27 अगस्त को पड़ने जा रही है भादों की अमावस्या जानें इसका महत्व

कुशोत्पाटिनी अमावस्या

इस विषय में जानने से पहले जान लीजिए कि कुशोत्पाटिनी अमावस्या क्या है और इसका क्या महत्व है। सभी जानते हैं कि चंद्रमा 28 दिनों में पृथ्वी ग्रह का एक चक्कर पूरा करता है। पृथ्वी की परिक्रमा के दौरान जब चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच में आ जाए तो पृथ्वी वाले हिस्से में अंधेरा रहता है जिसके कारण हमें चंद्रमा नहीं दिखाई पड़ता। इस घटना को हम अमावस्या/Amavasya 2022 कहते हैं। इस अमावस्या को कई नामों से भी जाना जाता है, जिसमें से सबसे विख्यात है कुशग्रहणी अमावस्या

कुशग्रहणी अमावस्या

कुश का अर्थ होता है (घास) इस वजह से इसे कुशोत्पाटिनी अमावस्या/Kushotpatini Amavasya भी कहते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन को साल भर धार्मिक कार्यों के लिए कुश को इकट्ठा कर लिया जाता है। (ॐ हूं फट्) मंत्र से कुश ग्रहण करना चाहिए। पुरुषोत्तम मास को छोड़कर वर्ष भर में कुल बारह अमावस्या होती हैं, जिनका अलग-अलग नाम है। भाद्रपद मास की अमावस्या को कुशोत्पाटिनी अमावस्या अथवा कुशोत्पाटिनी अमावस्या कहा गया है। इसे पिठोरी अमावस्या या पोला/Pola पिठौरा भी कहा जाता है। विष्णु पुराण से स्पष्ट होता है कि देवताओं द्वारा चंद्रमा का नित्य अमृत पान करते रहने से चंद्रदेव की कलाएं क्षीण होती हैं और फिर अमावस्या तक पूर्ण क्षीण होते ही सूर्य देवता शुक्ल प्रतिपदा से चंद्रमा को पुन: पोषण कर पुष्ट कर देते हैं। फिर आधे माह के एकत्र अमृत तत्व का पान देवता गण करते हैं। इसके बाद पुन: सूर्य देवता चंद्रमा को पुष्ट कर देते हैं। जिस समय दो कलामात्र अवशिष्ट चंद्रमा सूर्य मंडल में प्रवेश करके उसकी अमा नामक किरण में निवास करते हैं, वही तिथि अमावस्या कहलाती है।

पितृ दोष से मुक्ति के लिए सर्वश्रेष्ठ होती है कुशोत्पाटिनी अमावस्या

27 अगस्त को शनि अमावस्या के साथ कुशोत्पाटिनी अमावस्या पड़ रही है। वर्ष भर में पितरों के नाम श्राद्ध-पिंडदान के लिए जो तिथि उपयुक्त बताई जाती है, उसमें कुशोत्पाटिनी अमावस्या भी एक है। इस दिन नदी अथवा जल राशि में पिंडदान, तर्पण, श्राद्ध कराना उत्तम माना गया है। इससे पितृ दोष/Pitra Dosha से मुक्ति मिलती है। ज्योतिषिय शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि पितृगण इस अमावस्या की तृप्ति से प्रसन्न होकर सपरिवार प्रगति पथ पर अग्रसर रहने का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। लेकिन इसके लिए आपको सही तिथि और सही समय का ज्ञात होना अनिवार्य होता है। 

 

ज्योतिषाचार्य डॉ. विनय बजरंगी/Dr. Vinay Bajrangi के अनुसार भाद्रपद मास की अमावस्या तिथि 26 अगस्त शुक्रवार की सुबह 11 बजकर 24 मिनट से शुरू होगी और 27 अगस्त शनिवार की दोपहर 12 बजकर 46 मिनट तक रहेगी।

 

अमावस्या तिथि प्रारंभ: 26 अगस्त, दोपहर 12:24 से

अमावस्या तिथि समाप्त: 27 अगस्त, दोपहर 01:47 तक

पूजा शुभ मुहूर्त: 27 अगस्त, प्रातः 07:33 से सुबह 09:09 तक

 

चूंकि अमावस्या तिथि का सूर्योदय (उदया तिथि) 27 अगस्त को है इसलिए इसी दिन ये तिथि मानी जाएगी। इस व्रत के पुण्य प्रभाव से निसंतानों को संतान की प्राप्ति होती है। इसके अलावा संतान की दीर्घायु और अच्छे स्वास्थ्य का भी आशीर्वाद मिलता है। कुशोत्पाटिनी अमावस्या का यह व्रत/Vrat और पूजन केवल विवाहित महिलाएं ही करती हैं। लेकिन इस अमावस्या पर बन रहे हैं कुछ खास योग। चलिए जानते हैं उन योगों के बारे में।

कुशोत्पाटिनी अमावस्या पर बन रहे हैं ये योग

ज्योतिषाचार्य डॉ. विनय बजरंगी के अनुसार इस दिन शिव योग बन रहा है। शिव योग/Shiva Yoga शक्ति, ज्ञान एवं ऊर्जा प्रदान करने वाला होता है। इस योग के फलस्वरूप व्यक्ति को प्रत्येक कार्य में विजय एवं सफलता प्राप्त होती है।

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