घर के दिशा का क्या है वास्तु और आपके जीवन से संबंध

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वास्तु/Vastu विज्ञान में आठ  दिशाओं अर्थात उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम तथा चार कोणीये दिशाओं उत्तर – पूर्व (ईशान), दक्षिण पूर्व (आग्नेय), दक्षिण पश्चिम (नैऋत्य), और उत्तर पश्चिम (वायव्य) के आधार पर पूरे वास्तु की गणना की जाती है। प्रत्येक दिशा पर अलग – अलग देवताओं व ग्रहों का प्रभाव रहता है जिस प्रकार ग्रहों के अनुकूल और प्रतिकूल प्रभाव मानव जीवन पर पड़ते हैं, उसी प्रकार ग्रह अपने शुभ और अशुभ प्रभाव से वास्तु की दिशाओं को प्रभावित करते हैं।

क्या है वास्तु के दिशा का अर्थ?

चलिए अलग अलग दिशा और उनके अर्थ को जानते हैं।

पूर्व दिशा

जिस घर का मुख्य द्वार पूर्व की ओर हो तथा उसी तरफ बड़ी – बड़ी खिड़कियाँ एवं झरोखे हों तो उसमे वास करने वाले को अच्छे स्वास्थ्य, पराक्रम, तेजस्विता, सुख -समृद्धि, बुद्धि – विवेक, धन – धन्य, भाग्य एवं गौरवपूर्ण जीवन की प्राप्ति होती है।

पश्चिम दिशा

पश्चिम दिशा सफलता, प्रसिद्धि, सम्पन्नता तथा उज्जवल भविष्य प्रदान करती है। पश्चिम दिशा में दोष रहने पर मन चंचल रहता है। इस दशा में दोष रहने पर नपुंसकता, पैरों में तकलीफ, कुष्ठ रोग, रीढ़ की हड्डी में कष्ट, गठिया स्नायु एवं वात्  सम्वन्धी रोगों के होने की सम्भावना रहती है।

उत्तर दिशा

इस दिशा में खाली जगह छोड़ने से ननिहाल पक्ष से लाभ मिलता है। उत्तर दिशा दोषपूर्ण रहने पर मातृ सुख, नौकर चाकर के सुख, भौतिक सुख आदि की कमी रहती है। साथ ही हर्नियां , ह्रदय एवं सीने के रोग, चार्म रोग, गॉल ब्लैडर, पागलपन हैजे, फेफड़े एवं रक्त से सम्बंधित बीमारियों की सम्भावना रहती है।

दक्षिण दिशा

घर के दक्षिण में कुआँ, दरार, कचरा, कूड़ादान एवं पुराना कबाड़ हो तो ह्रदय रोग, जोड़ों का दर्द, खून की कमी, पीलिया आदि की बीमारियां होती हैं। इसी कारणवश इस दिशो पर व्यक्ति का खास महत्व होना चाहिए।

ईशान दिशा

ईशान दिशा के स्वामी रूद्र, आयुध त्रिशूल एवं प्रतिनिधि ग्रह बृहस्पति है। यह दिशा बुद्धि, ज्ञान, विवेक धैर्य और साहस का सूचक है। इस दिशा को खुला साफ – सुथरा नीचे एवं कम से कम निर्माण कार्य करना चाहिए। इस दिशा में शौचालय , सेप्टिक टैंक एवं कूड़े – करकट रखने पर सात्विकता में कमी वंश वृद्धि में अवरोध, नेत्र, कान गर्दन एवं वाणी में कष्ट भी होता है।

वायव्य दिशा

वायव्य दिशा का प्रतिनिधि ग्रह चंद्र होता है। चंद्र शुभ होने पर जातक को सुकीर्ति और यश मिलता है। इस दिशा का सम्बन्ध अतिथियों एवं सम्बन्धियों से भी होता है। वायव्य के दोषपूर्ण होने पर फेफड़े, ह्रदय, छाती, सर्दी जुकाम निमोनिया, अपेंडिसाइटिस, डायरिया, स्त्रियों में मानसिक धर्म की अनियमतता एवं स्त्री रोगों की सम्भावना रहती है।

आग्नेय दिशा

आग्नेय दिशा के स्वामी गणेश, आयुध शक्ति एवं प्रतिनिधि ग्रह शुक्र है। शुक्र समरसता तथा परस्पर मैत्री संबंधों का ग्रह माना जाता है। आग्नेय दिशा का सम्बन्ध स्वास्थ्य से है। इस दिशा में किसी तरह का दोष रहने पर वैवाहिक सुख में समस्याए आती है। साथ ही मधुमेह, तिल्ली बहरापन, गूंगापन छाती आदि से सम्बंधित बीमारियों की सम्भावना रहती है।

नैऋत्य दिशा

नैऋत्य दिशा का स्वामी राहु एवं देवता नैऋत्य नामक राक्षस है। नैऋत्य दिशा सभी प्रकार की विषमताओं एवं संघर्षों से जूझने की क्षमता प्रदान करती है। यह दिशा आयु, अकस्मात दुर्घटना, आत्महत्या बाहरी जननेन्द्रियों, बायाँ पैर, किडनी, पैरों की बीमारियों, स्नायु रोग आदि का प्रतिनिधित्व करता है। यह थी दिशा के बारे में कुछ जरूरी बातें, जिन्हें हर व्यक्ति को अपने घर बनवाने और उसमें रहने से पहले जान लेना चाहिए। इसी पर आधारित होता है वास्तु शास्त्र।

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