भाई बहन के पावन प्रेमका प्रतीक रक्षाबंधन दोनों के आपसी प्रेम की दृढ़ता को प्रकट करता है | भाई-बहन का प्रेम एक दूसरे को ऐसी शक्ति प्रदान करता है जिससे मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियां भीअनुकूल हो जाती हैं |

यह पर्व श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को मनाया जाता है | इस दिन बहन अपने भाई के माथे पर तिलक लगाती है कलाई पर रक्षा सूत्र बांध उसके दीर्घ जीवन की कामना करती है भाई भी बहनों की झोली उपहारों से भरते हुए संकट की हर घड़ी में सहायता के लिए तत्पर रहने का वचन देता है | इसके अतिरिक्त इस दिन गुरु शिष्य परम्परा के अनुसार विद्यार्थियों का यज्ञोपवीत संस्कार तथा ऋषि तर्पण आदि की भी परम्परा है |

राखी से संबधित प्रचलित कई ऐतिहासिक घटनाएं

द्रौपदी व श्री कृष्ण की कथा:

इतिहास साक्षी है जब दुश्शासन भरी सभा में द्रौपदी का चीर हरण कर रहा था तब द्रौपदी ने कृष्ण को अपनी रक्षा के लिए पुकारा तो वे नंगे पाँव दौड़े चले आये और भरी सभा में उसकी लाज बचायी | भले ही कृष्ण और द्रौपदी के बीच सखा भाव का सम्बन्ध हो परन्तु कहा जाता है कि द्रौपदी व कृष्ण पूर्व जन्म में भाई-बहन थे | उसकी राखी के प्रति अपनी वचनबद्धता को कृष्ण कैसे भूल सकते थे |

देवताओं और दानवों की घोर युद्ध कथा:

एक बार देवताओं और दानवों में घोर युद्ध हुआ |    देवता हार गए और दानव स्वर्ग पर अधिकार करने लगे | तब देवगुरु बृहस्पति की सलाह से देवताओं के राजाइंद्र की पत्नी शचिने श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन अपने पति की कलाई पर ऋषियों द्वारा अभिमंत्रित रक्षा सूत्र बांधा था | परिणामस्वरुप देवताओं की विजय हुई |

कर्णावती व हुमायूँ की कथा:

एक ऐतिहासिक घटना यह भी है कि सोलहवीं शताब्दी के मध्य मेवाड़ के राजपूत राणा सांगा के निधन के उपरांत जब उनकी महारानी कर्णावती ने राज काज संभाला ही था कि गुजरात के सम्राट बहादुरशाह ने मेवाड़पर चढाई कर दी |

राजपूतों की कम संख्या देखकर मेवाड़ की रानी कर्णावती ने दिल्ली के सम्राट हुमायूँ को भाई मानकर उसके पास राखी भेजी | राखी के धागों में एक राजपूत वीरांगना के हृदय की जो वेदना छिपी थी , वह जाति और धर्म से कहीं ऊंची थी |

इस सदभावना ने हुमायूँ के हृदय को छू लिया और वह अपनी राखीबंध बहन की रक्षा के लिए फ़ौज के साथ  मेवाड़ की ओर चल पड़ा और मेवाड़ की रक्षा की | इस तरह एक भाई ने अपनी बहन के रक्षा सूत्र की मर्यादा रखी |

रक्षाबंधन यम लोक में भी :

रक्षाबंधन की पावनता से यमलोक भी अछूता नहीं है | इस दिन मृत्यु के देवता यम को उनकी बहन ने राखी बांधी और अमर होने का वरदान दिया | यम ने इस पावन दिन के महत्व कोअक्षुण्ण रखते हुए घोषणा की कि जो भाई इस दिन अपनी बहन से राखी बंधवाएगा और उसे रक्षा का वचन देगा वह हमेशा अमर रहेगा |

एक- दूसरे को स्नेह सदभावना एवं कर्तव्य के सूत्र में पिरोने वाले इस त्यौहार के पीछे यह भाव है कि समाज में रहने वाले लोग एक दूसरे के साथ मिल जुल कर रहें और जरुरत पड़ने पर एक दूसरे की रक्षा के लिए आगे आएं |

रक्षाबंधन दिवस के अन्य महत्व

पुराण की एक अन्य कथा के अनुसार आज ही के दिन श्रवण नक्षत्र के प्रारम्भ में भगवान विष्णु के हयग्रीव अवतार का जन्म हुआ था तभी से वैष्णव समुदाय इसे हयग्रीव जयंती के रूप में मनाता है | दूसरी कथा के अनुसार इसी दिन श्री हरी ने ऋग्वेद और यजुर्वेद की संख्या में सामवेद की अभिवृद्धि की थी  | भगवान का यह सामगान प्रथम बार वितस्ता सिंधु के संगम पर श्रावणी पूर्णिमा के दिन किया गया था और  इसी से इस दिन संगम पर किया जाने वाला स्नान समस्त सिद्धियां प्रदान करता है |

स्कंद पुराण में दिए गए ईश्वर सनत्व कुमार संवाद के अनुसार श्रावणी पूर्णिमा का प्रभात होते ही श्रुति-स्मृति के विधान को समझने वाले बुद्धिमान द्विज हेमाद्रि स्नान करने के पश्चात्  पितृ  ऋषि एवं देवताओं का तर्पण संध्या जप तथा पूजन से निवृत्त होकर मोतियों से मंडित रंगीन शुद्ध रेशम के तंतु एवं गुच्छों से शोभित सूत्र लेकर आकण्ठ जलपूर्ण कलश पर उसे रख दें तथा कुमकुम , अक्षत , पुष्पादि से उसका पूजन करें |

राखी का ज्योतिषीय सम्बन्ध –

किसी भी कुंडली में जातक का छोटा भाई छोटी बहन तृतीये भाव से देखे जाते हैं जबकि बड़े भाई या बहन की ग्यारहवें भाव से पड़ताल की जाती है तब लग्न से तृतीये भाव या एकादश भाव उपचय भाव होता है | जिसका अर्थ वृद्धि होता है अर्थात छोटे हों या बड़े भाई बहन कुंडली आपसी विकास का पर्यायहैं,  दूसरी बात यह है कि ग्यारहवें भाव से तृतीये भाव पंचम होता है जो कि त्रिकोण भाव है जिसका सम्बन्ध साक्षात लक्ष्मी  से होता है इन सब बातों का मतलव या अभिप्राय यह हुआ कि जातक तथा उसके भाई – बहन का विकास आपस के प्रेम – दुलार, सौहार्द से जुड़े हुए हैं | यह पर्व इसी प्रेम भाव को विकसित करने के लिए आता है ताकि कभी आपस में मनभेद व मतभेद न हो जिसके फलस्वरूप प्रसन्नता व विकास बाधित हो | कुछदशकोंपहले तक कन्याओं को दूसरे घर का समझने की प्रथा थी तथा उस का सामना अपने जन्म के परिवार वालों से विवाहोपरांत सिर्फ तीज-त्यौहार और पर्वों पर ही होता था लेकिन आजकल की परिस्थितियों में बड़ा बदला व है बच्चों की संख्या कम से और कम हो गयी है जिसके फलस्वरूप कन्या की भागीदारी अपने जन्म के घर पर बहुत हद तक विवाह के बाद भी रहती है , जिसके कारण उसके और उसके भाई के बीच में मन भेद व मतभेद उभर सकते हैं | जिस का कारण कुंडली के विभिन्न भावों से प्रदर्शित हो सकता है जैसा कि –

१- कन्या को लगना कि भाई व्यस्तता या किसी और कारणवश माँ-बाप की देखभाल सही नहीं करता ( चतुर्थभाव , नवमभाव, द्वादशभाव ) |

२- कन्या का अपने पिता की संपत्ति में इच्छा रखना ( अष्टम व तृतीये भाव ) |

३- वैवाहिक परेशानियों की वजह से कन्या का अपने जन्म के परिवार पर आश्रित होना ( चतुर्थ व एकादश भाव ) |

४- सबल कन्या का दुर्बल भाई या परिवार की धन से मदद करना  ( द्वादश भाव ) | उपरोक्त परिस्थितियों को ध्यान में रखकर इस पर्व की महिमा इस कलयुग में और भी बढ़ जाती है ताकि भाई व बहन विषम से विषम परिस्थितियों के अंदर अपना धैर्य न खोएं और आपसी सूझ-बुझ से प्रेम को बनाये रखें |

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