कोजागर व्रत – कर्ज व आर्थिक तंगी से मुक्ति दिलाने वाला व्रत

kojagar

आश्विन मास में आने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व कोजागर व्रत/Kojagar vrat भी रहा है। कोजागर पर्व को आश्विन मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। कोजागर अर्थात जागृत होना या जागृत रहने का भाव अधिक सार्थक होता है। इस पर्व पर हमारी चेतना व अनुभूति जागृत हो सकती है। यह समय हर व्यक्ति को साधना संपन्नता की स्थिति प्रदान करने में सक्षम होती है, इसलिए इस दिन को कुछ खास कार्यों को करते हुए मनाया जाता है। 

कोजागर व्रत को कोजागरी पूर्णिमा/Kojagri poornima के रूप में भी जाना जाता है। धार्मिक एवं लोक मान्यताओं के अनुसार माना जाता है कि इस दिन धन की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी जी पृथ्वी पर रात में विचरण करती हैं तथा सुख समृद्धि की वर्षा करती हैं, इसलिए माँ लक्ष्मी के आशीर्वाद को पाने के लिए इस पूर्णिमा के रात्रि में विशेष पूजा एवं अनुष्ठान किए जाते हैं। इस पूर्णिमा के दिन पर कई आध्यात्मिक एवं धार्मिक कार्यों को किया जाता है। इसमें साधना कार्य, मंत्र जाप, पूजा-दान-स्नान इत्यादि शामिल हैं।

धन धान्य और सुखी जीवन का वरदान

कोजागर व्रत का दिन आर्थिक समृद्धि एवं सम्पन्नता हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। इस दिन किया गया लक्ष्मी पूजन सिद्धि कार्यों के लिए उत्तम होता है। अष्ट लक्ष्मी पूजा/Asht Lakshmi Pooja एवं श्री विष्णु पूजन अत्यंत प्रभावशाली होता है। आर्थिक विपन्नता को दूर करने वाला यह व्रत/Vrat समस्त कष्ट समाप्त करने की क्षमता रखता है एवं जीवन में समृद्धि एवं मान सम्मान को प्रदान करता है। 

कोजागरी व्रत शुभ मुहूर्त समय/Kojagri Vrat Shubh muhurat

कोजागर व्रत 19 अक्टूबर 2021 को मंगलवार के दिन रखा जाएगा। 

कोजागर पूजा निशिता काल पूजा 

निशिथ काल पूजा का समय 23:41 से 24:31 तक रहेगा

कोजागर पूजा के दिन चंद्रोदय शाम 17:20  

पूर्णिमा तिथि का आरंभ – 19 अक्टूबर, 2021 को 19:03 

पूर्णिमा तिथि की समाप्ति – 20 अक्टूबर, 2021 को 20:26 

कोजागर व्रत पूजन विधि/Kojagar vrat poojan vidhi

कोजागर पूर्णिमा के दिन प्रात: काल उठकर स्नान इत्यादि कार्यों से निवृत्त होकर पूजा- व्रत का संकल्प धारण करना चाहिए। यदि इस दिन व्रत न रख पाए तो भक्ति भाव द्वारा देवी लक्ष्मी जी का पूजन अवश्य करें। इस दिन मंदिर में देवी की प्रतिमा अथवा चित्र को स्थापित करना चाहिए। देवी लक्ष्मी जी की पूजा में कमल पुष्प, अक्षत, कपूर इत्यादि से पूजन करना शुभदायक साबित हो सकता है। धूप-दीप, मिष्ठान इत्यादि द्वारा देवी का पूजन करना चाहिए। देवी लक्ष्मी को खीर, एवं दूध से बने पदार्थों का भोग भी लगाना चाहिए। वस्त्र, कुमकुम, अक्षत, ऋतुफल और नैवेद्य इत्यादि वस्तुओं को अर्पित करना चाहिए। माता की आरती करनी चाहिए व कथा को पढ़ना व सुनना चाहिए। 

देवी लक्ष्मी पूजा के साथ साथ इस दिन श्री विष्णु भगवान, श्री गणेश, इंद्र देव एवं चंद्र देव का पूजन किया जाता है। रात्रि में चंद्रमा उदय होने पर दीपक प्रज्वलित करना चाहिए तथा चंद्रमा को अर्घ्य प्रदान करते हुए मंत्र जाप इत्यादि कार्य करने चाहिए। इस दिन श्री सूक्त, अष्ट लक्ष्मी स्त्रोत तथा कनकधारा स्त्रोत का पाठ करना उत्तम होता है। संपूर्ण रात्रि देवी का पूजन एवं भजन कीर्तन करते हुए रात्रि जागरण किया जाना चाहिए तथा अगले दिन ब्राह्मण भोज कराने के पश्चात व्रत संपन्न करना चाहिए। 

कोजागर व्रत कथा/Kojagar vrat katha

कोजागर व्रत के दिन कोजागर कथा का बहुत महत्व होता है। इस दिन होने वाली पूजा एवं व्रत के दौरान कोजागर कथा का श्रवण एवं पठन किया जाता है। कोजागर कथा देवी लक्ष्मी जी के पृथ्वी विचरण से संबंधित कथा होती है। इस दिन भक्त देवी लक्ष्मी पूजा, स्त्रोत एवं कथा विशेष  रूप से करते हैं।

कोजागर कथा  (ब्राह्मण की कथा)

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में मगध प्रदेश के एक राज्य में एक योग्य वेदपाठी ब्राह्मण रहा करता था। वह ब्राह्मण अत्यंत दयालु एवं परोपकारी कार्यों को करने वाला व्यक्ति था किंतु उसकी पत्नी कर्कश वाणी की कठोर स्वभाव की स्त्री थी। ब्राह्मण की आर्थिक स्थिति अनुकूल नहीं थी इस कारण उसकी स्त्री इसका सारा दोष अपने पति को देती थी, वह सदैव अपने पति को गलत कार्यों द्वारा धनार्जन करने की सलाह देती थी। एक दिन अपने दांपत्य जीवन के कष्टों एवं पत्नी के कटु वचनों से थक हार कर वह ब्राह्मण घर से निकल कर वन की ओर चल पड़ता है। ब्राह्मण दुखी मन से जब घर से बहुत दूर वन में प्रवेश करता है, तो उसे वहां उस निर्जन स्थान पर नाग कन्याएं मिलती हैं जो उसके दुख को देख कर उसके उस निर्जन घने वन में आने का कारण पूछती हैं। ब्राह्मण अपनी सारी व्यथा उनसे कहता है, ऐसे में नाग कन्याओं ने उस ब्राह्मण को आश्विन मास की पूर्णिमा के दिन श्री लक्ष्मी पूजन एवं जागर करने को कहा और कोजागर व्रत की समस्त विधि उसे बताकर वहां से प्रस्थान कर जाती हैं। 

ब्राह्मण यह सब सुनकर अपने घर के ओर पुन: लौट आता है और आने वाले आश्विन मास की पूर्णिमा/Purnima के दिन देवी लक्ष्मी का पूजन करता है और समस्त रात्रि देवी स्त्रोत व जागरण करता है। ब्राह्मण की निष्ठा एवं भक्ति से प्रसन्न होकर माता उसे धन धान्य का आशीर्वाद प्रदान करती हैं तथा व्रत के प्रभाव से उनका जीवन सुखमय हो जाता है। उसकी पत्नी भी शुभ कार्यों को करने वाली बनती है और अपने पति को भी शुभ कार्य को करने को कहती है। इस प्रकार कोजागर व्रत के प्रभाव स्वरूप ब्राह्मण दंपत्ति अपना जीवन धन धान्य से युक्त सुख पूर्वक व्यतीत करते हैं।

दो बहनों की कथा 

 कोजागर पूर्णिमा की एक अन्य कथा दो बहनों से संबंधित कथा है। इस कथा के अनुसार  एक साहूकार की दो कन्याएं थी। दोनों बहने पूजा पाठ करती थी लेकिन छोटी बहन कई बार पूजा पाठ तथा पूर्णिमा का व्रत अधूरा ही करती थी जब दोनों बहनों का विवाह हुआ तो तब भी दोनों बहने अपने अपने घरों में पूर्णिमा व्रत एवं पूजा पाठ करती थीं किंतु छोटी अभी भी व्रत को अधूरा ही कर पाती थी। कुछ समय व्यतीत होने के बाद दोनों के घर संतान जन्म हुआ लेकिन छोटी बहन की संतानें जन्म लेते ही मृत्यु को प्राप्त हो गई थी। अपने कष्ट के बारे में उसने पंडितों से पूछा तो उन्होंने कहा की वो व्रत कार्य अधूरा छोड़ती रही है, जिसके परिणामस्वरूप उसे संतान कष्ट के रूप में भुगतना पड़ रहा है। इस कष्ट से मुक्ति पाने के लिए उसे पूर्णिमा के दिन व्रत को संपूर्णता से करना होगा। ऐसा करने से उसे संतान सुख की प्राप्ति होगी।

पंडितों द्वारा बताए गए विधि विधान से उसने पूर्णिमा का व्रत किया लेकिन संतान फिर से जन्म के पश्चात मृत्यु को प्राप्त हो जाती, तब वह अपने मृत बच्चे को पीढ़े पर लिटा कर कपड़े से ढक देती है और अपनी बड़ी बहन को बुलाती है। बहन उसके बुलाने पर तुरंत उसके पास आ जाती है। छोटी, बड़ी बहन को पीढ़े पर बैठने को कहती है।

जब वह बैठने लगती है तो उसकी चुनरी का कोना बच्चे से लग जाता है और बच्चा रोने लगता है। अपनी संतान को पुनर्जीवित देख छोटी बहन बड़ी को बहुत धन्यवाद करती है और कहती है कि बहन तेरी शुभता से मेरी संतान को पुनः जीवित हो गई। वह अपनी बड़ी बहन से कहती है कि तुमने जो पूर्णिमा के व्रत संपूर्णता व भक्ति के साथ किए उनका फल मुझे भी मिला है। तब से छोटी भी अपनी बड़ी बहन की तरह पूर्णिमा का व्रत पूर्णता एवं भक्ति भाव से करने लगी और दोनों बहनों का जीवन व्रत के प्रभाव स्वरूप सुखमय व्यतीत होता है। इसी प्रकार जो भी अपने जीवन में इस व्रत को श्रद्धा पूर्वक करता है, उसका जीवन भी सुखमय हो जाता है।

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