छठे भाव में राहु और बारहवें भाव में केतु क्यों अच्छा है?

छठे भाव में राहु

ज्योतिष में राहु-केतु को छाया ग्रह के तौर पर देखा जाता है और इन्हे क्रूर, पापी व अलगाववादी ग्रह माना जाता है. इन दोनों ग्रहों का कोई भी भौतिक स्वरूप नहीं है. राहु को वृषभ और मिथुन राशि में उच्‍च माना जाता है तो केतु की उच्च राशि वृश्चिक व धनु मानी गई है. राहु की प्रकृति शनि के समान और केतु की प्रकृति मंगल के समान मानी गई है।  राहु व केतु सदैव वक्री गति से चलते हैं और यह दोनों ग्रह मिलकर मनुष्य के जीवन पर विशेष प्रभाव डालते हैं.

 

अगर आपकी कुंडली में राहु व केतु शुभ व बली स्थिति में होते हैं तो ये आपको अनेक प्रकार के लाभ प्रदान कर सकते हैं. यदि आपकी कुंडली में राहु व केतु अशुभ स्थिति में हो तो ये दोनों ग्रह मिलकर आपको भारी परेशानी में भी डाल सकते हैं। इन ग्रहों के विषय में आमतौर पर ऐसी धारणा है कि ये सिर्फ अशुभ प्रभाव देते हैं. लेकिन सच तो यह है कि कुण्डली में राहु-केतु अगर शुभ स्थिति में हो तो व्यक्ति को धन दौलत के साथ- साथ समाज में उच्च पद एवं प्रतिष्ठा भी दिलाते हैं. राहु और केतु जब कुंडली में बली स्थिति में होते हैं तब ये व्यक्ति को धन लाभ, उच्च पद, मान-सम्मान, बड़ी सफलताएं आदि प्रदान करते हैं.

 

केतु के बलवान होने पर व्यक्ति आध्यात्मिक व ईश्वर के प्रति श्रद्धावान होता है। राहु व केतु कुंडली के 03 11वें भाव में बलवान समझे जाते हैं. इन भावों में स्थित राहु-केतु व्यक्ति को साहस, पराक्रम, अच्छी संघर्ष क्षमता व निडरता प्रदान करते हैं. जिस व्यक्ति की कुंडली में राहु-केतु बलवान स्थिति में होते हैं उनके जीवन में समस्याएं कम होती हैं. ऐसे लोगों की आर्थिक स्थिति भी मजबूत रहती है. अगर राहु और केतु तृतीय अथवा एकादश भाव में स्थित हो और उन पर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो ऐसे व्यक्ति को कोई भी बाधा लम्बे समय तक रोक नहीं पाती है. वह जिस काम में हाथ डालता है, वह कार्य आसानी से हो जाता है.

 

अब छठे भाव में स्थित राहु व बारहवें भाव में स्थित केतु की चर्चा करते हैं. छठा और बारहवां भाव कुछेक चीजों को छोड़कर स्वभावतः बुरा है इसलिए इन भावों की गणना त्रिक भावों(06, 8, 12) में होती है. ज्योतिष शास्त्र की एक अवधारणा यह है कि पाप ग्रह यदि बुरे भावों में स्थित हो तो उन भावों की अशुभता को नष्ट करके शुभ फल प्रदान करते हैं. यह ठीक ऐसा ही है जैसे गणित में दो नेगेटिव मिलकर पॉजिटिव हो जाते हैं ठीक वैसे ही यह माना जाता है कि जब कोई पाप ग्रह अशुभ भावों में स्थित हो तो वह उस भाव की अशुभता को नष्ट करके शुभ फल प्रदान करता है.

 

छठा भाव रोग, ऋण, शत्रु, विवाद, चोट, मुकदमेबाज़ी आदि से संबंधित है और बारहवां भाव हानि, व्यय, गुप्त शत्रु, जेल, हॉस्पिटल में भर्ती होना आदि से संबंधित है. जब राहु और केतु इन भावों में बैठते हैं तो उपरोक्त अवधारणा के अनुसार इन भावों के इन अशुभ कारकत्वों का नाश करते हैं इसलिए छठे भाव में राहु/Rahu in the sixth house और बारहवें भाव में केतु/Ketu in the twelfth house को शुभ माना जाता है. लेकिन ये बात अनुभव में हमेशा सत्य नहीं उतरती है. अशुभ भावों में बैठा पाप ग्रह उन अशुभ भावों के कारकत्वों को अपने में समाहित करके व्यक्ति को दुगना कष्ट दे सकता है क्योंकि एक तो वह नैसर्गिक रूप से पापी स्वभाव वाला है ऊपर से अशुभ भावों में बैठने के कारण वह उन बुरे भावों के गुणों को अपने में समाहित कर लेता है और दुगना अशुभ परिणाम डाल सकता है.

 

आपका दूसरा प्रश्न है कि राहु और केतु की इस स्थिति के बावजूद व्यक्ति को कठिन प्रयासों के बाद सफलता क्यों मिलती है? इसका उत्तर यह है कि छठे भाव से राहु दशम भाव(कार्यक्षेत्र) व द्वितीय भाव(धन व आर्थिक स्थिति का भाव) को देखता है और केतु द्वादश भाव से चतुर्थ भाव(सुख स्थान) को देखता है. राहु के दशम भाव/Rahu at the 10th house को देखने के कारण व्यक्ति के कर्म में अवरोध व बाधाएं आती हैं और द्वितीय भाव को देखने के कारण धनार्जन व पद-प्रतिष्ठा को अर्जित करने में अत्यंत संघर्ष करना पड़ता है. केतु की चतुर्थ भाव/Ketu at the fourth house पर दृष्टि होने के कारण व्यक्ति को सरलता से सुख प्राप्त नहीं होते हैं.

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