क्यों भगवान गणेश को दुर्वा व मोदक अर्पित किया जाता है ?

Ganesh mahotsav

गणपति जी/Ganpati Ji को अर्पित की जाने वाली वस्तुओं में दूर्वा एवं मोदक अत्यंत विशिष्ट स्थान रखते हैं। गणेश जी की पूजा अर्चना प्रत्येक भक्त बहुत ही श्रद्धा एवं भक्ति भाव के साथ करता है। भगवान श्री गणेश जी की षडोपचार एवं पंचोपचार पूजन इत्यादि द्वारा पूजा की जाती है। गणेश चतुर्थी/Ganesh Chaturthi पर भगवान को दूर्वा भी अर्पित की जाती है। वैसे तो दूर्वा  का उपयोग अनेक पूजा कार्यों में किया जाता रहा है, लेकिन गणेश जी को यह अत्यंत ही प्रिय होती है, इसलिए दूर्वा द्वारा पूजन से गणपति जी जल्द प्रसन्न होते हैं। यदि दुर्वा द्वारा गणेश जी का पूजन कर दिया जाए, तो भी यह पूजन संपूर्ण होता है। 

दूर्वा क्यों है इतनी महत्वपूर्ण 

दूर्वा जिसे दूब, घास, कुशा, अमृता, शतपर्वा, अनंता, औषधि इत्यादि नामों से जाना जाता है। दूर्वा की उत्पति की कथा समुद्र मंथन से जुड़ी हुई है, जिसके अनुसार जब समुद्र मंथन/Samudra Manthan में से अमृत की प्राप्ति होती है तो अमृत को लेकर देवों और दैत्यों में जो उत्पात मचा उस के कारण अमृत कलश में से अमृत की कुछ बूंदें पृथ्वी पर गिरती हैं और यही बूंदे दूर्वा की उत्पत्ति का कारण बनी अत: दुर्वा को पूजा में बहुत ही शुभ माना गया है। इसी के साथ अनेकों पूजा में दूर्वा के अलग-अलग रुपों का भी उपयोग होता है और दूर्वा के इन सभी स्वरूपों का अपना एक विशेष महत्व रहा है।

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गणेश पूजा में दूर्वा का महत्व 

गणेश जी के पूजन/Ganesh Pujan में दूर्वा की महत्ता को पौराणिक कथाओं में वर्णित किया गया है। कथा के अनुसार अनलासुर नामक दैत्य ने जब तीनों लोकों पर अपना अधिपत्य स्थापित करना चाहा तो उसके अत्याचारों से देवता भी त्रस्त होने लगे और पृथ्वी पर मौजूद सभी लोगों पर उस दैत्य का कोप फैल गया। उसके कारण चारों और मची विपदा को शांत करने हेतु सभी देवता एवं ऋषि मुनि भगवान श्री गणेश की शरण लेते हैं। भक्तों की इस व्यथा को दूर करने हेतु गणेश जी ने अनलासुर के साथ युद्ध किया और उसे निगल लिया। अनलासुर को निगल जाने पर गणेश जी का शरीर अग्नि के समान तपने लगता है व उनके पेट में बहुत जलन होने लगती है। इस जलन को शांत करने के कई उपाय किए गए किंतु किसी से लाभ नहीं पहुंचा तब महर्षि कश्यप जी, गणेश जी को दूर्वा खाने को देते हैं। दूर्वा में 21 गांठ लगाकर गणेश जी ने दूर्वा का सेवन किया और उसे खाने भर से जलन शांत हो गई। गणपति जी इससे बहुत प्रसन्न होते हैं, एवं दूर्वा को अपने लिए एक महत्वपूर्ण वस्तु के रुप में स्वीकार करते हैं। 

गणेश जी को क्यों प्रिय है मोदक  

गणेश जी को मोदक अत्यंत ही प्रिय है। इसलिए गणेश जी को मोदक का भोग विशेष रुप से लगाए जाने की परंपरा प्राचीन काल से ही चली आ रही है। 

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गणेश जी के मोदक/Modak को पसंद करने की कई कहानियां हैं इसके पीछे एक पौराणिक कथा भी बहुत प्रचलित रही है, जिसके अनुसार पता चलता है की एक बार जब गणेश जी अपने दांत के टूट जाने के कारण कुछ भी सही से नहीं खा पी पा रहे थे, तब माता पार्वती ने उनके लिए मोदक बनाए। जब भोजन में उन्हें मोदक खाने को दिया तो वह उनसे अत्यंत ही आराम से खाए गए और उन्हें उनका स्वाद इतना पसंद आया की उन्होने उसे अपने भोग के रुप में स्वीकृति प्रदान की और कहा कि जो भी मुझे मोदक का भोग लगाएगा उसकी समस्त मनोकामनाएं सहजता से पूर्ण होंगी, तभी से मोदक भगवान श्री गणेश जी को भोग स्वरूप अर्पित किए जाते हैं। 

गणेश महोत्सव/ Ganesh mahotsav पर मोदक का महत्व 

धर्म ग्रंथों के अनुसार मोदक अर्पित करने पर गणपति जी तुरंत ही प्रसन्न हो जाते हैं। मोदक का स्वरूप व्यक्ति में बौद्धिकता के असीम ज्ञान को दर्शाने वाला होता है। जिसका बाहरी आवरण स्वयं में अथाह ज्ञान को अपने भीतर लिए हुए होता है। गणेश जी मोदक को आनंद से खाते हैं। मोदक को बुद्धि एवं ज्ञान के रुप में भी अर्पित किया जाता है। मोदक को ब्रह्माण्ड का प्रतीक भी माना गया है, जिसे गणेश जी धारण किए हुए हैं। ऐसे में मोदक के अनेकों रुप उसकी सार्थकता को स्वयं ही सिद्ध करते हैं।

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