करवा चौथ- अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद

  • 2023-03-16
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करवा चौथ कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन मनाया जाता है। यह पर्व जीवन साथी के सुख तथा उसकी लम्बी आयु हेतु किया जाता है। भारत के अनेक क्षेत्रों में  इस व्रत को अलग अलग रूपों से मनाया जाता है। आज के समय में इस व्रत की मान्यता इतनी अधिक है कि यह  पूर्ण रूप से हर संप्रदाय की स्त्रियों के आकर्षण का केंद्र बन गया है। करवा चौथ का व्रत चाहे कितनी भी आधुनिकता से जुड़ता जाए लेकिन उसकी एक भावना जो सभी स्थानों पर एक ही होती है जो विवाह एवं दाम्पत्य सुख को दर्शाती है। सौभाग्यवती स्त्रियों के लिए यह व्रत अत्यंत ही महत्वपूर्ण होता है। इस दिन का इंतजार प्रत्येक सुहागन स्त्री को रहता है। इस दिन अपने वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाने हेतु स्त्रियां कठोर व्रत का पालन करते हैं। विवाहित स्त्रियों के साथ साथ कुंवारी कन्याएं भी इस व्रत को करती है और अपने लिए एक योग्य जीवन साथी की कामना करती है। (Click here and get Online Report for Future Life Partner)

करवा चौथ पूजन  

करवा चौथ का व्रत/Karwa Chauth एक अत्यंत ही शुभ दिन होता है इस दिन स्त्रियां प्रात: काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर व्रत का आरंभ करती हैं। नित्य कर्मों से निवृत होकर, देवी भगवती का पूजन एवं भगवान शिव का पूजन किया जाता है। इस दिन पूजा सामग्री में करवे का मुख्य रूप से उपयोग किया जाता है। एक करवे में पानी भरकर, करवा चौथ का चित्र बनाया जाता है अथवा चित्र लाकर पूजा स्थल पर रखा जाता है और समस्त सौभाग्य की वस्तुओं को वहां रखा जाता है। इसी के साथ प्रसाद रूप में मिष्ठान-फल इत्यादि भी रखे जाते हैं । सौभाग्यवती स्त्रियां पूरे दिन निर्जला व्रत रखते हुए संध्या काल समय में पूजा व कथा की जाती है इसके पश्चात चंद्र दर्शन एवं पूजन किया जाता है इसके पश्चात पूजन पूर्ण होता है 

करवा चौथ बन रहा है विशेष योग 

करवा चौथ का दिन अत्यंत ही शुभ दिन के रूप में प्रत्येक वर्ष उत्साह एवं उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस पर्व की रौनक कई दिन पहले से ही आरंभ हो जाती है। इस दिन का इंतजार प्रत्येक विवाहित स्त्री को होता है। इस वर्ष करवा चौथ के दिन एक विशेष शुभ योग बनेगा। चंद्रमा का रोहिणी नक्षत्र/Rohini Nakshatra में गोचर होगा। चंद्रमा के रोहिणी नक्षत्र में होने को ज्योतिष शास्त्र में अत्यंत ही महत्वपूर्ण एवं शुभ समय माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चंद्रमा को अपनी सभी पत्नियों में रोहिणी अत्यंत प्रिय थी। रोहिणी और चंद्रमा के मध्य प्रेम इतना गहरा और अटूट है, जिसका प्रभाव चंद्रमा के रोहिणी नक्षत्र में आने पर स्वत: ही देखने को मिलता है। इस समय पर चंद्रमा की शुभता का विस्तार होता है। ऐसे में करवा चौथ के दिन यह शुभ संयोग वैवाहिक जीवन को शुभता एवं सौभाग्य प्रदान करने वाला होगा। 

करवा चौथ पर क्या है सरगी का महत्व 

करवा चौथ के व्रत में सरगी एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण होती है। सरगी विवाह सौभाग्य का सूचक होती है, व्रत से एक दिन पूर्व विवाहित स्त्री को उसकी सास अथवा परिवार के किसी वरिष्ठ सदस्य द्वारा सरगी दी जाती है। सरगी में कई प्रकार की वस्तुओं को रखा जाता है कुछ क्षेत्रों में इसमें सौभाग्य की सभी वस्तुएं होती हैं तो कुछ स्थानों पर इसमें मिष्ठान, खाद्य पदार्थों मेवे फल इत्यादि भी होते है। सास  की ओर से बहू को दी गई सरगी बहुत सारा आशीर्वाद तथा ढेर सारी शुभकामनाओं का परिचायक होती हैं। इस सरगी का उपयोग करवा चौथ के दिन सूर्योदय से पूर्व तारों की छांव में किया जाता है। सरगी को तारों की छाया में सेवन किया जाता है तथा इसके पश्चात व्रत का आरंभ होता है। महिलाएं सारा दिन बिन अपानी पिए निर्जला व्रत का पालन करते हुए करवचौथ का व्रत संपूर्ण करती है। चंद्रमा पूजन एवं चंद्र अर्घ्य के पश्चात व्रत का पारण होता है। 

करवा चौथ कथा – सात भाईयों की एक बहन ने कैसे मनाया करवा चौथ 

करवा चौथ से जुड़ी कई कहनैयां प्रचलित हैं पर इनमें से एक कथा प्रमुख तौर  पर सुनी और सुनाई जाती है। इस कथा अनुसार सात भाईयों की एक बहन थी जो सभी भाईयों को बहुत ही प्रिय थी एक बार विवाह पश्चात जब उनकी बहन अपने मायके आती है तो करवा चौथ का व्रत करती है, उसके साथ उसकी भाभियां भी इस व्रत को करती हैं। पहली बार कठोर व्रत रखने के कारण बहन व्याकुल हो उठी, इस पर भाईयों ने जब अपनी बहन की इस दशा को देखा तो उन्होंने नकली चांद की छाया बनाने का विचार किया और एक घने पेड़ के पत्तों के पीछे से चांद निकलने की बात बहन को बताई। बहन ने अपनी भाभियों को चांद देखने के लिए बुलाया पर भाभियों ने मना कर दिया। बहन भूख प्यास से व्याकुल थी इसलिए उसे सुध न रही और उसने उस नकली चांद को अर्घ्य देकर भोजन कर लिया। इस तरह से उसका व्रत खंडित हो गया और उसी समय उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे प्राप्त हुआ । यह समाचार सुनकर वह तुरंत अपने ससुरल के लिए निकल पड़ती है। रोति बिलखती हुई भगवान से प्रार्थना करती है की उसके सुहाग को कुछ न हो। मार्ग में उसकी करुण दशा देख कर माता पार्वती उसे दर्शन देती हैं और उसे उसके व्रत के टूट जाने की बात बताती हैं जिसके परिणम स्वरुप उसके पति की यह  दशा हुई। 

बहन अपने भाईयों की गलती की माफी मांगती है और अपने पति के प्राणों की रक्षा हेतु माता से प्रार्थना करती है। माँ भगवती उसकी दशा देख उसे क्षमादान देती हैं तथा उसे व्रत को पुन: विधि विधान से करने का निर्देश देती हैं। करवा चौथ के व्रत को वह स्त्री पुन: विधि विधान से सम्पूर्ण करती है और व्रत के संपूर्ण होने पर उसे पति का जीवन पुन: प्राप्त हो जाता है। उस समय से ही इस व्रत को पूर्ण भक्ति एवं निष्ठा से करने की परंपरा चली आ रही है। यह एक सौभाग्यवती स्त्री के लिए अत्यंत पवित्र व्रत होता है जो उसके पति को दीर्घायु प्रदान करता है।

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