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	<title>क्यों नहीं चढ़ाई जाती है गणेश जी को तुलसी</title>
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	<description><![CDATA[तुलसी को एक अत्यंत ही पवित्र एवं शुद्ध माना गया है, पूजा में तुलसी को श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है और कृष्ण पूजा/Krishna Pooja तो तुलसी के बिना संपूर्ण ही नहीं होती। ऐसे में गणेश पूजा में तुलसी को निषेध क्यों माना गया है? आखिर क्यों गणेश भगवान के साथ तुलसी जी को स्थान प्राप्त नहीं होता है? क्यों दोनों एक दूसरे के लिए अनुकूल नहीं माना जाते हैं? इस प्रकार के अनेक प्रश्न हमारे मन में मौजूद होते हैं। जिनके रहस्य को समझने के लिए पौराणिक ग्रंथों में मौजूद कथाओं को समझने की अत्यंत आवश्यकता होती है। आईये जानते हैं क्या कहते हैं ग्रंथ गणेश/Ganesh Ji जी और तुलसी जी के मध्य संबंधों के बारे में और जानते हैं इन कथाओं को विस्तार से। इस कारण से नहीं होता गणेश पूजन में तुलसी का उपयोग पुराण एवं उपनिषदों में मौजूद कई कथाएं हैं जो इस सत्य की गंभीरता एवं गहराई को दर्शाती हैं। एक कथा ब्रह्मावैवर्त पुराण/Brahma Vaivarta Purana में आती हैं। इस कथा के कुछ अंश इस प्रकार हैं &ndash; एक समय श्री गणेश जी पवित्र नदी किनारे तपस्या में लीन थे, उसी समय के दौरान देवी तुलसी भी कई स्थलों की तीर्थ यात्रा एवं पूजा पाठ हेतु भ्रमण के लिए निकली थी। अनेकों धर्म-नगरियों की यात्रा करने पश्चात वह गंगा स्थल पर आती हैं। उस स्थान पर देवी तुलसी का ध्यान अत्यंत ही तेजस्वी महापुरुष पर जाता है। वह व्यक्ति और कोई नहीं बल्कि ओज से युक्त एवं भक्ति ध्यान में लीन गणेश जी थे। तपस्या में लीन गणेश जी का स्वरुप इतना मनमोहक एवं आकर्षक युक्त होता है की उनकी आभा से तुलसी जी अत्यंत ही मोहित हो जाती हैं। यह भी पढ़ें: गणेश जी को दूर्वा और मोदक क्यों अर्पित किया जाता है तुलसी जी, अपने मोहवश गणेश जी की साधना में अवरोध उत्पन्न कर देती हैं। तुलसी उनके समक्ष जाकर विवाह हेतु निवेदन करती हैं। तुलसी के इस कृत्य के कारण गणेश जी की साधना बीच में टूट जाने से वह अत्यंत ही दुखी एवं क्रोधित हो उठते हैं। अपनी भक्ति में तुलसी के द्वारा उत्पन्न की गई बाधा से वह नाराज हो जाते हैं, और तुलसी जी के प्रस्ताव को अस्वीकार कर देते हैं एवं स्वयं को ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला बताते हैं। ऐसे में तुलसी जी को इस बात से अत्यंत दुख पहुंचता है। इस अस्विकार होने के दंश को वह सहन नहीं कर पाती हैं। आवेश के वशीभूत होकर गणेश जी को दो विवाह होने का श्राप दे देती हैं। तुलसी के इन वचनों को सुनकर गणेश जी अपने ब्रह्मचर्य के खंडित होने की स्थिति को जान जाते हैं। तथा वह भी उन्हें क्रोधवश एक असुर की जीवन संगिनी होने का श्राप दे देते हैं। तुलसी जी अपने क्रोध में बोले हुए वचनों एवं असुर(राक्षस) से विवाह की बात से अत्यंत दुखी हो जाती हैं, व गणेश जी से क्षमा मांगती हैं। तुलसी की विनय प्रार्थना सुनकर गणेश जी, अपने श्राप के प्रभाव को कम करने का आश्वासन देते हुए उन्हें कहते हैं कि तुम्हारा विवाह एक महान राक्षस शंखचूर्ण के साथ संपन्न होगा, जिसकी ख्याति तीनों लोकों में रहेगी। किंतु तुम परिस्थितियों के कारण तुलसी नामक वृक्ष का रूप धारण करोगी एवं सदा पूजनीय होगी। कलयुग में तुम पापों का शमन करने वाली होगी, लेकिन मेरी पूजा में तुम्हारा सदा निषेध ही होगा। मैं तुम्हें कभी स्वीकार नहीं कर पाउंगा। अत: इस कथन के अनुसार तभी से तुलसी के पत्तों को गणेश जी की पूजा में उपयोग नहीं किया जाता है। यह भी पढ़ें: गणेश जी को स्थापित करने के बाद क्यों करते हैं विसर्जन]]></description>
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        <title><![CDATA[क्यों नहीं चढ़ाई जाती है गणेश जी को तुलसी]]></title>
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        <description><![CDATA[तुलसी को एक अत्यंत ही पवित्र एवं शुद्ध माना गया है, पूजा में तुलसी को श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है और कृष्ण पूजा/Krishna Pooja तो तुलसी के बिना संपूर्ण ही नहीं होती। ऐसे में गणेश पूजा में तुलसी को निषेध क्यों माना गया है? आखिर क्यों गणेश भगवान के साथ तुलसी जी को स्थान प्राप्त नहीं होता है? क्यों दोनों एक दूसरे के लिए अनुकूल नहीं माना जाते हैं? इस प्रकार के अनेक प्रश्न हमारे मन में मौजूद होते हैं। जिनके रहस्य को समझने के लिए पौराणिक ग्रंथों में मौजूद कथाओं को समझने की अत्यंत आवश्यकता होती है। आईये जानते हैं क्या कहते हैं ग्रंथ गणेश/Ganesh Ji जी और तुलसी जी के मध्य संबंधों के बारे में और जानते हैं इन कथाओं को विस्तार से। इस कारण से नहीं होता गणेश पूजन में तुलसी का उपयोग पुराण एवं उपनिषदों में मौजूद कई कथाएं हैं जो इस सत्य की गंभीरता एवं गहराई को दर्शाती हैं। एक कथा ब्रह्मावैवर्त पुराण/Brahma Vaivarta Purana में आती हैं। इस कथा के कुछ अंश इस प्रकार हैं &ndash; एक समय श्री गणेश जी पवित्र नदी किनारे तपस्या में लीन थे, उसी समय के दौरान देवी तुलसी भी कई स्थलों की तीर्थ यात्रा एवं पूजा पाठ हेतु भ्रमण के लिए निकली थी। अनेकों धर्म-नगरियों की यात्रा करने पश्चात वह गंगा स्थल पर आती हैं। उस स्थान पर देवी तुलसी का ध्यान अत्यंत ही तेजस्वी महापुरुष पर जाता है। वह व्यक्ति और कोई नहीं बल्कि ओज से युक्त एवं भक्ति ध्यान में लीन गणेश जी थे। तपस्या में लीन गणेश जी का स्वरुप इतना मनमोहक एवं आकर्षक युक्त होता है की उनकी आभा से तुलसी जी अत्यंत ही मोहित हो जाती हैं। यह भी पढ़ें: गणेश जी को दूर्वा और मोदक क्यों अर्पित किया जाता है तुलसी जी, अपने मोहवश गणेश जी की साधना में अवरोध उत्पन्न कर देती हैं। तुलसी उनके समक्ष जाकर विवाह हेतु निवेदन करती हैं। तुलसी के इस कृत्य के कारण गणेश जी की साधना बीच में टूट जाने से वह अत्यंत ही दुखी एवं क्रोधित हो उठते हैं। अपनी भक्ति में तुलसी के द्वारा उत्पन्न की गई बाधा से वह नाराज हो जाते हैं, और तुलसी जी के प्रस्ताव को अस्वीकार कर देते हैं एवं स्वयं को ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला बताते हैं। ऐसे में तुलसी जी को इस बात से अत्यंत दुख पहुंचता है। इस अस्विकार होने के दंश को वह सहन नहीं कर पाती हैं। आवेश के वशीभूत होकर गणेश जी को दो विवाह होने का श्राप दे देती हैं। तुलसी के इन वचनों को सुनकर गणेश जी अपने ब्रह्मचर्य के खंडित होने की स्थिति को जान जाते हैं। तथा वह भी उन्हें क्रोधवश एक असुर की जीवन संगिनी होने का श्राप दे देते हैं। तुलसी जी अपने क्रोध में बोले हुए वचनों एवं असुर(राक्षस) से विवाह की बात से अत्यंत दुखी हो जाती हैं, व गणेश जी से क्षमा मांगती हैं। तुलसी की विनय प्रार्थना सुनकर गणेश जी, अपने श्राप के प्रभाव को कम करने का आश्वासन देते हुए उन्हें कहते हैं कि तुम्हारा विवाह एक महान राक्षस शंखचूर्ण के साथ संपन्न होगा, जिसकी ख्याति तीनों लोकों में रहेगी। किंतु तुम परिस्थितियों के कारण तुलसी नामक वृक्ष का रूप धारण करोगी एवं सदा पूजनीय होगी। कलयुग में तुम पापों का शमन करने वाली होगी, लेकिन मेरी पूजा में तुम्हारा सदा निषेध ही होगा। मैं तुम्हें कभी स्वीकार नहीं कर पाउंगा। अत: इस कथन के अनुसार तभी से तुलसी के पत्तों को गणेश जी की पूजा में उपयोग नहीं किया जाता है। यह भी पढ़ें: गणेश जी को स्थापित करने के बाद क्यों करते हैं विसर्जन]]></description>
        <pubDate>Tue, 19 Sep 2023 00:00:00 GMT</pubDate>
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