यदि मेरी जन्म कुंडली के पहले भाव में राहु और सप्तम में केतु हो तो क्या होता है?

राहु पहले भाव में

वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली में 12 भाव होते हैं जिनमें से प्रथम भाव को लग्न भाव कहते हैं. कुंडली का लग्न भाव सबसे अधिक महत्वपूर्ण भाव होता है क्योंकि इस भाव से हमारा अस्तित्व और व्यक्तित्व जुड़ा होता है. यह भाव हमारे जीवन के अनेक महत्वपूर्ण पहलुओं का प्रतिनिधित्व करता हैं. इस भाव से शारीरिक बनावट, बल, स्वास्थ्य की स्थिति, रोग प्रतिरोधक क्षमता, रंग-रूप, मस्तिष्क,  प्रकृति, स्वभाव, आयु, सम्मान, प्रसिद्धि, प्रतिष्ठा, यश आदि का विचार किया जाता है. कुंडली में लग्न और लग्न भाव के स्वामी(लग्नेश) का बली स्थिति में होना व्यक्ति को उपरोक्त विषयों से जुड़े मामलों में शुभ फल प्रदान करता है. कुंडली के प्रथम भाव की गणना केंद्र व त्रिकोण भावों में होती है. कुंडली का सातवां  भाव विवाह का मुख्य भाव है.

 

इस भाव से आपका वैवाहिक जीवन से जुड़ा होता है। कुंडली के सप्तम भाव/Satva Bhav से जीवनसाथी, उसका स्वभाव व व्यक्तित्व, मूत्रांग, वैवाहिक ख़ुशियाँ, यौन संबंधी रोग, व्यापार, विदेश यात्रा, दीर्घकालिक संबंध आदि का विचार किया जाता है. इस भाव से आपके वैवाहिक जीवन/Married life Prediction व जीवनसाथी की विशेषताओं का पता चलता है. यह भाव नैतिक व अनैतिक संबंधों को भी दर्शाता है। इस भाव की गणना केंद्र भाव के रूप में भी होती है. राहु व केतु क्रूर व पाप ग्रह हैं. राहु से विदेश, विदेशी यात्रा, शोध व रिसर्च, भ्रम, भय, छलावा, जटिल रोग आदि का कारक है. राहु मनुष्य के अंदर सांसारिक मोह व भौतिक विषयों के प्रति रुझान पैदा करता है. इसके प्रभाव से मनुष्य सांसारिक मायाजाल में उलझकर रह जाता है. ये व्यक्ति में तीव्रता से आगे बढ़ने व सफल होने की इच्छा जागृत करता है. यह आकस्मिक प्रसिद्धि, लालच, हेरफेर, षड़यंत्र, कूटनीति आदि का कारक भी है. यह एक वात प्रकृति वाला ग्रह है इसलिए इसके प्रभाव से लकवा, अर्थराइटिस, हार्ट अटैक आदि होता है.

 

यह चोर-उचक्कों, राजनेताओं, अपराधियों व स्मगलरों, बंधन, जेल, सांप, जहर आदि का प्रतिनिधित्व करता है. यह राजनीति, विदेशी, स्रोत, डिप्लोमेसी, भौतिक विज्ञान, वायुयान से जुड़े क्षेत्र आदि क्षेत्रों से लाभ प्रदान करता है. कुंडली में राहु/Kundli me Rahu की अशुभ स्थिति व्यक्ति चोरी, डकैती, लूटपाट जैसे गलत कार्यों की ओर अग्रसर हो सकता है. लेकिन कुंडली में बलवान राहु की स्थिति व्यक्ति को आकस्मिक सफलता, आर्थिक समृद्धि व प्रसिद्धि प्रदान कर सकती है. केतु का प्रभाव अकसर सांसारिक विषयों में जटिलता उत्पन्न करता है. केतु अध्यात्म, आध्यात्मिक साधना,ध्यान, साधु, सन्यासी, वैराग्य, मोक्ष, गूढ़ व गुप्त विद्या, आयुर्वेद, चिकित्सा, तंत्र-मंत्र, योग, ज्योतिष, हीलिंग साइंस आदि का कारक ग्रह है. केतु भी मंगल के समान उग्र, अग्नि तत्व प्रधान व पित्त प्रकृति वाला ग्रह है. केतु व्यक्ति को सांसारिक विषयों की बजाय आध्यात्मिक विषयों में रूचि प्रदान करता है. केतु व्यक्ति को आध्यात्मिक विषयों की गहरी समझ व उत्तम अंतर्ज्ञान शक्ति देता है केतु के शुभ प्रभाव के कारण व्यक्ति गूढ़ व जटिल विषयों को शीघ्रता से समझ लेता है.

 

अब प्रथम भाव में राहु व सप्तम भाव में स्थित केतु की बात करते हैं. प्रथम भाव से स्वास्थ्य, व्यक्तित्व, रूप, रंग, स्वभाव, शारीरिक बनावट, सिर, समृद्धि आदि का विचार किया जाता है और सप्तम भाव से विवाह, दीर्घकालिक संबंध, व्यापार, विदेश वास या विदेश यात्राएं आदि का विचार किया जाता है. प्रथम भाव में राहु/Rahu in the first house के होने से आप एक गूढ़ व रहस्यमयी स्वभाव के व्यक्ति हो सकते हैं. आपके व्यक्तित्व को पहचानना थोड़ा जटिल हो सकता है. आपके व्यक्तित्व में एक गजब का आकर्षण हो सकता है.

 

अगर लग्नेश व सूर्य कमजोर हो तो आपका स्वास्थ्य गड़बड़ रह सकता है. आप सांवले व लंबी कद-काठी के स्वामी हो सकते हैं. आप जादू-टोने, ऊपरी हवा व नजर दोष से बहुत जल्दी प्रभावित होने वाले हो सकते हैं. आपको सिर या दिमाग से जुड़े रोग हो सकते हैं. प्रथम भाव में स्थित राहु के कारण आप अक्सर दुविधा के शिकार हो सकते हैं. सप्तम भाव में केतु/Ketu in the seventh house के स्थित होने से आपका जीवनसाथी आध्यात्मिक प्रकृति का हो सकता है. उसका स्वास्थ्य प्रतिकूल रह सकता है. आपका विवाह भंग हो सकता है अर्थात आपका तलाक़ या संबंध विच्छेद हो सकता है. आपको व्यापार से नुकसान हो सकता है. विदेश वास करना या विदेश यात्राएं/foreign traveling करने से आपको नुकसान हो सकता है. आप गुप्त रोगों से पीड़ित हो हो सकते हैं.

 

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