नवरात्री का पहला दिन: माँ शैलपुत्री की पूजन विधि और घटस्थापना मुहूर्त

Shail putri

नवरात्रि के पहले दिन माँ दुर्गा के प्रथम स्वरुप माँ शैलपुत्री की पूजा अर्चना की जाती है। इस साल 7 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि की शुरुआत होने जा रही है। हिन्दू धर्म शास्त्र के अनुसार देवी शैलपुत्री ने पर्वत राज हिमलाय की पुत्री के रूप में धरती पर जन्म लिया था। वैदिक ज्योतिष में देवी के इस रूप का सभी राशि के लोग यदि नियमानुसार पूजा पाठ करें तो उन्हें माँ का विशेष आशीर्वाद मिल सकता है। तो आइये जानते हैं माँ शैलपुत्री के ज्योतिषीय संबंध और राशि अनुसार उनकी पूजा विधि के बारे में। 

घटस्थापना शुभ मुहूर्त

तिथि : बृहस्पतिवार, अक्टूबर 7, 2021 को

घटस्थापना मुहूर्त समय : 06:17 प्रातःकाल से 07:06 प्रातःकाल

अवधि : 00 घण्टे 50 मिनट्स

प्रतिपदा तिथि प्रारंभ और समाप्ति समय : अक्टूबर 06, 2021 को 04:34 दोपहर से अक्टूबर 07, 2021 को 01:46 दोपहर तक

माँ शैलपुत्री के स्वरुप से जुड़ा है उनका ज्योतिषीय संबंध 

देवी माँ के इस स्वरुप का वर्णन करें तो उनके मस्तिष्क पर विराजित अर्धचाँद, दाएं हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल शोभित है। माँ शैलपुत्री का मूल निवास चक्र होता है जिसे ज्योतिषशास्त्र में दैवकीय जागरूकता का प्रथम बिंदु माना जाता है। इसी के आधार पर यह जाना जा सकता है कि कुंडली के किस भाव में चंद्रमा स्थित होगा और उस भाव के आधार पर किस प्रकार से माँ दुर्गा की पूजा कर नाकारात्मक प्रभावों से बचा जा सकता है। माँ के हाथ में शोभित त्रिशूल छठे भाव/6th House जिसे शत्रुओं का भाव भी माना जाता है उसे निर्बल करता है। माँ शैलपुत्री के बाएं हाथ में शोभित कमल का फूल कुंडली के बारहवें भाव को दर्शाता है, माँ की पूजा अर्चना कर इसे मजबूत किया जा सकता है। नंदी (बैल) को माँ का सवारी माना जाता है जो कि वृषभ राशि का भी प्रतीक है। लिहाजा इस राशि के लोग भी माँ के इस रूप की आराधना कर उनका आशीर्वाद पा सकते हैं। इसके साथ ही उनकी पूजा करने से मूलाधार चक्र जागृत होता है, यह मन को वश में करने के लिए बेहद सहायक माना जाता है। माँ शैलपुत्री का मूल मंत्र है “ॐ शं शैल पुत्रैय फट।”

जानें राशि अनुसार किन प्रकार करें माँ शैलपुत्री की पूजा 

मेष राशि : इस राशि वालों को अपने घर में अखंड ज्योत जलाना चाहिए और माँ  शैलपुत्री को लाल रंग की चुनरी चढ़ानी चाहिए। 

वृषभ राशि : इस राशि के जातकों को माँ शैलपुत्री की विशेष कृपा पाने के लिए उन्हें नारियल चढ़ाना चाहिए और दुर्गा चालीसा का पाठ करना चाहिए। 

मिथुन राशि : इस राशि के लोग यदि पूरी श्रद्धा के साथ माँ की पूजा करें और उन्हें साज श्रृंगार की वस्तुएं चढ़ाये तो इससे विशेष रूप से कुंवारी कन्याओं को मनवांछित वर और विवाहित स्त्री के पति की उम्र लंबी हो सकती है। 

कर्क राशि : इस राशि के जातकों को माँ शैलपुत्री का विशेष आशीर्वाद पाने के लिए उन्हें इत्र अर्पित कर दुर्गा सप्तसती का पाठ करना चाहिए। 

सिंह राशि : इस राशि वालों को माँ के समक्ष तिल के तेल से अखंड ज्योत जलाना चाहिए और दुर्गा चालीसा का पाठ करना चाहिए। 

कन्या राशि :  इस राशि वालों को विशेष रूप से लाल रंग का वस्त्र धारण कर “वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्द्वकृत शेखराम। वृषारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम॥” मंत्र का उच्चारण करना चाहिए और उन्हें भोग स्वरुप खीर चढ़ाना चाहिए। 

तुला राशि : इस राशि के लोगों को माँ शैलपुत्री को सुगंधित फूल चढ़ाना चाहिए उनके चरणों में अर्पित किये जाने वाले जल का पूरे घर में छिड़काव करना चाहिए। 

वृश्चिक राशि : शारदीय नवरात्रि के पहले दिन माँ शैलपुत्री का आशीर्वाद पाने के लिए दुर्गा सप्तसती का पाठ करें और घर से निकलने से पहले बड़ों का आशीर्वाद लें। 

धनु राशि : इस राशि के जातकों को लाल या पीले रंग का वस्त्र धारण कर माँ के सामने अखंड ज्योत जलाकर उनकी आरती करनी चाहिए। 

मकर राशि : इस राशि वालों को दुर्गा चालीसा का पाठ करना चाहिए और घर के मंदिर में धुप जलाना चाहिए। 

कुंभ राशि : इस राशि वालों को दुर्गा चालीसा का पाठ करने के साथ ही माँ शैलपुत्री को केले और शहद का भोग लगाना चाहिए। इसके साथ ही “पूणेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्॥ पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥” मंत्र का जाप करें। 

मीन राशि : इस राशि वालों को माँ शैलपुत्री को लाल चुनरी और सफ़ेद फूल चढ़ा कर रोली से तिलक करना चाहिए और दुर्गा चालीसा का पाठ करना चाहिए। 

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जानें माँ शैलपुत्री की व्रत कथा 

ऐसी मान्यता है कि देवी सती ने ही दोबारा माँ शैलपुत्री के रूप में जन्म लिया था। देवी सती के पिता प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया था। उन्होनें इस महयज्ञ में सभी देवी देवताओं को निमंत्रण दिया लेकिन भगवान् शिव के औघड़ रूप होने के कारण उन्हें नहीं बुलाया। देवी सती को जब इस बारे में पता चला की उनके पिता ने इतने बड़े यज्ञ का आह्वान किया है तो उन्होनें भगवान् शिव से पिता के घर जाने की जिद की। शिव जी ने उन्हें समझाया की उन्हें आमंत्रण नहीं मिला है, लेकिन इसके बावजूद भी देवी सती वहां गयी। यज्ञ स्थल पर पहुंचने के बाद उन्होनें ऐसा महसूस किया कि उनके घर वाले उनसे ठीक तरह से बातचीत नहीं कर रहे हैं और शिव जी का अपमान कर रहे हैं। क्रोध में आकर उन्होनें खुद को उसी यज्ञ की अग्निकुंड में आत्मदाह कर लिया। इसके बाद उन्होनें हिमालय देव के घर देवी शैलपुत्री के रूप में जन्म लिया। 

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