यदि कुंडली के तीसरे भाव में केतु हो तो क्या व्यक्ति का कोई मित्र नहीं होता है?

Ketu ka prabhav

कुण्डली का तीसरा भाव पराक्रम भाव है। इस भाव से व्यक्ति के साहस, बल, शारीरिक शक्ति, पराक्रम आदि का विचार किया जाता है. इस भाव से छोटे भाई-बहनों का सुख और छोटी यात्राओं का विचार भी किया जाता है. यह भाव मनुष्य के शौर्य, निडरता व साहस की गाथा बयान करता है. इस भाव से बाहुबल का विचार किया जाता है. यह भाव आपके मानसिक रुचियों व शौक के बारे में जानकारी देता है. इस भाव के कमजोर होने पर मनुष्य में साहस, शक्ति, हिम्मत व पराक्रम की कमी होती है. यह भाव कठिन विषयों को समझने की क्षमता भी प्रदान करता है. इस भाव के बलवान होने से मनुष्य में लीडरशिप क्वालिटी होती है. यह भाव आपकी लेखन शक्ति से भी जुड़ा है. यह भाव कला, गायन व संगीत के प्रति भी रुझान पैदा करता है.

 

यह भाव छाती का उपरी भाग, कान, कंधे व भुजाओं को दर्शाता है. यह भाव छोटे भाई-बहनों की संख्या व उनसे प्राप्त होने वाले सुख-दुःख की जानकारी भी प्रदान करता है. कालपुरुष कुंडली के अनुसार इस भाव में मिथुन राशि आती है जिसका संबंध मनुष्य की मानसिक क्षमता व बौद्धिकता से है इसलिए यह भाव किसी भी व्यक्ति के मानसिक बल या मानसिक शक्ति को भी बताता है. इस भाव का कारक मंगल है. इस भाव की गणना त्रिषडाय, आपोक्लिम, व उपचय स्थानों में होती है. इस भाव में क्रूर व पाप ग्रहों का बैठना शुभ होता है. इस भाव के बलवान होने से व्यक्ति की संघर्षक्षमता उत्तम होती है. यह भाव आपके पड़ोसियों से भी जुड़ा है. इस भाव से बातचीत या वार्तालाप करने का कौशल, संचार से जुड़े क्षेत्र, मीडिया, प्रकाशन, छपाई, न्यूज़ व समाचार पत्रों से जुड़े क्षेत्र आदि का विचार भी किया जाता है.

 

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार केतु एक छाया ग्रह है जो क्रूर, उग्र व अलगाववादी स्वभाव वाला है. केतु के बुरे प्रभाव/Ketu ka prabhav से व्यक्ति को अपने सांसारिक जीवन में कई बड़े संकटों का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि कुंडली में केतु/Kundli me Ketu की शुभ स्थिति व्यक्ति को ऊंचाईयों पर भी ले जाती है. केतु यदि अनुकूल हो तो व्यक्ति अध्यात्म, आयुर्वेद, चिकित्सा, हीलिंग से जुड़े क्षेत्र, गूढ़ विज्ञान व रिसर्च संबंधी क्षेत्र आदि के माध्यम से ख्याति अर्जित करता है. केतु के अशुभ प्रभाव के कारण व्यक्ति को विवाद, मुकदमेबाजी, अनावश्यक झगड़ा, वैवाहिक जीवन में अशांति/Married life issues, भूत-प्रेत बाधा आदि समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. केतु चोट, दुर्घटनाएं, बुखार, घाव, पथरी, गुप्त व असाध्य रोग व पित्त संबंधी समस्याएं देता है.

 

केतु कुंडली के जिस भाव में स्थित होता है उस भाव से जुड़े कराकत्वों में कुछ न कुछ कमी रहती है. केतु प्रभावित भाव/Ketu ka prabhav से जुड़े अंग में किसी प्रकार की चोट, निशान, तिल, वर्ण आदि चिन्ह हो सकते हैं. केतु आध्यात्मिकता से जुड़ा ग्रह है इसलिए शुभ केतु का प्रभाव/Ketu ka prabhav व्यक्ति को धर्म व अध्यात्म से जोडता है। लग्न या नवम भाव/Navam bhav पर केतु का शुभ प्रभाव हो तो ऐसा व्यक्ति उच्च कोटि की आध्यात्मिक आत्मा हो सकता है. 

 

केतु का प्रतीकात्मक चिन्ह झंडा होता है जोकि उच्चता व ऊंचाई का सूचक है इसलिए केतु का शुभ प्रभाव/Ketu ka prabhav व्यक्ति को सफलता के शिखर पर पहुंचा सकता है. केतु सूर्य व चंद्र से शत्रुता रखता है और यह मंगल ग्रह की तरह प्रभाव डालता है. केतु वृश्चिक व धनु राशि में उच्च का और वृष व मिथुन में नीच का होता है. जन्म कुंडली/Janam Kundli के 6, 8, 12 भाव में केतु की स्थिति को सांसारिक विषयों के लिए शुभ नहीं माना गया है. इन भावों में स्थित केतु अधिकतर सांसारिक विषयों के लिए कष्टकारी होता है.

 

दोस्तों व मित्रों का भाव तीसरा नहीं ग्यारहवां होता है. हालांकि तीसरे भाव में बैठा केतु मित्रों के सुख से वंचित कर सकता है क्योंकि केतु अलगाववादी, अंतर्मुखी और एकांतवादी ग्रह है इसलिए अलगाव कराना इसका एक गुण है. तीसरे भाव में बैठा केतु/Tisare bhav me ketu अपनी नवम दृष्टि से ग्यारहवें भाव को देखता है इसलिए व्यक्ति का अपने मित्रों से अलगाव हो सकता है या वह खुद मित्र बनाने से झिझक सकता है. लेकिन यह स्थिति तभी आएगी जब एकादश भाव/gyarahva bhav का स्वामी यानी एकादशेश व मित्रों का कारक बुध ग्रह भी कुंडली में कमजोर अवस्था में हो.

 

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