आज का युग प्रतिस्पर्धा का युग है | शिक्षा के आरम्भ के वर्षों में माता-पिता को चाहिए कि बालक की अभिरुचि , मनोवृत्ति और बौद्धिक योग्यता को जानने की कोशिश करें | इस क्षेत्र में ज्योतिष माता-पिता की सहायता कर सकते हैं | ज्योतिष कि नियमों द्वारा यह जाना जा सकता है कि जातक में बौद्धिक योग्यता कितनी है और उसकी मनोवृत्ति किस ओर है | एक योग्य ज्योतिषी माता – पिता को होने वाली घटनाओं का पहले से ही अनुमान लगाकर उनका मार्गदर्शन कर सकता है |

स्वस्थ शरीर में स्वस्थ बुद्धि और मन रहता है | इसलिए शरीर का स्वस्थ रहना पहली शर्त है | यदि लग्नेश पाप ग्रहों से युक्त दृष्ट होकर ६,८,१२ भावों में स्थित हो तो जातक रोगी रहता है | इससे जातक की योग्यता पर प्रभाव पड़ता है |

लग्न- से उपचय भाव तीन, छह , दस और ग्यारह  जातक को उत्साह और आगे बढ़ने की शक्ति, हिम्मत, शत्रुओं से लड़ने की शक्ति , प्रतिस्पर्धा को शक्ति देते हैं | उपचय भाव में अशुभ ग्रह मंगल , सूर्य , शनि ग्रह आदि जातक को प्रतिस्पर्धा की शक्ति प्रदान करतें हैं |

द्वितीय भाव – द्वितीय भाव से हम हीरे , मोती , सोना , चांदी आदि धातुओं का क्रय -विक्रय आदि का अनुमान लगते हैं. यदि  कोई भावेश द्वितीय भाव में स्थित है तो उस भावेश की वस्तु के क्रय-विक्रय द्वारा धन कमाना  अथवा सत्य -झूठ या बहु भाषण (वकील नेता आदि )आदि  का  अनुमान हम द्वितीय भाव से लगाते हैं | द्वितीय भाव से स्मरण शक्ति का भी अनुमान लगाया जा सकता है जैसे –

  • धनेश चतुर्थेश से युक्त या दृष्ट हो तो जातक को माता की संपत्ति प्राप्त होती है |
  • धनेश चतुर्थेश से युक्त या दृष्ट नवांश और दशमांश में भी हो तो जातक को किसी बंधु या कृषि कर्म से धन लाभ होता है |
  • यदि धनेश बलवान होकर पंचमेश या पंचम कारक ग्रह बृहस्पति से युति या दृष्टि सम्बन्ध हो तो जातक को पुत्र से धन लाभ होता है |
  • यदि चतुर्थेश धन भाव में पाप ग्रह से युक्त होकर नीच राशि या शत्रु राशि में स्थित हो तो जातक भूमि का क्रय-विक्रय करने वाला होता है |
  • यदि द्वितीयेश कोई पाप ग्रह हो और नीच राशि या शत्रु राशि में स्थित होकर बलवान चतुर्थेश से दृष्टि या युति सम्बन्ध करे तो जातक भूमि का क्रय -विक्रय करने वाला होता है |
  • इन सब योगों से स्पष्ट होता है कि जातक को धन की प्राप्ति कैसे होगी द्वितीय भाव और द्वितीयेश से जाना जा सकता है | इससे जातक के माता पिता का मार्ग दर्शन किया जा सकता है |
  • चतुर्थ भाव से हम केवल जातक के शिक्षा के बारे में ही नहीं जानते अपितु किस विषय पर शिक्षा होगी , किस प्रकार की शिक्षा जातक ग्रहण करेगा भी जाना जा सकता है | ज्योतिष के कई ग्रंथों में स्पष्ट लिखा है कि कौन सा ग्रह किस प्रकार की शिक्षा के लिए जातक को प्रेरित करेगा | यदि उसका प्रभाव चतुर्थ भाव पर हो शुक्र संगीत की शिक्षा , बुध शिक्षा , सूर्य और चंद्र | राजनैतिक विज्ञान , मनोविज्ञान और पराविद्या की शिक्षा देते हैं | सूर्य और बुध गणित , सूर्य ,शुक्र या बुध और शुक्र जातक को कवि बनाते हैं | मंगल और सूर्य जातक को तर्क शास्त्र का ज्ञाता बनाने में मदद करते हैं | इत्यादि |

चतुर्थ भाव और चतुर्थेश को प्रभावित करने करने वाले ग्रहों के अध्ययन से जातक की शिक्षा के विषय में जाना जा सकता है |

पंचम भाव से जातक के सोचने की शक्ति देखते हैं | यही भाव बौद्धिक लब्धि कोष्ठक को भी बतलाता है |

शुभ योग

  • पंचम भाव में शुभ राशि हो तथा शुभ ग्रहों की युति या दृष्टि हो |
  • पंचम भाव शुभ ग्रहों के मध्य हो तथा पंचमेश बलवान हो |
  • पंचमेश अपनी उच्च , स्वराशि या मित्र राशि में स्थित हो या शुभ ग्रहों के मध्य हो |
  • बृहस्पति केंद्र या त्रिकोण में स्थित हो और बलवान हो |
  • बलवान बुध पंचम भाव में स्थित हो तथा पंचमेश बलवान होकर केंद्र में स्थित हो |

अशुभ योग

  • चन्द्रमा षष्ट , अष्टम या द्वादश भाव में स्थित हो और शुक्र देखता हो |
  • पंचम भाव शुभ ग्रहों के मध्य हो तथा पंचमेश बलवान हो |
  • पंचमेश अपनी उच्च , स्वराशि या मित्र राशि में स्थित हो या शुभ ग्रहों के मध्य हो |
  • बृहस्पति केंद्र या त्रिकोण में स्थित हो और बलवान हो |
  • बलवान बुध पंचम भाव में स्थित हो तथा पंचमेश बलवान होकर केंद्र में स्थित हो |
  • चन्द्रमा और शनि केंद्र में स्थित हो और चन्द्रमा पीड़ित हो |
  • शनि और तृतीयेश दोनों साथ-साथ हों |
  • राहु और तृतीयेश दोनों साथ – साथ हों |
  • लग्न में चन्द्रमा हो और शनि और मंगल से दृष्ट हो |

ऊपर के योगों से यह स्पष्ट हो जाता है कि यदि पंचम भाव पंचमेश , कारक बृहस्पति , बुध , और चन्द्रमा पीड़ित हो तो जातक मंद बुद्धि होता है | वह पढ़ाई में  पीछे रह जाता है | बुध का सम्बन्ध यदि द्वितीय भाव से हो तो जातक चंचल बुद्धि वाला होता है | उसमे एकाग्रता की कमी आ जाती है और वह शिक्षा में पीछे रह जाता है | यही प्रभाव चन्द्रमा का सूर्य के साथ होने पर होता है | सूर्य और चन्द्रमा लग्न और त्रिकोण में स्थित हो तो जातक की एकाग्रता में कमी होती है |

तत्व

बुध यदि वायु तत्व या अग्नि तत्व की राशियों में स्थित हैं तो जातक बुद्धिमान होता है |

बुध यदि पृथ्वी तत्व की राशियों में स्थित है तो जातक को गणित और गणित से सम्बंधित विषयों में परेशानी होती है | इसलिए ऐसे जातक को उन विषयों में शिक्षा नहीं लेनी चाहिए | उसे इतिहास , राजनैतिक आदि विषय ठीक रहते हैं |

बुध यदि जल तत्व की राशियों में स्थित होता है तो उसके बौद्धिक विकास में कमी आ जाती है | उस जातक को जब तक कोई दूसरा ग्रह मदद नहीं करता तब तक जातक शिक्षा से दूर भागता है |

दशम भाव एवं शिक्षा

शिक्षा का अध्ययन हम व्यवसाय को ध्यान में रखकर ही करते हैं | इसलिए दशम भाव में स्थित ग्रह , राशि और तत्व को ध्यान में रखकर ही निर्णय लेना उपयुक्त होगा |

दशान्तर्दशा

यह सर्वमान्य ज्योतिष का नियम है कि ग्रह अपना फल अपनी दशा और अंतर्दशा में देते हैं | जन्म कुंडली में चाहे कितने भी उच्च ग्रह क्यों न बैठे हों परन्तु जब तक उनकी दशा या अंतर्दशा नहीं आएगी तब तक उनका फल जातक को नहीं मिल सकता  | इसलिए शिक्षा के काल के समय जातक की कौन सी दशा – अंतर्दशा चल रही है उसका भी कम महत्व नहीं होता | इसलिए दशा – अन्तर्दशा के ग्रहों का बल तथा भाव स्थिति देखकर ही विषयों का चयन आवश्यक है |

गोचर

गोचर का अपना महत्व है | दशा अंतर्दशा जहां भूमि को उर्वरा बनाती है  तो गोचर उसको पल्ल्वित और पुष्पित करता है | इनमे शनि और बृहस्पति का विशेष महत्व है | इन दो ग्रहों का जातक के किस भाव पर विशेष प्रभाव पड़ रहा है इसका भी अध्ययन आवश्यक हो जाता है | जिन – जिन भावों पर शनि और बृहस्पति का संयुक्त प्रभाव पड़ रहा है उस भाव से विशेष कर फल  ज्यादा मिलता है | इसलिए शिक्षा के विषयों का चयन करते हुए दशान्तर्दशा और गोचर का ध्यान भी आवश्यक हो जाता है | क्योंकि बिना दशान्तर्दशा तथा गोचर के फलित निर्णय नहीं लिया जा सकता |

योग :

योग फलित ज्योतिष का एक आवश्यक अंग है | ग्रहों की भावों में एक विशेष स्थिति जातक को प्रभावित करती है | इसलिए ज्योतिष ग्रंथों में योगों का विशेष महत्व है शिक्षा से सम्बंधित कुछ योग इस प्रकार हैं –

बुधआदित्य योग

बुध और सूर्य की युति को बुध आदित्य योग कहते हैं |

यह सर्वविदित है कि ग्रह सूर्य कि निकट आ जाता है और अस्त हो जाता है | अस्त का अर्थ यह है कि वह ग्रह अपना प्रभाव देने में असमर्थ हो जाता है | इसलिए बुध भी सूर्य कि निकट हो तो अस्त हो जाता है | इसलिए बुध भी सूर्य से चौदह अंश तक दूर रहना चाहिए यदि बुध वक्री है तो बारह अंश दूर रहना चाहिए | इसलिए बुध – आदित्य योग में बुध और सूर्य का कम से कम चौदह अंश का अंतर आवश्यक है |

सांख्य योग यदि पंचमेश और षष्ठेश एक दूसरे से केंद्र में स्थित हों और लग्नेश बलवान हों तो जातक अच्छी शिक्षा प्राप्त करता है |

सरस्वती योग

यदि शुभ ग्रह ( बृहस्पति , शुक्र , बुध और चंद्र ) केंद्र ( १,४,७,१० ) त्रिकोण (५,९ ) और दूसरे भाव में इकठे या अलग-अलग स्थित हों तो जातक उच्च शिक्षा प्राप्त करता है |

बुद्ध योग

यदि गुरु लग्न में चन्द्रमा केंद्र में , राहु चन्द्रमा से द्वितीय भाव में , सूर्य और मंगल राहु से तृतीये भाव में स्थित हों तो जातक बौद्धिक सक्षम होता है |

ऊपर के योग में बृहस्पति लग्न में चन्द्रमा , सूर्य , मंगल ( मित्र ग्रह ) एक दूसरे से केंद्र में होने के कारण एक दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं | राहु चन्द्रमा से द्वितीय में स्थित है जो शुभ है |

ऊपर लिखित कुछ योगों से स्पष्ट है कि कारक ग्रह बुद्ध और चन्द्रमा यदि केंद्र या त्रिकोण में स्थित हों तो जातक बुद्धिमान होता है | उनका बौद्धिक लब्धी कोष्ठक उच्च होता है | इसलिए शिक्षा का निर्णय लेते हुए बुद्धिकारक ग्रहों की भाव स्थिति ,राशि , तत्व , दशान्तर्दशा और गोचर का ध्यान रखकर ही निर्णय लिया जाये तो माता – पिता जातक में छिपे गुणों का पूर्ण -विकास कर जातक को जीवन में सफल व्यक्ति बना सकते हैं |

कुंडली में अत्यंत कठिन कार्य होता है जब किसी ग्रह पर किसी अन्य ग्रह की दृष्टि , युति , राशिपरिवर्तन , का अन्यतर स्थान दृष्टि सम्बन्ध नहीं है | इसी से योग बनते हैं और जातक के जीवन को प्रभावित करते हैं | कुछ योग संक्षिप्त में इस प्रकार हैं –

सूर्य + चन्द्रमा  : शत्रु को पराजित करने वाला , शस्त्र धारण करने वाला सैनिक |

सूर्य + मंगल : शस्त्र धारण करने वाला दंडाधिकारी |

सूर्य + बुद्ध : विज्ञान सम्बन्धी ज्ञान |

सूर्य + गुरु : पुरोहित ( प्रवचन करने वाला ) |

सूर्य + शुक्र : वाहन |

सूर्य + शनि : दुःख परदेश में नौकरी |

सूर्य + राहु : पिता को भय , अपराधिकीय , आध्यात्मिक ज्ञान , कृषि या वनस्पति ज्ञाता , वैद्य |

चंद्र + मंगल : व्यापार से धन , अपने परिश्रम से आजीविका |

चंद्र + बुध : सलाहकार , मंत्री

चंद्र + गुरु : ज्योतिषी , विद्वान |

चंद्र + शुक्र : कवि |

चंद्र + शनि : पुस्तक मुद्रण या विक्रेता |

मंगल + बुध : इंजीनियर इत्यादि |

पृथ्वी तत्व राशियां (२,६,१० ) यथार्थवादी , व्यवहारिक बनाती है | ऐसा व्यक्ति , कृषि , बागवानी भवन निर्माण सड़क निर्माण या प्लाट का क्रय – विक्रय इमारती लकड़ी का व्यापार या फर्नीचर आदि का कार्य या शिक्षा प्राप्त करता है |  ऐसा जातक एक सफल प्रबंधक का कार्य भी करता है | कन्या राशि का सूर्य और बुध का सम्बन्ध दशम या चतुर्थ भाव से हो तो जातक लेखा परीक्षक या कर अधिकारी बनता है |

वायु तत्व राशियाँ ३,७,११ जातक के बौद्धिक स्तर को बहुत  उठाती हैं | ऐसे जातक बुद्धिमान , चिंतन मनन करने वाला , दार्शनिक , लेखक , जर्नलिस्ट , विचारक या वैज्ञानिक शोधकर्ता होता है | इसके सोच की शक्ति बहुत विकसित होती है | ऐसा जातक वकील , साहित्यकार और एक अच्छा सलाहकार होता है |

जल तत्व राशियाँ ( ४,८,१२,) ऐसे जातक का बौद्धिक स्तर ज्याद अच्छा नहीं होता | दूध , घी पेय पदार्थ या रासायनिक पदार्थों में रूचि लेता है | जल भण्डारण बोध , नहर सिंचाई आदि कार्य रुचिकर होते हैं |

इस प्रकार हम पाते हैं कि लग्न , द्वितीय , चतुर्थ , पंचम  एवं दशम भाव और भावेश पर पड़ने वाले तत्वों का जातक के जीवन पर बहुत प्रभाव होता है | इसलिए भावों के तत्वों का विशेष ध्यान रखना चाहिए |

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