मैं अपने केतु ग्रह को कैसे शांत कर सकता हूँ?

केतु ग्रह

राहु और केतु ग्रह को छाया ग्रह माना गया है. किसी भी जातक की कुंडली में राहु और केतु तीव्र कार्मिक प्रभाव उत्पन्न करते हैं. पौराणिक कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान ही राहु और केतु की उत्पत्ति हुई थी. ये दोनों एक ही दानव के दो हिस्से हैं. समुद्र मंथन के दौरान राक्षसों की पंक्ति में बैठा एक राक्षस रूप बदल कर देवताओं की पंक्ति में बैठा गया और उसने मोहिनी रूप धारी भगवान विष्णु को धोखा देकर अमृत का पान कर लिया। जैसे ही भगवान विष्णु को इसका पता चला उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से उस राक्षस का सिर धड़ से अलग कर दिया. इस घटना के बाद उस दानव का सिर वाला हिस्सा राहु और धड़ वाला हिस्सा केतु कहलाया. केतु के इस पौराणिक परिचय के बाद अब केतु ग्रह की शांति की बात करते हैं.

 

किसी भी ग्रह को शांत करने के लिए आपको उस ग्रह के स्वभाव, उसकी प्रकृति व एनर्जी को समझना बेहद आवश्यक है. केतु ग्रह अग्नि तत्व प्रधान, उग्र स्वभाव वाला व शुष्क ग्रह है. केतु ग्रह वैराग्य, सन्यास, अलौकिकता, धर्म, दर्शन, एकांत, योग, ज्योतिष, तंत्र-मंत्र, आत्मज्ञान, मोक्ष व आध्यात्मिकता का कारक ग्रह है इसलिए सांसारिक विषयों में इस ग्रह की अरुचि है.यही कारण है कि केतु सांसारिक विषयों से जुड़े मामलों के लिए सामान्यतः कष्टकारी साबित होता है. केतु जिस ग्रह को युति व दृष्टि द्वारा अपने प्रभाव में लेता है उसके कारकत्वों को नष्ट करके उस ग्रह को ग्रहण लगा देता है. यह धनु राशि में उच्च का माना जाता है और मिथुन राशि/Mithun Rashi में नीच का होता है. मतांतर से वृश्चिक और वृषभ क्रमशः इसकी उच्च और नीच राशि मानी जाती है. राहु किसी भी व्यक्ति के द्वारा किए गए पापों को चित्रित करता है तो केतु उन पापों को निरस्त करने या उससे मुक्ति की विधि बताता है.

 

इस प्रकार ये दोनों ग्रह सृष्टि चक्र में एक संतुलन बनाने का प्रयास करते हैं. राहु सांसारिक माया है और सांसारिक समृद्धि देता है तो केतु सांसारिक विषयों के प्रति विरक्ति देता है. किसी भी व्यक्ति के जीवन की सभी प्रमुख घटनाएं राहु-केतु द्वारा गृहीत भावों से संबंधित होती है. राहु शुक्र का चेला है तो केतु देवगुरु बृहस्पति का चेला है. देवगुरु बृहस्पति के समान ही आध्यात्मिक ग्रह होने के कारण यह धनु राशि/Dhanu Rashi में उच्च का होता है. राहु सूर्य से तो केतु चंद्रमा से विशेष शत्रुता रखता है. कुंभ और मीन राशि को केतु की मूल त्रिकोण राशि माना गया है. ऐसा अनुभव में आया है कि कई बार केतु सांसारिक मामलों के लिए इतना कष्टकारी होता है कि उस घटना से संबंधित अनुभव को व्यक्ति सरलता से भुला नहीं पता है. यह मंगल के समान अग्नि कारक, ऊर्जावान व विस्फोटक प्रकृति का ग्रह है इसलिए यह चोट, दुर्घटनाएं, घाव, सर्जरी व जटिल रोग भी देता है. यह साधु, सन्यासियों व आध्यात्मिक गुरुओं का भी प्रतिनिधित्व करता है.

 

अगर केतु की स्थिति आपकी पत्रिका में ठीक नहीं है और ये आपको अशुभ प्रभाव दे रहा है तो आप इसकी शांति के लिए मंगलमूर्ति श्री गणेश जी की नियमित पूजा व ॐ गं गणपतये नमः मंत्र का एक माला(108 बार) जाप कर सकते हैं. इसके अलावा आप मंगलवार के दिन/Tuesday Fast किसी भी गणेश मंदिर में काले व सफ़ेद तिलों से बने लड्डू(मोदक) गणेश जी को अर्पित कर सकते हैं. रोजाना या मंगलवार के दिन श्री संकटनाशन गणेश स्तोत्र का 7 या 11 बार पाठ करने से केतु के दुष्प्रभाव/Ketu ke Dushprabhav से मुक्ति मिलती है. राहु व केतु को गरीबों व असहायों का मसीहा कहा गया है इसलिए जहाँ तक हो सके नेत्रहीन, निर्धन व असहाय लोगों की मंगलवार के दिन अवश्य ही सेवा करनी चाहिए।

 

क्योंकि केतु साधु, संतों व आध्यात्मिक गुरुओं का प्रतिनिधित्व करता है इसलिए रोजाना या मंगलवार के दिन किसी भी आध्यात्मिक व्यक्ति को भोजन खिलाने या उसकी सेवा करने से केतु ग्रह का प्रकोप शांत होने लगता है. इसके अलावा आप रोजाना या मंगलवार की रात्रि को केतु ग्रह के इन मंत्रों ( ॐ कें केतवे नम: या ॐ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं स: केतवे नम:) का भी एक माला (108 बार) जाप कर सकते हैं. इसके अलावा रोजाना या मंगलवार के दिन कुत्तों की सेवा करने से भी केतु के दुष्प्रभावों/Ketu ke Dushprabhav से मुक्ति मिलती है. केतु के दुष्प्रभाव/Ketu ke Dushprabhav व केतु दोष/Ketu Dosha से मुक्ति के लिए कंबल, छाता, लोहा, उड़द, गर्म कपड़े, कस्तूरी, लहसुनिया आदि का दान करना भी शुभ माना गया है.


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