ज्योतिष विवाह के संबंध में कैसे सहायता कर सकता है?

when i will get married

विवाह का योग कब बनेगा, किस उम्र में विवाह होगा/at what age will the marriage happen? इन बातों को ज्योतिष शास्त्र द्वारा कई तरह के योग एवं अन्य सिद्धांतों द्वारा विस्तार से बताया गया है। किसी भी व्यक्ति के विवाह का समय उसकी कुंडली द्वारा यह सहजता से पता किया जा सकता है। कुंडली में मौजूद कुछ ऐसे भाव होते हैं जो विवाह एवं उससे सुख को दर्शाते हैं, विवाह भाव/marriage house की शुभता उसमें स्थित ग्रह अथवा ग्रहों के साथ शुभ संबंध होने पर विवाह समय पर होता है। इसके विपरीत यदि स्थिति अशुभ होगी, सप्तम भाव एवं उसके स्वामी की स्थिति कमजोर होगी या वह अन्य अशुभ प्रभावों से ग्रसित होगा तो विवाह में विलंब अधिक होगा और साथ ही विवाह किसी न किसी रूप में बाधित अवश्य होता है। 

लग्न कुंडली से जाने विवाह समय 

किसी व्यक्ति की लग्न कुंडली/Ascendant chart से विवाह का समय जाना जाता है। यह इस बात को जानने का पहला चरण होता है की विवाह किस आयु में संपन्न हो सकता है। जन्म कुंडली में सप्तम भाव एवं सप्तमेश की स्थिति विवाह के समय को प्रमुख रूप से दर्शाती है। कुंडली के सप्तम भाव में स्थित शुक्र, चंद्र, बुध की स्थिति एवं सप्तम भाव के शुभ होने पर विवाह जल्दी होता है। 

लग्न कुंडली में गुरु सप्तम भाव में स्थित हो अथवा शनि की दृष्टि सप्तम भाव पर होगा, तो विवाह होने में देरी होगी और कम से कम 26 वर्ष के पश्चात विवाह होने के योग अधिक प्रबल होता है। परंतु इसके विपरीत यदि चंद्रमा, गुरु की युति सप्तम भाव पर हो तथा सप्तम भाव का अधिपति भी शुभ अवस्था में हो तो विवाह जल्द होता है। 

यदि लग्न कुंडली में सप्तम भाव का स्वामी उच्च का होगा और किसी शुभ ग्रह से दृष्टि या युति बनाता है तो विवाह जल्द होता है। ऐसे में विवाह 24 वर्ष की आयु से पहले भी हो सकता है। 

कुंडली में शुक्र सप्तम भाव का स्वामी होकर यदि सप्तम भाव में ही स्थित हो तथा लग्नेश व द्वितीय भाव के मध्य शुभ संबंध बन रहा हो तो विवाह यौवनावस्था में होता है। 

कुंडली में लग्न एवं सप्तम भाव के स्वामी का संबंध यदि शुभ स्थिति में हो , दूसरी ओर नवमांश कुंडली में भी स्थिति अत्यंत शुभ हो सप्तम भाव का कारकांश शुभस्थ हो तो विवाह 21 से 24 वर्ष में होने के योग बनते हैं। 

जन्म कुंडली/Natal chart में यदि सप्तम भाव का स्वामी वक्री हो और मंगल षष्ठ भाव में हो तो उच्च स्थिति में व्यक्ति का विवाह देर से या 30 वर्ष के पश्चात होने की संभावना बनती है। अगर लग्न, सप्तम भाव, लग्नेश और शुक्र चर स्थान में स्थित हों और चन्द्रमा चर राशि में स्थित हों तो विवाह विलम्ब के योग बनते हैं।

जब सप्तम भाव के स्वामी या सप्तम भाव का संबंध 6, 8, 12 होता है तो ऐसी स्थिति में विवाह देरे से होता है। शनि-शुक्र लग्न से चतुर्थ भाव में हों, चन्द्रमा छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो तो विवाह काफी विलंब से होता है। 

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विवाह के समय में  ग्रहों की भूमिका 

ज्योतिष शास्त्र में कुंडली में सातवें भाव, सातवें भाव के अधिपति, शुक्र तथा बृहस्पति ग्रह को मुख्य रूप से देखा जाता है। कुंडली में विवाह से जुड़े मसलों पर इनका विशेष प्रभाव  पड़ता है। जहां शुक्र को पुरुष हेतु तो बृहस्पति को स्त्री की कुंडली में जीवन साथी के सुख हेतु देखा जाता है। इनकी शुभ स्थिति होने पर विवाह समय के अनुरूप और सुख से संपन्न होता है।  वैवाहिक जीवन भी सुखमय होने की भी संभावनाएं बहुत प्रबल हो जाती हैं।  

विवाह के समय में मंगल की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है क्योंकि मंगल को मांगल्य सुख का मुख्य कारक भी कहा जाता है जो संबंधों की गर्मजोशी पर असर डालता है इसलिए यदि कुंडली में मंगली योग हो तो विवाह जल्द या देर से होना दोनों ही हो सकता हैं अगर इस योग का अशुभ प्रभाव पड़ रहा है तो विवाह देरी को दिखाता और दूसरी ओर यदि कुछ शुभता का प्रभाव होगा तो यह जल्द विवाह को भी दर्शाता है।

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