पति के व्यापार, स्वास्थ्य और आपके सौभाग्य को बढ़ाने वाला त्यौहार

  • 2023-08-05
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ऐसा माना गया है कि आज के ही दिन देवी पार्वती ने अपने अखंड तप के माध्यम से भगवान शंकर को प्रसन्न कर उन्हें अपने पति के रूप में प्राप्त किया था। देवी पार्वती ने 107 जन्म लिए और हर जन्म में भगवान शिव को पाने के लिए आराधना की। तब जाकर 108 वे जन्म में उन्होनें भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त किया था।

हरियाली तीज इसी समर्पण व प्रेम को दर्शाता है। ऐसी मान्यता है की जो भी नारी चाहे सुहागन या कुंवारी इस व्रत को रखती है और देवी पार्वती व शिव जी की पूरी श्रद्धा से पूजा अर्चना करती है उसके जीवन में अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद बना रहता है। यह दिन महिलाओं के सजने संवरने और खुशियां मनाने का दिन है। सावन मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली तृतीया तिथि को हर साल हरियाली तीज/Hariyali Teej के रूप में मनाया जाता है। यह त्यौहार मुख्य रूप से उत्तरी भारत में बहुत ही धूम धाम से मनाया जाता है। हरियाली तीज के बाद एक के बाद एक त्योहारों का आगमन होता है। इस त्योहार के बाद से ही लगभग सभी बड़े– छोटे त्योहार आने शुरू हो जाते हैं। हरियाली तीज को मधुश्रवा तृतीया के नाम से भी जाना जाता है। हरियाली तीज के बाद ही नाग पंचमी/Nag Panchami, जन्माष्टमी/Janmashtami, रक्षाबंधन/Rakshabandhan और नवरात्रे/Navratri आदि बड़े त्योहार आते हैं। इस दिन वह निर्जला व्रत रखने की भी परंपरा है।

ये तो ज्ञात है कि तीज/Teej पर महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और स्वास्थ्य की कामना के साथ यह व्रत रखती हैं। भगवान शिव और माता पार्वती जैसी जोड़ी बनाये रखने के लिए यह व्रत रखा जाता है। आइए जानते हैं इस व्रत के महत्व व इससे जुड़ी खास बातों को

कब हैं हरियाली तीज?

हिन्दू पंचांग/Panchang के अनुसार,वर्ष 2023 में श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि, 18 अगस्त, शुक्रवार को रात्रि 08 बजकर 01 मिनट पर प्रारम्भ हो रही है और अगले दिन 19 अगस्त, शनिवार को रात्रि 10 बजकर 19 मिनट पर समाप्त हो जाएगी। ऐसे में उदयातिथि की धारणा के अनुसार हरियाली तीज 19 अगस्त 2023 को मनाई जाएगी।

हरियाली तीज पर सोलह ऋंगार का महत्व

सभी महिलाएं तीज की पूजा से पहले खूब सजती संवारती हैं, वे सोलह श्रृंगार करती हैं और भगवान शिव से हमेशा सुहागिन रहने का आशीर्वाद मांगती हैं। यह त्यौहार अखंड सौभाग्य प्रदायी है और इस व्रत में महिलाएं मां पार्वती को 16 श्रृंगार की सामग्री भी अर्पित करती हैं। इसमें चूड़ी, मेहँदी, सिंदूर, कंगन, चुनरी, वस्त्र आदि शामिल होते हैं। यह सामग्री अर्पित कर महिलाएं देवी पार्वती से अखंड सौभाग्य का वरदान चाहती हैं।

इस दिन महिलाएं अपने मायके भी जाती हैं और इस दिन झूला–झूलने का भी अत्यंत प्रचलन हैं। कुंवारी लड़कियां भी अच्छे वर की कामना से यह व्रत रखती हैं। इस दिन सभी सुहागनें मेंहदी भी लगाती हैं। मेहँदी सुहाग की निशानी है और वैसे भी सावन में मेंहदी लगाने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है।

तीज पर क्यों खास होता है हरा रंग?

इस त्यौहार पर हरे रंग का बहुत अधिक महत्व है। जैसे कि नाम में ही बताया गया है “हरियाली” यानि चरों और केवल हरा ही हरा रंग। सावन में चारों और हरियाली छायी होती है। फूल, पत्ते, वृक्ष सभी ताज़गी का एहसास देते हैं। इसी कारण इस दिन पेड़ों, नदियों और जल के देवता वरुण देव को भी नमन किया जाता है। मेहँदी भी हरी होती है जो अमर सुहाग को दर्शाती है इसलिए इस त्यौहार/Festivals को हरे रंग से जोड़ कर देखा जाता है।

हरियाली तीज पूजा विधि

• इस दिन महिलाएं प्रातः उठकर स्नान के पश्चात साफ़ वस्त्र पहनें।
• घर के पूजा स्थल या मंदिर जाकर भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान लगाते हुए व्रत करने का संकल्प लें।
• इस दिन रेत या बालू के भगवान शंकर व माता पार्वती बनाकर भी पूजन किया जाता है। रेत में गंगाजल मिलाकर शिवलिंग, पार्वती व गणेश जी की प्रतिमा बनाई जाती है।
• माता को 16 श्रृंगार का सामान अर्पित करें और भगवान शिव, पार्वती व गणेश जी की पूजा करें।
• हरियाली तीज की कथा सुनें।
• माता पार्वती जाप्य मन्त्र – “ऊं उमायै नम:
• भगवान शिव जाप्य मंत्र – “ऊं महेश्वराय नम:

इस कथा के बिना अधूरी है हरियाली तीज

हरियाली तीज भगवान शिव और माता पार्वती का पुनर्मिलन का दिन है। धार्मिक कथाओं के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए अत्यंत कठोर तप किया था। माता गौरी ने गिरिराज हिमालय के घर पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया था। पार्वती, शुरू से ही भगवान शिव को पाना चाहती थी और इसीलिए तप में लीन थी। एक दिन नारद मुनि ने पिता हिमालय से भगवान विष्णु को पार्वती के वर के रूप में सहमति प्राप्त कर ली। जिस पर पार्वती बहुत निराश हो गयी और एकांत वास में चली गईं। घने जंगल में उन्होनें एक बार फिर से तप करना शुरू कर दिया। उन्होंने रेत से शिवलिंग बनाया और उपवास करते हुए पूजन करने लगीं। भगवान शिव इस तप से बहुत प्रसन्न हुए और उनकी मनोकामना पूर्ण की। शिव ने इस कथा में कहा कि जो भी स्त्री इस व्रत/Vrat को निष्ठा से करेगी उसे मैं मनवांछित फल दूंगा।

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