कैसे तोड़ा गणेश जी ने कुबेर का अहंकार

श्री गणेश जी/Ganesh jiके जीवन से संबंधित अनेकों प्रेरक कथाएं भक्तों को जीवन में आगे बढ़ने में मदद करती हैं। गणेश जी बुद्धि और ज्ञान के दाता हैं। उनके ज्ञान द्वारा समस्त लोकों का कल्याण संभव हो पाता है। श्री गणेश जी सभी शक्तियों को देने वाले देव हैं। वह अपने भक्तों को सुख समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। भगवान गणेश जी की बुद्धि एवं चातुर्य का एक अत्यंत रोचक प्रसंग कुबेर के अहंकार को तोड़ने का मिलता है। इस प्रसंग के बारे में पौराणिक ग्रंथों में विस्तार पूर्वक दिया गया है। आईये जानते हैं कैसे श्री गणेश जी ने कुबेर के अहंकार को तोड़ कर उन्हें उचित मार्ग दिखाया और कैसे श्री गणेश जी के सूझबूझ द्वारा बिना किसी वाद-विवाद के कुबेर/Kuber को परास्त कर दिया एवं उन्हें सच्ची भक्ति का मार्ग भी सिखलाया। 

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धन के देवता हैं कुबेर 

हिंदू पौराणिक ग्रंथों में कुबेर को धन के देवता की उपाधि प्रदान की गई है। कुबेर को धन संपदा को प्रदान करने वाले देव कहा जाता है। इनकी पूजा आराधना द्वारा व्यक्ति के आर्थिक संकट समाप्त हो जाते हैं। कुबेर को उत्तर दिशा के दिक्पाल भी माना गया है, एवं संसार की सुरक्षा हेतु इन्हें लोकपाल की उपाधि भी प्रदान की गई है। कुबेर का प्रसंग रामायण ग्रंथ में भी प्राप्त होता है, जिसके अनुसार उनमें बताया गया है कि कुबेर रावण के भाई थे। एक अन्य प्रसंग के अनुसार जब भगवान शिव तपस्या में लीन थे, उसी दौरान जब माता पार्वती को कुबेर ने अपनी बायें नेत्र से देखा, तो माता के तेज से उनका नेत्र पीला पड़ जाता है और इसी कारण वह एकाक्षीपिंगल कहलाते हैं। रामायण के अनुसार कुबेर द्वारा ही सोने की लंका का निर्माण संभव हो पाया था।

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गणेश जी द्वारा हुआ था कुबेर का अहंकार समाप्त 

पौराणिक आख्यानों/mythological tales में मिलता है कि कुबेर अपनी धन संपदा के चलते गर्व एवं अहंकार से भर जाते हैं। अपनी संपदा का उन्हें इतना अभिमान हो जाता है कि वह किसी को भी अपने समक्ष स्थित नहीं देख पाते हैं। जब कुबेर ने सोने से निर्मित लंका का निर्माण किया तो उनका गर्व अत्यंत ही अभिमान से पूर्ण हो उठा। उन्होंने अपने को समस्त सृष्टि में सबसे अधिक धनवान माना एवं स्वयं को अतुल्य संपदा का स्वामी समझने लगे। अपने वैभव को दिखाने के लिए दूसरों को अपने पास बुलाते एवं उन सभी के समक्ष अपनी अथाह धन संपदा का बखान करने लगते थे। एक बार उन्होंने सभी को प्रभावित करने के लिए एक भव्य महाभोज का आयोजन किया। कुबेर अपने इस महाभोज में महादेव शिव को आमंत्रित करने के लिए उनके पास कैलाश पहुंच गए और अपनी संपत्ति एवं ऐश्वर्य का वर्णन भगवान शिव के समक्ष करने लगे। भगवान शिव ने कुबेर की मंशा को जान लिया था, इसलिए उन्होंने गणेश जी/Ganesh ji को उनके निवास स्थान पर भेजने की बात कही। ऎसे में श्री गणेश जी ने कुबेर के अभिमान को दूर करने का निश्चय किया। 

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महाभोज में गणेश जी का आगमन और कुबेर द्वारा क्षमा याचना करना 

श्री गणेश जी/Ganesh ji निश्चित समय पर कुबेर के महाभोज पहुंच जाते हैं। कुबेर ने अपनी धन संपदा एवं ऎश्वर्य का प्रदर्शन गणेश जी के समक्ष करने के लिए उन्हें स्वर्ण एवं रत्न जड़ित पात्रों में भोजन परोसा। श्री गणेश जी/Ganesh ji ने भोजन करना आरंभ किया किंतु उनकी क्षुद्धा शांत ही नहीं हो पाई और वह खाते चले गए। महाभोज के समस्त भोज्य पदार्थ समाप्त होने लगते हैं, किंतु गणेश जी की भूख शांत नहीं होती है और अंत में कुबेर की समस्त भोजन सामग्री समाप्त हो जाती है। तब गणेश जी कुबेर के महल की समस्त वस्तुओं को खाने लगते हैं।

कुबेर यह देख कर भयभीत हो जाते हैं और श्री गणेश जी से क्षमा याचना करने लगते हैं। अपनी गलती का उन्हें एहसास होता और वह जान जाते हैं की इस सृष्टि में उनके पास कुछ भी नहीं हैं। गणेश जी कुबेर पर ध्यान नहीं देते, तब कुबेर भगवान शिव के पास जाकर अपने अहंकार एवं गलती की क्षमा मांगने लगते हैं। तब श्री गणेश जी उन्हें क्षमा कर देते हैं। इस प्रकार कुबेर के अहंकार का नाश होता है और गणपति जी/Ganpati Ji के आशीर्वाद द्वारा वह पुन: अपने वैभव को भी प्राप्त कर लेते हैं। 

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