कुंडली में अलग अलग प्रकार के योग

diffrent yoga in kundli

हर व्यक्ति की कुंडली में बहुत सारे योग/Kundali yoga होते हैं जो कुंडली के पूर्ण विश्लेषण के द्वारा पता करना संभव होता है। उनमें से कुछ महत्वपूर्ण योगों के बारे में नीचे बताया गया है।

गजकेसरी योग/Gajkesari Yoga

कुंडली/Kundli में यदि बृहस्पति से लग्न भाव, चतुर्थ भाव, सप्तम भाव, दशम भाव में चंद्रमा स्थित हो तो गजकेसरी योग बनता है। गजकेसरी योग एक अत्यंत ही शुभ योग होता है। चंद्रमा और बृहस्पति की युति एवं दृष्टि संबंध के द्वारा भी गजकेसरी योग का निर्माण होता है। गजकेसरी योग के प्रभाव से जातक को जीवन में धन धान्य की प्राप्ति होती है। धन का आगमन जीवन में किसी न किसी रुप से होता ही रहता है। इस योग के प्रभाव से ज्ञान एवं सौभाग्य की प्राप्ति भी होती है। इस योग के होने से शुभता मिलती है और समाज में मान एवं सम्मान की प्राप्ति भी होती है। जातक के जीवन में शुभ गुणों का विकास होता है। महत्वाकांक्षाएं पूर्ण होती हैं। गजकेसरी योग अपने नाम के अनुरूप ही कार्य करता है, व्यक्ति में साहस भी लाता है तथा सौम्यता का परिवेश भी करता है। यह योग कुंडली के जिस भाव में भी बनता है, उस के अनुरूप फलों को दिलाने वाला बनता है। यह व्यक्ति को राजसिक सुख भी प्रदान करता है। सामाजिक एवं राजकीय क्षेत्र द्वारा लाभ की प्राप्ति होती है। धन के मामले में कुछ लापरवाह भी बनाता है, किंतु इसके प्रभाव द्वारा वैभवता एवं जीवन में भौतिक सुखों की प्राप्ति का योग भी प्रबल रुप से बनता है। 

लक्ष्मी योग/Lakshmi yoga

लक्ष्मी योग/Lakshmi yoga का निर्माण तब होता है जब कुंडली में नवम भाव का स्वामी यदि अपनी स्वराशि में नवम भाव में ही स्थित हो, नवम भाव का स्वामी उच्च राशि में स्थित होकर केंद्र या त्रिकोण भाव में उपस्थित हो। लक्ष्मी योग द्वारा जीवन में धन की प्राप्ति सदैव होती रहती है। उस व्यक्ति के घर में धन का अभाव नहीं होता है। यदि उसका जन्म गरीब परिवार में भी हुआ हो तो भी वह अपने भाग्य द्वारा धन अवश्य प्राप्त कर सकता है। उसका जीवन एवं उसके साथ रहने वाला का भी जीवन लक्ष्मी की कृपा को प्राप्त करता है। व्यक्ति अपने समाज का कल्याण करने वाला होता है। स्वभाव से परोपकारी एवं मित्रता पूर्वक व्यवहार करने वाला होता है। जीवन में यात्राओं का सुख भोगता है। व्यक्ति ज्ञान वान होता है तथा उसे गुरुजनों का आशीष प्राप्त होता है। वरिष्ठ एवं उच्च अधिकारियों की आदर करता है। अपने ज्ञान एवं बौद्धिकता द्वारा कई महत्वपूर्ण कार्यों को सफलता से पूर्ण करने वाला होता है। उच्च वर्गीय स्थानों में उसकी पैठ होती है। पिता का सुख एवं सौभाग्य प्राप्त करता है। कार्यों में अपार सफलता प्राप्त कर सकता है। कोई भी कार्य धन के अभाव के कारण नहीं रुकता है। जीवन में पैसों की निरंतर प्राप्ति होती है। इस योग के कारण  जातक धनवान, सुखी एवं संपन्न बनता है। 

विपरीत राजयोग/Vipreet Rajyoga

कुंडली में छठे भाव, आठवें भाव तथा बारहवें भाव के अधिपति एक दूसरे के साथ संबंध बनाते हों तो यह स्थिति विपरीत राजयोग का निर्माण करती है।

हर्ष विपरीत राजयोग/ Harsh Vipreet rajyoga

कुंडली में षष्ठ भाव में पाप ग्रह हो या पाप ग्रहों की दृष्टि हो, षष्ठ भाव का स्वामी अष्टम या द्वादश भाव में स्थित हो तो हर्ष नामक विपरीत राजयोग का निर्माण होता है। इस योग के प्रभाव द्वारा जातक अपने शत्रुओं को परास्त कर पाने में सक्षम होता है। उसके गुप्त विरोधी अधिक हो सकते हैं, या बाहरी लोगों द्वारा उसे परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन जातक इन सभी बाधाओं को पार कर पाने में सक्षम होता है और उसे अकस्मात धन की प्राप्ति होती है, गुप्त धन एवं विदेश द्वारा धन लाभ भी मिलता है। व्यक्ति उच्च पद पाने में सफल होता है तथा जीवन में मान सम्मान एवं उत्तम फलों को पाता है। 

सरल विपरीत राजयोग/Saral Vipreet Rajyoga

कुंडली में अष्टम भाव का अधिपति यदि षष्ठ भाव अथवा द्वादश भाव में स्थित हो तो सरल नामक विपरीत राजयोग का निर्माण होता है। सरल विपरीत राजयोग/Saral Vipreet Rajyoga द्वारा व्यक्ति बाधाओं और व्यवधानों को दूर कर पाने में कुशल होता है। उसके जीवन में अचानक से होने वाली घटनाएं उसे सफलताओं की ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती हैं। वह व्यक्ति विपरीत स्थिति एवं दुष्कर कार्यों को अपनी बौद्धिकता एवं कार्यकुशलता से दूर करने में सक्षम होता है। व्यक्ति को पैतृक संपदा की प्राप्ति भी होती है। अपने विरोधियों को हराने वाला और धन संपत्ति को पाने वाला बनता है। विदेश द्वारा लाभ हो सकता है। उच्च पद प्राप्ति एवं यात्राओं का सुख भोगता है। जातक को अपनी मेहनत द्वारा अत्यधिक धन संपदा की प्राप्ति होती है। भौतिक सुखों को पाने वाला तथा लंबी आयु को प्राप्त करता है। 

विमल विपरीत राजयोग/Vimal vipreet rajyoga

कुंडली में षष्ठेश, अष्टमेश की स्थिति द्वादश भाव में हो, द्वादशेश स्वयं द्वादश में स्थित हो, अथवा द्वादश भाव भाव का स्वामी षष्ठ भाव या अष्टम भाव में स्थित हो तो विमल नामक विपरीत राजयोग का निर्माण होता है।  विमल विपरीत राजयोग द्वारा व्यक्ति धनवान होता है तथा खर्च करने की प्रवृत्ति भी उसमें अधिक होती है। व्यक्ति अपने विचारों द्वारा जीवन में प्रगति को पाता है। स्वतंत्र एवं उन्मुक्त विचारधारा वाला व्यक्ति होता है। अपने काम के क्षेत्र में विरोधियों को भी अपना मित्र बना लेने की योग्यता रखता है। चतुराई एवं दक्षता द्वारा कामों को पूरा करता है। व्यक्ति को भ्रमण के द्वारा लाभ की प्राप्ति होती है। बाहरी संपर्क एवं कई प्रकार से अकस्मात धन की प्राप्ति भी होती है। सामाजिक क्षेत्र में कई सारे कार्य करने वाला तथा लोगों के मध्य प्रसिद्ध को पाता है। 

राज्यमूल धन योग/Rajyamool Dhan Yoga

कुंडली में दूसरे भाव के स्वामी का यदि नवम भाव के स्वामी के साथ संबंध बनता है तो यह स्थिति राज्य मूल नामक धन योग/Rajyamool Dhan Yog का निर्माण करने वाली होती है। इस योग का प्रभाव तब अधिक बढ़ जाता है जब दूसरे भाव का स्वामी बलवान हो उच्च स्थिति का हो, तथा नवम भाव का स्वामी भी यदि उच्च स्थिति अथवा बलशाली हो। इन पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि पड़ने से राज्य मूल धन योग के शुभ फलों की प्राप्ति होती है। कुंडली में राज्य मूल धन योग द्वारा सरकार एवं परिवार दोनों ही क्षेत्रों द्वारा आर्थिक उन्नती का मार्ग प्रशस्त होता है। जातक को अपने कुटुम्ब का सहयोग मिलता है। जीवन में धन की कमी परेशान नहीं करती है। भाग्य द्वारा आर्थिक लाभ तथा धन की आमद जीवन भर होती है। इस योग के प्रभाव द्वारा उच्च पद प्राप्ति होती है, राजकीय क्षेत्र में सरकार की ओर से लाभ मिलता है। पिता द्वारा धन एवं सुख की प्राप्ति होती है। किसी न किसी रूप में आध्यात्मिक क्षेत्र में भी उच्चता प्राप्त होती है। जातक संस्थाओं का निर्माण कर सकता है। सरकार से उच्च पद की प्राप्ति भी हो सकती है।  आपको सम्मान की प्राप्ति हो सकती है, सामाजिक क्षेत्र में जातक के द्वारा कई प्रकार के कार्य भी किए जा सकते हैं जिनके द्वारा मान सम्मान भी प्राप्त होता है। 


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धन योग/Dhan Yoga

कुंडली में दूसरे भाव, पंचम भाव, नवम भाव और एकादश भाव के स्वामियों का आपस में संबंध होने पर धन योग का निर्माण होता है। इस योग में ऊपर दिए गए भावों के स्वामियों की युति, दृष्टि या परिवर्तन योग किसी न किसी रूप में होने पर धन योग/Dhan yoga की प्राप्ति होती है। जीवन में किसी न किसी तरह से धन की प्राप्ति संभव होती है। आर्थिक क्षेत्र में जीवन संपन्न होता है। अपने साथ साथ दूसरों के लिए भी आप काफी कुछ करने वाले होते हैं। सौम्य एवं प्रेमी स्वभाव होता है। जातक अपने एवं दूसरों के लिए भी हितकारी होता है। समाज में मान सम्मान को पाता है। इस योग पर शुभ ग्रहों की दृष्टि तथा संबंध अत्यधिक सकारात्मक फल देने   द्वारा कोई संबंध बना रहे हों तो कुंडली में धन योग/Dhan Yog in Kundli का निर्माण होता है। धन योग का निर्माण होने पर जातक को जीवन में कभी धन की अत्यधिक कमी नहीं सहन करनी पड़ती है। वह कम मेहनत द्वारा भी अच्छा धन पाने में एवं कमाने में सफल होता है। वाहन, वस्त्र, भवन की प्राप्ति भी जातक को होती है। कार्यक्षेत्र में लोगों का सहयोग भी मिलता है। अपने काम द्वारा प्रसिद्धि भी पाता है। धनवान लोगों की श्रेणी में स्थान भी प्राप्त होता है।

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