राहु क्यों बनता है पितृ दोष का कारण ?

Rahu Surya ki Yuti

पितृदोष कुडली का एक ऎसा दोष होता है जो जीवन के सभी सुखों पर अपना असर अवश्य डालता है। इस दोष का निर्माण राहु के प्रभाव से बनने पर व्यक्ति को कई तरह की परेशानियों से गुजरना पड़ सकता है। पितृ दोष भाग्य के सुखद फलों को कम कर देने वाला होता है। हिंदू धर्म अवधारणा के अनुसार सृष्टि में उत्पन्न होने पर हम पर अपने पितरों का ऋण होता है और जब संतती की प्राप्ति होती है तो इन ऋणों में से कुछ का निवारण भी होता है। कई बार जब व्यक्ति एवं कुल की ओर से पूर्वजों की अनदेखी की जाती है। बड़े बुजुर्गों का तिरस्कार किया जाता है तो इस स्थिति में पितरों का दोष अवश्य प्राप्त होता है। यही दोष आने वाली संतति को प्राप्त होता जाता है। आने वाली संतानों की कुंडली में इस दोष का प्रभाव भी देखने को मिलता है।

जन्म कुंडली में अनेक प्रकार के योग निर्मित होते हैं जो ग्रहों की स्थिति परिस्थिति के अनुसार अपना असर दिखाते हैं। जब कुछ विशेष ग्रहों का योग किसी विशेष ग्रह के साथ बनता है तो ऐसे में जो योग निर्मित होता है उसका गंभीर असर जीवन में देखने को मिलता है। अब ऎसे में राहु का असर जब कुंडली में सूर्य शनि के साथ निर्मित होता है तो ये योग कुंडली में खराब दोषों का निर्माण करते हैं जो पितृ दोष एवं पितृ ऋण के रुप में जाने जाते हैं। कुंडली में बनने वाला पितर दोष व्यक्ति के जीवन को बहुत तरह से प्रभावित कर सकता है। इस दोष के प्रभाव स्वरूप शुभ फलों का मिलना मुश्किल होता है। जीवन में कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

राहु से बनने वाला पितृदोष/Rahu Surya ki Yuti

जन्म कुंडली में पितृ दोष की स्थिति कई तरह से निर्मित होती है। ग्रहों का विशेष संयोग कुंडली में इस दुर्भाग्य पूर्ण दोष को बनाने वाला होता है। यह दोष राहु के द्वारा कई तरह से बनता है। कुंडली में राहु कई तरह की स्थितियों के आधार पर पितृ दोष को समझा जा सकता है।

राहु सूर्य का इन भाव स्थानों पर होने से बनता है पितृ दोष 

राहु के साथ सूर्य/Rahu Surya ki Yuti जब का युति बनता है तो यह एक खराब योग में गिना जाता है। इस योग को ग्रहण दोष तो कहा ही जाता है इसके अलावा इसे पितृ दोष भी कहते हैं। राहु के साथ सूर्य/Rahu Surya ki Yuti जब किसी व्यक्ति की कुंडली/Kundli के लग्न, पंचम और नवम भाव में होते हैं तो पितृ दोष का निर्माण करता है।

ज्योतिष अनुसार सूर्य आत्मा और पिता का कारक होता है। ऐसे में सूर्य पर पीड़ा का प्रभाव व्यक्ति पर काफी खराब रुप से दिखाई दे सकता है। कुंडली में जब राहु के साथ सूर्य/Rahu Surya ki Yuti नवम भाव मे युति योग बनाता है तो इस स्थिति में खराब पितृ दोष का निर्माण होते देखा जा सकता है। पितरों की पीड़ा व्यक्ति के जीवन को भी खराब कर देने वाली होती है। कई जन्म कुंडलियों में इस स्थिति को देखा जा सकता है जब माता-पिता एवं संतान सभी की कुंडली में पितृदोष/Kundli me Pitra Dosha का निर्माण किसी न किसी रुप में हो रहा होता है।

 

एक अन्य विचार अनुसार जन्म कुंडली में यदि राहु केंद्र भाव में हो अथवा त्रिकोण भाव स्थान में हो तथा उसकी स्थिति नीचस्थ बन रही हो तो ऐसी स्थिति में पितृ दोष का निर्माण होता है। अब इस भाव में विशेष रुप से पंचम और नवम का काफी महत्वपूर्ण माना गया है। इन दोनों स्थानों में से किसी में राहु का होना पितृ दोष की उत्पत्ति करता है। जन्म कुंडली के नवम भाव द्वारा को विशेष रुप से पिता का भाव कहा गया है। गुरु पिता पूर्वजों का प्रभाव इस भाव से देखा जाता है। अब जब इस भाव में राहु स्थित होता है तो इसे पितृ दोष की उत्पत्ति के कारण रुप से भी देखा जाता है। इसी प्रकार राहु जब कुंडली के पंचम भाव में/Rahu in the fifth house होता है तो भी ये स्थिति पितृ दोष का निर्माण करने वाली होती है।

 

जन्म कुंडली में राहु का योग जब चंद्रमा से होता है/Kundli me Rahu Chandra ki yuti तो भी पितृ दोष का असर पड़ता है। चंद्रमा को माता का कारक भी कहा गया है। कुंडली में जब चंद्रमा राहु से पीड़ित होता है तो इस स्थिति में यह पितृ दोष के प्रभाव दिखाने वाली स्थिति होती है।

 

राहु का संबंध जब कुंडली में शनि के साथ होता है/Kundli me Rahu Shani ki yuti या बृहस्पति के साथ होता है तो ये स्थिति भी पितृ दोष के प्रभाव देने वाली मानी जाती है। कुछ ग्रंथों में राहु का द्वितीय भाव में होना अथवा आठवें भाव में होना भी पितृ दोष के फलों को दिखाने वाली स्थिति को निर्मित करते हैं।

पितृ दोष का प्रभाव 

कुंडली में बनने वाला ये दोष काफी बुरे फलों को देने वाला होता है। पितृ दोष के प्रभाव का जिस भी भाव में निर्माण हो रहा है उस भाव को तो खराब करता ही है साथ ही जीवन के अन्य क्षेत्रों पर भी अपना बुरा असर दिखाने में आगे रहता है। इस दोष के प्रभाव से व्यक्ति का जीवन कष्टमय बन जाता है। जीवन में परेशानियों एवं बाधाओं का सामना बहुत अधिक करना पड़ता है। इस दोष के प्रभाव से विवाह होने में परेशानी झेलनी पड़ सकती है। विवाह का देर से होना/Delay Marriage या वैवाहिक जीवन में कलह क्लेश का असर/Problems in married life सदैव देखने को मिल सकता है। कई बार इस दोष के प्रभाव से विवाह ही नहीं हो पाता है। व्यक्ति को पूरा जीवन अकेले ही गुजारना पड़ सकता है।

इस दोष के बुरे प्रभाव के कारण व्यक्ति को संतान सुख प्राप्ति में भी कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। संतान का मृत होना, संतान का नहीं होना या बहुत देर के बाद संतान का होना, या फिर संतान को रोग दोष होना इत्यादि कारण भी पितृ दोष के कारण झेलने पड़ सकती है। राहु द्वारा निर्मित पंचम या नवम भाव/Navam Bhav का यह दोष व्यक्ति को संतान सुख के लिए बहुत तरसाता है। इसी के अलावा व्यक्ति अपने जीवन में उचित ज्ञान एवं मान सम्मान को प्राप्त नहीं कर पाता है। गरीबी और पतन की स्थिति जीवन को हर पल प्रभावित कर सकती है।

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