राहु और केतु कहाँ स्थित है, वे क्या फल देते हैं?

राहु और केतु

राहु और केतु अन्य ग्रहों की तरह कोई खगोलीय पिंड नहीं हैं. खगोल शास्त्र के अनुसार चंद्रमा पृथ्वी का उपग्रह है इसलिए पृथ्वी के चारों और अपनी कक्षा में चक्कर काटता है. चंद्रमा की ये कक्षा पृथ्वी की कक्षा के साथ पाँच डिग्री का कोण बनाते हुए उसे दो भागों में काटती है। इन दो कटान बिंदुओं में से एक का नाम राहु और दूसरे कटान बिंदु का नाम केतु है। राहु और केतु चंद्र और पृथ्वी की कक्षा के मात्र दो कटान बिंदु हैं इसलिए इनका कोई भी भौतिक स्वरूप नहीं है। प्राचीन ऋषियों ने इन बिंदुओं के महत्व व प्रभाव को देखते हुए इनका नाम ‘राहु’ और ‘केतु’ रखा था. किसी भी कुंडली में राहु-केतु परस्पर 6 राशि (180 अंश) की दूरी पर स्थित होते हैं इसलिए प्रत्येक कुंडली में यह एक दूसरे से विपरीत भाव में होते हैं। इनकी दैनिक गति 3 कला और 11 विकला हैं. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इन्हे संपूर्ण राशि वृत्त का एक चक्कर लगाने में 18 वर्ष 7 माह 18 दिवस का समय लगता है. यद्यपि राहु तथा केतु दृष्टिगोचर नहीं होते तथापि ज्योतिष शास्त्र में इन दोनों ग्रहों को विशेष स्थान प्राप्त है. विंशोत्तरी दशा क्रम में राहु की महादशा/Rahu Mahadasha 18 वर्ष तो केतु की 7 वर्ष की होती है. 

 

राहु का प्रभाव हमारे मन के ऊपर रहता हैं, जो दिखाई नही देता हैं, फिर भी वज़ूद में हैं, वह राहु हैं। हमारे विचारों के ऊपर राहु का गहरा प्रभाव पड़ता है क्योंकि विचार का स्रोत अदृश्य है और राहु भी एक अदृश्य तत्व है. राहु के कारकतत्व षड़यत्र, दुष्टता, अस्थिरता, कूटनीति, राजनीति, तामसिकता, मलीनता, आलस्य, दरिद्रता, रुकावट, बाधा, आकस्मिता, विदेश, विदेशी लोग, इंटरनेट, बिजली, अंतरिक्ष-इंजीनियर, पायलट, एयरहोस्टेस, जुआ, समाज से बहिष्कार, सांप का काटना, जहर फैलना, चोरी व नीचता के कार्य,  स्वछंद, अपवित्रता, झूठ बोलना, दादा, वात-कफ की पीड़ा आदि हैं। यह सबसे अधिक गुप्त प्रवृति का ग्रह हैं। केतु के कारकत्व  गुप्त शक्ति व गुप्त विद्या, डॉक्टर, वैकल्पिक-चिकित्सा पद्धति, कम्प्यूटर-भाषा, सूक्ष्मता अंतर्मुखी, गंगा-स्नान, वैद्य, कुत्ता, बुखार, टी.बी., तंत्र-मंत्र, ज्योतिष, मोक्ष, अध्यात्म, वैराग्य, त्वचा-रोग, नाना, कम्बल, चैक वाले कपड़े, गर्म कपड़े, तीर्थ यात्रा, झंडा, काला सफेद कुत्ता, दूर-दृष्टि, इमली का पेड़, ब्रह्मज्ञान, फोड़े-फुन्सी आदि हैं।

 

राहु व्यक्ति को भौतिक समृद्धि, सांसारिक भोग विलास, आकस्मिक लाभ या हानि प्रदान करता है। जबकि केतु व्यक्ति में आध्यात्मिक गुणों की वृद्धि करता है और उसे सांसारिक जीवन के प्रति विरक्त बनाता है। राहु और केतु को कुंडली/Kundli के 3, 10, 11वें भाव में बलवान माना जाता है. जिन व्यक्तियों की कुंडली में राहु और केतु तीसरे भाव में/Tisare bhav me Ketu हो तो यह बहुत शुभ माना जाता है। कुंडली का तीसरा भाव साहस, बल और पराक्रम का माना जाता है। अगर आपकी कुंडली के तीसरे भाव में राहु-केतु/Tisare Bhav me Ketu Rahu हों तो ये आपको बहुत उत्तम फल प्रदान कर सकते हैं. इस भाव में राहु और केतु के होने से आप अपने बल और पराक्रम की बदौलत जीवन में कई बड़े मुकाम हासिल कर सकते हैं. तिसरे भाव में राहु और केतु/Tisare Bhav me Ketu Rahu आपको स्वावलंबी, महत्वाकांक्षी और दृढ़ संकल्प शक्ति वाला बना सकते हैं. यहाँ स्थित राहु-केतु आपके साहस व पराक्रम में वृद्धि करते हैं और शत्रु भी आपको नुकसान नहीं पहुंचा सकते हैं.

 

आप अपनी ऊर्जा का प्रयोग अच्‍छे कार्यों में कर सकते हैं और जीवन में अनेक बड़ी उपलब्धियां व सफलताएं प्राप्त कर सकते हैं. अगर आपकी कुंडली के 10वें भाव में राहु/Dasve Bhav me Rahu या केतु हो और दशम भाव का स्वामी भी बलवान हो तो आप अपने करियर में काफी तरक्की और सफलता प्राप्‍त कर सकते हैं. आपको राजनीति, विदेश और सरकारी क्षेत्रों से अच्छा लाभ मिल सकता है. कामयाबी आपके कदम चूम सकती है. आपके अंदर कुशल नेतृत्व की क्षमता हो सकती है. आपको अपने कार्यक्षेत्र में कई बड़े लाभ प्राप्त हो सकते हैं. अगर आपकी कुंडली के 11वें भाव में राहु/Rahu in the Eleventh House या केतु स्थित हो तो यह बहुत ही शुभ फलदायी है. कुंडली का यह भाव लाभ व आमदनी से संबंधित है. इस भाव में राहु और केतु के होने से आपको जीवन में अनेक स्रोतों से लाभ मिल सकता है. आपकी आमदनी में अप्रत्याशित रूप से वृद्धि हो सकती है. यहाँ स्थित राहु व केतु आपको आकस्मिक धन लाभ कराते हैं. कुंडली के 6, 8, 12 भावों में राहु-केतु अधिकतर अशुभ प्रभाव देते हैं. केतु 8 वें और 12वें भाव में आध्यात्मिक विषयों के लिए शुभ होता है.

 

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