Hanuman Puja Vidhi | घर पर ऐसे करें हनुमान जी का पूजा । Hanuman Aarti

  • 2024-01-20
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मंगलवार के दिन ब्रह्म मुहुर्त में उठकर हनुमान जी को प्रणाम कर दिन की शुरुआत करें। नित्य कर्मों से निवृत होकर स्नान करें। इसके पश्चात, लाल रंग का वस्त्र धारण करें। इसके बाद लाल-पीला कपड़ा बिछाकर हनुमान जी की मूर्ति को रखें साथ ही आप कुश के आसन पर बैठे। अब हनुमान जी की मूर्ति पर फूल-माला चढ़ाएं और धूप, दीप जलाकर पूजा आरंभ करें। फिर हनुमान जी को अनामिका अंगुली से तिलक या सिंदूर लगाएं और प्रसाद अर्पित करें। इसके बाद हनुमान चालिसा, हनुमान बाण का पाठ करें और अंत में हनुमान जी की आरती उतारें।

 

हनुमान चालीसा/Hanuman Chalisa

||दोहा|| 

श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि।

बरनऊं रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि॥

बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवन कुमार।

बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेस बिकार॥

||चौपाई|| 

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।

जय कपीस तिहुं लोक उजागर॥

रामदूत अतुलित बल धामा।

अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥

महाबीर बिक्रम बजरंगी।

कुमति निवार सुमति के संगी॥

कंचन बरन बिराज सुबेसा।

कानन कुंडल कुंचित केसा॥

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।

कांधे मूंज जनेऊ साजै॥

संकर सुवन केसरीनंदन।

तेज प्रताप महा जग बन्दन॥

विद्यावान गुनी अति चातुर।

राम काज करिबे को आतुर॥

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।

राम लखन सीता मन बसिया॥

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।

बिकट रूप धरि लंक जरावा॥

भीम रूप धरि असुर संहारे।

रामचंद्र के काज संवारे॥

लाय सजीवन लखन जियाये।

श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।

तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।

अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।

नारद सारद सहित अहीसा॥

जम कुबेर दिगपाल जहां ते।

कबि कोबिद कहि सके कहां ते॥

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।

राम मिलाय राज पद दीन्हा॥

तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।

लंकेस्वर भए सब जग जाना॥

जुग सहस्र जोजन पर भानू।

लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।

जलधि लांघि गये अचरज नाहीं॥

दुर्गम काज जगत के जेते।

सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥

राम दुआरे तुम रखवारे।

होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥

सब सुख लहै तुम्हारी सरना।

तुम रक्षक काहू को डर ना॥

आपन तेज सम्हारो आपै।

तीनों लोक हांक तें कांपै॥

भूत पिसाच निकट नहिं आवै।

महाबीर जब नाम सुनावै॥

नासै रोग हरै सब पीरा।

जपत निरंतर हनुमत बीरा॥

संकट तें हनुमान छुड़ावै।

मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥

सब पर राम तपस्वी राजा।

तिन के काज सकल तुम साजा॥

और मनोरथ जो कोई लावै।

सोइ अमित जीवन फल पावै॥

चारों जुग परताप तुम्हारा।

है परसिद्ध जगत उजियारा॥

साधु संत के तुम रखवारे।

असुर निकंदन राम दुलारे॥

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।

अस बर दीन जानकी माता॥

राम रसायन तुम्हरे पासा।

सदा रहो रघुपति के दासा॥

तुम्हरे भजन राम को पावै।

जनम-जनम के दुख बिसरावै॥

अन्तकाल रघुबर पुर जाई।

जहां जन्म हरि भक्त कहाई॥

और देवता चित्त न धरई।

हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥

संकट कटै मिटै सब पीरा।

जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥

जै जै जै हनुमान गोसाईं।

कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥

जो सत बार पाठ कर कोई।

छूटहि बंदि महा सुख होई॥

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।

होय सिद्धि साखी गौरीसा॥

तुलसीदास सदा हरि चेरा।

कीजै नाथ हृदय मंह डेरा॥

||दोहा|| 

पवन तनय संकट हरन मंगल मूरति रूप।

राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप॥

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बजरंग बाण/Hanumaan Baan

||दोहा|| 

निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान। 

तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥ 

||चौपाई|| 

जय हनुमंत संत हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥ 

जन के काज बिलंब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै॥ 

जैसे कूदि सिंधु महिपारा। सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥ 

आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुरलोका॥ 

जाय बिभीषन को सुख दीन्हा। सीता निरखि परमपद लीन्हा॥ 

बाग उजारि सिंधु महँ बोरा। अति आतुर जमकातर तोरा॥ 

अक्षय कुमार मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा॥ 

लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुरपुर नभ भई॥ 

अब बिलंब केहि कारन स्वामी। कृपा करहु उर अंतरयामी॥ 

जय जय लखन प्रान के दाता। आतुर ह्वै दुख करहु निपाता॥ 

जय हनुमान जयति बल-सागर। सुर-समूह-समरथ भट-नागर॥ 

ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले। बैरिहि मारु बज्र की कीले॥ 

ॐ ह्नीं ह्नीं ह्नीं हनुमंत कपीसा। ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर सीसा॥ 

जय अंजनि कुमार बलवंता। शंकरसुवन बीर हनुमंता॥ 

बदन कराल काल-कुल-घालक। राम सहाय सदा प्रतिपालक॥ 

भूत, प्रेत, पिसाच निसाचर। अगिन बेताल काल मारी मर॥ 

इन्हें मारु, तोहि सपथ राम की। राखु नाथ मरजाद नाम की॥ 

सत्य होहु हरि सपथ पाइ कै। राम दूत धरु मारु धाइ कै॥ 

जय जय जय हनुमंत अगाधा। दुख पावत जन केहि अपराधा॥ 

पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत कछु दास तुम्हारा॥ 

बन उपबन मग गिरि गृह माहीं। तुम्हरे बल हौं डरपत नाहीं॥ 

जनकसुता हरि दास कहावौ। ताकी सपथ बिलंब न लावौ॥ 

जै जै जै धुनि होत अकासा। सुमिरत होय दुसह दुख नासा॥ 

चरन पकरि, कर जोरि मनावौं। यहि औसर अब केहि गोहरावौं॥ 

उठु, उठु, चलु, तोहि राम दुहाई। पायँ परौं, कर जोरि मनाई॥ 

ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता॥ 

ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल-दल॥ 

अपने जन को तुरत उबारौ। सुमिरत होय आनंद हमारौ॥ 

यह बजरंग-बाण जेहि मारै। ताहि कहौ फिरि कवन उबारै॥ 

पाठ करै बजरंग-बाण की। हनुमत रक्षा करै प्रान की॥ 

यह बजरंग बाण जो जापैं। तासों भूत-प्रेत सब कापैं॥ 

धूप देय जो जपै हमेसा। ताके तन नहिं रहै कलेसा॥ 

||दोहा|| 

प्रेम प्रतीतिहिं कपि भजै। सदा धरैं उर ध्यान।। 

'तेहि के कारज तुरत ही, सिद्ध करैं हनुमान।।

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हनुमान आरती/Hanuman Aarti

आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।

जाके बल से गिरिवर कांपे। रोग दोष जाके निकट न झांके।

अंजनि पुत्र महाबलदायी। संतान के प्रभु सदा सहाई।।

आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।

दे बीरा रघुनाथ पठाए। लंका जारी सिया सुधि लाए।

लंका सो कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई।

आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।

लंका जारि असुर संहारे। सियारामजी के काज संवारे।

लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे।आनि संजीवन प्राण उबारे।

आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।

पैठी पाताल तोरि जमकारे। अहिरावण की भुजा उखारे।

बाएं भुजा असुरदल मारे। दाहिने भुजा संत जन तारे।

आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।

सुर-नर-मुनि जन आरती उतारें। जय जय जय हनुमान उचारें।

कंचन थार कपूर लौ छाई। आरती करत अंजना माई।

आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।

लंकविध्वंस कीन्ह रघुराई। तुलसीदास प्रभु कीरति गाई।

जो हनुमानजी की आरती गावै। बसी बैकुंठ परमपद पावै।

आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।

यह भी पढें: जानें ज्योतिष अनुसार क्या है आरती का महत्व?

हनुमान मंत्र/Hanuman Mantra

सिन्दूर अर्पित के समय निम्न मंत्र का उच्चारण करें:

दिव्यनागसमुद्भुतं सर्वमंगलारकम् |

तैलाभ्यंगयिष्यामि सिन्दूरं गृह्यतां प्रभो ||

पुष्पमाला अर्पण मंत्र:

नीलोत्पलैः कोकनदैः कह्लारैः कमलैरपि |

कुमुदैः पुण्डरीकैस्त्वां पूजयामि कपीश्वर ||

पंचामृत अर्पण मंत्र:

मध्वाज्य क्षीर दधिभिः सगुडैर्मन्त्रसन्युतैः |

पन्चामृतैः पृथक् स्नानैः सिन्चामि त्वां कपीश्वर ||

अर्घ्य अर्पण मंत्र:

कुसुमा-क्षत-सम्मिश्रं गृह्यतां कपिपुन्गव |

दास्यामि ते अन्जनीपुत्र | स्वमर्घ्यं रत्नसंयुतम् ||

फल अर्पण मंत्र:

फ़लं नानाविधं स्वादु पक्वं शुद्धं सुशोभितम् |

समर्पितं मया देव गृह्यतां कपिनायक ||

क्षमा याचना मंत्र:

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं कपीश्वर |

यत्पूजितं मया देव! परिपूर्ण तदस्तु मे ||

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