वरुथिनी एकादशी 2022 पर बन रहा है त्रिपुष्कर योग

ekadashi

हिंदू कैलेंडर के अनुसार वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को वरुथिनी एकादशी/ Varuthani Ekadashi कहते हैं. जबकि अंग्रेजी मतानुसार अप्रैल माह में यह एकादशी आती है. ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने से व्यक्ति के समस्त पापों का नाश हो जाता है और उसे सुख, शांति व सौभाग्य की प्राप्ति होती है.

प्राचीन ग्रंथों के अनुसार जो मनुष्य श्रद्धा व भक्ति पूर्वक इस एकादशी का व्रत करता है, उसे अनंत कोटि पुण्य फलों की प्राप्ति होती है और मृत्यु उपरांत बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है। वरुथिनी एकादशी के दिन श्री हरि विष्णु के अवतार भगवान वामन की पूजा-अर्चना करने का विधान है. ऐसी मान्यता है कि वरुथिनी एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति की विभिन्न संकटों से सुरक्षा होती है और आर्थिक समृद्धि प्राप्त होती है. जो व्यक्ति किसी जटिल व गंभीर रोग से ग्रस्त है अगर वह भी इस दिन भगवान श्री हरि का नाम स्मरण या मंत्र जाप करे तो उसके रोग व कष्ट का निवारण होता है.

कब मनाई जाएगी वरुथिनी एकादशी?

इस वर्ष वरुथिनी एकादशी 2022 में 26 अप्रैल, मंगलवार को मनाई जाएगी.

वरुथिनी एकादशी शुभ पूजा मुहूर्त

एकादशी तिथि प्रारम्भ – अप्रैल 26, 2022 को रात्रि 01:38 बजे

एकादशी तिथि समाप्त – अप्रैल 27, 2022 को रात्रि 00:48 तक

 वरुथिनी एकादशी पूजा शुभ मुहूर्त(दिल्ली के लिए)- सुबह 10:41 से दोपहर 13:58 तक

वरुथिनी एकादशी पारण (व्रत खोलने का समय) मुहूर्त- 27 अप्रैल को प्रातः 06:41 से प्रातः 08:22 तक

इस वरुथिनी एकादशी पर बन रहा है यह दुर्लभ योग

इस वरुथिनी एकादशी व्रत पर त्रिपुष्कर योग बन रहा है जो कि 26 अप्रैल को देर रात 12 बजकर 48 मिनट से प्रारंभ होकर अगले दिन 27 अप्रैल को सुबह 05 बजकर 49 मिनट तक रहेगा।  

ऐसे बनता है त्रिपुष्कर योग

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जब मंगलवार, शनिवार या रविवार के दिन द्वादशी, सप्तमी या द्वितीया तिथि होती है और उसी समय अगर कृत्तिका, पुनर्वसु, विशाखा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराषाढ़ाउत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र आदि में से कोई एक नक्षत्र हो, तो त्रिपुष्कर योग का निर्माण होता है। इस योग की यह विशेषता है कि इसमें किए गए कार्यों का फल तीन गुणा अधिक मिलता है. 

वरुथिनी एकादशी व्रत का संपूर्ण फल प्राप्त करने की शास्त्रीय पूजन विधि 

  • एकादशी तिथि से एक दिन पहले यानी दशमी तिथि को शाम को सूर्यास्त के बाद भोजन न करें।  
  • वरुथिनी एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करके शुद्ध धुले हुए वस्त्र धारण कर लें। 
  • इसके बाद घर के मंदिर या पूजास्‍थल को अच्छी तरह से साफ़ करके गंगाजल छिड़ककर पवित्र कर लें. 
  • अब पूजा स्थल में एक लकड़ी की चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र को स्थापित करें. 
  • अब हाथ में जल लेकर व्रत व पूजन को सफलतापूर्वक पूर्ण करने का संकल्प लें.
  • इसके उपरांत श्री हरि व माँ लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र को हल्दी या पीले चंदन से तिलक करके पीले पुष्पों की माला अर्पित करें. 
  • अब शुद्ध घी या तेल का दीपक और धूपबत्ती को प्रज्वलित करके तुलसी दल अर्पित करें. 
  • इसके बाद एकादशी व्रत की कथा, श्री विष्णु सहस्त्रनाम, श्री विष्णु चालीसा आदि का श्रद्धापूर्वक पाठ करें.
  • पाठ के बाद विधिवत आरती उतारें और प्रभु को भोग अर्पित करें. 
  • इस पावन दिवस पर संध्याकाळ की पूजा के बाद तुलसी जी के आगे घी का दीपक अवश्य जलाएं क्योंकि तुलसी जी को प्रसन्न करने से भगवान विष्णु अपने आप ही प्रसन्न हो जाते हैं. 
  • वरुथिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु को तुलसी की माला अवश्य अर्पित करें। 
  • इस दिन पीपल के पेड़ पर जल अवश्य चढ़ाएं क्योंकि शास्त्रों के अनुसार पीपल के वृक्ष पर श्री हरि विष्णु जी का वास होता है.  
  • वरुथिनी एकादशी पर भगवान विष्णु को केसर युक्त खीर, पीले फल व पीले रंग के मिष्ठान का भोग लगाना शुभ है. 
  • अगले दिन सुबह स्नान व पूजा आदि करके किसी ब्राह्मण को भोजन कराएं। 

वरुथिनी एकादशी के दिन इन 9 नियमों का पालन करना है जरूरी

  1. वरुथिनी एकादशी के दिन मानसिक व शारीरिक शुद्धि का पूरा ध्यान रखना चाहिए। 
  2. इस दिन कांसे के बर्तन में भोजन न करें। 
  3. इस दिन मांस, मसूर की दाल, चने का साग, शहद आदि का सेवन वर्जित है. 
  4. इस दिन स्त्री संपर्क करना वर्जित है. 
  5. इस दिन दूसरी बार भोजन करना वर्जित है. 
  6. इस दिन मदिरा या किसी भी प्रकार के मादक पदार्थ का सेवन वर्जित है. 
  7. इस दिन जुआ खेलना, बुराई करनापर निंदा करना वर्जित है. 
  8. इस व्रत में नमक व ठोस आहार का सेवन भी वर्जित है।
  9. इस दिन काम, क्रोध, लोभ, मोह व अहंकार का त्याग करना चाहिए।  

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