केतु ग्रह की शांति के सरल उपाय

Ketu ka Prabhav

भारतीय ज्योतिष के अनुसार राहु और केतु को छाया ग्रह माना गया है. खगोल शास्त्र के अनुसार सूर्य एवं चंद्र के परिक्रमा पथों के आपस में काटने से दो बिन्दुओं का निर्माण होता है उनमें से एक बिंदु को राहु और दूसरे बिंदु को केतु कहा गया है. किसी भी जन्म कुंडली में यह दोनों ग्रह एक दूसरे से 06 राशि (180 अंश) की दूरी पर रहते हैं. क्योंकि ये ग्रह कोई खगोलीय पिंड न होकर संवेदनशील बिंदु हैं और इनका मनुष्य जाति पर गहन प्रभाव पड़ता है इसलिए वैदिक ज्योतिष में इन्हे ग्रहों की उपाधि से विभूषित किया गया है. सूर्य और चन्द्रमा के अंतरिक्ष में अपने-अपने भ्रमण पथ पर गतिशील होने के कारण राहु और केतु की स्थिति भी साथ-साथ बदलती रहती है। पाश्चात्य ज्योतिष में राहु और केतु को उत्तरी एवं दक्षिणी लूनर नोड के नाम से जाना जाता है.

 

केतु ग्रह अपना स्वतंत्र फल देने के अलावा कुंडली में जिस भाव में स्थित होता है और जैसे ग्रहों की युति या दृष्टि में होता है उनके अनुरूप भी फल प्रदान करता है. केतु ग्रह को वैदिक ज्योतिष में एक अशुभ व क्रूर ग्रह की संज्ञा दी गई है. लेकिन केतु हमेशा ही जातक को बुरे फल प्रदान नहीं करता है. अगर कुंडली में केतु शुभ और बलवान हो तो यह व्यक्ति को शुभ फल भी प्रदान कर  सकता है. भारतीय ज्योतिष के अनुसार केतु अध्यात्म, वैराग्य, मोक्ष, आयुर्वेद, गूढ़ विषय व तांत्रिक विद्या का कारक है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार केतु ग्रह को किसी भी राशि का स्वामित्व प्राप्त नहीं है। लेकिन कुछ प्राचीन ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार केतु धनु राशि/Dhanu Rashi में उच्च और मिथुन राशि में नीच का होता है. मतांतर से केतु को वृश्चिक राशि में उच्च और वृषभ राशि में नीच का माना जाता है. केतु अश्विनी, मघा और मूल नक्षत्र/Nakshatra का स्वामी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार केतु ग्रह को स्वरभानु नामक राक्षस का धड़ माना जाता है. जबकि इसके सिर वाले हिस्से को राहु कहा जाता है. किसी भी कुंडली में राहु और केतु/Kundli me rahu Ketu दोनों मिलकर कालसर्प दोष का निर्माण करते हैं जिसका प्रभाव अक्सर कष्टकारी होता है.

 

केतु सूर्य व मंगल के समान अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। केतु के कारण व्यक्ति, आध्यात्मिक, अंतर्मुखी, गूढ़ व रहस्यमयी स्वभाव का होता है. केतु एक क्रूर व उग्र प्रकृति का ग्रह है इसलिए केतु के प्रभाव/Ketu ka Prabhav के कारण जातक जल्दी आक्रोशित हो जाने वाला होता है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार केतु ग्रह की अपनी कोई राशि नहीं है इसलिए यह जिस राशि में विराजमान होता है उस राशि स्वामी की प्रकृति के अनुसार भी फल प्रदान करता है. यदि किसी व्यक्ति के प्रथम यानी लग्न भाव, लग्नेश, सूर्य व चन्द्रमा पर केतु का प्रभाव/Ketu ka Prabhav हो तो ऐसा व्यक्ति सांसारिक सुखों से विरक्त होकर अध्यात्म की ओर मुड़ जाता है. केतु ग्रह कुंडली में/Kundli me Ketu जिस ग्रह को अपने प्रभाव में ले रहा हो उस ग्रह के गुणों व कारकत्वों में कमी आ जाती है. केतु ग्रह की पीड़ा बहुत तीव्र, आकस्मिक और गहन होती है लेकिन कुछ प्रभावशाली उपायों के माध्यम से इसकी पीड़ा में कमी लाई जा सकती है.  केतु ग्रह की शांति के लिए भगवान श्री गणेश जी की पूजा सर्वाधिक लाभकारी होती है.

 

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार प्रत्येक ग्रह का एक देवी/देवता से गहन संबंध होता है. उस ग्रह की ऊर्जा या उसके गुण उस देवी/देवता की ऊर्जा व गुणों से मिलते-जुलते हैं. गणेश जी को केतु के अधिपति देवता माना गया है क्योंकि पौराणिक कथाओं के अनुसार केतु के पास सिर्फ धड़ है सिर नहीं है और श्री गणेश जी के पास भी सिर्फ धड़ था सिर नहीं था क्योंकि उनके पिता देवादिदेव महादेव ने उनका सिर काट दिया था और बाद में उन्हें गजमुख लगाया गया. गणेश जी की नियमित रूप से पूजा करने से केतु ग्रह का प्रकोप शांत होने लगता है. केतु ग्रह की शांति के लिए श्री गणेश चालीसा, श्री गणेश अथर्वशीर्ष, संकटनाशन श्री गणेश स्तोत्र का पाठ बेहद कल्याणकारी होता है. गणेश जी के मंत्रों का जाप करने से भी केतु ग्रह के दुष्प्रभावों/Ketu ka Prabhav से मुक्ति मिलती है. हिंदू संस्कृति में भगवान गणेश प्रथम पूज्य देव हैं और राशि चक्र(भचक्र) की शुरुआत भी केतु के प्रथम अश्विनी नक्षत्र/Ashwini Nakshatra से होती है इसलिए भगवान गणेश जी इस ग्रह के देवता हैं. केतु जीवन चक्र की एक अवस्था की समाप्ति के बाद दूसरे चक्र के प्रारंभ को दर्शाता है. गणेश जी की पूजा-अर्चना करने से केतु ग्रह की पीड़ा कम होने लगने लगती है.

 

यह भी पढ़ें: जन्म कुंडली के किस भाव में केतु की स्थिति शुभ होती है?

Leave a Reply