अनुष्ठान

भारत आध्यात्मिकता का पालन करने वाला देश है। लेकिन क्या केवल अनुष्ठान करने का मतलब आध्यात्मिकता है। जैसा कि हम आम तौर पर जानते हैं या हमें सुझाव दिया जाता है, लेकिन अंतहीन अनुष्ठानों को अंधाधुंध करके, विशेष रूप से भगवान को प्रसन्न नहीं कर सकते हैं। भारतीयों के लिए आध्यात्मिकता  विरासत नहीं बल्कि एक सतत परंपरा है। सदियों से इस परंपरा ने हमारे धर्म को दर्शन और आध्यात्मिकता पर विभिन्न विचार विकसित करने में मदद की है। इनमें से कुछ न्याय, वैशेशिका, योग और वेदांत हैं और इसके लिए दुनिया  हिंदू धर्म को उत्सुकता से देखती है। भारत की आध्यात्मिक हवा कर्म- धर्म की सुगंध फैला रही  है। और यह भारतीयों में  धार्मिक और नैतिक जीवन रखने के लिए बदलाव लाती है। वैदिक और पुराण के माध्यम से आध्यात्मिकता के स्वामी, वैदिक ऋषि ने हमें वास्तविक अर्थ में आध्यात्मिकता प्राप्त करने के लिए सही कर्मिक तरीके सिखाए हैं।

केवल अनुष्ठान और उपाय करना ही पूजा नहीं है

प्रत्येक धर्म में भक्ति की धारणा आवश्यक है लेकिन समय के अनुसार इस धारणा में बदलाव आ रहा है | अब प्रत्येक धर्म में धार्मिकता की भावना को गलत तरीके से देखा जाता है बड़े और विशाल पूजा और अनुष्ठानों को धार्मिकता कहा जाता है | अब बात थोड़ी अलग है  जो पूर्ण रूप से भौतिक संसार में विलीन हैं वह अधिक पूजा करते हैं | पूजा करना तो मनुष्य और भगवान के बीच के सम्बन्ध को मजबूत करना है | लेकिन आष्चर्य की बात यह है कि अब पूजा और अनुष्ठानों का मतलव बदल गया है

आडम्बर अनुष्ठान के प्रभाव को पीछे छोड़ देता है

कई लोग आंख बंद करके अनुष्ठान का पालन करते हैं और किसी कारण से ही पूजा करते हैं:

  1. कुछ लोग मानते हैं की उनके पूजा न करने से भगवान नाराज हो जायेंगे |
  2. हम में से कई लोग ईश्वर ने जो कुछ उन्हें दिया है उसका कुछ अंश सर्वशक्तिमान को रिश्वत के रूप में देने का प्रयास करते हैं।
  3. वह अपनी जरूरतों ( को पूरी करने ) के लिए उनकी प्रशंसा करते हैं उन्हें भेंट देते हैं
  4. अनुष्ठान करके वह उनकी खुशामद कर स्वयं को संतुष्ट करते हैं क्या वे भगवान से प्यार करते हैं या उनसे डरते हैं?
  5. क्या वह अनुष्ठान और भेंट करने से सही दिशा में जा रहे हैं | या उन्हें यह लगता है कि यह अनुष्ठान उनके दोषपूर्ण कर्मों को निरंतर करने का लाइसेंस देते हैं और परिणामत: वह यह सोचकर कि इन अनुष्ठानों को करने से भगवान उनके पक्ष में हैं , और भी घमंडी हो गए |

अनुष्ठान और उपचार –  इतना अधिक क्यों निर्भर हैं

मध्य प्रदेश कैडर के एक उच्चस्तरीय सरकारी कर्मचारी ज्योतिषीय सलाह के लिए एक बार मेरे पास आये। पहले कुछ मिनटों में उनको सुनने के बाद मैंने स्पष्ट रूप से एक निष्कर्ष निकाला, कि वह मेरे पास अपने कुंडली को समझने के लिए नहीं आया था, बल्कि अपनी कुछ इच्छाओं को पूरा करने के लिए मेरे पास आया था। इन इच्छाओं की पूर्ति की इच्छा रखना कुछ भी गलत नहीं है क्योंकि सभी ऐसी इच्छा रखते हैं । लेकिन इसकी पूर्ति की कीमत दूसरों के लिए चिंता का विषय हो सकता है।

सभी अनुष्ठानों को करना. आध्यात्मिक होने का पाखंड

उसने मुझे उन रत्नों को दिखाया जो उन्होंने अपनी आठ उँगलियों में से पांच में एक एक रत्न पहन रखा था । गर्व के साथ, उन्होंने यह जानकारी दी कि धर्म में उनकी गहरी आस्था है और हर सुबह और शाम को उनके द्वारा किए गए अनुष्ठानों के बारे में बताया। ये अनुष्ठान सुबह में कम से कम दो घंटे और शाम को एक घंटे उनको व्यस्त रखने के लिए पर्याप्त थे। जब उन्होंने हर साल किए गए आवधिक अनुष्ठानों का वर्णन किया तो उनकी अहंकार की कोई सीमा नहीं थी। उन्होंने इन आवधिक अनुष्ठानों के लिए नियोजित पंडितों के प्रकारों का और वह दान के रूप में वितरित धन की राशि का भी स्पष्ट उल्लेख किया। कुल मिलाकर, वह पूजा और अनुष्ठानों में बहुत दिखावा करने वाला और इन चीजों को निष्पादित करने में बहुत अधिक समय देने वाला व्यक्ति था।

उत्कृष्ट जन्म कुंडली  – फिर भी अनुष्ठान मदद नहीं कर सकते हैं

वह एक विशिष्ट प्रश्न और इरादे के साथ आया था, और वह थाः उनका पदोन्नति अगले कुछ महीनों में देय थी और क्या वह अपने वरिष्ठ को पीछे छोड़ने में सक्षम होगा। उन्होंने राजनीतिक दायरे में भी अपने संबंधों का दावा किया और उल्लेख किया कि उन्होंने अतीत में इसे दो बार कितनी चतुराई से हासिल किया है।

उसकी कुंडली  वास्तव में उत्कृष्ट थी, सभी सम्मान और धन अनुरूप ग्रह त्रिकोण में अच्छी तरह से स्थापित थे । पिछले सोलह वर्षों से, उसकी उत्थान (लग्नेश) की दशा चल रही थी , जिसमें ग्यारहवें  घर के स्वामी के साथ राशीपरिवर्तन का योग था। डी -10 चार्ट और भी आशाजनक था क्योंकि इसमें दो राशि परिवर्तन योग थे। शनि चंद्रमा से अपने ग्यारहवें घर की यात्रा पर था। ये दोनों  दो महीनों में होना  था।

कर्म सुधार के बिना अनुष्ठान मदद नहीं करते हैं

मैंने कुछ प्रश्न किए, और वह उनका जवाब देने में अनिच्छुक था, लेकिन मेरे आग्रह पर, उसने उनका  जवाब दिया।

  1. मैंने उसकी पत्नी के साथ उसके सम्बन्ध के बारे में पूछा, और उसने जवाब दिया कि हालांकि वे एक साथ रहते थे, किन्तु वे मुश्किल से एक-दूसरे से बात करते थे। रिश्ता खट्टा था।
  2. अपने भाई के साथ रिश्ते पर मेरे प्रश्न के जवाब में उसने उम्मीद के अनुसार जवाब दिया। उसने कहा कि यह रिश्ता निम्नस्तर का था क्योंकि उनके भाई ने उसकी कुछ संपत्ति (संपत्ति जो उनकी होनी ही नहीं थी ) पर कब्जा कर लिया था।
  3. विवाहेतर मामलों पर सवाल के जवाब में, उन्होंने स्वीकार किया कि कुछ से उनके अनैतिक सम्बन्ध थे।
  4. पूछताछ पर, उसने बताया कि कभी-कभी उसने धन गलत तरीके से इधर से उधर किया था।
  5. पूछने पर उसने यह भी बताया कि उनके पास कई व्यापर है जो उनके प्रतिनिधियों द्वारा संचालित हैं।

मेरे हर सवाल से उसके माथे पर एक नई त्यौरी पड़ती गई तथा उसे और अधिक अधीर बना दिया। आखिरकार, उसने पूछा कि वह जिस चीज के लिए आया था वह कैसे और किस अनुष्ठान के माध्यम से संभव हो सकता है ।

मैंने कुंडली का विश्लेषण किया जिसके अनुसार उसकी पदोन्नत्ति का तो  अवसर नहीं था बल्कि उसकी वर्तमान नौकरी जाने का और संपत्ति भी जाने का योग था । कि वर्तमान में समय कम था और इन योगों से बचने के लिए कुछ विशेष उपाय करना सम्भव नहीं था तो मैंने उसे तीन महीने बाद आने को कहा | इस बात से वह खिन्न होकर मेरे पास से चला गया |

भाग्य केवल अनुष्ठानों के करने से नहीं बदलता है

कुछ समय बाद केवल मैंने ही नहीं अपितु काफी भारतीयों ने भी उसके बारे में समाचार पत्रों में पड़ा कि उसे कई मामलों कि वजह से कारागार  में भेज दिया गया है और उसकी जमा सम्पत्तियों को भी जब्त कर लिया गया |

कौन जानें कि ऐसे एक निष्ठावान उपासक और अनुष्ठान करने वाले व्यक्ति को जेल से बाहर आने पर शायद भगवान पर से विश्वास ही उठ गया हो

यह संक्षिप्त वर्णन धार्मिकता और उपासक के बीच अंतर को समझने के लिए था । बिना किसी भौतिक लालच के की गयी पूजा ही व्यक्ति को धार्मिक बनाती है

धर्म या आध्यात्मिक होना – कर्म सुधार अनुष्ठानों को पीछे छोड़ देता है

पूजा का लाभ यह है कि यह इच्छाशक्ति को बढ़ावा देता है, ज्ञान को बढ़ाता है, सर्वशक्तिमान के साथ संबंध बनाने में मदद करता है, संतुष्टि प्रदान करता है और ‘‘छोडो कोई बात नहीं” की शक्ति के साथ मूल व्यक्ति को आशीर्वाद देता है।

पूजा करने और अनुष्ठान करने का एक महत्व होता है क्योंकि वे ईश्वर के समक्ष एक शपथ ग्रहण करते हैं । लेकिन हमें ये अनुष्ठान भगवान के साथ छल करने या उन्हें वश में करने के लिए नहीं करने चाहिए । कोई भी धर्म यह नहीं बताता कि धार्मिक होने का मतलव बिना स्वयं के कर्मों में सुधार किये अनुष्ठान करने से है ।इसलिए, सभी धर्म कहते हैं कि हमें आध्यात्मिक होना चाहिए, भक्ति करना चाहिए और हमारे कर्मों को अच्छा रखना चाहिए। त्रुटिपूर्ण कर्मों के साथ पाखंड करके यह सोचते हुए कि हम अनुष्ठान कर रहे हैं, वे भगवान को मुर्ख नहीं बना सकते हैं। यह कभी भी दुर्व्यवहार के लिए एक ढाल के रूप में कार्य नहीं कर सकता है। कोई भी अधिक दान और अनुष्ठान कर पंडित और सहयोगियों को प्रसन्न कर सकता है लेकिन जब सर्वशक्तिमान ईश्वर के फैसले की बारी आती है तो मुख्य रूप से कर्मों को गिना ( फल दिया ) जाता है |

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