhidatri

देवी सिद्धिदात्री की पूजा करने से प्रकृति में बहुत उत्थान होता है। इसके प्रभाव से भक्तों को मनचाहा फल मिलता है। देवी सभी सिद्धियों की दाता हैं, और वह भक्तों के जीवन से सभी भय और बीमारी को दूर करती हैं और उनके जीवन को और अधिक खुशी से जीने का मार्ग प्रदान करती हैं। इसलिए भक्तों को उनकी पूजा करनी चाहिए। देवताओं, दानुज, मनोज, गंधर्व, आदि सभी के द्वारा समान रूप से माँ सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। इस प्रकार, शांति और समृद्धि प्राप्त करने के लिए उसकी पूजा आवश्यक है। 

देवी के महत्व के बारे में बताते हुए देवता कहते हैं कि -

(शरणागत की पीड़ा दूर करने वाली देवि। हम पर प्रसन्न हो और सम्पूर्ण जगत् की माता! प्रसन्न हो। विश्वेश्वरि। विश्व की रक्षा करो। देवि! तुम्हीं चराचर जगत् की अधीश्वरी हो। तुम इस जगत् का एकमात्र आधार हो, क्योंकि पृथ्वी के रूप में तुम्हारी ही स्थिति है। तुम्हारा पराक्रम अलंघनीय है। तुम्हीं जल रूप में स्थित होकर सम्पूर्ण जगत् को तृप्त करती हो। तुम अनन्त बलसम्पन्न वैष्णवी शक्ति हो। इस विश्व की कारण भूत परामाया तुम हो। देवि! तुमने इस समस्त जगत् को मोहित कर रखा है। तुम्हीं प्रसन्न होने पर इस पृथ्वी पर मोक्ष की प्राप्ति कराती हो।)

मां सिद्धिदात्री का ज्योतिष से संबंध/ Mother Siddhidatri's relationship with astrology

यह देवी का उग्र रूप है, जिसमें अनंत मात्रा में ऊर्जा है, जो शत्रु को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है। इस रूप की पूजा त्रिमूर्ति यानी ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी करते हैं। इसका मतलब है कि अगर देवी अपने भक्त से खुश हो जाती हैं, तब कोई भी शत्रु उनके आसपास नहीं टिकेगा। साथ ही उन्हें त्रिमूर्ति की ऊर्जा भी प्राप्त होगी। इनकी पूजा करने से भक्त की कुंडली के छठे/Sixth House और ग्यारहवें भाव/Eleventh House को बल मिलता है साथ ही, तीसरे भाव में भी जबरदस्त ऊर्जा पैदा होती है। यदि शत्रु पक्ष परेशान कर रहे हैं या अदालती कार्यवाही चल रही हो तब इस रूप में मां की पूजा करने से विशेष लाभ मिलता है।

देवी सिद्धिदात्री की पूजा करने की विधि/ The Vidhi to Worship Goddess Siddhidatri

देवी आदिशक्ति दुर्गा के इस नौवें विग्रह को सिद्धिदात्री के रूप में जाना जाता है और इसे इस सारी दुनिया में पूजा जाता है। ऐसा माना जाता है कि नवरात्रि के नौवें दिन स्तुति और देवी सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। वह दुनिया भर में मनुष्यों, देवताओं, राक्षसों और गंधर्व द्वारा पूजित है। उनकी पूजा करने से आठ सिद्धियों की नवनिधि प्राप्त करने के मार्ग खुलते हैं। भक्तों को चाहिए कि वह पूरी श्रद्धा के साथ उनकी पूजा करें और अपने परिवार के उत्थान के लिए सभी पूजा नियमों का पालन करें। पूजा के नियम पहले जैसे ही रहेंगे। जिसमें पूर्ण पवित्रता को ध्यान में रखते हुए संयम और ब्रह्मचर्य भी जरूरी है।

नवमी के दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। यह नवरात्रि का आखिरी दिन है। इस दिन इस देवी की पूजा की जाती है और उन्हें विदाई दी जाती है।

सबसे पहले भक्त को पवित्र होना चाहिए और स्वच्छ  वस्त्र धारण करना चाहिए। इसके बाद उन्हें देवी के चित्र या मूर्ति को एक आसन पर स्थापित करना चाहिए।

इसके बाद देवी को कुछ फल, फूल, माला, नैवेद्य आदि चढ़ाएं और नियमानुसार उनकी पूजा करें। अंत में देवी की आरती करें।

इस दिन कन्या पूजन को विशेष महत्व दिया जाता है। कन्याओं को अपने घर आमंत्रित करें और उनकी पूजा करें और उन्हें कुछ उपहार दें। अंत में उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें। साथ ही ब्राह्मण और गाय को भोजन कराएं। इन अनुष्ठानों को करें और इस पूजा प्रक्रिया को पूरा करें जिससे आपको मनचाहा फल प्राप्त होगा। देवी की कृपा से, दुनिया भर के भक्त अपने जीवन में सुख और शांति प्राप्त कर सकते हैं।

देवी सिद्धिदात्री का प्रिय भोग और रंग/ The favorite Bhog and Color of Goddess Siddhidatri

ऐसा माना जाता है कि देवी सिद्धिदात्री को लाल और पीला रंग पसंद है। उनके पसंदीदा भोग नारियल, सेवइयां, नैवेद्य और पंचामृत हैं।

देवी सिद्धिदात्री का मंत्र

या देवी सर्वभूतेषु मां सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।

माँ सिद्धिदात्री का ध्यान/Meditation of Goddess Siddhidatri

वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।

कमलस्थितां चतुर्भुजा सिद्धीदात्री यशस्वनीम्॥

स्वर्णावर्णा निर्वाणचक्रस्थितां नवम् दुर्गा त्रिनेत्राम।

शख, चक्र, गदा, पदम, धरां सिद्धीदात्री भजेम।

पटाम्बर, परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम।

मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम॥

प्रफुल्ल वदना पल्लवाधरां कातं कपोला पीनपयोधराम।

कमनीयां लावण्यां श्रीणकटि निम्ननाभि नितम्बनीम॥)

सिद्धिदात्री की स्तोत्र पाठ

कंचनाभा शखचक्रगदापद्मधरा मुकुटोज्वलो।

स्मेरमुखी शिवपत्नी सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥

पटाम्बर परिधानां नानालंकारं भूषिता।

नलिस्थितां नलनार्क्षी सिद्धीदात्री नमोअस्तुते॥

परमानंदमयी देवी परब्रह्म परमात्मा।

परमशक्ति, परमभक्ति, सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥

विश्वकर्ती, विश्वभती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता।

विश्व वार्चिता विश्वातीता सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥

भुक्तिमुक्तिकारिणी भक्तकष्टनिवारिणी।

भव सागर तारिणी सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥

धर्मार्थकाम प्रदायिनी महामोह विनाशिनी।)

मोक्षदायिनी सिद्धीदायिनी सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥

माँ सिद्धिदात्री कवच/Goddess Siddhidatri Shield

(ओंकारपातु शीर्षो मां ऐं बीजं मां हृदयो। हीं बीजं सदापातु नभो, गुहो च पादयो॥ ललाट कर्णो श्रीं बीजपातु क्लीं बीजं मां नेत्र घ्राणो। कपोल चिबुको हसौ पातु जगत्प्रसूत्यै मां सर्व वदनो॥)

अंत में भगवान शिव और ब्रह्मा जी की आराधना करने के बाद देवी सिद्धिदात्री की आराधना करें और उनकी आरती करें और उनके नाम से देवी से क्षमा मांगें। हवन के दौरान चढ़ाए गए प्रसाद को बांटे और हवन की अग्नि के अवशेषों को पवित्र जल में विसर्जित करें। यह आपको रोग, क्रोध और ग्रह बाधाओं से बचाता है और आपके मन से भय से दूर रखता है।

मां सिद्धिदात्री की आरती/Maa Siddhidatri Ki Aarti

जय सिद्धिदात्री मां तू सिद्धि की दाता।

तू भक्तों की रक्षक तू दासों की माता।।

तेरा नाम लेते ही मिलती है सिद्धि ।

तेरे नाम से मन की होती है शुद्धि ।।

कठिन काम सिद्ध करती हो तुम ।

जभी हाथ सेवक के सिर धरती हो तुम।।

तेरी पूजा में तो ना कोई विधि है ।

तू जगदंबे दाती तू सर्व सिद्धि है ।।

रविवार को तेरा सुमिरन करे जो ।

तेरी मूर्ति को ही मन में धरे जो ।।

तू सब काज उसके करती है पूरे ।

कभी काम उसके रहे ना अधूरे ।।

तुम्हारी दया और तुम्हारी यह माया।

रखे जिसके सिर पर मैया अपनी छाया।।

सर्व सिद्धि दाती वह है भाग्यशाली।

जो है तेरे दर का ही अंबे सवाली ।।

हिमाचल है पर्वत जहां वास तेरा।

महानंदा मंदिर में है वास तेरा ।।

मुझे आसरा है तुम्हारा ही माता ।

भक्ति है सवाली तू जिसकी दाता ।।

देवी सिद्धिदात्री की कथा/ The tale of Goddess Siddhidatri

कई प्रसिद्ध कथाएं देवी सिद्धिदात्री के इर्द-गिर्द घूमती है, जो देवी सिद्धिदात्री के साथ दुर्गा सप्तदशी के बारे में है| इनके माध्यम से भक्तों को सिद्धि, बुद्धि, सुख और शांति प्राप्त होती है, और घर में मानसिक पीड़ा दूर हो जाती है। घर में प्यार की भावना बढ़ती है अर्थात यह देवी सर्वव्यापी है, जिसे स्वयं देवी ने एक कथा में स्वीकार किया है। 

शुम्भ के साथ युद्ध में वह कहती है कि मेरे सिवा इस दुनिया में और कोई नहीं है? देखो, यह सारे मेरे ही व्यक्तित्व के हिस्से हैं, इसलिए वह मुझमें प्रवेश कर रहे हैं। इस तरह ब्राह्मणी आदि सभी देवी-देवता अंबिका देवी के शरीर में समा गए। उस समय केवल अंबिका देवी ही बची थीं। देवी ने कहा, "मैं यहां अपने ऐश्वर्य के साथ कई रूपों में थी। मैंने उन सभी रूपों को धारण किया है । मैं अब युद्ध में अकेली हूं। तब सभी देवताओं और राक्षसों की दृष्टि में देवी और शुंभ के बीच एक भयंकर युद्ध हुआ|

ऋषि कहते हैं: तब सभी राक्षसों के राजा शुंभ को अपनी ओर आते देख देवी ने त्रिशूल से उनकी छाती को भेद दिया और उसे पृथ्वी पर गिरा दिया। जब दानव अपने त्रिशूल की धार से घायल हो गया, तब उसका जीवन उड़ गया, और वह गिर गया, जिससे भूमि, समुद्र, द्वीप, पहाड़, और पूरी पृथ्वी सहित सब कुछ हिल गया। फिर, जब दैत्य का वध हुआ, तब सारा संसार सुखी और पूर्ण रूप से स्वस्थ हो गया, और आकाश स्वच्छ दिखाई देने लगा। इसके बाद मेघ और उल्का जो विनाश के सूचक थे, सब शांत हो गए और जब दानव मारा गया तो नदियां भी सही ढंग से बहने लगीं।

नवरात्रि के आखिरी दिन इस तरह की जाती है कन्या पूजन How to perform Kanya Pujan on the Last day of Navratri?

नवरात्रि के नौवें दिन देवी सिद्धिदात्री की पूजा करने और नवरात्रि के समापन के लिए भोजन और नौ प्रकार के फल आदि से युक्त नवहना प्रसाद और नवरस बनाना चाहिए। इस दिन दुर्गासप्तदशी के नौवें भाग से देवी की पूजा करें। नौवें दिन मां सिद्धिदात्री को मौसमी फल, हलवा, पूरी, काले चने और नारियल चढ़ाएं। देवी की पूजा के दौरान बैंगनी रंग के कपड़े पहने। देवी की पूजा के बाद कन्या या अविवाहित कन्याओं को भोजन कराना चाहिए। भोजन करने से पहले आपको उनके पैर धोना चाहिए और उनसे आशीर्वाद लेना चाहिए। उन्हें देवी और दक्षिणा का प्रसाद दें और फिर उनके पैर छूकर विदा करें। यदि कन्या न मिले तो सुपारी की पूजा करें। आपको उनकी देवी के रूप में पूजा करनी चाहिए।

जो भक्त कन्या पूजन और नवमी पूजन करके नवरात्रि का समापन करते हैं उन्हें इस लोक में धर्म, अर्थ, कार्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है। देवी भागवत पुराण में कहा गया है कि देवी सिद्धिदात्री की पूजा करने से सभी सिद्धियों की प्राप्ति होती है। इस दिन देवी दुर्गा, नवरात्रि के नौ दिनों में भक्ति के साथ की गई पूजा का फल प्रदान करती हैं। यही कारण है कि नवरात्रि के आखिरी दिन, देवता, ऋषि, किन्नर लोग, यक्ष, दानव, साधक और सभी भक्त भी देवी सिद्धिदात्री की पूजा करते हैं। इस देवी की पूजा से यश, बल और धन की प्राप्ति होती है।

नवमी हवन (होम)/ Navami Havan ( Homa)

महानवमी की शाम को नवमी हवन का बहुत महत्व है। नवमी पूजन के बाद नवमी हवन प्रस्तुत किया जाता है। नवमी होम अनुष्ठान लोकप्रिय रूप से चंडी होम के रूप में जाना जाता है। भक्त नवमी हवन के अनुष्ठान का पालन करते हैं और मां दुर्गा से समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य का आशीर्वाद मांगते हैं। भक्तों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नवमी हवन की रस्म केवल दोपहर के समय ही की जानी चाहिए। भक्तों को हवन के दौरान दुर्गासप्तदशी से मंत्रों का जाप करना चाहिए।

इस दिन हवन की क्या प्रक्रिया है?/ What is the process of the Havan on this day?

  • यह हवन नवरात्रि को पूरा करने के लिए नवमी के दिन किया जाता है।
  • नवमी के दिन पहले पूजा और फिर हवन करें।
  • हवन की सामग्री में जौ और काले तिल डालें।
  • इसके बाद कन्या पूजन करें।
  • कन्या पूजन करने के बाद संपूर्ण भोजन का दान करें।
  • हवन से मनचाहा लाभ पाने के लिए कौन सी सामग्री का प्रयोग करना चाहिए?
  • आर्थिक लाभ के लिए- मखाने और खीर के साथ हवन।
  • कर्ज से मुक्ति के लिए- राई से हवन।
  • संतान संबंधी समस्याओं के लिए- मक्खन से हवन करें।
  • ग्रह शांति के लिए - काले तिल वाला हवन।
  • सर्व कल्याण के लिए- काले तिल और जौ से हवन करें।
  • सिद्धिदात्री देवी की पूजा से किस प्रकार के वरदान प्राप्त हो सकते हैं?
  • सिद्धिदात्री में सभी देवी-देवता समाहित हैं।
  • यदि केवल नवरात्रि के दौरान उसकी पूजा की जाती है, तो नवरात्रि के सभी फल प्राप्त करना संभव है।
  • इनकी पूजा से अपार वैभव मिलता है।
  • साथ ही उनकी पूजा करने से भक्त सभी सिद्धियों को प्राप्त कर सकते हैं।
  • देवी के इस रूप की पूजा करने से भक्त को ग्रहों के प्रतिकूल प्रभाव से बचाया जा सकता है।

नवरात्रि में न करें ये काम/Do not do these tasks on Navratri

  • साफ कपड़े पहनने चाहिए। कृपया बिना धोए कोई भी कपड़े न पहनें।
  • नवरात्रि प्रतिपदा के दिन से एकादशी तिथि तक अपने नाखून न काटें। बेहतर होगा कि आप नवरात्रि के दिनों में बाल न कटवाएं।
  • नवरात्रि के इस शुभ मुहूर्त में सिलाई-या वस्त्रों की कटाई के काम में शामिल नहीं होना चाहिए।
  • नवरात्रि के इस विशेष काल में आपको किसी की निंदा नहीं करनी चाहिए, झूठ नहीं बोलना चाहिए और मीठा बोलना चाहिए।
  • कोशिश करें कि नवरात्रि के नौ दिनों तक सूर्यास्त के बाद घर में झाड़ू न लगाएं, या कम से कम पूजा घर और रसोई घर में ऐसा न करने का संकल्प लें।
  • हो सके तो इन नौ दिनों में चप्पल पहनकर अपने घर में प्रवेश न करें। 
  • चमड़े से बनी किसी भी चीज का प्रयोग न करें।
  • नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान शराब, मांस, तंबाकू और अन्य वस्तुओं का सेवन न करें।
  • नवरात्रि के नौ दिनों में किसी भी महिला का अपमान न करें।
  • तामसिक भोजन जैसे प्याज, लहसुन का सेवन न करें। मांसाहार पूर्णत: प्रतिबंधित है।
  • यदि आप अनंत अखंड दीपक जला रहे हैं तो अपने घर को कभी भी खाली न छोड़ें।
  • नवरात्रि में दिन में सोना वर्जित है। ऐसा विष्णु पुराण में कहा गया है।
  • यदि आप मंत्र, चालीसा, या सप्तशती पढ़ रहे हैं,तब बीच में न उठें और कोई भी इधर उधर की बात न करें अन्यथा यह शत्रुतापूर्ण शक्तियों को पाठ का फल देता है।

आप हमारी वेबसाइट से अन्य भारतीय त्योहारों, लोकप्रिय व्रत तिथियों के बारे में भी पढ़ सकते हैं।

साथ ही जन्मकुंडलीलव या अरेंज मैरिज में चुनाव, व्यवसायिक नामों के सुझावस्वास्थ्य ज्योतिषनौकरी या व्यवसाय के चुनाव के बारे में भी पढ़ सकते हैं।       

दशहरा
12 Oct, 2024

भारत में मनाए जाने वाले सभी पर्व किसी न किसी रूप में बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश देते हैं, लेकिन वास्तव में दशहरे का त्यौहार इसके लिए जाना जाता है। यह पर्व दीपावली से ठीक बीस दिन बाद मनाया जाता है। पंचाग के अनुसार अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी को पूरे देश में विजयदशमी या दशहरा मनाया जाता है। दशहरा हिंदुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह त्योहार भगवान श्री राम की कथा बताता है, जिन्होंने नौ दिनों के युद्ध के पश्चात लंका में अभिमानी रावण को पराजित किया और माता सीता को उसकी कैद से मुक्त कराया। उसी दिन देवी दुर्गा ने महिषासुर का संहार किया था। इसलिए, इसे विजयदशमी के रूप में भी मनाया जाता है।

इस दिन देवी दुर्गा की भी आराधना की जाती है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान श्री राम ने भी देवी दुर्गा की पूजा कर उनसे शक्ति की याचना की। श्री राम की परीक्षा लेने के लिए, देवी ने पूजा के लिए रखे फूलों में से एक कमल का फूल हटा दिया। श्री राम राजीवनयन के नाम से जाने जाते हैं , जिसका अर्थ है कमल के सामान नयनों का स्वामी। इसलिए, उन्होंने अपनी एक आंख देवी को अर्पण करने का निर्णय किया। जैसे ही वह अपनी आंख निकालने वाले थे , देवी दुर्गा प्रसन्न हो गईं; वह उनके समक्ष प्रकट हुई और श्री राम को विजय का आशीर्वाद दिया। ऐसा माना जाता है कि इसके पश्चात दशमी के दिन भगवान राम ने रावण का वध किया था। रावण पर भगवान राम और महिषासुर दानव पर देवी दुर्गा की जय का यह पर्व सम्पूर्ण देश में बुराई पर अच्छाई तथा अधर्म पर धर्म की जीत के रूप में मनाया जाता है। इसे मनाने की विभिन्न शैलियाँ देश के अलग-अलग भागों में भी विकसित हुई हैं। कुल्लू का दशहरा देश भर में प्रसिद्ध है; पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा सहित कई राज्यों में दुर्गा पूजा भी भव्यता से मनाई जाती है।

विजयदशमी / दशहरा का महत्त्व/Importance of Vijayadashami/Dussehra

विजयदशमी / दशहरा का त्योहार बदी पर नेकी की जीत को दर्शाने के लिए मनाया जाता है। दशहरे के इस पर्व को विजय उत्सव के रूप में मनाया जाता है,  परन्तु उत्सव के पीछे की मान्यताएं भिन्न हैं। उदाहरण हेतु , किसानों के लिए, यह नई फसलों के लहलहाने का उत्सव है। प्राचीन काल में इस दिन औज़ारों और शस्त्रों का पूजन किया जाता था , क्योंकि पौराणिक काल में लोग औजारों और शस्त्रों को युद्ध में विजय के तौर पर देखते थे। फिर भी, इन सबके पीछे का  मुख्य कारण "बुराई पर अच्छाई की जीत" है। वर्तमान समय में यह बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। बुराई किसी भी रूप में हो सकती है जैसे क्रोध, झूठ, घृणा, ईर्ष्या, उदासीनता आदि। हमें अपने भीतर की बुराई को नष्ट करके विजयदशमी / दशहरा का पर्व मनाना चाहिए ताकि एक दिन हम अपनी सभी इंद्रियों पर शासन  पा सकें।

विजयादशमी: जानिए रामचरित मानस में क्या लिखा है?/ Vijayadashmi: Know What is Written in Ramacharitra Manas

हर वर्ष धूम- धाम के साथ मनाया जाने वाले विजयदशमी के त्योहार को केवल राम-रावण युद्ध  से सम्बंधित नहीं माना जाना चाहिए। बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक इस पर्व में छिपे संदेश समाज के लिए एक दिशा प्रशस्त कर सकते हैं। महापंडित दशानन स्वयं भली-भांति जानते थे कि राम के द्वारा उनकी जीवन लीला का अंत निर्धारित है। वहीं मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने भी रावण की बुद्धि और कौशल को नमन किया।

रामचरित मानस में राम का चरित्र बेहतरीन तरीके से वर्णित किया गया है, वहीं हम रावण के जीवन में  अपने ज्ञान और नेतृत्व क्षमता पर गर्व का अवलोकन भी देखते हैं। रावण बुद्धिमान होने के साथ-साथ अत्यंत पराक्रमी भी था, लेकिन वानर राज बाली ने इस अभिमानी  का दमन किया और लंकेश को उसे छह माह  तक अपनी काख में दबा कर रखा।

लंका पर शासन करने वाले रावण ने भी अपने सौतेले भाई कुबेर को धोखा दिया और उसके पुष्पक विमान पर आधिपत्य जमा लिया। इन सब बुराइयों के कारण वह मृत्यु को प्राप्त हुआ । हम हर वर्ष रावण रूपी अहंकार का पुतला जलाकर पर्व मनाते हैं, लेकिन हम अपने अहंकार का त्याग करने को तैयार नहीं हैं। इस प्रकार विजयादशमी का पर्व मनाने से क्या लाभ?

अपने अंदर छिपी चेतना को जागृत करना और अहंकार का त्याग करना विजयदशमी के पर्व का प्रमुख संदेश है। आज हम अपनी चेतना और ऊर्जा को सही दिशा प्रदान करने के लिए समस्याओं से ग्रसित हो गए हैं। रावण के अत्याचारों से त्रस्त लोगों को सुख प्रदान करने के लिए ही भगवान राम का जन्म हुआ था।

हम सभी इस बात से अवगत हैं कि राम का जन्म एक  क्षत्रिय परिवार में हुआ था। जबकि, रावण ब्राह्मण कुल से था और एक महान, वेदों और पुराणों के ज्ञाता ऋषि का पुत्र था। रावण के दादा ऋषि पुलत्स्य को भी भगवान के समान ही माना जाता था। राम-रावण युद्ध के दौरान राम के हृदय में कहीं न कहीं रावण के प्रति सहानुभूति थी।

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम इस बात से अवगत थे  एक कि ब्राह्मण को मारना पाप है। इसलिए, उन्होंने रावण को मारने के बाद ब्राह्मणों के वध का प्रायश्चित किया और प्रार्थना की, कि उनका इस पाप का भागी बनाना  सर्व-साधारण की रक्षा के लिए आवश्यक था; तो ईश्वर उन्हें इस पाप से मुक्त करें।

इस युग में यह बात भी जानने योग्य है कि रावण की मृत्यु के पश्चात भगवान राम ने स्वयं अपने छोटे भाई लक्ष्मण को ज्ञान प्राप्ति के लिए रावण के पास भेजा था। फिर भी अपनी अंतिम सांस ले रहे रावण ने लक्ष्मण की ओर दृष्टि तक नहीं डाली । बाद में, मर्यादा पुरुषोत्तम ने स्वयं रावण से हाथ जोड़कर ज्ञान प्रदान करने का अनुरोध किया, और रावण ने अपना अहंकार त्यागकर ज्ञानोपदेश दिया।

दशहरा या विजयदशमी का  पर्व  हमें दस प्रकार के पापों से दूर रहने का संदेश देता है। यह पर्व हमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, नशा, मत्सर, अभिमान, आलस्य, हिंसा और चोरी से दूर रहने की प्रेरणा देता है। यदि हम उत्साह के साथ रावण के पुतले को जलाते हैं, तो इन दस पापों को आग में दाह कर देना चाहिए , तभी हमारा इस विजयी पर्व को मनाने का उद्देश्य पूर्ण हो सकता है।

केवल सांस्कृतिक कार्यक्रमों जैसे, नाचने ,गाने, आतिशबाजी को ही विजयदशमी उत्सव का प्रतीक नहीं माना जाना चाहिए। इस पर्व की निहित संदेश लोगों तक पहुंचना चाहिए, और हर घर में शांति और खुशी होनी चाहिए। यही इस पर्व का संदेश है। दशहरे का नाम विजयदशमी होने के पीछे ग्रहों की स्थिति एक  प्रमुख कारण है।

शास्त्रों के अनुसार अश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी को शुक्र के उदय के समय जो मुहूर्त होता है, उसे ज्योतिष की भाषा में विजय मुहूर्त कहा जाता है। ज्योतिष की मानें तो शुक्र के उत्थान का यह समय सर्व सिद्धि दयाक माना जाता है। इसलिए दशहरे  को विजय दशमी के नाम से भी जाना जाता है।

दशहरे के पावन अवसर पर शमी के वृक्ष के सोन पत्र के आदान-प्रदान की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। इस परंपरा के पीछे एक कहानी है। ऐसा माना जाता है कि भगवान श्री राम लंका गमन के समय इस वृक्ष से होकर गुज़र रहे थे, तब इसी वृक्ष ने उनकी विजय की घोषणा की थी।

ऐसा कहा जाता है कि वनवास के चौदहवें वर्ष में अर्जुन ने इसी शमी वृक्ष पर अपना धनुष छिपा कर रखा था। आज भी दशहरे पर हिन्दू धर्म के अनुयायी रावण से शमी वृक्ष के पत्ते प्राप्त कर रावण से ज्ञान प्रदान करने का अनुरोध करते हैं।

विजय दशमी मनाने का मुख्य कारण चाहे जो भी हो, परन्तु यह निश्चित है कि यह पर्व अभिमान को नष्ट करने और संस्कृति के अनुसार आचरण करने का प्रतीक है। अच्छे व्यवहार को अपनाकर और खुद में व्याप्त बुराई को  तिलांजली अर्पित करने को विजयदशमी कहा जा सकता है।

दशहरे का धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्व है/Dussehra Has Huge Importance From Religious Point of View

ऐसा माना जाता है कि इस समय कोई भी शुभ कार्य प्रारम्भ करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है। दशहरे के दिन क्षत्रिय वंश में शस्त्रों का पूजन किया जाता है। इस दिन ब्राह्मण ज्ञान की देवी सरस्वती की पूजा करते हैं। वैश्य अपने बही खातों की पूजा करते हैं। बुराई के प्रतीक लंकेश रावण के पुतले को भी देश के विभिन्न हिस्सों में जलाया जाता है। भगवान राम ने रावण का वध किया था। हालाँकि, रावण अभी भी समाज में मुद्रास्फीति, भ्रष्टाचार, व्यभिचार, लालच , हिंसा, भेदभाव, ईर्ष्या, पर्यावरण प्रदूषण, यौन हिंसा और यौन शोषण जैसे रूपों में  विद्यमान है। इसलिए इस दिन हमें  अपने अन्दर निहित इन सभी बुराइयों को दूर करना चाहिए।

इसलिए, इस पर्व को  विजय दशमी और दशहरा के रूप में जाना जाता है/Hence, it is known as Vijaya Dashami and Dussehra

एक पौराणिक कथा के अनुसार रावण ने माता सीता का हरण किया था। जब रावण सीता का हरण कर सकता था, उस समय महिलाओं की दुर्दशा की कल्पना करना मुश्किल नहीं है । भगवान राम ने अधर्मी और अन्यायी रावण को युद्ध की चुनौती दी और नारी जाति के सम्मान की रक्षा के लिए दस दिनों तक रावण से युद्ध किया। अश्विन माह की शुक्ल दशमी को भगवान राम ने मां दुर्गा के दिव्य अस्त्र से उसका वध किया था। रावण का अंत दशानन का अंत था। इस पर्व को असत्य पर न्याय और सत्य की विजय के उत्सव के रूप में मनाया गया। इस संग्राम में रावण पर राम की विजय हुई थी। इसलिए इसको विजयदशमी कहा गया। इस दिन दशानन रावण पराजित हुआ था, इसलिए इस दिन को आम भाषा में दशहरा भी कहा जाता है।

देवी दुर्गा ने इस तिथि को विजयदशमी बनाया है/Goddess Durga has made this Tithi as Vijayadashami

दुर्गा सप्तशती का मध्य चरित्र में  देवी दुर्गा और महिषासुर वध की कथा है। इस दैत्य ने देवताओं का स्वर्ग से भी पलायन करा दिया। उसके अत्याचारों से पृथ्वी पर त्राही-त्राही मच गई। देवी ने अश्विन मास शुक्ल दशमी तिथि को महिषासुर का वध कर पृथ्वी को पाप के भार से मुक्त किया। देवी की विजय से प्रसन्न होकर देवताओं ने विजया देवी की पूजा की और इसी कारण इस  तिथि को विजयदशमी कहा जाता है।

महाभारत काल में सत्य की विजय/The victory of truth in the time of Mahabharata

महाभारत से पहले एक और युद्ध हुआ था, जिसे अकेले अर्जुन ने लड़ा था। एक ओर कौरवों की विशाल सेना थी और दूसरी ओर अर्जुन अकेला था। यह युद्ध इतिहास में विराट युद्ध के नाम से विख्यात है। अपने अज्ञात वास के अंतिम दिनों में, अर्जुन ने राजा विराट के लिए यह युद्ध लड़ा, जिनके राज्य में उन्होंने अपना अज्ञातवास बिताया था। यह कौरवों के असत्य पर पांडवों के धर्म की विजय थी। पांडवों की सफलता के कारण दशहरा को विजयदशमी के रूप में भी मनाया जाता है।

इसी देवी के कारण दशहरे का नाम विजयादशमी पड़ा/Dussehra got its name as Vijaya Dashami because of this Goddess.

नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ रूपों का पूजन होता है। लेकिन योगिनियों की पूजा के बिना देवी की पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती। इसलिए विजय नक्षत्र में दशमी तिथि को देवी की योगिनी जया और विजया का  अश्विन नक्षत्र के शुक्ल पक्ष में आगमन होता है। यह दो योगिनियां अजेय हैं; उन्हें कोई परास्त नहीं कर सकता, इसलिए इन्हें अपराजिता के रूप में भी पूजा जाता है। दशमी तिथि पर विजया देवी के पूजन के कारण दशहरे को विजय दशमी कहा जाता है।

यह पर्व प्राचीन काल से मनाया जा रहा है/Festival is being celebrated since ancient times

पुराने समय में राजघन दशहरा विजय उत्सव के रूप में मनाया जाता था। इस दिन, राजा ने देवी से प्रार्थना की और वह यात्रा के लिए चल पड़ा। विजयदशमी के दिन राजाओं ने अपने शासन क्षेत्र का विस्तार करने को दूसरे देशों पर आक्रमण किया।

दशहरा का महत्व/Importance of the day of Dussehra

ऐसी मान्यता है कि यदि दशहरे के दिन अगर कोई नया कार्य प्रारम्भ किया जाता हैं, तो यह अक्सर फायदेमंद साबित होता है, और इस दिन वाहन, आभूषण और अन्य सामान खरीदना भी शुभ माना जाता है; इससे घर में समृद्धि आती है। यही नहीं, इस दिन शिव पूजन करने से बहुत लाभ मिलता है। इस दिन की गयी प्रार्थना से आपको जीत और सफलता  प्राप्त होती है।

दशहरे की पूजन सामग्री/Dussehra Puja Essentials

  • दशहरे की मूर्तियाँ
  • गाय का गोबर, नींबू
  • तिलक, मौली,अक्षत, पुष्प
  • नवरात्रों में उगाई गयी जोँ
  • केले, मूली, ग्वार फली, गुड़
  • खीर, पूड़ी और आपकी पुस्तकें

दशहरा पूजन विधि/Dussehra Puja Vidhi

प्रात:काल स्नान करके गेहूं या चूने से दशहरे की मूर्तियाँ बना लें। इसके बाद गाय के गोबर के नौ गोले बनाएं। अब गाय के गोबर से दो कटोरी बना लें और एक कटोरी में कुछ सिक्के रख दें; दूसरी कटोरी  में रोली, चावल, फल और जौ रखें। इसके पश्चात :

पूजा का प्रारभ जल से करें/Start the Puja with water

रोली, चावल, फूल और जौ चढ़ाएं।

मूर्ति पर केला, मूली, ग्वारफली, गुड़ और चावल अर्पित करें ।

इसके बाद:

मूर्ति को धूप और दीप अर्पण करें और किताबों पर पुष्प, जौ, रोली और चावल भी चढ़ाएं।

यह करने के बाद गाय के गोबर के कटोरे में से सिक्के निकाल कर किसी सुरक्षित स्थान पर रख दें।

ब्राह्मणों और गरीबों को भोजन कराएं, दक्षिणा दें और रावण, दहन के बाद सोन पत्र बांटें और घर के बड़ों और रिश्तेदारों को प्रणाम करें और एक-दूसरे से भेंट करें ।

श्री राम रक्षा स्तोत्र पाठ/Sri Rama Raksha StotraPaath

अगर आप किसी राक्षसी प्रभाव से पीड़ित हैं या कोई अधर्मी आपको सता रहा है तो इस दिन श्री राम रक्षा स्तोत्र का पाठ करें। यदि आपके मन में कोई भय है तो इस दिन बगलामुखी अनुष्ठान करें। आपको लाभ होगा। राम मर्यादा की सीमा हैं, इसलिए उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है । वह शक्ति में विष्णु और क्षमा में पृथ्वी है। वास्तव में, वह साक्षात धर्म की प्रतिमूर्ति है। आज का दिन राम की पूजा के साथ ही उनके चरित्र से कुछ सीखने के लिए शुभ है।

शस्त्र पूजा का महत्व/Importance of Shastra Puja

विजय दशमी पर शत्रु पर विजय पाने के लिए शस्त्र पूजन भी किया जाता है। इस दिन वेदों, गीता और रामायण की पूजा करें क्योंकि यह वह शस्त्र हैं जो आपके आंतरिक और बाहरी शत्रुओं दोनों को परास्त करेंगे। नवरात्र के तुरंत बाद विजयदशमी आती है। इसका दार्शनिक अर्थ है कि नारी पूजा। मातृ शक्ति की पूजा के बिना हम शत्रु पर विजय प्राप्त नहीं कर सकते। विजयदशमी के इस महापर्व पर श्री राम की पूजा करें। श्री रामचरित मानस का अखंड पाठ करें। सीता राम का कीर्तन करें।

इस दिन कई  अन्य पूजाएँ भी की जाती है, जिनका उल्लेख नीचे किया गया है।

सूर्यास्त के बाद जब आकाश में कुछ तारे चमकने लगते हैं, यह समय विजय मुहूर्त कहलाता है। इस समय कोइ भी कार्य अथवा पूजन करने से अनुकूल परिणाम प्राप्त होते हैं। ऐसा कहा जाता है की श्री राम ने रावण को परास्त करने के लिए युद्धनाद इसी मुहूर्त में किया था।

दशहरे को वर्ष के सबसे पवित्र दिनों में से एक माना जाता है।यह समय कोई भी काम प्रारम्भ करने के लिए उपयुक्त है। हालाँकि, कुछ निश्चित मुहूर्त किसी विशेष पूजा के लिए भी उपयुक्त हो सकते हैं।

इस दिन क्षत्रिय, योद्धा और सैनिक शस्त्रों का पूजन करते हैं; इस पूजा को आयुध / शास्त्र पूजा भी कहा जाता है। वह इस दिन शमी-पूजन भी करते हैं। प्राचीन काल में राज परिवार और क्षत्रियों के लिए इस पूजा का विशेष महत्त्व था।

ब्राह्मण इस दिन देवी सरस्वती की पूजा करते हैं

वैश्य अपने बहि-खाते की पूजा करते हैं।

कई  स्थानों पर होने वाली नवरात्रि रामलीला का भी इस दिन समापन होता है।

रावण, कुंभकर्ण और मेघनाथ के पुतले जलाकर भगवान राम की विजय का जश्न मनाया जाता है।

इस दिन मां भगवती जगदम्बा की अपराजिता का जाप करना पवित्र माना जाता है।

पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा बहुत धूम-धाम से मनाई जाती है ।

दशहरे को विजयदशमी या आयुध पूजा के नाम से भी जाना जाता है। यह एक अत्यंत ही शुभ तिथि है। सर्वकार्य सर्वसिद्धि विजय मुहूर्त है। इसलिए कोई भी धार्मिक या नया कार्य इस दिन प्रारम्भ करने से अपार लाभ होता है। वहीं दशहरे पर शस्त्र पूजन भी होता है। साथ ही ऐसे कार्य घर सुख-शांति के साथ-साथ भारी आर्थिक मुनाफे का मार्ग प्रशस्त करते हैं। आइए जानते हैं कौन से हैं वह कार्य :

दशहरे पर शमी की लकड़ी की मीठे दही द्वारा अपराजिता मंत्रों से पूजा करने से सफलता और उन्नति प्राप्त होती है। घर के सदस्यों पर देवी-देवताओं की कृपा बनी रहती है।

दशहरे पर रावण दहन  के उपरान्त आप गुप्त दान भी कर सकते हैं। इस दिन आप किसी ऐसे मंदिर में नई झाड़ू रख सकते हैं जहां आपको कोई देख ना सके। आपके द्वारा किया गया यह दान आपकी धन संबंधी सभी समस्याओं को दूर करेगा।

दशहरे के दिन शमी वृक्ष की पूजा करने की मान्यता है। इस दिन शाम के समय शमी वृक्ष की पूजा करना और उसके नीचे देसी घी का दीप प्रज्ज्वलित करना आपके लिए शुभ रहेगा। माना जाता है कि इससे आपको कानूनी मामलों में सफलता प्राप्त होती है।

धार्मिक मान्यताएं ऐसा कहती हैं कि दशहरे के दिन फिटकरी का टुकड़ा लेकर परिवार के सभी सदस्यों को उसका स्पर्श कराएं। फिर इसे घर की छत पर ले जाकर जहां फेंकना चाहते हैं, उसके विपरीत दिशा में खड़े हो जाएं। फिर इसे अपने इष्टदेव का ध्यान करते हुए फेंक दें। ऐसा करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और समृद्धि आती है। ।

दशहरे के दिन पूजा करने के उपरान्त नौकरी और व्यापार में सफलता पाने के लिए गरीबों में दस फल वितरित करें और ओम विजयाय नमः मंत्र का जाप करें। ऐसा करने से आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी।

ज्योतिषियों के अनुसार रावण दहन के बाद बची हुई लकड़ी को घर में लाकर सुरक्षित स्थान पर रखना चाहिए। इससे घर में नकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश नहीं होता है। साथ ही घर में कोई भी तंत्र-मंत्र नहीं करता। दशहरे के दिन भगवान राम की रावण पर विजय हुई थी। इस दिन नवरात्रि का भी अंत होता है और देवी की प्रतिमा का विसर्जन होता है। इस दिन शस्त्रों की पूजा की जाती है और विजय उत्सव मनाया जाता है। यदि इस दिन कुछ विशेष अनुष्ठान किए जाएं तो भरपूर धन की प्राप्ति हो सकती है।

दशहरे पर किसकी पूजा करनी चाहिए और क्या लाभ होगा?/ Who should be worshipped on Dussehra, and what will be the benefit?

  • इस दिन महिषासुरमर्दिनी मां दुर्गा और भगवान राम की पूजन होना चाहिए।
  • इससे सभी विघ्नों का नाश होगा और जीवन के सभी कार्यों में में विजय प्राप्त होगी।
  • आज अस्त्र-शस्त्रों की पूजा करने से आपकी रक्षा होगी और यह आपको कोइ भी आपको हानि नहीं पहुंचाएंगे।
  • आज देवी की पूजा करके आप कोई नया कार्य प्रारम्भ कर सकते हैं।
  • जब नवग्रह को नियंत्रित रखने की बात आती है तो इसके लिए दशहरा पूजन अद्वितीय होता है।

विजय के लिए कौन से मंत्र का जाप करना चाहिए?/ Which Mantra should be chanted for victory?

"श्रीरामराम, जयरामराम, द्विजयम राममिर्यत।

 त्रयोदशाक्षरो मंत्रः सर्वसिद्धिकारःस्थितः।

नवरात्रि की समाप्ति पर दशहरा मनाएं/Celebrate Dussehra on the culmination of Navaratri

सर्वप्रथम देवी की पूजा करें और तद्पश्चात श्री राम की पूजा करें।

 देवी और श्री राम के मंत्रों का जाप करें।

अगर आपने कलश स्थापना की है तो नारियल को निकाल कर, उसका  प्रसाद के रूप में सेवन करें।

कलश का जल पूरे घर में छिड़कें ताकि नकारात्मकता का नाश हो सके ।

आप अन्य सभी प्रमुख भारतीय पर्वों के लिए भारतीय त्योहारों में ज्योतिष की प्रासंगिकता पर इसी प्रकार  के लेख पढ़ सकते हैं।

करवा चौथ
20 Oct, 2024

करवा चौथ/Karva chauth दो शब्दों से मिलकर बना है, 'करवा' जिसका अर्थ है मिट्टी का बरतन और 'चौथ' का अर्थ है महीने का चौथा दिन। इस दिन मिट्टी का बरतन या करवे को अत्यधिक महत्व दिया जाता है। करवा चौथ का पावन त्यौहार 13 अक्टूबर, गुरुवार के दिन है. इस दिन महिलाएं अखंड सौभाग्य के लिए व्रत रखती हैं। इस साल करवा चौथ के शुभावसर पर एक साथ कई दुर्लभ संयोग बन रहे हैं। इस दिन शुक्र और बुध के एक ही राशि कन्‍या में रहने से लक्ष्मी नारायण योग बना रहा है। वहीं बुध और सूर्य भी एक ही राशि में रहकर बुधादित्‍य योग बना रहे हैं। जबकि शनि स्‍वराशि मकर और गुरु स्‍वराशि मीन में रहेंगे। साथ ही चंद्रमा अपनी उच्‍च राशि वृषभ में रहेंगे। कुल मिलाकर ये सभी ग्रह स्थितियां मिलकर अनेक  शुभ योगों का निर्माण कर रही है. लिहाजा ऐसी शुभ ग्रह स्थिति में की गई पूजा-पाठ पति-पत्‍नी के सुख-समृधि और सौभाग्य में वृद्धि करेगी।

उपवास का दिन/ FASTING ON THIS DAY

यह त्योहार कृष्ण पक्ष के चौथे दिन या 'चतुर्थी'/ Krishna Paksha को मनाया जाता है। महिलाएं इस दिन को अपने पति के लिए व्रत रखकर मनाती हैं। भारतीय महिलाएं इसे बहुत खुशी के साथ मनाती हैं। आजकल इसे विश्व स्तर पर मनाने का चलन हो गया है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, यह दिन 'पूर्णिमा' के चार दिन बाद मनाया जाता है। यह ज्यादातर अक्टूबर या नवंबर में होता है।

 

उपवास या व्रत करने की परंपरा का सभी विवाहित महिलाओं द्वारा पालन किया जाता है जिसमें महिलाओं द्वारा भगवान गणेश से, अपने जीवनसाथी की स्वस्थ और लंबी उम्र के लिए प्रार्थना की जाती है। हालांकि,  ज्यादातर इसे विवाहित महिलाओं द्वारा मनाया जाता है, लेकिन भारत के कुछ क्षेत्रों में ऐसा माना जाता है कि अविवाहिताओं को अपने भावी पति के लिए उपवास रखना चाहिए।

आसमान में चंद्र दर्शन किए बिना, कुछ भी न खाने-पीने के कठोर नियम का पालन करते हुए, विवाहित महिलाओं द्वारा करवा चौथ/ Karwa chauth का व्रत रखा जाता है। चंद्रोदय के बाद, भगवान शिव की उनके संपूर्ण परिवार सहित पूजा करके महिलाएं भोजन ग्रहण कर सकती हैं।

 

महिलाओं द्वारा मिट्टी के बर्तन/ करवा में जल भरकर चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। ब्राह्मण और अन्य विवाहित महिलाओं द्वारा जरूरतमंदों को दान देने की परंपरा है। यह पर्व ज्यादातर उत्तर भारतीयों द्वारा मनाया जाता है। करवा चौथ/Karwa chauth 2021 के ठीक चार दिन बाद, अहोई अष्टमी के दिन माताओं द्वारा अपने पुत्रों के लिए उपवास किया जाता है।

करवा चौथ संबंधित रीति-रिवाज / RITUALS OF KARVA CHAUTH

महिलाओं का पर्व होने के कारण, उन सभी के द्वारा उत्साहपूर्वक इस दिन की पहले से ही तैयारियां शुरू कर दी जाती हैं। कुछ महिलाओं द्वारा साड़ी-लहंगे, मेकअप, झुमके, हार, विभिन्न आभूषण और पूजा का सामान  नया खरीदा जाता है और कुछ महिलाओं द्वारा अपनी शादी की चीजों का प्रयोग किया जाता है। महिलाएं अपने हाथों को हिना के विभिन्न डिजाइनों से सजाती हैं, जिसे 'मेहंदी' भी कहा जाता है।

पूरा दिन उपवास होने के कारण, पंजाब जैसे क्षेत्रों में, महिलाएं प्रातः काल 4:00 बजे से पहले जागकर   खाती-पीती हैं। उत्तर प्रदेश में, पूर्व संध्या को महिलाओं द्वारा दूध से बनी फरनी को रस्म के तौर खाया जाता है।

 

पंजाब में, महिलाओं को अपनी सास से सजावटी सामान, मिठाई, साड़ी और अन्य महिला संबंधित सामान सरघी/ sarghi के तौर पर दिए जाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि जब कोई महिला अपना पहला करवा चौथ/Karwa chauth रखती है, तो उसकी सास द्वारा उसे सरघी दी जाती है। सरघी नवविवाहिताओं द्वारा, संपूर्ण जीवन अपनी सास के रीति-रिवाजों और परंपराओं का सम्मानपूर्वक पालन करने का प्रतीक होती है।

सूर्योदय से व्रत की शुरुआत होती है तथा महिलाओं द्वारा सामान्य रूप से कार्य करके या मित्रों के साथ अपना दिन व्यतीत किया जाता है। साथ ही, महिलाओं को पतियों और माता-पिता द्वारा भी उपहार दिए जाते हैं।  

शाम को, महिलाओं द्वारा सुंदर पोशाकें पहनकर, अन्य महिलाओं के साथ इस त्यौहार का आनंद लिया जाता है और समर्पित भाव से "पूजा-थाली" को सजा कर करवा चौथ की कथा सुनी जाती है। 

 

उत्तर प्रदेश और बिहार जैसी जगहों पर, महिलाएं अपनी थालियां सजा कर अन्य महिलाओं के समूहों में बैठती हैं, जहां वरिष्ठ महिलाओं या पुजारी द्वारा करवा चौथ कथा का पाठ किया जाता है। ऐसे समूहों में महिलाओं द्वारा अपनी थालियों को एक-दूसरे के साथ, सात बार बदल कर कथा पाठ किया जाता है।

समूहों में पहली छ: फेरियों में गाया जाता है- "वीरों कुण्डियॉ करवा, सर्व सुहागन करवा, कात्ती नाया तेरी ना, कुम्भ