सर्वपितृ अमावस्या, श्राद्ध पक्ष का अंतिम दिन

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आश्विन मास की अमावस्या को कई नामों से पुकारा जाता है और यह श्राद्ध कर्म के विचार में एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण दिवस होता है। आश्विन मास की अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या, महालय अमावस्या/ Mahalya Amawasyaपितृ मोक्ष अमावस्यापितृ अमावस्याश्राद्ध अमावस्या इत्यादि के नामों से जानी जाती है। हिंदू परंपरा में पितरों-पूर्वजों को समर्पित यह अमावस्या वर्ष भर में आने वाली सभी अमावस्या में अलग और विशेष स्थान रखती है। इस अमावस्या के समय पितृ पक्ष का समापन होता है और इसी के साथ पितृ लोक में पितरों की वापसी होती है। श्राद्ध पक्ष के अंतिम दिन पितृ अपने वंश-कुल के लोगों को आशीर्वाद देते हुए प्रस्थान करते हैं।  

गजच्छाया योग में होगा श्राद्ध पक्ष का समापन

इस वर्ष महालय/सर्वपितृ अमावस्या पर एक खास योग बन रहा है। इस बार 11 वर्ष बाद बन रहा है शुभ गजच्छाया योग। श्राद्ध पक्ष का समापन पर गजच्छाया योग का निर्माण होने पर यह दिन अत्यंत शुभदायी बनता है। आश्विन अमावस्या के दिन सूर्य और चंद्रमा की स्थिति हस्त नक्षत्र/ Hasta Nakshatra में होने के कारण इस योग का प्रभाव श्राद्ध कार्य की शुभता को विस्तार देने वाला होगा। इस दिन प्रात: काल समय होने वाले इस योग के समय पर किया गया स्नान दान, तर्पण पिंडदान का विशेष लाभ होगा।

अज्ञात मृत्यु तिथि वालों का होता है इस दिन श्राद्ध  

इस अमावस्या के दिन उन सभी लोगों का भी श्राद्ध संपन्न किया जा सकता है, जिन लोगों के मृत्यु कि कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। इस समय पर उन सभी के लिए श्राद्ध करने का नियम लागू होता है, अत: इस प्रकार यह अमावस्या सभी पितरों को शांति प्रदान करने में सहायक बनती हैं। पूर्वजों के प्रति निष्ठा-आदर एवं प्रेम की अभिव्यक्ति का यह अंतिम दिन अत्यंत ही खास होता है। संपूर्ण भारत वर्ष में इस अमावस्या को मनाया जाता है, तथा जो लोग पूरे वर्ष के दौरान कोई श्राद्ध इत्यादि कार्य नहीं कर पाते हैं, तो उनके लिए भी यह विशेष दिन काफी प्रभावशाली बन जाता है। इस दिन अपने पूर्वजों को याद करने और सभी धार्मिक रीति रिवाज को करते हुए क्षमा याचना द्वारा पितरों का आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है। 

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आश्विन अमावस्या पिण्डदान का महत्वपूर्ण  समय  

आश्विन माह/Ashwin Month के कृष्ण पक्ष के पंद्रह दिनों तक श्राद्ध का समय होता है और इस का अंतिम दिन अमावस्या तिथि जो महालय अमावस्या होती है। इस दिन श्राद्ध कार्यों को करने का अंतिम दिन होता है। श्राद्ध अनुष्ठान से जुड़े कामों का अंतिम दिन होने के कारण यह समय विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इस समय को पितरों की वापसी का समय माना जाता है और उनके प्रति हमारे सम्मान का आखिरी पक्ष होता है। इस अमावस्या के दिन को पितृ पक्ष हेतु अत्यंत शुभ समय माना जाता है, क्योंकि इस दिन किसी भी मृत व्यक्ति का श्राद्ध कार्य किया जा सकता है फिर चाहे उस मृत व्यक्ति की तिथि ज्ञात हो या न हो। 

तर्पण की अंतिम आहुति

सर्व पितृ अमावस्या का दिन श्राद्ध पक्ष की पूर्णाहुति का समय होता है। इस समय पर पवित्र नदियां एवं धर्म स्थलों पर श्रद्धालुओं का विशेष रूप से आगमन होता है। इस समय पर पितरों के तर्पण/Tarpan से जुड़े कार्यों के साथ ही श्रद्धालु पवित्र स्थलों पर स्नान एवं अनुष्ठान इत्यादि कार्यों को करते हैं। जो लोग किसी कारणवश अपने पितरों की तिथि पर श्राद्ध कार्य न कर पाए हों या जिनके पितरों की तिथि का उन्हें ज्ञान नहीं होता है, वह सभी लोग इस दिन श्राद्ध  एवं तर्पण के कार्य करके पितरों के लिए मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। इस दिन अपने पूर्वजों की याद में श्रद्धा विश्वास के साथ किया गया दान, तर्पण, स्नान, श्राद्ध जप-तप इत्यादि अत्यंत ही शुभ फलदायी कार्य साबित होता है। इस कार्य द्वारा व्यक्ति को जीवन में अपने पितरों का आशीष प्राप्त होता है और पितरों को इस कार्य द्वारा तृप्ति प्राप्त होती है। 

पितृ विसर्जन का धार्मिक महत्व

शास्त्रोक्त विचारों द्वारा ज्ञात होता है की यदि व्यक्ति प्रत्येक मास, अमावस्या या अन्य कोई श्राद्ध तर्पण कार्य यदि किसी कारणवश नहीं कर पाते हैं, तो उनके लिए आश्विन मास में आने वाले पितृपक्ष/Pitra Paksha के दौरान किया जाने वाला श्राद्ध अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। उस पर भी आश्विन मास की अमावस्या के दिन पितृ विसर्जन/Pitra Visarjan से जुड़ा कार्य अवश्य करना चाहिए, जिससे उसके पितरों को उत्तम गति हो और उसे पितरों का आशीर्वाद प्राप्त हो सके। 

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पितृ दोष से मुक्ति का दिन 

इस समय पितरों का आगमन अपने कुल के लोगों द्वारा किए जाने वाले पिंडदान की प्राप्ति की आशा में होता है। ऐसे में जो भी अपने पितरों हेतु पिण्डदान करता है, उसे ऋण से मुक्ति प्राप्त होती है, किंतु जो लोग यह कार्य नहीं करते हैं, उन्हें पितृ दोष की प्राप्ति होती है और जीवन में अनेकों कष्टों का सामना करना पड़ता है। इसलिए पितरों की आशा अनुसार तिलांजली देना अत्यंत आवश्यक कार्य होता है, जो इस श्राद्ध पक्ष में संपूर्ण किया जाना आवश्यक होता है। अमावस्या के दिन अपने पितरों को याद करते हुए उनसे अपने अपराध बोध की क्षमा याचना करना एवं उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करते हुए तर्पण दान कार्य करना उत्तम होता है। पितृदोष/Pitra Dosha से मुक्ति के लिए महालय श्राद्ध उत्तम समय माना गया है। इस दिन पितृ दोष शांति के लिए पितरों का पिंडदान करना अत्यंत प्रभावशाली उपाय बनता है। 

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