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	<title>गणेश जी को स्थापित करने के बाद क्यों करते हैं विसर्जन</title>
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	<description><![CDATA[हिंदू पंचांग में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी अत्यंत ही महत्वपूर्ण और शुभ तिथियों में से एक है। क्योंकि इसी दिन को गणेश चतुर्थी के रूप में भी मनाया जाता है। गणेश उत्सव 10 दिनों तक चलता रहता है, जिसकी तैयारियां काफी दिन पहले से ही आरंभ हो जाती है। लगभग दस दिनों तक चलने वाले इस पर्व का समापन अनंत चतुर्दशी के दिन होता है। भादो माह की गणेश चतुर्थी संपूर्ण भारत वर्ष में श्रद्धा एवं भक्ति के साथ मनाई जाती है। सामान्यतः प्रत्येक माह में आने वाली शुक्ल पक्ष एवं कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश चतुर्थी/Ganesh Chaturthi के रूप में मनाया जाता है, लेकिन भाद्रपद माह में भगवान श्री गणेश के जन्म को चतुर्थी तिथि से संबंधित माना गया है। साथ ही इसे महाभारत ग्रंथ की उत्पति के साथ भी जोड़ा गया, जिसे श्री वेद व्यास जी भगवान श्री गणेश जी की सहायता से ही पूर्ण कर पाए थे। इसलिए इस समय पर आने वाली चतुर्थी का विशेष महत्व देखने को मिलता है। गणपति स्थापना की लोकप्रिय कथा भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी पर भगवान गणेश जी को घरों, मंदिरों एवं धार्मिक स्थलों पर स्थापित किए जाने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है। इस के पीछे कुछ कथाएं अत्यंत लोकप्रिय भी रही हैं, जिसमें से एक कथा महाभारत ग्रंथ रचना से जुड़ी है। कथा के अनुसार, जब महर्षि वेदव्यास महाभारत की रचना का विचार करते हैं, तो वह गणेश जी का आह्वान करते हैं और उनके इस ग्रंथ के पूर्ण करने हेतु सहायता मांगते हैं। गणेश जी ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और उनका साथ देने के लिए तैयार हो गए। यह एक लम्बी प्रक्रिया थी जिसमें काफी समय भी लगा था। इसी कारणवश वेद व्यास जी गणेश की थकान को दूर करने के लिए उन पर मिट्टी का लेप लगा कर और उनके देह को शीतल बनाए रखने की कोशिश की थी। ग्रंथ के पूर्ण होने में दस दिनों का समय लगा था। वह दसवें दिन चतुर्थी के दिन से आरंभ हुआ था और यह कार्य चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है। यह भी पढ़ें: क्या है दशहरा का महत्व और क्यों मनाया जाता है यह पर्व? गणपति को क्यों स्थापित करने के कुछ दिन बाद किया जाता है विसर्जित महाभारत ग्रंथ के संपूर्ण होने तक कि इस अवधि में वेदव्यास जी द्वारा इस समय के दौरान श्री गणेश जी के शरीर को मिट्टी के लेप द्वारा शीतल करने का प्रयास बना रहता है और अंतिम दिन उनके शरीर को जल से साफ करते हैं एवं शीतलता प्रदान करते हैं। इन दस दिनों में वेदव्यास जी ने गणेश भगवान की विभिन्न प्रकार से सेवा आराधना भी की और इसी कारण से चतुर्थी के दिन भगवान श्री गणपति जी को स्थापित करने की परंपरा चली आ रही है और अनंत चतुर्दशी/Anant Chaturdashi के दिन गणेश जी को जल में विसर्जित कर दिया जाता है। पौराणिक कथाओं एवं मान्यताओं के आधार पर इस परंपरा को इस आधुनिक दुनिया में मौजूद है और इस पर्व को अब नए रूप में मनाया जाता है। गणपति विसर्जन को कई प्रतीकात्मक स्वरूप से जोड़ कर देखा जाता है। दर्शन शास्त्र इसे जीव और जगत के मध्य होने वाले चक्र के रूप में स्थापित करता है। इसी के साथ प्रकृति और सृष्टि के मध्य भेद की समाप्ति का स्वरूप भी इसी में झलकता है। इस सृष्टि में उत्पन्न सभी पदार्थों का मिलन प्रकृति के साथ होता है, एवं एक निश्चित समय अवधि पश्चात सभी कुछ उसी में विलीन हो जाता है जहां से वह उत्पन्न हुआ है। ऐसे अनेकों विचार गणपति विसर्जन द्वारा स्वत: अनुभूति में झलक पड़ते हैं और इन सभी का अर्थ शांति एवं स्थिरता को दर्शाने वाला होता है। गणेश चतुर्थी महत्व भारत वर्ष में यह इस पर्व का उत्साह देखते ही बनता है। सभी आयु वर्ग के लोग इस उत्सव में उत्साह से शामिल होते हैं और प्रत्येक वर्ग के लोग अपने सामर्थ्य अनुसार भगवान गणपति जी के समक्ष अपनी भक्ति को प्रकट करते हुए विघ्न विनाशक गणपति जी को घर पर, मंदिरों में एवं अन्य भव्य स्थानों पर स्थापित करते हैं। इस दिन गणेश जी की छोटी बड़ी हर स्वरुप की प्रतिमाओं को स्थापित किया जा सकता है। भक्ति स्वरूप हर कोई भगवान को अपने पास रखने की इच्छा रखता है और यह अवधि एक दिन से लेकर 10 दिनों तक रहती है। माना जाता है कि जो भी गणपति बप्पा की पूजा इन दस दिनों तक करते हैं, उनके सभी कष्ट गणपति जी दूर कर देते हैं एवं भक्त को सुखी जीवन का आशीर्वाद देते हैं। यह भी पढ़ें: दिवाली क्यों मनाई जाती है और क्या है इसका महत्व?]]></description>
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        <pubDate>Sun, 17 Sep 2023 00:00:00 GMT</pubDate>
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