गणेश जी को क्यों मिला मौर्य और एकदंत नाम

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गणेश जी/Ganesh ji को प्रथम पूज्य माना गया है, तभी तो किसी भी मांगलिक कार्य की शुरुआत श्री गणेश पूजन द्वारा ही आरंभ होती है और उसके पश्चात अन्य कृत्य आरंभ किए जाते हैं। भारतीय संस्कृति में गणपति जी का महत्वपूर्ण स्थान है। किसी भी प्रकार के कर्म में यह सर्वप्रथम पूज्य होते हैं गणेश जी को मनाने के बाद ही आगे के कार्यों में गति प्राप्त होती है। श्री गणेश जी को अनेकों नामों से पुकारा जाता है। गणेश जी को विघ्नहर्ता/Vighnaharta कहा जाता है क्योंकि यह सभी विघ्नों- कलेशों को हर लेते हैं। गणों के अधिपति हैं इसलिए गणपति हैं, इसी प्रकार से अनेकों कामों के पीछे कई कथाएं एवं पौराणिक आख्यान मौजूद हैं जो श्री गणेश जी के नामों की महिमा का गुणगान करते हैं। 

श्री गणेश जी के मौर्या नाम की महिमा 

गणेश भगवान जी का एक नाम मौर्या है जिसे मोरया के रूप में भी लिखा एवं बोला जाता है। यह नाम अत्यंत ही लोकप्रिय एवं भक्त जनों के मुख से निकलने वाला महामंत्र स्वरूप नाम है। महाराष्ट्र में तो इस नाम को प्रमुखता के साथ उपयोग में लाया जाता है। श्री गणेश चतुर्थी/Ganesh Chaturthi  के उत्सव पर गणपति बप्पा मोरिया नाम की गूंज हर घर में सुनाई देती है।  गणेश भगवान का यह नाम कैसे पड़ा इसके पीछे कई कथाएं उपलब्ध हैं। आईये मोरया नाम की कथा के कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों के बारे में जानते हैं।

लगभग 14वीं शताब्दी पूर्व भारत में महाराष्ट्र के शहर पुणे के पास चिंचवाड़ स्थान पर मोरया गोसावी नामक गणेश भक्त निवास करते थे, जो गाणपत्य सम्प्रदाय से जुड़े थे। कहते हैं की उन्होंने भगवान गणेश जी की भक्ति में ही अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत किया और साधना में लीन होकर समाधि धारण कर ली। उनकी भक्ति की अनेकों कथाओं ने लोगों को बहुत प्रभावित किया, तभी से भक्तों ने उस गणेश भक्त के नाम के साथ गणेश जी का नाम भी जोड़ दिया और गणेश जी को मोरया कहा जाने लगा तभी से श्री गणेश जी का मोरया नाम प्रसिद्ध हुआ। 

इसके अतिरिक्त यह भी प्रचलित है की मोरगांव जहां गाणपत्य संप्रदाय के लोगों का निवास स्थान बना। यहां मयूर अत्यधिक संख्या में रहते थे जिस कारण मोरया इस स्थान का नाम भी हुआ। भक्तों नें गणेश जी की भक्ति परंपरा को यहां विकसित किया, इसलिए स्थान व भक्ति के संगम से गणेश जी को मोरया शब्द से जोड़ा गया है और तभी से गणेश जी मोरया के नाम से जाने जाते हैं।  इस स्थान का धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्व है, क्योंकि अष्टविनायक धार्मिक यात्रा में यह एक स्थान बहुत ज्यादा महत्व रखता है। इसी स्थान से यात्रा का आरंभ होता है तथा यहीं पर मयूरेश्वर नामक गणपति भी स्थित हैं।  

पौराणिक कथाओं के अनुसार दानव सिन्धु को गणेश जी ने समाप्त करने हेतु मयूर अर्थात मोर को अपनी सवारी के रूप में चुना और सिंधु का संहार किया। मोरगांव में मयूरेश्वर अवतार की पूजा की जाती है और मराठी भाषा में गणेश जी को मोरेश्वर के नाम से पुकारा जाता है। इस प्रकार से भगवान के मोरया नाम की महिमा का उल्लेख ग्रंथों में विस्तार रूप से दिया गया है। 

गणेश जी के एकदंत होने की कथा   

श्री गणेश जी का एक अन्य नाम एकदंत भी बहुत प्रसिद्ध है। इस नाम के पीछे भी कई कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें से एक कथा परशुराम युद्ध से संबंधित है।  इस पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार ऋषि परशुराम जी भगवान शिव से मिलने की इच्छा रखते हैं और उनसे मिलने कैलाश पहुंच जाते हैं। कैलाश के द्वार पर गणेश सुरक्षा में वहां सदैव ही उपस्थित रहते थे और परशुराम जब गणेश जी से अंदर जाने का मार्ग मांगते हैं तो गणेश मना कर देते हैं। इस पर परशुराम क्रोधित हो जाते हैं और गणेश जी एवं परशुराम के मध्य युद्ध होता है। परशुराम जी के फरसे के वार से गणेश जी का एक दांत टूट जाता है और इस कारण वह एकदंत कहलाते हैं। 

एक अन्य कथा जो महाभारत की रचना से जुड़ी हुई है। उसमें गणेश जी ने अपने दांत को तोड़ कर उसकी कलम बनाकर ग्रंथ को बिना रुके समाप्त किया और इस कारण गणेश जी एकदंत कहलाते हैं।

इसी प्रकार एक अन्य कथा है। यह कथा कार्तिकेय एवं गणेश के मध्य विवाद होने और कार्तिकेय के गणेश जी के दांत तोड़ देने से भी जुड़ी हुई है। इन सभी कथाओं में गणेश जी के कार्यों की महत्ता भी देखने को मिलती है, जिसमें वह साहस एवं शौर्य के साथ उपस्थित होते हैं और संघर्ष के पश्चात विजय प्राप्त करते हैं। इसलिए उनके एकदंत होने की कथा भी मनुष्य को संघर्ष का सामना करने की सीख देती है और विजय प्राप्ति का आशीर्वाद भी प्रदान करती हैं। 

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