क्या है भगवान शिव और रुद्राक्ष का संबंध ?

Rudraksha

रुद्र से उत्पन्न हुआ रुद्राक्ष अत्यंत ही चमत्कारिक वस्तु है। मान्यताओं के अनुसार रुद्राक्ष को शिव के आंसुओं के रूप में दर्शाया गया है। रुद्राक्ष/Rudraksha में भगवान शिव का वास माना जाता है। ऐसे में शिव और रुद्राक्ष के मध्य संबंध अलग नहीं है, यह एक युग्म समाहित रुप है। रुद्राक्ष में रुद्र (Rudra) का नाम शामिल है। वेदों में रुद्र की अनेकों कथाएं मिल जाएंगी। रुद्राक्ष के गुणों का एवं इसके प्रकट होने का वर्णन कई रूपों में मिलता है। रुद्राक्ष शब्द की उत्पत्ति को रुद्र एवं अक्ष से मिलकर बनाया गया है। यह दोनों ही शब्द रुद्र के नेत्रों से निकले आंसू को दर्शाते हैं।  रुद्राक्ष एवं भगवान आदिदेव शिव/Lord Shiva के संबंध में कई पौराणिक तथ्य उपलब्ध हैं, जिनमें से कुछ के बारे में हम  बताने वाले हैं।

शिव का आशीर्वाद है रुद्राक्ष

भक्ति को पाने के अनेकों साधनों का वर्णन भारतीय धर्म शास्त्रों में मिलता है। इसी में रुद्राक्ष को भी उच्च स्थान प्राप्त है। रुद्राक्ष के पूजन और इसे धारण करने और इसके उपयोगों द्वारा भगवान महादेव की भक्ति का आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है। रुद्राक्ष ही शिव के सानिध्य को प्रदान करने का एक जरिया बनता है। रुद्राक्ष की उत्पत्ति एवं इसके अनेकों रुप मौजूद हैं, उन सभी में जो शक्तियां हैं वह किसी न किसी रूप में भक्त को प्रभु से जोड़ने वाली ही होती हैं।

रुद्राक्ष उत्पत्ति कथा

वेद, शिव पुराण, लिंग पुराण इत्यादि में रुद्राक्ष के विषय में बहुत ही सुंदर कहानी मिलती है। पौराणिक कथाओं में रुद्राक्ष की उत्पत्ति एवं इसकी शुभता के बारे में बहुत ही शुद्ध रूप से चित्रण प्राप्त होता है। रुद्राक्ष केवल एक बीज नहीं है, यह वह अद्भुत वस्तु है जो ईश्वर के साथ हमारे साक्षात्कार को मजबूती देने वाली होती है तथा आध्यात्मिकता का विकास करती है। रुद्राक्ष मार्ग में मौजूद समस्त विपदाओं को दूर करने का उपाय बनता है। यह नकारात्मक ऊर्जाओं से मुक्ति दिलाता है और सात्विकता के साथ आत्मिक शुद्धि देने में बहुत ही कारगर सिद्ध होता है।

रुद्राक्ष को किसी भी रूप में उपयोग में लाने पर लाभ होता है। यह कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं डालता है और इसके कोई दुष्प्रभाव नहीं होते हैं, इसी कारण रुद्राक्ष अपनी शुभता के कारण एक अत्यंत ही प्रभावशाली माना गया है। रुद्राक्ष को भगवान शिव के नेत्रों द्वारा उत्पन्न हुआ माना गया है। इनका पृथ्वी पर गिरना समस्त सृष्टि के कल्याण हेतु एक सुरक्षा कवच का रूप भी बनता है जो समस्त जीवों पर अपनी कृपा बरसाता है।

रुद्राक्ष पौराणिक कथा

आईये जानें क्या है रुद्राक्ष के उत्पन्न होने की पौराणिक कथा। रुद्राक्ष की एक कथा का संबंध त्रिपुर दैत्य से जुड़ा हुआ माना गया है। चिरकाल पूर्व में त्रिपुर/Tripur नाम का एक अत्यंत बलशाली, देवों को भी परास्त कर देने में सक्षम दैत्य का जन्म हुआ। उस दैत्य के अत्याचारों एवं आतंक से समस्त त्रिभुवन कांपने लगे। हर ओर प्राणियों में त्राहि-त्राहि मची हुई थी। उस दैत्य ने अपने बाहुबल एवं शक्तियों द्वारा देवताओं को भी परास्त कर दिया और समस्त लोकों पर अपना आधिपत्य स्थापित करने लगा।

इस कठिन समय पर देवताओं ने भगवान शिव से सुरक्षा की विनय अनुनय-विनय की, भगवान शिव ने देवताओं की प्रार्थना को सुना तथा उन्हें उस दैत्य से मुक्ति दिलाने के लिए संग्राम छेड़ दिया। त्रिपुर के साथ भगवान शिव ने युद्ध किया और वर्षों तक चलने वाले इस युद्ध में जब अंतिम समय पर भगवान शिव में अपने नेत्रों को बंद करते हुए अघोर अस्त्र को प्रकट किया तब शिव जी के नेत्रों से पानी की कुछ बूंदे पृथ्वी पर गिरती हैं तथा इन्हीं जल बूंदों द्वारा रुद्राक्ष की उत्पत्ति संभव हो पाती है, एवं त्रिपुर दैत्य का भी अंत होता है। इस प्रकार पृथ्वी समेत समस्त लोकों का कल्याण होता है।

इसी प्रकार कुछ कथाओं में भिन्नता भी मिलती है, इसमें एक कथा अनुसार भगवान शिव के समाधिस्थ होने पर कई समय तक नेत्र न खोलने के कारण भगवान शिव के आंखों से कुछ बूंदे पृथ्वी पर गिरती हैं, जिनसे रुद्राक्ष की उत्पत्ति होती है। एक अन्य शिव पुराण/Shiv puran कथा अनुसार सती की मृत्यु से व्यथित हुए भगवान शिव की आंखों से जब अश्रु धारा फूट पड़ती है तो वही रुद्राक्ष का रुप बनती है।

भगवान शिव से है रुद्राक्ष का अस्तित्व 

रुद्राक्ष की उत्पत्ति से जुड़ी इन सभी कथाओं में चाहे कितनी भी भिन्नता हो किंतु एक बात पूर्ण रूप से समान देखने को मिलती है की रुद्राक्ष भगवान शिव के नेत्रों से ही उत्पन्न होते हैं फिर चाहें वह अश्रु की बूंद किसी भी रूप में पृथ्वी में संचित हुई पर उनका स्वरूप रुद्राक्ष ही रहा। इसी कारण रुद्राक्ष भगवान शिव से संबंधित हुआ और समस्त जीवों के कल्याण हेतु सदैव पृथ्वी पर उपजा।

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