विनायक चतुर्थी

गजाननं भूतगणादि सेवितं कपित्थजम्बुफलचारु भक्षणम्  |

उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम् || 

हे गज के सर वाले , सभी गणों द्वारा पूजित  कैथ और जामुन खाने वाले , शोक का विनाश करने वाले पार्वती पुत्र विघ्नेश्वर गणपति मैं आपके चरण कमलों में नमन करता हूँ |

श्री गणेश जी का जन्म भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को अभिजित मुहूर्त में वृश्चिक लग्न में हुआ था | उनका जन्मोत्सव विनायक चतुर्थी के नाम से विशेष हर्षोल्लास से मनाया जाता है | गणेश चतुर्थी का त्यौहार दस दिन पश्चात अनन्त चतुर्दशी के दिन मिट्टी से बनायीं  गयीं मूर्तियों को जल में विसर्जित करके संपन्न किया जाता है |

गणपति जन्म कथा –

शिव पुराण के अनुसार एक बार माता पार्वती जब स्नान के लिए जा रहीं तो अंगरक्षकों की अनुपस्थिति के कारण उन्होंने एक बुत बनाया और उसमें जीवन डाल दिया और इस प्रकार उन्होंने अपनी सुरक्षा हेतु भगवान श्री गणेश को जन्म दिया और उन्हें आदेश दिया कि वह किसी को भी घर के अंदर प्रवेश नहीं करने दें | कुछ समय बाद जब भगवान शिव बाहर से घर लौटे तो गणेश ने उन्हें अंदर जाने से रोका तब क्रोधित होकर भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से उस बच्चे का सिर काट दिया | जब माता पार्वती बाहर आयीं तो अपने पुत्र का मृत शरीर देखकर बहुत क्रोधित हुईं और भगवान शिव से गणेश को पुनर्जीवन देने का आग्रह किया | देवी पार्वती के आग्रह करने पर भगवान शिव ने हाथी  का शरीर गणेश जी के शरीर में जोड़ उन्हें पुनर्जीवन दिया | और सभी देवताओं ने इन्हें शक्ति और समृद्धि का आशीर्वाद दिया |

गणेश कैसे बने गणपति

एक बार देवताओं में अपने समूह के मुखिया का निर्णय करने हेतु प्रतियोगिता  हुई | इस प्रतियोगिता के अनुसार जो  पूरे ब्रह्माण्ड की परिक्रमा करने के पश्चात  शीघ्रातिशीघ्र भगवान शिव और देवी पार्वती के चरणों में पहुंचेगा वह समस्त देवगणों का स्वामी कहलाएगा | सभी देवता अपना – अपना वाहन लेकर इस प्रतियोगिता में कूद पड़े , परन्तु भगवान गणेश ने पूरे ब्रह्माण्ड की परिक्रमा करने की अपेक्षा भगवान शिव और माँ पार्वती की ही परिक्रमा कर ली और भगवान के चरणों में आकर कहने लगे कि भगवान शिव और देवी पार्वती की परिक्रमा ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की परिक्रमा है | तब भगवान गणेश के इस उत्तर से भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्हें विजेता घोषित करके गणपति के पद पर नियुक्त किया गणपति शब्द दो शब्दों गण और पति से मिलकर बना है | महर्षि  पाणिनि के अनुसार आठ वसुओं के समूह को गण कहते हैं | वसु का अभिप्राय दिशा स्वामी और दिक्पाल से है | अत: गणपति का अर्थ है दिशाओं के देवता | दूसरे देवता बिना गणपति की आज्ञा के पूजास्थल पर नहीं पहुँचते इसीलिये किसी भी शुभ कार्य या देव पूजन का आरम्भ गणपति की पूजा के बिना नहीं किया जाता | जब गणपति सभी दिशाओं की बाधाओं को दूर कर देते हैं तभी उपास्य देव पूजा स्थल पर पहुँचते हैं |

क्यों हैं गणेश एकदन्त –

पुराणों के अनुसार एक बार महर्षि व्यास गणेश से महाभारत लिखने की विनती की थी | तब भगवान गणेश ने कहा कि  यदि महर्षि व्यास बोलते हुए रुकेंगे नहीं तो उन्हें उनका यह आग्रह स्वीकार्य होगा | तत्पश्चात महर्षि व्यास बिना रुके अनवरत बोलते गए और गणेश जी लिखते गए , लिखते – लिखते अचानक गणेश जी की कलम टूट गयी तो उन्होंने शीघ्रता से अपना एक दांत तोड़कर उसे कलम के रूप में प्रयोग करके लिखना जारी रखा | और तभी से वे एकदन्त नाम से प्रसिद्ध हुए |

  क्यों है चूहा श्री गणेश जी का वाहन –

भगवान गणेश की शारीरिक बनावट के मुकाबले उनका वाहन छोटा सा चूहा है | भगवान गणेश ने आखिर निकृष्ट माने जाने वाले इस जीव को ही अपना वाहन क्यों चुना ? चूहे का काम किसी भी चीज को कुतर डालना है , जो भी वस्तु चूहे को नजर आती है वह उसकी चीर-फाड़ कर उसके अंग प्रत्यंग का विश्लेषण कर देता है , गणेश जी बुद्धि और विद्या के अधिष्ठाता देवता हैं | तर्क – वितर्क में उनका कोई सानी नहीं है |

एक – एक बात या समस्या की तह में जाना , उसकी मीमांसा करना और उसके निष्कर्ष तक पहुंचना उनका शौक है | मूषक भी तर्क – वितर्क में पीछे नहीं है | हर वस्तु को काट – छांट कर रख देता है और उतना ही फुर्तीला भी है  ,जो जागरूक रहने का सन्देश देता है | गणेश जी ने कदाचित चूहे के इन्हीं गुणों को देखते हुए उसे अपना वाहन चुना |

गणेश जी के प्रमुख अवतार –

१- सुमुख – सुन्दर मुख वाले 
२- एकदन्त – एक दांत वाले
३- लम्बोदर – लम्बे उदर वाले
४- विनायक – उन्नत मार्ग पर ले जाने वाले विशिष्ट नायक
५- विघ्नहर्ता – विघ्नों का नाश करने वाले
६- गजानन – हाथी के मुख वाले
७- गणपति – गणों के स्वामी
८- धूम्र वर्ण – धुएं के समान वर्ण की ध्वजा वाले

गणेश जी के हाथ एवं हाथों में विराजित चिह्नों का महत्व –

गणेश जी चतुर्भुज हैं | वे जल तत्व के अधिपति हैं | जल के चार गुण होते हैं – शब्द , स्पर्श , रूप , रस |

सृष्टि भी स्वदज अण्डज, उदभिज तथा जरायुज चार प्रकार की होती है | पुरुषार्थ भी चार प्रकार के होते हैं – धर्म , अर्थ , काम तथा मोक्ष | गीता के अनुसार भगवान के भक्त चार प्रकार के होते हैं | 

इस प्रकार गणेश जी के चार हाथ चतुर्विध सृष्टि , चतुर्विध पुरुषार्थ , चतुर्विध भक्त तथा चतुर्विध परम उपासना का संकेत करते हैं |

१- पाश – गणेश जी के एक हाथ में पाश ( ग्रंथि , बंधन ) विद्यमान है | यह पाश राग , मोह और तमोगुण का प्रतीक माना जाता है | इसी पाश के द्वारा श्री गणेश भक्तों के पाप – समूहों और सम्पूर्ण प्रारब्ध का आकर्षण करके अंकुश से उनका नाश कर देते हैं |

२- अंकुश – गणेश जी के हाथ में न्यायशास्त्र का अंकुश है तथा यह प्रवृत्ति तथा रजोगुण का चिह्न है | यह क्रोध का भी संकेतक है | इसी के द्वारा गणेश जी दुष्टों को दण्डित करतें हैं |

३- परशु – गणेश जी के हाथ में परशु ( फरसा ) प्रमुखता से दिखाई देता है | यह तेज धार वाला है | इसे तर्क शास्त्र  का प्रतीक माना जाता है |

४- वरमुद्रा – गणपति प्राय: वरमुद्रा में दिखाई देते हैं | वरमुद्रा सत्वगुण का प्रतीक है | इसी से भक्तों की मनोकामना पूरी कर अपने अभय हस्त से सम्पूर्ण भयों से भक्तों की रक्षा करते हैं |

इस प्रकार गणेश जी के उपासक रजोगुण , तमोगुण , और सत्वगुण इन तीनों से ऊपर उठकर एक विशेष आनंद का अनुभव करते हैं |

इस प्रकार गणेश जी का बाह्य व्यक्तित्व जितना निराला है , आंतरिक गुण भी उतने ही अनूठे हैं |

भगवान गणेश से श्रापित है चन्द्रमा –

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवान गणेश स्वर्ग में विचरण कर रहे थे | जब वह चन्द्रमा के पास से गुजरे तो अत्यंत रूपवान चन्द्रमा ने गणेश जी के शरीर और रूप का उपहास किया | तब गणेश जी ने कुपित होकर चन्द्रमा को श्राप दिया कि तुम्हें अपने कर्मों के फलों का भुगतान करना होगा , जिस रूप रंग पर तुम्हें इतना अहंकार है वह नष्ट हो जायेगा और तुम्हारे दर्शन करने वाले मनुष्यों को व्यर्थ का अपमान , कलंक , निंदा व अनिष्ट का भागी बनना पड़ेगा और वे मेरे श्राप से प्रभावित होंगे |

इस भयंकर श्राप को सुनकर चन्द्रमा डर की वजह से कुमुद में रहने लगा | तब ब्रह्मा जी , इंद्र और अग्नि देव ने मिल कर चन्द्रमा को सुझाव दिया कि चतुर्थी के दिन विशेषकर कृष्ण पक्ष में गणेश जी की पूजा करें , उनका प्रिये व्रत नवव्रत रखकर उन्हें खीर और मोदक से प्रसन्न करे तथा सायंकाल भोजन करें और ब्राह्मणों को विधि अनुसार दान करें |

अत: चन्द्रमा ने उपयुक्त तरीके से गणेश जी की स्तुति की तथा अपने घमंड और उपहास पर पश्चाताप किया | अंतत: गणेश जी प्रसन्न हुए और वरदान मांगने को कहा | तब चन्द्रमा ने कहा : प्रभु ! ऐसा वरदान दें कि अपने पाप और श्राप से निर्वृत्त हो जाऊं तथा मनुष्य फिर से मेरे दर्शन कर सुखमय हों | तब गणेश जी  बोले : जाओ मैं तुम्हे अपने श्राप से मुक्त करता हूँ लेकिन भाद्रपद शुक्लपक्ष की चतुर्थी को जो तुम्हारे दर्शन करेगा , उसे मिथ्या विवाद और कष्टों से गुजरना पड़ेगा | किन्तु जो मनुष्य मेरे पहले ( अर्थात चतुर्थी से पहले ) तुम्हारा दर्शन करेंगे ( अर्थात शुक्ल पक्ष द्वितीया के रोज तुम्हारा दर्शन कर लेंगे ) उनको यह दोष नहीं लगेगा | बस , तबसे हर वर्ष चन्द्रमा गणेश चतुर्थी का व्रत रख , गणेश जी की पूजा करते आ रहे हैं |एक बार श्री कृष्ण ने , अनजाने में ही भाद्रपद के शुक्लपक्ष की चतुर्थी का चाँद देख लिया था , जिसकी वजह से उन्हें जीवन भर चोरी के कलंक का सामना करना पड़ा था |

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