दिशा का ग्रहों से सम्बन्ध

वास्तु विज्ञान में आठ  दिशाओं अर्थात उत्तर, दक्षिण , पूर्व और पश्चिम तथा चार कोणीये दिशाओं उत्तर – पूर्व ( ईशान ), दक्षिण – पूर्व  ( आग्नेय ) , दक्षिण – पश्चिम ( नैऋत्य ) , और उत्तर – पश्चिम ( वायव्य ) के आधार पर पूरे वास्तु की गणना की जाती है | प्रत्येक दिशा पर अलग – अलग देवताओं व ग्रहों का प्रभाव रहता है जिस प्रकार ग्रहों के अनुकूल और प्रतिकूल प्रभाव मानव जीवन  पर पड़ते हैं उसी प्रकार ग्रह अपने शुभ और अशुभ प्रभाव से वास्तु की दिशाओं को प्रभावित करते है उस मकान में रहने वालों के तत् संबंधी प्रभाव में कमी या वृद्धि करते हैं |

पूर्व दिशा –

पूर्व दिशा के स्वामी इन्द्र एवं प्रतिनिधि ग्रह सूर्य है | सृष्टि के सृजन में सूर्य का विशेष महत्व है  इनसे ही समस्त सृष्टि में प्राणियों एवं वनस्पतिओं की उत्पत्ति पोषण एवं प्रलय होते है | जिस घर का मुख्य द्वार पूर्व की ओर हो तथा पूर्व की ओर बड़ी – बड़ी खिड़कियाँ एवं झरोखे हों तो उसमे वास करने वाले को अच्छे स्वास्थ्य , पराक्रम , तेजस्विता , सुख -समृद्धि , बुद्धि – विवेक, धन – धन्य , भाग्य एवं गौरवपूर्ण जीवन की प्राप्ति होती है | अत: भवन निर्माण में पूर्व दिशा का स्थान खुला एवं नीचे रखना चाहिए घर के पूर्वी  भाग में कूड़ा – कचरा , पत्थर या मिटटी का ढेर हो तो संतान की हानि , विकलांग संतान का जन्म एवं पिता के सुख में कमी होती है | यश् और प्रतिष्ठा में कमी आती है | इसके अतिरिक्त पूर्व की दिशा में दोष रहने पर धन का अपव्यय , ऋण , मानसिक अशांति , नेत्र विकार , लकवा , रक्तचाप , सिर दर्द या सिर से सम्बंधित रोग हड्डी के टूटने ,दांत , जीभ , मुँह, एवं ह्रदय से संबंधित बीमारियां देखने को मिलती है |

पश्चिम दिशा –

पश्चिम दिशा के स्वामी वरुण , आयुध पाश एवं प्रतिनिधि ग्रह शनि है | शनि  काल है | शनि अवधि है |  शनि दुर्भाग्य और सौभाग्य दोनों का प्रतिनिधित्व करता है  | पश्चिम दिशा सफलता , प्रसिद्धि , सम्पन्नता तथा उज्जवल भविष्य प्रदान करती है | यदि घर का प्रवेश द्वार पूर्व में हो और वह पूर्ण स्वच्छ और साफ हो तथा पश्चिम में मिटटी , चट्टान आदि हो तो गृह स्वामी की आमदनी ठीक रहती है | पश्चिम दिशा में दोष रहने पर मन चंचल रहता है | मानसिक तनाव बना रहता है और किसी भी कार्य में पूर्ण रूप से सफलता नहीं मिलती |  भवन में घर या वर्षा का जल पश्चिम दिशा से जाता हो तो पुरुष लम्बी बीमारीओं के शिकार होते हैं | घर के पश्चिम दिशा में दरारें रहने पर गृह स्वामी की आमदनी अव्यवस्थित रहने की सम्भावना बनती है | पश्चिम दिशा में अग्नि का स्थान हो तो गर्मी , पित्त और मस्से की शिकायतें आमतौर पर देखने को मिलती हैं | इस दशा में दोष रहने पर नपुंसकता , पैरों में तकलीफ , कुष्ठ रोग , रीढ़ की हड्डी में कष्ट , गठिया स्नायु एवं वात्  सम्वन्धी रोगों के होने की सम्भावना रहती है |

उत्तर दिशा –

उत्तर दिशा के स्वामी कुबेर , आयुध गदा एवं प्रतिनिधि ग्रह बुध है | बुध को उत्तर दिशा का स्वामी माना गया है | बुध जिस ग्रह के साथ होता है उसी के अनुसार अपना फल देता है अर्थात शुभ ग्रहों के साथ हो तो शुभ और अशुभ ग्रहों के साथ रहने पर अशुभ फल देता हैं | उत्तर दिशा बुद्धि , ज्ञान , चिंतन , मनन , विद्या एवं धन के लिए शुभ होती है | यह दिशा मातृ भाव का घोतक है | इस दिशा में खाली जगह छोड़ने से ननिहाल पक्ष से लाभ मिलता है | कवित्व शक्ति तथा विभिन्न प्रकार के अविष्कारों की क्षमता का विकास होता है | नौकर – चाकर , मित्र घर और विभिन्न प्रकार के सुख की प्राप्ति होती है | उत्तर दिशा दोषपूर्ण रहने पर मातृ सुख , नौकर चाकर के सुख , भौतिक सुख आदि की कमी रहती है | साथ ही हर्नियां , ह्रदय एवं सीने के रोग , चार्म रोग, गॉल ब्लैडर , पागलपन हैजे , फेफड़े एवं रक्त से सम्बंधित बीमारियों की सम्भावना रहती है |

दक्षिण दिशा –

दक्षिण दिशा के स्वामी यम , आयुध दंड एवं प्रतिनिधि ग्रह मंगल है | मंगल सांसारिक कार्यक्रम को संचालित करने वाली विशिष्ट जीवन दायनी शक्ति है | यह सभी प्राणियों को जीवन शक्ति , उत्साह , पराक्रम और स्फूर्ति प्रदान करता है | फल स्वरुप दक्षिण दिशा सफलता ,यश, पद, प्रतिष्ठा एवं धैर्य की घोतक है | यह दिशा पिता के सुख का भी कारक है | दक्षिण दिशा से सीने के वायें भाग गुर्दे , बाएं फेफड़े एवं मेरुदंड का विचार किया जाता है | इस दशा को जितना  भारी और ऊँचा रखेंगे उतना ही लाभदायी सिद्ध होगा | घर के दक्षिण में कुआँ , दरार , कचरा, कूड़ादान एवं पुराना कबाड़ हो तो ह्रदय रोग , जोड़ों का दर्द , खून की कमी , पीलिया आदि की बीमारियां होती हैं | दक्षिण द्वार नैऋत्याभिमुख रहने पर दीर्घ व्याधियां एवं अचानक मृत्यु होती है इस दिशा के दोष पूर्ण होने पर स्त्रियों में गर्भपात, मासिक धर्म में अनियमितता , रक्त विकार , उच्च रक्तचाप , बवासीर , दुर्घटना , फोड़े -फुंसी अस्थि-  मज्जा , अल्सर आदि से सम्बंधित बीमारियों की सम्भावना बनती है | साथ ही नौकरी , वयवसाय में नुक़सान , समाज में अपयश, पितृ सुख में अवरोध तथा सरकारी कार्यों में असफलता आदि की सम्भावना रहती है |

ईशान दिशा –

ईशान दिशा के स्वामी रूद्र , आयुध त्रिशूल एवं प्रतिनिधि ग्रह बृहस्पति है | बृहस्पति को सर्वाधिक शुभ ग्रह कहा गया है | आध्यात्मिक विकास के लिए ,प्रयत्नशील जिज्ञासुओं के लिए बृहस्पति अति शुभ होता है | इसका प्रभाव सर्वदा सात्विक होता है | ईशान दिशा अत्यधिक पवित्र होने के कारण इसकी सुरक्षा अनिवार्य है | यह दिशा बुद्धि , ज्ञान , विवेक धैर्य और साहस का सूचक है | इस दिशा को खुला साफ – सुथरा नीचे एवं कम से कम निर्माण कार्य करना चाहिए फलस्वरूप आध्यात्मिक मानसिक एवं आर्थिक सफलता देखने को मिलती है | साथ ही वास करने वाले लोग अच्छी वाणी बोलने वाले होते है इस दिशा में शौचालय , सेप्टिक टैंक एवं कूड़े – करकट रखने पर सात्विकता में कमी वंश वृद्धि में अवरोध , नेत्र , कान गर्दन एवं वाणी में कष्ट भी होता है  | साथ ही वसा ,जन्य , लीवर , मधुमेह , तिल्ली आदि से सम्बंधित बीमारियां होने की सम्भावना रहती है | उत्तर – पूर्व में रसोई घर रहने पर खांसी ,  अम्लता , बदहज़मी , पेट में गड़बड़ी आंतो के रोग होते हैं |

वायव्य दिशा –

वायव्य दिशा के स्वामी वायु  एवं आयुध अंकुश है | इस दिशा में प्रतिनिधि ग्रह चंद्र है | चंद्र में शुभ और अशुभ , सक्रिय और निष्क्रिय दोनों प्रकार की क्षमता होती है | चंद्र शुभ होने पर जातक को सुकीर्ति और यश मिलता है | उसका समुचित मानसिक विकास होता है तथा पारवारिक जीवन सुखमय होता है | वायव्य दिशा मित्रता एवं शत्रुओं को बतलाता है | इस दिशा का सम्बन्ध अतिथियों एवं सम्बन्धियों से है | यह दिशा मानसिक एवं विद्वत्ता का परिचायक है साथ ही कालपुरुष की शरीर में नाभि , आंत , पित्ताशय , गर्भाशय , पेट का ऊपरी भाग घुटने एवं दायां पैर का प्रतिनिधित्व करता है | किसी भी घर में वायव्य की दिशा , ईशान की अपेक्षा नीची हो तो शत्रुओं की संख्या में वृद्धि होती है तथा स्त्रियां रोगग्रस्त एवं घर भय ग्रस्त रहता है | वायव्य के दोषपूर्ण होने पर फेफड़े , ह्रदय ,छाती ,सर्दी  जुकाम निमोनिया , अपेंडिसाइटिस , डायरिया , स्त्रियों में मानसिक धर्म की अनियमतता एवं स्त्री रोगों की सम्भावना रहती है |

आग्नेय दिशा –

आग्नेय दिशा के स्वामी गणेश , आयुध शक्ति एवं प्रतिनिधि ग्रह शुक्र है | शुक्र समरसता तथा परस्पर मैत्री संबंधों का ग्रह माना जाता है | शुक्र से प्रभावी जातक आकर्षक , प्रभावी , कृपालु , मिलनसार तथा स्नेही होते हैं | आग्नेय दिशा का सम्बन्ध स्वास्थ्य से है | यह दिशा परमात्मा सृष्टि को आगे बढ़ाती है | यह दिशा बायीं भुजा , घुटने नेत्र एवं उचित शयन – सुख को भी दर्शाती है | इस दिशा में किसी तरह का दोष रहने पर दाम्पत्य – सुख में कमी आती है | साथ ही नपुंसकता , मधुमेह , तिल्ली बहरापन , गूंगापन छाती आदि से सम्बंधित बीमारियों की सम्भावना रहती है |

नैऋत्य दिशा –

नैऋत्य दिशा का स्वामी राहु एवं देवता नैऋत्य नामक राक्षस है | राहु एक शक्तशाली छाया ग्रह है | प्रत्यक्ष रूप में राहु ग्रह के अनिष्टकारी फल दूर नहीं किये जा सकते | केवल ज्ञान तथा बुद्धि पूर्वक इससे सहयोग करके इसके दुष्प्रभावों को कम किया जा सकता है | नैऋत्य दिशा सभी प्रकार की विषमताओं एवं संघर्षों से जूझने की क्षमता प्रदान करती है | साथ ही स्थायी , सही निर्णय , एवं किसी भी निर्णय को मजबूती से दिलवाने में मदद करता है | यह दिशा आयु , अकस्मात दुर्घटना , आत्महत्या बाहरी जननेन्द्रियों , बायाँ पैर , किडनी , पैरों की बीमारियों , स्नायु रोग आदि का प्रतिनिधित्व करता है | इसके अतिरिक्त इस दिशा में निवास करे वाले लोगों में त्वचा रोग , पैरों की बीमारियां हाइड्रोसिल एवं स्नायु से सम्बंधित बीमारियों की सम्भावना होती है | घर के नैऋत्य क्षेत्र में खली जगह , गड्ढ़ा , भूतल , जल की वयवस्था एवं कांटेदार वृक्ष हो तो गृहस्वामी बीमार होता है तथा उसकी आयु क्षीण होती है | शत्रु पीड़ा पहुंचाते हैं तथा सम्पन्नता दूर रहती है

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