मां चित्र में नहीं चरित्र में बसती है

Navratri Special

रोहित ऑफिस जाने के लिए बिलकुल तैयार था। रितू सुबह जल्दी ही ऑफिस जा चुकी थी। इतने में पीछे से माँ की आवाज़ आई। बेटा! जाने से पहले एक बार मुझे पानी पिलाता जा, अभी काम वाली बाई भी नहीं आयी और मुझे बहुत ज़ोर से प्यास लग रही है। इतने में रोहित बोला, माँ मुझे देर हो रही है। आज ऑफिस में जरूरी मीटिंग है। थोड़ी देर बिना पानी के रह लो, बाई आ कर पिला देगी कहते कहते झुंझलाते हुए रोहित बाहर निकल गया। लताजी पिछले 6 महीने से bed पर थीं। शुरू में तो बेटा-बहू ने उनका अच्छे से ख्याल रखा लेकिन धीरे धीर वह उनसे परेशान होने लगे थे। लता जी को सब समझ आता था लेकिन वह लाचार थीं। बिस्तर पर लेटे लेटे पुराने दिन याद करतीं, जब यही बेटा बहू उनके आगे पीछे घूमते और नई नई खाने पीने की फरमाइशें करते थे। लेकिन आज उन्ही बेटे बहू के लिए वह बोझ बन गई थी। शाम को जब रोहित घर आया तब तक रितू भी आ चुकी थी। रोहित बहुत खुश था क्योंकि दोस्तों ने मिलकर बाहर एक पार्टी रखी थी। रोहित घर आते ही बोला कि जल्दी से तैयार हो जाओ आज खाने पर बाहर चलेंगे।

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रितू बोली लेकिन तुम्हारी मम्मी का खाना? मैंने तो अभी कुछ बनाया नहीं है और बाई भी जा चुकी है। अरे! लेकिन माँ तो रात को बहुत हल्का फुल्का खाती हैं, नहीं तो रात में उनकी तबियत बिगड़ जाती है। ऐसा करते हैं जब वापिस आएंगे तो माँ को दूध दे देना। ठीक है कहती हुई रितू तैयार हुई और ताला लगा कर दोनों खाने पर चले गए। लता जी बहुत देर तक बेटे बहू को आवाज़ देती रहीं। उन्हें बहुत भूख लगी थी। दिन में भी आज खाना ठीक से नहीं खाया था। बाई ने खाने में बहुत तेज़ नमक दाल दिया था, जिससे उनसे वो खाया नहीं गया था। सोचा था शाम को बहू बनाएगी तो ठीक से खा लूंगी। लेकिन यहाँ तो कोई उनकी आवाज़ सुनने वाला भी नहीं था। लता जी आँखों में आंसू भरे ईश्वर का नाम लेकर आँखे बंद करके सोने की कोशिश करने लगी। रितू और रोहित 12 बजे के करीब वापिस आए। लेकिन यह याद ही नहीं रहा की भूखी माँ को घर छोड़ कर गए थे। अपनी ही धुन में अपने कमरे में गए और सो गए। लता जी पूरी रात भूख से तड़पती रहीं। दो दिन बाद नवरात्री शुरू थी। रितू और रोहित दोनों ही देवी के भक्त थे। नवरात्री वाले दिन दोनों ने सुबह उठ कर पूजा की और अपने अपने काम पर चले गए। उस दिन बाई भी छुटि कर गयी थी। शाम को जब दोनों आए तो देखा बाई नहीं आई और ना ही खाना बना था। दोनों खाना खाने के लिए बहार चल दिए। रोहित बोला माँ के लिए दूध दे दो। माँ वही पी लेंगी। अब थक हार कर खाना बनाना तो मुश्किल है। रितू जब दूध देने गई तो लता जी बोली बेटा कुछ खाने के लिए नहीं है क्या? रितू बोली आज आप दूध पी लीजिए, आज बाई भी नहीं आई और मैं भी थक गयी हूं, इसलिए मैं और रोहित तो बाहर ही खाना खा आएंगे। आप दूध पी लीजिए। लता जी की आँखें भर आईं। आज अष्टमी का दिन था। रितू और रोहित ने पूजा की और फिर कंजकों को खाना खिलाया।

आज रोहित ने सब कंजकों को 100-100 रूपए दिए। उसके बाद वो ऑफिस चला गया। आज उसकी बहुत इम्पोर्टेन्ट मीटिंग थी। उसे पक्की उम्मीद थी कि आज उसे प्रमोशन मिलेगा। लेकिन यह क्या उसकी जगह आज एक नया आदमी उसकी कुर्सी पर बैठा था और रोहित को बताया गया कि आज से उसे उस आदमी के नीचे काम करना पड़ेगा। रोहित का चेहरा एक दम मुरझा गया। शाम को रोहित घर आया और बिना खाना खाए अपने कमरे में जा कर सो गया। बहुत देर तक उसके आँखों में आंसू रहे और न जाने कब उसकी आँख लग गयी। नींद में उसे माँ दुर्गा नज़र आई। जिनसे वह बार बार कह रहा था मां मैंने आपकी कितनी पूजा की , आज आपके नाम कि कंजक बिठाई, मैंने आपकी इतनी भक्ति की और आपने आज ही के दिन मुझे इतना बड़ा दुःख दिया। माँ मुस्कुराते हुए बोली लेकिन तूने तो मुझे पानी तक नहीं पिलाया, मैंने तुझे कितनी आवाज़ें दी लेकिन तूने मुझे भूखे ही सुलाया। क्या सिर्फ मेरा नाम लेने से ही तू मेरा सच्चा भक्त बन गया? रोहित चौंक गया और बोला यह आप क्या कह रही हो माँ। मैंने तो हर रोज़ आपका भोग लगाया है।

मैंने तो कभी भी बिना भोग लगाए खुद कुछ नहीं खाया। माँ बोली तूने भोग मेरे चित्र का लगाया लेकिन मैं तो साक्षात् तेरे घर में थी, लेकिन तूने कभी मेरे पास बैठ कर मुझे प्यार से कुछ नहीं खिलाया। मैं तुझसे पानी मांगती रही लेकिन तू मुझे प्यासा छोड़ कर ऑफिस चला गया। मैं चित्र में नहीं चरित्र में बसती हूँ। हो सके तो मेरे उस चरित्र (माँ) के पास जा और अपना समय मेरे चित्र को देने कि जगह उसे दे जो हर वक्त तेरे साथ है। तेरे सारे संकट दूर हो जाएंगे। रोहित कि नींद अचानक खुल गई। वह अँधेरे में उठा और अपनी माँ के चरणों में बैठ कर आंसू बहाने लगा। माँ कि नींद खुल गई। बोला माँ मुझे माफ़ कर दो। माँ प्यार से उसे निहारने लगी और बोली चिंता मत कर माँ सब अच्छा करेगी।
“ये दुनिया है तेज धूप,
पर वो तो बस छाँव होती है ।,
स्नेह से सजी, ममता से भरी,
माँ तो बस माँ होती है।।”

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